खूंटी में हर निकला
खूंटी में हर निकला गाँव में एक बुज़ुर्ग दादी थीं, जिनका नाम था मैना दादी। उनके पास एक पुरानी लकड़ी की खूंटी थी, जो वर्षों से उनके आंगन की दीवार में गड़ी थी। उस खूंटी पर कभी कपड़े टांगे जाते, कभी चाबियों का गुच्छा, तो कभी बच्चों की पतंग की डोर। लेकिन कोई नहीं जानता था कि उस खूंटी में एक राज़ छिपा था। एक दिन, दादी की पोती नंदिनी ने खेल-खेल में खूंटी पकड़कर खींची, तो उसके हाथ में एक सुनहरा हार आ गया। हार चमक रहा था, और उसकी बनावट किसी राजघराने के गहनों जैसी थी। नंदिनी दौड़ती हुई दादी के पास गई और बोली, "दादी! देखो, तुम्हारी खूंटी में से ये निकला है!" दादी की आँखें चौड़ी हो गईं। उन्होंने वह हार अपने कांपते हाथों में लिया और एक गहरी सांस ली। उनकी आँखों में यादों की एक लहर उमड़ आई। उन्होंने कांपती आवाज़ में कहा, "ये वही हार है, जो मेरी माँ ने मुझे दिया था। ये नल-दमयंती की कहानी से जुड़ा है, मेरी बच्ची!" नंदिनी ने उत्सुकता से पूछा, "कैसे दादी?" दादी ने कहना शुरू किया— "बहुत पहले की बात है, जब राजा नल और रानी दमयंती का विवाह हुआ था, तब दमयंती के पास एक दिव्य ...