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Showing posts from June, 2022

नल दमयंती || 01. परिचय सर्ग || हंस कलाधर महाकाव्य

परिचय - सर्ग स्वामी की चाह जान मन में -  श्री आ पहुँची ज्यों निषध-देश । सुख - शान्ति साधनों में प्रवेश - पाकर बैठी ज्यों विविध वैश ॥1॥ स्थायी वास न पाया तो  आकर वसन्त उस देश बसा । नल का शरीर ही केन्द्र मान  मादक यौवन के वेश लसा ॥2॥ ऊषा की चोधक चितवन-सँग चलती थी कर्ममयी लीला,  तोषद विश्राम, प्रेम का पथ  नित्त दिखलाती सन्ध्या वेला ॥3॥ शृंगार सजाकर रजनी नित  आती यौवन सरभार लिये । रत्नों को माया यहीं लुटा  जाती अम्बर को प्यार लिये ॥4॥ शशि कला न अपनी दे पाता  तब भी रजनी आ निषध-देश, मणि- दीपों की मृदु जगमग में  पा जाती थी प्रिय कलित वेश ॥5॥ रजनी का घन लज्जित होता, प्यारी चपला को गोद लिये। कल-भाषण ले आते प्रकाश जब  वातायान से मोद लिये ।।6।। दुख की माया को दूर देश -  तजकर आती नित अंधियारी । वह प्रेम मिलन की वेला में - दिखलाती सुन्दरता सारी॥7॥ तम से प्रकाश की शोभा का होता निशि में शृंगार सफल । जीवन रस से सुन्दरता का  हो पाता था अभिसार सँभल॥8॥ मधुमास रचित रस माया में - अलि - साज रंगीले अम्बर का । मृदु हास भरे वन वैभव में - अभिसार सहज 'गु...

नल दमयंती कथा || आश्रय-लाभ

06 नल दमयंती कथा || आश्रय-लाभ आश्रय-लाभ नल ने पूछा, "हे विप्र कहिये, इसके बाद क्या हुआ? -- न रानी दमयन्तीने उस घोर वन में भटकती हुई और कौन-कौनसे दुःख उठाये ? उस बेचारीको, क्या कही आश्रय, मिला या नहीं ?". ब्राह्मणने कहा, "भाई। जब वह भयानक राक्षसो दमयन्तौ - के सतीत्वसे शक्तिहीन होकर वहाँसे चली गई, तब दमयन्ती भो वहाँसे आगे बढ़ो। चलते-चलते उसे बडो प्यास मालूम होने, लगो, इसी समय दूर पर मृग जन देखकर उसने सोचा, कि - वहाँ कोई जलाशय है, पर ज्यों-ज्यों वह आगे बढती गई, त्यो 1 वह मृग-जल भी दूर भागता गया। इस प्रकार दौडती हाँफती हुई वह जब एक दम हैरान हो गई, तब आर्त होकर कहने... लगी, ―"यदि मैंने सच्चे मनसे- अपने गोल_ सतीत्वका पालन किया होगा और मेरी आत्मा एकबारगो शुद्ध और पवित्र होगी, तो अवश्य हो, अभी यहाँ जल उत्पन्न हो जायेगा। यह,  64 4 कह, उसने बड़े ज़ोरसे पृथ्वी पर पैर पटका | उसका पाद प्रहार होते ही पृथ्वी फाडकर जल निकल पडा - बडा मनोहर सरोवर सा पैदा हो गया । दमयन्तोने उसोका मधुर जल पानकर उसमें खान किया और अपनी थकावट तथा प्यास दूर को। थोडी देर तक उसी जलाशयके पास विश्राम कर, वह आग...

नल दमयंती कथा || सती प्रताप

पाँचवाँ परिच्छेद सती · प्रताप 50 इतनी कथा सुनाकर, वह, ब्राह्मण सुस्तानेके लिये,थोड़ी देर चुप हो रहा । उसकी यह चुप्पी नलको बेतरह | खटकने लगी। उनका हृदय कौतूहलके मारे बल्लियों उछल रहा था और वे प्रत्येक क्षण यही सोच रहे थे, कि क्योंकर में शीघ्रातिशीघ्र इस ब्राह्मणके मुँह से सारी कथा सुन लूँ । इसी लिये उसे चुप देख, उन्होंने बडी घबराहटके साथ कहा, - "हे विप्र । शीघ्र कहो, इस प्रकार नलको ढूँढ़ती और रोती बिलखती हुई दमयन्ती आखिरकार कहाँ जा पहुंची और उसे रास्तेमें किन-किन कठिनाइयोंका सामना करना पडा ?" यह सुन, उस ब्राह्मणने फिर कहना प्रारम्भ किया, "इस - प्रकार उस जङ्गलमें अकेली भटकती हुई, दमयन्तीने सोचा, कि यदि इस समय कोई साथी मिल जाये, तो में उसके साथ-साथ इस गहन वनको पार कर अपने पिताके पास पहुँच जाऊँ । इसी समय उसने सामनेसे गाडी-घोड़ेके साथ बहुतसे आदमियोंको आते देखा । यह देख, उसे बडी प्रसन्नता हुई। 51 इसी समय उस जन-समुदायमें डङ्का बजने लगा और लोग यह कह-कह कर चिल्लाने लगे, कि जो कोई चोर-डाकू यहाँ छिपा हो, वह भाग जाये, हम लोग. यहाँ सैन्य सहित आ पहुँचे हैं, पकडे जानेपर फिरः खैरियत नहीं ...

इन्द्र और तोते की कथा

1️⃣6️⃣❗0️⃣6️⃣❗2️⃣0️⃣2️⃣2️⃣ *🙏 "इन्द्र और तोते की कथा"🙏*           देवराज इन्द्र और धर्मात्मा तोते की यह कथा महाभारत से है। कहानी कहती है, अगर किसी के साथ ने अच्छा वक्त दिखाया है तो बुरे वक्त में उसका साथ छोड़ देना ठीक नहीं।            एक शिकारी ने शिकार पर तीर चलाया। तीर पर सबसे खतरनाक जहर लगा हुआ था। पर निशाना चूक गया। तीर हिरण की जगह एक फले-फूले पेड़ में जा लगा। पेड़ में जहर फैला। वह सूखने लगा। उस पर रहने वाले सभी पक्षी एक-एक कर उसे छोड़ गए। पेड़ के कोटर में एक धर्मात्मा तोता बहुत बरसों से रहा करता था। तोता पेड़ छोड़ कर नहीं गया, बल्कि अब तो वह ज्यादातर समय पेड़ पर ही रहता। दाना-पानी न मिलने से तोता भी सूख कर काँटा हुआ जा रहा था। बात देवराज इन्द्र तक पहुँची। मरते वृक्ष के लिए अपने प्राण दे रहे तोते को देखने के लिए इन्द्र स्वयं वहाँ आए।        धर्मात्मा तोते ने उन्हें पहली नजर में ही पहचान लिया। इन्द्र ने कहा, "देखो भाई इस पेड़ पर न पत्ते हैं, न फूल, न फल। अब इसके दोबारा हरे होने की कौन कहे, बचने की भी कोई उम्...

नल दमयंती कथा || नलका गुप्त-वास

नल दमयंती कथा || नलका गुप्त-वास दमयन्तघको छोडकर आगे जानेपर नलको एक और बडा भारी जङ्गल मिला। उस जंगलमें एक बडा ऊँचा पर्वत भी था । उस पर्वतके वृक्षोंमें दार्वाग्नि लगी हुई थी, जिसकी ज्वाला चारों ओर फैल रही थी। देखते ही देखते सारा जङ्गल दावाग्निसे धधक उठा। जीव-जन्तु, जल-जलकर मरने लगे । उनके प्राण विदीर्ण करनेवाले हाहा - कार और क्रन्दन - स्वरको सुनकर नलको छाती फटने लगी। इसी समय उनके कानोंमें मनुष्यको सो आवाज सुनाई दी । यह सुनते ही वे उस शब्दको सोधपर लपकते हुए चले गये । पहले तो वे निश्चय नहीं कर सके, कि यह आवाज कहाँसे आ रही है, पर पीछे जब उन्होंने चुपचाप खडे हो, कान लगाकर सुना, तो फिर उसी आवाज में यह कातर ध्वनि पुन' सुनाई दो,– “हे ईच्क्षवाकु कुलके भूषण राजा नल ! तुम इस संसारके दीन-दुखियोंके रक्षक हो--दोन-बन्धु कहलाते हो। में इस दावाग्निमें जला जा रहा हूँ - मुझे कंपा करके बचालो। 38 तेरी जातिका सहज स्वभाव है, कि जो तुम्हें दूध पिलाता है, उसे ही तुम लोग काट खाते हो ।" यह कहते ही कहते उस भयङ्कर विषधरके विष के प्रभावसे राजा नल कोयलेको तरह एकदम काले हो गये और खींचे हुए धनुषको तरह भुक गये ...

नल दमयंती कथा || नल दमयंती वियोग

तीसरा परिच्छेद वियोग समय एकसा कभी नहीं रहता। जो कभी फूलोंको सेज पर सोते हुए कष्ट अनुभव करता है, उसे ही समय - एक दिन काँटों सरकंडों की सेजपर सुला देता है। जिन सिरों पर किसी दिन मुकुटु मणिकी ज्योति जगमगाती है, उन्हींपर एक दिन रास्तेकी धूल उड़-उड कर पडा करती है । जिन्हें सदा सेव- नासपाती खानेको मिलती है, उन्हें एक दिन वनस्पति भी मुहाल हो जाती है । इसीसे किसीने कहा है, कि - "किसीकी बनी रही है, किसकी बनी रहेगी ?” राजा नल और रानी दमयन्ती भी आज उसी तरह समयके फेर में पड़कर जङ्गल पहाडोंकी खाक छान रहे हैं। अनेक नगर, ग्राम, नदी, पहाड पार कर वे जङ्गलोंकी शैर कर रहे हैं। जिन्हें सेजसे उठकर दो पग चलना भी पहाड़ मालूम पडता था, आज वे कितनी बडी मंजिल मार चुके है, " यह उनके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ती हुई देखकर ही अनुमान में आ जाता है । उनके वह कुसुमसे कोमल शरीर और वह विषम कठिन विपत्ति देख, मनुष्योंकी तो बात ही क्या है, पशु-पक्षियोंके भी कलेजे फटने लगते थे। जब कभी वे लोग घूमते-फिरते हुए किसी बस्तीमे॑ पहुँच जाते, तब उन्हें पहचान कर लोग अनायास कह उठते थे,– “हाय ! विधाताका यह कैसा कठोर - विधान है कैसी ...

नल दमयंती कथा || बंधु विरोध

दूसरा परिच्छेद बन्धु-विरोध' (1) निषध राज का वानप्रस्थ के लिए जाना और राजा नल को सिंहासन देना इसी तरह कितने ही वर्ष बीत गये। दिन, महीना, वर्ष करते; करते कई वर्षोंका समय निकल गया धीरे-धीरे निषध-राजाका बुढापा आ पहुँचा। उनको इन्द्रियाँ शिथिल होने लगी- मस्तिष्क दिन - दिन दुर्बल होने लगा। राजकार्यसे उन्हें घृणा और विरक्ति होने लगी। उन्होंने सोचा, कि अब अपने को इस भंझट में रखना ठीक नहीं । अब मेरी अवस्था राज्य करनेकी नहीं - धर्माचरण - करनेकी है । क्रमश यह विचार दृढ होता चला गया और उन्होंने मन्त्रियों को सलाहसे एक दिन अच्छा मुहूर्त्त देख, राजकुमार नलको सिंहासन पर बैठा दिया और कूबरको युवराजको पदवी प्रदानको । इस प्रकार अपने राज्यकी यथो चित व्यवस्था करनेके बाद राजा निषध, चारित्र ग्रहण कर, वनमें तपस्या करने चले गये । पिताके वनमें चले जानेके बादसे राजा नलने अपने राज्यका रथ इस प्रकार कुशलता, चतुरता, नीति तंन्त्रता और प्रजाप्रियता के साथ चलाना आरम्भ किया, कि उनकी चारो ओर प्रशंसा होने लगी। उनके यश, तेज और प्रतापकी दिन दिन वृद्धि होने लगी। प्रजा उनसे सदा प्रसन्न रहने लगी। जैसे गरमीके दिन बीतने पर वर...

नल दमयंती कथा || नल-दमयन्ती विवाह और निषध देश वापसी

नल-दमयन्ती विवाह और निषध देश वापसी पहला परिच्छेद (1) निषध नगरी का वर्णन पुण्य-भूमि भारतवर्षके कोसल प्रदेशमें इन्द्रकी अमरावती नगरी से भी कहीं अधिक सुहावनी, सुख 'समृद्धि-शालिनी और नाना प्रकारको मनोहर अट्टालिकाओंसे सुशोभित कोसला नामको एक परम रमणीय नगरी थी । वहाँ सम्पूर्ण वैरी-वृन्द को पराजित कर सर्वत्र अपनी विजय पताका फहरानेवाले, न्याय और नीतिमें पूर्ण निष्ठा रखनेवाले, प्रजापालनमें सदा – सब तरहसे— तत्पर रहनेवाले निषध नामके - एक राजा राज्य करते थे । राजा निषध बडेही दयालु, धर्मात्मा, न्यायी और सदाचारी थे । वे अपनी प्रजाको पुत्रके समान मानते थे और उसका दुःख-दर्द दूर करनेके लिये सदा तैयार रहते थे ।  उनके राज्यमें प्रजाको रोग, शोक, अकाल और महामारी आदिका कभी सामना नहीं करना पडता था । राज्यके कर्मचारियों पर स्वयं राजाका ऐसा अंकुश रहता था, कि वे कभी प्रजापर अत्याचार 'नहीं' करने पाते थे ।  जहाँ राजा प्रजाको ओरसे कान में तेल डाले पड़े रहते हैं और अपने कर्मचारियोको ही कही हुई बातो को सच समझा करते हैं, वहाँ कर्मचारी अपनेको प्रजाका सेवक नहीं, बल्कि सोलह आने मालिक समझने लगते हैं और मनमाने ...

कथा नल दमयंती || 31 || विवाह

कथा नल दमयंती || 31 || विवाह नल और दमयंती की प्रणय-परिणय कथा मुझे भी आकर्षित किए हुए थी, और इसे नाट्य-रुप में ढालने की उत्कंठा भी बहुत पुरानी थी। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। नल दमयंती की यह कहानी अद्भुत है। भारत वर्ष के अनोखे अतीत की पिटारी खोलने पर अमूल्य रत्नों की विशाल राशि विस्मित करती है। इस पिटारी में यह कथा-संयोग ऐसा ही राग का एक अनमोल चमकता मोती है। भाव-विभाव और संचारी भाव ऐसे नाच उठे हैं कि अद्भुत रस की निष्पत्ति हो गयी है। निषध राजकुमार नल और विदर्भ राजकुमारी दमयंती के मिलन-परिणय की अद्भुत कथा है यह। रुदन, हास, मिलन, विछोह के मनके इस तरह संयुक्त हो उठे हैं इस कहानी में कि नल दमयंती मिलन की एक मनोहारी माला बन गयी है- अनोखी सुगंध से भरपूर। नल दमयंती की यह कथा नाट्य-रूप में संक्षिप्ततः प्रस्तुत है। दृश्य-परिवर्तन के क्रम में कुछ घटना...

नल दमयंती और दशा माता व्रत

दशा माता व्रत   *********** होली के दसवें दिन हिंदू धर्म में विवाहित महिलाएं अपने परिवार की सलामती और सुखमय जीवन के लिए चैत्र कृष्ण दशमी के दिन दशामाता का व्रत रखती हैं। दशामाता व्रत सनातन धर्म की पौराणिक मान्यता के अनुसार विवाहित महिलाएं पति और परिवार की सलामती के लिए दशामाता का व्रत धारण करती हैं। नियमानुसार इस दिन पीपल के पेड़ का सच्ची श्रद्धा से पूजन करती हैं। पूजन के बाद नल राजा दमयंती रानी की व्रत कथा का श्रवण किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में दिए गए उल्लेख के अनुसार इस दिन झाड़ू की खरीददारी करना भी शुभ माना जाता हैं। इस दिन पीपल के वृक्ष की छाल को उतारकर घर लाया जाता है। उसे घर की अलमारी या तिजोरी में सोने के आभूषण के साथ रखा जाता है। व्रत धारण करने वाली महिलाएं एक वक्त भोजन का धारण करती हैं। खास बात यह है कि, उपवास तोड़ते समय किये जाने वाले भोजन में नमक का प्रयोग बिलकुल नहीं किया जाता हैं। दशामाता व्रत कथा ============ दशामाता की कथा प्राचीन समय के एक राजा नल और रानी दमयंती से जुड़ी हुई हैं। एक समय की बात हैं राजा नल का राज्य सुख सम्पन्न था। प्रजा राज्य में सुख से जीवन जी ...