नल दमयंती || 01. परिचय सर्ग || हंस कलाधर महाकाव्य

परिचय - सर्ग

स्वामी की चाह जान मन में - 
श्री आ पहुँची ज्यों निषध-देश ।
सुख - शान्ति साधनों में प्रवेश -
पाकर बैठी ज्यों विविध वैश ॥1॥

स्थायी वास न पाया तो 
आकर वसन्त उस देश बसा ।
नल का शरीर ही केन्द्र मान 
मादक यौवन के वेश लसा ॥2॥

ऊषा की चोधक चितवन-सँग
चलती थी कर्ममयी लीला, 
तोषद विश्राम, प्रेम का पथ 
नित्त दिखलाती सन्ध्या वेला ॥3॥

शृंगार सजाकर रजनी नित 
आती यौवन सरभार लिये ।
रत्नों को माया यहीं लुटा 
जाती अम्बर को प्यार लिये ॥4॥

शशि कला न अपनी दे पाता 
तब भी रजनी आ निषध-देश,
मणि- दीपों की मृदु जगमग में 
पा जाती थी प्रिय कलित वेश ॥5॥

रजनी का घन लज्जित होता,
प्यारी चपला को गोद लिये।
कल-भाषण ले आते प्रकाश जब 
वातायान से मोद लिये ।।6।।

दुख की माया को दूर देश - 
तजकर आती नित अंधियारी ।
वह प्रेम मिलन की वेला में -
दिखलाती सुन्दरता सारी॥7॥

तम से प्रकाश की शोभा का
होता निशि में शृंगार सफल ।
जीवन रस से सुन्दरता का 
हो पाता था अभिसार सँभल॥8॥

मधुमास रचित रस माया में -
अलि - साज रंगीले अम्बर का ।
मृदु हास भरे वन वैभव में -
अभिसार सहज 'गुन गुन' स्वर का ॥9॥

मधु की माया छिपकर आती
रस भर देती जीवन-वन में।
नव रंग भरी हरियाली का -
अब भाव सोचता नल मन में ॥10॥

दुख-मोह भरे जीवन - पथ में
सुख शान्ति रूप वह सुखद राज । 
सुख - विलसित जीवन गिर न सके

स्वर्गिक मेला तजकर परियाँ - 
घन-बीच छिपी सी बसती थीं 
नल का सौन्दर्य परखने को 
चपला के रूप बिलसती थी ॥12॥

तन- मादकता की लहरों में 
पड़कर सत्वर छिप जाती थी 
सौन्दर्यमयी लज्जावाली 
क्षण भर ही नयन मिलाती थी |॥13॥

किसके जीवन की गन्ध लिये 
आता समीर मतवाला बन, 
अवगाहन करने  को जीभर 
किसके जीवन की धारा बन ? ॥14॥

यौवन की मादक डाली पर
भावों के पक्षी आते थे । 
नव सरस पहेली का केवल - 
संकेत मात्र दे जाते थे ॥15॥

संयम में यौवन की शोभा
शृंगार सहज रच पाती थी; 
पर मुधा बनावट की माया -
अति दूर सहम रह जाती थी ॥ 16 ॥

नैसर्गिक ओ नर-रचित दिव्य
सुन्दरता का मृदु मेल जहाँ, 
नल वहाँ पहुँचने वाला अब 
अन्तर संगम रस खेल जहाँ ॥ 17॥ 


सुन्दरता की मादक रेखा 
जिस क्षितिज - लोक से आती थी,
ऊषा निज मृदु मुस्कान दिखा
संकेत सदा दे जाती थी ॥18॥

श्यामल अम्बर में वह लाली
प्राची की प्रभा दिखाती थी । 
सरसिज विकास का समय सहज 
मानस को अब समझाती थी ॥19॥

पिंगल किरणों पर चढ़कर ज्यों 
सुन्दरता आती निषध - देश, 
प्राची - नयनों के मन भाये 
इसलिये सजाती विविध वेश ||20||

भर प्यार रंगीली बाँहों से 
किरणें आलिंगन करती थी । 
सुन्दरता के पट पर चित्रित
नगरी ज्यों नित्य विलसती थी ॥21॥

नृप लक्ष्य हेतु गठबन्धन की
जब बात कही कुछ हो पाती,
कोयल की मंगल ध्वनि आकर -
शुचि सहज समर्थन कर जाती ॥22॥

जीवन यौवन सुन्दरता की
मृदु मौन कहानी कह जाता ।
लज्जा की मोहक छाया में
बैठा नल तन्मय सुन पाता ॥ 23 ॥

अब पिता वानप्रस्थी नरवर 
करता स्वरूप का ध्यान रहा, 
भूपासन पर शोभित नल का 
समुचित करता सम्मान रहा ||24||

आशाभर निपुण योग्य सुत का
सब भाँति परीक्षण कर देखा ।
शासन में शान्ति सुरक्षा का  
मिल पाता था समुचित लेखा ॥25॥

अब वीरसेन मन सोच रहा
आयेगी पुत्र बधू कोई,
पर चयन न भ्रामक हो जाये 
चिन्ता - रेखा उर बनी नई ॥26॥

तन मन की वह सुन्दर बाला 
है कौन, रखे जो मुख-लाली, 
सुत के भावों की आशा में
विश्वास सहज भरने वाली ॥27॥

नारी - गुण से सम्पन्न सदा 
लज्जाशीला गुणवती मिले, 
पति सेवारता, सहज सरला - 
सुधि नित्य निरन्तर पति की ले ॥28॥

मन का सब कुछ पति-चरणों पर
रख कर सब कुछ पाने वाली । 
उसको प्रिय परम समझ पाये 
श्यामा, मन को भाने वाली ॥29॥

मन के भावों की तन शोभा - 
बनकर शुभ सहज विकस पाये । 
शोभा को भी शोभित कर दे 
सुत के अन्तर में बस जाये ॥ 30॥

अञ्चल में माता के गुण हों, 
आखों में हो श्रृंगार सरल,
कर में सेवा शुचि बसती हो, 
उर में आकर्षक भाव सफल ॥31॥

भावों की गंगा - धारा में 
जीवन का लक्ष्य समझती हो । 
उस प्रेम - सिन्धु की दूरी क्या, 
पाने की चाह उमड़ती हो ॥ 32॥

क्षणभंगुर काया का विलास, 
बस लहरों का उठना गिरना, 
उर्मिल क्रीड़ा में प्रेम सत्य 
जाने उसमें प्रिय का मिलना ||33||

तन - भोग मात्र ही लक्ष्य नहीं
वह पथ हो योग साधना का | 
शुचि सहज समर्पण - सेवा में
मिट चले विकार वासना का ॥ 34॥

उसकी अपनी इच्छा फिर क्या 
जो भी होगी प्रिय-भाव- सनी । 
सुत के जीवन में रस भर दे 
होगी वह पुत्र वधू अपनी ॥ 35॥

संग्रह की कटुक वंचना वह 
अन्तर से सदा जान पाये,
इसलिये त्याग पथ पर चलकर 
निर्भर हुई प्रिय को भाये ||36||

इस भाँति सोच-रत वीरसेन,
बैठा नल भी था वही बीच 
तब तक कुछ अतिथि पहुँच आये 
ज्यों भाव लिये हों रूप खीच ।।37।।

जन रहे विदर्भ भूमि वासी
आ पहुँचे देश भ्रमण करते । 
क्या रही देश की सुन्दरता,
नैसर्गिक भाव हृदय धरते ||38||

वन्दन और नमन भरी मुद्रा - 
उनमें आकर साकार हुई । 
शुभ सरस कहानी कहने को 
जैसे पावन आधार हुई ||39||

देखी नल की सुन्दरता तब
जो भावों में आ बसती थी । 
यौवन के भार दबी - सी 
कुछ लज्जा की राह विलसती थी ॥40॥

तन- श्री औ स्वागत विधि लखकर
अपनी तन सुधि जन गये भूल । 
पथ - श्रम की दिव्य सफलता हित
विकसित भावों के हुए फूल ॥41॥


पूछा तब वीरसेन ने फिर 
" हे अतिथि - जनो, क्या समाचार?
किस भाँति भ्रमण करते पहुॅचे
बीहड़ पथ कैसे हुए पार ॥42॥

"नैसर्गिक सुषमा भरी हुई 
पावन भू श्री को आँक सकें,
नटवर के चल जग नर्त्तन में - 
उसकी छवि पर कुछ झाँक सकें ॥43॥

इसलिये भ्रमण करते पहुँचे । 
शोभा संपूरित निषध देश । 
है जहाँ प्रकृति सब भाँति सजी
अपना वैभव लेकर अशेष ॥44॥

देखा दक्षिण से उत्तर तक 
यह प्यारा देश विलसता सा । 
आकर्षण के कर सजा हुआ
अम्बर के उर में बसता सा ॥45॥ -

पूरब में आर्यावर्त देश 
अपनी उपमा में एक रहा । 
हिमगिरि से श्री वैभव पाकर 
उसके पद मस्तक टेक रहा ॥46॥

ऊषा की छवि अरुणाभ, अहा !
पहले जिसका वन्दन करती । 
मलयानिल की गंधित वेला 
प्राणों में नव जीवन भरती ॥47॥

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