003. नल दमयंती 2
नल दमयंती की कथा : अर्जुन जब अस्त्र प्राप्त करने के लिये इन्द्रलोक चले गये , तब पाण्डव काम्यक वन में निवास कर रहे थे । वे राज्य के नाश और अर्जुन के वियोग से बड़े ही दुःखी हो रहे थे । एक दिन की बात है , पाण्डव और द्रौपदी इसी सम्बन्ध में कुछ चर्चा कर रहे थे । धर्मराज युधिष्ठिर भीमसेन को समझा ही रहे थे कि महर्षि बृहदश्व उनके आश्रम में आते हुए दीख पड़े । महर्षि बृहदश्व को आते देखकर धर्मराज युधिष्ठिर ने आगे जाकर शास्त्र विधि के अनुसार उनकी पूजा की , आसन पर बैठाया । उनके विश्राम कर लेने पर युधिष्ठिर उनसे अपना वृत्तान्त कहने लगे । उन्होंने कहा कि ‘ महाराज ! कौरवो ने कपट – बुद्धि से मुझे बुलाकर छल के साथ जूआ खेला और मुझ अनजान को हराकर मेरा सर्वस्व छीन लिया । इतना ही नहीं , उन्होंने मेरी प्राणप्रिया द्रौपदी को घसीटकर भरी सभा में अपमानित किया । उन्होंने अन्त में हमें काला मृगछाला ओढ़ाकर घोर वन में भेज दिया । महर्षे ! आप ही बतलाइये कि इस पृथ्वी पर मुझ – सा भाग्यहीन राजा और कौन है ! क्या आपने मेरे – जैसा दुःखी और कहीं देखा या सुना है ? ‘ महर्षि बृहदश्व ने कहा – धर्मराज ! आपका यह कहना ठीक नहीं...