003. नल दमयंती 2

नल दमयंती की कथा : अर्जुन जब अस्त्र प्राप्त करने के लिये इन्द्रलोक चले गये , तब पाण्डव काम्यक वन में निवास कर रहे थे । वे राज्य के नाश और अर्जुन के वियोग से बड़े ही दुःखी हो रहे थे । एक दिन की बात है , पाण्डव और द्रौपदी इसी सम्बन्ध में कुछ चर्चा कर रहे थे । धर्मराज युधिष्ठिर भीमसेन को समझा ही रहे थे कि महर्षि बृहदश्व उनके आश्रम में आते हुए दीख पड़े । महर्षि बृहदश्व को आते देखकर धर्मराज युधिष्ठिर ने आगे जाकर शास्त्र विधि के अनुसार उनकी पूजा की , आसन पर बैठाया । उनके विश्राम कर लेने पर युधिष्ठिर उनसे अपना वृत्तान्त कहने लगे । उन्होंने कहा कि ‘ महाराज ! कौरवो ने कपट – बुद्धि से मुझे बुलाकर छल के साथ जूआ खेला और मुझ अनजान को हराकर मेरा सर्वस्व छीन लिया । इतना ही नहीं , उन्होंने मेरी प्राणप्रिया द्रौपदी को घसीटकर भरी सभा में अपमानित किया । उन्होंने अन्त में हमें काला मृगछाला ओढ़ाकर घोर वन में भेज दिया । महर्षे ! आप ही बतलाइये कि इस पृथ्वी पर मुझ – सा भाग्यहीन राजा और कौन है ! क्या आपने मेरे – जैसा दुःखी और कहीं देखा या सुना है ? ‘ महर्षि बृहदश्व ने कहा – धर्मराज ! आपका यह कहना ठीक नहीं है कि मुझ – सा दुःखी राजा और कोई नहीं हुआ ; क्योंकि मैं तुमसे भी अधिक दुःखी और मन्दभाग्य राजा का वृत्तान्त जानता तुम्हारी इच्छा हो तो मैं सुनाऊँ । धर्मराज युधिष्ठिर के आग्रह करने पर महर्षि ने कहना प्रारंभ किया।

दमयंती का स्वयंवर और विवाह( नल दमयंती का विवाह)।raja nal damyanti ki katha

नल दमयंती की कथा:  दमयन्ती का स्वयंवर और विवाह निषध देश में वीरसेन के पुत्र नल नाम के एक राजा हो चुके हैं । वे बड़े गुणवान् , परम सुन्दर , सत्यवादी , जितेन्द्रिय , सबके प्रिय , वेदज्ञ एवं ब्राह्मणभक्त थे । उनकी सेना बहुत बड़ी थी । वे स्वयं अस्त्रविद्या में बहुत निपुण थे । वे वीर , योद्धा , उदार और प्रबल पराक्रमी भी थे । उन्हें जूआ खेलने का भी कुछ – कुछ शौक था । उन्हीं दिनों विदर्भ देश में भीम नामके एक राजा राज्य करते थे । वे भी नल के समान ही सर्वगुण सम्पन्न और पराक्रमी थे । उन्होंने दमन ऋषि को प्रसन्न करके उनके वरदान से चार संतानें प्राप्त की थीं — तीन पुत्र और एक कन्या । पुत्रों के नाम थे – दम , दान्त और दमन । पुत्री का नाम था – दमयन्ती । दमयन्ती लक्ष्मी के समान रूपवती थी । उसके नेत्र विशाल थे । देवताओं और यक्षों में भी वैसी सुन्दरी कन्या कहीं देखने में नहीं आती थी । उन दिनों कितने ही लोग विदर्भ से निषध देश में आते और राजा नलके सामने दमयन्ती के रूप और गुण का बखान करते । निषध देश से विदर्भ में जाने वाले भी दमयन्ती के सामने राजा नल के रूप , गुण और पवित्र चरित्र का वर्णन करते । इससे दोनों के हृदय में पारस्परिक अनुराग अङ्करित हो गया । एक दिन राजा नल ने अपने महल के उद्यान में कुछ हंसों को देखा । उन्होंने एक हंस को पकड़ लिया । हंसने कहा- ‘ -‘आप मुझे छोड़ दीजिये तो हम लोग दमयन्ती के पास जाकर आपके गुणों का ऐसा वर्णन करेंगे कि वह आपको अवश्य – अवश्य वर लेगी । ‘ नल ने हंस को छोड़ दिया । वे सब उड़कर विदर्भ देश में गये ।

दमयन्ती अपने पास हंसों को देखकर बहुत प्रसन्न हुई और हंसों को पकड़ने के लिये उनकी ओर दौड़ने लगी । दमयन्ती जिस हंस को पकड़ने के लिये दौड़ती , वही बोल उठता कि ‘ अरी दमयन्ती ! निषध देश में एक नल नाम का राजा है । वह अश्विनीकुमार के समान सुन्दर है । मनुष्यों में उसके समान सुन्दर और कोई नहीं है । वह मानो मूर्तिमान् कामदेव है । यदि तुम उसकी पत्नी हो जाओ तो तुम्हारा जन्म और रूप दोनों सफल हो जायँ । हमलोगों ने देवता , गन्धर्व , मनुष्य , सर्प और राक्षसों को घूम – घूमकर देखा है । नल के समान सुन्दर पुरुष कहीं देखने में नहीं आया । जैसे तुम स्त्रियों में रत्न हो , वैसे ही नल पुरुषों में भूषण है । तुम दोनों की जोड़ी बहुत ही सुन्दर होगी । ‘ दमयन्ती ने कहा- ‘ हंस तुम नल से भी ऐसी ही बात कहना । ‘ हंसने निषध देश में लौटकर नल से दमयन्ती का संदेश कह दिया । दमयन्ती हंसके मुँह से राजा नल की कीर्ति सुनकर उनसे प्रेम करने लगी ।

नल दमयंती की कहानी,nal damyanti ki kahani. राजा नल दमयंती की कथा raja nal damyanti ki katha.

उसकी आसक्ति इतनी बढ़ गयी कि वह रात – दिन उनका ही ध्यान करती रहती । शरीर धूमिल और दुबला हो गया । वह दीन – सी दीखने लगी । सखियों ने दमयन्ती के हृदयका भाव ताड़कर विदर्भराज से निवेदन किया कि ‘ आपकी पुत्री अस्वस्थ हो गयी है । ‘ राजा भीम ने अपनी पुत्री के सम्बन्ध में बड़ा विचार किया । अन्त में वह इस निर्णय पर पहुँचा कि मेरी पुत्री विवाह योग्य हो गयी है , इसलिये इसका स्वयंवर कर देना चाहिये । उन्होंने सब राजाओं को स्वयंवर का निमन्त्रण – पत्र भेज दिया और सूचित कर दिया कि राजाओं को दमयन्ती के स्वयंवर में पधारकर लाभ उठाना चाहिये और मेरा मनोरथ पूर्ण करना चाहिये । देश – देश के नरपति हाथी , घोड़े और रथों की ध्वनि से पृथ्वी को मुखरित करते हुए सज – धजकर विदर्भ देश में पहुँचने लगे।

भीम ने सबके स्वागत – सत्कार की समुचित व्यवस्था की । देवर्षि नारद और पर्वत के द्वारा देवताओं को भी दमयन्ती के स्वयंवर का समाचार मिल गया । इन्द्र आदि सभी लोकपाल भी अपनी मण्डली और वाहनों सहित विदर्भ देश के लिये रवाना हुए । राजा नलका चित्त पहले से ही दमयन्ती पर आसक्त हो चुका था । उन्होंने भी दमयन्ती के स्वयंवर में सम्मिलित होने के लिये विदर्भ की यात्रा की । देवताओं ने स्वर्ग से उतरते समय देख लिया कि कामदेव के समान सुन्दर नल दमयन्ती के स्वयंवर के लिये जा रहे हैं । नल की सूर्य के समान कान्ति और लोकोत्तर रूप – सम्पत्ति से देवता भी चकित हो गये । उन्होंने पहचान लिया कि ये नल हैं । उन्होंने अपने विमानों को आकाश में खड़ा कर दिया और नीचे उतरकर नल से कहा – ‘ राजेन्द्र नल ! आप बड़े सत्यव्रती हैं । आप हम लोगों की सहायता करने के लिये दूत बन जाइये । ‘ नल ने प्रतिज्ञा कर ली और कहा कि ‘ करूँगा । ‘ फिर पूछा कि ‘ आपलोग कौन हैं और मुझे दूत बनाकर कौन – सा काम लेना चाहते हैं ? ‘ इन्द्र ने कहा – ‘ हम लोग देवता हैं । मैं इन्द्र हूँ और ये अग्नि , वरुण और यम हैं । हम लोग दमयन्ती के लिये यहाँ आये हैं । आप हमारे दूत बनकर दमयन्ती के पास जाइये और कहिये कि इन्द्र , वरुण , अग्नि और यम देवता तुम्हारे पास आकर तुमसे विवाह करना चाहते हैं । इनमें से तुम चाहे जिस देवता को पति के रूप में स्वीकार कर लो । ‘ नल ने दोनों हाथ जोड़कर कहा कि ‘ देवराज ! वहाँ आप लोगों के और मेरे जाने का एक ही प्रयोजन है । इसलिये आप मुझे दूत बनाकर वहाँ भेजें , यह उचित नहीं है । जिसकी किसी स्त्री को पत्नी के रूप में पाने की इच्छा हो चुकी हो , वह भला , उसको कैसे छोड़ सकता है और उसके पास जाकर ऐसी बात कह ही कैसे सकता है ? आपलोग कृपया इस विषय में मुझे क्षमा करे।

देवताओं ने कहा- ‘ नल ! तुम पहले हम लोगों से प्रतिज्ञा कर चुके हो कि मैं तुम्हारा काम करूँगा । अब प्रतिज्ञा मत तोड़ो । अविलम्ब वहाँ चले जाओ । ‘ नल ने कहा – ‘ राजमहल में निरन्तर कड़ा पहरा रहता है , मैं कैसे जा सकूँगा ? ‘ इन्द्रने कहा – ‘ जाओ , तुम वहाँ जा सकोगे । ‘ इन्द्र की आज्ञा से नल ने राज महल में बेरोक – टोक प्रवेश करके दमयन्ती को देखा । दमयन्ती और सखियाँ भी उसे देखकर अवाक रह गयीं । वे इस अनुपम सुन्दर पुरुष को देखकर मुग्ध हो गयीं और लज्जित होकर कुछ बोल न सकीं । दमयन्ती ने अपने को सँभालकर राजा नल से कहा – ‘ वीर ! तुम देखने में बड़े सुन्दर और निर्दोष जान पड़ते हो । पहले अपना परिचय बताओ । तुम यहाँ किस उद्देश्य से आये हो और यहाँ आते समय द्वारपालों ने तुम्हें देखा क्यों नहीं ? उनसे तनिक भी चूक हो जाने पर मेरे पिता उन्हें बड़ा कड़ा दण्ड देते हैं । ‘ नल ने कहा ‘ कल्याणी ! मैं नल हूँ । लोकपालों का दूत बनकर तुम्हारे पास आया हूँ । सुन्दरी ! इन्द्र , अग्नि , वरुण और यम ये चारों देवता तुम्हारे साथ विवाह करना चाहते हैं । तुम इनमें से किसी एक देवता को अपने पति के रूप में वरण कर लो । यही संदेश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ । उन देवताओं के प्रभाव से ही जब मैं तुम्हारे महल में प्रवेश करने लगा , तब मुझे कोई देख नहीं सका । मैंने देवताओं का संदेश कह दिया । अब तुम्हारी जो इच्छा हो , करो । ‘ दमयन्ती ने बड़ी श्रद्धा के साथ देवताओं को प्रणाम करके मन्द – मन्द मुस्कुराकर नलसे कहा –

नरेन्द्र । आप मुझे प्रेम – दृष्टि से देखिये और आज्ञा कीजिये कि मैं यथा शक्ति आपकी क्या सेवा करूँ । मेरे स्वामी । मैंने अपना सर्वस्व और अपने आपको भी आपके चरणों में सौंप दिया है । आप मुझपर विश्वासपूर्ण प्रेम कीजिये । जिस दिन से मैंने हंसों की बात सुनी , उसी दिन से मैं आपके लिये व्याकुल हूँ । आपके लिये ही मैंने राजाओं की भीड़ इकट्ठी की है । यदि आप मुझ दासी की प्रार्थना अस्वीकार कर देंगे तो मैं विष खाकर , आग में जलकर , पानी में डूबकर या फाँसी लगाकर आपके लिये मर जाऊँगी । ‘ राजा नल ने कहा- -‘जब बड़े – बड़े लोकपाल तुम्हारे प्रणय सम्बन्ध के प्रार्थी हैं , तब तुम मुझ मनुष्य को क्यों चाह रही हो ? उन ऐश्वर्यशाली देवताओं के चरण – रेणुके समान भी तो मैं नहीं हूँ । तुम अपना मन उन्हीं में लगाओ । देवताओं का अप्रिय करने से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है । तुम मेरी रक्षा करो और उनको वरण कर लो । ‘ नल की बात सुनकर दमयन्ती घबरा गयी । उसके दोनों नेत्रों में आँसू छलक आये । वह कहने लगी – ‘ मैं सब देवताओं को प्रणाम करके आपको ही पतिरूप में वरण कर रही हूँ । यह मैं सत्य शपथ खा रही हूँ * । ‘ उस समय दमयन्ती का शरीर काँप रहा था , हाथ जुड़े हुए थे । राजा नल ने कहा – ‘ अच्छा , तब तुम ऐसा ही करो । परंतु यह तो बतलाओ कि मैं यहाँ उनका दूत बनकर संदेश पहुँचाने के लिये आया हूँ । यदि इस समय मैं अपना स्वार्थ बनाने लगूं तो कितनी बुरी बात है । मैं अपना स्वार्थ तो तभी बना सकता हूँ , यदि वह धर्म के विरुद्ध ना हो।

तुम्हें भी ऐसा ही करना चाहिये । ‘ दमयन्ती ने गद्गद – कण्ठ से कहा – ‘ नरेश्वर ! इसके लिये एक निर्दोष उपाय है । उसके अनुसार काम करने पर आपको कोई दोष नहीं लगेगा । वह उपाय यह है कि आप लोकपालों के साथ स्वयंवर – मण्डप में आवें । मैं उनके सामने ही आपको वरण कर लुंगी । तब आपको दोष नहीं लगेगा । अब राजा नल देवताओं के पास आये । देवताओं के पूछने पर उन्होंने कहा- ” मैं आप लोगों की आज्ञा से दमयन्ती के महल में गया । बाहर बूढ़े द्वारपाल पहरा दे रहे थे , परंतु उन्होंने आप लोगों के प्रभाव से मुझे देखा नहीं । केवल दमयन्ती और उसकी सखियों ने मुझे देखा । वे आश्चर्यमें पड़ गयीं । मैंने दमयन्ती के सामने आप लोगों का वर्णन किया , परंतु वह तो आप लोगों को न चाहकर मुझे ही वरण करने पर तुली हुई है । उसने कहा है कि ‘ सब देवता आपके साथ स्वयंवर में आवें । मैं उनके सामने ही आपको वरण कर लूँगी । इसमें आपको दोष नहीं लगेगा। ‘ मैंने आप लोगों के सामने सब बातें कह दीं । अन्तिम प्रमाण आप लोग ही हैं । ” राजा भीमने शुभ मुहूर्त में स्वयंवर का समय रखा और लोगों को बुलवा भेजा । सब राजा अपने – अपने निवास स्थान से आ – आकर स्वयंवर – मण्डप में यथास्थान बैठने लगे । पूरी सभा राजाओं से भर गयी । जब सब लोग अपने – अपने आसन पर बैठ गये , तब सुन्दरी दमयन्ती अपनी अङ्गकान्ति से राजाओं के मन और नेत्रों को अपनी ओर आकर्षित करती हुई रङ्गमण्डप में आयी । राजाओं का परिचय दिया जाने लगा । दमयन्ती एक – एक को देखकर आगे बढ़ने लगी ।

आगे एक ही स्थानपर नल के समान आकार और वेषभूषा के पाँच राजा इकट्ठे ही बैठे हुए थे । दमयन्ती को संदेह हो गया , वह राजा नल को नहीं पहचान सकी । वह जिसकी ओर देखती , वही नल जान पड़ता । इसलिये विचार करने लगी कि ‘ मैं देवताओं को कैसे पहचानूँ और ये राजा नल हैं — यह कैसे जानूँ ? ‘ उसे बड़ा दुःख हुआ । अन्त में दमयन्ती ने यही निश्चय किया कि देवताओं की शरण में जाना ही उचित है । हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक स्तुति करने लगी- -देवताओ ! हंसों के मुँहसे नल का वर्णन सुनकर मैंने उन्हें पतिरूप से वरण कर लिया है । मैं मन से और वाणी से नल के अतिरिक्त और किसी को नहीं चाहती । देवताओं ने निषधेश्वर नल को ही मेरा पति बना दिया है तथा मैंने नल की आराधना के लिये ही यह व्रत प्रारम्भ किया है । मेरी इस सत्य शपथ के बलपर देवता लोग मुझे उन्हें ही दिखला दें । ऐश्वर्यशाली लोकपालो ! आपलोग अपना रूप प्रकट कर दें , जिससे मैं पुण्यश्लोक नरपति नल को पहचान लूँ । ‘ देवताओं ने दमयन्ती का यह आर्त – विलाप सुना । उसके दृढ़ निश्चय , सच्चे प्रेम , आत्मशुद्धि , बुद्धि , भक्ति और नल परायणता को देखकर उन्होंने उसे ऐसी शक्ति दे दी , जिससे वह देवता और मनुष्य का भेद समझ सके ।

दमयन्ती ने देखा कि देवताओं के शरीर पर पसीना नहीं है । पलकें गिरती नहीं हैं । उनके गले में पड़ी पुष्पमाला कुम्हलायी नहीं है । शरीर पर मैल नहीं है । वे सिंहासन पर स्थित हैं पर उनके पैर धरती को नहीं छूते और उनकी परछाई नहीं पड़ती । ‘ इधर नल के शरीर की छाया पड़ रही है । माला कुम्हला गयी है । शरीर पर कुछ धूल और पसीना भी है । पलकें बराबर गिर रही है और धरती छूकर स्थित है । दमयन्ती ने इन लक्षणों से देवताओं और पुण्यश्लोक नल को पहचान लिया । फिर धर्म के अनुसार नलको वरण कर लिया । दमयन्ती ने कुछ सकुचाकर यूंघट काढ़ लिया और नलके गलेमें वरमाला डाल दी । देवता और महर्षि साधु – साधु कहने लगे । राजाओ में हाहाकार मच गया । राजा नल ने आनन्दातिरेक से दमयन्ती का अभिनन्दन किया । उन्होंने कहा – ‘ कल्याणी ! तुमने देवताओं के सामने रहने पर भी उन्हें वरण न करके मुझे वरण किया है , इसलिये तुम मुझको प्रेम परायण पति समझना । मैं तुम्हारी बात मानूँगा । जब तक मेरे शरीर में प्राण रहेंगे , तब तक मैं तुमसे प्रेम करूंगा – यह मैं तुमसे शपथपूर्वक सत्य कहता हूँ । ‘ दोनों ने प्रेम से एक – दूसरे का अभिनन्दन करके इन्द्रादि देवताओं की शरण ग्रहण की । देवता भी बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने नल को आठ वर दिये । इन्द्रने कहा – ‘ नल ! तुम्हें यज्ञ में मेरा दर्शन होगा और उत्तम गति मिलेगी । ‘ अग्नि देव ने कहा – ‘ जहाँ तुम मेरा स्मरण करोगे , वहीं मैं प्रकट हो जाऊँगा और मेरे ही समान प्रकाशमय लोक तुम्हें प्राप्त होंगे । यमराज ने कहा- ‘ तुम्हारी बनायी हुई रसोई बहुत मीठी होगी और तुम अपने धर्म में दृढ़ रहोगे । ‘ वरुण ने कहा- ‘ जहाँ तुम चाहोगे , वहीं जल प्रकट हो जायगा । तुम्हारी माला उत्तम गन्ध से परिपूर्ण रहेगी। इस प्रकार दो दो वर देकर सब देवता अपने अपने लोको में चले गए। निमंत्रित राजा लोग भी विदा हो गए। भीम ने प्रसन्न होकर दमयंती का नल के साथ विधि पूर्वक विवाह कर दिया राजा नल कुछ दिनों तक विदर्भ देश की राजधानी कुंडलपुर में रहे । उसके बाद भीम की अनुमति प्राप्त करके वह अपनी पत्नी दमयंती के साथ अपनी राजधानी लौट आए। राजा नल अपनी राजधानी में धर्म के अनुसार प्रजा का पालन करने लगे सचमुच उनके द्वारा राजा नाम सार्थक हो गया। उन्होंने अश्वमेघ आदि बहुत से यज्ञ किये। समय आने पर दमयंती के गर्भ से इंद्रसेन नाम के पुत्र और इंद्रसेना नाम की कन्या का जन्म हुआ।

नल पर कलयुग का दुर्भाव व जुए में हारना। raja nal ki kahani,
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महर्षि बृहदश्व कहते हैं – युधिष्ठिर ! जिस समय दमयन्ती के स्वयंवर से लौटकर इन्द्रा दि लोकपाल अपने – अपने लोकों में जा रहे थे , उस समय उनकी मार्ग में ही कलियुग और द्वापर से भेंट हो गयी । इन्द्र ने पूछा- क्यों कलियुग ! कहाँ जा रहे हो ? ‘ कलियुग ने कहा- ‘ मैं दमयन्ती के स्वयंवर में उससे विवाह करने के लिये जा रहा हूँ । ‘ इन्द्रने हँसकर कहा – अजी , वह स्वयंवर तो कभी का पूरा हो गया । दमयन्ती ने राजा नल को वरण कर लिया , हम लोग ताकते ही रह गये । कलियुग ने क्रोध में भरकर कहा – ‘ ओह , तब तो बड़ा अनर्थ हुआ । उसने देवताओं की उपेक्षा करके मनुष्य को अपनाया , इसलिये उसको दण्ड देना चाहिये । देवताओं ने कहा – ‘ दमयन्ती ने हमारी आज्ञा प्राप्त करके नल को वरण किया है । वास्तव में नल सर्वगुण सम्पन्न और उसके योग्य हैं । वे समस्त धर्मो के मर्मज्ञ और सदाचारी हैं । उन्होंने इतिहास – पुराणों के सहित वेदों का अध्ययन किया है । वे धर्मानुसार यज्ञ में देवताओं को तृप्त करते हैं , कभी किसी को सताते नहीं , सत्यनिष्ठ और दृढनिश्चयी हैं । उनकी चतुरता , धैर्य , ज्ञान , तपस्या , पवित्रता , दम और शम लोकपालों के समान हैं । उनको शाप देना तो नरक की धधकती आग में गिरना है । ‘ यह कहकर देवतालोग चले गये ।

अब कलियुग ने द्वापर से कहा – ‘ भाई ! मैं अपने क्रोध को शान्त नहीं कर सकता । इसलिये मैं नल के शरीर में निवास करूँगा । मैं उसे राज्यच्युत कर दूंगा । तब वह दमयन्ती के साथ नहीं रह सकेगा । इसलिये तुम भी जुए के पासों में प्रवेश करके मेरी सहायता करना । ‘ द्वापर ने उसकी बात स्वीकार कर ली । द्वापर और कलियुग दोनों ही नल की राजधानी में आ बसे । बारह वर्ष तक वे इस बात की प्रतीक्षा में रहे कि नल में कोई दोष दीख जाय । एक दिन राजा नल संध्या के समय लघुशंका से निवृत्त होकर पैर धोये बिना ही आचमन करके संध्या – वन्दन करने बैठ गये । यह अपवित्र अवस्था देखकर कलियुग उनके शरीर में प्रवेश कर गया । साथ ही दूसरा रूप धारण करके वह पुष्कर के पास गया और बोला – ‘ तुम नल के साथ जूआ खेलो और मेरी सहायता से जुए में राजा नल को जीतकर निषध देश का राज्य प्राप्त कर लो । ‘ पुष्कर उसकी बात स्वीकार करके नल के पास गया । द्वापर भी पासों का रूप धारण करके उनके साथ हो लिया । जब पुष्कर ने राजा नल से बार – बार जूआ खेलने का आग्रह किया , तब राजा नल दमयन्ती के सामने अपने भाई की बार – बार की ललकारको सह न सके । उन्होंने उसी समय पासे खेलने का निश्चय कर लिया । उस समय नल के शरीर में कलियुग घुसा हुआ था ; इसलिये राजा नल दाव में सोना , चाँदी , रथ , वाहन आदि जो कुछ लगाते , वह हार जाते । प्रजा और मन्त्रियों ने बड़ी व्याकुलता के साथ राजा नल से मिलकर जुए को रोकना चाहा और आकर फाटक के सामने खड़े हो गये । उनका अभिप्राय जानकर द्वारपाल रानी दमयन्ती के पास गया और बोला कि ‘ आप महाराज से निवेदन कर दीजिये। आप धर्म और अर्थ के तत्त्वज्ञ हैं । आपकी सारी प्रजा आपका दुःख सह्य न होने के कारण कार्यवश दरवाजे पर आकर खड़ी है । ‘ दमयन्ती स्वयं दुःख के मारे दुर्बल और अचेत हुई जा रही थी । उसने आँखों में आँसू भरकर गद्गद – कण्ठ से महाराज के सामने निवेदन किया – ‘ स्वामिन् ! नगर की राजभक्त मन्त्रिमण्डल के लोग, प्रजा के लोग आपसे मिलने आये हैं और ड्योढ़ीपर खड़े हैं । आप उनसे मिल लीजिये । परंतु नल कलियुग का आवेश होने के कारण कुछ भी नहीं बोले । मन्त्रिमण्डल और प्रजाके लोग शोकग्रस्त होकर लौट गये ।

पुष्कर और नल में कई महीनो तक जूआ होता रहा तथा राजा नल बराबर हारते गये । राजा नल जुए में जो पासे फेंकते , वे बराबर ही उनके प्रतिकूल पड़ते । सारा धन हाथ से निकल गया । जब दमयन्ती को इस बात का पता चला , तब उसने बृहत्सेना नाम की धाय के द्वारा राजा नल के सारथि वार्ष्णेय को बुलवाया और उससे कहा – सारथि ! तुम राजाके प्रेमपात्र हो । अब यह बात तुमसे छिपी नहीं है कि महाराज बड़े संकट में पड़ गये हैं । इसलिये तुम घोड़ों को रथमें जोड़ लो और मेरे दोनों बच्चों को रथ में बैठाकर कुण्डिननगर में ले जाओ । तुम रथ और घोड़ों को भी वहीं छोड़ देना । तुम्हारी इच्छा हो तो वहीं रहना । नहीं तो कहीं दूसरी जगह चले जाना । ‘ सारथि ने दमयन्ती के कथनानुसार मन्त्रियों से सलाह करके बच्चों को कुण्डिनपुर में पहुँचा दिया , रथ और घोड़े भी वहीं छोड़ दिये तथा स्वयं वहाँ से पैदल ही चलकर अयोध्या जा पहुँचा और वहीं राजा ऋतुपर्ण के पास सारथिका काम करने लगा । वार्ष्णेय सारथिके चले जाने के बाद पुष्कर ने पासों के खेल में राजा नल का राज्य और धन ले लिया । उसने नल को सम्बोधन करके हँसते हुए कहा – ‘ और जूआ खेलोगे ? परंतु तुम्हारे पास दाँवपर लगाने के लिये तो कुछ है ही नहीं । यदि तुम दमयन्ती को दाँवपर लगाने के योग्य समझो तो फिर खेल हो । नलका हृदय फटने लगा । वे पुष्कर से कुछ भी नहीं बोले ।

नल दमयंती का नगर से निर्वासन।nal aur damyanti ki katha. nal damyanti story.

उन्होंने अपने शरीर से सब वस्त्राभूषण उतार दिये और केवल एक वस्त्र पहने नगर से बाहर निकले । दमयन्ती ने भी केवल एक साड़ी पहनकर अपने पति का अनुगमन किया । नल के मित्र और सम्बन्धियों को बड़ा शोक हुआ । नल और दमयन्ती दोनों नगर के बाहर तीन रात तक रहे । पुष्कर ने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो मनुष्य नल के प्रति सहानुभूति प्रकट करेगा , उसको फाँसी की सजा दी जायगी । भय के मारे नगर के लोग अपने राजा नल का सत्कार तक न कर सके ।

राजा नल तीन दिन – रात तक अपने नगर के पास केवल पानी पीकर रहे । चौथे दिन उन्हें बड़ी भूख लगी । फिर दोनों फल – मूल खाकर वहाँ से आगे बढ़े । एक दिन राजा नल ने देखा कि बहुत – से पक्षी उनके पास ही बैठे हैं । उनके पंख सोने के समान दमक रहे हैं । नलने सोचा कि इनकी पाँख से कुछ धन मिलेगा । ऐसा सोचकर उन्हें पकड़ने के लिये नल ने उनपर अपना पहनने का वस्त्र डाल दिया । पक्षी उनका वस्त्र लेकर उड़ गये । अब नल नंगे होकर बड़ी दीनता के साथ मुँह नीचे किये खड़े हो गये । पक्षियों ने कहा – ‘ दुर्बुद्धे ! तू नगर से एक वस्त्र पहनकर निकला था । उसे देखकर हमें बड़ा दुःख हुआ था । ले , अब हम तेरे शरीर पर का वस्त्र लिये जा रहे हैं । हम पक्षी नहीं , जुए के पासे हैं । ‘ नल ने दमयन्ती से पासों की बात कह दी । इसके बाद नल ने कहा – ‘ प्रिये ! तुम देख रही हो , यहाँ बहुत – से मार्ग हैं । एक अवन्ती की ओर जाता है , दूसरा ऋक्षवान् पर्वत पर होकर दक्षिण देश को । सामने विन्ध्याचल पर्वत है । यह पयोष्णी नदी समुद्र में मिलती है । ये महर्षियों के आश्रम हैं । सामने का रास्ता विदर्भ देश को जाता है । यह कोसल देशका मार्ग है । ‘ इस प्रकार राजा नल दुःख और शोकसे भरकर बड़ी सावधानी के साथ दमयन्ती को भिन्न – भिन्न मार्ग और आश्रम बतलाने लगे । दमयन्ती की आँखें आँसू से भर गयीं । वह गद्द – स्वर से कहने लगी – ‘ स्वामिन् ! आप क्या सोच रहे हैं ? मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मेरा हृदय उद्विग्र हो रहा है । आपका राज्य गया , धन गया , आपके शरीरपर वस्त्र नहीं रहा , आप थके – माद तथा भूखे – प्यासे हैं ; क्या मैं आपको इस निर्जन वन में छोड़कर अकेली कहीं जा सकती हूँ ?

मैं आपके साथ रहकर आपके दुःख दूर करूँगी । दुःख के अवसरों पर पत्नी पुरुष के लिये औषध है । वह धैर्य देकर पति के दुःख को कम करती । यह बात वैद्य भी स्वीकार करते हैं । नल ने कहा – ‘ प्रिये ! तुम्हारा कहना ठीक है । पत्नी मित्र है , पत्नी औषध है । परंतु मैं तो तुम्हारा त्याग करना नहीं चाहता । तुम ऐसा संदेह क्यों कर रही हो ? ‘ दमयन्ती बोली – ‘ आप मुझे छोड़ना नहीं चाहते , परंतु विदर्भ देश का मार्ग क्यों बतला रहे हैं ? मुझे निश्चय है कि आप मेरा त्याग नहीं कर सकते । फिर भी इस समय आपका मन उलटा हो गया है , इसलिये ऐसी शंका करती हूँ । आपके मार्ग बताने से मेरा मन दुखता है । यदि आप मुझे मेरे पिता या किसी सम्बन्धी के घर भेजना चाहते हों तो ठीक है , हम दोनों साथ – साथ चलें । मेरे पिता आपका सत्कार करेंगे । आप वहीं सुख से रहिये गा । ‘ नल ने कहा ‘ प्रिये ! तुम्हारे पिता राजा हैं और मैं भी कभी राजा था । इस समय मैं संकट में पड़कर उनके पास नहीं जाऊँगा । ‘ राजा नल दमयन्ती को समझाने लगे । तदनन्तर दोनों एक ही वस्त्र से शरीर ढककर वन में इधर – उधर घूमते रहे । भूख – प्यास से व्याकुल होकर दोनों एक धर्मशाला में आये और ठहर गये ।

नल का दमयन्ती को त्यागना। raja nal damyanti ki katha. नल दमयंती की कथा।

बृहदश्वजी कहते हैं – युधिष्ठिर | उस समय राजा नल के शरीर पर वस्त्र नहीं था और तो क्या , धरती पर बिछाने के लिये एक चटाई भी नहीं थी । शरीर धूल से लथपथ हो रहा था । भूख प्यास की पीड़ा अलग ही थी । राजा नल जमीन पर ही सो गये । दमयन्ती के जीवन में भी कभी ऐसी परिस्थिति नहीं आयी थी । वह सुकुमारी भी वहीं सो गयी । दमयन्ती के सो जानेपर राजा नल की नींद टूटी । सच्ची बात तो यह थी कि वे दुःख और शोक की अधिकताके कारण सुख की नींद सो भी नहीं सकते थे । आँख के खुलनेपर उनके सामने राज्य के छिन जाने , सगे – सम्बन्धियों के छूटने और पक्षियों के वस्त्र लेकर उड़ जाने के दृश्य एक – एक करके आने लगे । वे सोचने लगे कि ‘ दमयन्ती मुझपर बड़ा प्रेम करती है । प्रेमके कारण ही वह इतना दुःख भी भोग रही है । यदि मैं इसे छोड़कर चला जाऊँगा तो यह अपने पिता के घर चली जायगी । मेरे साथ तो इसे दुःख – ही दुःख भोगना पड़ेगा । यदि मैं इसे छोड़कर चला जाऊँ तो सम्भव है कि इसे सुख भी मिल जाय । ‘ अन्तमें राजा नल ने यही निश्चय किया कि ‘ दमयन्ती को छोड़कर चले जाने में ही भला है । दमयन्ती सच्ची पतिव्रता है । कोई भी इसके सतीत्वको भङ्ग नहीं कर सकता । * इस प्रकार त्यागनेका निश्चय करके और सतीत्वकी ओर से निश्चिन्त होकर राजा नल ने यह विचार किया कि ‘ मैं नंगा हूँ और दमयन्तीके शरीरपर भी केवल एक ही वस्त्र है । फिर भी इसके वस्त्रों से आधा फाड़ लेना ही श्रेयस्कर है । परंतु फाइँ कैसे ? शायद यह जग जाय ? ‘ वे धर्मशालामें इधर – उधर घूमने लगे । उनकी दृष्टि एक बिना म्यानकी तलवारपर पड़ गयी । राजा नलने उसे उठा लिया और धीरे से दमयन्ती का आधा वस्त्र फाड़कर अपना शरीर ढक लिया।

दमयन्ती नींदमें थी । राजा नल उसे छोड़कर निकल पड़े । थोड़ी देर बाद जब उनका हृदय शान्त हुआ , तब वे फिर धर्मशालामें लौट आये और दमयन्तीको देखकर रोने लगे । वे सोचने लगे कि ‘ अबतक मेरी प्राणप्रिया अन्तःपुरके परदे में रहती थी , इसे कोई छू भी नहीं सकता था । आज यह अनाथके समान आधा वस्त्र पहने धूलमें सो रही है । यह मेरे बिना दुःखी होकर वनमें कैसे फिरेगी ? प्रिये । तू धर्मात्मा है ; इसलिये आदित्य , वसु , रुद्र , अश्विनीकुमार और पवनदेवता तेरी रक्षा करें । ‘ उस समय राजा नलका हदय दुःखके मारे टुकड़े – टुकड़े हुआ जा रहा था , वे झूलेकी तरह बार – बार धर्मशालासे बाहर निकलते और फिर लौट आते । शरीरमें कलियुगका प्रवेश होनेके कारण बुद्धि नष्ट हो गयी थी , इसलिये अन्ततः वे अपनी प्राणप्रिया पत्नीको वनमें अकेली छोड़कर वहाँसे चले गये ।

नल दमयंती की कहानी,nal damyanti ki kahani. राजा नल दमयंती की कथा raja nal damyanti ki katha.

जब दमयन्तीकी नींद टूटी , तब उसने देखा कि राजा नल वहाँ नहीं हैं । वह आशंकासे भरकर पुकारने लगी कि ‘ महाराज ! स्वामिन् ! मेरे सर्वस्व ! आप कहाँ हैं ? मैं अकेली डर रही हूँ , आप कहाँ गये ? बस , अब अधिक हँसी न कीजिये । मेरे कठोर स्वामी ! मुझे क्यों डरा रहे हैं ? शीघ्र दर्शन दीजिये । मैं आपको देख रही हूँ । लो , यह देख लिया । लताओंकी आड़में छिपकर चुप क्यों हो रहे हैं ? मैं दुःखमें पड़कर इतना विलाप कर रही हूँ और आप मेरे पास आकर धैर्य भी नहीं देते ? स्वामिन् ! मुझे अपना या और किसीका शोक नहीं है । मुझे केवल इतनी ही चिन्ता है कि आप इस घोर जंगलमें अकेले कैसे रहेंगे ? हा नाथ ! निर्मल चित्तवाले आपकी जिस पुरुषने यह दशा की है , वह आपसे भी अधिक दुर्दशाको प्राप्त होकर निरन्तर जीवन बिताए।

दमयन्ती इस प्रकार विलाप करती हुई इधर – उधर दौड़ने लगी । वह उन्मत्त – सी होकर इधर – उधर घूमती हुई एक अजगरके पास जा पहुँची , शोकग्रस्त होने के कारण उसे इस बातका पता भी नहीं चला । अजगर दमयन्तीको निगलने लगा । उस समय भी दमयन्तीके चित्तमें अपनी नहीं , राजा नलकी ही चिन्ता थी कि वे अकेले कैसे रहेंगे । वह पुकारने लगी ‘ स्वामिन् ! मुझे अनाथकी भाँति यह अजगर निगल रहा है , आप मुझे छुड़ानेके लिये क्यों नहीं दौड़ आते ? ‘ दमयन्तीकी आवाज एक व्याधके कानमें पड़ी । वह उधर ही घूम रहा था । वह वहाँ दौड़कर आया और यह देखकर कि दमयन्तीको अजगर निगल रहा है , अपने तेज शस्त्रसे अजगरका मुँह चीर डाला । उसने दमयन्तीको छुड़ाकर नहलाया , आश्वासन देकर भोजन कराया । दमयन्ती कुछ कुछ शान्त हुई । व्याधने पूछा- ‘ सुन्दरी ! तुम कौन हो ? किस कष्टमें पड़कर किस उद्देश्यसे यहाँ आयी हो ? ‘ दमयन्तीने व्याधसे अपनी कष्ट – कहानी कही । दमयन्तीकी सुन्दरता , बोल – चाल और मनोहरता देखकर व्याध काममोहित हो गया । वह मीठी – मीठी बातें करके दमयन्तीको अपने वशमें करनेकी चेष्टा करने लगा । दमयन्ती दुरात्मा व्याधके मनका भाव जानकर क्रोधके आवेशसे प्रज्वलित हो गयी । दमयन्तीने व्याधके बलात्कारकी चेष्टाको रोकना चाहा ; परंतु जब वह किसी भी प्रकार न माना , तब उसने शाप दे दिया।

यदि मैंने निषधनरेश राजा नलको छोड़कर और किसी पुरुषका मनसे भी चिन्तन नहीं किया हो तो यह पापी क्षुद्र व्याध मरकर जमीनपर गिर पड़े । * दमयन्तीके मुँहसे ऐसी बात निकलते ही व्याधके प्राण – पखेरू उड़ गये , वह जले हुए हूँठकी तरह पृथ्वीपर गिर पड़ा । व्याधके मर जानेपर दमयन्ती राजा नलको ढूँढ़ती हुई एक निर्जन और भयंकर वनमें जा पहुँची । बहुत – से पर्वत , नदी , नद , जंगल , हिंस्र पशु , पिशाच आदिको देखती हुई और विरहके उन्मादमें उनसे राजा नलका पता पूछती हुई वह उत्तरकी ओर बढ़ने लगी ।

दमयंती को दिव्य ऋषियो के दर्शन और राजा सुबाहु के महल में निवास( नल और दमयंती की कथा)। raja nal aur damyanti ki kahani.

तीन दिन , तीन रात बीत जानेके बाद दमयन्तीने देखा कि सामने ही एक बड़ा सुन्दर तपोवन है । उस आश्रममें वसिष्ठ , भृगु और अत्रिके समान मितभोजी , संयमी , पवित्र , जितेन्द्रिय और तपस्वी ऋषि निवास कर रहे हैं । वे वृक्षोंकी छाल अथवा मृगछाला धारण किये हुए थे । दमयन्ती को कुछ धैर्य मिला , उसने आश्रम में जाकर बड़ी नम्रता के साथ तपस्वी ऋषियोंको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी । ऋषियोंने ‘ स्वागत है ‘ कहकर दमयन्ती का सत्कार किया और बोले – ‘ बैठ जाओ । हम तुम्हारा क्या काम करें ? ‘ दमयन्तीने भद्र महिलाके समान पूछा – ‘ आपकी तपस्या , अग्नि , धर्म और पशु – पक्षी तो सकुशल हैं न ? आपके धर्माचरणमें तो कोई विघ्न नहीं पड़ता । ‘ ऋषियोंने कहा – ‘ कल्याणी ! हम तो सब प्रकारसे सकुशल हैं । तुम कौन हो , किस उद्देश्यसे यहाँ आयी हो ? हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है । क्या तुम वन , पर्वत , नदीकी अधिष्ठातृदेवता हो ? ‘

दमयन्तीने कहा – ‘ महात्माओ ! मैं कोई देवी – देवता नहीं ,एक मनुष्य – स्त्री हूँ । मैं विदर्भनरेश राजा भीमकी पुत्री हूँ । बुद्धिमान् , यशस्वी एवं वीर – विजयी निषधनरेश महाराज नल मेरे पति हैं । कपटद्यूतके विशेषज्ञ एवं दुरात्मा पुरुषोंने मेरे धर्मात्मा पतिको जूआ खेलने के लिये उत्साहित करके उनका राज्य और धन ले लिया है । मैं उन्हींकी पत्नी दमयन्ती हूँ । संयोगवश वे मुझसे बिछुड़ गये हैं । मैं उन्हीं रणबांकुरे , शस्त्रविद्याकुशल एवं महात्मा पतिदेवको ढूँढ़नेके लिये वन – वन भटक रही हूँ । मैं यदि उन्हें शीघ्र ही नहीं देख पाऊँगी तो जीवित नहीं रह सकूँगी । उनके बिना मेरा जीवन निष्फल है । वियोगके दुःखको मैं कबतक सह सकूँगी । ‘ तपस्वियोंने कहा ‘ कल्याणी ! हम अपनी तपःशुद्ध दृष्टिसे देख रहे हैं कि तुम्हें आगे बहुत सुख मिलेगा और थोड़े ही दिनोंमें राजा नलका दर्शन होगा । ‘ धर्मात्मा निषध – नरेश थोड़े ही दिनोंमें समस्त दुःखोंसे छूटकर सम्पत्तिशाली निषध देशपर राज्य करेंगे । उनके शत्रु भयभीत होंगे , मित्र सुखी होंगे और कुटुम्बी उन्हें अपने बीचमें पाकर आनन्दित होंगे । ‘ इस प्रकार कहकर वे सब तपस्वी अपने आश्रमके साथ अन्तर्धान हो गये । यह आश्चर्यकी घटना देखकर दमयन्ती विस्मित हो गयी । वह सोचने लगी कि ‘ अहो ! मैंने यह स्वप्न देखा है क्या ? यह कैसी घटना हो गयी । वे तपस्वी , आश्रम , पवित्रसलिला नदी , फल – फूलोंसे लदे हरे – भरे वृक्ष कहाँ गये ? ‘ दमयन्ती फिर उदास हो गयी , उसका मुख मुरझा गया । वहाँसे चलकर विलाप करती हुई दमयन्ती एक अशोक वृक्षके पास पहुँची । उसकी आँखोंसे झर – झर आँसू झर रहे थे ।

उसने अशोक वृक्ष से गद्गद – स्वरमें कहा- ‘ शोकरहित अशोक ! तू मेरा शोक मिटा दे । क्या कहीं तूने राजा नलको शोक – रहित देखा है ? अशोक ! तू अपने शोकनाशक नामको सार्थक कर । ‘ दमयन्तीने अशोक की प्रदक्षिणा की और वह आगे बढ़ी । भयंकर वनमें अनेकों वृक्ष , गुफा , पर्वतोंके शिखर और नदियोंके आस – पास अपने पतिदेवको ढूँढ़ती हुई दमयन्ती बहुत दूर निकल गयी । वहाँ उसने देखा कि बहुत – से हाथी , घोड़ों और रथोंके साथ व्यापारियों का एक झुंड आगे बढ़ रहा है । व्यापारियों के प्रधान से बातचीत करके और यह जानकर कि ये व्यापारी राजा सुबाहु के राज्य चेदिदेश में जा रहे हैं , दमयन्ती उनके साथ हो गयी । उसके मनमें अपने पतिके दर्शनकी लालसा बढ़ती ही जा रही थी । कई दिनोंतक चलनेके बाद वे व्यापारी एक भयंकर वनमें पहुंचे । वहाँ एक बड़ा ही सुन्दर सरोवर था । लंबी यात्राके कारण सब लोग थक गये थे । इसलिये उन लोगोंने वहीं पड़ाव डाल दिया । दैव व्यापारियोंके प्रतिकूल था । रातके समय जंगली हाथी व्यापारियोंके हाथियोंपर टूट पड़े और उनकी भगदड़में सब – के – सब व्यापारी नष्ट – भ्रष्ट हो गये । कोलाहल सुनकर दमयन्तीकी नींद टूटी । वह इस महासंहारका दृश्य देखकर बावली – सी हो गयी । उसने कभी ऐसी घटना नहीं देखी थी । वह डरकर वहाँसे भाग निकली और जहाँ कुछ बचे हुए मनुष्य खड़े थे , वहाँ जा पहुँची । तदनन्तर दमयन्ती उन वेदपाठी और संयमी ब्राह्मणों के साथ , जो उस महासंहारसे बच गये थे , शरीरपर आधा वस्त्र धारण किये चलने लगी और सायंकाल के समय चेदिनरेश राजा सुबाहुकी राजधानी में जा पहुंची । जिस समय दमयन्ती राजधानीके राज – पथपर चल रही थी , नागरिकों ने यही समझा कि यह कोई बावली स्त्री है ।

छोटे – छोटे बच्चे उसके पीछे लग गये । दमयन्ती राजमहलके पास जा पहुँची । उस समय राजमाता राजमहलकी खिड़कीमें बैठी हुई थीं । उन्होंने बच्चोंसे घिरी दमयन्तीको देखकर धायसे कहा कि ‘ अरी ! देख तो , यह स्त्री बड़ी दुखिया मालूम पड़ती है । अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़ रही है । बच्चे इसे दुःख दे रहे हैं । तू जा , इसे मेरे पास ले आ । यह सुन्दरी तो इतनी है , मानो मेरे महलको भी दमका देगी । ‘ धायने आज्ञापालन किया । दमयन्ती राजमहल में आ गयी । राजमाताने दमयन्तीका सुन्दर शरीर देखकर पूछा – ‘ देखनेमें तो तुम दुखिया जान पड़ती हो , तो भी तुम्हारा शरीर इतना तेजस्वी कैसे है ? बताओ , तुम कौन हो , किसकी पत्नी हो , असहाय अवस्थामें भी किसीसे डरती क्यों नहीं हो ? ‘ दमयन्तीने कहा- ‘ मैं एक पतिव्रता नारी हूँ । मैं हूँ तो कुलीन परंतु दासीका काम करती हूँ । अन्तःपुरमें रह चुकी हूँ । मैं कहीं भी रह जाती हूँ । फल – मूल खाकर दिन बिता देती हूँ । मेरे पतिदेव बहुत गुणी हैं और मुझसे प्रेम भी करते हैं । मेरे अभाग्यकी बात है कि वे बिना मेरे किसी अपराधके ही रातके समय मुझे सोती छोड़कर न जाने कहाँ चले गये । मैं रात दिन अपने प्राणपतिको ढूँढ़ती और उनके वियोगमें जलती रहती हूँ । ‘ इतना कहते – कहते दमयन्तीकी आँखोंमें आँसू उमड़ आये , वह रोने लगी । दमयन्तीके दुःखभरे विलापसे राजमाताका जी भर आया । वे कहने लगीं – ‘ कल्याणी ! मेरा तुमपर स्वाभाविक ही प्रेम हो रहा है । तुम मेरे पास रहो , मैं तुम्हारे पतिको ढूँढ़ने का काम करूंगी । जब वे आवे , तब तुम उनसे यहीं मिलना । ‘ दमयन्तीने कहा — ‘ माताजी ! मैं एक शर्तपर आपके घर रह सकती हूँ ।

कभी जूठा न खाऊँगी , किसीके पैर नहीं घोऊँगी और पर – पुरुषके साथ किसी प्रकार भी बातचीत नहीं करूँगी । यदि कोई पुरुष मुझसे दुश्चेष्टा करे तो उसे दण्ड देना होगा । बार – बार ऐसा करनेपर उसे प्राणान्त दण्ड भी देना होगा । मैं अपने पतिको ढूँढ़ने के लिये ब्राह्मणों से बातचीत करती रहूँगी । आप यदि मेरी यह शर्त स्वीकार करें तब तो मैं रह सकती हूँ , अन्यथा नहीं । * राजमाता दमयन्तीके नियमोंको सुनकर बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने कहा कि ऐसा ही होगा । तदनन्तर उन्होंने अपनी पुत्री सुनन्दा को बुलाया और कहा कि ‘ बेटी ! देखो , इस दासीको देवी समझना । यह अवस्था में तुम्हारे बराबरकी है , इसलिये इसे सखी के समान राजमहल में रखो और प्रसन्नता के साथ इससे मनोरञ्जन करती रहो । ‘ सुनन्दा प्रसन्नताके साथ दमयन्तीको अपने महलमें ले गयी । दमयन्ती अपने इच्छानुसार नियमोंका पालन करती हई महलमें रहने लगी ।

नल का रूप बदलना। raja nal ki katha.nal raja ki kahani.

दमयन्ती को सोती छोड़कर आगे बढ़े , उस समय वनमें दावाग्नि लग रही थी । नल कुछ ठिठक गये , उनके कानों में आवाज आयी ‘ राजा नल ! शीघ्र दौड़ो । मुझे बचाओ । ‘ नलने कहा — ‘ डरो मत ‘ वे दौड़कर दावानलमें घुस गये और देखा कि नागराज कर्कोटक कुण्डली बाँधकर पड़ा हुआ है । उसने हाथ जोड़कर नलसे कहा ‘ राजन् ! मैं कोंटक नामका सर्प हूँ । मैंने तेजस्वी ऋषि नारदको धोखा दिया था । उन्होंने शाप दे दिया कि जबतक राजा नल तुम्हें न उठावें , तबतक यहीं पड़ा रह । उनके उठानेपर तू शापसे छूट जायगा । उनके शापके कारण मैं यहाँसे एक पग भी हट – बढ़ नहीं सकता । तुम शापसे मेरी रक्षा करो । मैं तुम्हें हितकी बात बताऊँगा और तुम्हारा मित्र बन जाऊँगा । मेरे भारसे डरो मत । मैं अभी हल्का हो जाता हूँ । ‘ वह अँगूठेके बराबर हो गया । नल उसे उठाकर दावानलसे बाहर ले आये । कर्कोटकने कहा- -‘राजन् ! तुम अभी मुझे पृथ्वीपर न डालो । कुछ पगों तक गिनती करते हुए चलो । ‘ राजा नलने ज्यों ही पृथ्वीपर दसवाँ पग डाला और कहा – ‘ दस ‘ , त्यों ही कर्कोटक नागने उन्हें डस लिया । उसका नियम था कि जब कोई ‘ दस ‘ अर्थात् ‘ डसो ‘ कहता , तभी वह डसता , अन्यथा नहीं । कर्कोटक के डसते ही नल का पहला रूप बदल गया और कोंटक अपने रूपमें हो गया । आश्चर्यचकित नल से उसने कहा -‘राजन् ! तुम्हें कोई पहचान न सके , इसलिये मैंने तुम्हारा रूप बदल दिया है । कलियुगने तुम्हें बहुत दुःख दिया है , अब मेरे विषसे वह तुम्हारे शरीरमें बहुत दुःखी रहेगा । * तुमने मेरी रक्षा की है । अब तुम्हें हिंसक पशु – पक्षी , शत्रु और ब्रह्मवेत्ताओं के शाप आदि से भी कोई भय नहीं रहेगा । अब तुमपर किसी भी विष का प्रभाव नहीं होगा और युद्ध में सर्वदा तुम्हारी जीत होगी । * अब तुम अपना नाम बाहुक रख लो और द्यूतकुशल राजा ऋतुपर्णकी नगरी अयोध्या जाओ । तुम उन्हें घोड़ों की विद्या बतलाना और वे तुम्हें जुएका रहस्य बतला देंगे तथा तुम्हारे मित्र भी बन जायेंगे । जुएका रहस्य जान लेनेपर तुम्हारी पत्नी , पुत्री , पुत्र , राज्य सब कुछ मिल जायगा । जब तुम अपने पहले रूपको धारण करना चाहो , तब मेरा स्मरण करना और मेरे दिये हुए वस्त्र धारण कर लेना । यह कहकर ककोंटकने दो दिव्य वस्त्र दिये और वहीं अन्तर्धान हो गया ।

राजा नल वहाँसे चलकर दसवें दिन राजा ऋतुपर्ण की राजधानी अयोध्या में पहुँच गये । उन्होंने वहाँ राजदरबार में निवेदन किया कि ‘ मेरा नाम बाहुक है । मैं घोड़ों को हाँकने तथा उन्हें तरह – तरह की चाले सिखाने का काम करता हूँ । घोड़ों की विद्या में मेरे – जैसा निपुण इस समय पृथ्वी पर और कोई नहीं है । अर्थ सम्बन्धी तथा अन्यान्य गम्भीर समस्याओं पर मैं अच्छी सम्मति देता हैं और रसोई बनाने में भी बहुत ही चतुर हूँ , एवं हस्तकौशलके सभी काम तथा दूसरे भी कठिन कामों को मैं करने की चेष्टा करूँगा । आप मेरी आजीविका निश्चित करके मुझे रख लीजिये । ‘ ऋतुपर्ण ने कहा- ‘ बाहुक ! तुम भले आये । तुम्हारे जिम्मे ये सभी काम रहेंगे । परंतु मैं शीघ्रगामी सवारी को विशेष पसंद करता इसलिये तुम ऐसा उद्योग करो कि- मेरे घोड़ों की चाल तेज हो जाय । मैं तुम्हें अश्वशालाका अध्यक्ष बनाता हूँ । तुम्हें हर महीने सोनेकी दस हजार मोहरें मिला करेंगी । इसके अतिरिक्त वाष्र्णेय ( नलका पुराना सारथि ) और जीवल हमेशा तुम्हारे पास उपस्थित रहेंगे । तुम आनन्द से मेरे दरबारमें रहो । ‘ राजा ऋतुपर्ण से सत्कार पाकर राजा नल बाहुक के रूपमें वार्ष्णेय और जीवलके साथ अयोध्यामें रहने लगे । राजा नल प्रतिदिन रात को दमयन्ती का स्मरण करके कहा करते कि ‘ हाय – हाय , तपस्विनी दमयन्ती भूख – प्यास से घबराकर थकी – माँदी उस मूर्ख का स्मरण करती होगी और न जाने कहाँ सोती होगी ? भला , वह अपने जीवन – निर्वाहके लिये किसके पास जाती होगी ? ‘ इसी प्रकार वे अनेकों बातें सोचते और इस प्रकार ऋतुपर्णके पास रहते कि उन्हें कोई पहचान न सके । जब विदर्भनरेश भीम को यह समाचार मिला कि मेरे दामाद नल राज्यच्युत होकर मेरी पुत्री के साथ वनमें चले गये हैं , तब उन्होंने ब्राह्मणों को बुलवाया और उन्हें बहुत – सा धन देकर कहा कि आपलोग पृथ्वीपर सर्वत्र जा – जाकर नल – दमयन्तीका पता लगाइये और उन्हें ढूंढ़ लाइये । जो ब्राह्मण यह काम पूरा कर लेगा , उसे एक सहस्र गौएँ और जागीर दी जायगी । यदि आप लोग उन्हें ला न सकें , केवल पता ही लगा लावें तो भी दस हजार गौएँ दी जायेंगी । ब्राह्मण लोग बड़ी प्रसन्नतासे नल – दमयन्तीका पता लगाने निकल पडे।

सुदेव नामक ब्राह्मण नल – दमयन्तीका पता लगानेके लिये चेदिनरेश की राजधानी में गया । उसने एक दिन राजमहल में दमयन्ती को देख लिया । उस समय राजाके महलमें पुण्याहवाचन हो रहा था और दमयन्ती – सुनन्दा एक साथ बैठकर वह मङ्गलकृत्य देख रही थीं । सुदेव ब्राह्मण ने दमयन्ती को देखकर सोचा कि वास्तव में यही भीम – नन्दिनी है । मैंने इसका जैसा रूप पहले देखा था , वैसा ही अब भी देख रहा हूँ । बड़ा अच्छा हुआ , इसे देख लेने से मेरी यात्रा सफल हो गयी । सुदेव दमयन्ती के पास गया और बोला – ‘ विदर्भनन्दिनि ! मैं तुम्हारे भाईका मित्र सुदेव ब्राह्मण हूँ । राजा भीम की आज्ञासे तुम्हें ढूँढ़ने के लिये यहाँ आया हूँ । तुम्हारे माता – पिता और भाई सानन्द हैं । तुम्हारे दोनों बच्चे भी विदर्भ देश में सकुशल है। । तुम्हारे बिछोहसे सभी कुटुम्बी प्राण – हीन – से हो रहे हैं और तुम्हें ढूँढ़ने के लिये सैकड़ों ब्राह्मण पृथ्वीपर घूम रहे हैं । दमयन्ती ने ब्राह्मण को पहचान लिया । वह क्रम – क्रमसे सबका कुशल – मङ्गल पूछने लगी और पूछते – पूछते ही रो पड़ी । सुनन्दा दमयन्ती को बात करते रोते देखकर घबरा गयी और उसने अपनी माता के पास जाकर सब हाल कहा । राजमाता तुरंत अन्तःपुरसे बाहर निकल आयीं और ब्राह्मणके पास जाकर पूछने लगी कि ‘ महाराज ! यह किसकी पत्नी है , किसकी पुत्री है , अपने घरवालोंसे कैसे बिछुड़ गयी है ? तुमने इसे पहचाना कैसे ? ‘ सुदेवने नल दमयन्तीका पूरा चरित्र सुनाया और कहा कि जैसे राख में दबी हुई आग गर्मी से जान ली जाती है , वैसे ही इस देवीके सुन्दर रूप और ललाट से मैंने इसे पहचान लिया है ।

सुनन्दा ने अपने हाथों से दमयन्तीका ललाट धो दिया , जिससे उसकी भौंहों के बीचका लाल चिह्न चन्द्रमाके समान प्रकट हो गया । ललाट का वह तिल देखकर सुनन्दा और राजमाता दोनों ही रो पड़ीं । उन्होंने दो घड़ीतक दमयन्ती को अपनी छातीसे सटाये रखा । राजमाताने कहा मैंने इस तिल से पहचान लिया कि तुम मेरी बहिन की पुत्री हो । तुम्हारी माता मेरी सगी बहिन है । हम दोनों दशार्ण देशके राजा सुदामा की पुत्री हैं । तुम्हारा जन्म मेरे पिताके घर ही हुआ था , उस समय मैंने तुम्हें देखा था । जैसे तुम्हारे पिताका घर तुम्हारा है , वैसे ही यह घर भी तुम्हारा ही है , यह सम्पत्ति जैसे मेरी है , वैसे ही तुम्हारी भी । ‘ दमयन्ती बहुत प्रसन्न हुई । उसने अपनी मौसीको प्रणाम करके कहा — ‘ माँ ! तुमने मुझे पहचाना नहीं तो क्या हुआ ? मैं रही हूँ यहाँ लड़की की ही तरह । तुमने मेरी अभिलाषाएँ पूर्ण की हैं तथा मेरी रक्षा की है । इसमें मुझे संदेह नहीं है कि मैं अब यहाँ और भी सुखसे रहूँगी । परंतु मैं बहुत दिनों से घूम रही हूँ । मेरे छोटे – छोटे दो बच्चे पिताजी के घर हैं । वे अपने पिताके वियोगसे दुःखी रहते होंगे । न जाने उनकी क्या दशा होगी ! आप यदि मेरा हित करना चाहती हैं तो मुझे विदर्भ देश में भेजकर मेरी इच्छा पूर्ण कीजिये । ‘ राजमाता बहुत प्रसन्न हुईं । उन्होंने अपने पुत्र से कहकर पालकी मंगवाई । भोजन , वस्त्र और बहुत – सी वस्तुएँ देकर एक बड़ी सेना के संरक्षण में दमयन्ती को विदा कर दिया । विदर्भ देश में दमयन्तीका बड़ा सत्कार हुआ । दमयन्ती अपने भाई , बच्चे , माता – पिता और सखियों से मिली । उसने देवता और ब्राह्मणों की पूजा की । राजा भीमको अपनी पुत्रीके मिल जाने से बड़ी प्रसन्नता हुई । उन्होंने सुदेव नामक ब्राह्मण को एक हजार गौएँ , गाँव तथा धन देकर संतुष्ट किया।

हमने नल दमयंती की कहानी में अब तक जाना नल का रूप बदलना। (raja nal ka kissa.nal raja ki kahani.) अब हम आगे की कहानी( नल दमयंती की कथा) में जानेंगे नल की खोज ऋतुपर्ण की विदर्भ यात्रा। और कलयुग का उतरना। (raja nal damyanti ki kahani)

नल की खोज। raja nal damyanti ki kahani.

अपने पिताके घर एक दिन विश्राम करके दमयन्तीने अपनी मातासे कहा कि ‘ माताजी ! मैं आपसे सत्य कहती हूँ। यदि आप मुझे जीवित रखना चाहती हैं तो मेरे पतिदेव को ढुढ़वाने का उद्योग कीजिये । ‘ रानी ने बहुत दुःखित होकर अपने पति राजा भीमसे कहा कि ‘ स्वामिन् ! दमयन्ती अपने पति के लिये बहुत व्याकुल है । उसने संकोच छोड़कर मुझसे कहा है कि उन्हें ढूंढ़वानेका उद्योग करना चाहिये । ‘ राजाने अपने आश्रित ब्राह्मणों को बुलवाया और नल को ढूँढ़ने के लिये उन्हें नियुक्त कर दिया । ब्राह्मणों ने दमयन्तीके पास जाकर कहा कि ‘ अब हम राजा नलका पता लगाने के लिये जा रहे हैं । ‘ दमयन्ती ने ब्राह्मणों से कहा कि ” आपलोग जिस राज्य में जायँ , वहाँ मनुष्यों की भीड़में यह बात कहें – ‘ मेरे प्यारे छलिया ! तुम मेरी साड़ी में से आधी फाड़कर तथा मुझ दासी को वनमें सोती छोड़कर कहाँ चले गये ? तुम्हारी वह दासी अब भी उसी अवस्था में आधी साड़ी पहने तुम्हारे आनेकी बाट जोह रही है और तुम्हारे वियोग के दुःख से दुःखी हो रही है । ‘ * उनके सामने मेरी दशा का वर्णन कीजियेगा और ऐसी बात कहियेगा , जिससे वे प्रसन्न हों और मुझ पर कृपा करें । मेरी बात कहने पर यदि आपलोगों को कोई उत्तर दे तो ‘ वह कौन है , कहाँ रहता है ‘ – इन बातों का पता लगा लीजियेगा और उसका उत्तर याद रखकर मुझे सुनाइयेगा । इस बात का भी ध्यान रखियेगा कि आपलोग यह बात मेरी आज्ञासे कह रहे हैं , यह उसे मालूम न होने पावे । ” ब्राह्मणगण दमयन्ती के निर्देशानुसार राजा नलको ढूँढ़नेके लिये निकल पड़े ।

बहुत दिनोंतक ढूँढ़ने – खोजने के बाद पर्णाद नामक ब्राह्मणने महल में आकर दमयन्ती से कहा- ” राजकुमारी ! मैं आपके निर्देशानुसार निषध नरेश नल का पता लगाता हुआ अयोध्या जा पहुँचा । वहाँ मैंने राजा ऋतुपर्णके पास जाकर भरी सभा में तुम्हारी बात दुहरायी । परंतु वहाँ किसीने कुछ उत्तर नहीं दिया । जब मैं चलने लगा , तब उसके बाहुक नामक सारथि ने मुझे एकान्त में बुलाकर कुछ कहा । देवि ! वह सारथि राजा ऋतुपर्ण के घोड़ों को शिक्षा देता है , स्वादिष्ट भोजन बनाता है ; परंतु उसके हाथ छोटे और शरीर कुरूप है । उसने लम्बी साँस लेकर रोते हुए कहा कि ‘ कुलीन स्त्रियाँ घोर कष्ट पानेपर भी अपने शीलकी रक्षा करती हैं और अपने सतीत्व के बलपर स्वर्ग जीत लेती हैं । कभी उनका पति त्याग भी दे तो वे क्रोध नहीं करतीं , अपने सदाचार की रक्षा करती हैं । त्यागने वाला पुरुष विपत्ति में पड़नेके कारण दुःखी और अचेत हो रहा था , इसलिये उसपर क्रोध करना उचित नहीं है । माना कि पति ने अपनी पत्नी का योग्य सत्कार नहीं किया । परंतु वह उस समय राज्यलक्ष्मीसे च्युत , क्षुधातुर , दुःखी और दुर्दशाग्रस्त था । ऐसी अवस्थामें उसपर क्रोध करना उचित नहीं है । जब वह अपनी प्राण रक्षाके लिये जीविका चाह रहा था , तब पक्षी उसके वस्त्र लेकर उड़ गये । उसके हृदयकी पीड़ा असह्य थी । ‘ राजकुमारी ! बाहुक की यह बात सुनकर मैं तुम्हें सुनाने के लिये आया हूँ । तुम जैसा उचित समझो , करो । चाहो तो महाराज से भी कह दो । ” ब्राह्मण की बात सुनकर दमयन्ती की आँखोंमें आँसू भर आये ।

उसने अपनी माँ से एकान्तमें कहा – ‘ माताजी ! आप यह बात पिताजीसे न कहें । मैं सुदेव ब्राह्मणको इस काममें नियुक्त करती हूँ । जैसे सुदेवने मुझे शुभ मुहूर्तमें यहाँ पहुँचाया था , वैसे ही वह शुभ शकुन देखकर अयोध्या जाय और मेरे पतिदेव को लाने की युक्ति करे । ‘ इसके बाद दमयन्ती ने पर्णादका सत्कार करके उसे विदा किया और सुदेवको बुलाया । दमयन्ती ने सुदेवसे कहा – ‘ ब्राह्मण देवता ! आप शीघ्र – से – शीघ्र अयोध्या नगरी में जाकर राजा ऋतुपर्ण से यह बात कहिये कि भीम – पुत्री दमयन्ती फिरसे स्वयंवर में स्वेच्छानुसार पति – वरण करना चाहती है । बड़े – बड़े राजा और राजकुमार जा रहे हैं । स्वयंवर की तिथि कल ही है । इसलिये यदि आप पहुँच सके तो वहाँ जाइये । नल के जीने अथवा मरने का किसी को पता नहीं है , इसलिये वह कल सूर्योदय के समय दूसरा पति वरण करेगी । ‘ दमयन्ती की बात सुनकर सुदेव अयोध्या गये और उन्होंने राजा ऋतुपर्ण से सब बातें कह दीं । राजा ऋतुपर्ण ने सुदेव ब्राह्मणकी बात सुनकर बाहुक को बुलाया और मधुर वाणी से समझाकर कहा कि ‘ बाहुक ! कल दमयन्ती का स्वयंवर है । मैं एक ही दिनमें विदर्भ देश में पहुँचना चाहता हूँ । परंतु यदि तुम इतना जल्दी वहाँ पहुँच जाना सम्भव समझो , तभी मैं वहाँ जाऊँगा । ‘ ऋतुपर्ण की बात सुनकर नल का कलेजा फटने लगा । उन्होंने अपने मन में सोचा कि ‘ दमयन्ती ने दुःख से अचेत होकर ही ऐसा कहा होगा । सम्भव है , वह ऐसा करना चाहती हो । परंतु नहीं नहीं , उसने मेरी प्राप्ति के लिये ही यह युक्ति की होगी । वह पतिव्रता , तपस्विनी और दीन है । मैंने दुर्बुद्धिवश उसे त्यागकर बड़ी क्रूरता की । अपराध मेरा ही है । वह कभी ऐसा नहीं कर सकती ।

अस्तु , सत्य क्या है , असत्य क्या है – यह बात तो वहाँ जाने पर ही मालूम होगी । परंतु ऋतुपर्ण की इच्छा पूरी करने में मेरा भी स्वार्थ है । ‘ बाहुक ने हाथ जोड़कर कहा कि ‘ मैं आपके कथनानुसार काम करने की प्रतिज्ञा करता हूँ । ‘ बाहुक अश्वशाला में जाकर श्रेष्ठ घोड़ों की परीक्षा करने लगे । नलने अच्छी जाति के चार शीघ्रगामी घोड़े रथमें जोत लिये । राजा ऋतुपर्ण रथपर सवार हो गये । जैसे आकाशचारी पक्षी आकाश में उड़ते हैं , वैसे ही बाहुकका रथ थोड़े ही समय में नदी , पर्वत और वनों को लाँघने लगा । एक स्थानपर राजा ऋतुपर्णका दुपट्टा नीचे गिर गया । उन्होंने बाहुक से कहा – ‘ रथ रोको , मैं वार्ष्णेय से उसे उठवा मँगाऊँ । ‘ नलने कहा – ‘ आपका वस्त्र गिरा तो अभी है , परंतु अब हम वहाँसे एक योजन आगे निकल आये हैं । अब वह नहीं उठाया जा सकता । ‘ जिस समय यह बात हो रही थी , उस समय वह रथ एक वन में चल रहा था । ऋतुपर्णने कहा – ‘ बाहुक ! तुम मेरी गणित – विद्याकी चतुराई देखो । सामने के वृक्ष में जितने पत्ते और फल दीख रहे हैं , उनकी अपेक्षा भूमिपर गिरे हुए फल और पत्ते एक सौ एक गुने अधिक है । इस वृक्षकी दोनों शाखाओं और टहनियों पर पाँच करोड़ पत्ते हैं और दो हजार पंचानबे फल हैं । तुम्हारी इच्छा हो तो गिन लो । ‘ बाहुक ने रथ खड़ा कर दिया और कहा कि ‘ मैं इस बहेड़े के वृक्षको काटकर इनके फलों और पत्तोंको ठीक – ठीक गिनकर निश्चय करूँगा । ‘ बाहुक ने वैसा ही किया । फल और पत्ते उतने ही हुए , जितने राजाने बतलाये थे । नल आश्चर्यचकित हो गये । बाहुकने कहा – ‘ आपकी विद्या अद्भुत है । आप अपनी विद्या बतला दीजिये । ‘

ऋतुपर्ण ने कहा- ‘ गणित विद्याकी ही तरह मैं पासो की वशीकरण – विद्या में भी ऐसा ही निपुण हूँ । ‘ बाहुकने कहा कि ‘ आप मुझे यह विद्या सिखा दें तो मैं आपको घोड़ों की भी विद्या सिखा दूं । ‘ ऋतुपर्ण को विदर्भ देश पहुँचने की बहुत जल्दी थी और अश्वविद्या सीखने का लोभ भी था , इसलिये उन्होंने राजा नलको पासों की विद्या सिखा दी और कह दिया कि ‘ अश्वविद्या तुम मुझे पीछे सिखा देना । मैंने उसे तुम्हारे पास धरोहर छोड़ दिया । जिस समय राजा नल ने पासोंकी विद्या सीखी , उसी समय कलियुग कर्कोटक नाग के तीखे विषको उगलता हुआ नलके शरीरसे बाहर निकल गया । कलियुग के बाहर निकलने पर नल को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने उसे शाप देना चाहा । कलियुग दोनों हाथ जोड़कर भय से काँपता हुआ कहने लगा – ‘ आप क्रोध शान्त कीजिये , मैं आपको यशस्वी बनाऊँगा । आपने जिस समय दमयन्ती का त्याग किया था , उसी समय उसने मुझे शाप दे दिया था । मैं बड़े दुःखके साथ कर्कोटक नाग के विषसे जलता हुआ आपके शरीर में रहता था । मैं आपकी शरणमें हूँ , मेरी प्रार्थना सुनें और मुझे शाप न दें । जो आपके पवित्र चरित्र का गान करेंगे , उन्हें मेरा भय नहीं होगा । ‘ राजा नलने क्रोध शान्त किया । कलियुग भयभीत होकर बहेड़े के पेड़ में घुस गया । यह संवाद कलियुग और नल के अतिरिक्त और किसी को मालूम नहीं हुआ । वह वृक्ष ढूँठ – सा हो गया । * इस प्रकार कलियुगने राजा नलका पीछा छोड़ दिया , परंतु अभी उनका रूप नहीं बदला था ।

उन्होंने अपने रथ को जोर से हाँका और सायंकाल होते – न – होते वे विदर्भ देश में जा पहुँचे । राजा भीम के पास समाचार भेजा गया । उन्होंने ऋतुपर्ण को अपने यहाँ बुला लिया । ऋतुपर्ण के रथ की झंकार से दिशाएँ गूंज उठीं । कुण्डिननगर में राजा नल के वे घोड़े भी रहते थे , जो उनके बचोंको लेकर आये थे । रथकी घरघराहटसे उन्होंने राजा नलको पहचान लिया और वे पूर्ववत् प्रसन्न हो गये । दमयन्ती को भी वह आवाज वैसी ही जान पड़ी । दमयन्ती कहने लगी कि ‘ इस रथकी घरघराहट मेरे चित्त में उल्लास पैदा करती है , अवश्य ही इसको हाँकने वाले मेरे पतिदेव हैं । यदि आज वे मेरे पास नहीं आयेंगे तो मैं धधकती आगमें कूद पड़ेंगी । मैंने कभी हँसी – खेल में भी उनसे झूठ बात कही हो , उनका कोई अपकार किया हो , प्रतिज्ञा करके तोड़ दी हो , ऐसी याद नहीं आती । वे शक्तिशाली , क्षमावान , वीर , दाता और एकपत्नीव्रती हैं । उनके वियोग से मेरी छाती फट रही है । ‘ दमयन्ती महल की छतपर चढ़कर रथ का आना और उसपर से रथी – सारथि का उतरना देखने लगी ।

नल दमयंती की कहानी।raja nal damyanti ki kahani. नल दमयंती की आगे की कहानी में हम जानेंगे दमयन्ती के द्वारा राजा नल की परीक्षा, पहचान और मिलन।(raja nal damyanti ki katha,nal damyanti ki kahani)

दमयन्ती के द्वारा राजा नल की परीक्षा, पहचान और मिलन(नल दमयंती की कथा)।raja nal damyanti ki katha,
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विदर्भ – नरेश भीम ने अयोध्याधिपति ऋतुपर्ण का खूब स्वागत – सत्कार किया । ऋतुपर्ण को अच्छे स्थान में ठहरा दिया गया । उन्हें कुण्डिनपुर में स्वयंवर का कोई चिह्न नहीं दिखायी पड़ा । भीमको इस बात का बिलकुल पता नहीं था कि राजा ऋतुपर्ण मेरी पुत्री के स्वयंवर का निमन्त्रण पाकर यहाँ आये हैं । उन्होंने कुशल – मङ्गलके बाद पूछा कि ‘ आप यहाँ किस उद्देश्यसे पधारे हैं ? ‘ ऋतुपर्ण ने स्वयंवरकी कोई तैयारी न देखकर निमन्त्रण की बात दबा दी और कहा – ‘ मैं तो केवल आपको प्रणाम करने के लिये ही चला आया हूँ । ‘ भीम सोचने लगे कि ‘ सौ योजन से भी अधिक दूर कोई प्रणाम करनेके लिये नहीं आ सकता । अस्तु , आगे चलकर यह बात खुल ही जायगी । ‘ भीम ने बड़े सत्कार के साथ आग्रह करके ऋतुपर्ण को अपने यहाँ रख लिया । बाहुक भी वार्ष्णेयके साथ अश्वशाला में ठहरकर घोड़ों की सेवामें संलग्न हो गया । दमयन्ती आकुल होकर सोचने लगी कि ‘ रथकी ध्वनि तो मेरे पतिदेव के रथके ही समान जान पड़ती थी , परंतु उनके कहीं दर्शन नहीं हो रहे हैं । हो – न – हो वार्ष्णेयने उनसे रथ – विद्या सीख ली होगी , इसी कारण रथ उनका मालूम पड़ता था । सम्भव है , ऋतुपर्णको भी यह विद्या मालूम हो । उसने अपनी दासी को बुलाकर कहा कि ‘ केशिनी ! तू जा । इस बात का पता लगा कि वह कुरूप पुरुष कौन है । सम्भव है , ये ही हमारे पतिदेव हों । मैंने ब्राह्मणों के द्वारा जो संदेश भेजा था , वही उसे बतलाना और उसका उत्तर सुनकर मुझसे कहना । ‘ केशिनी ने जाकर बाहुक से बातें कीं । बाहुकने राजाके आने का कारण बताया और संक्षेपमें वार्ष्णेय तथा अपनी अश्वविद्या एवं भोजन बनाने की चतुरता का परिचय दिया । केशिनीने पूछा- ‘ बाहुक ! राजा नल कहाँ हैं ? क्या तुम जानते हो ? अथवा तुम्हारा साथी वार्ष्णेय जानता है ? ‘ बाहुक ने कहा – ‘ केशिनी ! वाष्र्णेय राजा नल के बच्चे को यहाँ छोड़कर चला गया था । उसे उनके सम्बन्ध में कुछ भी मालूम नहीं है । इस समय नलका रूप बदल गया है । वे छिपकर रहते हैं । उन्हें या तो स्वयं वे ही पहचान सकते हैं या उनकी पत्नी दमयन्ती । क्योंकि वे अपने गुप्त चिह्नोंको दूसरों के सामने प्रकट करना नहीं चाहते ।

केशिनी ! राजा नल विपत्तिमें पड़ गये थे । इसीसे उन्होंने अपनी पत्नीका त्याग किया । दमयन्ती को अपने पति पर क्रोध नहीं करना चाहिये । जिस समय वे भोजन की चिन्तामें थे , पक्षी उनके वस्त्र लेकर उड़ गये । उनका हृदय पीड़ा से जर्जरित था । यह ठीक है कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ उचित व्यवहार नहीं किया । फिर भी दमयन्ती को उनकी दुरवस्था पर विचार करके क्रोध नहीं करना चाहिये । ‘ यह कहते नलका हृदय खिन्न हो गया । आँखों में आँसू आ गये , वे रोने लगे । केशिनी ने दमयन्तीके पास आकर वहाँ की सब बातचीत और उनका रोना भी बतलाया । अब दमयन्ती की आशंका और भी दृढ़ होने लगी कि यही राजा नल हैं । उसने दासी से कहा कि ‘ केशिनी ! तुम फिर बाहुक के पास जाओ और उसके पास बिना कुछ बोले खड़ी रहो । उसकी चेष्टाओं पर ध्यान दो । वह आग माँगे तो मत देना । जल माँगे तो देर कर देना । उसका एक – एक चरित्र मुझे आकर बताओ । ‘ केशिनी फिर बाहुक के पास गयी और वहाँ उसके देवताओं एवं मनुष्यों के समान बहुत – से चरित्र देखकर लौट आयी और दमयन्ती से कहने लगी ‘ राजकुमारी ! ‘ बाहुकने तो जल , थल और अग्निपर सब तरहसे विजय प्राप्त कर ली है । मैंने आजतक ऐसा पुरुष न कहीं देखा है और न सुना ही है । यदि कहीं नीचा द्वार आ जाता है तो वह झुकता नहीं , उसे देखकर द्वार ही ऊँचा हो जाता है । वह बिना झुके ही चला जाता है । छोटे – से – छोटा छेद भी उसके लिये गुफा बन जाता है । वहाँ जल के लिये जो घड़े रखे थे , वे उसकी दृष्टि पड़ते ही जल से भर गये । उसने फूसका पूला लेकर सूर्य की ओर किया और वह जलने लगा । इसके अतिरिक्त वह अग्निका स्पर्श करके भी जलता नहीं है । पानी उसके इच्छानुसार बहता है । वह जब अपने हाथसे फूलोंको मसलने लगता है , तब वे कुम्हलाते नहीं और प्रफुल्लित तथा सुगन्धित दीखते हैं । इन अद्भुत लक्षणों को देखकर मैं तो भौंचक्की – सी रह गयी और बड़ी शीघ्रतासे तुम्हारे पास चली आयी । ‘

दमयन्ती बाहुक के कर्म और चेष्टाओं को सुनकर निश्चित रूपसे जान गयी कि ये अवश्य ही मेरे पतिदेव हैं । उसने केशिनी के साथ अपने दोनों बच्चों को नलके पास भेज दिया । बाहुक इन्द्रसेना और इन्द्रसेनको पहचानकर उनके पास आ गया और दोनों बालकों को छातीसे लगाकर गोदमें बैठा लिया । बाहुक अपनी संतानों से मिलकर घबरा गया और रोने लगा । उसके मुखपर पिताके समान स्नेहके भाव प्रकट होने लगे । तदनन्तर बाहुकने दोनों बच्चे केशिनी को दे दिये और कहा – ‘ ये बच्चे मेरे दोनों बच्चों के समान ही हैं , इसलिये मैं इन्हें देखकर रो पड़ा । केशिनी ! तुम बार – बार मेरे पास आती हो , लोग न जाने क्या सोचने लगेंगे । इसलिये यहाँ मेरे पास बार – बार आना उत्तम नहीं है । तुम जाओ । ‘ केशिनी ने दमयन्ती के पास आकर वहाँ की सारी बातें कह दीं । अब दमयन्ती ने केशिनी को अपनी माताके पास भेजा और कहलाया कि ‘ माताजी ! मैंने राजा नल समझकर बार – बार बाहुक की परीक्षा करवायी है । अब मुझे केवल उसके रूपके सम्बन्धमें ही संदेह रह गया है । अब मैं स्वयं उसकी परीक्षा करना चाहती हूँ । इसलिये आप बाहुकको मेरे महलमें आनेकी आज्ञा दे दीजिये अथवा उसके पास ही जाने की आज्ञा दे दीजिये । आपकी इच्छा हो तो यह बात पिताजी को बतला दीजिये अथवा मत बतलाइये । ‘ रानीने अपने पति भीमसे अनुमति ली और बाहुकको रनिवास में बुलवाने की आज्ञा दे दी । बाहुक बुला लिया गया । दमयन्ती के देखते ही नलका हृदय एक साथ ही शोक और दुःखसे भर आया । वे आँसुओं से नहा गये । बाहुककी आकुलता देखकर दमयन्ती भी शोकग्रस्त हो गयी । उस समय दमयन्ती गेरुआ वस्त्र पहने हुए थी । केशोंकी जटा बँध गयी शरीर मलिन था ।

दमयन्ती ने कहा – ‘ बाहुक ! पहले एक धर्मज्ञ पुरुष अपनी पत्नी को वन में सोती छोड़कर चला गया था । क्या कहीं तुमने उसे देखा है ? उस समय वह स्त्री थकी – माँदी थी , नींद से अचेत थी ; ऐसी निरपराध स्त्रीको पुण्यश्लोक निषधनरेश के सिवा और कौन पुरुष निर्जन वन में छोड़ सकता है ? मैंने जीवन – भरमें जान – बूझकर उनका कोई भी अपराध नहीं किया है । फिर भी वे मुझे वनमें सोती छोड़कर चले गये । ‘ इतना कहते – कहते दमयन्ती के नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गयी । दमयन्ती के विशाल , साँवले एवं रतनारे नेत्रों से आँसू टपकते देखकर नल से रहा न गया । वे कहने लगे – ‘ प्रिये ! मैंने जान – बूझकर न तो राज्य का नाश किया है और न तो तुम्हें त्यागा है । यह तो कलियुग की करतूत है । मैं जानता हूँ कि जबसे तुम मुझसे बिछुड़ी हो , तबसे रात – दिन मेरा ही स्मरण – चिन्तन करती रहती हो । कलियुग मेरे शरीरमें रहकर तुम्हारे शापके कारण जलता रहता था । मैंने उद्योग और तपस्याके बलसे उसपर विजय पा ली है और अब हमारे दुःखका अन्त आ गया है । कलियुग अब मुझे छोड़कर चला गया , मैं एकमात्र तुम्हारे लिये ही यहाँ आया हूँ । यह तो बतलाओ कि तुम मेरे – जैसे प्रेमी और अनुकूल पतिको छोड़कर जिस प्रकार दूसरे पतिसे विवाह करनेके लिये तैयार हुई हो , क्या कोई दूसरी स्त्री ऐसा कर सकती है ? तुम्हारे स्वयंवरका समाचार सुनकर ही तो राजा ऋतुपर्ण बड़ी शीघ्रताके साथ यहाँ आये हैं । ‘

दमयन्ती ने हाथ जोड़कर कहा – ‘ आर्यपुत्र ! मुझपर दोष लगाना उचित नहीं है । आप जानते हैं कि मैंने अपने सामने प्रकट देवताओं को छोड़कर आपको वरण किया है । मैंने आपको ढूँढ़ने के लिये बहुत – से ब्राह्मणों को भेजा था और वे मेरी कही बात दुहराते हुए चारों ओर घूम रहे थे । पर्णाद नामक ब्राह्मण अयोध्यापुरी में आपके पास भी पहुंचा था । उसने आपको मेरी बातें सुनायी थीं और आपने उनका यथोचित उत्तर भी दिया था । वह समाचार सुनकर मैंने आपको बुलानेके लिये ही यह युक्ति की थी । मैं जानती हूँ कि आपके अतिरिक्त दूसरा कोई मनुष्य नहीं है , जो एक दिनमें घोड़ोंके रथसे सौ योजन पहुँच जाय । मैं आपके चरणोंमें स्पर्श करके शपथपूर्वक सत्य – सत्य कहती हूँ कि मैंने कभी मनसे भी पर पुरुषका चिन्तन नहीं किया है । यदि मैंने कभी मनसे भी पापकर्म किया हो तो निरन्तर भूमिपर विचरनेवाले वायुदेव , भगवान् सूर्य और मनके देवता चन्द्रमा मेरे प्राणोंका नाश कर दें । ये तीनों देवता सकल भूमण्डलमें विचरते हैं । वे सच्ची बात बतला दें और यदि मैं पापिनी होऊँ तो मुझे त्याग दें । ‘ उसी समय वायुने अन्तरिक्षमें स्थित होकर कहा – ‘ राजन् । मैं सत्य कहता हूँ कि दमयन्तीने कोई पाप नहीं किया है । इसने तीन वर्षतक अपने उज्ज्वल शीलवत की रक्षा की है । हमलोग इसके रक्षक रूपमें रहे हैं और इसकी पवित्रताके साक्षी हैं । इसने स्वयंवरकी सूचना तो तुम्हें ढूँढ़ने के लिये ही दी थी । वास्तव में दमयन्ती तुम्हारे योग्य है और तुम दमयन्तीके योग्य हो । कोई शंका न करो और इसे स्वीकार करो । ‘

जिस समय पवन – देवता यह बात कह रहे थे , उस समय आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा होने लगी , देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं । शीतल , मन्द , सुगन्ध वायु चलने लगी । ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर राजा नलने अपना संदेह छोड़ दिया और नागराज कर्कोटक का दिया हुआ वस्त्र ओढ़कर उसका स्मरण किया । उनका शरीर तुरंत पूर्ववत् हो गया । दमयन्ती राजा नलको पहले रूपमें देखकर उनसे लिपट गयी और रोने लगी । राजा नल ने भी प्रेमके साथ दमयन्ती को गलेसे लगाया और दोनों बालकों को छातीसे लिपटाकर उनके साथ प्यार की बात करने लगे । सारी रात दमयन्तीके साथ बातचीत करने में ही बीत गयी । प्रातःकाल होने पर नहा – धो , सुन्दर वस्त्र पहनकर दमयन्ती और राजा नल भीमके पास गये और उनके चरणोंमें प्रणाम किया । भीमने बड़े आनन्दसे उनका सत्कार किया और आश्वासन दिया । बात – ही- बातमें यह समाचार सर्वत्र पहुँच गया । नगरके नर – नारी आनन्दमें भरकर उत्सव मनाने लगे । देवताओंकी पूजा हुई । जब राजा ऋतुपर्ण को यह बात मालूम हुई कि बाहुक के रूपमें तो राजा नल ही थे , यहाँ आकर वे अपनी पत्नी से मिल गये , तब उन्हें बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने नल को अपने पास बुलवाकर क्षमा माँगी । राजा नलने उनके व्यवहारोंकी उत्तमता बताकर प्रशंसा की और उनका सत्कार किया । साथ ही उन्हें अश्वविद्या भी सिखा दी । राजा ऋतुपर्ण किसी दूसरे सारथिको लेकर अपने नगर चले गये । राजा नल एक महीने तक कुण्डिननगर में ही रहे । तदनन्तर अपने ससुर भीमकी आज्ञा लेकर थोड़े – से लोगोंको साथ ले निषधदेशके लिये रवाना हुए । राजा भीमने एक श्वेतवर्णका रथ , सोलह हाथी , पचास घोड़े और छः सौ पैदल राजा नलके साथ भेज दिये ।

अपने नगरमें प्रवेश करके राजा नल पुष्कर से मिले और बोले कि ‘ या तो तुम कपटभरे जुएका खेल फिर मुझसे खेलो या धनुषपर डोरी चढ़ाओ । ‘ पुष्कर ने हँसकर कहा – ‘ अच्छी बात है , तुम्हें दाँवो पर लगाने के लिये फिर धन मिल गया । आओ , अबकी बार तुम्हारे धन तथा दमयन्ती को भी जीत लूँगा । ‘ राजा नल ने कहा – ‘ अरे भाई । जूआ खेल लो , बकते क्या हो ! हार जाओगे तो तुम्हारी क्या दशा होगी , जानते हो ? ‘ जूआ होने लगा , राजा नल ने पहले ही दावमें पुष्करके राज्य , रत्नोंके भण्डार और उसके प्राणोंको भी जीत लिया । उन्होंने पुष्करसे कहा कि ‘ यह सब राज्य मेरा हो गया । अब तुम दमयन्ती की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सकते । तुम दमयन्ती के सेवक हो । अरे मूढ़ ! पहली बार भी तुमने मुझे नहीं जीता था । वह काम कलियुग का था , तुम्हें इस बातका पता नहीं है । मैं कलियुग के दोष को तुम्हारे सिर नहीं मढ़ना चाहता । तुम अपना जीवन सुख से बिताओ , मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ । तुमपर मेरा प्रेम पहले के ही समान है । तुम मेरे भाई हो । मैं कभी तुमपर अपनी आँख टेढ़ी नहीं करूंगा । तुम सौ वर्षतक जीओ । ‘ राजा नल ने इस प्रकार कहकर पुष्कर को धैर्य दिया और उसे अपने हृदय से लगाकर जाने की आज्ञा दी । पुष्कर ने हाथ जोड़कर राजा नल को प्रणाम किया और कहा- ‘ जगत्में आपकी अक्षय कीर्ति हो और आप दस हजार वर्षतक सुख से जीवित रहें । आप मेरे अन्नदाता और प्राणदाता हैं । ‘ पुष्कर बड़े सत्कार और सम्मान के साथ एक महीने तक राजा नल के नगर में ही रहा । तदनन्तर सेना , सेवक और कुटुम्बियों के साथ अपने नगर में चला गया । राजा नल भी पुष्करको पहुँचाकर अपनी राजधानी में लौट आये ।

सभी नागरिक , साधारण प्रजा तथा मन्त्रि मण्डल के लोग राजा नल को पाकर बहुत प्रसन्न हुए । उन्होंने रोमाञ्चित शरीर से हाथ जोड़कर राजा नल से निवेदन किया राजेन्द्र ! आज हमलोग दुःखसे छुटकारा पाकर सुखी हुए हैं । जैसे सब आये हैं । ‘ देवता इन्द्रकी सेवा करते हैं , वैसे ही आपकी सेवा करने के लिये हम घर – घर आनन्द मनाया जाने लगा । चारों ओर शान्ति फैल गयी । बड़े – बड़े उत्सव होने लगे । राजा नल ने सेना भेजकर दमयन्ती को बुलवाया । राजा भीम ने अपनी पुत्री को बहुत – सी वस्तुएँ देकर ससुराल भेज दिया । दमयन्ती अपनी दोनों संतानों को लेकर महलमें आ गयी । राजा नल बड़े आनन्दके साथ समय बिताने लगे । राजा नलकी ख्याति दूर – दूरतक फैल गयी । वे धर्मबुद्धि से प्रजाका पालन करने लगे । उन्होंने बड़े – बड़े यज्ञ करके भगवान्की आराधना की । बृहदश्वजी कहते हैं – युधिष्ठिर ! तुम्हें भी थोड़े ही दिनों में तुम्हारा राज्य और सगे – सम्बन्धी मिल जायेंगे । राजा नल ने जूआ खेलकर बड़ा भारी दुःख मोल ले लिया था । उसे अकेले ही सब दुःख भोगना पड़ा ; परंतु तुम्हारे साथ तो भाई हैं , द्रौपदी है और बड़े – बड़े विद्वान् तथा सदाचारी ब्राह्मण हैं । ऐसी दशा में शोक करने का तो कोई कारण ही नहीं है । संसार की स्थितियाँ सर्वदा एक – सी नहीं रहतीं । यह विचार करके भी उनकी अभिवृद्धि और ह्राससे चिन्ता नहीं करनी चाहिये । नागराज कर्कोटक , दमयन्ती , नल और ऋतुपर्णकी यह कथा कहने – सुनने से कलियुग के पापो का नाश होता है और दुःखी मनुष्योंको धैर्य मिलता है ।

मैं आशा करता हूं कि आप सभी को नल दमयंती की कहानी(नल दमयंती की कथा ) पसंद आई होगी धन्यावाद।

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