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दशामाता व्रत कथा 4

दशामाता व्रत कथा 3

दशामाता व्रत कथा 3 दशामाता व्रत कथा 3 दशामाता व्रत कथा 3 एक सास बहु थी | एक दिन सुबह-सुबह सास ने बहु से कहा की -‘ जाओ आग लाकर भोजन बनाओ | बड़ी भूख लगी है |’ बहु हाथ में कंडी लेकर आग लेने गांव मैं गई | उस दिन गांव भर मैं दशामाता की पूजा थी | इसलिए किसी के यहाँ से भी उसे आग नहीं मिली | वह खाली हाथ लौटकर आयी | सायं होने पर वह पड़ोसन के पास जाकर बोली की -‘ मेरी सास तो दशामाता का डोरा नहीं लेती | परन्तु अब की बार मैं डोरा लेना चाहती हु | मुझे पूजन की विधि भी बता देना |’ दोबारा जब डोरा लेने का समय आया तो बहु ने सास को बिना बताये दशामाता का डोरा ले लिया | नो दिन वह किसी न किसी बहाने पड़ोसन के घर जाकर कथा सुनते रही | दसवे दिन उसे चिंता सताने लगी की अब मैं पूजा कैसे करुँगी | वह मन ही मन दशामाता का ध्यान धरकर सोचने लगी की आज सास कहि बाहर चली जाये तो मैं शांति पूर्वक पूजा कर लू | दशामाता की कृपा से सास बहु से बोली -‘ मैं आज खेतो मैं जा रही हु | यदि मुझे आने मैं देर हो जाये तो तुम मेरे लिए खेत पर खाना ले आना |’ बहु के मन की मुराद पूरी हो गयी | वह तो यही चाहती ही थी | उसने सास से कहा की -‘ आप निश्चिन्...

दशामाता व्रत कथा 1

दशामाता व्रत कथा 1 एक राजा था | उसकी दो रानिया थी | बड़ी रानी के संतान नहीं थी | छोटी रानी के पुत्र था | राजा छोटी रानी और राजकुमार को बहुत प्यार करता था | बड़ी रानी छोटी रानी से ईर्ष्या करने लगी | बड़ी रानी राजकुमार के प्राण हर लेना चाहती थी  | एक दिन राजकुमार खेलता-खेलता बड़ी रानी के चोक में चला गया | बड़ी रानी ने राजकुमार के गले मई एक कला साँप डाल दिया | छोटी रानी दशा माता  का व्रत करती थी राजकुमार दशा माता का ही दिया हुआ था | दशामाता की कृपा से राजकुमार के गले में साँप बिना नुकसान पहुचाये चला गया | दूसरे दिन बड़ी रानी ने लड्डूओ में जहर मिला कर राजकुमार को खाने के लिए दिए | राजकुमार जैसे ही लड्डू खाने लगा तो दशामाता एक दासी का रूप धारण कर आयी और राजकुमार के हाथ से लड्डू छीन लिए | बड़ी रानी का यह वार भी खाली गया | रानी को बड़ी चिंता हुई की किसी भी तरह से राजकुमार को मारना हे | तीसरे दिन जब राजकुमार फिर बड़ी रानी के आँगन में खेलने गया तो रानी ने उसे पकड़ कर गहरे कुवे     में धकेल दिया | चूंकि कुवा बड़ी रानी के आँगन में बना था इसलिए किसी को भी पता नहीं चला की राजकुमार...

दशामाता व्रत कथा 2

दशामाता व्रत कथा 2 एक घर में सास-बहु रहती थी | बहु का पति परदेश में गया था | एक दिन सास ने बहु से गांव में से आग ला कर भोजन पकाने को कहा | बहु गांव में आग लाने गयी पर किसी ने भी उसे आग नहीं दी और सभी ने  कहा की -‘ जब तक दशामाता की पूजा नहीं हो जाती तब तक आग नहीं मिलेगी | ‘ बेचारी बहु खाली हाथ घर लोट आई | उसने सास को बताया की – ‘ गांव भर में आज दशामाता की पूजा है इसलिए कोई आग नहीं दे रहा है |’ शाम हो जाने पर सास आग लेने गांव में गयी तो स्त्रियो ने उसे आराम से बैठाया और कहा की -‘ सुबह तुम्हारी बहु आग लेने आई थी | परंतु हमारे यहा पूजा नहीं हुई थी इसलिए आग नही दे सकी |’ सास आग लेकर अपने घर पहुची ही थी की एक आदमी बछड़ा लिए आया और उसके पीछे एक गाय थी | स्त्री ने उससे पूछा की – ‘ यह गाय का पहला बच्चा है क्या ?’ आदमी ने उत्तर दिया -‘ हां |’ उसने फिर पूछा की -‘ बछड़ा है या बछिया ?’ उसने जवाब दिया की-‘बछड़ा है |’ सास ने घर जाकर बहु से कहा -‘ आओ ! हम दोनों भी दशामाता का डोरा ले और व्रत करे |’ दोनों सास-बहु ने डोरा लिया | सवेरे से व्रत आरम्भ किया | नो व्रत पुरे हो जाने पर दसवे दिन डोरे की पूजा की...
दशा माता की कथा कहानी Dasha Mata Katha kahani in Hindi दशा माता की कथा (Dasha mata ki kahani ) :  चैत्र मास (march-april) के कृष्ण पक्ष की दशमी को दशा माता की पूजा अर्चना करने का और दशा माता की कथा कहानी सुनने का अवसर मिलता है। लेकिन यदि कोई स्त्री चाहे तो अन्य दो दशाओं में दशा माता की पूजा कर सकती हैं। जब किसी नवजात शिशु के जन्म की खबर सुने या किसी गाय के बछड़े के जन्म की शुभ खबर सुनकर वो दशा माता की पूजा करना शुरू कर सकते है।  हमारे हिन्दू धर्म में होली के दूसरे दिन से दशा माता की पूजा अर्चना और कथा आदि करने का बहुत ही प्राचीन काल से एक प्रथा चली आ रही हैं। जिसमें हिंदू संप्रदाय के व्यक्ति व महिलाएं लगातार 10 दिन तक कथा कहानी करते और सुनते हैं। इन इन कथाओं में दशा माता की महिमा और उनकी कृपा के बारे में लोगों को सुनाया जाता है। दशा माता की कथा अथवा दशा माता की कहानी  कोई भी सुहागन स्त्री अथवा विधवा स्त्री प्रारम्भ कर सकती है। जो भी स्त्री दशा माता की पूजा प्रारंभ करने की सोच रही हैं तो उन्हें बता दूं इसके कुछ नियम होते हैं जिन्हें आपको ध्यान में रखते हुए अपनी पूजा प्रारं...
कथा इस प्रकार है:- राजा नल उज्जैन में राज्य करता था। वह छत्रपति राजा था। श्रनेक राने राव सिर नवाकर उसकी आज्ञा का पालन करते थे। उसका तेज सूर्य के समान था। सत्य और शांति उसमें विराजमान रहती थी। राजकाज करते समय सत्य और धर्म का पूरा विचार रखता था । धर्म की रक्षा तो प्राणपण से करता था। वह बड़ा वुद्धिमान, पंडित, धर्मात्मा, सर्वगुण संपन्न, खड्गशूर और तेज एवं दया का सरोवर था। वह रूप में भी अप्रतिम था । संसार में कोई उसके रूप की होड़ करने वाला नहीं था। उसके स्वभाव और वाणी से प्रेम छलकता था। सदैव प्रेम मार्ग का अनुसरण करता था । किसी को प्रेम में दुखी देख स्वयं भी बड़ा दुखी होता था। लोग उसके प्रेमपूर्ण मधुर व्यवहार से मुग्ध हो जाते थे । राप रंग की घोर वह अधिक रुचि रखता था। रात दिन गुणियों की चरचा करता था । एक गुणी जाता तो दूसरा आता था। उसकी सभा विद्वानों, कवियों, संगीतज्ञों, वाग्मियों और अन्य अनेक गुणियों से भरी रहती थी। उससे सदा अक्षर और अर्थ पर विचार विमर्श चला करता था। एक दिन राजा जब सभा में बैठा हुआा था और गुणी लोग अपने-अपने गुणों का प्रदर्शन कर रहे थे तो अकस्मात् प्रेम की चर्चा चल निकली जिसक...

नल और दमयंती भाग 03

लावण्यवती राजकुमारी दमयंती उस दिन राजोपवन में अपनी सखियों के साथ हास-परिहास कर रही थीं। वसंत की मंद समीर बह रही थी, आम्र-मंजरियों की सुगंध वातावरण में घुली थी और पुष्पों से सुसज्जित वाटिका मानो स्वर्ग का अंश प्रतीत होती थी। किंतु सहेलियों के बीच हँसी-ठिठोली करते-करते दमयंती के मन में एक अनाम व्याकुलता उठी। उन्होंने कृतक रोष प्रकट करते हुए सब सखियों को वहाँ से विदा कर दिया और स्वयं अकेली ही उपवन में विचरण करने लगीं। धीरे-धीरे चलते हुए वे पुष्करणी के तट पर जा बैठीं। शांत जल में आकाश का प्रतिबिंब झिलमिला रहा था। तभी आकाश से एक दिव्य हंसों का जोड़ा उतरकर जल पर आ विराजा। उन हंसों की कांति स्वर्ण के समान दीप्तिमान थी। अचानक उनमें से एक हंस ने मनुष्य-वाणी में कहा— “राजकुमारी दमयंती! नैषध देश के राजकुमार नल तुम्हारे ध्यान में निमग्न होकर प्रेमातुर हो उठे हैं। उन्होंने तुम्हें कभी देखा नहीं, परंतु मन की व्याकुलता से तुम्हारा चित्र अत्यंत सजीव रूप में अंकित किया है। वे रात्रि-दिन उसी चित्र को निहारते रहते हैं।” दमयंती आश्चर्यचकित रह गईं। उन्होंने कौतूहल से पूछा, “हे पक्षीराज! यह नल कौन हैं? ...