कथा इस प्रकार है:-

राजा नल उज्जैन में राज्य करता था। वह छत्रपति राजा था। श्रनेक राने राव सिर नवाकर उसकी आज्ञा का पालन करते थे। उसका तेज सूर्य के समान था। सत्य और शांति उसमें विराजमान रहती थी। राजकाज करते समय सत्य और धर्म का पूरा विचार रखता था । धर्म की रक्षा तो प्राणपण से करता था। वह बड़ा वुद्धिमान, पंडित, धर्मात्मा, सर्वगुण संपन्न, खड्गशूर और तेज एवं दया का सरोवर था। वह रूप में भी अप्रतिम था । संसार में कोई उसके रूप की होड़ करने वाला नहीं था। उसके स्वभाव और वाणी से प्रेम छलकता था। सदैव प्रेम मार्ग का अनुसरण करता था । किसी को प्रेम में दुखी देख स्वयं भी बड़ा दुखी होता था। लोग उसके प्रेमपूर्ण मधुर व्यवहार से मुग्ध हो जाते थे । राप रंग की घोर वह अधिक रुचि रखता था। रात दिन गुणियों की चरचा करता था । एक गुणी जाता तो दूसरा आता था। उसकी सभा विद्वानों, कवियों, संगीतज्ञों, वाग्मियों और अन्य अनेक गुणियों से भरी रहती थी। उससे सदा अक्षर और अर्थ पर विचार विमर्श चला करता था। एक दिन राजा जब सभा में बैठा हुआा था और गुणी लोग अपने-अपने गुणों का प्रदर्शन कर रहे थे तो अकस्मात् प्रेम की चर्चा चल निकली जिसके फलस्वरूप रूप पर विवाद छिड़ पड़ा। प्रश्न हुआ, 'सोलह कला पूर्ण उज्ज्वल रूप किस स्त्री में होता है और वह कहाँ पाई जाती है?' सबने एक स्वर से उत्तर दिया कि ऐसा रूप पद्मिनी स्त्रियों में ही संभव है और पद्मिनी स्त्रियाँ सिंघल द्वीप में होती है। वैसे राजा और रंक में कोई भेद नहीं इसलिये घर-घर की स्त्रियों को भी पद्मिनी सदृश ही समझना

नल-दमन

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चाहिए; उनका रूप भी ग्रनुपम है। सभा में एक भाटिन भी कहीं से आकर बैठी थी। वह गायन में निपुण (चतुर) और अपूर्व थो। वह भी उठकर विनयपूर्वक बोली, "महाराज ! यह सत्य है कि सिंघल द्वीप में ही पद्मिनी स्त्रियाँ होती है। परंतु भगवान् की लीला प्रपरंपार है; वह चाहे तो ताल तलैया में भी मोती उत्पन्न कर सकता है। जंबूद्वीप में भी पद्मिनी स्त्री विद्यमान है। यह वात में सुनी हुई नहीं, देखी हुई कहती हूँ । पहले मैने भी सुना ही था और उस पर विश्वात नहीं किया था। परंतु जब आँखों से देखा तब विश्वास हुग्रा। दक्षिण दिशा में वह कन्या के रूप में है। संयोग से उसके योग्य अभीतक कोई वर नहीं मिला। वहाँ कुंडनपुर नाम का अनुपम नगर है। में समस्त जंबूद्वीप में फिर चुकी हूँ और उसके देश देश और नगर नगर से अच्छी तरह परिचित हूँ; परन्तु उस जैसा नगर मेने कहीं नहीं पाया । वैकुंठ के विषय में जैसा सुना जाता है, वह नगर सचमुच वैसा ही रमणीक है। वहाँ के राजा का नाम भीमसेन है। वह छत्रपति राजा है और उसके समान उस मंडल में वीर कोई राजा नहीं। उसी राजा की पुत्री पद्मिनी है। 

एक सिद्ध पुरुप के वरदान से उसका जन्म हुया । उसमें एक विशेष वात यह है कि पद्मिनी से वह एक कला बढ़कर है। उसकी हाथ की उंगलियों में अमृत है। उन्हें धोकर मृतक के मुख में देने से वह तत्काल जी उठता है। विधाता ने मानो उसे ही अमृत में सान कर बनाया हो और फिर उसके समान दूसरी स्त्री न वना सका हो । उसकी मुख की ज्योति के विषय में तो कुछ कहते ही नहीं बनता। शरद पूर्णिमा की चंद्रकांति से भी कहीं उच्च ज्योतिपुंज के समान वह ज्योति है। महाराज सचमुच वह पद्मिनी आश्चर्यजनक है; वैसी अभी कहीं मेरे सुनने में नहीं आई है। 

उसकी सुवास तीनों लोकों में भर गई है और सारा संसार भौरा बनकर उसकी आशा से मंडरा रहा है। उसकी शोभा ने सबको लुभा लिया है। न जाने, वह किस भाग्यशाली के हाथ लगती है।" 

यह सुनते ही राजा की उत्कंठा वढ़ी और उसने भाटिन से कुंडनपुर नगर, भीमसेन राजा और राजपुत्री के जन्म आदि का विस्तार पूर्वक वर्णन करने के लिये कहा। भाटिन ने तदनुमार पहले नगर के वृक्ष, फुलवारी, पक्षी, ताल, सरोवर, कुत्रा, वावड़ी, मन्दिर, भवन, अट्टालिका, स्त्री, पुरुप, नगर से दूर वेश्या, हाट, बाजार, चौक, व्यापार, व्यवसाय, ठग, पाखंडी, वेदपाठी ब्राह्मण, ज्योतिषी, स्वाँग-नृत्य, नाद, वैद्य, जड़ी-बूटी, साँप, सपेरा, चित्रकार, जन्त्र-मन्त्र, चेटक और विविध जातियों का विस्तृत वर्णन किया। तत्पश्चात् राज दुर्ग, हाथी, घोड़े, राजद्वार, राजसभा और राजा भीमसेन तथा उनकी पटरानी राजमती का उल्लेख करते हुए अन्त में राजपुत्री का सविस्तार मनोमुग्धकारी वर्णन कर राजा को सुनाया। 

राजपुत्री के जन्म के विषय में बताया कि 'राजा भीमसेन के कोई संतान नहीं थी जिसके लिये वे सदैव चिंतित रहत थे। एक दिन दमन ऋषि उनके राज्य में आकर तपस्या करने लगे। राजा ने सुना तो उनके दर्शन के निमित्त गए। ऋषि ने प्रसन्न होकर रानी को खिलाने के लिये राजा को चार पके फल दिए और कहा कि उनके प्रभाव से उनकी इच्छा की पूति होगी। निदान समय आने पर उनकी रानी, राजमती के गर्भ से चार संतानें-- क्रमशः तीन पुत्र और एक पुत्री उत्पन्न हुए । वे सब बड़े भाग्य-शाली, बुद्धिमान, साधु, सुशील ग्रोर धर्मज्ञ है। पुत्री स्त्रियों में श्रेष्ठ पद्मिनी के समान है और उसका नाम दमंती (दमयन्ती) है। राजा यह सुनते ही प्रेम के वश में होगया। 

वह उदास रहने लगा। न दिन को राजकाज में मन लगा और न रात को नींद आती । रागरंग से भी चित्त उजड़ गया। उसे कही भी कल नहीं पड़ती। वह हर समय व्याकुन रहने लगा। अपने मन का भेद भी किसी को नहीं बताना। भूख, प्यास दोनों जाती रही। वह प्रेस विर में पुराने लगा। देह दिन प्रतिदिन होने की जिनमे यह पोन्या पड़ गया । भाई-चन्नु उनकी यह वक्षा ६ बहुत दुहुने रोग पूदने नगे परन्तु यह कुछ नहीं बताता। इसने राब। फिर भी उपचार प्रारम्भया और पाप शांति के निमित्त पुरान पढे जानेोभा भी बनाए गए। उनरो अपनी-अपनी राम के अनुसार रोग प‌ानाव्याशांन करने के निमित्त उपचार करने के लिये का गाने पे होने परीक्षा के लिये गया । उसने राजा की नाही देखी नो उनमे रोग का निदान हो गया। दूसरी बार नादी पकड़ने बढ़ा तो राजा हो गया। उनमे रदिया रि यह प्रेग का रोगी है, अन्य रोग उने सुछ नहीं। पंच औट गया और उसने को राजा पा पदार्थ रोग बना दिया तथा उस गम्बन्ध में शीघ्र में शीघ्र उपायानेनिय कहा। यह जानकार नान्य प्रधान, प्रहतमेन तुरन्न राजा के पारा ग्राया त्रोर राजा को पैर्य बंधाते हुए उनके प्रेम के विषय में पूछा। 

राजा ने भी प्रपने प्रेममय दिया शोर कहा कि यदि शीघ्र ही प्रिय मिलन न हुया तो उसका जीवित रहना प्रत्यन्त कठिन हो जाएगा। मंत्रो ने विनय की, 'महाराज ! वियोग दुःप में पारण करना प्रथम गातंय्ण है। प्रेम में स्वयं भगवान् सहायत होते हैं। सच्चा प्रेम एक ही योर नहीं रह‌ता परन् यहाँ भी पहुँचता है, जिसमे प्रेस होता है। जब प्रेम पन्तिम अवस्था तक पहुँच जाता है तो इसमें सन्देह नहीं कि वह परीक्षा की पड़ी होती है। ऐसा फौन है, जो प्रेमी को दुःसमें देग उसकी युधि न ले।' इस प्रकार मन्त्री ने राजा को र्धर्ष वेंचाने का प्रयत्न किया; परन्तु राजा को शांति नहीं हुई। उसे वियोग दुगुने वेग से नताने लगा। धैर्य की बातें उसे पीड़ा देने लगीं । अन्त में उसका प्रेम प्रलाप और उन्माद को प्रवरथा तक पहुँच गया । कुटुम्योजन, इष्ट मित्र और सगे सम्बन्धी सब ग्राए और समझाने लगे। उन्होंने उनके प्रिय को इच्छा जानने के विषय मे प्रयत्न करने का भी वचन दिया, पर राजा पर उनके समझाने का कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ा। सब हार मान कर चुप हो गए। उल्टे हो राजा प्रलाप की दशा में उन्हें समझाने लगा ।

इधर राजा नल को यह दक्षा हुई और उधर उसकी वियोगाग्नि की लपट दमयंती तक जा पहुंची। वह भी रात्रि को तड़फ तड़फ उठने लगी। उसके हृदय फो नल दुःख देने लगा जिससे उसकी निद्रा जाती रही और उसे चिंता ने श्रा घेरा । रातें उससे काटे न फटतीं। तारे गिनते गिनते प्रातः होने लगा। एक रात उसने नल का चित्र बना डाला, जिसे सखियों के सो जाने पर एक टक देखती और प्रेमाश्रु बहाती । रात दिन प्रिय के ध्यान में मग्न रहती। उसको भूख प्यास जाती रही। रक्त कमल जैसा उसका मुख पीला पड़ गया। वह अत्यंत दुर्बल हो गई और उठने बैठने में ही उसे पसीना छूटने लगा। सखियों को अभी तक उसका यह भेद विदित नहीं हुआ । वह प्ररुट में उनसे हँसने खेलने की बातें करती, परन्तु मन ही मन रोती रहती । अंत में एक दिन दमयंती की धाय उसके पास याई और उसने उसको अनुपात करते देख लिया । वह बहुत चकित हुई। उसने एकांत में दमयंती से दुर्बल होने ग्रीर रोने का कारण पूछा; परंतु दमयंती ने इधर उधर की बातें मिलाकर धाय को बिदा किया । बाय चतुर और अनुभवी थी। उसने दमयंती की व्या का वर्णन रानी से जाकर कर दिया । 

रानी यह सुनकर बहुत उद्विग्न हुई। वह तुरंत दमयंती के पास जाई और उससे दुर्वल होने का कारण पूछा। साथ ही साथ यह भी पूछा कि कहीं वह स्वप्न में टरी तो नहीं । दमयंती ने माता को उत्तर दिया कि उसे न तो फोई कष्ट ही हुआा और न उसे किसी रोग का ही पता चलता है। स्वप्न में उरने की भी कोई बात नहीं, क्योंकि वह ग्रात्मा पर विश्वाम करती है और हर समय ग्रात्माराम में लीन रहती है। फिर भी, संदेह निवारणार्थ उपचार किया जा सकता है। रानी ने तत्काल वैद्य, ओझा और तंत्र मंत्र के जानकार बुलाए । सबने अपना अपना उपचार किया, पर कोई लाभ नहीं हुम्रा । दमयंती दिन प्रति दिन वियोग में घुलने लगी। परंतु उसकी सखियाँ प्रव सावधानी से उसकी देख रेख करने लगीं यऔर फलस्वरूप एक रात उनमें से एक ने उमे नल का चित्र लिये रोती देख लिया। बात उघड़ गई। दनयंत्री ने भी उससे अपना गुप्त भेद प्रकट कर दिया। उस सखी ने दमयंती की व्यनीय दशा देख रानी को सूचित किया । रानी पहले तो अत्यंत लज्जित ग्रौर क्षुब्ध हुई; परंतु फिर वैर्य धारण कर दमयंती के पास गई । उसने दमयंती को बड़े प्रेम से समझाते हुए कहा, 'पुत्री ! तुम्हारे पिता छत्र-पति राजा है। चारों ग्रोर उनका नाम है। यदि तुम्हारे प्रेम की बात कहीं बाहर फैल गई तो वह अपयन का कारण होगा। उससे अपनी प्रतिष्ठा घटेगी और जग व्यवहार विगड़ेगा। 

भले ही तुम्हारा प्रेम राजा नल से हो गया है, फिर भी तुम्हें धैर्य धारण करना चाहिए। समय आने पर सब ठीक हो जाएगा। में राजा से कहकर तुम्हारा स्वयंवर रचाऊँगी। उसमें राजा नल भी आाएँगे जिसे तुम इच्छानुसार पति के रूप में वरण कर सकोगी । इस प्रकार तुम्हें मनोनुकूल पति मिल जाएगा श्रीर कोई बुरा भी न मानेगा, । परंतु दमयंती को धैर्य नहीं बँधा। उसने माता से अपनी प्रशांत स्थिति का पूरा वर्णन कर दिया । दमयंती का उत्तर पाकर रानी बहुत चितित हुई। वह सीधे राजा के पास गई और उन्हें दमयंती का सारा समाचार सुनाया तथा शीघ्र से शीघ्र उसका रवयंवर करने का परामर्श दिया। राजा ने स्वजन, इष्ट मित्र, सगे संबंधी योर मंत्रियों की संमति लेकर दमयंती के स्वयंवर की तैयारी करने की श्राजा दे दी। देश देश के राजाओं के पास स्वयंवर में श्राने का निमंत्रण भेजा गया। राजा नल को जय निमंत्रण मिला तो वे प्रसन्न चित्त हो बड़े सजधज के साथ कुंडनपुर की ओर चले। परंतु श्राधे मार्ग से ही उनके मन में नये तर्क वितर्क उठने लगे। उन्हें अब इस ग्राशंका ने घेरा कि वांस्तव में दमयंती उन्हें पति के रूप में वरण करेगी या नहीं। इससे उनका चित्त फिर अशांत होने लगा और वे इसी श्रशांत स्थिति में कुंडनपुर पहुँचे। कुंटनपुर की शोभा देखकर उहें भाटिन का कथन सत्य प्रतीत हुआ। उन्होंने स्वच्छ श्रीर श्रगाध जलपूर्ण सरोवर किनारे डेरा डाला। दमयंती ने जब नल के ग्रागमन का समाचार सुना तो बहुत सप्त हुई । उसका मुरझाया हुया मुख कमल के समान खिल उठा श्रीर वह राजमहल छत पर चढ़कर नल के डेरे की शोर देखने लगी। दूर से नल को देखकर अपने मन में 'बह सेरा प्रियतम है' ऐसा कहने लगी। उनके हृदय में नल के पास उड़कर जाने की प्रवल इच्छा हुई। वह जरुरी की तरह फिरने लगी और बिजली के समान तड़फकर गिरने की अभिलापा करने लगी ।

इसी समय देर्वाध नारद पृथ्ची के कौतुकों को देखते हुए कैलास की ओर जा रहे थे। मार्ग में इंद्र मिल गए। इंद्र के पूछने पर नारद ने भूमंटल का समाचार कह सुनाया और दमयंती के रूप तोंदर्य और उसके स्वयंवर का भी वर्णन किया। उन्होंने इंद्र को वताया कि स्वर्ग के रामस्त देवता स्वयंवर देखने के लिये कुंडनपुर गए हुए है। इंद्र ने देखा कि सचनुच स्वर्ग में एक भी देवता नहीं दिखाई देता तो यम, कुबेर और वरुण को लेकर वे भी कुंडनपुर के लिये चल पड़े। संध्या समय चारों देवता राजा नल के डेरे की ग्रोर निकले । राजा नल ने अभिवादन कर उनका सत्कार किया। देवता वहां बैठकर सुसताने लगे । थोड़ी देर पश्चात् इंद्र ने राजा नल से दमयंती के पास जाकर उसे संदेसा देने के लिये कहा कि "वह देवतायों में से किसी को अपना पति चुने। राजा नल ने संदेसा सुना तो भौचयक रह गए। उनकी इच्छाओं पर मानों तुषार पात हुश्रा। उन्होंने हाथ जोड़-कर बिनय की कि "वह भी मन में दमयंती को मिलन-आशा घरे हुए है और यदि वह संदेसा लेकर जाएगा तो उसे पहले ही निराश होना पड़ेगा। फिर दमयंती के दर्शन को अपनी अभिलाषा पूरी होते जान वे संदेसा लेजाने के लिये तैयार हुए केवल मार्ग की कठिनाई बाधक यताई। इंद्र ने उन्हें एक मंत्र देकर कहा, "यदि तुम चाहो तो श्रव इस मंत्र की सहायता से दमयंती के पास निविध्नता पूर्वक जा सकते हो" । राजा नल संदेसा लेकर चल पड़े और मंत्र की सहायता से राजप्रासाद में प्रवेशकर दमयंती के पास जा पहुँचे । उन्हें देखते ही दमयंती और उसकी सखियाँ बहुत लज्जित हुई । परंतु दमयंती ने शीघ्र ही अपने को संभाला। वह श्रपरिचित पुरुप को देखकर विचारने लगी कि यह कौन है और कठिन पहरे के रहते यहाँ क्यों और कैसे चला आया। क्या यह मनुष्य है या सूर्य तेज वाला कोई देवता। उसने फिर राजा नल की ओर एकटक होकर देखा तो उन्हें पहचान लिया। वह दौड़ पड़ी और वेसुध होकर उनके पैरों पर गिर पड़ी। राजा नल ने सिर पकड़कर दमयंती को उठाया। इस प्रथम मिलन में दोनों को अपार आनंद हुआ । हर्ष के आँसू निकल पड़े और उनका वियोग-दुःख जाता रहा। पश्चात् राजा नल ने दमयंती को इंद्र का संदेसा सुनाया। दमयंती संदेसा सुनकर आगबबूला हो गई। उसने इंद्र को बड़ी भर्त्सना की। साथ ही साथ राजा नल पर विगड़कर बोलो, 'हे प्राणनाथ! में तुम्हारे प्रेम के लिये सारे संसार से उदासीन बनी हूँ। तुम्हें तन, मन, धन अर्पण कर चुकी हूँ। परंतु तुम लोगों का संदेसा लेकर मेरे पास आए हो। में केवल तुमको छोड़ अन्य किसी को पति नहीं बना सकती। यदि तुम्हें इंद्र का संकोच हो तो में कल स्वयंवर में तुम्हे स्वय ढूंढ लूंगी। उस अवसर पर इंद्र और अन्य राजाओं के सामने तुम्हें वरमाला पहना-ऊँगी। इसमे तुम्हें कोई दोषी नहीं कहेगा और श्रवला होने के कारण इंद्र मुझे भी शाप नहीं देगा।" नल को इससे बड़ी प्रसन्नता हुई और उसका रहा सहा संदेह जाता रहा । वह डेरे पर आया और इद्र से दमयंती का सब समाचार ज्यों का त्यों वर्णन कर दिया । इंद्र ने कुछ नहीं कहा और वह चुपचाप वहाँ से चल दिया। दूसरे दिन स्वयंवर जुड़ा ।

इंद्र वरुण श्रादि चारों देवतात्रों न, यह जानकर कि दमयंती नल पर आसक्त है और उसी को जयमाला पहनाएगी तो सभा में नल के पास उसी का रूप घागा कर बैठ दमयंती जब नल को वरमाला पहनाने गई तो उसे कई नल बैठे f. 30/254 द्विविधा में पड़ी और सोचने लगी कि किस प्रकार राजा नल की पहचान करे। उस भी चिता हुई कि यदि सभा को उसकी द्विविधा का पता चल गया तो वह उठ जाएगी और उसको नल का मिलना फिर दुर्लभ हो जाएगा। वह बहुत व्याकुल हुई। जब कोई उपाय नहीं सूझा तो भगवान् के शरण में गई। उसने तन्मय होकर भगवान् की स्तुति की जिसके फल स्वरूप श्राकाश वाणी हुई कि 'धैर्य पूर्वक तीन तरह से परीक्षा लेने पर नल की पहचान होजाएगी। जो नल का रूप बरे हुए है, उनके एक तो परछाई नहीं पड़ती, दूसरे आँखों की पलकें नहीं लगतीं और तीसरे उनके पाँव घरती से ऊपर श्रघर में रहते है।' दमयंती ने देखा कि कंवल एक पुरुप ऐसा है जिसमें श्राकाशवाणी के अनुसार लक्षण नहीं घटते । उसने नल को पहचान लिया और उसे वरमाला पहना दी। इस प्रकार दोनों की मनोकामनाएँ पूर्ण हुई और उनके ग्रानंद का ठिकाना न रहा। इंद्रादिक चारों देवताओं को पहले तो बड़ा चाश्चर्य हुआ कि दमयंती ने नल को कैसे पहचाना, पर फिर नल दमयंती के मिलन हो जाने से बड़े प्रसन्न हुए। वे राजा नल के पास गए और मधुर वचनों से उन्हें संतुष्ट किया तथा वरदान दिया। इंद्र ने शालिहोत्र विद्या प्रदान की, यम ने सौ वर्ष की श्रायु वी और कहा कि श्रग्नि सदा श्राज्ञाकारी बनकर रहेगी। वरुण ने इच्छा करते ही जल प्रस्तुत हो जाने का वर दिया। इस प्रकार वरदान देकर देवता विदा हुए। तत्पश्चात् नल दमयंती का विवाह हुआ। राजा नन कुछ दिन कुंटनपुर में रह फिर दमयंती को लेकर उज्जैन चले श्राए और उसके साथ सुख पूर्वक रहने लगे।

इंद्रादि देवता जब अपने-अपने रथानों को जा रहे थे तो उन्हें मार्ग में द्वापर के साथ कलियुग मिला। बातचीत होने पर कलियुग को पता चला कि दमयंती ने नल को जयमाला देकर अपना पति चुन लिया। वह भी उसे पाने की इच्छा से स्वयंवर में जा रहा था इसलिये उसे बड़ा क्रोध आया और तत्काल नन्न को शाप देना चाहा । इंद्र ने कलियुग को फटकारा और चेतावनी दी कि वंसा करने से उसे महापाप लगेगा जिसके फलरवरूप उसे नरक भोगना पड़ेगा। यह कह ये देवतायों सहित चले गए। कलियुग ने नल को शाप तो नहीं दिया, पर द्वापर के सामने प्रतिज्ञा की कि वह नल से बैर ठानेगा और उसे घोर कष्ट देगा। उसे वह धन, धर्म, धाम और राजपाट से रहित करेगा तथा वन वन घुमा अंत में दमयंती से उसको अलग कर देगा। वह तीर की तरह नल के पास गया और उसे धर्म अष्ट करने की घात में रहने लगा। बारह वर्ष बाद उसे नल को धर्म भ्रष्ट करने का अवसर मिला। एक दिन संध्या काल में संध्या कर्म से निवृत्त होते ही नल को नींद श्रागई और वह बिना पाँव घोए सो गया । कलियुग ने इतने में ही उसके शरीर में प्रवेश कर उसकी मति को फेर दिया । पश्चात् वह नल के भाई पुष्कर के पास गया और उसे नल के साथ जुवा खेलने के लिये उकसाया। उसन पुष्कर को श्रपनी सहायता का वचन दिया। फलतः नल श्रीर पुष्कर का जुवा हुश्रा । नल दाँव पर दाँव हारने लगा। दमयंती ने नल को जुम्रा खेलने के लिये बहुत जित किया, पर यह नहीं माना। उनके दो बालक (पुत्र और पुत्री) थे । दमयंती ने जुए का रंग देख उन वालकों को नैहर भेज दिया। अंत में जुवा समाप्त हुआ और नल धन-संपत्ति सहित राजपाट हार गया। पुष्कर ने राज पाजाने पर नल दमयंती को राज्य से बाहर कर दिया और उन्हें ग्राश्रय न देने के लिये राज्य भर में घोषणा कर दी। नल दमयंती वन वन घूमने लगे। पुष्कर के उर से किसी ने भी उन्हें आश्रय नहीं दिया। उन्हें भूख प्यात सताने लगी। वन में दावाग्नि लगी रहने के कारण खाद्य कण भी दुष्प्राप्य था। तीन दिन पश्चात् एक स्थान पर सोने का पक्षी दिखाई दिया जिसे पकड़ने के लिये नल ने घोती फेंकी। परंतु वह पक्षी कलियुग था, घोतो लेकर उड़ गया । ग्राकाश रो उसने अपनी करतूत का वर्णन किया। नल धोती के चले जाने से वहुत दुखी हुया। उसे नई ग्रापदा ने घेरा। दमयंती के कष्ट ने तो उसे बहुत विचलित किया । उसने दमयंती को नहर जाने के लिये समझाया; परंतु दमयंती ने उसे विपत्ति में छोड़कर जाना रवीकार नहीं किया। फलतः दोनों भूल प्यास सहते हुए फिरने लगे । मार्ग में कहीं फल फूल और सागपात मिल जाने पर थोड़ी बहुत क्षुवा शांत कर लेते। इस प्रकार घूमते फिरते एक नदी के तट पहुँचे। वहां भरपेट पानो पीकर प्यास नांत की और थोड़ी देर विश्राम किया। जब उठे तो भोजन के रूप में अनायास दो मछलियाँ पड़ी मिल गई। नल ने उन मछलियों को उठा लिया श्रीर उन्हें दमयंती को देकर स्वयं नहाने चला गया। दमयंतो ने मछ‌लियों को छीलना श्रारंभकिया तो उसकी उँगलियों के प्रमृत ने मछलियों जोदित हो गई और हाथ से फिसल कर नदी में चली गई। दसयंतो ठगी सी रह गई। नहाकर वापस प्राने पर मछ‌लियों को न देख नल ने समझा कि शायद क्षुधा से पीड़ित होकर दमयंती ने उन्हें ता लिया । अतः उसे संतोप हुआ और उसकी भूख भी जाती रही। परंतु जब वास्तविक बात विदित हुई तो भाग्य को कोसने लगा। वे फिर भूखे पेट आगे बढ़े। रात्रि को एक गाँव में जाकर टिके । दमयंती के नो जाने पर नल जागता रहा। उसे महान् चिता सताने लगी । दमयंती के कष्टों ने उसे बहुत विकल किया। विपत्तियों से शोघ्र छुटकारा पाने की भी कोई ग्राशा नहीं दिखाई दी। उसके सामने दमयंती का कष्ट विकट समस्या के रूप में उपस्थित हुआ। वह चाहता था कि दमयंती कुछ दिन नैहर जाकर रहे, पर बहुत सगझाने बुझाने पर भी दमयंती ने जाना अस्वीकार किया । उसे यह भी आगा नहीं रही कि साथ रहते दमयंती कभी उसे छोड़ेगी। अतएव बहुत सोचने विचारने के पश्चात् उसने दमयंती को वहीं सोतो छोड़कर चले जाने का निश्चय किया जिसके पश्चात् दमयती उसे न पाकर स्त्रतः पितृगृह चली जाएगी और उसका वन वन भटकने का कष्ट मिट जाएगा। इस निश्चयानुसार वह धीरे से उठा और दमयंती को छोड़ कर चला गया। चलते समय ओढ़ने पहनने के लिये दमयंती की साड़ी और चादर ग्रावी ग्राधी फाड़कर ले गया। प्रातःकाल जब दमयंती जागी तो नल को न देखकर बहुत चकित हुई। वह उसे इधर उधर ढूंढने लगी पर वह कहीं नहीं दिखाई दिया। वहुत देर हो जाने पर भी जव नल नहीं आया तव उसका ध्यान साड़ी और चादर की ओर गया। उन्हें फटे देख उसे विश्वास हुम्रा कि वह उसे छोड़कर चला गया। उसका दुःख उमड़ चला वह विलाप करती हुई रोने लगी। वह नल की खोज में वन की ओर चल पड़ी। उसे तन बदन की कुछ सुध नहीं रही; नल नल पुकारती हुई वन वन फिरने लगी । फिरते फिरते वह एक अजगर के सामने जा निकली जिसने लपक कर उसे लील लिया । एक ग्वाले ने, जो दूर से देख रहा था, तत्काल दौड़कर तलवार से अजगर का पेट चीर दमयंती को बाहर निकाल दिया। परंतु दमयंती के रूप को देख ग्वाला उस पर आसक्त हो गया और पकड़ने के लिये उसकी ओर बढ़ा । दमयंती ने ग्वाले की ढिठाई देख उसे शाप दिया जिससे उसकी तुरंत मृत्यु हो गई । वहाँ से भागती और विलाप करती हुई दमयंती श्रागे वढ़ी। चलते चलते वह ऐसे घोर अनेक हिंसक पशुपक्षियों दहला रहा था। दमयंती बिना उसे संसार इच्छा हुई। परंतु वियावान वन में पहुँची जहाँ सिंह, हाथी, चीते, रोछ और का निवास था। एक सिंह अपनी गर्जना से सारे वन को सीधे उसके सामने गई। उसे जीवन का मोह नहीं रहा। नल के निस्सार प्रतीत हुआ और भोजन की इच्छा के बजाय उसे मृत्यु की उस विरहिणी की वियोगाग्नि के सामने वह सिह सियार की तरह भाग गया। यह देख दमयंती को फिर विरह सताने लगा। वह अत्यंत व्याकुल हुई। उसके लिये न तो मृत्यु ही श्राती और न विरह ही उसे चैन देता । वह फिर नल का नाम ले लेकर आगे बढ़ी। रास्ते में पथिकों से नल के विषय में पूछतो, पर कोई कुछ न बताता । अंत से एक नदी के तीर पहुँची जहाँ उत्तने अनेक सुनियों को देखा । मुनियों ने दमयंती को अपने पास बुलाया और उसका परिचय पूछा। दमयंती ने उन्हे अपनी विपत्ति की सारी कहानी कह सुनाई। उन्होंने दमयंती को सांत्वना देते हुए कहा, "यह विपत्ति काल प्रेरित है, इसलिये इससे छुटकारा पाना वश की बात नहीं है। परंतु श्रव यह बहुत थोड़े दिनों के लिये है। पश्चात् तुझे तेरा पति मिल जाएगा और तू उसके हृदय की रानी होगी। धन, संपत्ति ओर राजसमाज भी पहले जैसा हो जाएगा। इसलिये निश्चित रह, चिंता न कर। तेरी सव चिताएं शीघ्र दूर हो जाएँगी।" सुमुनियों की बात सुनकर दमयंती पहले तो विस्मित हुई, पर पीछे यह समझकर कि मुनि जन सत्य बोलते हैं, उसे कुछ धीरज बंधा । यह वहाँ से कलपत्ती विलपती श्रागे बढ़ी। रास्ते मे बनजारो का झुंड मिला। बजारों के नायक ने परिचय पाकर उसे चंदेरी चलने के लिये कहा। उसने दमयंती को समझाया, कि वन के बजाय नस्ती से पथिक रात दिन आते जाते रहते है। उनके द्वारा दूर दूर की खबर हवा की तरह उघड़ती है, इसलिये पूछताछ करते रहने पर उनसे कभी न कभी नल की खबर मिल जाएगी। दमयंती नायक से सहमत होकर उसके साथ चल दी। परंतु कुछ दिन पश्चात् घने वन में निवास करते हुए अर्थ रात्रि के समय वनजारों के झुंड को जंगली हाथियों ने रोद डाला। वे सबके सब मारे गए। केवल दमयंती और दो चार भिखारी वाह्मण बच रहे। दमयंती बनजारों की दशा देख अत्यंत दुली हुई और स्वयं को मृत्यु का कारण समझ विलख बिलख कर रोने लगी । ब्राह्मणों ने उसे समझा बुझाकर शांत किया और अपने साथ ले लिया । दमयंती उनके साथ चंदेरी पहुँची। चंदेरी में वहाँ की पटरानी ने उसे देखा और अपने पास बुलाकर उसका परिचय पूछा। उसने परिचय के विषय में केवल इतना ही कहा कि "वह फुदिनों की मारी हुई है"। पटरानी ने फिर कुछ नहीं पूछा, पर उसके रंग रूप से समझ

२२

दमन-नल

गई कि वह कोई राजरानी है। उसन उसका स्वागत सत्कार किया और वाटिका म टिकन का स्थान दिया तथा अपनी पुत्री को साथ रहने के लिये भेज दिया ।

उपर नल दमयंती को छोड़कर चला तो गया पर दमयंती का विरह उसे सताने लगा । उसके विना वह व्याकुल होकर फिरने लगा। फिरते फिरते ऐसे वन में पहुंचा जहाँ दावाग्नि लगी हुई थी। वहाँ कोई उसको पुकार पुकार कर कह रहा था, नल तुम धर्मात्मा, गुणी और ज्ञानी हो, जरा मेरे पास प्राकर एक बात सुन लो' । नल ने यह सुनकर दृष्टि दौड़ाई तो एक सर्प को जो उसका नाम पुकार रहा था- वावाग्नि में पड़ा देखा । उसकी बात मानकर वह उसके पास गया। सर्प ने कहा, "में पापी हूँ। मुझे प्रपने कर्मों और ब्राह्मण के शाप से यह गति मिलो है। मैने एक ब्राह्मण को श्रकारण डसा था जिसने मुझे एक ही जगह पर रिथर रहने का आप दिया। इरालिये में हिल दुल नहीं सकता। इधर यह अग्नि काल रूप होकर तेरी ओर बढ़ रही है। ग्राप मुझे इससे बचाइए और सुरक्षित स्थान पर ले जा कर रख दीजिए। यदि आपने इस बार सुझे बचा लिया तो मे सदा के लिये अमर हो जाऊँगा ।" नल के हृदय में सर्व के प्रति दया उत्पन्न हुई ओर उसने उसको उठाकर अग्नि से बाहर कर दिया। जब छोड़ना चाहा तो सर्प ने दस कदम गिनते हुए चलकर छोड़ने के लिये कहा। नल ने वैसा ही किया; परंतु 'दस' फहने पर सर्प ने उसे उस लिया। सर्प के उसने से नल के त्तारे शरीर में विष व्याप गया और उसका रंग काला पड़ गया। नल ने कारण पूछा तो सर्प ने कहा, "मैंने 'प्राप के साथ धोखा नहीं किया है। इस समय आप कुदिनों के फेर मे पड़े है। और यह दशा कुछ दिनों तक बनी रहेगी। आप राजा है, श्रौर सारा संसार श्रापको जानता है। कोई शत्रु इस स्थिति में आपको दुःख दे सकता है। इसलिये मॅने प्रापके रूपको छिपा लिया है जिससे कोई आपको पहचान न सके। जब आपके कुदिन टल जाएँगे तो आपके स्मरण करने पर में प्रकट हो जाऊँगा और अपने विष का शोषण कर लूंगा। आप का रंग फिर ज्यों का त्यों हो जाएगा। इसके अतिरिषत यह विप आपकी रक्षा करेगा। इसके प्रभाव से आपके निकट न तो कोई शत्रु आएगा और न युद्ध से कोई आपसे जीत ही सकेगा। अव श्राप अपना नाम बाहुक रख सीधे राजा अऋतुपर्ण के पास अयोध्या चले जाइए । राजा ऋतुपर्ण जुवा खेलने की विद्या जानते है । आप उनकी सेवा करके वह विद्या प्राप्त करें। जुवा का मर्म जान लेने पर फिर उसी खेल द्वारा आप अपना गया हुआ राज्य वापस पाएँगे और यह दुःख फिर आपके लिये स्वप्न हो जाएगा।" यह कहकर उसने नल को दो कंचुलियों यत्नपूर्वक रखने के लिये दीं और कहा कि वे अवधि स्वरूप है। समय आने पर वे उसके तेज को पहले जैसा कर देंगे । नल सर्प के उपदेशानुसार सोधे अयोध्या पहुंचे और वहाँ राजा ऋतुपर्ण के सारथी बन कर रहने लगे ।

कुंडनपुर में जव नल दमयंती के वनवास का समाचार पहुँचा तो राजा भीमसेन और रानी राजमती बहुत शोकाकुल हुए। उन्होंने शीघ्र ही नल दमयंती की खोज करने के लिये चारों ओर ब्राह्मणों और भाटों को भेजा। राजा नल का पता तो न चला, पर सहदेव नामक ब्राह्मण ने चंदेरी के राजमहल में दमयंती को देख लिया। बात प्रकट हो

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जाने पर चंदेरी की रानी दमयंती से प्रेम पूर्वक मिली। उसने दमयंती को बताया कि उसकी माता और वह सगी वहन हैं इसलिये वह उसकी पुत्री के समान है। वह दमयंती के दुःख को देखकर वहुत दुखी हुई और उसे उसकी इच्छानुसार राज साज के साथ कुंडनपुर भेज दिया । दमयंती के कुंटनपुर पहुंच जाने पर सवको बढ़ा हर्ष हुया, पर दमयंती को उससे कुछ सुख नहीं मिला। वह नल के विरह में घुलने लगी। उसके दुःख को देखकर राजा और रानी बहुत चितित हुए । उन्होंने नल को ढूंढ़ने के लिये ब्राह्मणों को नियुक्त किया । ब्राह्मण पहले दमयंती से मिले । दमयंती ने उन्हें नल के चिह्न वताए और फटी चादर दिखाकर नल के कार्य का परिचय दिया। उसने कहा, जहाँ जहाँ जाम्रो वहाँ-वहाँ कहना कि "एक पुरुष दुःख से दग्ध स्त्री को संग में सोती छोड़कर चला गया। उसकी चादर को भी ग्राधी फाड़कर ले गया। ऐसा निठुर कि जरा भी द्रवित नहीं हुया । उसके तन, मन और हृदय को वस्त्र की ही तरह चीर कर चला गया।" उसने कहा, यदि इन बातों से कहीं डेरा डाले किसी पुरुष का पता चले तो समझ लेना कि बही वनवासी निठुर नल है। ब्राह्मणों के हृदय में भी दमयंती की पीड़ा से बड़ी करुणा उत्पन्न हुई। वे उसका मर्मभेदी संदेश लेकर चले और उसे वन-वन, नगर-नगर कहने हुए नल को ढूंढ़ने लग । उनमें से एक ब्राह्मग प्रयोध्या भी गया श्रीर घर-घर, गली-गली वही बात सुनाने लगा। वह फिरते-फिरते वहाँ निकला जहाँ नल रहता था। नल ब्राह्मण के मुख से सर्म संदेश सुनते ही मूछित हो गया। जब चैतन्य हुआ तो ब्राह्मण को प्रेम से बुलाकर बैठाया और इस प्रकार कहने लगा, 'हे मित्र ! वही पतिव्रता स्त्री है जो पति से सच्ची प्रीति करती है। भले ही पति सेवा में उसे दुःख मिले, फिर भी उसकी सेवा में श्रधिकाधिक मन लगाती है। पति को सब तरह से भला समझती है और कष्ट का कारण अपने बुरे कर्मों को बताती है उसे पति के सब कार्य हितकारक जान पड़ते हैं। उसके श्रहित पूर्ण कार्यों को वह मन में नहीं धरती श्रीर भ्रामक दृष्टि उसको अच्छी नहीं लगती। और नुनो, उस स्त्री में वे सब बातें थीं जो उसके पति को भाती थीं। वह नुकुमार बड़े दुःख में थी इसलिये उसके दुःख को जब पति नहीं देख सका तो छोड़कर चला गया। परंतु इस संसार में वे विरली स्त्रियाँ हैं जो दुःख पाकर भी दुखी नहीं होतीं । पतिव्रता वही है जो पति के रुष्ट हो जाने पर रुष्ट नहीं होतीं प्रत्युत उसके रुष्ट होने पर उन्हें उसी में रस ग्राता है।" ब्राह्मण ने नल का कथन संदेश के उत्तर रूप में पाया। वह नल को अपने स्थान पर ले गया और उसका परिचय पूछा। नल ने कहा, "मेरा नाम बाहुक है । यहाँ राजा की सेवा में रहता हूँ। में शालिहोत्र विद्या जानता हूँ इसलिये राजा ने ग्रपने घोड़ों की देख-रेख और सम्हाल करने के लिये मुझे नियुक्त किया है । इसके अतिरिक्त राजा के चित्रकारों को चित्रांकन करना सिखाता हूँ और पाक विद्या में प्रवीण होने के कारण राजा के लिये अनेक प्रकार की रसोई तैयार करता हूँ। राजा मेरी सेवा से प्रसन्न रहता है और मुझसे प्रेम करता है।" ब्राह्मण संदेश का उत्तर पाकर सीधे कुंटनपुर श्राया और राजा तथा दमयंती को उसने समस्त वृत्तांत सुनाया । दमयंती ने वाहुक के रूप रंग के विषय में बताया और कहा हा कि संभवतः वियोगाग्नि में को विश्वास हुया कि बाहुक ही राजा नल है। पूछा तो ब्राह्मण ने रंग बहुत ही काला जल कर वह वैसा हो गया है। दमयंती वही शालिहोत्र विद्या जानता है श्रीर

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चित्र तथा रसोई बनाने की कला में भी यह प्रबोण है। उसके रूप रंग ने उसको कुछ भ्रमित अवश्य किया, पर उप्तका विश्वास डिगा नहीं। उसका हृदन उससे मिलने के लिये उद्विग्न हो उठा। वह माता के पास गई और उसकी संमति से उसने नल को कुंटन-पुर लाने का उपाय सोचा। उसने सहदेव ब्राह्मण को बुलाया और उसे अयोध्या जाकर राजा ऋतुपर्ण को यह समाचार सुनाने के लिये कहा, "नल खो गया है, उसका कहीं पता नहीं लगा । इसलिये उसकी स्त्री दूसरा विवाह करना चाहती है। विवाह मुहर्त ग्राज ही है। जो ग्राज कुंडनपुर पहुंचेगा उसको दमयंती पति के रूप में तरेगी ।" उसने सहदेव को अपनी योजना बताई और कहा कि 'यदि नल सचमुच राजा ऋतुपर्ण के यहाँ होगा तो एक ही दिन मे रथ लेकर कुंडनपुर आएगा'। सहदेव ने अयोध्या जाकर राजा ऋतुपर्ण को उक्त समाचार सुनाया। राजा ने समाचार गुना तो उसके हृदय में दमयंती को प्राप्त करने की प्रबल इच्छा जगी। वह शीघ्र ते शोन्न कुंडनपुर पहुँचने की उतावली करने लगा । उसने तुरंत बाहुक को बुलाया और उने दमयंती के दिवाह का समाचार सुना, दिन डूबने के पहले ही रथ द्वारा कुंडनपुर पहुंचाने के लिये कहा। बाहुरु दमयंती के निश्चय को सुनकर पहले तो हक्का बक्का रह गया, पर फिर यह ननभकर कि संभवतः उसने उसे हो बुलाने का उपाय रचा है, उसका दमयंती पर फिर विश्वास जमा । उसने तुरंत सम्हल कर राजा से कहा कि वह दिन डूबने के पहले उन्हें अवश्य कुंडनपुर पहुंचा देगा । उसने तेज चलने वाले धोड़ों को रथ में जोता और राजा को बिठाकर रथ कुंडन-पुर की ओर ले चला। उसके हांकने से घोड़े पवन वेग के समान चल पड़े और रथ से मेघ गर्जन की सी ध्वनि उत्पन्न हुई। राजा को बड़ी प्रसन्नता हुई और वे नल की प्रशंसा करने लगे । इसी समय राजा के कंधे से दुपट्टा खिसककर नीचे गिर पड़ा । उन्होंने बाहुक को 'दुपट्टा गिर गया' कह कर तुरंत रथ व्हराने का ग्रादेश दिया । वाहुक ने दुपट्टे के सात कोस पर छट जाने की बात बतला बहेड़ा वृक्ष के पाप्त रथ ठहरा दिया । राजा को जब रथ की गति विदित हुई तो वाहुक से बोले, "वाहुक ! इसमें संदेह नहीं कि तुम बड़े गुणी हो; परंतु में भी अद्भुत गुण का मर्मी हूँ। सामने जो बहेड़े का वृक्ष दिखाई देता है, उसमे जितने फल, फूल और पत्तियों है तथा जितने पके-अधपके फल है एवं उनमे से जितने जमीन पर गिरे हुए है, में उन सबका अलग-अलग लेखा बतला सकता हूँ।" बाहुक यह जानने के लिये बड़ा उत्सुक हुआ और उसने राजा से लेखा पूछा । राजा ने सबका अलग-अलग लेखा वतला दिया। बाहुक ने वृक्ष उखाड़कर गणना की तो लेखा सत्य पाया। उसने राजा से वह विद्या उसे सिखा देने और बदले में उससे शालिहोत्र विद्या लेने की प्रार्थना की। राजा ने उसे अपनी विद्या सिखादी। उस विद्या को प्राप्त करने के पहले वाहुक को द्यूत विद्या सीखनी पड़ी। इसलिये जैसे ही वह विद्या प्राप्त हुई वैसे ही उसे कलियुग दिखाई दिया। कलियुग नल के सामने हाथ जोड़कर खड़ा हुआ और उससे क्षमा याचना के लिये अनुनय विनय करने लगा। उसने कहा कि उसे दुष्कर्मो का फल मिल गया। पतिव्रता दमयंती ने दुदिन में पड़कर उसे इस प्रकार शाप दिया था, "जिसने मेरे साथ अकारण ऐसा वैर ठाना है और मेरे पति को डॉवा डोल किया है, वह भी, हे विधाता ! सुख को छाया में न बैठे। उसका भी गृह छूट जाय, वह

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वनवास करे और उसका सुख मंदिर ढहकर धरती में मिल जाय ।" कलियुग ने कहा कि उस बाप का प्रभाव उस पर व्याप्त हो गया है। उसकी आदि ठीर नष्ट हो गई है। जिस बहेड़े के वृक्ष पर वह रहता रहा, वह उसके द्वारा कट कर घरानायी हो गया श्रीर वह पूर्ण रूप से उसके बा में है। नल को कलियुग पर दया ग्राई और उसने उसको क्षमा कर दिया । पञ्चात् कलियुग धोग्या त्याग कर चला गया और नल भी राजा ऋतुपर्ण सहित तीसरे पहर रथ लेकर कुंडनपुर जा पहुंचा। रथ की श्रावाज सुनकर दमयंती पति को देखने के लिये राजमहल की छत पर गई। परंतु सत्र लक्षण घटित होने पर भी रंग को न देख वह नल को बाहुक के भेप में नहीं पहचान सकी। उसके सामने यह समस्या अकल्पनीय रूप में उपस्थित हुई और वह भ्रम में पड़ गई ।

उधर राजा भीमसेन को जब राजा ऋतुपर्ण के श्राने का समाचार मिला तो उन्होंने उनका स्वागत किया और उन्हें भवनसार में टिकाया। राजा ऋतुपर्ण ने देखा कि वहाँ विवाह की कुछ भी तैयारी नहीं हो रही है तो वे चकराए और बड़े विचार में पढ़े । राजा भीमसेन को जब विदित हुआ कि राजा ऋतुपर्ण उसी दिन अयोध्या से चले हैं तो वे भी मोच में पड़े। उन्होंने राजा ऋतुपर्ण से ग्रीघ्रता से ग्राने का कारण पूछा। राजा ऋतुपर्ण के मुख पर पहले संकोच और लज्जा के चिह्न झलके; परंतु तुरंत ग्रपने को सम्हाल कर उत्तर दिया कि 'वे केवल दर्शनों के लिये ग्राए है'। राजा भीमसेन ने इस पर कृतज्ञता प्रकट की और उनका बड़ा सत्कार किया ।

दमयंती ने नल का समाचार जानने के लिये गुप्तचर भेजा और स्वयं महल की छत पर से कान लगाकर मुनने लगी। चर ने बाहुक से उसका और उसके साथियों के नाम पूछे तथा रथ स्वासी के विषय में बतलाने को कहा, वाहक ने कहा । "रथपति अयोध्या नरेश" राजा ऋतुपर्ण है। वे दमयंती के द्वितीय वर बरण करने का समाचार पाकर आए है। मेरा नाम बाहुक है और मैं राजा का सारथी हैं। साथियों के नाम क्रमशः वारमुतो श्रीर जीवन है, वे सामान की देख रेख करते हैं।" चर ने वारसुतो से, जो पहले नल का सारथी था और उसके पुत्र पुत्री को कुंटनपुर पहुंचाकर अयोध्या चला गया था, नल का समाचार पूछा। परन्तु वारमुतो के कहने के पहले ही बाहुक बोल उठा । उसने पूछा, "क्या नल की स्त्री इसी जगह रहती है ? यह बात यह लोग जानना चाहते है इसलिए पूछता हूँ। फिर बारमुतो जिस गाँव को देखता है, वहाँ नल अवश्य होगा। इस समाज से वह बाहर नहीं है। यदि वह है तो इसी रथ में है। वह जिसके हृद्व्य में रहता है वही उसको पहचान सकता है। हृदय के वर्ण को देखकर उसे यब ग्रवर्ण वाला जाने । जो उमे (वास्तविक) वर्ग में देखना चाहंगा वह ढूंढ़ ढूंढ़ कर थक जाएगा, पर उसे नहीं पा सकेगा। श्रवर्ण समझते हुए जो खोज करेगा वह पा जाएगा। जो बात-बान में भेद लेना जानता है वही उस पुरुष को पहचान सकता है।" चर ने बाटुक को मर्मी और ज्ञानी समझा। उसे विश्वास हुया कि वह या तो स्वयं नल है अथवा वह नल के त्रियय में जानता है। उसने वाहुक से उस पुरुप के विषय में भी अपनी जानकारी बनाने के लिये पूछा जिसने अयोध्या में घूमते हुए उस ब्राह्मण से बातें की थीं जो कहता फिरता था, कि "वह कौन पुरुष है जिसने पतिव्रता स्त्री को उसकी साड़ी योर चादर

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चीर कर तज दिया। वह वड़ा हो निठुर है, उसे जरा भी पीड़ा नहीं हुई। वह निर्दय उस सोती हुई को छोड़कर चला गया ।" इस बात ने नल के हृदय को मानो चीर दिया । उसने पहले की जो दरार थी वह नई होकर फिर पीड़ा देने लगी । प्रेमाग्नि ने उस घाव को फिर सेकना प्रारम्भ किया। हँसता हुआ मुख रखते हुए भी उसकी चॉखें लाल हो गई और उनसे अश्रुधाराएँ निकल पड़ीं। वह फिर बोला, "हे मित्र ! मुन, वह पुरुष भी हमी से है। वह या तो मै हूँ या वह मेरे संग ही है। दूसरी जगह कहीं नहीं है। इतना सुनते ही वह चर सीधे दमयन्ती के पास आया और उससे बाहुक की सव वाले व्योरेवार कह सुनायीं। चर ने दमयन्ती से कहा, "वाहुक को ही प्रीतम समझो। में उसके हृदय से प्रेस की पीड़ा पाता हूँ। उसमे विरहाग्नि भरी हुई है। ऊपर से वेह काली पड़ने का कारण यह है कि वह विरहाग्नि से दग्ध हो चुकी है। उसके बोलने से अग्नि की लपटें ऐसी निकलती है मानो उसका मुख मुख न होकर अग्नि की भट्टी ने मुख खोला हो। वह चुभने वाले वचन कहता है और उसका मन तुम्हीं में लगा रहता है। अन्त में जब तुम्हारा नाम जुना तो उसकी आँखों से रुधिर की धाराएँ वह चली। वह निश्चय ही तुम्हारा पति है। तमय रहते उसे पहचान लो। उसके चले जाने पर फिर रोना होगा।" दमयन्ती ने कहा, "हे भाई ! मैने भी बातें सुनकर प्रियतम को पहचान लिया है। परन्तु भ्रम को सव तरह से दूर कर देना अच्छा है जिससे पीछे पछताना न पड़े। इसलिए भोजन की सामग्री और रीते घड़े लेकर वाहुक के पास जाओ । यदि वह नल होगा तो विना जल और अग्नि के रसोई तैयार कर लेगा। नल के देखते ही खाली घड़े पानी से भर जाते हैं और उसके स्मरण करते ही अग्नि भी चली आती है। इनके अतिरिक्त कुछ सुगन्धियुक्त फूल लेजाकर उसके हाथ में देना। यदि हाथ से मलने पर फूल ज्यों के त्यों अम्लान और सुगन्धियुक्त बने रहें तो बाहुक निःसन्देह नल के अतिरिक्त और कोई नही।" वह मनुष्य तत्काल फूल, जलरहित घड़ा और रसोई का सामान लेकर वाहुक के पास गया। बाहुक उन्हें देखते ही बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने समझ लिया कि वह सब उसकी परीक्षा के लिये भेजा गया है। उसे प्रिय का मिलन निकट दिखाई दिया । उसने पहले फूलों को लेकर हाथ से मला तो उनके तेज रंग, और सुवास में और वृद्धि हो गई। देखने वाले आश्चर्य करने लगे। फिर उसने खाली घड़े की ओर देखा, वह पानी से भर गया। तत्पश्चात् बरतन के अन्न में नमक जल डाल और सुवास का संचार कर उसे हाथ में लिया तो तत्काल उफान आकर भोजन भी तैयार हो गया। फलतः यह परीक्षा सब तरह उसकी साक्षी वन गई। वह मनुष्य भोजन के बरतन को लेकर दमयन्ती के पास वापस आया और उसे वरतन देकर जो कुछ देखा वह वर्णन कर सुनाया। दमयन्ती ने पहले भोजन को सूघा और फिर प्रेम से उसे खाया तो उसमें सुगन्धि, रस और मिठास आदि सव वैसे ही पाए जैसे नल के बनाए भोजन में रहते थे । इस पर उसे निश्चय हो गया कि वाहुक ही उसका पति है। उसने अपने वालकों को भी उसके पास भेजा। बाहुक ने उन्हें दौड़कर गले लगा लिया और रोने लगा । राजा ऋतुपर्ण यह देख रहे थे। उन्होंने बाहुक से उन वालकों का परिचय पूछा । बाहुक ने कहा, "महाराज ! इन्हीं बालकों के समान मेरे दो बालक थे जिनका स्मरण कर में रो उठा हूँ । दमयन्ती ने जब इसका भी परचा पाया तो उसे बाहुक के पति

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होने में पूर्ण विश्वास हो गया और वह तुरंत माता के पास गई। उसने माता फो पति के थाने का समाचार दिया और जिस जिस प्रकार पति की परीक्षा की वह भी सब सुनाया । माता ने उसी क्षण चर भेजकर बाहुक को बुलाया। दमयंती बाहुक के सामने जाकर सीबी खड़ी हो गई। नत्र की दृष्टि जैसे ही दमयंती की दृष्टि से मिली, वह रोने लगा । उसके आँसू निकलते समय लाल दिखाई दिए श्रौर गिरते समय सफेद । यह नल में विशेष वात थी । दमयंती ने जब यह भेद भी पाया तो वह जोर से रो उठी। वह बोली, ''प्रियतम ! मुझे वन में छोड़कर तुमने जैसा क्रिया वैया कोई नहीं करता। संग रहते भेद उत्पन्न किया और जिस मिलन की सदा इच्छा रहती है उससे अलग हो गए। दूर भी होते है तो परीक्षा नहीं होती। बिछुड़े हुए मिलन हो जाने पर फिर गले लगते है। सचमुच, में इस मिलन के कारण मारी गई। में तुमसे जुड़ी हुई थी, पर तुमने अलग किया। सुना है, कपटी लोग मिलन में भी अलग रहते हैं। हे कंत ! तुम्हें भी मैने वैसा ही देखा । बतायो, कौनसा हित सोचकर पहले भूमि पर विछीना विछाया ग्रोर मुझे गल से लगा सुलाया फिर मुख नित्रा में छोड़ विछोह किया। क्या मिलन में कोई ऐमा करता है? यदि में जानती कि मुझे कपट से सुलाकर तुम स्वयं अलग हो रहे थे तो में किस लिये सोती और किस लिये तुम जैसे रत्न को खोती । तुमने मुझे कंठ से लगाकर मुलाया, पर मन में गाँठ घरे रहे। फिर भी, जाने दो, वह वात बीत गई । श्रव तो मिलो । क्या श्रव भी वह गाँठ नहीं छोड़ोगे।" नल ने कहा, " हे सुन्दरी ! यह सब प्रारब्ध वा हुम्रा । प्रारब्ध कभी नहीं मिटता। उसका भोग करना पड़ता है। जो कुछ किया प्रारब्ध ने किया। उसी ने कारण के रूप में कलियुग को बीच में डाला जिससे विछोह हुम्रा । श्रव दिन फिर लोट श्राए हैं। वह कलियुग मित्र बन गया है। परन्तु तूने तन के लिये विछोह माना, नहीं तो में तुझमें ही समाया हुया हूँ। क्षण भर के लिये भी तुझसे अलग नहीं हुया, भूल से तेरे ही मन में भ्रम उत्पन्न हुया है। तूने ही अपने मन में गाँठ डाली है जिसके कारण मुझमे संबंध विच्छेद कर देह से सम्वन्ध जोड़ा है। देह सुख के लिए तूने मुझे भुला दिया है और वर बुलाकर वरण किए हुए को खो दिया है। हे दमयंती, तेरी देह का पति सुखी पुरुष है, पर मैं तेरे हृदय का स्वामी हूँ इसलिये देह की तरह अपना हृदय भी मुझ से न फेर ।"

दमयंती नल का उत्तर सुनकर बहुत विकल हुई और बोली, " हे स्वाभी मैने तुमसे सम्बन्ध नहीं तोड़ा है वरन् सबमे उदासीन होकर तुमसे ही नाता जोड़ा है। देह का सुख में कुछ नहीं गिनती । अपना तन, मन और प्राण सब कुछ तुम्हीं को समझती हूँ। तुम्हें बुलाने के लिये ही श्राज का श्रायोजन किया। एक दिन में सो योजन की गति से रथ चलाने की कला केवल तुम्हीं जानते हो। इसलिये यह सोचकर कि यदि तुम अयोध्या में हो तो रथ द्वारा एक ही दिन में यहाँ पहुँचोगे। फिर भी, यदि तुमने अपने मन में ऐसा ही समझ लिया है तो ये सूर्य और चन्द्रमा साक्षी भरेंगे तथा मेरी देह के संगी-पृथ्वी, पवन, श्रग्नि ग्रऔर वरुण भी भ्रम का निवारण करेंगे।" दमयंती के ऐसा कहते ही तत्क्षण अग्नि, पवन और वरुण देह सहित प्रकट हुए; उन्होंने उसके सत की साक्षी दी। इससे नल को परम संतोष हुआा और उसने दमयंती को श्रृंगार करने के लिये कहा ।

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स्वयं भी उसने सर्प का स्मरण किया। सर्प तत्काल प्रकट हुआा और उसने उसका विष उतारा तथा कंचुली पहना कर उसे पूर्व रूप में ज्यों का त्यों कर दिया। तत्पश्चात् नल और दमयंती आनन्द पूर्णक मिले ।

राजा ऋतुपर्ण को जब नल दमयंती के मिलन का समाचार मिला तो वे उसी समय नल के पास गए और उससे अपनी अज्ञानता के लिये क्षमा माँगी। नल ने राजा ऋतुपर्ण की प्रशसा की और उनकी उदारता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उन्हें शालिहोत्र विद्या सिखाई। राजा ऋतुपर्ण कुछ दिन नल के साथ प्रेम पूर्वक रहकर फिर अयोध्या चले गए । तत्पश्चात् नल शीघ्र ही राजा भीम से वहुतसा धन और हाथी, घोड़े, रथ तथा सेना लेकर कुंडनपुर से उज्जैन श्राया। उसने पुष्कर को जुए में हराकर अपना राज्य वापस ले लिया और फिर दमयंती के साथ श्रानन्दपूर्व क रहने लगा ।

महाभारत की कथा से अंतर

महाभारत से वृहदश्व ऋषि और युधिष्ठिर के संवाद के रूप में नल दमयंती की कथा वन पर्व के अन्तर्गत अ‌ट्ठाईस अध्यायों (५२-७६) में वर्णन की गई है। उससे प्रस्तुत कथा में कई स्थलों पर अन्तर पाया जाता है:-

आरम्भ का तो अधिकांश (दमयन्ती के स्वयंवर की चर्चा चलन तक) कल्पित है । इसमे पहली बात तो यह है कि हंसों को कोई स्थान नहीं दिया गया है। महाभारत से हंस नल दमयन्ती के बीच प्रेम संदेसा पहुँचाने का कार्य करते है और तत्पश्चात् लुप्त हो जाते हैं । प्रस्तुत कथा में हंसों के स्थान पर भाटिन की योजना की गई है। भाटिन रूप में अनूप और गायन में निपुण एवं अपूर्व है। वह नल को सभा में ग्रारंभ में ही प्रकट हो जाती है और पद्मिनी के विषय में चर्चा छिड़ते हो प्रमुख वक्ता का स्थान ग्रहण करती है। उसकी प्रगल्भ वाक्शक्ति के आगे सारे सभासद निस्तेज हो लाते हैं। पद्मिनी के परिचय से आरम्भ कर कुंडनपुर नगर, राजा भीमसेन, रानी राजमती, पद्मिनी स्वरूपा राजकुमारी दमयन्ती और हस्तिनी, शंखिनी, चित्रणी एवं पद्मिनी नामक स्त्रियों के विशद वर्णन द्वारा वह गल को मुग्ध करती हुई उसकी सुध वुध खो उसे प्रेम पथ पर आरूढ़ करती है। इसके पश्चात् हंसों की तरह उसका भी कोई पता नहीं चलता । इससे स्पष्ट होता है कि स्वाभाविकता लाने के लिये भाटिन द्वारा प्रस्तुत किया गया विस्तृत विवरण कवि को अभिप्रेत था। हंसों द्वारा, उनके पक्षी होने के कारण, वैसा वर्णन करना सम्भव न था एवं वह अस्वाभाविक होता। दूसरी बात यह है कि दमयन्ती को पद्मिनी के रूप में चित्रित किया गया है और उसकी उँगलियों में अमृत बताया गया है जिसके आधार पर वन में मछलियों के जीवित होने की कथा गढ़ी गई है। महाभारत में ऐसा कुछ नहीं है। वहाँ दमयन्ती को अत्यन्त रूपवती बताया है; मृतक मछलियों के जीवित होने की का। उसमें नहीं है। तीसरा परिवर्तन यह किया है कि दमन ऋषि को राजधानी से चार कोस दूर वन मे तपस्या करते हुए दिखाया गया है। राजा भीमसेन वहाँ उनके दर्शन के हेतु जाते है और ज्ञानोपदेश के अनन्तर फल प्राप्त करते है जिनके प्रभत्व से रानी के गर्भ से सन्तान उत्पन्न होती है। महाभारत के अनुसार

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ऋषि राजा के ही घर पर आते हैं। चौथा परिवर्तन यह है कि दमयन्ती के हृदय में नल का प्रेस सहसा उत्पन्न होता है। यह प्रेम का माहात्म्य दिखाने के लिये किया गया है।

कल्पितांश के पश्चात् मूल कथा में प्रमुख रूप से निम्नलिखित अन्तर पाए जाते है-

१- इंद्र के साथ वरुण, कुवेर श्रोर यम कुंडनपुर जाते हैं। महाभारत में कुवेर के स्थान पर ग्रग्नि का उल्लेख है। इसी तरह इनके द्वारा नल को वरदान देने में भी हेर फेर है ।

२-देवताओं के दूत के रूप में दययन्ती के भवन में पहुँचने पर नल को दमयन्ती ने पहचान लिया जिससे उसके प्रेम की महत्ता प्रकट होती है। महाभारत में ऐसा नहीं है । वहाँ नल श्रपना परिचय देता है।

३०- दमयन्ती नल का रूप धारण किए हुए देवताथों को पहचानने में असमर्थ होने पर चित प्रभु की गरण में जाती है। महाभारत में दमयन्ती देवताओं से ही अपना वास्तविक रूप धारण करने के लिये प्रार्थना करती है ।

४- बनजारों के स्वामी के समझाने बुझाने पर टमयन्ती उसके साथ चंदेरी चलती है। महाभारत में दमयन्ती स्वतः ही वनजारों के स्वामी के साथ चंदेरी चलतो है।

५- नल का राजा ऋतुपर्ण को लेकर कुंटनपुर पहुँचाने पर दमयन्ती ने उसका समाचार जानने के लिये चर भेजा और उसकी परीक्षा के निमित्त उसी चर के हाथ फूल, जलरहित घड़ा और भोजन की सामग्री भेजी। महाभारत में केशिनी नामक दूती नल का सामाचार लाने के लिये भेजी जाती है। उसमें फूल, घड़ा और ज सामग्री भेजने का उल्लेख नहीं है।

६- नल चर द्वारा बुलाए जाने पर जब दमयन्ती के सामने खड़ा हुया रोने लगा। उसके आँसू ग्राँखों में लाल और गिरने समय सफेद दिखाई देते थे । महा भारत में ऐसा कुछ नहीं लिखा है।

७- नल को वास्तविक रूप में करने के लिये कर्कोटक सर्प उपस्थित होता श्रीर उसके शरीर से विप का शोषण करता है तथा उसे दी हुई कंचुली पहनाता है महाभारत में कर्कोटक के थाने का उल्लेख नहीं है, केवल कंचुली पहन कर ही न. अपने प्रकृत रूप को प्राप्न करता है।

प्राचीन (तस कवि लोग स्वतंत्र -दमयंती की इनके अतिरिक्त छोटे-छोटे अंतर बहुत है, पर वे नगण्य है। या पौराणिक) कथाग्रों को अपनी कल्पनानुसार काव्य रूप देने में इसमें संदेह नहीं। परंतु एक स्थल पर कवि की उ‌द्भावना चित्य है। में अमृत होने की कल्पना बहुत शिथिल है। उस अमृत को स्वयं नल दमयंती ने जाने कितनी बार चखा होगा। इस दृष्टि से उन्हें श्रमर हो जाना चाहिए था । इस अतिरिक्त मरे हुए बनजारों के समूह को भी जीवित किया जा सकता था। इन बा.

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ज्ञान के इन दो पक्षों को प्रस्तुत आख्यानक के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध में कलात्मक ढंग से क्रमबद्ध किया गया है। प्रथम ज्ञान का विषय निर्गुण ब्रह्म है और दूसरे ज्ञान का विषय व्यवहारधर्म । लोक व्यवहार का उपदेश पात्र (राजा) के अनुसार राजधर्म के रूप में हुआ है। परंतु राजा भीमसेन को किया गया यह उपदेश प्रस्तावना रूप में कोरा उपदेश समझना चाहिए। अन्यत्र यह 'कांता संमित उपदेश' के रूप में कहानी के साथ गुंथा हुआ है। कवि ने एक बात और की है। दमयंती के वर्णन में उसने परमात्मा को प्रम (प्रेमामृत) के रूप मे चित्रित किया है और नल के वर्णन मे ज्ञान रूप में। यह उनके लिंग भेद के कारण है जो स्वाभाविक है। परमात्मतत्त्व दोनों में एक ही है। दोनों शुद्ध सात्विक वृत्ति के होने के कारण वह तत्त्व उनमे पूर्ण प्रकाश रूप में भासने लगता है । रंगहीन शुद्ध काँच की बोतल में जैसे गंगाजल दिखाई देता है ऐसे ही उनके त्रिगुण मल रहित शुद्ध अंतःकरण में परमात्म रूपी आत्म तेज चमकने लगता है। इस प्रकार उनमें जिस रूप सौदर्य का निर्माण होता है वह अनुपम, दुर्लभ और अलौकिक है। उसके आगे स्वयं रूप (जगद् रूप) का मुख फीका पड़ जाना उचित हो है। इस दृष्टि से इस रूप की उपमा के लिये ब्रह्म ही रह जाता है और ऐसा ही कवि ने किया है। यह भी बात है कि कहानी ब्रह्म की ओर इंगित करती हुई चलती है। नल के सौंदर्य का वर्णन केवल कहानी के आरम्भ से है और वह कवि द्वारा हुआ है। दमयंती के सौंदर्य का वर्णन भाटिन द्वारा तीन बार और कवि द्वारा उत्तरार्द्ध में दो बार किया गया है। यहाँ विषय स्पष्ट करने के लिये उनके आरंभिक रूप सौदर्य का एक एक उदाहरण दिया जाता है। इन्हीं में समस्त भेद खुल जाता है-

नल का सौंदर्य

वह (ज्ञान रूपी नल) उज्ज्वल वर्ण वाला है मानो काम ने (परमात्मा का नाम 'काम' भी है इसलिये परमात्मा रूपी काम ने) अवतार लिया हो। जिसके मुख से सुना गया, वही उस रूप को सुंदर (वास्तविक, ब्रह्मरूपमय) कहता था। नल के मुख के ग्रागे रूप (जगद् रूप) का मुख फीका था। उसके रूप की बराबरी कोई नहीं कर सकता था । मानो विधाता ने सव के घट-घट में उसी रूप को लिखा (मानो वही रूप सबके घट-घट में ब्रह्मरूप के समान व्याप्त हुआ)। उसके मुख की ज्योति सूर्य क्रांति (ब्रह्मज्योति) के समान थी। संसार में दिन करने वाले सूर्य की ज्योति उस ज्योति को

नल-दमन

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नहीं पाती थी। सूर्य को देखने से आँखों की ज्योति जनने लगती है और वे तब शीतल होती है जब हिम देखने को मिलता है। परंतु नल को देख लेने पर सूर्य को देखने के लिये कोई लालायित नहीं रहता था। जो नल को देख लेता था, वह उसमें सूर्य का (दूसरा अर्थ, प्रह्मरूप का) दर्शन करता था। सूर्य को देखने से आँखों की जो गति (जलने की गति) होती है वही गति नल रूपी सूर्य को क्षण भर देखने से होती थी (अर्थात्, नलरूपी ज्ञान सूर्य श्रजानांषकार युक्त आँखों को क्षण भर में जला देता था) । पुरुष अथवा स्त्री, जिसके भी वित्त में वह रूप (नहारूप) झलक पड़ा, फिर वह जन्म भर उसके चित्त से नहीं टला। वह रूप संसार के हृदय में समाया हुआ जैसा था । जिसने उस रूप को देखा उसने अपने को उसी में हिरा दिया (दूसरा अर्थ, जिसने उस ब्रह्म रूप का दर्शन किया वह भी ब्रह्ममय हो गया) ।

जितने राजा अविवाहित थे उन्होने जैसे ही नल के रूप के विषय में मुना वैने ही उन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया (वैराग्य इसलिये कि संसार की सुंदरी नल को छोड़ उन्हें नहीं बरेगी) । वे अग्नि वर्णयुक्त नल के वर्ण के कारण द्वेषाग्नि में जलने लगे ।

दूसरा अर्थ

जो रजोगुणी (शुद्ध सात्विक गुण ने श्रयुक्त) थे वे उस ज्ञानरूप के विपय म सुनते ही विरक्त (सांसारिक भोगों से अलग) हो गए। ओर जानाग्नि में नपे (नल के सदृश्य) शुद्ध सात्विक उज्ज्वल वर्ण प्राप्ति के निमित्त वे भी अपने रजोगुण को जानाग्नि में जलाने लगे ।

ज्ञानोपदेश

यह लिखा जा चुका है कि कवि कहानी के साथ-साथ ज्ञानोपदेश भी करना चाहता है। नल के इस रूप वर्णन में ज्ञान द्वारा ब्रह्म प्राप्ति का उपदेश है-

ब्रह्म ही वास्तविक वस्तु है। वही काम है। उसका रूप अनुपम है। सब जगह और सब के हृदय में वही रूप व्याप्त है। उसके रूप की झलक मात्र मिलने से ज्ञान चक्षु प्राप्त होते हैं और ज्ञान प्राप्त होते ही ब्रह्म प्राप्त हो जाता है। ज्ञान की प्राप्ति के लिये त्रिगुणों (सत, रज, तम) को समूल नष्ट करके शुद्ध सात्विक वृत्ति प्राप्त करनी पड़ती है, आदि। कहानी के रूप में यह ज्ञान रसात्मक शैली में वर्णन किया

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