नल दमयंती कथा || नल-दमयन्ती विवाह और निषध देश वापसी
नल-दमयन्ती विवाह और निषध देश वापसी
पहला परिच्छेद
(1) निषध नगरी का वर्णन
पुण्य-भूमि भारतवर्षके कोसल प्रदेशमें इन्द्रकी अमरावती नगरी से भी कहीं अधिक सुहावनी, सुख 'समृद्धि-शालिनी और नाना प्रकारको मनोहर अट्टालिकाओंसे सुशोभित कोसला नामको एक परम रमणीय नगरी थी । वहाँ सम्पूर्ण वैरी-वृन्द को पराजित कर सर्वत्र अपनी विजय पताका फहरानेवाले, न्याय और नीतिमें पूर्ण निष्ठा रखनेवाले, प्रजापालनमें सदा – सब तरहसे— तत्पर रहनेवाले निषध नामके - एक राजा राज्य करते थे । राजा निषध बडेही दयालु, धर्मात्मा, न्यायी और सदाचारी थे । वे अपनी प्रजाको पुत्रके समान मानते थे और उसका दुःख-दर्द दूर करनेके लिये सदा तैयार रहते थे ।
उनके राज्यमें प्रजाको रोग, शोक, अकाल और महामारी आदिका कभी सामना नहीं करना पडता था । राज्यके कर्मचारियों पर स्वयं राजाका ऐसा अंकुश रहता था, कि वे कभी प्रजापर अत्याचार 'नहीं' करने पाते थे ।
जहाँ राजा प्रजाको ओरसे कान में तेल डाले पड़े रहते हैं और अपने कर्मचारियोको ही कही हुई बातो को सच समझा करते हैं, वहाँ कर्मचारी अपनेको प्रजाका सेवक नहीं, बल्कि सोलह आने मालिक समझने लगते हैं और मनमाने ढग से प्रजाको लूटते-खसोटते तथा मारते- कूटते है । परन्तु निषध के से सुचतुर राजाके यहाँ ऐसी घाँधली नहीं होने पाती थी, क्योकि वे स्वयं अपनी प्रजाके अभाव अभियोग तथा आवश्यकताओं पर ध्यान दिया करते थे और किसीको मनमानी घरजानी करने का अवसर हाथ नहीं लगने देते थे।
इस प्रकारका प्रजाप्रिय नृपति प्राप्तकर, कोसल- देशको प्रजा अपने भाग्यको बारम्बार वडाई करती और हर तरह के सुख भोग रही थी। जैसा राजा वैसी प्रजा यह पुरानी कहावत इसी राज्य में सच्ची साबित हो गयी थी । जैसे धर्मात्मा और न्यायी, यहाँके राजा थे, वैसे ही धर्मात्मा, विवेकी और निरन्तर न्याय में निष्ठा रखनेवाले मनुष्य भी उस राज्य में बसते थे। साराश यह, कि राजासे सारी प्रजा सन्तुष्ट रहती थी, और राजाको भी अपनी प्रजाको ओरसे कोई खुटका ( सन्देह ) नहीं था ।
पूर्व-पुण्यों कें प्रभावसे राजा निषधको दो पुत्र प्राप्त हुए। बड़े का नाम नल और छोटेका कूबर था। दोनों ही" राजकुमार शील, सौन्दर्य, बुद्धि और प्रतिभा में बढे चढ़ें थे | क्रमश. गुरुके निकट रहकर, दोनों राजकुमारों ने राजकुमारोंके योग्य शिक्षा प्राप्त की और सभी कलाओं में प्रवीण हो गये। दिन बीतते देर नही लगती । राजकुमारोंने धीरे-धीरे बॉलकपन और किशोरावस्थां पारकर यौवनमें पैर रखा।
(2) कुंडिनपुर से दूध का स्वयंवर के लिए संदेश लाना
एक दिन राजा निषध अपनी राजसभा में बैठे हुए राज कार्यका निरीक्षण कर रहे थे, इसी समय विदर्भ-देशक राजा भीमका भेजा हुआ दूत वहाँ आ पहुँचा और राजाको विधि वत् प्रणाम कर, हाथ जोडे हुए कहने लगा,
1 “हे महाराज ! विदर्भ-देश में कुण्डिनपुर नामक एक नगर है। उसमें भीमरथ नामके राजा रहते है। उनके एक बडीही सुन्दरी और गुणवती कन्या है। उसके रूप- लावण्यको चारों ओर प्रशंसा फैली हुई है। उस सौन्दर्यका शब्दो द्वारा वर्णन नहीं हो सकता - वह आँखों देखने की ही चीज़ है ।
उसका वह अनुपम लावण्य देखकर आँखोंपर अमृतसा बरस जाता है । शायद विधाताके हाथोंकी वैसी कारोगरी कभी नहीं प्रकट हुई, जैसी उसने उस राजकुमारीके बनाने में खर्च की है। महाराज मै अधिक क्या कह उस राजकन्याकी सी सुन्दरी शायद ही इस पृथ्वीपर कभी देखने में आयी हो । उसका नाम भी बडाही सुन्दर है । लोग उसे दमयंती कहते हैं। जैसे सव जलाशयोंको छोडकर हंस मानसरोवरके पास ही आ रहते हैं, वैसे ही समस्त उत्तम गुण बिना बुलाये दमयन्तीके पास चले आये हैं। राजकुमारी विवाह योग्य हो गयी है, इसलिये राजा उसके योग्य वरको खोजमें है, परन्तु आजतक उसके समान शील, सौन्दर्य और गुणोंसे भरा-पूरा कोई वर नहीं मिला। इसीलिये राजाने स्वयंवर रचाया है। और उसमें पधारनेके लिये सब देशोंके राजा-राजकुमारोंके पास निमंत्रण भिजवाया है। मैं भी उसीके लिये आपको निमन्त्रण देने आया हूँ । अतएव आप कृपाकर अपने दोनों राजकुमारोंके साथ वहाँ पधारें और हमारे राजाको कृतार्थ करें, यही मेरी प्रार्थना है।"
दूतकी यह बात सुन, राजाने सादर राजा भीमरथका निमन्त्रण स्वीकार किया और उस दूतका भलीभाँति आदर सत्कार किया । जाते समय उस दूतको मुँहमाँगा इनाम भी राजाको ओरसे दिया गया। इसके बाद राजा विदर्भ-देश जाने को तैयारी करने लगे ।
(3) स्वयंबर के लिए कुंडिनपुर को प्रस्थान
उनके साथ जाने के लिये बहुत बडी सेना सज्जित हुई । एक दिन शुभ मुहूर्त्तमें अपने सब सैनिकों और सेवकोंके साथ राजा निषध, अपने दोनों राजकुमारीको संग लिये, दक्षिण दिशाको ओर चल पड़े । क्रमशः महीनो को यात्रा कर, स्थान-स्थान पर विश्राम करते हुए वे लोग कुण्डिनपुरमें आ पहुँचे।
विदर्भ- देशके राजाने इन लोगों को बडी प्रीति और भक्तिके साथ स्वागत करते हुए केलि-वनमें ले जाकर पधराया | उसी समय स्वयवरके निमित्त अन्यान्य देशोके जो राजागण वहाँ आये, उनलोगोको भी विदर्भ-नरेशने बढे आदरके साथ अलग-अलग स्थानों में ठहराया। देश देश के भिन्न-भिन्न रूप रङ्गवाले मनुष्यों के आगमनसे कुण्डिन पुरमें खासी चहल-पहल हो गयो । जगह-जगह खेल-तमाशे और नाच गानका रङ्ग जम गया। भिन्न-भिन्न राजाओके रंग बिरंगे डेरे- खेमे गड गये - उन पर रंग-बिरंगी पताकाएँ फहराने लगीं। कुण्डिनपुरके झुण्ड के झुण्ड लोग आकर उन डेरे-तम्बुओंको देखने लगे। सबकी अपेक्षा निषध देश के ही राजाका सुन्दर डेरा लोगों को बहुत ही पसन्द आया।
उस डेरेके भीतर झाँक कर लोगों ने जब राजकुमार 'नलको देखा, तब तो उनको सुन्दरताने सबकी आँखो में चकाचौधसी लगा दी । सब लोग उस कामदेवके समान सुन्दर रूपवाले नलको देखकर कहने लगे,–“बस यही राजकुमार दमयन्ती के योग्य वर है। अच्छा हो, यदि राजा भीमरथ, सबको छोड कर इसके साथ दमयन्ती का विवाह कर दें।
नियत समय पर सब लोग स्वयंवर मण्डपमें आ विराजे । सभी राजा-राजकुमार बडे ठाट-बाटसे भडकीली पोशाकें पहने बैठे हुए थे । कोसल - नरेश भी अपने दोनों पुत्रो के साथ मणि - रत्न जटित सिहासन पर बैठे हुए नक्षत्रों के बीच शोभित होनेवाले चन्द्रमाको भाँति शोभा पा रहे थे। सबके बीचमें राजकुमार नल सहस्ररश्मि सूर्यके समान सबको ज्योतिको मन्द करते हुए विराजमान थे । उनका तेज देखकर सबको आँखें झैप जाती थीं । न मालूम क्यों, सबके दिलमें रह रह
(4)
(5) रास्ते में बाल ब्रह्मचारी से भेट और उनका आशीर्वाद प्राप्ति
सूर्यकासा प्रकाश फैल जानेसे वह जो मनुष्यकासा आकार दिखाई दे रहा है, वह क्या है ?"
दमयन्तीने कहा, – “स्वामी। वे बालब्रह्मचारी हैं। उन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियोंको जीत लिया है। प्राणनाथ ! इस जंगलके रहनेवाले हाथी, इन मुनिवरको पर्वत समझकर, इन के शरीरमें अपनी पीठ घिसा करते थे, इसलिये इनका ध्यान , टूट गया है। इतनेमें हाथियोंको गलपट्टोसे चूते हुए मदलज के लोभसे भौरे आ-आकर मुनिको दुःख दे रहे हैं, इसीसे वे बडे क्लेशमें हैं। "
यह सुन, राजकुमार नल अपना रथ मुनिके पास ले आये। तदनन्तर उसपरसे नीचे उतरकर दोनों स्त्री-पुरुषने उन्हें प्रणाम किया । भौरोंके उत्पातको देख, उन्हें मुनिकी दशापरे तरस आ गया। मुनिने अपने ज्ञानसे यह बात जान ली । तदनन्तर भौरोंके उपद्रवोंको शान्तकर मुनिने कहा, - हे - दम्पती ' सुनो-धर्मं कोई नयी वस्तु नहीं है, जिसके विषय में उपदेश करनेको आवश्यकता हो। धर्म सारे ससारमें प्रसिद्ध और पुरातन वस्तु है। मनुष्य मात्रको इसका सर्वदा आचरण करना चाहिये। ( नलकी ओर देखकर ) हे राजकुमार नल तुम्हारी स्त्रो दमयन्ती, पूर्वजन्ममें, चौबीसों तोर्थकंरोंका स्मरण कर नाना प्रकारके तप, दान आदि शुभकृत्य कर चुकी है, इसीलिये इसे इस जन्ममें सूर्यको ज्योतिको भी मन्द करनेवाली ललाट-ज्योति प्राप्त हुई है। तुमने भी पिछले जन्म में उत्तमोत्तम तप, दान आदि धर्मके कार्य किये हैं, इसीलिये तुम्हें दमयन्तो पत्नी रूप में प्राप्त हुई है। इसके बाद आगे आने वाले भवों में भी तुम्हें सदा सुख-शान्ति प्राप्त होती रहेगी।"
(6) निषाद देश के निकट
मुनिको यह बात सुन, दोनों वर वधू बडे प्रसन्न हुए और रथपर सवार हो आगे चले। इसी प्रकार आगे चलते-चलते वे अपनी राजधानीके पास पहुँचे। वहाँ एक सुन्दर सुहावनी फुलवारी देख, नलको बडा आनन्द हुआ और उन्होने अपनो नव-विवाहिता पत्नी से कहा, “प्यारी । अब यहीसे तुम हमारी राजधानीको सुन्दर रचना देखो। यह फुलवारी हमें बतला रही है, कि हमारी राजधानी अब बहुत हो निकट है, उसकी बाहरी - भीतरी सुन्दरता देखनेके लिये तैयार हो जाओ। इस लिये प्राणप्यारी । तुम्हारी ससुराल अब बहुत पास आ गयो है— उसको सुन्दरता देखनेके लिये अपनी आँखें बिछाये रहो। उसमें जगह-जगह पर सुहावने सरोवर, वन, उपवन तथा स्त्रियोंके विहार करनेके लिये रमणीय वापियाँ बनी हुई हैं। "
इसके बाद ज्यों-ज्यों नल अपनी राजधानीके पास पहुँचने लगे, त्यों-त्यों बीचमें पडनेवाले स्थानोंको अपनी प्यारी पत्नी दमयन्तीको दिखलाने और उनका परिचय देने लगे। दमयन्ती भी उन स्थानों को भली भाँति देखती-भालती हुई चलने लगी। इसी तरह दोनों प्रिया-प्रियतमने बड़े आनन्दसे रास्ता पार किया और अपनी राजधानीके बिलकुल पास आ गये ।
(7) भारत का निषाध देश में स्वागत
उस दिन बडे ही शुभ मुहर्त्तमें निषध राजाने, सब बरातियों और नव-विवाहित वर-वधूंके साथ, नगर में प्रवेश किया । उस समय ऐसा मालूम हुआ, मानों देवराज इन्द्र युद्ध में विजय प्राप्त कर, अमरवती पुरीमे प्रवेश कर रहे हों। आगे-आगे वर-वधू श्रौर पीछे-पीछे सब स्वजनो तथा सेवक सैनिकों के साथ राजा नगरके भिन्न-भिन्न राजपथोसे होकर जाने लगे। उस परमं सुन्दर नगरको ऊँची-ऊँची अट्टालिकाओं को देखकर दमयन्तो को बडा ही हर्ष हुआ, उस समय तो उसके आनन्दकी कोई सीमाही न रही, जव उसने उस परम रमणीय और विशालं राजमंन्दिर में प्रवेश किया। राजमहल में वर-वधूका प्रवेश हो जानेके'बाद सब लोग जहाँ-तहाँ चले गये । नगरभरमें जगह जगह आनन्दक वधावे बजने आरम्भ हो गये । 'सारी' नगरीने आनन्दमयी मूर्त्ति धारण कर ली ।
(8) नल और दमयंती की प्रेम क्रीड़ाएं
राजकुमार नलने दमयन्तीकी सी सुन्दरी, सुशील, सदाचारिणो और विनयको मूर्त्तिके समान पत्नी पाकर अपने भाग्य की बार-बार प्रशसा की और उनके समान सब गुणोकी खान स्वामी पाकर दमयन्तीने भो अनमिल जोडी मिलानेवाले विधाताको बार-बार धन्यवाद' दिया ।
नगरके लोग और लुगाइयाँ भी नल और दमयन्तीकी यह समान जोडी देख, सौ-सौ मुँहसे हर्ष प्रकट करने लगीं। इधर नये विवाहित जीवनके आनन्द और प्रोतिमें लीन होकर नल और दमयन्ती को भी संसारकी सुधि भूल गयो । वे कभी तो मनोहर पर्वतके ऊपर क्रीडाके निमित्त चले जाते, कभी सुन्दर सुहावने वनमें जाकर तरह-तरहसे दिल बहलाते, कभी फुलवारियोंमें मौज बहार लूटते, कभी जल-क्रीडा में दिन विताते, कभी बागीचेमें जाकर पुष्प क्रीडा करते, - फूल तोड तोड कर' एक 'दूसरे पर उछालते अथवा उनके हार बनाकर एक दूसरेको पहनाते या मुकुट बनाकर एक दूसरेके सिरपर रख देते। इसी प्रकार वे दम्पती भिन्न-भिन्न स्थानोंमें भिन्न-भिन्न प्रकारसे सुख भोग करते हुए समय बिताने लगे । उनका यह आनन्द, यह सुख सौभाग्य- " यह प्रोति-विलास, यह रस तरङ्ग देख, माता पिताके हर्ष और आनन्दको सीमा न रही।
सुखके दिनों को यह स्वभाव है, कि वे हवाके परोंपर उडते चले जाते हैं—उनके बीतते देर नही लगती । 'नल' और दमयन्तीके विवाहके बाद कितनेही वर्ष इस आनन्दके साथ व्यतीत हो गये, कि कुछ मालूम ही नहीं पडा, कि ये दिन किधरसे आये और किधर चले गये ।
Comments
Post a Comment