नल और दमयंती भाग 03
लावण्यवती राजकुमारी दमयंती उस दिन राजोपवन में अपनी सखियों के साथ हास-परिहास कर रही थीं। वसंत की मंद समीर बह रही थी, आम्र-मंजरियों की सुगंध वातावरण में घुली थी और पुष्पों से सुसज्जित वाटिका मानो स्वर्ग का अंश प्रतीत होती थी। किंतु सहेलियों के बीच हँसी-ठिठोली करते-करते दमयंती के मन में एक अनाम व्याकुलता उठी। उन्होंने कृतक रोष प्रकट करते हुए सब सखियों को वहाँ से विदा कर दिया और स्वयं अकेली ही उपवन में विचरण करने लगीं।
धीरे-धीरे चलते हुए वे पुष्करणी के तट पर जा बैठीं। शांत जल में आकाश का प्रतिबिंब झिलमिला रहा था। तभी आकाश से एक दिव्य हंसों का जोड़ा उतरकर जल पर आ विराजा। उन हंसों की कांति स्वर्ण के समान दीप्तिमान थी। अचानक उनमें से एक हंस ने मनुष्य-वाणी में कहा—
“राजकुमारी दमयंती! नैषध देश के राजकुमार नल तुम्हारे ध्यान में निमग्न होकर प्रेमातुर हो उठे हैं। उन्होंने तुम्हें कभी देखा नहीं, परंतु मन की व्याकुलता से तुम्हारा चित्र अत्यंत सजीव रूप में अंकित किया है। वे रात्रि-दिन उसी चित्र को निहारते रहते हैं।”
दमयंती आश्चर्यचकित रह गईं। उन्होंने कौतूहल से पूछा,
“हे पक्षीराज! यह नल कौन हैं? वे कैसे दिखते हैं? उनका स्वरूप और स्वभाव कैसा है?”
सुवर्णहंस ने नल के तेजस्वी व्यक्तित्व, उनके शौर्य, धर्मनिष्ठा, सौंदर्य और विनम्रता का विस्तृत वर्णन किया। वह वर्णन सुनते-सुनते दमयंती का हृदय धड़कने लगा। उन्होंने अपनी दासी भल्लिका को चित्र-सामग्री लाने का आदेश दिया।
क्षणभर में वे चित्रांकन में तल्लीन हो गईं। उनके मन में जो रूप आकार ले चुका था, वही भूर्जपत्र पर उतरने लगा। कुछ समय पश्चात जब चित्र पूर्ण हुआ, तो सुवर्णहंस ने प्रसन्न होकर कहा—
“राजकुमारी! तुमने नल का स्वरूप अद्भुत कुशलता से उकेरा है। यही हैं नैषध के नल। तुम्हारी जोड़ी तो रति और मदन के समान शोभायमान होगी।”
दमयंती चित्र को निहारती रहीं, मानो चेतना ही विलीन हो गई हो। उसी समय भल्लिका धीरे से वह चित्र उठाकर महारानी चारुमती के कक्ष में पहुँची।
महारानी ने चित्र देखकर विस्मय से पूछा,
“भल्लिका! यह किसका चित्र है? यदि ऐसा रूपवान युवक मेरा जामाता बने, तो मैं अपने को धन्य समझूँगी।”
भल्लिका ने सारी कथा निवेदित की—
“देवी! राजकुमारी जब पुष्करणी के तट पर थीं, तब एक सुवर्णहंस आया। उसके वर्णन के आधार पर राजकुमारी ने यह चित्र बनाया। हंसों के अनुसार यह नैषध देश के महाराज वीरसेन और रानी वसुमती के पुत्र नल हैं। राजकुमारी मन ही मन उन्हें अपना पति स्वीकार कर चुकी हैं।”
महारानी ने गंभीरता से कहा,
“भल्लिका, यह चित्र दमयंती के कक्ष में रख दो और उसे मेरे पास भेजो।”
जब दमयंती ने आकर माता को प्रणाम किया, तो चारुमती बोलीं—
“पुत्री, तुम्हारे चित्र के अनुसार यह युवक तुम्हारे योग्य प्रतीत होता है। मैं महाराज से चर्चा कर शीघ्र ही तुम्हारे स्वयंवर की व्यवस्था करूँगी।”
दमयंती ने संकोच से कहा,
“माते, जब मैंने मन ही मन नल को वर लिया है, तो स्वयंवर की क्या आवश्यकता?”
चारुमती ने समझाया—
“पुत्री, स्वयंवर हमारी प्राचीन परंपरा है। इससे देश-देशांतर के राजाओं का आगमन होता है, पारस्परिक परिचय और राजनीतिक संबंध स्थापित होते हैं। संभव है कि वहाँ तुम्हें नल से भी अधिक योग्य कोई राजकुमार दिखाई दे।”
दमयंती ने दृढ़ स्वर में उत्तर दिया,
“माते, यह कदापि संभव नहीं। मैं नल के अतिरिक्त किसी अन्य को वरण नहीं करूँगी।”
उधर सुवर्णहंस नैषध लौटकर पुष्करणी में उतरा। नल तो पहले से ही उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। हंस ने मनुष्य-वाणी में कहा—
“कुमार! हमने दमयंती को तुम्हारा संदेश दे दिया है। वह भी तुम पर अनुरक्त है और मन ही मन तुम्हें ही अपना पति मान चुकी है। किंतु उसके पिता भीमसेन ने परंपरा के अनुसार स्वयंवर का आयोजन किया है। समय आने पर निमंत्रण अवश्य पहुँचेगा।”
अब विदर्भ में स्वयंवर की भव्य तैयारी आरंभ हो गई। भारतखंड के मध्य स्थित होने से वहाँ पहुँचना सभी राज्यों के लिए सुगम था। मद्रदेश से लेकर गांधार तक, केरल से कामरूप तक निमंत्रण भेजे गए। स्वयंवर के लिए एक नवीन नगर बसाया गया। चार सौ से अधिक प्रासाद निर्मित हुए। प्रत्येक प्रासाद के साथ अश्वशाला, गजशाला और पदाति-शाला बनाई गई।
गलीचे, रेशमी पर्दे, मणियों से जड़ी सजावट से नगर आलोकित हो उठा। प्रत्येक प्रासाद में सुंदर दासियाँ और बलिष्ठ सेवक नियुक्त किए गए। राजाओं के सम्मानार्थ रत्नजटित स्वर्ण-थाल सजाए गए। भोजनालयों में निपुण रसोइयों की नियुक्ति हुई, जहाँ विविध व्यंजन और मधुर पेय तैयार किए गए।
देश-देशांतर के राजा और राजकुमार आने लगे। स्वयं राजा भीमसेन प्रत्येक अतिथि का स्वागत करते, पंचआरती से उनका अभिनंदन करते और मंदार पुष्पों की मालाएँ उनके गले में डालते। वातावरण में उत्सव का उल्लास व्याप्त था।
इसी बीच तीनों लोकों में विचरण करने वाले देवर्षि नारद को जब इस अद्वितीय स्वयंवर का समाचार मिला, तो वे तत्काल देवलोक पहुँचे। इंद्रसभा में देवताओं की सभा चल रही थी। नारद ने प्रणाम कर कहा—
“देवगण! पृथ्वी पर विदर्भ की राजकुमारी दमयंती का स्वयंवर हो रहा है। उसका रूप ऐसा अनुपम है कि अप्सराएँ भी उसके सामने फीकी प्रतीत होंगी।”
नारद की वाणी सुनकर इंद्र और अन्य लोकपालों के मन में कौतूहल जागा। वे अपने दिव्य रथों पर आरूढ़ होकर विदर्भ की ओर प्रस्थान कर गए।
इधर नल और उनके चचेरे भाई पुष्कर भी स्वयंवर के लिए निकल पड़े। पुष्कर ने समस्त वैभव और सेना के साथ रत्नजटित रथ में यात्रा आरंभ की। वे भव्य आभूषणों और वस्त्रों से सुसज्जित थे।
परंतु नल का स्वभाव भिन्न था। वे केवल एक अश्व पर सवार हुए, साथ में एक और घोड़ा ले लिया। बिना किसी आडंबर के वे तीव्र गति से विदर्भ की ओर बढ़ चले। निरंतर घुड़दौड़ से घोड़े थक गए, उनके शरीर पर पसीना छलक आया। स्वयं नल भी श्रम से क्लांत थे। उनके वस्त्र धूल और पसीने से मलिन हो चुके थे।
किन्तु उनके मुखमंडल पर अदम्य तेज था—वह तेज जो बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि अंतःकरण की पवित्रता और प्रेम की अग्नि से प्रज्वलित होता है। स्वयंवर का निर्णायक क्षण समीप था, और नियति अपने महान अध्याय की रचना कर रही थी।
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