कथा नल दमयंती || 102. || राजा भीम को संतान प्राप्ति का वरदान
कथा नल दमयंती || 102. || राजा भीम को संतान प्राप्ति का वरदान विदर्भ नरेश भीम बेचैनी से चहल कदमी करते हुए सोच रहें कि भीम → काश ! हमारे कोई संतान होती । निसंतान रहना भी कितना कष्टकारी होता है। (तभी दमन ऋषि का प्रवेश होता है।) दरबारी → महर्षि दमन दरबार में पधार रहे हैं। राजा भीम → (राजा, सम्मान में खड़ा हो जाता है। उन्हें सामने देखकर दंड़वत प्रणाम करता है। ) महर्षि ! मेरा प्रणाम स्वीकार करें। मेरा अहोभाग्य कि आपके दर्शन हुए। अब मुझे पूरा विश्वास है कि मेरे दुख जल्दी मिट जाएंगे। दमनऋषि → उठोगे राजन ! तुम्हारा स्थान, यह नहीं उस सिंहासन पर है। बिना राजा के सिंहासन, का कोई महत्व नही होता। आप चले और उस पर बिराजमान होकर प्रजा के कष्टों को दूर करें। हे राजन ! परमेश्वर आपके काष्ट अवश्य दूर करेगा। राजा भीम → जैसी आपकी आज्ञा, ऋषिवर ! परन्तु कुछदिन सेवा का अवसर दें। दमन ऋषि → ठीक है राजन ! हम एक मास आपके राज्य में ठहरेंगे। पर हम मात्रशक्ति का सम्मान करते हैं। कृपया उन्हें हमारी सेवा से दूर ही रखें। आप समझ गए न राजन। राजा भीम → समझ गया महर्षि । आपकी से...
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