नल दमयंती कथा || आश्रय-लाभ

06 नल दमयंती कथा || आश्रय-लाभ

आश्रय-लाभ

नल ने पूछा, "हे विप्र कहिये, इसके बाद क्या हुआ? -- न रानी दमयन्तीने उस घोर वन में भटकती हुई और कौन-कौनसे दुःख उठाये ? उस बेचारीको, क्या कही आश्रय, मिला या नहीं ?".

ब्राह्मणने कहा, "भाई। जब वह भयानक राक्षसो दमयन्तौ - के सतीत्वसे शक्तिहीन होकर वहाँसे चली गई, तब दमयन्ती भो वहाँसे आगे बढ़ो। चलते-चलते उसे बडो प्यास मालूम होने, लगो, इसी समय दूर पर मृग जन देखकर उसने सोचा, कि - वहाँ कोई जलाशय है, पर ज्यों-ज्यों वह आगे बढती गई, त्यो 1 वह मृग-जल भी दूर भागता गया। इस प्रकार दौडती हाँफती हुई वह जब एक दम हैरान हो गई, तब आर्त होकर कहने... लगी, ―"यदि मैंने सच्चे मनसे- अपने गोल_ सतीत्वका पालन किया होगा और मेरी आत्मा एकबारगो शुद्ध और पवित्र होगी, तो अवश्य हो, अभी यहाँ जल उत्पन्न हो जायेगा। यह, 

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कह, उसने बड़े ज़ोरसे पृथ्वी पर पैर पटका | उसका पाद प्रहार होते ही पृथ्वी फाडकर जल निकल पडा - बडा मनोहर सरोवर सा पैदा हो गया । दमयन्तोने उसोका मधुर जल पानकर उसमें खान किया और अपनी थकावट तथा प्यास दूर को। थोडी देर तक उसी जलाशयके पास विश्राम कर, वह आगे बढो, परन्तु लगातार चलते रहने से उसके पैर काम नहीं देते घे, इसलिये वह हारकर एक बडके पेडको ठंढो छाया में बैठकर विश्राम करने लगी। इसी समय उस राइसे गुज़रते हुए कुछ पथिकोंने उसके पास आकर पूछा,– 'देवो' आप कौन है ? कहाँसे आयी हैं ? कहाँ जायेंगी ? इस तर‍ मनमारे, उदास मुँह किये, इस पेड़के नोचे क्यों बैठी हुई हैं आपका यह अलौकिक रूप देखकर तो यही मालूम होता कि, आप इस वट-वृक्ष पर रहने वाली कोई देवो है ।

“उन लोगोंको यह बात सुन, दमयन्तीने कहा, "भाइयो में देवो नहीं, तुम्हारी ही तरह हस्डो चमडेको बनो पु मानवी हूँ। मैं जातिको वणिक- कन्या हूँ ।' अपने स्वामो साथ-साथ पिताके घर चली जाती थी, कि रास्ते में मेरे स्वा मुझे छोडकर न जाने कहाँ चले गये । इसलिये भाइय पाकर मुझे तापस॑पुरको राह दिखना दो, तो बडी दया हो पथिकोंने कहा, "यहाँ पचिमको ओर' तापसपुर सूर्य अस्त हो रहा है, इसलिये हम आपको वहाँ तक प चाने में असमर्थ हैं। यदि आपको कोई आपत्ति न हो, "L तो ह

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माघ चन्तिये । जहाँ हमलोग रातको रहेंगे, वहीं आप भी सुखसे रात बितायेंगो ।”

तदनन्तर उन पथिकोंके सरदारने अपने साथियोंसे कहा, “भाइयो ! यह कोई महा दुखिया स्त्री मालूम होती है। प्रमे अपने साथ ले चलना चाहिये ।" यह कह, उसने दमयन्तीसे कहा, – “बेटी। मैं तुम्हें अपनी वेटोके समान मानता हूँ । इसलिये मेरे साथ चलनेमें आनाकानी न कगे।" यह कह, उसने दमयन्तोको सवारी पर बैठा लिया और अपने साथ ले चला । जब वे लोग अचलपुरमें भा पहुँचे, तब दमयन्तोके कहने से उन्होंने उसे वहीं छोड दिया । थको-माँदी दम यन्तोने एक बावलीमें जाकर हाथ पैर धोये और जलपान किया। वहाँसे आकर वह फिर वहीं बैठ रही, जहाँ पछिको ने उसे सवारीसे नीचे उतारा था। वहाँ बैठो-बैठी यह यही सोचने लगी, कि अब में कहाँ जाऊँ और क्या करूँ ? पर उसको समझमें कुछ भी न आया । इसी समय बहुतसी पुत्र नारियाँ उम्र बावलीसे जल लानेके लिये जाती हुई दिखाई पड़ीं। वे आपसमें राजा ऋतुपर्ण और रानौ चन्द्रयमाको र बढाई करती चली जाती थीं । पुर-नारियाँ दमयन्तो का यह भुवनमोहन-रूप देख, अचम्भे में आा गर्यो । उन्होंने पानी भर कर राजमहलमें लौटने पर रानी चन्द्रयशासे कहा, 'महा रानी ! आज इस नगर में एक अद्भुत रूपवती युवती आयो । बह अकेली चुप-चाप बावलीके रास्ते में बैठी हुई है। रास्तेमें उम्रका

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वह चन्द्रमासा मुख, कमलसे नेत्र, अनारकेसे दाँग मृणालको सी बाहु और सुन्दर सुडौल शरीर देख कर हम तियोंको भी मोह प्राप्त हुए बिना न रहा । ऐसा मालूम होता है, मानों वर्ग मे साक्षात् 'लक्ष्मो ही उतर आयी है"। एक बारे तो उसे देखकर हमें यही भ्रम हुआ, कि कहीं (आप को पुती) राजकुमारी चन्द्रवती हो तो यहाँ नहीं आयो ।”

यह अद्भुत बात सनतॆ हो कौतूहलवश रानीने उन्हें तत्काल उस रूपवतोको राजमहलमें ले आनेकी आज्ञा दी। रामोशा हुक्म पाते ही वे सब दमयन्तीके पास आकर कहने लगो, - '"हे देवी' तुम्हें अपनी पुत्री मानकर यहाँके राजाको पटरानो चन्द्रयशा देवीने तुम्हें अपने पास बुलाया है। इसलिये तुम अभी हमारे साथ चली और उनमे अपना सब हाल कह सुनाभो । यहाँ अकेलो क्यों बैठी हो ?”

यह सुन, दमयन्ती तुरंत उठ खडी हुई और उन स्त्रियोंके साथ चलकर थोडो ही देरमें रानी चन्द्रयशाके पास आ पहुँची एक दूसरो को देखते हो वे, न जाने क्या सोचकर, शङ्का और सन्देहमें पड गयो । दमयन्तीको यह 'शड़ा हुई, कि कहीं यह मेरी माता पुष्पदन्ताको बर्द्दन चन्द्रयशा हो तो नही है। उध चन्द्रयशाने सोचा, कि कहीं यह मेरो बहन पुष्पदन्ताको पुर्व दमयन्ती तो नहीं है इस प्रकारका सन्देह मनमें उत्पन्न हु सँहो, पर उसका भण्डाफोड नहीं हुआ। रानीने सोचा, वि यह मेरा कोरा भ्रम ही है, क्योंकि मेरी बहनको लडको ते


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| बडे मारो राजाके घर व्याही है, उसका ऐसा हाल कैसे होगा ? तो भी रानीने दमयन्तोको आते ही गलेसे लगा लिया और दमयन्तीने उसके पैरों पर गिरकर प्रणाम किया। उसे प्रेमसे उठाते और दुवारा छातोसे लगाते हुए रानी चन्द्रदशाने कहा, - "बेटी । आजसे तू मेरी पुत्रो चन्द्रवतीको सहेली बनकर यहीं रह । तुम दोनों को मैं एक समान मानूँगी और तुम्हें कोई कष्ट न होने दूँगी । तुम मुझे अपनो रामकहानो कह सुनायो ।”

यह सुन, दमयन्तोने सच्ची बात छिपाते हुए रानीसे भी घही बनावटी कथा कह सुनायो, जो उसने पथिकोंसे कही थी । इसके बाद उसने कहा, "महारानी ! आपको ओरसे जो प्रति - दिन दीन-दु खियोंको सदाव्रत बॅटता है, उसीका काम मुझे सौंप दीजिये । मैं प्रतिदिन अपने हाथों दीन-दुखियोंको सदा अस माँटा करुँगो 1 रानी चन्द्रयशाने उसकी यह बात सानन्द स्वीकार कर ली और उसे सदाव्रत बाँटनेका हो काम सौंपा। उस दिनसे वह प्रतिदिन सदाव्रत बाँटने लगो ।

जहाँ दमयंतोका डेरा था, उसके पास ही राजपथ था । उसी रास्ते एक दिन कुछ राजकर्मचारी एक 'चोरको बाँधकर लिये ज्ञाते थे । पयोंही उस चोरको दृष्टि दमयन्तो, पर पडीत्योंही ब्रह बढी दोनताके साथ चिल्लाने लगा, -"देवो ! मेरो रचा फ़रो । रवा करो।” उसकी यह करुणा-भरो वाणी सुनते हो दमयन्तीको उसपर दया आ गयौ । उसने चोरको बाँधकर ले जाने वाले कर्मचारियोंसे पूछा, "भाइयो! इस प्रादमीने कौनसा

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अपराध किया है ? उन्होंने कहा, "इसने राजकुमारी चन्द्रवती के गहनेको सन्दुकृचो चुराई है, इसलिये हम लोग इसे वध्यभू मिर्गे मारनेके लिये, लिये जाते हैं।" दमयन्तीने कहा, " अभी इस चोरको छोड दो । जब राजा तुमसे पूछेंगे, कि तुमने इसे क्यों नहीं मारा ? तब मैंही तुम्हारे तरफ से उन्हें जवाब दे दूँगी । यह सुनकर भी जब उन राजकर्मचारियोंने उस चोरको नहीं छोड़ा, तव दमयन्तोने कहा, –“इस चोरके बन्धन अभी खुल जायें ।” इतनी बात उसके मुँहसे निकलते ही उस चोरके बन्धन खुल गये और उसने निकल भागनेकी राह देखनी शुरू को, पर यह तमाशा देखकर इतने लोग वहाँ आ इकट्ठे हुए, कि उसे भागनेकी राह नहीं मिली। राजाको भी इस बातका पता चला । वे भी अपने मन्त्रियों आदिके साथ वहाँ आ पहुँचे भौ दमयन्तोमे कहने लगे, - "वेटो ! राजाओंका यह सनातन धर्म है, कि दुष्टोंका दमन और शिष्टोंका पालन करें । र्या ऐसा नहीं किया जाये, तो देश में बे तरह उपद्रव और उत्पात जा हो जायें, दिन दहाडे चोगे-डकैती होने लगे, प्रजाका नाश जाये और राज्यको सारी व्यवस्था उलट जाये। राजा प्रजासे अं धन करके रूपमें लेता है, उसको प्रजाको रचामें ही खर्च करण उचित है। जो राजा ऐसा नहीं करता, उसे बडा पाप होता i और उसका समस्त वैभव कुछ ही दिनो में लुप्त हो जाता है इसलिये यदि यह चोर छोड़ दिया आयेगा तो बडा भारी भन्या होगा और इससे लोग निडर होकर चोरी किया करेंगे।"

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दमयन्तोने कहा, – “महाराज मे भापको बात, मानती हूँ, पर जब यह मेरी आँखोंके सामने भा गया, तब मै इसे अका नर्मे हो कैसे मरने दूँ गो ? मेरा भईंन्तधर्म पालन करना किस 'कामको, यदि मैंने इसे मुफ्त फाँसी पडने दिया या घातकके हाथों, इसको गरदन कटने दो १९

इस प्रकार बडी देर तक राजा और दमयन्तो में बातें हुई, किचन्त में राजाको दमयन्तोके आग्रह के सामने हार मान लेनी पडी और उस चोरको छोड देनेका हुक्म जारी करना पडा । |सतियों और पतिव्रताओंको बात बडे-बडे राजा-महाराजोंको भी माननी पडतो है । छुटकारा पाने पर वह चोर भाकर दमयंतीके पैरों पर गिर पडा और बोला, – “देवी ! भाज - • आापको कृपासे मेरा नया जन्म हुआ। आपके इस दयामय व्यव हारके कारण मैं आपको अपनी मासाके हो समान मानता हूँ । यह कह वह आनन्दित चित्तसे अपने घर चला गया और उस दिन से वह प्रतिदिन आकर दमयंतीको प्रणाम करने लगा ।

- एक टिन दमयंतीने उससे पूछा, – “तुम कौन हो, यह मुझे ठीक-ठीक बतलाओ ।" उसने कहा, “में सापसपुरके वसन्त • नामक सार्थपतिका दास पिङ्गल हूँ । एक दिन में उनके यहाँ कुछ हीरे मोती चुराकर भाग आया । मार्ग में मेरे ऊपर भी लुटेरे टूट पड़े और सब कुछ लूट ले गये । दुष्टों को जानको हमेशा आकृत रहती है। वहाँसे भागा-भागा में यहाँ आया और राजमहल में नौकर बहाल हो गया । परसों में अकेला ही राजमहल में घूम


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रहा था, दूसरा कोई वहाँ नहीं था । इसी समय एक जग मोती जडो सन्दूकचो देखकर मेरे मुँह में पानी भर आया श्री मै उसे कोंख-तले दबाये हुये ले चला। इसी समय मुँह देखन भीतरका हाल जान लेने वाले राजाने मुझे देख लिया। उन्हों मुझे सिपाहियोंके सुपुर्द कर, उन्हें मुझे मार डालनेका हु दे दिया। इसके बाद किसी तरह मैने आपको देखा। आपने क्लृपाकर मेरी जान बचायो । यह तो आपको मालूम हो है आपके इस उपकारको मैं कभी नहीं भूलूँगा । भला अकार दया वर्षा करनेवालो देवी से कोई कब उऋण हो सकता है कहीं कोई उस मेघ-मालाके उपकारसे भी मुक्त हुआ है, वर्षाकालमें जल बरसाकर संसार भरके जीवोंके लिये अ प्रबन्ध कर देती है ? देवी । जिस समय आप तापसपुर से चु चाप चली आयी, उस समय सार्थपतिको इतना शो हुआ, कि उन्होंने खाना-पीना छोड दिया। श्रीयशोभद्रसूरि उन्हें और अन्यान्य लोगोंने धैर्य देकर शान्त किया | त सातवें दिन सार्थपतिनें भोजन किया ।

एक दिन सार्थपति सुवर्ण-रत्नादिककी भेंट लिये हुए को ला पुरीके कूवर राजासे मिलने गये। भेंट स्वीकार कर राजा उनका वडा चादर-सत्कार किया और उनका नाम वस श्रीशेवर रखकर उन्हें छत्र, चामर और दण्ड आदि राजचि दे दिये। इसके बाद कुछ दिन वहाँ रहकर वे तापसपुर लो पाये और बडे भानन्दसे वहाँका राज्य करने लगे। माता

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यह सब वैभव उन्हें आपको ही कृपामे प्राप्त हुआ । अब कृपा कर आप मुझे ऐसा उपदेश दें, जिससे मेरे सारे पाप कट बायें।” यह मुन, दमयन्तोने का,–“वहुत अच्छा। तुम चारित्र ग्रहण कर लो।" P

दूसरे दिन वहाँ पर दो मुनि आये। उन्हें शुद्ध अत्र जल खिला-पिला कर दमयन्तौने उनसे पूछा,-"महाराज कृपाकर कहिये, यह पिङ्गल चारित्र ग्रहण करने योग्य है या नहीं ? सुनियोंने कहा, “हां यह चारित्र ग्रहण करनेके लिये सर्वघा . - उपयुक्त पात्र है । "

तब पिंगल ने उन मुनियोंसे चारित्र ग्रहण करनेको इच्छा प्रकट की और वे उसे जिनमन्दिरमें ले गये । वहीँ उसे प्रवल्या भवलम्बन कराकर मुनि अपने स्थानको चले गये । दमयती वहीं रहने लगो । सारे नगरके लोग उसके पासर्यदायक कार्योंको देखकर उसको बढाई करते और उससे सदा प्रसन्न रहते थे। कोई उससे किसी तरह असन्तुष्ट नहीं होता था । उस को धार्मिकता, दयालुता और सहृदयताने थोड़े ही दिनोंमें षडों के सब लोगोंको उसका हितैषी बना दिया ।

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