नल दमयंती कथा || नल दमयंती वियोग
तीसरा परिच्छेद
वियोग
समय एकसा कभी नहीं रहता। जो कभी फूलोंको सेज पर सोते हुए कष्ट अनुभव करता है, उसे ही समय - एक दिन काँटों सरकंडों की सेजपर सुला देता है। जिन सिरों पर किसी दिन मुकुटु मणिकी ज्योति जगमगाती है, उन्हींपर एक दिन रास्तेकी धूल उड़-उड कर पडा करती है । जिन्हें सदा सेव- नासपाती खानेको मिलती है, उन्हें एक दिन वनस्पति भी मुहाल हो जाती है । इसीसे किसीने कहा है, कि - "किसीकी बनी रही है, किसकी बनी रहेगी ?”
राजा नल और रानी दमयन्ती भी आज उसी तरह समयके फेर में पड़कर जङ्गल पहाडोंकी खाक छान रहे हैं। अनेक नगर, ग्राम, नदी, पहाड पार कर वे जङ्गलोंकी शैर कर रहे हैं। जिन्हें सेजसे उठकर दो पग चलना भी पहाड़ मालूम पडता था, आज वे कितनी बडी मंजिल मार चुके है, " यह उनके चेहरे पर हवाईयाँ उड़ती हुई देखकर ही अनुमान में आ जाता है । उनके वह कुसुमसे कोमल शरीर और वह विषम कठिन विपत्ति देख, मनुष्योंकी तो बात ही क्या है, पशु-पक्षियोंके भी कलेजे फटने लगते थे। जब कभी वे लोग घूमते-फिरते हुए किसी बस्तीमे॑ पहुँच जाते, तब उन्हें पहचान कर लोग अनायास कह उठते थे,– “हाय ! विधाताका यह कैसा कठोर - विधान है कैसी विकट विडम्बना है। राजा नल, जो इस - भरतखण्डके आधे भू-भागके अधीश्वर थे, इस दशाको प्राप्त हो रहे हैं, इससे बढकर दुःखकी बात और क्या होगो ? निर्दयो दैव ! इन्होंने तुम्हारा क्या बिगाडा था, जो तुमने इनकी ऐसी दशा कर दी ? यदि यही हालत करनी थी, तो फिर पहले इतना ऐश्वर्य इन्हें क्यों दिया था ? पहले सम्पत्तिके सबसे ऊँचे शिखरपर चढ़ाकर, पीछे विपत्तिको गहरी खाई में डाल देना यह तुम्हारा घोर अन्याय है।
शापके भयसे जिस रानी दमयन्तुको सूर्य भी स्पर्श नहीं करता था, वह बेचारी आज यह विकट रास्ता कैसे तय करती होगी ? ओह ! धिक्कार है कूबरको जिसने अपने भाई और भाभीको इस तरह वनवास दे दिया। उसका कभी भला न होगा। उससे भला कितने दिन राज्य चलाया जायेगा ?"
इसी प्रकार दमयन्तीका सूखा हुआ चेहरा, थकी हुई देह और फटे-पुराने वस्त्र देखकर पुर-नारियाँ कह उठती थीं, "हाय ! हाय ! रानी दमयन्तीका यह हाल । शोक !! जब राजा नल जे से प्रतापी पुरुषको स्त्रीकी ऐसी दुर्दशा हुई, तब अन्यान्य साधारण नारियोंकी क्या बात है ? भला इस संसारमें ऐसा कौन है, जो कभी विपत्तिमें न पड़ा हो ? 'सबै दिन नाहिं बराबर जात ' । :
इसी तरह जहाँ कहीं के लोग उन्हें पहचान जाते, उनके मुँह से हाहाकार, शोक और सहानुभूतिसे भरे हुए शब्द निकल हो पडते थे। कहीं-कहींके लोग तो धन, धान्य, हाथी, घोडा तथा अन्यान्य आवश्यक सामग्रियाँ लिये हुए उनके सामने आते और वह भेंट स्वीकार कर भली भाँति किसी स्थानपर टिके रहनेको सलाह देते थे, पर नल, उनकी यह भेंट स्वीकार कर लेने को तैयार नहीं होते थे । वे कहने लगते, “प्यारे भाइयो ।, पहले भले ही तुम मेरी प्रजा थे, पर अब मेरा तुम्हारा भाईचारेका नाता है, क्योंकि यह राज्य अब मेरे छोटे भाई कूबरका है । इसलिये अब मुझे तुम्हारी भेंट लेने का कोई अधिकार नहीं है। आपको इस भेंटसे मुझे यह मालूम कर बडा हर्ष हुआ, कि आपलोग मुझपर इतना प्रेम रखते हैं, पर मैं इस भेंटको किसी प्रकार स्वीकार नहीं कर सकता। इसके सिवा में क्षत्रिय हूँ - अपने भुज-बलसे उपार्जित वस्तुको हो अपने व्यवहारमें लाना मेरा धर्म है। इस समय यदि में आपको ये चीजें ले लूँगा, तो यह भिक्षा ही कहलायेगी इसलिये में इन्हें सादर वापिस किये देता हूँ आपलोग मुझे क्षमा करेंगे। क्षमा,
इसी प्रकार सबको मीठे-मीठे वचनोंसे सन्तुष्ट कर वे आगे चल देते थे। बेचारे पुरुषगण, उनकी बातें सुन, निरुत्तर हो,
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. नल-दमयन्ती,
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शोक भूल गये हैं । तभी तो वे ऐसे उत्साहके साथ पैर बढाते हुए चले जा रहे है, मानों उनके आगे-आगे चतुरङ्गिणी सेना चल रही हो। सच है, जो बल पतिव्रता नारी में है, वह लाखों चतुरङ्गियो सेनाओंमें भी नहीं हो सकता । जब उनके आगे-आगे स्वय लक्ष्मी स्वरूपिणी दमयन्ती : चल रही है, तब उन्हें रोग, शोक, चिन्ता, दुःख और कष्ट क्यों व्यापने लगे ? स्त्रियोंको स्वामीको विपद् में कैसा करना चाहिये इसका उदाहरण रानी दमयन्तीने अपने अनु करणीय चरित्रसे भली भाँति प्रकट कर दिखाया है ।"
इसी प्रकार जहाँ-जहाँसे होकर वे दोनों जाने लगते, वहाँ वहाँके लोग उनके दुःखमें सहानुभूति प्रकट करते हुए इसी तरहके उदार विचार प्रकट करने लगते थे। इसी चलते-चलते वे लोग एक घने जङ्गल में पहुँच गये । उस समय थकी हुई दमयंतीके मुखड़े पर पसोनेकी - बूँदें मोतोको तरह चमकने लगों । यह देख, नलने सरल भावसे अपने वस्त्र से उसका पसीना पोंछ दिया इसी तरह चलते-चलते वह एक जगह थकावट और प्याससे व्याकुल होकर बैठ रही । तब राजा नल. पासके ही एक जलाशयसे पत्तोंकी दोनी बनाकर, उसमें जल भर लाये और दमयतीको हाथ-मुँह धोकर जल
नाथ । आप मेरे गुरु, पूज्य और स्वामी है । आप ऐसा काम कदापि न करें ।। कहाँ तो मुझे आपको सेवा करनी चाहिये, कहाँ आप ही मेरी सेवा करनेके लिये तैयार है ? - आप मेरी सेवा करेंगे, इससे मुझे बडा पाप लगेगा ।" दमयंतीको इन विनय भरी बातोंको सुनकर नल मन मारे रह गये और दोनों पति-पत्निने थोडी देर वहीं विश्राम किया। इसी तरह जब कभी दमयन्तीको 'भूख लग जाती, तब वे वनमें जाकर उत्तम और खादिष्ट फल, टँटकर ले आते और दमयन्तीको खिलाते थे। इसी तरह उस वनमें उन्होंने नाना प्रकारके कष्ट उठाते हुए भी पास-पास रहनेके कारण किसी प्रकारका कष्ट नहीं अनुभव किया । क्रमश सन्ध्याके बाद भयावनी रात्रि आ पहुँची । दोनों प्रिया-प्रिय तमने वहीं पतको शय्या पर शयन किया।
दूसरे दिन सवेरे ही उठकर वे फिर आगे बढे और उस वन को पार कर एक दूसरे वनमें घुसे। यह जङ्गल पहलेवाले जङ्गल से कही अधिक घना और भयावना था। इसमें वृक्षोंको ऐसी सघन श्रेणी थो, कि दिनको भी सूर्यको किरणें उसमें नहीं घुसने पाती थी । और बड़े विकराल विपधर सर्पोंका समूह फन फैलाये काट खानेको तैयार दिखलाई देता था इसी समय पूर्व दिशा में सूर्य उदय हो भाया और प्रकोश दिखलाई देने लगा। उसो भल्प प्रकाशके और दमयन्ती उस अङ्गलको राह पार करने लगे।
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प्राणेश्वर होकर भी उसे छोडकर भाग जाने को तैयार हूँ । हा विधाता तुम्हारा हृदय इतना कठोर है ! तुम इतने 'निर्दय हो ? सच पूछो, तो तुम पूरे जड हो । तुम्हारे हृदय दया, माया, प्रेम और सहानुभूतिका लेशमात्र भी नहीं है।" "
। इस प्रकार विधाताको दोषे-देकर नलने वनदेवताओंको संम्बोधन कर 'कहा, "हे वनदेवो । मेरो एक बिनती सुनो। - विधाता तो निष्ठुर हो ही रहे हैं, पर तुम लोग भी उन्होंको तरह निर्दय न हो जाना-मेरी प्राणप्यारी दमयन्ती पर दया करना । सदा ऐसी ही चेष्टा करना, जिससे दमयन्तीको दुःख न होने पाये। जब यह सवेरे सोकर उठे, तो इसे घर की रास्ता बतला देना, जिसमें यह व्यर्थ हो इधर-उधर न भटक्तीफिरे ।” यह कहते हुए राजा नल उठ खड़े हुए और फिर-फिर कै पोछे की ओर देखते हुए आगे निकल चले। थोडी ही देर में वे उस जङ्गलके बाहर हो गये; पर तुरत ही उनके जीमें कुछ खु-' र्टका हुआ और वे फिर लौट आये। उन्होंने सोचा,-" मैं तो छोडकर चला जा रहा हूँ, पर इस जगलमें बडे भयानक जीवहिंसक जन्तु रहते हैं। वें दमयन्तीको जान ले लें, तो भाखर्य नहीं । इसलिये उसे इस तरह रात में अकेलो छोडकर जाना ठीक नहीं। जब तक वह सोयी रहे, तब तक मुझे किसी नता कुष्में छिपकर बैठ रहना चाहिये और उसकी हिंसक जीव-जन्तुओंसे रक्षा करनी चाहिये । इसके बाद अब प्रात: काले. यह सोकर उठेगी, तब जिस रास्ते जाना चाहे, चली जायेगी।
यही सोचकर राजा नल एक लता-कुंजमें आकर बैठ गये । इसी समय दमयन्तीको देखकर फिर उन्होंने सोचा, –“श्रोह ! महान् आचर्य है | मेरे जिस अन्तःपुरमें सूर्यको भी पहुँच 6-17 नही थो, वहाँ अपने जीवनका बहुत बड़ा भार्ग बिता देने वाली दमयन्तोको इस प्रकार वनमें अकेली छोडकर भाग जाने को इच्छा करनेवाला पापी नल अब तक इस महापापको अग्नि में जलकर भस्म क्यों नहीं हुआ ? *
इसी तरह दमयन्तीको देख-देख कर नलके मनमें_नाना प्रकारके विचार उठते रहे । इसी तरह सोच विचार में उन्होंने - सारी रात जागते ही बिता दी । क्रमश रात बीत गयो, सवेरा हुआ। पूर्व दिशा में सूर्य निकल आया । पृथ्वीका वह सघन अन्धकार टूर हो गया, परन्तु नलके हृदय में न ज्ञान-सूर्यका उदय हुआ, न उनका, अज्ञानान्धकार ही मिटा | मानों सूर्यो दयके भयसे सब स्थानोंसे भाग कर उनके हृदय में ही अन्धकार - ने. अड्डा जमा लिया। वे दमयन्तो को वहीं मोयो हुई छोडकर एक ओर चल दिये । वेचारो दमयन्ती अपने प्राणाधारसे वि कुड गयो और 'सोया सो खोया' वाली कहावतके अनुसार उसने सोकर अपना सबसे बडा अमूल्य रत्न खो दिया ।
उस समय तक दमयन्ती घोर निद्रामें पडी सो रही थो । उसे सूर्योदय होनेका कुछ भी ज्ञान नहीं ।
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