नल दमयंती कथा || बंधु विरोध
दूसरा परिच्छेद
बन्धु-विरोध'
(1) निषध राज का वानप्रस्थ के लिए जाना और राजा नल को सिंहासन देना
इसी तरह कितने ही वर्ष बीत गये। दिन, महीना, वर्ष करते; करते कई वर्षोंका समय निकल गया धीरे-धीरे निषध-राजाका बुढापा आ पहुँचा। उनको इन्द्रियाँ शिथिल होने लगी- मस्तिष्क दिन - दिन दुर्बल होने लगा। राजकार्यसे उन्हें घृणा और विरक्ति होने लगी। उन्होंने सोचा, कि अब अपने को इस भंझट में रखना ठीक नहीं । अब मेरी अवस्था राज्य करनेकी नहीं - धर्माचरण - करनेकी है । क्रमश यह विचार दृढ होता चला गया और उन्होंने मन्त्रियों को सलाहसे एक दिन अच्छा मुहूर्त्त देख, राजकुमार नलको सिंहासन पर बैठा दिया और कूबरको युवराजको पदवी प्रदानको । इस प्रकार अपने राज्यकी यथो चित व्यवस्था करनेके बाद राजा निषध, चारित्र ग्रहण कर, वनमें तपस्या करने चले गये ।
पिताके वनमें चले जानेके बादसे राजा नलने अपने राज्यका रथ इस प्रकार कुशलता, चतुरता, नीति तंन्त्रता और प्रजाप्रियता के साथ चलाना आरम्भ किया, कि उनकी चारो ओर प्रशंसा होने लगी। उनके यश, तेज और प्रतापकी दिन दिन वृद्धि होने लगी। प्रजा उनसे सदा प्रसन्न रहने लगी। जैसे गरमीके दिन बीतने पर वर्षा ऋतुके नये-नये, मेघको देख कर सब लोगोंको आनन्द होता है, वैसे ही बूढे राजाके बाद इस नवीन राजाको पाकर सब प्रजाजन आनन्दित हो उठे । जैसे पानोके भारखे के हुए बादलोंको देखकर लोगों को बडो प्रसन्नता होती है, वैसे ही राजा नल, दिन-दिन लक्ष्मीकी अधिकतासे शोभा पाने लगे और अपने समस्त प्रियजनों और पुरजनोंको अधिकाधिक आनन्द देने लगे। अपने प्रतापरूपी अग्निमें शत्रुओंकी स्त्रियोंके मोतीके हारोंको भस्म करके, मानों उसो भस्मसे राजा नलने अपने महलोंपर सफेदी करवायी थी ।
जैसे कल्पान्तकालकी अग्नि समुद्रमें डूब जाती है, वैसे ही शत्रुओं की लक्ष्मी नलके खड्गरूपी जलमें डूब गयी । जैसे सूर्य सारे संसारमें अपनी किरणोंका प्रकाश फैला देता है, वैसे ही राजा नलने अपनी सत्ता पृथ्वीके आधे भाग पर बैठा दी। जैसे सब देवता इन्द्रकी अधीनता स्वीकार किये बैठे हैं, वैसे ही क्रमश: सब राजाओंने राजा नलको अपना अधिपति मान लिया। इस प्रकार राजा नलने पिताके समयसे अपने राज्यको कहीं अधिक उन्नति कर डाली और सर्व-सम्पत्ति सम्पन्न होकर सानन्द राज्य करना आरम्भ किया ।
(2) कूबर की नल के प्रति डाह पैदा होना
इधर उनके भाई कुबरके मनमें डाहको भाग धीरे-धीरे सुलग रही थी । वे सदा राजा नलकी बुराई करने ताक में लगे रहते थे। राजा नलको हरएक बातमें वे बुराई ढूँढा करते थे । क्या शिकार में, क्या भोजन में, क्या राजकाजमें, क्या राजनीतिमें, क्या क्रोड़ा - कौतुकमें - सभी कामोमें वे नलका छिद्रान्वेषण करनेको ही तैयार रहते थे। कूबर की यह कुंवासना और ईर्षा राजा नलसे छिपी हुई नहीं थी । वे अच्छी तरह पहचान, गये थे, कि मेरे भाईके मनसे मेरे प्रति डाह पैदा हो गया है। और मेरा इस सिंहासनपर बैठना, इसे फूटी आँखों भी नहीं सुहाता। परन्तु वे ऊपरसे यह बात प्रकट 'नहीं होने देते थे और पहले की ही भांति अपने छोटे भाईके साथ स्नेहमय व्यवहार करते थे। पर भाईकी यह सरलता भी कूबरको अच्छी नही लगती थी। वे इसी ताक में थे, कि कैसे इस राज्यको हडप कर जाऊँ ।
(3) कूबर की नल के बीच द्यूत क्रीड़ा
एक दिनकी बात है, कि राजा नल, दिल बहलानेके लिये अपने भाई कूबरके साथ जुआ खेलने बैठे। समयके प्रभाव से उस दिन, राजा नलके पाँसे बराबर उलटे पडते चले गये, हरबारी में, कूबरकी ही:, जीत होती चली गयी । क्रमश: राजा नल, जुए में नगर, ग्राम, क्षेत्र और अन्यान्य सम्पत्तियाँ हारते चले गये । इस प्रकार कृष्णपक्षको चन्द्रकलाको भाँति नलको सम्पत्ति लगातार क्षीण होती चली गयी । परंतु इस हारसे भी नल ने हिम्मत नहीं हारी- वे और भी जोश के साथ जुआ खेलने लगे। धीरे-धीरे राजा, नल अपना यथा सर्वस्व हार बैठे। इस समय दमयन्तीने वहाँ आकर कहा, "नाथ ! आप यह क्या कर रहे है ? आपको ऐसा करना कदापि उचित नहीं है। जुआ का खेल कोई अच्छा मनो विनोद नहीं है। महाराज ! आपकेसे श्रेष्ट पुरुष ही, यदि ऐसा आचरण करेंगे, तो फिर और लोगोंकी क्या बात है ? उन्हें फिर कौन उपदेश देगा ? यद्यपि आपको जुएका बहुत पुराना शौक है, तथापि आजका खेल, तो और दिनोंको अपेक्षा कुछ और ही ढंगका दिखलाई देता है। मुझे तो ऐसा मालूम पडता है, कि इसका कोई बुरा परिणाम होने वाला है। यह तो साफ़ ही अशुभ सूचक मालूम पडता है, कि आपकी बाजी हर दाँवमें मात होती चली जाती है । अब भी, पाँसे फेंक-फाँक कर अलग हो जाइये । अव दाँवपर लगने योग्य आपके पास रह ही क्या गया है, जो अब भो जोंक को तरह खेलसे चिपके हुए है ? अब तो आप अपना सर्वस्व हार चुके। इसलिये, चुपचाप युवराज कूवरको राज्य सौंप कर कहीं चले चलिये, नही तो बेइज्जती के साथ इस राज्यसे निकाल कर बाहर कर दिये जायेंगे ।दैवयोगसे जो होना था, वह तो हो ही गया, अब अधिक अपमान सहन करने का क्या काम है ? जो हो गया, उसी पर सन्तोष कीजिये - अब राज्य वापिस मिलनेको आशा से फिर पाँसे फेकनेको इच्छा न कीजिये ।"
(4) नल का बार-बार हारना और दमयंती वह राज मंत्रियों के द्वारा समझाया जान
इस प्रकार -दमयन्तोने नलको बहुतेरा समझाया बुझाया, पर उन्होंने उसकी एक न सुनी, - तब दमयन्तीने अन्यान्य अच्छे-अच्छे लोगोंसे भी राजाको बहुत कुछ कहलवाया, परन्तु 'जुएका भूत सिर पर सवार होनेके कारण नलने उन लोगोंकी बातें भी अनसुनी कर दीं और फिर उत्साहके साथ खेलने लगे ।
विधाता जब प्रतिकूल हो जाते है, तब मनुष्यको बुद्धिका दिवाला निकल जाता है । यही हाल राजा नलका भी हुआ । उन्हें किसीका हितोपदेश अच्छा नहीं लगा । वे जुआं खेलते ही चले गये । जैसे प्रातःकाल होते ही चन्द्रमा चाँदनीके साथ-साथ समस्त नक्षत्रोंको भी खो देता है, वैसे ही राजा नल अपनी प्राणप्यारी पत्नी और सब मन्त्री पारिषदोंको भी हार बैठे। शरीर परके वस्त्र और आभूषण भी दाँव पर लग गये । इनके पास अब अपना कुछ भी नहीं रहा । " अबके कूबरने तेवर बदले और पैशाचिक आनन्दसे प्रफुलित होते हुए नलसे कहा, "भाई साहब! अब आप शीघ्र ही इस नगरको छोडकर जहाँ जी चाहे चले जाइये । पिताके दिये हुए राज्यको आपने इतने दिन भली भाँति भोगा, अबके मेरो बारी है। मैंने आपसे सब कुछ जुए में जीत लिया। यह मेरे बापका धन नहीं, मेरा निजका उपार्जित धन है । इसमें आपका कोई हिस्सा नहीं, इसलिये आप अब यहाँसे शीघ्र ही चले जाइये, जिससे मुझे राज्यको बागडोर अपने हाथ में ले लेनेका मौका मिले ।" ',
(5) कोहबर द्वारा राजा नल को देश निकाला और दमयंती को अपने पास रोकने का प्रयास
कूबरकी यह बात सुन, राजा नलने झुंझलाते हुए कहा, "कूवर तुम इतना घमंड क्यों करते हो ? राज्य पा लेना कोई बडी बात नहीं है। जिसकी भुजाओं में बल है, वह अनायास राजलक्ष्मीको प्राप्त कर सकता है। मुझे अपने हाथ से निकल कर तुम्हारे हाथ में राज्य चले जानेका तनिक भी दुःख नहीं है । मैं अभी यह नगर छोड़े देता हूँ। तुम रहनेको कहते, तो भो में यहाँ नहीं रहता।"
यह कह, राजा नल केवल एक धोती पहने हुए वहाँसे चल निकले। उनके पीछे-पीछे दमयन्ती भी चली। यह देख, कूबरने कहा, “सुन्दरी ! भला तुम कहाँ जा रही हो ? तुम्हें तो मैंने जीत लिया है। इसलिये तुम कदापि नलके पीछे पीछे नहीं जाने पाओगु। तुम्हारा उनका अब कोई सम्बन्ध नहीं है। साथ जानेको बात तो दूर रहे, तुम्हें अब उनका स्मरण करना या मुँह देखना भी मुहाल हो जायेगा।"
देवरके ऐसे कठोर वचन, राज्य-नाशसे भी न घबरानेवाली दमयन्तीका हृदय विदीर्ण हो गया और उसकी आँखोंसे अविरल अश्रुधारा बह चली। यह देख, सब लोग, जो इस बन्धु-विरोधका तमाशा बडी देरसे चुपचाप देख और नलको मूर्खता पर तरस खा रहे थे, बोल उठे,– “युवराज' कूवर ! यह आप अच्छा नहीं कर रहे हैं। इससे आपको कदापि भलाई नही होगी। जैसे सिंहके पीछे-पीछे जाती हुई सिंहनीको रोकने वाला शृगाल मारा जाता है, वैसे ही राजा नलके पीछे पीछे जाती हुई दमयन्तीको रोक कर आप भी अपनी मौत को पास बुला रहे हैं। बड़े भाईको स्त्री माताके समान है । उन्हें रोक कर आपको कौनसा लाभ होगा ? आपके लिये यही उचित है, कि दमयन्ती देवीको प्रणामकर उन्हें नलके साथ ही रथ पर बैठाकर यहाँ से भेज दें। ऐसीं नहीं करनेसे आपको बड़ी बदनामी होगी। यदि आप हमारा यह कहना नहीं मानेंगे, तो आपकी बडो दुर्गति होगी।"
जब सब लोगोने इस प्रकार दृढ़ता के साथ कूबरको फटकारा, तब उन्होंने दमयन्तीको रथमें बैठाकर नलके साथ ही जाने को कह दिया । दमयंती को रथपर सवार देख, राजा नलने कहा, "कूबर'' मुझे तुम्हारे रथसे कोई प्रयोजन नहीं है ।"
कूबरने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। तब राजा नल दमयन्तो को आगे कर, आप उसके पीछे-पीछे पैदल चलने लगे। नल के चले जानेपर कूबरने बड़े ज़ोरसे दुन्दुभि बनवायी । उसे सुनते ही सारे नगरके लोर् हाहाकार कर उठे और, कूबरकों धिक्कार देने लगे ।
(6) नल का निषध देश छोड़कर जाना
राजा नलकसे प्रजाप्रिय राजाको खोकर प्रजा मानो अनाथ हो गयी । 'कूबरका स्वभाव बालकपनसे ही जैसा उग्र था और युवराजक हैसियत से ही उन्होंने प्रजाके साथ जिस तरह कड़ई के साथ वर्ताव किया था । उससे सभी लोग डर गये, कि 'अबके कूबरके राजत्व कालमें हमारा कल्याण नही होगा। यह अवश्यहीं हम लोगों को पीस डालेंगे। पर समय पाकर अवस्था में भेद होनेपर मनुष्यको स्वभाव बहुत कुछ बदल जाता है, इसी आशा पर प्रजा चुपचाप मन मारे रह गयी। उसने कूबर को तुरंत पाये हुए अधिकारको उलट देने को कोई प्रयत्न नहीं किया।
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