नल दमयंती कथा || नलका गुप्त-वास

नल दमयंती कथा || नलका गुप्त-वास

दमयन्तघको छोडकर आगे जानेपर नलको एक और बडा भारी जङ्गल मिला। उस जंगलमें एक बडा ऊँचा पर्वत भी था । उस पर्वतके वृक्षोंमें दार्वाग्नि लगी हुई थी, जिसकी ज्वाला चारों ओर फैल रही थी। देखते ही देखते सारा जङ्गल दावाग्निसे धधक उठा। जीव-जन्तु, जल-जलकर मरने लगे । उनके प्राण विदीर्ण करनेवाले हाहा - कार और क्रन्दन - स्वरको सुनकर नलको छाती फटने लगी। इसी समय उनके कानोंमें मनुष्यको सो आवाज सुनाई दी । यह सुनते ही वे उस शब्दको सोधपर लपकते हुए चले गये । पहले तो वे निश्चय नहीं कर सके, कि यह आवाज कहाँसे आ रही है, पर पीछे जब उन्होंने चुपचाप खडे हो, कान लगाकर सुना, तो फिर उसी आवाज में यह कातर ध्वनि पुन' सुनाई दो,– “हे ईच्क्षवाकु कुलके भूषण राजा नल ! तुम इस संसारके दीन-दुखियोंके रक्षक हो--दोन-बन्धु कहलाते हो। में इस दावाग्निमें जला जा रहा हूँ - मुझे कंपा करके बचालो।
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तेरी जातिका सहज स्वभाव है, कि जो तुम्हें दूध पिलाता है, उसे ही तुम लोग काट खाते हो ।" यह कहते ही कहते उस भयङ्कर विषधरके विष के प्रभावसे राजा नल कोयलेको तरह एकदम काले हो गये और खींचे हुए धनुषको तरह भुक गये उनको पीठ पर कूबड निकल आया । अपने शरीरंकी ऐसो हालत हुई देख, नलको अपने जीवनसे हो वैराग्य हो गया और उन्होंने सब कुछ छोड़कर धर्म करनेकी हो । मनमें ठाम लो । इसी समय जिस नागने उन्हें डँसा था, उसने. अपना नाग - रूप त्यागकर, दिव्य मूर्त्ति धारण कर लिया और नलके " सामने आकर कहा,–“बेटा नल! तुम अपने मनमें किसे लिये दु.ख पा रहे हो ? सर्पने तुम्हारी, जैसी भलाई की है; वैसी और कौन कर सकता है ? मैं तुम्हारा पिता निषध हूँ । पूर्व जन्म में व्रत अङ्गीकार कर, दुष्कर तप करते हुए, अन्तमें अनशन ग्रहण कर मैं ब्रह्म नामक पाँचवें देवलोकमें जाकर देवता हो गया । 
वहाँ अवधिज्ञास से तुम्हारे जुएके दुर्व्यसनका हाल जानकर में नागका रूप धारणकर, यहाँ, आया हुआ था । अभी तुमने जो कुछ चमत्कार देखा है, वह सब मेरी मायाके प्रभाव में ही उत्पन्न हुआ था। तुम यह कदापि नही सोचना, कि मैंने तुम्हारा पिता होते हुए भी तुम्हें ऐसा कुरूप क्यों बना दिया । इस बदले हुए रूप में तुम्हें कोई न पहचान सकेगा और तुम्हें शत्रुओंका जरा भी भय न रहेगा।  अभी तुम्हें इस संसारके बहुत कुछ सुख भोगने बाकी हैं, इसलिये तुम -

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अभीसे ससारसे विरक्त हो जानेका नाम न लो। जब, तुम्हारे व्रत अङ्गीकार करने का समय आ जायेगा, तब मैं स्वयं आकर तुमसे कह जाऊँगा । मैं तुम्हें यह श्रीफल और यह सन्दूकची दिये जाता हूँ। इन दोनों चीजोंको सदा -सब तरहसे – रक्षा करना । जब तुम्हें अपना पूर्वरूप धारण करनेकी इच्छा हो, तब इस श्रीफलको तोडकर इसमेंसे जो दिव्य वस्त्र निकलें, उन्हें पहन लेना। बस तुम पहलेकेसे हो जाओगे। फिर इस सन्दूकचीर्मेंसे हार, मोतो, अंगूठी आदि उत्तमोत्तम अलङ्कार निकाल कर पहन लेना।" यह कह, वे दोनों चीजें नलके हवाले करते हुए उन्होंने फिर कहा, "बेटा । तुम व्यर्थ जङ्गल - में क्यों भटक रहे हो। तुम जहाँ कहो, वहीं मैं तुम्हों पहुँचा दुंगा।" 

( यह सुन, नलने उनसे सुखमारपुर जानेकी इच्छा प्रकट को, । बस उसी समय उस दिव्य पुरुषने उन्हें उस नगरके फाटकपर लाकर उतार दिया। ज्योंही राजाने नगरको ओर मुँह फेरा,, त्योंही नगरके भीतरसे बहुत बडे कोलाहलको ध्वनि सुनाई दी। मानों सैकडों हजारों लोग एकही साथ "दौडो - दौडो - भागो-भागो" की आवाज़ लगा रहे हों और सारे नगरमें भगदड मची हो, ऐसा मालूम पडा। इतने में हाथी घोडों और बहुतसे मनुष्योंके दौडधूप करनेको भावान भी कामोंमें पड़ी । - यह सब सुनकर नलने सोचा, “भाई ! यह क्या बात है ' लोग भागो भागो और दौड़ो-दौड़ोको पुकार  क्यों मचा रहे हैं ? इस नगर में इस समय कौनसा उपद्रव जारी है

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'वे' ऐसा सोच ही रहे थे, कि इसी समय पर्वतके समान ऊँचा हाथी, सांक्षात् क्रोधकी सी मूर्त्ति बनाये, दोनों कनपटियोंसे, मद गिराता, झूमता-झामता हुआ आता दिखाई दिया। उस हाथी का वेग पवनको तरह किसीके रोके नहीं रुकता था रास्तेमें जो मठ, मन्दिर, मकान, खेत, बाग और बगीचे आदि मिलते थे, उन्हें वह अपने पर्वतकेसे भारी शरीरकी टक्करसे ढोता चलता था । लोग पीछेसे उसे भाले बर्क्षियों से गोदते, पीलवान् बड़े-बड़े अश लेकर उसके शरीर में गोद देते, पर वह किसीके रोकनेसे रुकनेवाला नहीं था । वह सबको दूर भगाता हुआ अपनी इच्छाके अनुसार आगे बढता चला जाता था । इसी समय नलने उस हाथी के पीछे-पीछे आते हुए राजा दधिपर्णको देखा । हाथीको इस तरह मतवाला होकर नगर का ध्वंस करते देख, राजा दधिपर्णने हाथ उठाकर ऊँचे स्वरसे कहा, – “भाइयो । जो कोई इस मतवाले हाथो का मद उतार कर वशमें ले आयेगा, उसे में अपनी समस्त सम्पत्ति दान कर दूँगा।” यह सुनते ही राजा नल उसे पकडने के लिये बड़े ज़ोरसे दौड़े। यह देख, सब लोग बड़े ज़ोर-ज़ोरसे कहने लगे, - - “अरे ओ कूबड़े । 'तू कहाँ चला जा रहा है ? भाग, जल्दी भाग - कहौं तूं पागल तो नहीं हो गया है ?" यह कह, लोगोंने 
उन्हें ऐसा दुस्साहसिक कर्म करने से भी 

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हाथीपर पंजा मारनेके लिये दौड पडता है, वैसेही राजा नल भी उस हाथीपर चढ़ दौड़े। सबसे पहले उन्होंने लाठी तान कर उस हाथो से कहा, “अरे ! क्या तू पागल हो गया है ? इस तरह स्त्रियों और बच्चोंको दुःख देनेसे तुझे क्या लाभ होगा ? जरा मेरे सामने तो आ, मैं तेरे स्वागत-सत्कारके लिये खडा हूँ।" यह सुनते ही वह हाथी नलपर टूट पड़ा। यह देखते हो नलने एक पत्थर उठाकर जोरसे उस हाथो को सूँडपर दे मारा। 
इसके बाद कभी इधर, कभी उधर, कभी सामने, कभी बांके तिरछे घुमाते हुए उन्होंने उस हाथो को खूब हैरान किया | कभी-कभी तो लोगोंको यह आशंका होने लगतो थो, कि अब के उस हाथीने नलको धर दबाया, पर जब उन्होंने देखा, कि राजा नल हर बार उस हाथीको धोखा देकर साफ़ बचकर निकल आते हैं, तब उन्हें बडा आचर्य हुआ । इस प्रकार घंटों की दौड़-धूपके मारे हाथी हैरान हो गया और घबराया हुआ इधर-उधर भागने लगा । नलने एक बार अपना वस्त्र उस हाथीकी ओर फेंका, पर ज्योंही वह हाथी उस वस्त्रको पकडनेके लिये लपका, त्योंही नलने उसे अपनी ओर खींच लिया। दूसरी बार वे ज़मीनपर लम्बे पड गये, पर ज्योंही हाथीने उन्हें सूंडसे उठाकर उछाल फेंकना चाहा, त्योंही वे उठकर भागे और हाथी उनके पीछे-पीछे दौड़ते-दौडते हेरान हो गया, पर वे उसके फन्दे में न आये। तीसरी बार फिर नलने अपना वस्त्र हाथीकी ओर फेंका और उसने ज्योंही अपनी "सूंड से उसे पकडनेके लिये बढायी, त्योहो वे उछलकर उसकी गरदन पर सवार हो गये।

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 इसी समय पीछे से आकर राजाके नौकरोने उनके हाथ में अंकुश और बन्धन पकडा दिये । 1 अंकुशकी लगातार मारसे नलने उस थके हुए हाथीको और भी हैरान कर डाला और उसके पैरोंमें, बन्धन डाल दिया। नलकी यह वीरता और चतुरता देख, लोग अचंभे में आ गये और परस्पर कहने लगे,—“यह कूबड़ा तो कोई मायावी देवता मालूम पडता है। इसने इस मतवाले हाथीको देखते-देखते अपने वश में कर लिया।" -

- तदनन्तर उसी हाथीपर बैठे हुए- राजा नल पास आ पहुँचे। उन्हें इस प्रकार उस हाथीको बकरे को तरह वंश में राजमहल लाते,देख, प्रसन्न होकर खिड़की पर बैठे हुए राजाने एक उत्तमोत्तम रन्त्रोंकी माला उनके गले में पहना दो । यह देख, सब प्रजावर्ग उन्हें धन्यवाद देने लगे और वाह-वाह करते नलके विजय-गर्वको सौगुना बढ़ाने लगे । इसके बाद उन्होंने उस हाथीको फीलखाने में लाकर बाँध दिया और तब राजा दधिपुर्ण से मिलने के लिये राजदरवारमें आये । उस समय बडी प्रसन्नता के साथ उन्हें उत्तमोत्तम वस्त्रालङ्कार इनाम दिये और उनका पूर्ण आदर-सत्कार करते हुए उन्हें सदाके लिये अपने पास रख लिया ।

दूसरे दिन, राजदरबार में सब दरबारियोंके साथ-साथ वह कूबड़ा भी आकर बैठ रहा । 


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उस समय राजा ने उससे कहा, – “भाई ! तुम कौन हो ?, तुम्हारा नाम क्या है ? तुम्हारो जन्मभूमि कहाँ है ? तुम्हारे भाई-बंधु कहाँ है और उनके नाम क्या हैं ? मैं तुम्हारी : गज-विद्या देखकर चकित हो गया हूँ ।" क्या तुम इसके सिवा और कोई विद्या भो जानते हो ?"

"यह सुन, कूबडेने कहा, "महाराज" मेरो जन्मभूमि कोमलापुरी में है। मेरे परिवारके सब लोग वहीं रहते हैं? में राजा नलका रसोइया हूँ । राजाने योग्य पात्र मानकर स्वय सब विद्याएँ मुझे सिखला दी थी । राजा नल पाक-शास्त्र में परम प्रवीण हैं। में भी उन्होंको कृपासे मब तरहके उत्तम पाक बनांना सीख गया हूँ। हम दोनोंके समान पाक-शास्त्र में निपुण मनुष्य इस संसारमें तीसरा नहीं है। 
राजा नल, अपने भाई कूवरके साथ जुआ खेलने में अपनी सारी सम्पत्ति हार बेटे और अपनी स्त्री को साथ लिये हुए वनमें चले गये । शायद वे मर गये हों, तो कोई आश्चर्य ‌नहीं । नलके जंगल में चले जाने और कूबर के ' किसी कलामें प्रवीण न होनेके कारण मैंने उनका "आश्रय छोड़ दिया और घूमता फिरता यहाँ भा पहुँचा हूँ ।"

नल राजाके मरनेकी बात कूबड़ेके मुँह सुनकर राजा दधिपर्कको बडा शोक हुआ वे रोने लगे। इसके बाद उन्होंने शास्त्र-विधि अनुसार राजा नलकी समस्त प्रेत क्रियाएँ कीं।

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- “निर्घृणानामलज्जाना, नि सत्वानां दुरात्मना,  नलचैव धुरीणत्व, सुप्तां तत्याजयत्प्रियाम् ॥ १॥

सुसामेकाकिन खिग्धा, विश्वस्ता दयितां सतीम् । रात गत किं न वने त्यक्त काम एव स भस्मसात् ॥ २॥ 


अर्थात् -- "इस ससारमें जितने निर्दय, निर्लज्ज और हृदय-हीन दुष्टत्मा हैं, उन सबका नल शिरोमणि है क्योंकि उसने अपनी सोयी हुई स्त्रीको अकेली छोड दिया था। हाय ! जिस समय उस दुष्टने उस प्रेममयी, विश्वासमयी और सती स्त्री को अकेली सोती छोड कर भागनेका विचारा, उसी समय वह जलकर खाक क्यों नहीं हो गया।

उस ब्राह्मणके मुँहसे ऐसी बात सुनकर नलको आँखों में माँसू भर पाये और उन्होंने गदगद कण्ठसे उम्र ब्राह्मणसे कहा, "कैसा आश्चर्य है। तुम्हारा स्वर तो बडा ही मधुर और तुम्हारी बातोंसे करुणा टपकी पडती है, जिससे मेरो आँखों में आँसू भर आये हैं। तुम कृपाकर यह बतलाओ, कि तुम कौन हो और कहाँसे आये हो? नलको ऐसी दुर्बुद्धिकी बात तुमने कहाँ सुनी ?"

'बातें बनाने में चतुर' ब्राह्मणने कहा, "मैं कुण्डिनपुरसे चला आ रहा हूँ।' वहीं मैंने 'नलकी इस" मूर्खताको बात सुनी है।" 

कूबड ने कहा, "दमयन्तीको छोडकर राजा, नलके भाग जाने तककी कथा, तो में भी सुन चुका हूँ. पर पति के वियोग होनेके बाद दमयन्तोका क्या हाल हुआ, यह मैं नही जानता ।
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इसलिये कृपाकर मुझे वह सब समाचार सुना दो।" यह सुन, उस ब्राह्मणने कहा, "हे कूबड़े । सुनो। जब राजा नल दमयन्ती को छोडकर चले गये, तब सवेरा हो चुका था, पर उस समय तक दमयन्तीको नींद नहीं टूटी थी । उसी समय दमयन्तीने सपना देखा, कि वह फलके भारसे झुके हुए एक आमके पेड़पर फल तोडकर खानेको, इच्छासे चढ़ो हुई है । उस पेडपर मोर बैठे शोर कर रहे है और भौंरे मधुर स्वरसे गूँज रहे हैं। इतनेमें अकस्मात् एक हाथी वहाँ आया और उस पेडको जड़ से उखाड डाला, जिससे वह, ज़मीनपर गिर पड़ी । इसी समय दमयन्तीकी नींद खुल गयी और वह व्याकुल होकर चारों ओर चकित नेत्रोंसे देखने लगी । उसने देखा, कि उसके स्वामी उसे छोडकर न जाने कहाँ चले गये हैं । यह देख, उसने भय और घबराहटके साथ उन्हें चारों ओर दूँढना शुरू किया, पर जब कहीं उनका पता न लगा, तब हारकर हथेली पर सिर रखे हुई शोकपूर्ण स्वरमै कहनें लंगो―हाय ! आज दैव सोलह आने मेरे प्रतिकूल हो गया । महा भयानक सर्प, शृंगाल, सिंह, व्याघ्र, भालू, मतवाले हाथी आदि जानवरों से भरे हुए इस जङ्गलमें मेरे स्वामी मुझे अकेली छोडकर चल दिये ! नहीं, नहीं, वे कदापि मुझे छोडकर अन्यत्र नहीं जा सकते। वे अवश्य हो पासके किसी जलाशय में हाथ-पैर या मुँह धोने गये होंगे, अथवा मेरे लिये जल लाने चले गये होंगे। 

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हो सकता है, वही किसी विद्याधरीने उन्हें बोतोंमें फँसा रखा हो, अथवा मुझे 'छकानेके 'लिये दिल्लगी से जान-बूझ कर देर कर रहे हों। खैर, उठकर देखें तो सही, कि वे कहाँ कटके हुए हैं। यही सोचकर यह फिर उठी और चारों दिशाओ में उन्हें ढूँढने लगी, परन्तु उसे 'नल कहीं दिखाई न दिये । तब तो वह घोर निराशाके मारे ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी । वह कहने लगी, "हा" नाथ | हा स्वामिन् ! हा 'राजन् ! तुम कहाँ चले गये ।। जल्दी' चले आओ । तुम्हारै वियोगमें मेरा हृदय टुकड़े-टुकडे हुआ जाता है। बहुत दिल्लगी अच्छी नहीं होती। कहीं हँसी-और-दिल्लगी में मेरे प्राण न निकल जायें।" तुम्हारी दिल्लगीमें मेरी मौत हो रखी है । चिडियोंको जान जाये और लडकोंका तमाशा हो। इस कहावतको पूरा न करो। इस प्रकार नाना प्रकारके दीन वचनोंको कहती हुई, दमयन्ती चारों ओर रोती फिरी । अबके उसे अपने स्वनको बात याद आयी । उसने सोचा, कि सचमुच मैं वृक्ष से ही नही, 'एकदम आसमान से नीचे गिर पडी हूँ। मेरी यह विपत्ति आकांशसे पाताल में गिर पड़नेके ही समान है। अब मेरे प्राणपति इस जीवनमें मुझे नहीं मिलेंगे। यह बात मन में आते ही दमयन्ती मूर्च्छित होकर भूमिमें गिर पड़ी । बडी देर बाद मूर्च्छा टूटने पर वह फिर करुणापूर्ण स्वरमें हृदय विदारक रूदन करने लगी। वह कहने लगो, - "हे नाथ । हे स्वामी ! हे महाराज ! में क्या तुम्हारे सिरपर बोझ लादे हुए थी।
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जो तुम इस प्रकार घोर वनमें मुझे छोड गये - विवकी पुरुषका यह काम नहीं है, कि पाँच भाइयोंके सामने जिसको बाँह पकड़े, उसे यों जङ्गलमें भटकतो छोड दे । हे निषधेश । मुझे इस तरह परित्याग कर देनेमें तुम्हारा कोई अपराध नहीं है । सब अपराध मेरे खोटे भाग्यका है। जब मेरा दैव ही सब तरहसे मेरे प्रतिकूल है, तब तुम क्या करते ? मेरा भाग्य खोटा नहीं होता, तो तुम्हारे मनमें ऐसी दुर्बुद्धि: क्योंकर उत्पन्न होतो ? इसी तरह विलाप करती हुई दमयन्ती चारों ओर जंगलमें भटकने लगी। इसी समय उसको दृष्टि वस्त्रपर खूनके अक्षरोंमें लिखे हुए राजा नलके पत्रपर पडी । उस लिखावट को पढ़कर दमयन्ती बड़ी प्रसन्न हुई । उसने सोचा, कि इस पत्रद्वारा मेरे स्वामीने मुझे पीहर या ससुराल चले जानेकी आज्ञा दी है। वह जो सामने बडका पेड दिखाई देता है, उसीके बगलसे मेरे पिताके यहाँ जानेका रास्ता गया है । बस अब मुझे पिताकेही यहाँ चला जाना उचित है, क्योंकि पति-विरहिणी स्त्रियोंको बापके ही, घरमें रहना चाहिये । बिना पतिके ससुरालमें रहनेसे पद-पद पर तिरस्कार और लान्छना सहनी पडती है । यह सोचकर दमयन्तीने अपने पिता के नगर की राह ली । बेचारी अकेली सुकुमार नारी उस जङ्गल में चलती हुई पद-पद पर ठोकरें खाने लगी । पैरोंमें कुश-काँटे गडने लगे। उस बार पतिके साथ जङ्गलमें -रह-रहकर उसके जाते समय पतिका मुखचन्द्र देख-देख कर वह इन कष्टोंकी बात भी अपने मनमें नहीं आने देती थी। 

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अबके ये कष्ट उसे रह-रह कर पतिकी याद दिलाते हुए दुगुना दुःख देने लगे । उसके पैर काँटोंसे छिद गये उनसे लहू बहने लगा | सारे शरीर पर धूल छा गई । बिखरे हुए केश कन्धों पर झूलने लगे। इसी तरह वह चञ्चल नयनी और पति-विरहि, जो किसी दिन राजराजेश्वरकी पत्नी थी, एक साधारण भिलखारिनोकी भाँति जंगली रास्तेको तय करने लगी। उस सती नारीको देख, सिंह, व्याघ्र, भालू और सर्प आदि हिंसक जीव जन्तु दूर भागने लगे ।




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