नल दमयंती कथा || सती प्रताप

पाँचवाँ परिच्छेद

सती · प्रताप
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इतनी कथा सुनाकर, वह, ब्राह्मण सुस्तानेके लिये,थोड़ी देर चुप हो रहा । उसकी यह चुप्पी नलको बेतरह | खटकने लगी। उनका हृदय कौतूहलके मारे बल्लियों उछल रहा था और वे प्रत्येक क्षण यही सोच रहे थे, कि क्योंकर में शीघ्रातिशीघ्र इस ब्राह्मणके मुँह से सारी कथा सुन लूँ । इसी लिये उसे चुप देख, उन्होंने बडी घबराहटके साथ कहा, -

"हे विप्र । शीघ्र कहो, इस प्रकार नलको ढूँढ़ती और रोती बिलखती हुई दमयन्ती आखिरकार कहाँ जा पहुंची और उसे रास्तेमें किन-किन कठिनाइयोंका सामना करना पडा ?"

यह सुन, उस ब्राह्मणने फिर कहना प्रारम्भ किया, "इस - प्रकार उस जङ्गलमें अकेली भटकती हुई, दमयन्तीने सोचा, कि यदि इस समय कोई साथी मिल जाये, तो में उसके साथ-साथ इस गहन वनको पार कर अपने पिताके पास पहुँच जाऊँ । इसी समय उसने सामनेसे गाडी-घोड़ेके साथ बहुतसे आदमियोंको आते देखा । यह देख, उसे बडी प्रसन्नता हुई।

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इसी समय उस जन-समुदायमें डङ्का बजने लगा और लोग यह कह-कह कर चिल्लाने लगे, कि जो कोई चोर-डाकू यहाँ छिपा हो, वह भाग जाये, हम लोग. यहाँ सैन्य सहित आ पहुँचे हैं, पकडे जानेपर फिरः खैरियत नहीं होगी। पर इस धमकीकी जरा भी परवा न कर, जङ्गलों में फिरनेवाले डाकुओंने उस वन समूह पर धावा बोल ही दिया । यह देख, दमयतीने उन्हें बड़े ज़ोरसे ललकारा। उसको ललकार सुनते ही चोर वैसे ही भाग गये, जैसे, सिंहनीका गर्जन सुन कर सारे, मृग भाग खडे, होते हैं। यह अद्भुत कौतुक देख, उन वन रक्षकोंने सोचा, कि यह तो हमारी कुलदेवी ही साक्षात् उतर पडी है, तभी तो इन्होंने हमारी इन चोर-डाकुओं से। इस प्रकार रक्षा की है। यही सोचकर वे लोग दमयंती के पास आकर उसे प्रणाम कर पूछने लगे, – “हे महिमामयी देवी । तुम कौन हो ? और अकेलो इस वनमें: किसलिये घूम रही हो ? - यह सुन, दमयन्तीने उन लोगोंको अपनी सारी रामकहानी सुना दो। एक तो दमयन्तीने तुरत ही उन लोगोंको, चोर-डाकुओसे बचाया था,दूसरे,. उन्हें यह भी मालूम हो गया, कि वह राजा नलके से उदार नरपतिकी पत्नी है। इसीलिये वे बढी प्रसन्नता के साथ उसे अपने डेरेमें ले गये और--उसे बड़ेः आदरसे नहला-धुलाकर खिलाया पिलाया। इसके सिवा, उसके आराम और जिन-जिन वस्तुओंको आवश्यकता थी, उन्हें भी वे ले आये और दमयन्ती को देवी को तरह पूजा करने लगे। सब लोगोंने उसे माता या बहनकी तरह मानते हुए बडे आदरके साथ उसे अपने पास रखा ।

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इसी तरह दिन बीतते बीतते वर्षा ॠतु आ पहुँची। एक बार तीन दिनों तक लगातार दिन-रात " मूसलधार पानी बरसता रहा । धीरे-धीरे सब रास्ते बन्द हो गये । पानी और कीच के मारे आदमियों का ही चलना मुश्किल हो गया, फिर घोड़े-गाडीकी तो बात ही क्या है ? यह देख दमयंती ने सोचा, कि अब तो ये लोग चौमासे भर यहीं रुके रहेंगे- इनके साथ रहकर में कदापि अपने पिताके घर न पहुँच सकूँगी । यही सोचकर वह एक दिन रातोरात चुप चाप निकल भागी। जाते-जाते रास्ते में एक जगह उसने काले पहाडके समान विकट और भयावने, मेघ और बिजली का तिरस्कार करनेवाले शरीर और आँखों वाले, मनुष्यको हड्डियोंको माला पहने हुए भयङ्कर राक्षसको विकराल मुँह बनाये खडा देखा । दमयन्ती को देखते हो उस राचसने कहा, – “अरी । तू कहाँ चली जा रही है ? आ, मुझे बडी भूख - लगी है। आज तुझे हो खाकर अपनी भूख बुझाऊँगा ।" यह सुन, जरा भी घबराहट में न पडकर दमयन्तीने उस दैत्य से तुम मेरी बातें सुन लो । इसके बाद जो तुम्हारे जीमें आये करना । मैं अरहन्त परमात्मा की उपासना करने वाली हूँ-मुझे मरनेका कोई डर नहीं है । पर तुम जरा मेरी एक बात सुन लो । मेरा मन सदा पवित्र रहा है।

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ओर में निरन्तर पति देवताके ही स्मरणमें रहती हूँ । इस लिये तुम्हारी भलाई इसीमें है, कि तुम मुझे न छुओ । यदि तुम न मानोगे और ज़बरदस्ती मुझ सती पर-नारीका अंग स्पर्श करोगे, तो यहाँ जल कर राख हो जाओगे ।" यह सुनते हो उस राक्षसने कहा, – “देवी । मैं तुम्हारी बातें सुनकर बडा - ही प्रसन्न हुआ, इसलिये बतलाओ, कि मैं तुम्हारी कौनसी भलाई करूँ ?" राक्षसकी यह बात सुन, दमयन्तीने कहा, - "हे राक्षस । यदि तुम मेरे ऊपर प्रसन्न हो, तो कृपा कर यह बतलाओ, कि मुझे फिर अपने प्यारे पतिदेवके दर्शन कब प्राप्त होंगे ? यह सुनते ही अवधिज्ञानसे इस भविष्यको बात ? का विचार कर राक्षसने कहा, – “जिस दिन तुम्हारे पतिदेव तुम्हें छोडकर गये हैं, उस दिनसे ठीक बारह वर्ष बाद तुम्हारे पिताके घर पर ही तुम्हारे पति तुमसे आ मिलेंगे। इसलिये यदि तुम कहो, तो मैं अभी तुम्हें तुम्हारे पिताके घर पहुँचा दूँ। पतिके फिर दर्शन प्राप्त होंगे यह बात सुनकर दमयंतीके रोएँ रोएँ में-प्रसन्नता छा गयी । उसने कहा, – “भाई तुम जैसे -- हितैषीके साथ पीहर जानेमें भला किसे आनन्द नहीं होगा ? पर में तुम्हारे साथ वहाँ न जाकर किसी दूसरे आदमीके हो साथ चली जाऊँगी – तुम, जहाँ जो चाहे, आनन्दसे जाओ । 
परमाका तुम्हारा भला करे । तुम्हारी धर्ममें सदा मति बनी रहे। यह सुन, उस राक्षसने अपना दिव्य स्वरूप प्रकट कर दमयन्तीको दिखलाया और एक और की राह नापी ।
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अब तो दमयंतीको इस बातका पूरा निश्चय हो गया, कि बारह वर्ष बाद ही उसके स्वामी उससे आ मिलेंगे, इधर नहीं। इसलिये उसने रँगीले वस्त्र, ताम्बूल, नेत्राचन, इतर फुलेल आदि शृङ्गारकी वस्तुओंका बारह वर्षके लिये परित्याग कर दिया। इस प्रकारका व्रत धारण कर वह आगे चली । जाते-जाते वह सुन्दर स्वादिष्ट फलोंसे लदे हुए वृचोंसे शोभित एक मनोहर गुफाके पास जा पहुँची । " 'बरसांतके भयानक प्रकोपके मारे दमयन्तीने उसी गुफा में डेरा डाल दिया और शान्ति जिनेश्वरको मिट्टोको प्रतिमा बना, वृक्षों परसे आप हो आप चू पडनेवाले फूलोंसे उसकी पूजा करनी आरंभ की । वह प्रति दिन इसी प्रकार पूजा और ध्यानमें अपना समय बिताने लगी । धर्म और ध्यान रूपी अमृतके सागर में भजन रूपी स्नानकर आनन्दमें निमग्न रहनेवाली, चतुर्थ आदि तप का निरन्तर अनुष्ठान करनेवाली, वृक्षोंके फलोंका पारण करनेवाली एकान्त में अपने पूर्व जन्मार्जित पापका स्मरण करनेवाली और पञ्चपरमेष्ठीके नमस्कार मन्त्रोंका निरन्तर उच्चारण करनेवाली दमयन्ती उसी गुफा में पडी-पडी समय बिताने लगी ।

इधर वे वन-रक्षक दमयन्तोको चारों ओर खोज करने लगे, कि वह एकाएक कहाँ गुम हो गयी ? उन्हें इस बातकी चिन्ता बेतरह सताने लगी, कि वह दु.खमें है, या सुखमें। इसीलिये वे जी-जान से उस को खोज़ करने लगे। खोजते - खोजते उस गुफाके पास पहुँचकर उन्होंने जब देखा, कि दमयन्ती वहाँ बैठो प्रतिमा-पूजन कर रहो है, तब उन्हें बडी प्रसन्नता हुई।
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 वे दमयन्तीके पास आ, उसे प्रणाम कर चुप - चाप बैठ रहे। पूजा समाप्त होने पर दमयन्तो बडे आदरके साथ उनसे बातें करने लगी। वनरक्षकोंने पूछा, "देवो । तुम किस देवताको पूजा कर रही हो?" दमयन्तीने कहा, "मैं सोलहवें तीर्थंकरों ओशातिजिनको पूजा कर रही हूँ ।" इस प्रकार बडी देर तक उन लोगोमें वार्त्तालाप होता रहा । बातचीतको आहट पाकर पासके आश्रम में रहनेवाले तापस गण वहाँ आ पहुँचे। तदनंतर दमयन्तीने वन रक्षकोंको अहिंसा आदि धर्मोका उपदेश दिया। उसे सुनकर वे बडे प्रसन्न हुए और दमयन्तीको अपना गुरु मानते हुए, अरहंत धर्म अङ्गीकारकर अपने-अपने घर चले गये। जाते-जाते वन रक्षकोंके सरदारने कहा, “हे कल्याणी। पहले मेरा नाम वसंत था। आज धर्मकी सुगन्ध द्वारा तुमने मेरा वह नाम सार्थक कर दिया।”

इसी समय आकाश में मेघ गर्जन करने लगे। चारों दिशाओं में चञ्चल चपला चमकने लगी और मूसलधार पानी बरसने लगा । इस विकट वर्षाके कारण वहां रहनेवाले तपस्वियोंको वहाँ रहनेमें बडा कष्ट होने लगा। वे इसी घबराहट में पड गये, कि अब हम कहां जायें और क्या करें। 
ऋपियोंकी यह व्याकुलता देख, दमयंतीने कहा, – “हे तपस्वियो। जरा - भी न घबराओ।" यह कह, उसने एक लकड़ी उठाकर एक कुण्डकी ओर इशारा करते हुए कहा, - 'यदि मैं, सती होऊँ -- और कपट रहित होकर भक्तिके साथ अरहंतको पूजा करती होऊँ, तो दृष्टिका सारा जल उसी कुण्डमें पड़े।' 

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सतीका वचन सत्य निकला । सचमुच सब स्थानोंसे हटकर मेघ उसी कुण्ड मैं पानी बरसाने लगे । दमयंतीकी यह महिमा देख, सारे तपस्वी अपने मनमें सोचने लगे, – “यह तो अद्भुत शक्तिशालिनी वन-देवी मालूम पडती है।” साथही दृष्टिको प्रबलताको सती - के वचन सुनते हो कम हो जाते देखकर वे अपने धर्मको प्रबल साको निन्दा करने लगे और दमयंतीके बतलाये अनुसार ही धर्म का आचरण करनेको तत्पर हुए। वन-रक्षकोंने उसी स्थान पर एक नगर बसाया और वहाँ जिन-चैत्य तैयार करवा कर उसमें श्रीशांतिनाथको मूर्त्ति स्थापित की। धर्मका खूब प्रचार हो गया । लोग मन लगाकर भक्ति पूर्वक जिनेश्वरको पूजा करने लगे । इसके प्रभावसे वहाँ रहने वाले पाँच सौ तपस्वियों को सम्यकदृष्टि प्राप्त हुई । उसी समयसे उस नये नगरका नाम तापसपुर पड गया। इधर-उधर के हजारों आदमी वहाँ आकर बस गये। थोड़े ही दिनों में उस नगर में नींच-ऊँच सभी श्रेणीके लोग भर गये। वह नगर सब तरहको समृद्धियोंसे भरपूर हो गया । सब लोग अरहत-भाषित धर्मका पालन करने लगे। एक दिनकी बात है, कि आधी रात के समय पर्वतके शिखर पर सूर्यको ज्योतिको भी लज्जित करनेवाली एक ज्योति दमयंती में प्रकट होती देखी। 

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सुरासुर आदि गगन-गामी देव, उस 'ज्योतिको देख आश्चर्य में आकर आकाश मार्ग से उड़ते दिखाई देने लगे। उन लोगोंके कोलाहलमे तापसपुरकी सारी प्रजा ज‍ग पड़ी और उस ज्योतिको देख कर बड़ी विस्मित हुई। उस कौतुकको देखनेके लिये सभी तपस्वी वनवासी और स्वयं दमयंती भी वहाँ आ पहुँची । वहाँ पहुँचकर उन्होंने नवीन केवल ज्ञान प्राप्त करने वाले सिंहकेसरी नामक मुनिका महा ज्योतिर्मय स्वरूप देखा। उन्हें देख, सब लोग उन्हें प्रणाम कर उनके पास बैठ गये । श्रीयशोभद्रसूरि भी उन केवलीको प्रणाम कर अति प्रसन्न चित्तसे उनके पास बैठ गये। उस समय सिंहकेसरी मुनिने उन सब लोगोंको कर्म- मर्माविध धर्मका उपदेश करते हुए कहा, 

“हे भव्य जीवो। इस ससारमें जीवन, यौवन, लक्ष्मी, तीनों चौज़ें बड़ी ही चञ्चल हैं। यह सदा सब दिन एक सी नही रहती, इसलिये मोहमें पडे हुए हे प्राणियो। तुम इस उत्तम मनुष्य जन्मको व्यर्थ क्यों गवाँ रहे हो ? इस मनुष्य रूपी कल्पवृक्षका फल मुक्ति है। उसकी प्राप्ति के लिये तुम्हें हर तरह तैयार हो जाना चाहिये और मृग-त्रिष्णाका परित्याग करना चाहिये ।'

इस प्रकार उपदेश देकर केवलीने वहाँ बैठे हुए, तपस्वियों से कहा, - 'दमयंतीने तुम लोगोंसे जिस धर्मका आचरण करनेको कहा, है, वही सत्य धर्म है। सत्यके अनुसार दमयंती की वाणी परम पवित्र है। यह परमं सती है।

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यह कभी असत्य वचन मुँह से नहीं निकाल सकती । इसलिये तुम लोग इसकी बातोंपर पूर्णतया विश्वास रखो, देखो इसने बात की बात में चोर डाकुको दूर भगा दिया, आकाशकी वृष्टिको कुण्डमें सोमावद्ध कर दिया और रीछ, व्याघ्रं और सर्पादिंसे भरे हुए इसे जङ्गल में अकेली निर्भय विचरण कर रही है। सतीके सतीत्वका यह प्रभाव देखकर, तुम्हे इससे उचित शिक्षा ग्रहण करनी चाहिये ।"

“केवलीकी यह आनन्द-दायिनो बात सुनकर तपस्वियोंके कुलपंतिने कहा,–“हे महाराज। आप मुझे साधुव्रतमें दीक्षित करें दीजिये ।” 

सिंहकेसरीने कहा,–“सब आचार्यो में महाबुद्धिमान् श्री यशोभद्रसूरि ही श्रेष्ट है, इसलिये ये ही तुम्हें श्रमणोका व्रत ग्रहण करायेंगे । ये मेरे भी गुरु हैं। "

कुलपतिने कहा,—“हे भगवन् । आपने इस तरुण वय॒स - में प्रवन्या क्यों अङ्गीकार कर ली ? इस बात से मुझे आश्चर्य हो रहा है। 

यह सुन सिंहकेसरीने कहा, “कोसला नामक नगरीमें नल नामके एक राजा थे।' उनकी ही स्त्रीका नाम दमयन्ती है | इन दिनों वहाँ नलके छोटे भाई कुंबर राज्य कर रहे हैं। मैं उन्हींका पुत्र सिंहकेसरी हूँ । शृगापुरीके राजा केसरीकी पुत्रीके साथ विवाहकर में अपनी नगरोंको ओर लोटा जा रहा था। इस समय इस पर्वतके शोभायमान शिखरोंको देखकर मैं यहाँ विश्राम करनेके लिये ठहर गया ।

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सौभाग्य वश, मुझे गुरुवर श्रीयशोभद्रसूरीके दर्शन प्राप्त हुए । इन्होंने मुझे यह देशना सुनाई, कि यह संसार अनित्य है । मैंने इनसे पूछा, कि मैं कितने दिन संसारमें जीऊँगा? उन्होंने कहा, कि तुम्हारी आयुके केवल पाँच दिन शेष रह गये हैं । मृत्युकी 'घडी सिरपर आयी देख, मेरे "चेहरेका रंग फीका पड गया । इसी समय सारे ससारकें जीवोंपर अत्यंत दया रखने वाले श्री यशोभद्र सूरिने कहा, कि एक दिनके लिये व्रत ग्रहण करने से भी मनुष्य जन्म मरणकें भयसे छूट जाता है, तुम्हारे तो अभीआयुके पाँच दिन बाकी हैं, इसलिये तुम समस्त भये और चिंता का त्याग कर व्रत ग्रहण कर लो । गुरुका यह वचन सुनते ही मैंने अपनी बन्धुमती नामक स्त्रीका परत्यिाग कर, गुरुसे पाँचों महाव्रत ग्रहण किये और गुरुसेवामें तत्पर रहते हुए इन्हींकी आज्ञासे इस गिरी-शिखरपर निवासकर कायोत्सर्ग-ध्यानमें लीन हो, समस्त घाती कर्मोका क्षयकर, लोकालोकको प्रकाशित करने वाला यह केवल ज्ञान प्राप्त किया है ।

'यह कह, वे फिर ध्यानमें लोन हो रहे । तदनंतर मुनोश्वरने योग-निरोधकर, शेष आघाति कर्मोंका भी छेदन कर, परम पद प्राप्त कर लिया। उनके शरीरका पुण्यवान् देवताने अग्नि संस्कार किया । कुलपतिमे उनके आज्ञानुसार गुरुवर श्रीयशो भद्रसे साधुओंके योग्य पंच महाव्रत ग्रहण कर लिये ।।

इसी समय दमयंतीने भी उनसे चारित्र ग्रहण करेनेकी प्रार्थना की। 

60.

यह सुन, गुरुने कहा, – “तुम चारित्र ग्रहण करना -- चाहती हो, यह बड़ी अच्छी बात है; पर देवी ! अभी तुम्हें इस संसारके बहुत कुछ सुख भोगने बाकी है, इसलिये तुम्हें अभी दीक्षा नहीं लेनी चाहिये ।" यह कह, वे दमयंतीको उसके पूर्व जन्मको कथा सुनाने लगे। उन्होंने कहा, 

. "पूर्व जन्म में राजा नल मन्मण नामक राजा थे । तुम्हीं - उनकी रानी थीं और तुम्हारा नाम वीरमती था। एक समय की बात है, कि तुम-दोनों सेना समेत शिकार खेलने गये । कुछ दूर जाने पर तुम्हें एक मुनि दिखाई दिये । उन्हें सामने मे आते देख, तुम्हारी,सेनाके सिपाहियोंने अपशकुन समझकर उन्हें आनेसे रोक दिया। बेचारे बड़ी देर तक वहीं खडे रहे। यह देख, तुम्हें दया आयी और तुमने पूछा, कि महाराज । आप कहाँ जा रहे है। तुम्हारे इन विनय भरे बचनोंसे मुनि को सन्तोष तो अवश्य हुआ, पर तुम्हारे, सैनिकोंने जो उन्हें बारह घण्टों तक रोक रखा, उसी दोषसे इस जन्म में तुम दोनों पति पत्नी को बारह बर्षके लिये वियोग हुआ। बारह वर्ष पूरे होने पर तुम दोनोंका, फिर मिलाप होगा और तुम्हारे समस्त नष्ट वैभव पुनः प्राप्त होंगे ।” 

इसी तरह, बातें करते हुए रात बीत गई। प्रातःकाल हो आया, सबके साथ गुरु यशोभद्रसूरी भी तापसपुर में आये । यहाँ आकर उन्होंने जिनेश्वरके मन्दिरकी प्रतिष्ठा की और समस्तनगर वासियों को शुद्ध देशना सुनाई । उसी गुफामें दमयन्तीने सात वर्ष बिता दिये । 
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तदनन्तर एक दिन उस गुफाके द्वार पर आकर एक पुरुषने अमृतमयी वाणोंमें दमयन्तीसे कहा, - “हे भद्रं । मैंने तुम्हारे पतिको पासके हो एक स्थान में देखा है। वह स्थान यहाँसे बहुत दूर नहीं है। मैं उन्हें पहचान लेना चाहता हूँ, पर 'दूसरा कोई मेरे साथ नहीं है, इसलिये लाचार हूँ। यह कह, वह पुरुष वहाँसे तुरत पीछे लौट चला। उसकी कानोंको आनन्द देने वाली बातें सुन, दमयन्ती जल्दी-जल्दी पैर उठाती हुई उस गुफाके बाहर निकली और उस पुरुषके पीछे-पीछे दोडी। उसने लाखे चिल्ला-चिल्लाकर पुकारा, पर वह पुरुष क्षण भर भी न ठहरे और झपाखटेके साथ आगे बढता ही चला गया। इसी समय अन्धाधुन्ध चलती हुई दमयंतीके पैरों में ठोकर लग गयी और वह जड़से उखडी हुई लता को तरह भूमिमें गिर पडी। इतने में वह पुरुष एकबारगी उसकी दृष्टिके परे हो गया। थोडी देर बाद अपनेको सम्भाल कर दमयंती उठ बैठी और फिर गुफाको ओर लौटने लगी, पर रास्ता भूल जानेके कारण वह उस गुफा तक नहीं पहुँच सकी। इस प्रकार दोनों ओर से निराश हो, वह बडी दुखित हुई और उस घोर जङ्गलमें इधर उधर भटकने लगी। तब वह लाचार हो हाहाकार करती हुई कहने लगी,-"हाय । दुर्देवने मुझे क्या क्या दुख नहीं दिखाये ? हा देव । तुम्हारा मैंने क्या विगाडा है, जो तुम इस तरह मुझे पद-पद पर दुःख दे रहे हो ? न तो वह आदमी ही दिखाई देता है, न मेरो गुफा हो नजर आती है।

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अब मैं क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? इस घोर वनमें अकेले में भटकती हुई मुझ अबलाका क्या हाल होगा ? मेरी कोनसी गति होनी बाकी है ? इस दुःखसे तो मर जाना ही अच्छा है। प्राण ! तुम इस दुःखसे भरे हुए तन-पिंजरेको छोड़कर उड - क्यों नहीं जाते, जिससे तुम्हें सुख तो मिले ।" इस प्रकार, करुणा पूर्ण-वचन बोलती हुई दमयंती व्याकुल होकर रोने लगी । इसके बाद; वह फिर चलने लगो, पर रह-रहकर उसके पैर रुक जाते और वह पछाड, खाकर जमीन पर गिर पडती और फिर रोने लगती थी। वह इसी तरह घोर दुःखको अवस्था में पडी हुई भटक रही थी, कि इतनेमें, एक राक्षसीने, उसके पास आकर कहा, अरी। कहाँ चली जा रही है, ठहर, मैं तुझे अभी सफाचट किये, डालती हैं । उसको यह-भय-दायनी बात सुन दमयंती, डरके मारे थर-थर काँपने लगो; पर, तुरंत ही उसे ढांढस हो आया और उसने बड़े, ज़ोरसे, कहा, 'यदि, सिवा नलके,मेरे मनमें कभी किसी पर पुरुषका ध्यान नहीं आया हो, अरहत, देवको में शुद्ध मनसे, मानती होऊ, मेरे गुरु उत्तम साधु हों और जैन धर्ममें मेरी अविचल रति: हो, तो इस राक्षसीके सारे मनोरथों पर अभी पाला पड जाये ।' दमयंतीके-मुँहसे ये वचन निकलते ही उस राक्षसीको सारी शक्तियाँ होम हो गयीं और वह दमयंती को प्रणामकर, वहाँसे जान लेकर भागा गयी । सच है, सतीके, प्रतापके सामने कोई नहीं ठहर सकता।



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