कथा नल दमयंती || 22. || नल और दमयंती का पूर्व जन्म

आपका ॐ जितेंद्र सिंह तोमर द्वारा लिखित हमारी सीरीज बागवान काका में एक बार फिर से स्वागत है । इस भाग में हम जानेंगे कि नल और दमयंती पूर्व जन्म में क्या थे? जब तक हम यह नहीं जानेंगे तो कथा समझने में कुछ नहीं कुछ कठिनाई रहेगी ही। इस कहानी में हम आपको नल और दमयंती के पूर्व जन्म की कथा सुनाने जा रहे हैं। मुझे आशा है कि आपको यह कथा सीरीज बहुत पसंद आएगी।

नल और दमयंती का पूर्व जन्म 

श्री शिव महापुराण के अनुसार अर्बुदांचल पर्वत के समीप भील वंश में आहुक नामक एक भील अपनी पत्नी आहुका के साथ निवास करता था। दोनों एक दूसरे से अथाह प्रेम करते थे। आहुका परम सुन्दरी, बड़ी पतिव्रता तथा धर्मशील स्त्री थी।

"स्वामी सुना है भगवान जोड़े आसमान में ही बना देते हैं। शायद हमारा यह मिलन भी उसी नियति का फल हो।", आहूका ने अपने पति आहुक से कहा।

"सत्य वचन, देवी ! मुझे शास्त्रों पर पूरा विश्वास है। उसमें लिखा एक एक वचन सत्य है। हो सकता है इनको समझने में कुछ कमी रह जाए। फिर भी ऋषि-मुनियों का कथन कभी असत्य नहीं होता।" मुस्कुराते हुए आहुक ने उत्तर दिया।

दोनों पति-पत्नी भगवान शिव के अनन्य उपासक थे। वे हर समय शिव की उपासना में लगे रहते थे। इस कारण उन्होंने कभी भी अपने सुख सुविधा पर ध्यान नहीं दिया परंतु भगवान शिव तो बहुत दयालु हैं।

उन दोनों की कठिन तपस्या देखकर पार्वती जी को दया आ गई । वे भगवान भोलेनाथ से बोलीं, "स्वामी ! क्या यह दोनों भक्त इसी प्रकार दुखी रहेंगे?" भगवान भोलेनाथ ने उन्हें कोई जवाब नहीं दिया और मुस्कुरा कर उनकी ओर देखने लगे।

" प्रभु मेरे साथ-साथ अपने इन भक्तों पर भी मुस्कुरा कर कृपा दृष्टि कीजिए। इनके दुखों को दूर कीजिए। इनके जीवन में सुख समृद्धि लाइए।" माता पार्वती भगवान शिव से प्रार्थना की। इसके तुरंत बाद भगवान भोलेनाथ गायब हो गए। माता पार्वती भक्तों को भूल गए भगवान भोलेनाथ को खोजने लगी उन्हें लगा कि वह नाराज होकर अदृश्य हो गए हैं।

कुछ दिन बाद , एक दिन दोनों जैसे ही भोजन करने के लिए बैठे हैं वैसे ही, उनकी कंदरा पर एक याचक आया। भील ने याचक की विधिपूर्वक भगवान शिव की तरह ही पूजा अर्चना की और भोजन परोसा । 

याचक ने आहुक से कहा, "हे मानव श्रेष्ठ ! आप मुझ याचक के लिए इतना कुछ क्यों कर रहे हैं ? मैं एक साधारण व्यक्ति हूं, कोई देव नहीं।"

आहुक मुस्कुराया और बोला, " महाराज मैंने शास्त्र तो नहीं पढ़े परंतु ऋषि मुनियों से सुना है के अतिथि भगवान के समान होते हैं। अतिथि का वैसा ही सत्कार करना चाहिए। मेरे तो भगवान भोलेनाथ हैं इसीलिए मैं आपका उन्हीं की तरह पूजन कर रहा हूं क्योंकि आप इस समय मेंरे अतिथि हैं और भगवान भी।"

"हे मानव श्रेष्ठ ! आप कैसी बातें करते हैं। मैं भगवान शिव के तुल्य कभी नहीं हो सकता। कहां भगवान शिव और कहां में। राम राम राम राम।" अतिथि ने कहा।

"आहुका भी बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी। वह बोली मेरे परमेश्वर सही कहते हैं अतिथि भगवान होता है और भगवान की सेवा में कोई कमी नहीं छोड़नी चाहिए।"

"हे देवी ! आप दोनों को स्वर्ग तुल्य सुख प्राप्त हो और दोनों इसी प्रकार सदा प्रेम में बंधे रहो। यही मैं भगवान भोलेनाथ से प्रार्थना करूंगा।" , कहकर अतिथि ने हाथ जोड़ लिए। इसके उपरांत जो कंदमूल फल आदि उनके पास थे। वह सब उन अतिथि के सामने रख दिया। अतिथि ने खूब छककर भोजन किया।

आहुक बोला, "आपने भोजन कर लिया। आप थक गए होंगे थोड़ी देर विश्राम कर लीजिए।"

"जैसी आपकी इच्छा।" ,  कहकर वह अतिथि विश्राम करने लगा। थकान के कारण उसकी आंखें लग गईं और वह गहरी निद्रा में सो गया।

संध्या होने लगी तो आहुक ने आतिथि को जगाया, " हे अतिथि देव ! उठी ! भगवान सूर्य देव अस्तांचल को जा रहे हैं। उठिए और संध्या भजन कीजिए।"

" क्या ? संध्या हो गई । अब मैं रास्ता कैसे पार करूंगा।" इतना कहकर अतिथि ने आहुक की तरफ मुंह करके हाथ जोड़ लिए और बोला, " महाराज ! यदि संध्या के बाद यात्रा करता हूं तो निश्चय ही मुझे कोई जंगली जानवर मार डालेगा। कृपया मुझे रात्रि विश्राम के लिए अपनी कंदरा में थोड़ा सा स्थान दो। मैं प्रातः काल ही यहां से चला जाऊंगा। " 

आहुक ने कहा, " हे मेरे भगवान ! मैं आपको कैसे मना कर सकता हूं परंतु मेरे पास थोड़ा सा स्थान है। जिसमें मुश्किल से दो ही व्यक्ति सो पाएंगे।" यह सुनकर याचक चुप रह गया। याचक उनकी परेशानी समझ कर जाने लगा। 

इस पर आहुका ने कहा, " स्वामी ! ये हमारे अतिथि है। इनको नाराज ना करें। आप अतिथि सहित घर में रहिए तथा मैं घर के बाहर रह जाऊंगी।"

आहुक बोला, "तुम नहीं ! मैं घर के बाहर रहूंगा। तुम अतिथि  सहित घर के अंदर रहना। एक रात की ही तो बात है मैं काट लुंगा।" इसके बाद भी मुस्कुरा दिया।

आहुक अपने अस्त्रों सहित घर के बाहर रुका तथा अतिथि और उसकी पत्नी घर के भीतर हो गए। किंतु इधर अर्धरात्रि में हिंसक एवं क्रूर पशुओं का रेला उधर से निकला तो किसी एक पशु ने आहुक की हत्या कर दी। 

प्रातः काल अतिथि ने घर के बाहर देखा कि आहुक को सिंह आदि जंगली जानवर भक्षण कर गए हैं। इससे अतिथि को बहुत दुख हुआ। पर वह कर भी क्या सकता था। 

आहुका ने दुखी मन से अतिथि को समझाया,  "हे अतिथि देव ! आप निराश ना होइए । अतिथि सेवा में अगर प्राण भी त्यागना पड़े तो यह धर्म है।" 

" पर बहन ! अब आप कैसे जीवन व्यतीत करेंगीं? ", अतिथि ने आहुका से प्रश्न किया।

" भाई ! अब मेरा क्या है ? मैं इनके बिना एक पल भी रहने की नहीं सोच सकती। मैं तो इनके साथ सती हो जाऊंगी।" 

आहुका ने दोनों हाथ जोड़ लिए और अतिथि से बोली, " से अतिथि देव ! नियति को कोई नहीं बदल सकता। बस, हम पर एक उपकार कर दो घर के अंदर कुछ लकड़ियां रखी हैं। उनसे चिता सजा दो और पति के साथ मेरा भी संस्कार करके मुझे और मेरे पति को मुक्ति प्रदान करा दो।"

"बहन ! यह तो आत्महत्या हुई और आत्महत्या करना पाप है।" अतिथि ने आहुका को समझाया पर वह नहीं मानी। तब अनमने मन से उसने आहुका के लिए चिता तैयार की। 

" बहन ! यह शरीर अपनी बहन और उसके पति की मृत्यु के कारण के पाप का वहन नहीं कर सकता। इसलिए मेरे इस शरीर को भी आपके साथ ही भस्म हो जाना चाहिए।"

"भाई ! यह आप क्या कह रहे हैं? यह तो हमारा अतिथि धर्म था पर यदि आप इसे पाप का कारण समझ रहे हैं, तो मैं अपने पति के समक्ष आपको उस ऋण से मुक्त करती हूं।"

आहुका ने पति के शव को चिता में रखा और उसके सिर को अपनी गोद में रखकर योग-अग्नि की साधना करने लगी। धीरे धीरे योग-अग्नि प्रज्वलित होने लगी।

वह अतिथि भी जलती चिता में आ बैठा और बोला, "आप दोनों में अनन्य प्रेम हैं जिसको दुनिया की कोई भी शक्ति अलग नहीं कर सकती। अतः आप दोनों का प्रेम हमेशा इसी प्रकार प्रगाढ़ रहेगा।"

"हे अतिथि ! हमें आप पाप का भागी क्यों बनाते हैं?" वह इतना ही बोल पाई थी कि भगवान शंकर डमरू, त्रिशूल आदि अपने आयुधों के साथ वहीँ प्रकट हो गए | उन्होंने बार-बार आहुका से वर मांगने को कहा, पर वह कुछ ना बोल कर ध्यान मग्न हो गई |

तब भगवान शंकर बोले, "हे आहुका ! मैं तुम दोनों पति पत्नी के बिछोह का कारण बना हूं । भविष्य में मैं ही तुम्हारे मिलन का कारण भी बनूंगा। तुम दोनों का पृथ्वी पर जीवन इतना ही था सो वह समाप्त हुआ।

यह कहकर भगवान शिव उसी स्थान नंदीश्वर लिंग के रूप में प्रकट हुए। जिन्हें हम 'अचलेश्वर महादेव' (ग्वालियर) के नाम से जानते हैं। जो ग्वालियर में स्थित है । ग्वालियर उस समय निषद क्षेत्र था। ।

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