कथा नल दमयंती || 05. || राजा नल के राज दरबार का दृश्य
कथा नल दमयंती || 05. || राजा नल के राज दरबार का दृश्य
निषध देश के राजा बहुत गुणवान, परम सत्यवादी, वेदो के ज्ञाता, इंद्रियोको वश में रखने वाले, वीर, योद्धा, उदार, अस्त्र-शस्त्र में निपुण, प्रबल पराक्रमी, ब्राह्मण भक्त, सबके प्रिय, प्रजाहित चाहने वाले तथा दानशील आदगुणों से भरे हुए थे। उनके अंदर के गुणों का बखान करना बहुत कठिन था। इतने सारे गुण होने के बाद भी चौसर खेलने के एक मात्र दुर्गुण ने उन्हें विश्व का सबसे दुखी व मन्दभाग्य राजा बना दिया था।
राजा नल का सभा में प्रवेश
घोषणा → परम सत्यवादी, गुणवान, वेदो के ज्ञाता, वीर, योद्धा, अस्त्र-शस्त्र में निपुण, ब्राह्मण भक्त, प्रजाहित चाहने वाले, दानशील और सबके प्रिय निषेध शिरोमणि राजा नल के राजसभा में आ रहे है।
सभी उनके सम्मान मे खड़े होकर स्वागत करते है। राजा शान में मस्त हाथी की तरह राजसभा में प्रवेश करते हैं। वे एक नजर पूरी सभा पर डालते हैं और सबको बैठने का इशारा करके स्वयं सिंहासन पर बैठ जाते हैं।
राजा नल → प्रजा मे यदि किसी को कोई कष्ट है तो हमारे समछ उपस्थित होकर अपनी परेशानी हमे बता सकता है।
(सभी शांत रहते हैं। राजा एक बार फिर से कहते हैं )
राजा नल → आप बेझिझक अपनी बात कह सकते हैं।
एक बुजुर्ग → महाराज ! आपके होते हमारे सामने क्या परेशानी हो सकती है? आप सभी परेशानी बिना पूछे समझ जाते है। फिर कौन आपकी शासन शक्ति मे कभी निकाले ?
राजा नल → ठीक है। फसल पककर आ चुकी है। व्यापारी आदि भी खुश हैं इसलिए सभी अपनी खुशी से कर दे। किसी पर कोई दवाब नहीं होगा। उद्यान, सरोबर, कुंए आदि बनवाने के लिए राज्य से पूर्ण सहयोग किया जायेगा।
व्यापारी → महाराज ! आपकी कीर्ति दसों दिशाओं में फैली हुई है। आपने रात्री में ठहरने के लिए धर्मशालाएं तथा धूप से बचने के लिए सड़क के दोनों और फलदार वृक्ष लगाकर बहुत ही पुण्य का काम किया है।
राजा नल →मेरी नहीं, आपकी कीर्ति दसों दिशाओं में फैली हुई है। मैं तो प्रजा का सेवक हूँ। इसमें प्रजा का पूरा पूरा योगदान है। यदि वे स्वयं इनकी देखभाल न करे तो हम और हमारे सैनिक किस प्रकार इतने स्थलों की सुरक्षा कर सकते है। यह तो हमारी प्रजा अर्थात आपके अथक प्रयासों का फल हैं। मैं इन सभी कार्यों के लिए अपनी प्रजा को इसका श्रेय देता हूँ।
अन्यवृद्ध → हम धन्य है, कि हमें आप जैसे राज मिले हैं।
राजा नल → धन्य आप नहीं, हम है। हमें पिता तुल्य प्रेम करने वाली प्रजा की सेवा करने का अवसर मिला है।
व्यापारी → महाराज ! हमारी तरफ से यह भेंट स्वीकार करें। (सोने, चांदी, हीरे ज्वाहरात से भरे थाल भेट करता है) मुझे खुशी होगी की आप इनका उचित उपयोग करेंगे।
राजा नल → ठीक है । आपकी प्रसन्नता के लिए हम इसे स्वीकार करते हैं। यदि व्यापार में कभी परेशानी हो तो अवश्य मिलना। आपका यह धन हम पर उधार रहा। यह धन प्रजा और आपके कठिन समय में काम आगा।
(सभी एक साथ बोलते है)
सभी → निषध राज राजा नल की जय हो ।
[इसी के साथ पहला सीन समाप्त होता है।]
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