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004. नल दमयंती की कथा

नल दमयंती की कथा

एक बार की बात है निषध देश में वीरसेन के पुत्र नल नाम के एक राजा थे। बहुत सुन्दर और गुणवान थे। वे सभी तरह की अस्त्र विद्या में भी बहुत निपुण थे। उन्हें जूआ खेलने का भी थोड़ा शोक था। उन्हीं दिनों विदभग् देश में भीमक नाम के एक राजा राज्य करते थे। वे भी नल के समान ही सर्वगुण सम्पन्न थे। उन्होंने दमन ऋषि को प्रसन्न करके उनके वरदान से चार संतान प्राप्त की थी- तीन पुत्र और एक कन्या । पुत्रों के नाम थे दम,दान्त व दमन पुत्री का नाम था दमयन्ती।

दमयन्ती लक्ष्मी के समान रूपवन्ती थी। बड़ी-बड़ी आंखे थी। उस समय देवताओं और यक्षों मे कोई भी कन्या इतनी रूपवती नहीं थी। उन दिनों कितने ही लोग उस देश में आते और राजा नल से दमयन्ती के गुणों का बखान करते। एक दिन राजा नल ने अपने महल के उद्यान में कुछ हंसों को देखा। उन्होंने एक हंसे को पकड़ लिया।

हंस ने कहा आप मुझे छोड़ दीजिए तो हम लोग दमयन्ती के पास जाकर आपके गुणों का ऐसा वर्णन करेंगे कि वह आपको जरूर वर लेगी। वे सब हंस उड़कर राजकुमारी दमयन्ती के पास गए। दमयन्ती उन्हें देखकर बहुत खुश हुई। हंसों को पकडऩे के लिए दौडऩे लगी। दमयन्ती जिस हंस को पकड़कर दौड़ती। Nal Damyanti Katha

वही हंस बोल उठता- रानी दमयन्ती निषध देश का एक नल नाम का राजा है। वह राजा बहुत सुन्दर है। मनुष्यों में उसके समान सुंदर और कोई नहीं है। वह मानो साक्षात कामदेव का स्वरूप है। यदि तुम उसकी पत्नी बन जाओ तो तुम्हारा जन्म और रूप दोनों सफल हो जाए।

वह अश्विनी कुमार के समानसुन्दर है। मनुष्यों में उसके समान सुंदर और कोई नहीं है। जैसे तुम स्त्रियों में रत्न हो, वैसे ही नल पुरुषों को भूषण है। तुम दोनों की जोड़ी बहुत सुंदर है। दमयन्ती ने कहा- हंस तुम नल से भी ऐसी ही बात कहना। हंस ने लौटकर राजा नल को उनका संदेश दिया। दमयन्ती हंस के मुंह से राजा नल की कीर्ति सुनकर उनसे प्रेम करने लगी।

उसकी आसक्ति इतनी बढ़ गई कि वह रात दिन उनका ही ध्यान करती रहती। शरीर धूमिल और दुबला हो गया। वे कमजोर सी दिखने लगी। सहेलियों ने दमयन्ती के मन के भाव जानकर राजा से निवेदन किया कि आपकी पुत्री अस्वस्थ्य हो गई हैं। राजा ने बहुत विचार किया और अंत में इस निर्णय पर पहुंचा कि मेरी पुत्री विवाह योग्य हो गई है। Nal Damyanti Katha

दमयन्ती के पिता ने सभी देशों के राजा को स्वयंवर के लिए निमंत्रण पत्र भेज दिया और सूचित कर दिया। सभी देश के राजा हाथी व घोड़ों के रथों से वहां पहुंचने लगे। नारद और पर्वत से सभी देवताओं को भी दमयन्ती के स्वयंवर का समाचार मिल गया। इन्द्र और सभी लोकपाल भी अपने वाहनों सहित रवाना हुए। राजा नल को भी संदेश मिला तो वे भी दमयन्ती से स्वयंवर के लिए वहां पहुंचे। नल के रूप को देखकर इंद्र ने रास्ते में अपने विमान को खड़ा कर दिया और नीचे उतरकर कहा कि राजा नल आप बहुत सत्यव्रती हैं।

आप हम लोगों के दूत बन जाइए। नल ने प्रतिज्ञा कर ली और कहा कि करूंगा। फिर पूछा कि आप कौन है तो इन्द्र ने कहा हम लोग देवता है। हम लोग दमयन्ती के लिए यहां आएं हैं। आप हमारे दूत बनकर दमयन्ती के पास जाइए और कहिए कि इन्द्र, वरुण, अग्रि और यम देवता तुम्हारे पास आकर तुमसे विवाह करना चाहते हैं। इनमें से तुम चाहो उस देवता को अपना पति स्वीकार कर लो।

नल ने दोनों हाथ जोड़कर कहा कि देवराज वहां आप लोगों का और मेरे जाने का एक ही प्रायोजन है। इसलिए आप मुझे वहां दूत बनाकर भेजे यह उचित नहीं है। जिसकी किसी स्त्री को पत्नी के रूप में पाने की इच्छा हो चुकी हो वह भला उसको कैसे छोड़ सकता है और उसके पास जाकर ऐसी बात कह ही कैसे सकता है? आप लोग कृपया इस विषय में मुझे क्षमा कीजिए। देवताओं ने कहा नल तुम पहले हम लोगों से प्रतिज्ञा कर चुके हो कि मैं तुम्हारा काम करूंगा। अब प्रतिज्ञा मत तोड़ो। अविलम्ब वहां चले जाओ। नल ने कहा- राजमहल में निरंतर कड़ा पहरा रहता है मैं कैसे जा सकुंगा। Nal Damyanti Story

इन्द्र की आज्ञा से नल ने राजमहल में बिना रोक टोक के प्रवेश किया। दमयन्ती और उसकी सहेलियां भी उसे देखकर मुग्ध हो गयी और लज्जित होकर कुछ बोल न सकी। तुम देखने में बड़े सुंदर और निर्दोष जान पड़ते हो। पहले यहां आते समय द्वारपालों ने तुम्हे देखा क्यों नहीं? उनसे तनिक भी चूक हो जाने पर मेरे पिता बहुत कड़ा दण्ड देते हैं। नल ने कहा- मैं नल हूं। लोकपालों का दूत बनकर तुम्हारे पास आया हूं।

सुन्दरी ये देवता तुम्हारे साथ विवाह करना चाहते हैं। तुम इनमें से किसी एक देवता के साथ विवाह कर लो। यही संदेश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूं। उन देवताओं के प्रभाव से जब मैंने तुम्हारे महल में प्रवेश किया तो मुझे कोई देख नहीं पाया। मैंने तुमसे देवताओं का संदेश कह दिया है अब जो कहना है कह दो। अब तुम्हारी जो इच्छा हो करो।

दमयन्ती ने बड़ी श्रृद्धा के साथ देवताओं को प्रणाम करके मन्द मुस्कान के साथ कहा स्वामी मैं तो आपको ही अपना सर्वस्व मानकर अपने आप को आपके चरणों में सौंपना चाहती हूं। जिस दिन से मैंने हंसों की बात सुनी तभी से मैं आपके लिए व्याकुल हूं। आपके लिए ही मैंने राजाओं की भीड़ इकट्ठी की है। यदि आप मुझ दासी की प्रार्थना अस्वीकार कर देंगे तो मैं जहर खाकर मर जाऊंगी।

राजा नल ने दमयन्ती से कहा- जब बड़े-बड़े लोकपाल तुमसे शादी करना चाहते हैं फिर तुम मुझ मनुष्य से क्यों शादी करना चाहती हो। मैं तो उन देवताओं के चरणों की धूल के बराबर भी नहीं हूं। तुम अपना मन उन्हीं में लगाओ। देवताओं का अप्रिय करने पर इंसान की मृत्यु हो सकती है। तुम मेरी रक्षा करो और उनको वरण कर लो। नल की बात सुनकर दमयन्ती घबरा गई। उसकी आंखों में आंसु छलक आए। उस समय दमयन्ती का शरीर कांप रहा था हाथ जुड़े हुए थे। उसने कहा मैं आपको वचन देती हूं कि मैं आपको ही पति के रूप में वरण करूंगी।

राजा नल ने कहा-अच्छा तब तो तुम ऐसा ही करो परंतु यह बतलाओ कि मैं यहां उनका दूत बनकर आया हूं। अगर इस समय मैं अपने स्वार्थ की बात करने लगूं तो यह कितनी बुरी बात है। मैं तो अपना स्वार्थ तभी बना सकता हूं जब वह धर्म के विरूद्ध ना हो। तब दमयन्ती ने गदगद कण्ठ से कहा राजा इसके लिए एक निर्दोष उपाय है। उसके अनुसार काम करने पर आपको दोष नहीं लगेगा।

वह यह उपाय है कि आप सभी लोकपालों के साथ स्वयंवर मंडप में आए। मैं आपको वर लुंगी। तब आपको दोष भी नहीं लगेगा। देवताओं के पूछने पर उन्होंने कहा मैं दमयन्ती के पास गया तो मुझे देखकर वे और उनकी सखियां सभी मुझ पर मोहित हो गई और आप लोगों के प्रस्ताव को उनके सामने रखने के बाद भी वे मुझे ही वरण करने पर तुली हैं। Nal Damyanti Story

स्वयंवर की घड़ी आई। राजा भीमक ने सभी को बुलवाया। शुभ मुहूर्त में स्वयंवर रखा। सब राजा अपने-अपने निवास स्थान से आकर स्वयंवर में यथास्थान बैठ गए। तभी दमयन्ती वहां आई। सभी राजाओं का परिचय दिया जाने लगा। दमयन्ती एक-एक को देखकर आगे बढऩे दिया जाने लगा। आगे एक ही स्थान पर नल के समान ही वेषभुषा वाले पांच राजकुमार खड़े दिखाई दिए। यह देखकर दमयन्ती को संदेह हो गया, वह जिसकी और देखती उन्हें सिर्फ राजा नल ही दिखाई देते।

इसलिए विचार करने लगी कि मैं देवताओं को कैसे पहचानूं और ये राजा है यह कैसे जानूं? उसे बड़ा दुख हुआ। अन्त में दमयन्ती ने यही निश्चय किया कि देवताओं की शरण में जाना ही उचित है। हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक स्तुति करने लगी। देवताओं हंसों के मुंह से नल का वर्णन सुनकर मैंने उन्हें पतिरूपण से वरण कर लिया है।

मैंने नल की आराधना के लिए ही यह व्रत शुरू कर लिया है। आप लोग अपना रूप प्रकट कर दें, जिससे में राजा नल को पहचान लूं। देवताओं ने दमयन्ती की बात सुनकर उसके दृढ़-निश्चय को देखकर उन्होंने उसे ऐसी शक्ति दी जिससे वह देवता और मनुष्य में अंतर कर सके। दमयन्ती ने देखा कि शरीर पर पसीना नहीं है। पलके गिरती नहीं हैं। माला कुम्हलाई नहीं है। शरीर स्थिर है। शरीर पर धूल व पसीना भी नहीं है। दमयन्ती ने इन लक्षणों को देखकर ही दमयन्ती ने राजा नल को पहचान लिया।

जिस समय दमयंती के स्वयंवर से लौटकर इन्द्र व अन्य लोकपाल अपने-अपने लोकों को जा रहे थे। उस समय उनकी मार्ग में ही कलयुग और द्वापर से भेंट हो गई। इन्द्र ने पूछा कलयुग कहा जा रहे हो? कलियुग ने कहा-मैं दमयन्ती के स्वयंवर में उससे विवाह करने के लिए जा रहा हूं। इन्द्र ने कहा अरे स्वयंवर तो कब का पूरा हो गया। दमयन्ती ने राजा नल का वरण कर लिया है।

हम लोग देखते ही रह गए। कलयुग ने क्रोध में भरकर कहा – तब तो यह अनर्थ हो गया। उसने देवताओं की उपेक्षा करके मनुष्य को अपनाया, इसलिए उसको दण्ड देना चाहिए। देवताओं ने कहा- दमयन्ती ने हमारी आज्ञा प्राप्त करके ही नल को वरण किया है। वास्तव में नल सर्वगुण सम्पन्न और उसके योग्य है। वे समस्त धर्मों के जानकार हैं। Nal Damyanti Story

उन्होंने इतिहास पुराणों सहित वेदों का भी अध्ययन किया है। उनको शाप देना तो नरक में धधकती आग में गिरने के समान है। अब कलयुग ने द्वापर से कहा मैं अपने क्रोध को शान्त नहीं कर सकता। इसलिए मैं नल के शरीर में निवास करूंगा। मैं उसे राज्यच्युत कर दूंगा। तब वह दमयन्ती के साथ नहीं रह सकेगा। इसलिए तुम भी जूए के पासों में प्रवेश करके मेरी सहायता करना।

द्वापर ने उसकी बात स्वीकार ली। द्वापर और कलयुग दोनों ही नल की राजधानी में आ बसे। बारह वर्ष तक वे इस बात की प्रतीक्षा में रहे कि नल में कोई दोष दिख जाए। एक दिन राजा नल संध्या के समय लघुशंका से निवृत होकर पैर धोए बिना ही आचमन करके संध्यावंदन करने बैठ गए। यह अपवित्र अवस्था देखकर कलियुग उनके शरीर में प्रवेश कर गया।

कलयुग दूसरा रूप धारण करके वह पुष्कर बनकर उसकी बात स्वीकार करके वह पुष्कर के पास गया और बोला तुम नल के साथ जुआं खेलो मेरी सहायता करो। जूए में जीतकर निषध राज का राज्य प्राप्त कर लो। पुष्कर उसकी बात स्वीकार करके नल के के पास गया। द्वापर भी पासे का रूप धारण करके उसके साथ चला। जब पुष्कर ने राजा नल को जूआ खेलने का आग्रह किया। तब राजा नल दमयन्ती के सामने अपने भाई की बार – बार की ललकार सह ना सके। उन्होंने पासे खेलने का निश्चय किया। Nal Damyanti Katha

उस समय नल के शरीर में कलयुग घुसा हुआ था, इसीलिए नल जो कुछ भी जूए में लगाते हार जाते। प्रजा और मंत्रियों ने राजा को रोकना चाहा लेकिन जब वे नहीं माने तो मंत्रियों ने द्वारपाल को रानी दमयंती तक राजा को रोकने का संदेश पहुंचवाया। तब रानी नल दमयन्ती को बोली आपकी पूरी प्रजा आपके दुख के कारण अचेत हुई जा रही है। इतना कहकर दमयंती भी रोने लगी। लेकिन राजा नल कलयुग के प्रभाव में थे।

इसीलिए जो पासे फेंकते वही उनके प्रतिकुल पड़ते। जब दमयंती ने यह सब देखा तो उसने धाय को बुलवाया और उसके द्वारा राजा नल के सारथि वाष्र्णेय को बुलवाया। उन्होंने ने उससे कहा सारथि तुम जानते हो कि महाराज बहुत संकट में है। अब यह बात तुम से छिपी नहीं है। तुम रथ जोड़ लो और मेरे बच्चों को रथ में बैठाकर कुंडिनगर ले जाओ। उसके बाद पुष्कर ने राजा नल का सारा धन ले लिया और बोला तुम्हारे पास दावं पर लगाने के लिए और कुछ है या नहीं। यदि तुम दमयंती को दावं पर लगाने के लायक समझो तो उसे लगा दो।

एक दिन राजा नल ने देखा कि बहुत से पक्षी उनके पास ही बैठे है। उनके पंख सोने के समान दमक रहे हैं। नल ने सोचा कि इनकी पांख से कुछ धन मिलेगा। ऐसा सोचकर उन्हें पकडऩे के लिए नल ने उन पर अपना पहनने का वस्त्र डाल दिया। पक्षी उनका वस्त्र लेकर उड़ गए। अब नल नंगे होकर बड़ी दीनता के साथ मुंह नीचे करके खड़ा हो गए। Nal Damyanti Story

पक्षियों ने कहा तु नगर से एक वस्त्र पहनकर निकला था। उसे देखकर हमें बड़ा दुख हुआ था ले अब हम तेरे शरीर का वस्त्र लिए जा रहे है। हम पक्षी नहीं जूए के पासे हैं। नल ने दमयन्ती से पासे की बात कह दी। तुम देख रही हो, यहां बहुत से रास्ते है। एक अवन्ती की ओर जाता है। दूसरा पर्वत होकर दक्षिण देश को। सामने विन्ध्याचल पर्वत है। यह पयोष्णी नदी समुद्र में मिलती है। सामने का रास्ता विदर्भ देश को जाता है। यह कौसल देश का मार्ग है।

इस प्रकार राजा नल दुख और शोक से भरकर बड़ी ही सावधानी के साथ दमयन्ती को भिन्न-भिन्न आश्रम मार्ग बताने लगे। दमयन्ती की आंखें आंसु से भर गई। दमयन्ती ने राजा नल से कहा क्या आपको लगता है कि मैं आपको छोड़कर अकेली कहीं जा सकती हूं। मैं आपके साथ रहकर आपके दुख को दूर करूंगी। दुख के अवसरो पर पत्नी पुरुष के लिए औषधी के समान है। वह धैर्य देकर पति के दुख को कम करती है। Nal Damyanti Katha

उस समय नल के शरीर पर वस्त्र नहीं था। धरती पर बिछाने के लिए एक चटाई भी नहीं थी। शरीर पर धूल से लथपथ हो रहा था। भूख-प्यास से परेशान राजा नल जमीन पर ही सो गए। दमयन्ती भी उनके साथ ये सारे दुख झेल रही थी। राजा नल भी जमीन पर ही सो गए। दमयन्ती के सो जाने पर राजा नल की नींद टूटी। सच्ची बात तो यह थी कि वे दुख और शोक की के कारण सुख की नींद सो भी नहीं सकते थे। वे सोचने लगे कि दमयंती मुझ से बड़ा प्रेम करती है। प्रेम के कारण ही उसे इतना दुख झेलना पड़ेगा। यदि मैं इसे छोड़कर चला जाऊं तो संभव है कि इसे सुख भी मिल जाए। अन्त में राजा नल ने यही निश्चय कि इसे सुख भी मिल जाए।

दमयन्ती सच्ची पतिव्रता है। इसके सतीत्व को कोई भंग नहीं कर सकता। इस प्रकार त्यागने का निश्चय करके और सतीत्व की ओर से निश्चिन्त होकर राजा नल ने यह विचार किया कि मैं नंगा हूं और दमयन्ती के शरीर पर भी केवल एक वस्त्र है। फिर भी इसके वस्त्रों में से आधा फाड़ लेना ही श्रेयस्कर है लेकिन फांडू़ कैसे? शायद यह जाग जाए? राजा नल ने यह सोचकर दमयंती को धीरे से उठाकर उसके शरीर का आधा वस्त्र फाड़कर शरीर ढक लिया। दमयंती नींद में थी। राजा नल उसे छोड़कर निकल पड़े। थोड़ी देर बाद वे शांत हुए और वे फिर धर्मशाला लौट आए। Nal Damyanti Story

थोड़ी देर बाद जब राजा नल का हृदय शांत हुआ ,तब वे फिर धर्मशाला में इधर-उधर घूमने लगे और सोचने लगे कि अब तक दमयन्ती परदे में रहती थी, इसे कोई छू भी नहीं सकता था। आज यह अनाथ के समान आधा वस्त्र पहने धूल में सो रही है। यह मेरे बिना दुखी होकर वन में कैसे रहेगी? मैं तुम्हे छोड़कर जा रहा हूं सभी देवता तुम्हारी रक्षा करें।

शरीर में कलियुग का प्रवेश होने के कारण उनकी बुद्धि नष्ट हो गई थी। इसीलिए वे अपनी पत्नी को वन में अकेली छोड़कर वहां से चले गए। जब दमयंती की नींद टूटी, तब उसने देखा कि राजा नल वहां नहीं है। यह देखकर वे चौंक गई और राजा नल को पुकारने लगी।

जब दमयंती को राजा नल बहुत देर तक नहीं दिखाई पड़ें तो वे विलाप करने लगी। वे भटकती हुई जंगल के बीच जा पहुंची। वहां अजगर दमयंती को निगलने लगा। दमयंती मदद के लिए चिल्लाने लगी तो एक व्याध के कान में पड़ी। वह उधर ही घूम रहा था। वह वहां दौड़कर आया और यह देखकर दमयंती को अजगर निगल रहा है। अपने तेज शस्त्र से उसने अजगर का मुंह चीर डाला। उसने दमयन्ती को छुड़ाकर नहलाया, आश्वासन देकर भोजन करवाया।

दमयन्ती जब कुछ शांत हुई। व्याध ने पूछा सुन्दरी तुम कौन हो? किस कष्ट में पड़कर किस उद्देश्य से तुम यहां आई हो? दमयन्ती की सुन्दरता, बोल-चाल और मनोहरता देखकर व्याध मोहित हो गया। वह दमयंती से मीठी-मीठी बातें करके उसे अपने बस में करने की कोशिश करने लगा। दमयन्ती उसके मन के भाव समझ गई। दमयंती ने उसके बलात्कार करने की चेष्टा को बहुत रोकना चाहा लेकिन जब वह किसी प्रकार नहीं माना तो उसने शाप दे दिया कि मैंने राजा नल के अलावा किसी और का चिंतन कभी नहीं किया हो तो यह व्याध मरकर गिर पड़े। दमयंती के इतना कहते ही व्याध के प्राण पखेरू उड़ गए। व्याध के मर जाने के बाद दमयंती एक निर्जन और भयंकर वन में जा पहुंची।

राजा नल का पता पूछती हुई वह उत्तर की ओर बढऩे लगी। तीन दिन रात दिन रात बीत जाने के बाद दमयंती ने देखा कि सामने ही एक बहुत सुन्दर तपोवन है। जहां बहुत से ऋषि निवास करते हैं। उसने आश्रम में जाकर बड़ी नम्रता के साथ प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। ऋषियों को प्रणाम किया। ऋषियों ने दमयन्ती का सत्कार किया और उसे बैठने को कहा- दमयन्ती ने एक भद्र स्त्री के समान सभी के हालचाल पूछे। Nal Damyanti Story

फिर ऋषियों ने पूछा आप कौन है तब दमयंती ने अपना पूरा परिचय दिया और अपनी सारी कहानी ऋषियों को सुनाई। तब सारे तपस्वी उसे आर्शीवाद देते हैं कि थोड़े ही समय में निषध के राजा को उनका राज्य वापस मिल जाएगा। उसके शत्रु भयभीत होंगे व मित्र प्रसन्न होंगे और कुटुंबी आनंदित होंगे। इतना कहकर सभी ऋषि अंर्तध्यान हो गए।

दमयंती रोती हुई एक अशोक के वृक्ष के पास पहुंचकर बोली तू मेरा शोक मिटा दे। शोक रहित अशोक तू मेरा शोक मिटा दे। क्या कहीं तूने राजा नल को शोक रहित देखा है। तू अपने शोकनाशक नाम को सार्थक कर।दमयन्ती ने अशोक की परिक्रमा की और वह आगे बढ़ी। उसके बाद आगे बड़ी तो बहुत दूर निकल गई। वहां उसने देखा कि हाथी घोड़ों और रथों के साथ व्यापारियों का एक झुंड आगे बढ़ रहा है। व्यापारियों के प्रधान से बातचीत करके दमयंती को जब यह पता चला कि वे सभी चेदीदेश जा रहे हैं तो वह भी उनके साथ हो गई। कई दिनों तक चलने के बाद वे व्यापारी एक भयंकर वन में पहुंचे।

वहा एक बहुत सुंदर सरोवर था। लंबी यात्रा के कारण वे लोग थक चुके थे। इसलिए उन लोगों ने वहीं पड़ाव डाल दिया। रात के समय जंगली हाथियों का झुंड आया। आवाज सुनकर दमयंती की नींद टूट गई। वह इस मांसाहार के दृश्य को देखकर समझ नहीं पा रही थी कि वह क्या करे? वे सभी व्यापारी मर गए वो वहां से भाग निकली और दमयंती भागकर उन ब्राह्मणों के पास पहुंची और उनके साथ चलने लगी शाम के समय वह राजा सुबाहु के यहां जा पहुंची। वहां उसे सब बावली समझ रहे थे। उसे बच्चे परेशान कर रहे थे।

उस समय राज माता महल के बाहर खिड़की से देख रही थी उन्होंने अपनी दासी से कहा देखो तो वह स्त्री बहुत दुखी मालुम होती है। तुम जाओ और मेरे पास ले आओ। दासी दमयंती को रानी के पास ले गई। रानी ने दमयंती स पूछा तुम्हे डर नहीं लगता ऐसे घुमते हुए। तब दमयंती ने बोला में एक पतिव्रता स्त्री हूं। मैं हूं तो कुलीन पर दासी का काम करती हूं। तब रानी ने बोला ठीक है तुम महल में ही रह जाओ। तब दमयंती कहती है कि मैं यहां रह तो जाऊंगी पर मेरी तीन शर्त है मैं झूठा नहीं खाऊंगी, पैर नहीं धोऊंगी और परपुरुष से बात नहीं करुंगी। रानी ने कहा ठीक है हमें आपकी शर्ते मंजुर है। Nal Damyanti Katha

जिस समय राजा नल दमयन्ती को सोती छोड़कर आगे बढ़े, उस समय वन में आग लग रही थी। तभी नल को आवाज आई। राजा नल शीघ्र दौड़ो। मुझे बचाओ। नागराज कुंडली बांधकर पड़ा हुआ था। उसने नल से कहा- राजन मैं कर्कोटक नाम का सर्प हूं। मैंने नारद मुनि को धोखा दिया था। उन्होंने शाप दिया कि जब तक राजा नल तुम्हे न उठावे, तब तक यहीं पड़े रहना। उनके उठाने पर तू शाप से छूट जाएगा। उनके शाप के कारण मैं यहां से एक भी कदम आगे नहीं बढ़ सकता।

तुम इस शाप से मेरी रक्षा करो। मैं तुम्हे हित की बात बताऊंगा और तुम्हारा मित्र बन जाऊंगा। मेरे भार से डरो मत मैं अभी हल्का हो जाता हूं वह अंगूठे के बराबर हो गया। नल उसे उठाकर दावानल से बाहर ले आए। कार्कोटक ने कहा तुम अभी मुझे जमीन पर मत डालो। कुछ कदम गिनकर चलो। राजा नल ने ज्यो ही पृथ्वी पर दसवां कदम चला और उन्होंने कहा दश तो ही कर्कोटक ने उन्हें डस लिया। उसका नियम था कि जब कोई बोले दश तभी वह डंसता था।

आश्चर्य चकित नल से उसने कहा महाराज तुम्हे कोई पहचान ना सके इसलिए मैंने डस के तुम्हारा रूप बदल दिया है। कलियुग ने तुम्हे बहुत दुख दिया है। अब मेरे विष से वह तुम्हारे शरीर में बहुत दुखी रहेगा। तुमने मेरी रक्षा की है। अब तुम्हे हिंसक पशु-पक्षी शत्रु का कोई भय नहीं रहेगा। अब तुम पर किसी भी विष का प्रभाव नहीं होगा और युद्ध में हमेशा तुम्हारी जीत होगी।

यह कहकर कर्कोटक ने दो दिव्य वस्त्र दिए और वह अंर्तध्यान हो गया। राजा नल वहां से चलकर दसवें दिन राजा ऋतुपर्ण की राजधानी अयोध्या में पहुंच गया। उन्होंने वहां राजदरबार में निवेदन किया कि मेरा नाम बाहुक है। मैं घोड़ों को हांकने और उन्हें तरह-तरह की चालें सिखाने का काम करता हूं। घोड़ो की विद्या मेरे जैसा निपुण इस समय पृथ्वी पर कोई नहीं है। रसोई बनाने में भी में बहुत चतुर हूं, हस्तकौशल के सभी काम और दूसरे कठिन काम करने की चेष्ठा करूंगा। Nal Damyanti Story

आप मेरी आजीविका निश्चित करके मुझे रख लीजिए। उसकी सारी बात सुनकर राजा ऋतुपर्ण ने कहा बाहुक मैं सारा काम तुम्हें सौंपता हूं। लेकिन मैं शीघ्रगामी सवारी को विशेष पसंद करता हूं। तुम्हे हर महीने सोने की दस हजार मुहरें मिला करेंगी। लेकिन तुम कुछ ऐसा करो कि मेरे घोड़ों कि चाल तेज हो जाए। इसके अलावा तुम्हारे साथ वाष्र्णेय और जीवल हमेशा उपस्थित रहेंगें।

राजा नल रोज दमयन्ती को याद करते और दुखी होते कि दमयन्ती भूख-प्यास से परेशान ना जाने किस स्थिति में होगी। इसी तरह राजा नल ने दमयंती के बारे में सोचते हुए कई दिन बिता दिए। ऋतुपर्ण के पास रहते हुए उन्हें कोई ना पहचान सका। जब राजा विदर्भ को यह समाचार मिला कि मेरे दामाद नल और पुत्री राज पाठ विहिन होकर वन में चले गए हैं। Nal Damyanti

तब उन्होंने सुदेव नाम के एक ब्राह्मण को नल-दमयंती का पता लगाने के लिए चेदिनरेश के राज्य में भेजा। उसने एक दिन राज महल में दमयंती को देख लिया। उस समय राजा के महल में पुण्याहवाचन हो रहा था। दमयंती- सुनन्दा एक साथ बैठकर ही वह कार्यक्रम देख रही थी। सुदेव ब्राह्मण ने दमयंती को देखकर सोचा कि वास्तव में यही भीमक नन्दिनी है। मैंने इसका जैसा रूप पहले देखा था। वैसा अब भी देख रहा हूं। बड़ा अच्छा हुआ, इसे देख लेने से मेरी पुरी यात्रा सफल हो गई। सुदेव दमयंती के पास गया और उससे बोला दमयंती मैं तुम्हारे भाई का मित्र सुदेव हूं। मैं तुम्हारी भाई की आज्ञा से तुम्हे ढ़ूढने यहां आया हूं। दमयंती ने ब्राह्मण को पहचान लिया। वह सबका कुशल-मंगल पूछने लगी और पूछते ही पूछते रो पड़ी।

सुनन्दा दमयंती को रोता देख घबरा गई। उसने अपनी माता के पास जाकर उन्हें सारी बात बताई। राज माता तुरंत अपने महल से बाहर निकल कर आयी। ब्राह्मण के पास जाकर पूछने लगी महाराज ये किसकी पत्नी है? किसकी पुत्री है? अपने घर वालों से कैसे बिछुड़ गए? तब सुदेव ने उनका पूरा परिचय उसे दिया। सुनन्दा ने अपने हाथों से दमयंती का ललाट धो दिया। जिससे उसकी भौहों के बीच का लाल चिन्ह चन्द्रमा के समान प्रकट हो गया। उसके ललाट का वह तिल देखकर सुनन्दा व राजमाता दोनों ही रो पड़े। राजमाता ने कहा मैंने इस तिल को देखकर पहचान लिया कि तुम मेरी बहन की पुत्री हो। उसके बाद दमयंती अपने पिता के घर चली गई।

अपने पिता के घर एक दिन विश्राम करके दमयंती अपनी माता से कहा कि मां मैं आपसे सच कहती हूं। यदि आप मुझे जीवित रखना चाहती हैं तो आप मेरे पतिदेव को ढूंढवा दीजिए। रानी ने उनकी बात सुनकर नल को ढूंढवाने के लिए ब्राह्मणों को नियुक्त किया। ब्राह्मणों से दमयंती ने कहा आप लोग जहां भी जाए वहां भीड़ में जाकर यह कहे कि मेरे प्यारे छलिया, तुम मेरी साड़ी में से आधी फाड़कर अपनी दासी को उसी अवस्था में आधी साड़ी में आपका इंतजार कर रही है। मेरी दशा का वर्णन कर दीजिएगा और ऐसी बात कहिएगा।

जिससे वे प्रसन्न हो और मुझ पर कृपा करे। बहुत दिनों के बाद एक ब्राह्मण वापस आया। उसने दमयंती से कहा मैंने राजा ऋतुपर्ण के पास जाकर भरी सभा में आपकी बात दोहराई तो किसी ने कुछ जवाब नहीं दिया। जब मैं चलने लगा तब बाहुक नाम के सारथि ने मुझे एकान्त में बुलाया उसके हाथ छोटे व शरीर कुरूप है। वह लम्बी सांस लेकर रोता हुआ मुझसे कहने लगा।

उच्च कुल की स्त्रियों के पति उन्हें छोड़ भी देते हैं तो भी वे अपने शील की रक्षा करती हैं। त्याग करने वाला पुरुष विपत्ति के कारण दुखी और अचेत हो रहा था। इसीलिए उस पर क्रोध करना उचित नहीं है। लेकिन वह उस समय बहुत परेशान था।जब वह अपनी प्राणरक्षा के लिए जीविका चाह रहा था। तब पक्षी उसके वस्त्र लेकर उड़ गए। जब ब्राह्मण ने यह बात बताई तो दमयंती समझ गई कि वे राजा नल ही हैं। Nal Damyanti Katha

ब्राह्मण की बात सुनकर दमयंती की आंखों में आंसु भर आए। उसने अपनी माता को सारी बात बताई। तब उन्होंने कहा आप यह बात अब अपने पिताजी से ना कहे। मैं सुदैव ब्राह्मण को इस काम के लिए नियुक्त करती हूं। तब दमयंती ने सुदेव से कहा- ब्राह्मण देवता आप जल्दी से जल्दी अयोध्या नगरी पहुंचे। राजा ऋतुपर्ण से यह बात कहिए कि दमयंती ने फिर से स्वेच्छानुसार पति का चुनाव करना चाहती है।

बड़े-बड़े राजा और राजकुमार जा रहे हैं। स्वयंवर की तिथि कल ही है। इसलिए यदि आप पहुंच सकें तो वहां जाइए। नल के जीने अथवा मरने का किसी को पता नहीं है, इसलिए वह इसीलिए कल वे सूर्योदय पूर्व ही पति वरण करेंगी। दमयंती की बात सुनकर सुदेव अयोध्या गए और उन्होंने राजा ऋतुपर्ण से सब बातें कह दी। सुदेव की बातें सुनाकर बाहुक को बुलाया और कहा बाहुक कल दमयंती का स्वयंवर है और हमें जल्दी से जल्दी वहां पहुंचना है। यदि तुम मुझे जल्दी वहंा पहुंच जाना संभव समझो तभी मैं वहां जाऊंगा।

ऋतुपर्ण की बात सुनकर नल का कलेजा फटने लगा। सोचा कि दमयंती ने दुखी और अचेत होकर ही ऐसा किया होगा। संभव है वह ऐसा करना चाहती हो। नल ने शीघ्रगामी रथ में चार श्रेष्ठ घोड़े जोत लिए। राजा ऋतुपर्ण रथ पर सवार हो गए। रास्ते में ऋतुपर्ण ने उसे पासें पर वशीकरण की विद्या सिखाई क्योंकि उसे घोड़ों की विद्या सीखने का लालच था। जिस समय राजा नल ने यह विद्या सीखी उसी समय कलियुग राजा नल के शरीर से बाहर आ गया।

कलियुग ने नल का पीछा छोड़ दिया था। लेकिन अभी उनका रूप नहीं बदला था। उन्होंने अपने रथ को जोर से हांका और शाम होते-होते वे विदर्भ देश में पहुंचे। राजा भीमक के पास समाचार भेजा गया। उन्होंने ऋतुपर्ण को अपने यहां बुला लिया ऋतुपर्ण के रथ की गुंज से दिशाएं गुंज उठी। दमयंती रथ की घरघराहट से समझ गई कि जरूर इसको हांकने वाले मेरे पति देव हैं। यदि आज वे मेरे पास नहीं आएंगे तो मैं आग में कुद जाऊंगी। Nal Damyanti Katha

उसके बाद अयोध्या नरेश ऋतुपर्ण जब राजा भीमक के दरबार में पहुंचे तो उनका बहुत आदर सत्कार हुआ। भीमक को इस बात का बिल्कुल पता नहीं था कि वे स्वयंवर का निमंत्रण पाकर यहां आए हैं। जब ऋतुपर्ण ने स्वयंवर की कोई तैयारी नहीं देखी तो उन्होंने स्वयंवर की बात दबा दी और कहा मैं तो सिर्फ आपको प्रणाम करने चला आया। भीमक सोचने लगे कि सौ-योजन से अधिक दूर कोई प्रणाम कहने तो नहीं आ सकता। लेकिन वे यह सोच छोड़कर भीमक के सत्कार में लग गए। बाहुक वाष्र्णेय के साथ अश्वशाला में ठहरकर घोड़ो की सेवा में लग गया। दमयंती आकुल हो गई कि रथ कि ध्वनि तो सुनाई दे रही है पर कहीं भी

मेरे पति के दर्शन नहीं हो रहे। हो ना हो वाष्र्णेय ने उनसे रथ विद्या सीख ली होगी। तब उसने अपनी दासी से कहा हे दासी तु जा और इस बात का पता लगा कि यह कुरूप पुरुष कौन है? संभव है कि यही हमारे पतिदेव हों। मैंने ब्राह्मणों द्वारा जो संदेश भेजा था। वही उसे बतलाना और उसका उत्तर मुझसे कहना। तब दासी ने बाहुक से जाकर पूछा राजा नल कहा है क्या तुम उन्हें जानते हो या तुम्हारा सारथि वाष्र्णेय जानता है? बाहुक ने कहा मुझे उसके संबंध में कुछ भी मालुम नहीं है सिर्फ इतना ही पता है कि इस समय नल का रूप बदल गया है। वे छिपकर रहते हैं। उन्हें या तो दमयंती या स्वयं वे ही पहचान सकते हैं या उनकी पत्नी दमयंती क्योंकि वे अपने गुप्त चिन्हों को दूसरों के सामने प्रकट नहीं करना चाहते हैं।

अब दमयंती की आशंका और बढ़ गई और दृढ़ होने लगी कि यही राजा नल है। उसने दासी से कहा तुम फिर बाहुक के पास जाओ और उसके पास बिना कुछ बोले खड़ी रहो। उसकी चेष्टाओं पर ध्यान दो। अब आग मांगे तो मत देना जल मांगे तो देर कर देना। उसका एक-एक चरित्र मुझे आकर बताओ।

फिर वह मनुष्यों और देवताओं से उसमें बहुत से चरित्र देखकर वह दमयंती के पास आई और बोली बाहुक ने हर तरह से अग्रि, जल व थल पर विजय प्राप्त कर ली है। मैंने आज तक ऐसा पुरुष नहीं देखा। तब दमयंती को विश्वास हो जाता है कि वह बाहुक ही राजा नल है।

अब दमयंती ने सारी बात अपनी माता को बताकर कहा कि अब मैं स्वयं उस बाहुक की परीक्षा लेना चाहती हूं। इसलिए आप बाहुक को मेरे महल में आने की आज्ञा दीजिए। आपकी इच्छा हो तो पिताजी को बता दीजिए। रानी ने अपने पति भीमक से अनुमति ली और बाहुक को रानीवास बुलवाने की आज्ञा दी। दमयंती ने बाहुक के सामने फिर सारी बात दोहराई। तब दमयंती के आखों से आंसू टपकते देखकर नल से रहा नहीं गया। नल ने कहा मैंने तुम्हे जानबुझकर नहीं छोड़ा। नहीं जूआ खेला यह सब कलियुग की करतूत है। दमयंती ने कहा कि मैं आपके चरणों को स्पर्श करके कहती हूं कि मैंने कभी मन से पर पुरुष का चिंतन नहीं किया हो तो मेरे प्राणों का नाश हो जाए।

ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर राजा नल ने अपना संदेह छोड़ दिया और कार्कोटक नाग के दिए वस्त्र को अपने ऊपर ओढ़कर उसका स्मरण करके वे फिर असली रूप में आ गए। दोनों ने सबका आर्शीवाद लिया दमयंती के मायके से उन्हें खुब धन देकर विदा किया गया। उसके बाद नल व दमयंती अपने राज्य में पहुंचे। राजा नल ने पुष्कर से फिर जूआं खेलने को कहा तो वह खुशी-खुशी तैयार हो गया और नल ने जूए की हर बाजी को जीत लिया। इस तरह नल व दमयंती को फिर से अपना राज्य व धन प्राप्त हो गया। Nal Damyanti Katha

नल और दमयंती (पौराणिक प्रेम कथा)

भारत के महाकाव्य ‘महाभारत’ से जुड़ा हुआ यह कहानी है। युधिष्टिर जुए में अपना सब कुछ हार कर अपने भाइयों के साथ वनवास जा रहे थे। उसी वन में एक ऋषि ने उन्हें ‘नल’ और ‘दमयंती’ की कथा सुनाई थी। ‘नल’ निषध देश के राजा वीरसेन के पुत्र थे। नल बड़े ही वीर, साहसी, गुणवान और सुन्दर थे। शस्त्र विद्या और अश्व संचालन में भी वे निपुण थे। ‘दमयंती’ विदर्भ (पूर्वी महाराष्ट्र) के भीष्मक नरेश की पुत्री थी। दमयंती लक्ष्मी के समान सुन्दर, सुशील और सर्वगुण संपन्न थी। निषध देश से जो कोई भी विदर्भ देश में आता था, वह महाराज नल के गुणों की बहुत प्रशंसा करता था। नल की प्रशंसा दमयन्ती अपने गाँव के लोगों से सुनती थी। इसी तरह विदर्भ देश से आने वाले लोग राजकुमारी दमयन्ती के रूप और गुणों की बखान महाराज नल के सामने करते थे। इसका परिणाम यह हुआ कि नल और दमयन्ती बिना देखे ही मन ही मन में एक दूसरे को प्रेम करने लगे थे।

एक दिन राजा नल अपने महल के बगीचे में टहल रहे थे। पक्षियों का मधुर कलरव उनके मन में मधुर संगीत घोल रहा था। उसी समय एक सेवक ने राजा से आकर कहा, महाराज! सरोवर में एक बहुत ही सुन्दर और अद्भुत हंस आया है। सेवक के बातों से राजा नल का ध्यान टूट गया। वे सेवक के साथ सरोवर के पास गये। उन्होंने देखा की वास्तव में एक सुन्दर हंस सरोवर में तैर रहा था। राजा नल को आते देख हंस तेज गति से भागने लगा। राजा नल उसे पकड़ने के लिए दौड़ पड़े। थोड़ी देर के बाद उन्होंने हंस को पकड़ लिया। हंस डर गया और अपने आप को राजा से छुड़ाने के लिए प्रयत्न करने लगा। हंस को लगा कि अब वह राजा नल से नहीं छुट पायेगा, तब हंस विलाप करते हुए राजा से कहा- मेरा परिवार यहाँ से बहुत दूर विदर्भ देश के राजा भीष्मक के सरोवर में रहता है। राजकुमारी दमयंती उनकी पुत्री है। मेरी हंसनी मेरे बिना जीवित नहीं रह पाएगी। वह मुझे बहुत प्यार करती है। वह रो-रो कर अपना प्राण त्याग देगी। राजन! आप मुझे छोड़ दीजिए, अब मैं कभी नहीं आऊंगा। हंस की बातों को सुनकर राजा को दया आ गई। उन्होंने हंस को छोड़ दिया। हंस ने राजा से कहा महाराज आप बहुत दयालु हैं। विदर्भ देश की राजकुमारी दमयंती भी बहुत ही सुन्दर, सुशील, दयालु और सर्वगुण संपन्न है। मैं विदर्भ देश में जाकर राजकुमारी दमयंती के समक्ष आपके गुणों की चर्चा अवश्य करूँगा कि आप जैसा दयावान और सुन्दर और कोई नहीं है। राजन आप दमयंती से विवाह कीजिए। आप दोनों एक दूसरे के योग्य है। यह कहकर हंस उड़ गया।

विदर्भ देश की राजकुमारी दमयंती की रूप की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी। दमयंती के सुदरता से राजा महाराजा ही नहीं देवता भी उससे विवाह करना चाहते थे। एक दिन दमयंती अपने सखियों के साथ बगीचे में विचरण करते-करते सरोवर के पास गई। वह सरोवर में खिले हुए कमल के फूलों की सुन्दरता को निहार रही थी। तभी उसकी दृष्टि एक हंस पर पड़ी। हंस की सुन्दरता को देखकर दमयंती उसको पकड़ने की कोशिश करने लगी। जैसे ही वह हंस को पकड़ने के लिए आगे बढ़ी, हंस कहने लगा- मेरी सुन्दरता तो राजा नल के सामने कुछ भी नहीं है। राजा नल बहुत ही सुन्दर और गुणवान है, तुम्हें तो उनकी ओर आकृष्ट होना चाहिए। हंस की बात को सुनकर दमयंती बोली। तुम कैसे जानते हो राजा नल के विषय में? हंस बोला मैं कई देशों में घूमता रहता हूँ लेकिन नल जैसा दयावान, सुन्दर राजा मैंने कहीं नहीं देखा है। आप दोनों की जोड़ी बहुत ही सुन्दर लगेगी। दमयंती हंस की बात को सुनकर मन ही मन राजा नल के रूप की कल्पना कर प्रेम करने लगी। दमयंती हमेशा नल के यादों में खोई रहती थी। इस प्रकार हंस ने नल और दमयंती दोनों के मन में प्रेम का विजारोपण कर दिया।

एक दिन विदर्भ नरेश अपने कक्ष में राज्य से संबंधित कार्यों में व्यस्थ थे। तभी महारानी महाराज के कक्ष में प्रवेश हुई। महाराज, महारानी से पूछे क्या बात है? आप कुछ चिंतित दिखाई  दे रही है। हमें बताइए मैं अभी आपकी सभी चिंताएं दूर कर देता हूँ। महारानी बोली, आप हमेशा अपने राजकाज के कार्यों में उलझे हुए रहते हैं। आपकी बेटी दमयंती विवाह योग्य हो गई है। हमें दमयंती की विवाह के विषय में भी सोचना चाहिए। महाराज बोले- महारानी आप ठीक कह रहीं हैं। मैं मंत्री जी से कहकर दमयंती के स्वयंवर का निमंत्रण सभी देशों में राजाओं, महराजाओं और राजकुमारों को भिजवा देने के लिए कहता हूँ। महाराज की बात सुनकर महारानी अश्वस्थ हो गई। दूसरे दिन से ही दमयंती के स्वयंवर की तैयारियाँ शुरू हो गई। सभी देशों में दूर-दूर तक राजकुमारी दमयंती के स्वयंवर की चर्चा होने लगी और सभी देशों में निमंत्रण पत्र भेज दिया गया। निषध देश में भी निमंत्रण भेजा गया। राजा नल निमंत्रण पत्र पाकर बहुत खुश हुए क्योंकि राजा नल दमयंती को मन से चाहने लगे थे। दमयंती से विवाह करने के लिए केवल धरती के राजा ही नहीं बल्कि देवातागण भी ललाईत थे। दमयंती के स्वयंवर में अग्नि देव, वारुण देव, इंद्र देव, और पवन देव जा रहे थे। नल भी स्वयंवर के लिए विदर्भ जा रहे थे। देवताओं ने नल को रास्ते में रोककर पूछा, आप कहां जा रहे हैं? राजा नल ने कहा मैं दमयंती के स्वयंवर में जा रहा हूँ। उन सभी देवताओं ने सोंचा नल तो हम सभी से अधिक सुन्दर है, फिर दमयंती इसके सामने हमसे विवाह नहीं करेगी। वह नल को ही अपना पति स्वीकार करेगी। इस बात को सोंचकर देवताओं ने कहा कि दमयंती देवताओं से विवाह करने के योग्य है, कोई मनुष्य उससे विवाह करने योग्य नहीं है। राजा नल! तुम जाओ और दमयंती से कहो कि वे हममे से ही किसी देवता को वरण कर ले। देवताओं की यह बात सुनकर राजा नल बहुत उदास हो गए।

राजा नल ने देवताओं से कहा- दमयंती से तो मैं विवाह करना चाहता हूँ। मैं उससे प्रेम करता हूँ। देवगण कुपित होकर बोले- अगर तुम नहीं गए तो तुम दोनों का अनिष्ट होगा। राजा नल ने कहा लेकिन मैं इतनी जल्दी कैसे जा सकता हूँ। देवातागन बोले- आप अपनी आंखें बंद करो! जैसे ही आप अपनी आंखें खोलेंगे आप अपने आपको दमयंती के महल में पाओगे। राजा नल ने अपनी आँखे बंद किया और जैसे ही खोला उन्होंने अपने को दमयंती के महल में पाया। राजा नल घूमते हुए महल के उपवन वाले सरोवर की तरफ बढ़े। उस सरोवर में राजा नल ने उसी हंस को अपनी हंसनी और पूरे परिवार के साथ देखकर अति प्रसन्न हुए। नल को देखकर दासियां दौड़ते हुए जाकर दमयंती को सूचना दिया कि कोई राजकुमार अपने महल में आया है और वह सरोवर की तरफ घूम रहा है। राजकुमारी जी चलिए देखिये। राजकुमारी दमयंती अपने दासियों के साथ बाहर आकर देखते ही पहचान लिया कि यही राजा नल हैं। हंस के वर्णन के अनुसार सभी लक्षण इस व्यक्ति से मिलते थे। दमयंती उनसे प्रेम करने लगी थी, इसीलिए नल को देखते ही दमयंती खुश हो गई। राजा नल भी दमयंती को प्रेम भरी नजरों से देखकर प्रेमासक्त हो उठे। हंस के वर्णन के अनुसार राजा नल के सपनों की रानी दमयंती उनके समक्ष खड़ी थी। यह कैसा समय था? यह कैसी बिडम्बना थी कि वे अपने प्रिय को प्रेम के लिए निवेदन भी नहीं कर सकते थे क्योंकि वे तो देवताओं का संदेशा लेकर दमयंती को संदेश सुनाने के लिए गए थे। राजा नल ने अपने दिल पर पत्थर रखकर दमयंती से कहा- “यहाँ आपके स्वयंवर में आने के लिए मैं भी आमंत्रित था। मार्ग में आते समय मुझे चार देवता पवन देव, अग्नि देव, इंद्र देव और वरुण देव मिले थे। उन्होंने संदेशा भेजवाया है कि दमयंती से कहना कि वे मनुष्य को नहीं देवताओं के वरण योग्य है, इसिलए वे हम देवताओं में से किसी एक का वरण करे। यह बात सुनते ही दमयंती के मन को चोट लगा और गुस्सा भी आई। दमयंती ने कहा मेरे पर किसी का अधिकार नहीं है और ना ही मैं कोई राज्य हूँ जिस पर शासन किया जा सकता है। विवाह कोई व्यापार नहीं है, जो हर किसी के साथ किया जा सकता है। मैंने आपसे प्रेम किया है मैं अपना सर्वस्व आपको अर्पण कर चुकी हूँ। मेरा विवाह आपसे ही होगा। अन्यथा मैं कदापि विवाह नहीं करुँगी। दमयंती की बात सुनकर राजा नल आति प्रसन्न हुए। उनका अशांत मन शांत हो गया। तत्पश्चात राजा नल विवाह समारोह में शामिल हो गए। समारोह स्थल की अनोखी साज-सज्जा थी। कई देशों के राजा-महाराजा दमयंती के विवाह समारोह में पधारे थे। प्रजा जनों की भीड़ भी एकत्रित हो चुकी थी। हर कोई चाहता था कि वरमाला उसी के गले में पड़े। नियत समय से अपूर्व सुंदरी दमयंती ने हाथ में वरमाला लिए अपनी सखियों के साथ प्रवेश किया। वधु वेश में दमयंती के अलौकिक सौंदर्य को देख सभी राजा-महाराजा हतप्रभ से हो गए। दमयंती धीरे-धीरे वरमाला लेकर आगे बढ़ने लगी। वह जिस राजा के सामने से गुजरती उसके हृदय में आशा का संचार जग जाता, और आगे बढ़ जाती तो राजा मुरझा जाते थे। दमयंती की आँखें तो राजा नल को ढूंढ रही थी। उसने राजा नल को ढूंढू ही लिया। उसने एक साथ पांच-पांच नल को देखा। देवताओं को यह बात पहले से ही पता था कि दमयंती नल को ही अपना वर चुनेगी। यह सोचकर सभी देवताओं ने नल का रूप धारण कर लिया था। स्वयंवर में एक साथ कई नल खड़े थे। यह देखकर सभी परेशान थे कि इन सभी में असली नल कौन होगा? दमयंती जरा भी विचलित नहीं हुई। दमयंती ने अपनी ऑखें बंद करके मन ही मन ईश्वर का स्मरण किया। हे! प्रभु हे! ईश्वर मेरी सहायता करो। दमयंती ने सुना था कि देवताओं के पैर भूमि में स्पर्श नहीं होते और ना ही उनकी फूल की मालाएँ कभी मुरझाती है। यही सोचकर दमयंती ने निरीक्षण किया और उसने अपनी आंखों से असली नल को पहचान लिया। दमयंती धीरे से राजा नल के पास जाकर उनके गले में वरमाला डाल दिया। दमयंती सभी देवताओं को हाथ जोड़कर बोली हे! देव जनों मैं पहले से ही राजा नल का वरण कर चुकी थी। आप सब हमें आशिर्वाद दें। यह देखकर सभी देवताओं ने नल और दमयंती का अभिवादन किया और आशिर्वाद दिया। इस तरह आंखों में झलकते भावों से ही दमयंती ने असली नल को पहचानकर अपना जीवन साथी चुन लिया। नल-दमयंती को देवताओं का आशीर्वाद भी प्राप्त हु्आ। दमयंती निषध नरेश राजा नल की महारानी बनी। दोनों बड़े सुख से समय बिताने लगे। दमयंती पतिव्रताओं में शिरोमणि थी। अभिमान तो उसे कभी छू भी नही  सकता था।

समय बीतने लगा दमयंती के गर्भ से एक पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ। उन्होंने पुत्र का नाम इन्द्रसेन और पुत्री का नाम इन्द्रसेना रखा दोनों बच्चे माता-पिता के अनुरूप ही सुन्दर और सर्वगुण सम्पन्न थे। विदर्भ नरेश अपनी पुत्री दमयंती से मिलने निषध देश आए। अपनी पुत्री के सुखी गृहस्थ जीवन को देखकर वे बहुत ही खुश हुए समय सदा एक-सा नहीं रहता, दुःख-सुख का चक्र निरन्तर चलता ही रहता है। दीपावली का त्योहार आने वाला था राजा नल ने अपने राज्य में बहुत बड़ा पूजा का आयोजन करवाया था। उस पूजा में राजा नल ने सभी देवताओं का पूजन किया लेकिन ‘कलयुग’ को भूल गए। ऐसा देखकर कलयुग क्रोधित हो गए। उन्होंने अपना अपमान समझा और कलयुग राजा नल से प्रतिशोध लेना चाहता था। वैसे तो महाराज नल गुणवान् तथा धर्मात्मा थे किन्तु उनमें एक दोष था, जुए का आदत। नल के एक भाई का नाम पुष्कर था। वह नल से अलग रहता था। उसने उन्हें जुए के लिए आमन्त्रित किया। खेल आरम्भ हुआ। भाग्य प्रतिकूल था। नल हारने लगे और उनका भाई पुष्कर जितने लगा। राजा नल इस जुए में अपना सबकुछ सोना, चाँदी, रथ, राजपाट आदि सब हार गए। महारानी दमयंती ने प्रतिकूल समय जानकर अपने दोनों बच्चों को विदर्भ देश की राजधानी कुण्डिनपुर भेज दिया। इधर नल जुए में अपना सर्वस्व हार गये। उन्होंने अपने शरीर के सारे वस्त्र-आभूषण उतार दिये। केवल एक वस्त्र पहनकर नगर से बाहर निकल पड़े दमयंती भी मात्र एक साड़ी में अपने पति के साथ निकल पड़ी। एक दिन जंगल में राजा नल ने सोने के पंख वाले कुछ पक्षी देखे। राजा नल ने सोचा, यदि इन्हें पकड़ लिया जाय तो इनको बेचकर निर्वाह करने के लिए कुछ धन कमाया जा सकता है। ऐसा सोचकर उन्होंने अपने पहने हुए वस्त्र खोलकर पक्षियों पर फेंका। वे पक्षी राजा नल के वस्त्र लेकर उड़ गये। अब राजा नल के पास तन ढकने के लिए भी वस्त्र नहीं रहा। नल अपने से ज्यादा दमयंती के दुःख से व्याकुल थे। जंगल में नल और दमयंती भूख और प्यास से व्याकुल हो रहे थे। नल ने बड़ी मेहनत करके तलाब से कुछ मछलियां पकड़ कर किसी भी तरह वही पर आग जलाकर मछलियों को भुन लिया। मछलियों को आग में भूनने से उस में राख लग गया था। नल दमयंती से बोले तुम यहीं ठहरों मैं इन मछलियों को तालाब से धोकर लाता हूँ, इनमे राख लगा हुआ है तब खायेंगे जैसे ही राजा नल मछलियों को पानी में धोने लगे वैसे ही सारी मछलियाँ पानी में बह गई। राजा सिर्फ देखते ही रह गए। नल अपने साथ होने वाले इन सभी घटनाओं को देखकर हताश हो रहे थे। आखिर ये सब मेरे साथ क्यों हो रहा है। मन ही मन सोचने लगे। हे! भगवान मुझे समझ में नहीं आ रहा है, अब मैं क्या करूँ? मैं अकेले होता तो सब बर्दास्त कर लेता लेकिन इस सुकुमारी दमयंती का दुःख मेरे से देखा नहीं जा रहा है।

जंगल में चलते-चलते नल और दमयंती बहुत थक कर एक वृक्ष के नीचे बैठ गए। दोनों एक ही वस्त्र से तन छिपाये हुए थे। दमयंती को थकावट और भूख के कारण नींद आ गयी। राजा नल ने सोचा, दमयंती को मेरे कारण बड़ा दुःख सहन करना पड़ रहा है। यह सोचकर राजा नल दमयंती को सुप्त अवस्था में छोड़कर चले गए लेकिन उनका मन बहुत दुखी था। उनके मन में बार-बार यही विचार आ रहा था कि दमयंती के इस दशा का मैं ही जिम्मेदार हूँ। मैंने तो दमयंती को उसकी रक्षा करने का वचन दिया था। लेकिन मैं उसके इन सभी अनंत दुखों का कारण बन गया हूँ। अब मुझसे दमयंती का दुःख सहा नहीं जा रहा है। यदि मैं इसे इसी अवस्था में यहीं छोड़कर चला जाऊँगा तो यह किसी भी तरह अपने पिताके के पास पहुँच जायेगी।

यह सोचकर नल दमयंती के आधी साड़ी को फाड़कर उसी से अपना तन ढककर दमयन्ती को उसी अवस्था में छोड़ कर चल दिये। जब दमयंती की नींद खुली तब वे अपने को अकेला पाकर करुण विलाप करने लगी। वे भटकती-भटकती जंगल के बीच में पहुँच गई। वहां जंगल में एक अजगर दमयंती को निगलने की कोशिश कर रहा था, तब अपनी रक्षा के लिए दमयंती जोर-जोर से चिल्लाने लगी। दमयंती की आवाज सुनकर वहां एक व्यघ्र आया और अजगर को मारकर दमयंती को बचा लिया। दमयंती जब शांत हुई तो व्याघ्र ने पूछा इस घने जंगल में तुम क्यों और कैसे आई? तुम कौन हो सुंदरी? दमयंती की सुन्दरता पर मुग्ध होकर व्याघ्र उसे अपनी काम-पिपासा का शिकार बनाना चाहता था। दमयंती उस व्याघ्र के मन की भाव को समझ गई। दमयंती ने उसे श्राप देते हुए कहा, हे भगवान! यदि मैंने अपने पति राजा नल के अलावा किसी भी पर पुरुष का चिंतन नहीं किया हो तो आप इस व्याघ्र के प्राण ले लो। दमयंती के इतना कहते ही व्याघ्र के प्राण पखेरू निकल गए। इस प्रकार दमयंती दैवयोग से भटकते-भटकते एक दिन चेदिनरेश सुबाहु के पास और उसके बाद अपने पिता के पास पहुँच गई।

राजा नल जिस रास्ते से जा रहे थे, वहाँ घना जंगल था। उन्होंने देखा कि जंगल में भयानक आग लगी है। उस आग में एक नाग फंसा हुआ है। नाग निकलने कि बहुत कोशिश कर रहा था लेकिन वह निकल नहीं पा रहा था। नाग को इस दशा में देखकर राजा नल को दया आ गई। उन्होंने उसे झाड़ियों से निकाल दिया। उसी समय नाग ने कहा, राजन! तुम मुझे अपने कदम से दस कदम गिनकर आगे रखो तभी मेरा भला होगा। ये नाग धर्मराज थे जो नल का परीक्षा ले रहे थे। राजा नल ने सर्प को उठाकर अपनी कदम गिनते हुए आगे बढ़कर दस बोले, वैसे ही नाग ने राजा नल के माथे पर डंस लिया। राजा नल चौक कर बोले लगता है यह मेरा काल था। अब मैं किसी को देख भी नहीं पाउँगा और इस जंगल में मर जाऊँगा। तभी नाग ने कहा- चिंता मत करो राजन तुम्हें कुछ भी नहीं होगा! मैंने तुम्हारी ‘दया’ की परीक्षा ली है और तुम इस परीक्षा में सफल हुए हो। धर्मराज ने कहा, राजन तुम्हारे इस सुन्दर रूप रंग को देखकर कोई राजवंशी समझकर तुम्हें काम नहीं देगा। अब तुम्हारे इस कोयल की तरह काले रंग को देखकर कोई भी काम पर रख लेगा। अभी तुम्हें इसकी सख्त जरुरत है। जब तुम्हें इस काले रंग को बदलने की जरुरत पड़े तो तुम मेरा स्मरण कर लेना। मेरा स्मरण करते ही तुम्हारा रंग फिर पहले की तरह हो जायेगा। नाग (धर्मराज) यह कहकर चला गया। नल भटकते-भटकते राजा रितुपर्ण के यहाँ पहुँच गए जो अयोध्या के राजा थे। राजा नल ने कहा महाराज मुझे नौकरी पर रख लीजिये। राजा रितुपर्ण पूछे तुम्हारा नाम क्या है? तुम क्या काम जानते हो? नल ने कहा- मैं बाहुक हूँ, मैं घोड़ों की अच्छी तरह से देखभाल कर सकता हूँ और रथ हांकने में निपुण हूँ। राजा रितुपर्ण ने अपने 500 घोड़ों की देखभाल और रथ हांकने का काम राजा नल को सौंप  दिया। बाहुक के सौम्य व्यवहार से राजा बहुत प्रभावित थे। बाहुक को राजा रितुपर्ण के यहाँ काम करते-करते बहुत समय बीत चुका था। एक दिन अचानक बाहुक को पता चला की विदर्भ देश की राजकुमारी का फिर से स्वयंवर हो रहा है। इस खबर को सुनते ही बाहुक बेचैन हो गया। उसे विश्वास नहीं हो रहा था। वह सोचने लगा दमयंती दूसरा विवाह कैसे कर सकती है। तभी एक नौकर बाहुक को आकर बोला, बाहुक! चलो तुम्हें महाराज बुला रहे हैं। बाहुक आश्चर्यचकित होकर पूछा! महाराज बुला रहे हैं? हाँ चलो! बाहुक महाराज रितुपर्ण के पास जैसे ही पहुँचा तब उसने देखा की महाराज हाथ में एक निमंत्रण पत्र लेकर चिंतित है। बाहुक ने कहा महाराज आपने मुझे याद किया। हाँ बाहुक “आओ-आओ” यह कहकर महाराज ने बाहुक को निमंत्रण पत्र दिखाते हुए कहा? देखो बाहुक यह विदर्भ देश की राजकुमारी का निमंत्रण पत्र है। कल ही स्वयंवर है और यह निमंत्रण पत्र मुझे अभी मिला है। अब तुम्हीं बताओं मैं इतनी जल्दी वहाँ कैसे पहुँच सकता हूँ? बाहुक ने महाराज से कहा, महाराज आप चिंचित न हो, अभी तो बहुत समय है, मैं आपको वहाँ समय से पहले ही पहुँचा दूंगा। बाहुक के आश्वासन से महाराज की चिंता दूर हो गई। जैसे ही महाराज रितुपर्ण रथं पर बैठे वैसे ही बाहुक ने मन ही मन में ‘पवन देव’ का स्मरण कर रथ को हांक दिया। थोड़ी ही देर में रथ ‘हवा से बातें करने’ लगा। महाराज रितुपर्ण रथ के वेग और रथ वाहक बाहुक दोनों को देखकर आश्चर्यचकित हो उठे। जैसे ही महाराज रथ से बाहर देखने लगे वैसे ही महाराज का दोशाला उड़ गया। महाराज बोले बाहुक रथ को रोकना, मेरा दोशाला उड़ गया है। बाहुक ने तुरंत रथ रोक दिया। बाहुक ने कहा महाराज हम तो बहुत दूर आ गए हैं, वापस जाना मुमकिन नहीं है। अगर हम वापस गए तो बहुत देर हो जायेगा। महाराज बोले छोड़ो चलो। बाहुक ने पुनः रथ को हांक दिया। संध्या होने से पहले ही बाहुक ने महाराज को विदर्भ देश के (अतिथिशाला) स्कंधावार में पहुँचा दिया। वहाँ पहुँचते ही रात हो चुकी थी। उस अतिथिशाला में कई राजाओं को ठहराया गया था। दमयंती सभी व्यवस्थाओं का बहुत ही सावधानी के साथ निरीक्षण कर रही थी। मन ही मन वह सोच रही थी कि अगर राजा नल का पता नहीं चला तो! लेकिन दमयंती उम्मीद नहीं छोड़ी थी। दमयंती का मन कहता था कि राजा नल को जब मेरी स्वयंवर के विषय में पता लगेगा तब वे अवश्य ही आएंगे। आज की रात आखरी रात थी गणना के अनुसार सभी राजा और राजकुमार स्वयंवर में पहुँच चुके थे। दमयंती के अनुसार अब कोई भी आने वाला नहीं था। दमयंती ने रात में अपनी दासी केश्की के साथ अपने दोनों बच्चों को भेजा और कहा कि तुम हर राजा के सामने जाकर उन्हें हमारी कहानी सुनाना। क्या पता नल भेष बदल कर आयें हो। केश्की सभी राजाओं के सामने जाकर कहानी सुनाकर आगे बढ़ जाती। केश्की कहानी सुनाते-सुनाते बाहुक के पास पहुंची और दमयंती की कहानी बड़े ही करुणा के साथ सुना रही थी। दमयंती कि करुणा भरी कहानी को सुनकर बाहुक के आँखों से आंसू बहने लगा। बाहुक ने इंद्रसेन और इंद्र्सेना को अपने गले से लगा लिया। दमयंती के सिखाएं अनुसार बच्चों ने कहा मुझे बहुत जोर से भूख लगी है। बाहुक ने कहा, बच्चों! अभी मैं तुम दोनों के लिए तुरंत भोजन बनाता हूँ। ऐसा कहकर बाहुक ने तुरंत अग्नि देव और वरुण देव का स्मरण किया। स्मरण करते ही दोनों प्रकट हो गए बाहुक ने तुरंत बड़ा ही स्वादिष्ट भोजन बनाकर बच्चों को खिला दिया और बच्चों को खीर देते हुए कहा कि तुम अपनी माँ को दे देना।

अंततः दमयन्ती के सतीत्व के प्रभाव से एक दिन महाराज नल के दुःखो का भी अन्त हुआ। दोनों का पुनर्मिलन हुआ और राजा नल को उनका राज्य भी वापस मिल गया। पुरानों के अनुसार- कहा जाता है की नल और दमयंती की अमर प्रेम कथा सुनने से पति-पत्नी के बीच में कटुता मिट जाती है, और प्रेम बढ़ता है। आबू पर्वत के समीप एक आहुक नामक भील रहता था। उसकी पत्नी का नाम आहुजा था। वह बड़ी पतिव्रता तथा धर्मशील थी। वे दंपत्ति बड़े शिवभक्त एवं अतिथि सेवक थे। एक बार भगवान शंकर ने इन दोनों की परीक्षा लेने का विचार किया। वे एक यति का रूप धारण करके संध्या समय आहुक के दरवाजे पर जाकर कहने लगे- ‘भील! तुम्हारा कल्याण हो, मैं आज रातभर यहीं रहना चाहता हूँ, तुम दया करके एक रात मुझे रहने के लिए स्थान दे दो।’ इस पर भील ने कहा – ‘स्वामी! मेरे पास स्थान बहुत थोड़ा है, उसमें आप कैसे रह सकते हैं?’ यह सुनकर यति चलने को ही थे कि पत्नी ने पति से कहा- ‘स्वामी! यति को लौटाइए नहीं, गृहस्थ धर्म का विचार कीजिए। आप दोनों घर के भीतर रहें और मैं अपनी रक्षा के लिए कुछ बड़े शस्त्रों को लेकर दरवाजे पर बैठी रह जाऊंगी।’ भील ने सोचा कि यह बात तो ठीक नहीं क्योंकि यह अबला है। अतएव उसने यति तथा अपनी पत्नी को घर के भीतर रखा और स्वयं शस्त्र धारण कर बाहर बैठा रहा। रात बीतने पर हिसक पशुओं ने उस पर आक्रमण किया और उसे मार डाला। प्रात: जब यति और उसकी पत्नी बाहर आये तो उसे मरा देखा। यह देखकर यति बहुत दु:खी हुए। पर भीलनी ने कहा- ‘महाराज ! इसमें शोक तथा चिंता की क्या बात है? ऐसी मृत्यु तो बड़े भाग्य से ही प्राप्त होती है। अब मैं भी इनके साथ सती हो जाऊंगी। इसमें तो हम दोनों का परम कल्याण हो गया।’ यों कहकर चिता पर अपने पति को रखकर वह भी उसी अग्नि में प्रविष्ट हो गयी। तब भगवान शंकर डमरु-त्रिशूल आदि के साथ प्रकट हो गये। उन्होंने बार-बार उस भीलनी से वर मांगने को कहा, पर वह कुछ न बोलकर सर्वथा ध्यान मग्न हो गयी। तब भगवान ने उसे वरदान दिया कि ‘अगले जन्म में तुम्हारा पति ‘निषध देश के राजा बीरसेन का पुत्र नल होगा और तुम्हारा जन्म विदर्भ देश के राजा भीष्मक की पुत्री दमयंती के रूप में होगा। यह ‘यति’ भी हंस होगा और यही तुम दोनों का संयोग करायेगा। वहां तुम लोग अनंत राजसुखों का उपभोग करके अंत में दुर्लभ मोक्षपद को प्राप्त करोगे।’ यों कहकर प्रभु शंकर वहीं अचलेश्वर लिंग के रूप में स्थित हो गये और कालांतर में ये दोनों भील दंपत्ति नल-दमयंती के रूप में अवतीर्ण हुए ।

राजा नल और दमयन्ती के पूर्वजन्म की कथा

नल और दमयन्ती के पूर्वजन्म की कथा

राजा नल की कथा

किसी समय आबू पर्वत (Mount Abu) के पास ‘आहुक’ नाम का एक भील रहता था | उसकी परम सुन्दरी स्त्री का नाम आहुआ था | वह बड़ी पतिव्रता तथा धर्मशील थी | दोनों ही पति-पत्नी बड़े शिवभक्त तथा अतिथि सेवक थे |

एक बार भगवान शिव ने उनकी परीक्षा लेने का विचार किया | उन्होंने एक यति-मानव का रूप धारण किया और संध्या के समय उन दोनों के घर पर जा कर कहने लगे “भील तुम्हारा कल्याण हो मैं आज रात भर यहीं रुकना चाहता हूं | क्या तुम दया कर एक रात मुझे अपने यहाँ रहने के लिए स्थान दे सकते हो?”

इसपर भील ने उनके भीमकाय शरीर को देखकर कहा कहा “स्वामिन मेरे पास स्थान बहुत थोडा है | उसमें आप कैसे रह सकते है | यह सुनकर निराश हुए यति चलने को ही थे कि उस भील की स्त्री ने अपने पति से कहा “स्वामी ! यति को लौटाइये नहीं; तनिक गृहस्थ धर्म का विचार कीजिए, ऐसा उचित नहीं होगा |

इसलिए आप दोनों तो घर के भीतर रुक जाइए, मैं अपनी रक्षा के लिए कुछ बड़े अस्त्र-शस्त्रों को लेकर दरवाजे पर बैठी रह जाऊंगी” | उस भील ने मन में सोचा, बात यह ठीक ही कहती है; लेकिन इसको बाहर रखकर घर में मेरा रहना ठीक नहीं है, क्योंकि यह अबला है | अतः उसने यति तथा अपनी स्त्री को घर के भीतर रखा और स्वयं शस्त्र धारण कर बाहर बैठा रहा |

दुर्भाग्य से भील दम्पत्ति की वह आखिरी रात थी | थोड़ी रात बीतने पर हिंसक पशुओं ने, घर के बाहर बैठे उस भील पर भयानक आक्रमण किया और उसे मार डाला | प्रातः काल होने पर यति और उस भील की स्त्री बाहर आए तो भील को मरा हुआ देखा |

यति इस पर बहुत दुखी हुए पर उस भील की पत्नी ने अपने आंसू छिपाते हुए उनसे कहा “महाराज इससे दुखी मत होइए ? ऐसी मृत्यु तो बड़े ही भाग्य से प्राप्त होती है | अब मैं भी इनके साथ सती होने जा रही हूं | इसमें तो हम दोनों का ही परम कल्याण होगा” |

ऐसा कहकर उसने अपने पति को चिता पर रखा और स्वयं भी वह उसी अग्नि में प्रविष्ट होने के लिए तैयार हो गई | इसी समय भगवान शंकर डमरू, त्रिशूल आदि अपने आयुधों के साथ वहीँ प्रकट हो गए | उन्होंने बार-बार उस भीलनी से वर मांगने को कहा, पर वह कुछ ना बोल कर ध्यान मग्न हो गई |

राजा नल का जन्म

इस पर भगवान शिव ने उसे वरदान दिया कि “तुम दोनों का साथ चिरस्थायी होगा | अगले जन्म में तुम्हारा पति निषध देश के राजा वीरसेन का पुत्र नल होगा और तुम्हारा जन्म विदर्भ देश के राजा भीमसेन की पुत्री दमयंती के रूप में होगा |

यह यति भी वहां हंस के रूप में होगा और यही तुम दोनों का संयोग कराएगा | वहां तुम दोनों असीम राजसुखों का भोग कर के अंत में दुर्लभ मोक्ष पद को प्राप्त करोगे” | ऐसा कह कर ही भगवन शंकर वहीँ अचलेश्वर लिंग के रूप में स्थित हो गए और कालांतर में यह दोनों भील दंपति नल दमयंती के रूप में जन्म लिए |

नल दमयंती की कथा

सनातन धर्म के महाकाव्य और विश्व के सबसे बड़े ग्रन्थ महाभारत में राजा नल और उनकी प्रेमिका दमयन्ती की बड़ी रोचक कथा आती है। एक बार ज्येष्ठ पाण्डुपुत्र धर्मराज युधिष्ठिर के विशेष आग्रह करने पर महर्षि बृहदश्व ने उन्हें नल-दमयन्ती की कथा सुनाई, जो उन्ही के शब्दों में इस प्रकार से थी।

“पाण्डुपुत्र ! किसी समय में निषध देश में वीरसेन नाम के एक राजा हुआ करते थे। उनके पश्चात् उनके पुत्र, युवराज नल एक बड़े ही गुणवान्, परम सुन्दर, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, सबके प्रिय, वेदज्ञ एवं ब्राह्मणभक्त राजा सिद्ध हुए । ऐसा कहा जाता है कि उनकी सैन्य शक्ति बहुत विशाल थी।।

सम्राट नल स्वयं अस्त्रविद्या में अत्यंत निपुण थे। बड़े भारी वीर एवं बैताल उन्होंने सिद्ध किये थे। कहते हैं कि बिजली की गति से वे अस्त्रों की बौछार करते थे वे और अपने शत्रुओं का सम्भलने का मौका ही नहीं देते। क्षत्रिय सम्राट नल अत्यंत वीर, योद्धा, उदार और प्रबल पराक्रमी तो थे ही किन्तु उनमे एक बड़ा भारी दुर्गुण था उन्हें द्यूत क्रीड़ा (जूआ खेलने) का भी कुछ-कुछ शौक था।

उसी कालखंड में उनके राज्य से कोई शतादिक कोस दूर विदर्भ देश में भीम नाम के एक राजा राज्य करते थे। वे भी नल के समान ही सर्वगुण सम्पन्न और पराक्रमी थे। किन्तु उन्हें कोई संतान नहीं थी। संतान शोक में उनका शरीर दुर्बल एवं कांति क्षीण होती जा रही थी।

फिर उन्होंने अपनी सेवा व आतिथ्य सत्कार से दमन ऋषि को प्रसन्न कर लिया और उनसे वरदान स्वरुप चार संतानें प्राप्त की थीं जिनमे तीन पुत्र थे और एक कन्या थी। उन्होंने अपने पुत्रों के नाम रखे दम, दान्त, और दमन। और अपनी पुत्री का नाम उन्होंने रखा दमयन्ती।

भीमसेन की कन्या दमयन्ती विलक्षण यौवन की स्वामिनी एवं रूपवती थी। उसके विशाल नेत्र, चौड़े कंधे, उन्नत एवं सुडौल वक्षस्थल तथा मनोहर कटिप्रदेश अप्सराओं को भी लज्जित करते थे। उसके बुद्धि-विवेक को देख कर विद्वान भी चकित हो जाते थे।

देवियों,और यक्षिणियों में भी वैसी अभूतपूर्व सुन्दरी कन्या कहीं देखने में नहीं आती थी। उन दिनों कितने ही भद्र पुरुष एवं स्त्रियां विदर्भ देश से निषध देश में अपने कार्यों के चलते आते और राजा नल के सामने, भीमसेन की पुत्री दमयन्ती के रूप और गुण का बखान करते।

इसी प्रकार से निषध देश से विदर्भ में जाने वाले लोग भी थे जो दमयन्ती के सामने राजा नल के रूप, गुण और पवित्र चरित्र का वर्णन करते। कुछ काल बीतने पर इस प्रकार से दोनों के हृदय में एक दूसरे के प्रति पारस्परिक प्रेम का बीज अंकुरित हो गया।

देव योग से एक दिन की घटना है। राजा नल ने अपने महल के सरोवर में कुछ हंसों को क्रीड़ा करते देखा। उन्होंने ठिठोली वश एक हंस को पकड़ लिया। हंस ने मनुष्य वाणी में उनसे कहा “आप मुझे छोड़ दीजिये तो हम लोग दमयन्ती के पास जाकर आपके गुणों का ऐसा वर्णन करेंगे कि वह आपको अवश्य वर लेगी।”

सम्राट नल सकते में आ गए क्योंकि उस हंस ने उनके अंतर्मन में बसी हुई उनकी प्रेमिका को पहचान लिया था। उन्होंने हंस को छोड़ दिया। राजा से विदा ले कर वे सारे हंस उड़कर विदर्भ देश में गये। दमयन्ती अपने राजमहल के सरोवर के उन हंसों को देखकर बहुत प्रसन्न हुई और हंसों के पास जाने के लिये उनकी ओर दौड़ने लगी।

दमयन्ती जिस हंस को पकड़ने के लिये दौड़ती, वही बोल उठता कि “अरी दमयन्ती ! निषध देश में एक नल नाम का राजा है। वह देवताओं में श्रेष्ठ अश्विनीकुमार के समान सुन्दर है। मनुष्यों में तो उसके समान सुन्दर एवं तेजस्वी और कोई नहीं है। वह तो मानो साक्षात् कामदेव ही है। यदि तुम उसकी अर्धांगिनी हो जाओ तो तुम्हारा जन्म और रूप दोनों सफल हो जाए।”

damyantiवे हंस लगातार दमयंती से ठिठोली कर रहे थे। उन्होंने दमयंती से कहा “अब हम लोगों ने तो देवलोक, गंधर्वलोक, मनुष्यलोक, नागलोक, और पाताललोक को भी घूम-घूमकर देखा है नल के समान सुन्दर पुरुष देखने में कहीं नहीं आया। जैसे तुम स्त्रियों में रत्न हो, वैसे ही नल पुरुषों में भूषण है। तुम दोनों की जोड़ी साक्षात् रति और कामदेव की जोड़ी के समान होगी।”

दमयन्ती ने हँसते हुए, उन हंसों से कहा “ओ हंसों ! तुम नल से भी ऐसी ही बातें कहना।” उसके बाद हंसों ने निषध देश में लौटकर सम्राट नल से दमयन्ती का सारा संदेश कह दिया। हंसों के जोड़े के जाने के पश्चात् दमयन्ती सम्राट नल की कल्पनाओं में खो गयी। हंसों के मुख से सम्राट नल की कीर्ति गाथा सुनकर वह उनसे प्रेम करने लगी थी । वह इतनी अधिक प्रेमासक्त हो गयी थी कि वह रात-दिन उनका ही ध्यान करती रहती।

वियोग में शरीर दुर्बल और कान्ति क्षीण पड़ने लगी थी उसकी। दीन अवस्था को प्राप्त हुई वह सखियों से भी कटी-कटी सी रहने लगी थी वह। किन्तु उसकी सखियाँ उसकी इस अवस्था से परिचित थी और उनसे रहा न गया। उन्होंने विदर्भराज से निवेदन किया कि “महाराज आपकी पुत्री अस्वस्थ हो गयी है, आप यथाशीघ्र उसके स्वास्थ्यलाभ के लिए उचित कदम उठायें।”

राजा भीमसेन पहले से ही इस सम्बन्ध में गंभीर थे। उन्होंने अपनी पुत्री के अस्वस्थ होने के सम्बन्ध में बड़ा विचार किया, राजवैद्य से विमर्श किया। अन्त में वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि मेरी पुत्री विवाहयोग्य हो गयी है, इसलिये यथाशीघ्र इसका स्वयंवर कर देना चाहिये।

उन्होंने दूर देश के राजाओं को भी स्वयंवर का निमन्त्रण-पत्र भेज दिया और उन्हें सूचित कर दिया कि नृपतियों को दमयन्ती के स्वयंवर समारोह में उपस्थित हो कर उसकी शोभा बढ़ानी चाहिये और मेरा मनोरथ पूर्ण करना चाहिये। देश विदेश के नृपति, सम्राट, हाथी, घोड़े और रथों की ध्वनि से पृथ्वी को मुखरित करते हुए सज-धजकर विदर्भ देश में पहुँचने लगे। भीमसेन ने सबके स्वागत सत्कार की समुचित व्यवस्था की थी।

दैवयोग से कुछ ऐसा हुआ कि देवर्षि नारद और पर्वतराज के द्वारा देवताओं को भी दमयन्ती के स्वयंवर का समाचार मिल गया। विभिन्न स्वर्गों के इन्द्र आदि समेत सभी लोकपाल भी अपनी मण्डली और वाहनों सहित विदर्भ देश के लिये प्रस्थान किये।

उधर सम्राट नल के चित्त को पहले से ही दमयन्ती ने हर लिया था। उन्होंने भी जगत सुंदरी दमयन्ती के स्वयंवर में सम्मिलित होने के लिये विदर्भ देश की ओर प्रस्थान किया। अलग-अलग लोक के देवताओं ने अपने स्वर्ग से, विमान द्वारा उतरते समय देख लिया था कि कामदेव के समान सुन्दर और बलिष्ठ देहयष्टि वाले नल, दमयन्ती के स्वयंवर के लिये जा रहे हैं।

नल की सूर्य के समान कान्ति और लोकोत्तर रूप-सम्पत्ति से वे देवता गण भी स्तब्ध हो गये। उन्हें लगा कि मनुष्यों में यह कौन हैं जिसके रूप और यौवन के सामने देवतागण भी मलिन दिखलायी पड़ रहे हैं। थोड़ी देर के आपस के वार्तालाप के पश्चात् उन्होंने पहचान लिया कि ये सम्राट नल हैं।

इसके पश्चात् उन देवताओं ने अपने अपने विमानों को आकाश में ही स्थिर कर दिया और नीचे पृथ्वी पर उतरकर नल के सामने आ गए और उनसे कहा “हे सम्राट नल ! आप बड़े सत्यव्रती हैं। आप हम लोगों की सहायता करने के लिए हमारे दूत बन जाइये।” नल ने अपनी सहमति प्रदान कर दी और कहा कि “ठीक है ! करूँगा”। फिर उनसे पूछा कि “महाभाव ! आप लोग कौन हैं और मुझे दूत बनाकर मुझसे  कौन-सा कार्य कराना चाहते हैं ?”

इन्द्र ने कहा “हम लोग देवगण हैं। मैं इन्द्र हूँ और ये अग्नि, वरुण और यम हैं। हम लोग दमयन्ती के स्वयंवर के लिये यहाँ आये हैं।” देवताओं ने नल से आग्रह किया कि “सम्राट आप हमारे दूत बनकर दमयन्ती के पास जाइये और कहिए कि इन्द्र, वरुण,अग्नि और यमदेवता तुम्हारे पास, तुमसे विवाह करने के लिए आये हैं। इनमें से जो तुम्हे पसंद हो उस देवता को पति के रूप में स्वीकार कर लो।”

सम्राट नल ने एक उड़ती हुई दृष्टी सभी देवताओं पर डाली और नमस्कार की मुद्रा में, विनम्रतापूर्वक उनसे कहा कि “हे देवराज ! वहाँ आप लोगों के और मेरे जाने का एक ही प्रयोजन है। इसलिये आप मुझे दूत बनाकर वहाँ भेजें, यह किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं है।

जिसकी किसी स्त्री को पत्नी के रूप में पाने की इच्छा हो चुकी हो, वह भला, उसको कैसे छोड़ सकता है और उसके पास जाकर ऐसी बात कह ही कैसे सकता है? ये आप लोग को स्वयं सोचना चाहिए। आप लोग कृपया इस विषय में मुझे क्षमा कीजिये और मेरा मार्ग निष्कंटक कीजिये। सम्राट नल के धधकते तेज़ के आगे सभी देवता मार्ग से हट गए।

राजा नल का विवाह

अंततः वह घड़ी आयी जिसकी सभी को प्रतीक्षा थी। दमयन्ती का स्वयंवर हुआ और वहाँ एक ऐसी घटना घटी जिसने कइयों को आश्चर्य में डाल दिया। वास्तव में अब तक बहुत सारे नृपतियों में यह बात फ़ैल चुकी थी कि सम्राट नल की बलिष्ठ एवं अत्यंत सुन्दर देहयष्टि के आगे तो देवता भी मलिन दिखायी पड़ रहे थे तो मनुष्यों की बात ही क्या।

इन्ही सब कारणों से उस स्वयंवर में न केवल धरती के राजा, बल्कि देवता भी सम्राट नल का रूप धरकर आ गए। अब स्वयंवर में एक साथ कई नल खड़े थे। सभी लोगों के साथ-साथ विदर्भ नरेश भीमसेन भी परेशान थे कि असली नल कौन होगा।

लेकिन दमयन्ती जरा भी विचलित नहीं हुई। उसने अपने अंतःचक्षुओं से ही अपने असली नल को पहचान लिया। दमयंती को इस प्रकार से अपने ह्रदय सम्राट नल को पहचानते देख कर समस्त देवताओं ने भी उन दोनों का अभिवादन किया, और धरती के नृपतियों ने उनका अभिनन्दन किया।

इस तरह आंखों में झलकते भावों से ही दमयंती ने असली नल को पहचानकर अपना जीवनसाथी चुन लिया था। नव-दम्पत्ति को देवराज इन्द्र समेत सभी देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त हु्आ। दमयन्ती निषध-नरेश राजा नल की महारानी बनी। दोनों बड़े सुख से समय बिताने लगे।

दमयन्ती एक दिव्य स्त्री थी। पतिव्रता स्त्रियों में वह शिरोमणि थी। अभिमान तो उसे कभी छू भी न सकता था। कालानुक्रम में दमयन्ती के गर्भ से एक पुत्र और एक कन्या का जन्म हुआ। दोनों बच्चे माता-पिता के अनुरूप ही सुन्दर रूप और दिव्य मानवीय गुणों से सम्पन्न थे।

nal damyantiकिन्तु समय सर्वदा एक-सा नहीं रहता, दुःख-सुख का चक्र निरन्तर चलता ही रहता है। वैसे तो महाराज नल गुणवान्, धर्मात्मा तथा पुण्यश्लोक थे, किन्तु उनमें एक प्रबल दोष था ‘द्यूत’ यानी जुए का व्यसन। नल के एक भाई का नाम पुष्कर था। वह नल से अलग रहता था। यद्यपि पुष्कर स्वयं व्यसनी था एवं नल से भयंकर ईर्ष्या करता था। किन्तु नल के मन में उसके प्रति कोई दुराव नहीं था।

भाग्य ने पलटा खाया और पुष्कर ने उन्हें द्यूत क्रीड़ा के लिए आमन्त्रित किया। खेल आरम्भ हुआ। भाग्य अत्यंत प्रतिकूल हो रहा था और नल इसका अनुमान तक न लगा सके। उस द्यूत क्रीड़ा में नल हारने लगे। उनका सोना, चाँदी, रथ, राजपाट सब हाथ से निकल गया। महारानी दमयन्ती ने थोड़ा अनुमान लगा लिया था। उन्होंने प्रतिकूल समय जानकर तत्काल अपने दोनों बच्चों को विदर्भ देश की राजधानी कुण्डिनपुर भेज दिया।

इधर नल जुए में अपना सर्वस्व हार गये। यहाँ तक की उन्होंने अपने शरीर के सारे वस्त्राभूषण उतार दिये। केवल एक वस्त्र पहनकर नगर से बाहर निकले। उनकी धर्मपत्नी दमयन्ती ने भी मात्र एक साड़ी में पति का अनुसरण किया। दोनों नगर के बाहर वन में आ गए रहने के लिए।

एक दिन जंगल में राजा नल ने सोने के पंख वाले कुछ पक्षी देखे। नल ने सोचा, यदि इन्हें पकड़ लिया जाय तो इनको बेचकर निर्वाह करने के लिए कुछ धन कमाया जा सकता है। ऐसा विचारकर उन्होंने अपने पहनने का वस्त्र खोलकर पक्षियों पर फेंका। किन्तु वे पक्षी वह वस्त्र लेकर उड़ गये।

अब राजा नल के पास तन ढकने के लिए भी कोई वस्त्र न रह गया। नल का भाग्य प्रबल रूप से प्रतिकूल हो रहा था। नल अपनी अपेक्षा दमयन्ती के दुःख से अधिक व्याकुल थे। एक दिन दोनों जंगल में एक वृक्ष के नीचे एक ही वस्त्र से अपना तन छिपाये आराम कर रहे थे।

दमयन्ती को थकावट के कारण नींद आ गयी। इसी समय राजा नल के मन में विचार आया, दमयन्ती को मेरे कारण बड़ा दुःख सहन करना पड़ रहा है। जब तक मै इसके साथ रहूँगा यह मुझे छोड़ कर कहीं नहीं जायेगी। यदि मैं इसे इसी अवस्था में यहीं छोड़कर चल दूँ तो यह किसी तरह अपने पिता और पुत्रों के पास पहुँच जायगी।

ऐसा विचारकर उन्होंने तलवार से दमयन्ती की आधी साड़ी को काट लिया और उसी से अपना तन ढककर तथा दमयन्ती को उसी अवस्था में छोड़ कर वे चल दिये। दुखों की अधिकता से नल पूरी तरह टूट चुके थे। उन्हें अपने कृत्यों पर अत्यधिक पश्चाताप हो रहा था। किन्तु नल ने अपने आप को संभाला और प्रण किया  कि वो अपनी प्राणप्रिया पत्नी, अपने पुत्रों तथा अपने राज्य को वापस ले कर रहेंगे।

उधर जब दमयन्ती की नींद टूटी तो बेचारी अपने को अकेला पाकर करुण क्रन्दन करने लगी। भूख और प्यास से व्याकुल होकर वह भोजन की खोज में अचानक एक विशालकाय अजगर के पास चली गयी और अजगर उसे निगलने लगा।दमयन्ती की चीख सुनकर एक बहेलिये ने उसे अजगर का निवाला होने से बचाया। किंतु वह बहेलिया स्वभाव से दुष्ट था। उसने दमयन्ती के सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उसे अपनी काम-पिपासा का शिकार बनाना चाहा।

damyanti qweenकिन्तु दमयन्ती ने उसे धक्का दे कर भूमि पर गिरा दिया और श्राप देते हुए बोली “यदि मैंने अपने पति राजा नल को छोड़कर किसी अन्य पुरुष का कभी चिन्तन न किया हो तो इस पापी बहेलिये के जीवन का अभी अन्त हो जाय।” दमयन्ती की बात पूरी होते ही वह बहेलिया मृत्यु को प्राप्त हो गया।

कालचक्र का पहिया घूमा, दैवयोग से भटकते हुए दमयन्ती एक दिन चेदिनरेश सुबाहु के पास पहुँच गयी। राजा सुबाहु विदर्भराज भीमसेन के मित्र थे। उन्हें नल और दमयंती की दुर्दशा की कहानी सुन कर अत्यंत कष्ट हुआ। साथ ही इस बात का संतोष भी हुआ की अब दमयंती अपने पिता के महल में सुरक्षित पहुँच जायेगी।

उन्होंने दमयंती को यथोचित सम्मान के साथ, उसके पिता के पास पहुंचा दिया और नल की खोज में अपने गुप्तचर विभाग को लगा दिया। अंततः दमयन्ती के सतीत्व के प्रभाव से एक दिन महाराज नल के दुःखो का भी अन्त हुआ। दोनों का पुनर्मिलन हुआ और उनके सौभाग्य का सितारा चमका, राजा नल को उनका राज्य भी वापस मिल गया।






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