नल दमयंती की संपूर्ण कथा
नल दमयंती की संपूर्ण कथा।
नल-दमयन्ती' की कहानी हमारे इतिहासपुराण की अमर कथाओं में से एक है। यह कथा जहां आदर्श पतिव्रत और पत्नीव्रत की कहानी सुनकर सुख दुख में डुबकी लगाते हुए आगे बढ़ती है वहीं यह कथा है, जुए के भयंकर परिणाम की ओर भी इशारा करती है। यह कथा इस बात का संदेश देती है कि बुरी आदतें मानव को अपने पंजे में जकड़कर बुरे कार्यों के लिए किस प्रकार से विवश कर देती हैं। यह कहानी बताते हैं कि जब यह जुआ राजा को भी भिखारी बना देता है तो तुच्छ से या साधारण मानव की तो बात ही क्या है।
चलिए अब आते हैं अपनी बात पर और सुनाते हैं आपको नल दमयंती की कहानी।
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अर्जुन जब अस्त्र प्राप्त करने के लिये इन्द्रलोक चले गये, तब पाण्डव काम्यक वन में निवास कर रहे थे। वे राज्य के नाश और अर्जुन के वियोग से बड़े ही दुःखी हो रहे थे।
एक दिन की बात है, पाण्डव और द्रौपदी इसी सम्बन्ध में कुछ चर्चा कर रहे थे । अपमान की आग से जलते भीमसेन ने एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर से कहा, "भैया ! आपके जुआ खेलने की बुरी लत के कारण, हम लोग पुरुषार्थी होकर भी दीन-हीन हो गए हैं। जुए के इस खेल में फंसकर आपने ऐसा अनर्थ कर डाला कि हम कहीं के न रहे। अनुज नकुल सहदेव को तो देखो उनकी कोमल काया और मुख कैसा मलिन पड़ गया है। यदि वे दुष्ट आपका फिर खेलने के लिए बुलाएंगे तो आप फिर खेलने जाएंगे।"
जब धर्मराज युधिष्ठिर भीमसेन को समझा रहे थे कि तभी महर्षि बृहदश्व उनके आश्रम में आते हुए दिखाई पड़े।
महर्षि बृहदश्व को आते देखकर धर्मराज युधिष्ठिर ने आगे जाकर शास्त्रोक्त विधि के अनुसार उनका स्वागत सत्कार किया और उनको आसन पर बैठाया। उनके विश्राम कर लेने पर युधिष्ठिर उनसे अपना वृत्तान्त कहने लगे।
युधिष्ठिर ने कहा कि ‘ महाराज ! कौरवो ने कपट-बुद्धि से मुझे बुलाकर छल के साथ द्यूत खेला और मुझ अनजान को हराकर मेरा सर्वस्व छीन लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने मेरी प्राणप्रिया द्रौपदी को घसीट कर भरी सभा में अपमानित किया। उन्होंने अन्त में हमें काला मृगछाला ओढ़ाकर घोर वन में भेज दिया।
मेरे दुखी सम्बन्धियों ने मेरी द्यूत खेलने की आदत के कारण मुझे जो तीखी और कड़वी बातें कही है, उनके कारण मुझे रात-रात भर नींद भी नहीं आती। इस द्यूत में हम ठगे गए, हमारा अपमान हुआ है।'
महर्षे ! आप ही बतलाइये कि इस पृथ्वी पर मुझ-सा भाग्यहीन राजा और कौन है ! क्या आपने मेरे जैसा दुःखी और कहीं देखा या सुना है ? ‘
महर्षि बृहदश्व ने कहा – धर्मराज ! आपका यह कहना ठीक नहीं है कि मुझ – सा दुःखी राजा और कोई नहीं हुआ ; क्योंकि मैं तुमसे भी अधिक दुःखी और मन्दभाग्य राजा का वृत्तान्त जानता हूं । यदि तुम्हारी इच्छा हो तो मैं सुनाऊँ।
धर्मराज युधिष्ठिर के आग्रह करने पर महर्षि ने कहना प्रारंभ किया।
निषध देश में वीरसेन के पुत्र नल नाम के एक राजा हो चुके हैं। वे बड़े गुणवान्, परम सुन्दर, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, सबके प्रिय, वेदज्ञ एवं ब्राह्मणभक्त थे।
उनकी सेना बहुत बड़ी थी। वे स्वयं अस्त्रविद्या में बहुत निपुण थे। वे वीर, योद्धा, उदार और प्रबल पराक्रमी भी थे। उन्हें जूआ खेलने का भी कुछ – कुछ शौक था। उन्हीं दिनों विदर्भ देश में भीम नाम के एक राजा राज्य करते थे। वे भी नल के समान ही सर्वगुण सम्पन्न और पराक्रमी थे।
उन्होंने दमन ऋषि को प्रसन्न करके उनके वरदान से चार संतानें प्राप्त की थीं — तीन पुत्र और एक कन्या।
पुत्रों के नाम थे – दम, दान्त और दमन।
पुत्री का नाम था – दमयन्ती।
दमयन्ती लक्ष्मी के समान रूपवती थी। उसके नेत्र विशाल थे। देवताओं और यक्षों में भी वैसी सुन्दरी कन्या कहीं देखने में नहीं आती थी।
उन दिनों कितने ही लोग विदर्भ से निषध देश में आते और राजा नल के सामने दमयन्ती के रूप और गुण का बखान करते। निषध देश से विदर्भ में जाने वाले भी दमयन्ती के सामने राजा नल के रूप, गुण और पवित्र चरित्र का वर्णन करते। इससे दोनों के हृदय में पारस्परिक अनुराग अङ्करित हो गया।
एक दिन राजा नल ने अपने महल के उद्यान में कुछ हंसों को देखा। उन्होंने एक हंस को पकड़ लिया।
हंसने कहा- ‘ -‘आप मुझे छोड़ दीजिये तो हम लोग दमयन्ती के पास जाकर आपके गुणों का ऐसा वर्णन करेंगे कि वह आपको अवश्य – अवश्य वर लेंगी।
‘नल ने हंस को छोड़ दिया। वे सब उड़कर विदर्भ देश में गये।
दमयन्ती अपने पास हंसों को देखकर बहुत प्रसन्न हुई और हंसों को पकड़ने के लिये उनकी ओर दौड़ने लगी। दमयन्ती जिस हंस को पकड़ने के लिये दौड़ती, वही बोल उठता कि ‘अरी दमयन्ती !
निषध देश में एक नल नाम का राजा है। वह अश्विनीकुमार के समान सुन्दर है। मनुष्यों में उसके समान सुन्दर और कोई नहीं है। वह मानो मूर्तिमान् कामदेव हैं। यदि तुम उसकी पत्नी हो जाओ तो तुम्हारा जन्म और रूप दोनों सफल हो जायँ।
हमलोगों ने देवता, गन्धर्व, मनुष्य, सर्प और राक्षसों को घूम – घूमकर देखा है। नल के समान सुन्दर पुरुष कहीं देखने में नहीं आया। जैसे तुम स्त्रियों में रत्न हो, वैसे ही नल पुरुषों में भूषण हैं।
तुम दोनों की जोड़ी बहुत ही सुन्दर होगी।‘
दमयन्ती ने कहा - ‘हंस तुम नल से भी ऐसी ही बात कहना।‘ हंसने निषध देश में लौटकर नल से दमयन्ती का संदेश कह दिया। दमयन्ती हंस के मुँह से राजा नल की कीर्ति सुनकर उनसे प्रेम करने लगी।
उसकी आसक्ति इतनी बढ़ गई कि वह रात – दिन उनका ही ध्यान करती रहती। शरीर धूमिल और दुबला हो गया। वह दीन – सी दिखने लगी।
सखियों ने दमयन्ती के हृदय का भाव ताड़कर विदर्भराज से निवेदन किया कि ‘आपकी पुत्री अस्वस्थ हो गई है।‘
राजा भीम ने अपनी पुत्री के सम्बन्ध में बड़ा विचार किया। अन्त में वह इस निर्णय पर पहुँचा कि मेरी पुत्री विवाह योग्य हो गई है, इसलिये इसका स्वयंवर कर देना चाहिये।
उन्होंने सब राजाओं को स्वयंवर का निमन्त्रण – पत्र भेज दिया और सूचित कर दिया कि राजाओं को दमयन्ती के स्वयंवर में पधारकर लाभ उठाना चाहिये और मेरा मनोरथ पूर्ण करना चाहिये।
देश – देश के नरपति हाथी, घोड़े और रथों की ध्वनि से पृथ्वी को मुखरित करते हुए सज – धजकर विदर्भ देश में पहुँचने लगे।
भीम ने सबके स्वागत – सत्कार की समुचित व्यवस्था की। देवर्षि नारद और पर्वत के द्वारा देवताओं को भी दमयन्ती के स्वयंवर का समाचार मिल गया।
इन्द्र आदि सभी लोकपाल भी अपनी मण्डली और वाहनों सहित विदर्भ देश के लिये रवाना हुए। राजा नल का चित्त पहले से ही दमयन्ती पर आसक्त हो चुका था। उन्होंने भी दमयन्ती के स्वयंवर में सम्मिलित होने के लिये विदर्भ की यात्रा की।
देवताओं ने स्वर्ग से उतरते समय देख लिया कि कामदेव के समान सुन्दर नल दमयन्ती के स्वयंवर के लिये जा रहे हैं। नल की सूर्य के समान कान्ति और लोकोत्तर रूप – सम्पत्ति से देवता भी चकित हो गये।
उन्होंने पहचान लिया कि ये नल हैं। उन्होंने अपने विमानों को आकाश में खड़ा कर दिया और नीचे उतरकर नल से कहा – ‘
राजेन्द्र नल !
आप बड़े सत्यव्रती हैं। आप हम लोगों की सहायता करने के लिये दूत बन जाइये। ‘नल ने प्रतिज्ञा कर ली और कहा कि ‘करूँगा।
फिर पूछा कि ‘आप लोग कौन हैं और मुझे दूत बनाकर कौन – सा काम लेना चाहते हैं ?‘
इन्द्र ने कहा – ‘हम लोग देवता हैं। मैं इन्द्र हूँ और ये अग्नि, वरुण और यम हैं। हम लोग दमयन्ती के लिये यहाँ आये हैं। आप हमारे दूत बनकर दमयन्ती के पास जाइये और कहिये कि इन्द्र, वरुण, अग्नि और यम देवता तुम्हारे पास आकर तुमसे विवाह करना चाहते हैं। इनमें से तुम चाहे जिस देवता को पति के रूप में स्वीकार कर लो।
‘नल ने दोनों हाथ जोड़कर कहा कि ‘ देवराज !
वहाँ आप लोगों के और मेरे जाने का एक ही प्रयोजन है। इसलिये आप मुझे दूत बनाकर वहाँ भेजें, यह उचित नहीं है। जिसकी किसी स्त्री को पत्नी के रूप में पाने की इच्छा हो चुकी हो, वह भला, उसको कैसे छोड़ सकता है और उसके पास जाकर ऐसी बात कह ही कैसे सकता है ?
आप लोग कृपया इस विषय में मुझे क्षमा करें। क्रमश:-------- शेष अगली पोस्ट में-------
🩵❤️💛🧡💚💙💜🤎🩷
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