002. राजा नल का जीवन परित्र
भूमिका
मेरा मनोरथ बहुत दिन से था कि महात्मा नल और दमयंती का वर्णनं विपत्ति समय का कि महा भारत के बीच में था संस्कृत से भाषा वहं अब परमेश्वर कृपा से पूरा हुआ यह वृत्तान्त जगह और कई प्रकार से छपगया है परन्तुः जैसा महाभारत में बन पर्वस्थ था वैसा आर्य में यथार्थ उल्था किया जो महाराय राजा नल दमयंती का वर्णन प्रीति पूर्वक पढ़ेंगे वा सुनेंगे को कलि की बाधा न होगी, सच सज्जनों से ना है कि जहां कहीं भूल हो कृपाकर शुद्ध क वा मुझ को उस भूल से सूचित करें इस वृत्तान्त इने से शोक व हर्ष औरं महात्मांनल का सत्य रूिढ़ रहन्दा भली भांति बिदित होजायगा न लोग. इस को एक बार अवश्य पढ़ें अथवा
दोहा
व्यापक सब में रम रह्यौ, अन्तर जामी दृष्टि ।
बार बार बिनती करों , पूरन कर ममं इष्टि ॥१॥
परम दयालू ज्ञान निधि, गुणातीत अज ईश ।
तीन ताप नाशक प्रभू, दीन बंधु जगदीश ॥ २॥
पं. मुरलीधर शर्मा स्थान चीचली
प्रथमोऽध्याय
राजा नल का जीवन परित्र
महाराजा युधिष्ठरे जब बहुत से अति उदास हुए तब वृहदश्व महर्षि ने राजी नल का वृत्तान्त कहना आरंभ किया जिस रीति से नीचे वर्णन किया गया ॥ वृहदश्व बोले, अच्युत राजा युधिष्ठिर सावधान होकर भ्राताओं के साथ सुनी जो राजा तुम से अधिक दुखी हुआ।
निषधदेशों में बीरसेन नाम से विख्यात राजा हुआ उस का पुत्र नल नाम अर्थ में पंडित था, वह राजा छल द्वारा भाई पुष्कर से जय किया गया । यह हमने सुना और भार्या के साथ अति दुखी बनवासी हुआ, हे राजन् ! उस बनवासी के कभी न दास न शेष हुए नाथ न भ्राता न बांधव, और आप देवताओं की. तुल्य बीरभ्राताओं तथा ब्रह्मरूप श्रेष्ठ ब्राह्मणों से युक्त हो इस कारण सोचकरने के योग्य नहीं हो; युधिष्टिर बोले हे वक्ताओं में श्रेष्ठ ! मैं महात्मा नल के चरित्र को विस्तार के साथ सुना चाहता हूं सो मुझ से कहने के योग्य हो ॥
द्वितीयोऽध्यायारंभः
वृहदंश्य बोले बीरसेन का पुत्र बली नल नान राजा हुआ जो कि इंष्ट गुर्णो से युक्त रूपवाण और अश्व विद्या में पंडित था, वह देव राजा अर्थात् इन्द्र के समान राजाओं के मरतक पर स्थित हुआ और तेज से मूर्य की तुल्य सत्र के ऊपर विराजमान हुआ, ब्रहाराय, वेद जानने वाला शूर, निपथ देशों में. राजा था अक्ष विद्या को प्रिय मानने वाला सत्यवादी महा यक्षोहिणी का स्वामी, श्रेष्ठ स्त्रियों का ईक्षित उदार जितेन्द्री रक्षा करने वाला धनुप धारियों में श्रेष्ठ साक्षात . स्वयं मनुजी के तुल्य था, उसी प्रकार विदर्भ देशों में भीन नाम राजा हुआ जो कि भयानक पराक्रम वाला शूरं सब गुणों से युक्त संतान हीन और संतान का अभिलापी था, हे भरत वंशी उस वड़े सावधान ने संतान के अर्थ परम यत्ल किया दमन नाम ब्रह्म ऋषि उस के पास आये, हे राजेन्द्र उस धर्मज्ञ संतान के इच्छामान राजा भीमने पटरानी के साथ. उस बड़े तेजस्वी ऋषि को सत्कार से प्रसन्न किया, महा यशस्वी दमन ऋषि ने उस भार्या सहित राजा के अर्थ कन्या रत्न दमयन्ती नाम. और बड़े सब गुणों से युक्त भयानक. पराक्रम वाले तीन पुत्र दम, दन्त, दमन नाम रूप बर को दिया अर्थात् यह कहा कि तेरे गृह में एक कन्या और तीन पुत्र होंगे, उस समध्यमा दमयंती ने [३]
लोकों के मध्य रूप तेज यश शोभा सौभाग्यं के द्वारा यश को पाया, उसके पीछे उस के युत्रा होने पर समलंकृत दासी और सखियों का एक २ सैकड़ा उस की उपासना अर्थात सिबकाई करने लगा जिस प्रकार सचिइन्द्रानी को, वहां सत्रियाँ के मध्य राजा भीमं की पुत्री सब आभरणों से भूषित और निर्दोष अंग इस प्रकार शोभायमान हुई जैसे बरसा के बादलों के मध्य बिजली, वह दीर्घ नेत्र लक्ष्मी की तुल्य अत्यंत रूप वान थी वैसी रूपवती देवता और यक्षा में कहीं नहीं देखी, और मनुष्य लोकों और दूसरे लोकों में भी न देखी न सुनी, वह सुंदरी वाला देवता ओं के चित्त को भी प्रसन्न करने वाली थी, और नरोत्तम नल भी पृथ्वी पर और लोकों में अप्रतिम और आप अपने रूप से मूर्तिमान कामदेव की समान हुआ, उम्र के समीप कुतूहल से नल की प्रशंसा की और नल के समीप बारंवार दमयंती की प्रशंसा किया, निरंतर गुणों को सुनते उन दोनों की प्रीति बिना दर्शन उत्पन्न हुई, हे कौन्तेय वह हृदय में शयन करने बाला काम परस्पर वृद्धि युक्त हुआ, तब नल हृदय से उस काम के धारण करने को समर्थ नहीं हुआ अंतः पुरके समीप विद्यमान वन के मध्य एकान्त में प्राप्त रहता था, उस के पीछे, उसने सुनहरी पक्ष वाले हंसों को देखा उन बन चारियों के मध्य एक पक्षी को पकड़ लिया, तब उसके पीछे अंतरीक्ष में प्राप्त पक्षी ने नह [8]
को कहा, हे राजन मैं तेरे हाथ से मारने को योग्य नहीं हूं तेरा प्रिय करूंगा, हे नैपथ तुम को दमयंती के समीप कहूंगा जिस प्रकार वहः तेरे सिवाय दूसरे पुरुप को कभी नहीं चाहेगी, उस के पीछे इस प्रकार कहे हुए राजा ने हंस को छोड़ दिया फिर वे हंस उड़कर विदर्भ देशों को गये, तब फिर वे पक्षी विदर्भनगरी को जाकर दमयंती के समीप भूमि पर उत्तरे उसने उन गणों को देखा, वह सखियों से युक्त और हृष्ट उन अद्भुत रूपं आकाश गामियों को देखकर पकड़ने को शीघ्र पास गई, फिर हंस नित्ये स्त्रियों के बन में इधर उधर फैल गये तब एक २ कन्या उन हंसों की थ्रोर दौड़ी, फिर दमयंती समीप ही जिस हंस की ओर दौड़ी वह मानुषी वाणी को करके दमयंती को बोला, हे दमयंती निषधं देशों में अश्विनी कुमारों के समान रूप बान नल नाम राजा है उस के समान मनुष्य नहीं है, वह आप रूप से मूर्तिमान कामदेव की तुल्य हुआ, हे वरर्णािने जों तुम उसकी भार्या हो, तोहे सुमध्यमे तेरा जन्म और यह रूप सफल होथै, हमने देवता गंधर्व मनुव्य उरंग और राक्षसों को देखा, हमने उस प्रकार का नहीं देखा तुम भी स्त्रियों में रत्न हो और नल नरों में श्रेष्ट है, विशिष्टः का विशिष्ट के साथ काम युद्ध गुण वान होवै, हेरांजन हंस से इस प्रकार कही हुई दमयंती वहां उस हंस को बोली तुम भी इस प्रकार नल से कहो, हे राजन पक्षी ने विदर्भ [५]
की कन्या को तथारतु कहकर निषध देशों को श्राकर नल से सब वर्णन किया ॥
द्वितीयोऽध्यायासमाप्तः
तृतियोऽध्याचारंभः
बृहदश्य बोले हे भरतवंशी वह दमयंती हंस के उस वचन को सुनकर तब से ही नल के विषय व्याकुल हुई, तब उसके पीछे दमयंती चिंता युक्त दोन विवर्ण मुख कुश और स्वास लेने वाली हुई, फिर क्षणमें ही यह दृष्टि ध्यान परा उन्मत्त दर्शन पांडुवर्ण और कामदेव से आविष्ट मन हुई, वह शैया आसन और भोगों में कहीं रत्ति को नहीं पाती थी फिर हाय २ करके रोती न दिन च रात को सोती, तब उन सखिओं ने उस रूपवती अश्वस्त उस दमयंती को अंगों की चेष्टा से जाना उस के पीछे दमयंती की सखियों ने विदर्भके स्वामी, राजा के पास अश्वस्थ दमयंती को निवे-दन किया, राजा भीम ने सत्रीगण से उस दमयंती को सुनकर अपनी पुत्री के विषय उस बड़े कार्य को विचार कियां, अब मेरी यह पुत्री अश्वस्य दीखती है क्या बात है, उस राजा ने अपनी पुत्री को युवान विचार कर आप से करने योग्य दमयंती के स्वयंवर को देखा, हे प्रभु उस राजाने राजाओं को निमंत्रण किया कि हे वोरो यह स्वयंवर देखना चाहिये तव पृथ्वी के स्वामी सब राजा दमयंती के स्वयंवर को सुनकर राजाभीम की आज्ञा से हाथी, घोडा, और रथ के घोप से पृथ्वी को पूर्ण करते विचित्र माला आभरणों युक्त अच्छी अलंकृत दर्शन योग्य सेनाओं के साथ राजाभीम के पास गये, महा बाहु भीम ने उन महात्मा राजाओं की पूंजा को यथा योग्य किया और वे पूजित वहां वसे, इसी काल पर देवऋषियों में उत्तम महात्मा महा ज्ञानी महा व्रती अच्छे पूजित नारद और पर्वत ऋषि इस लोक से जाकर इंद्र लोक में घूमते देवताओं केः भवनों में प्रवेश हुए, उस के पीछे समर्थ इंद्र ने उन दोनों की पूजाकर उन की सर्व-गत कुशल और अनामय को पूछा, नारदजी बोले हे तम-र्थ देवता ईश्वर हम दोनों की कुशल सर्वत्रं प्राप्त है और संपूर्ण लोक में राजा कुशली है, वृहदश्व बोले वलं वृता सुर के मारने वाले इंद्र ने नारदजी के बचनों को सुनकर पूछा कि धर्म के जानने वाले और जीवितकोछोड़ कर लड़ने वाले राजा लोग जो विमुख न होने वाले काल परः शस्त्र से मरन को पाते हैं जिसी प्रकार मेरा, वे शूर क्षत्री कहां हैं मैं उन अपने प्रिय अतिथि आये हुए राजाओं को नहीं देखता हूं, इंद्र से इस प्रकार कहे हुए नारद जी बोले हे इंद्र मुझ से सुन जिस कारण से राजा लोग नहीं दीखते हैं राजा विदर्भ की पुत्रीः दमयंती नाम से विख्यात है जिस ने [৩] रूप से पृथ्वी पर स्लियों को उलंघन किया है, हे इंद्र थोडे ही काल में उस का रवयंवर होगा, वहां राजा श्रोर सत्र राजपुत्र जाते हैं, हे वत्त वृत के मारनेवाले राजा लोग उरा लोक की रत्न रूप कन्या को चाहते विशेष इच्छा भान हुए, इस बात के कहने पर देवताथों में श्रेष्ट लोकपाल अग्नि देवता सहित देव गज के समीप आये, उसके पीछे उन सबने नारदजी के. सहा वाक्य को सुना और सुनते ही हृष्टमन वोले कि हम भी जरंगे, हे गहाराज उस के पीछे वे सब देवतागण और वाहन सहित विदर्भ देशों को गये जिस मार्ग से सब राजा जाते थे, हे कौन्तेय अदीन आत्मा और दमयंती का अनुवृत राजा नल भी. राजाओं के समागम को सुन कर चला, उस के पीछे देवताओं ने मार्ग में भूतल पर रिथत नल को देखा जो कि रूप संपत्ति से साक्षात मूर्तिमान कामदेव की तुल्य था, चे लोकपाल उस राजा नल को सूर्य की तुल्य प्रकाशमान देख कर रूप संपत्ति से विस्मितः और नष्ट संकल्पस्थित हुए, उस के पीछे देवता आकाशः तल से उतरकर और अंतरीक्ष में विमानों को खड़ा करके राजा नल को बोले, हे निषधदेशों के राजेंद्र नल श्राप सत्य वृत हैं हमारी सहायता करो हे नरो त्तम हमारा दूत हो ॥
चतुर्थोऽध्यायारंभः
बृहदश्व बोल हे भरतवंशी नल उसके साथ यह प्रतिज्ञा करूंगा करके फिर कृतांजलि और समीपस्थित ने इन को पूछा, निश्चय आप कौन हैं और यह कौन हैं मैं जिस का इक्षित दूत हूं और तुम्हारा वह कार्य मुझ से कौन है सत्य कहो, नल से इस प्रकार क-हने पर इंद्र देवता बोले हम को दमयंती के अर्थ 'आये हुए देवता जानो, हे राजन् में इंद्र हूं यह आनि है उसी प्रकार यह जों काःस्वामी वरुण है और म. नुष्यों के शरीरों का नाश करने वाला यह यमराज भी है, तुम ही आये हुए हम् देवताओं को दमयंती से कहो कि यहां इंद्र थादि लोकपाल दर्शन कांक्षी आत हैं, इंद्र अग्नि वरुण और यम नाम देवता तुम को प्राप्त करना चाहते हैं उन में एक देवता को पतित्व में चरो, इंद्र से. इस प्रकार कहा हुआ यह नल हाथ जोड़ कर बोला एक प्रयोजन से प्राप्त होने वाले नुझ को. भेजने को योग्य नहीं हो, हे ईश्वरो संकल्प करने बाला मनुष्य किस प्रकार दूसरे के अर्थ स्त्री से ऐसा कहने को उत्साह करै उस कारण से मुझ पर क्षमा करो, देवता वोले हे सजा. निपथ. तू हमारे साथ प्रथम. यह प्रतिज्ञा करके कि करूंगा फिर किस कारण से नहीं करेगा जायो देर मत करे।, वृहदश्व बोले उन देवताओं से इस प्रकार कहा हुआ वह नल फिर चोला 9 कि राज भवन अच्छे प्रकार रक्षित है प्रवेश करने को कैसे उत्साह करूं, इंद्र फिर उस को घोले कि प्रवेश करेगा, वह नलं बहुत अच्छा कहकर दमयंती के भवन को गया, वहां पर सखीगंण से युक्त शरीर और शोभा से दीप्यमान वरवर्णिनी, अत्यंत कोमल अंग, सूक्ष्म कमर, सुंदर नेत्र, और अपने, तेज से चंद्रमा की प्रभा को निरादर करने वाली दमयंती को देखा उस चारु हासिनी को देखते ही उसका कामं बढ़ा सत्य करने के इच्छा मान नलने हृदय में शयन करने वाले काम को धारण किया, उस के पीछे वे श्रेष्ट त्रियां राजा नल को देख कर उस के तेज से अभिभूत और संभ्रांत आसनों से उठ खड़ी हुई अति प्रसन्न और आश्चर्य से युक्त उन स्त्रियों ने नल की प्रांरा। की, इस से नहीं बोली परंतु भनोंसे पूजन किया, महात्मा का रूप कांति और धैर्य अद्भुत है यह कोई देवता वा यज्ञ वा गंधर्व होगा, वे श्रेष्ठ स्त्रियां उसके तेज से धर्पित और लज्जापती उस से कुछ कहने को समर्थ नहीं हुई, इसके पीछे मंदमुस्कान पूर्वकं वोलने दानी आश्चर्य युक्त दमयंती इस भंदमुस्कान करने वाले वीर नल को बोली, हे निर्दोष सब अंग मेरे कामदेव को बढ़ानेवाले, तुमको जाना चाहती हूं यहां किस प्रकार आना हुआ, मेरा भवन अच्छा रक्षित है और राजाभी उस आज्ञा वाला है, दमयंती से इस प्रकार कहें हुए नंलनें उस को उत्तर दिया हे कल्याणी [१०] यहां आये हुए मुझको देवताओं का दूत जानो, इंद्र अग्नि वरुण और यम देवता तुम को प्राप्त करना चा हते हैं, हे शोभने उन्हों में एक देवताको पति कर, उन्हीं के प्रभाव से श्रातिथ्य में प्रवेश हुया और मुझ प्रवेश करने वाले को किसी ने नहीं देखा और रोका भी नहीं, हे भद्रे मैं इसी लिये सुरसत्तमों की ओर से भेजा गया, हैं शुभे इस बात को सुनकर युद्धि करो जिस प्रकार चाहती है।
पंचमोऽध्यायारंभः
1 दृहदश्व वोले वह दमयंती श्रद्धा अनुसार दे-वताओं के अर्थ नमस्कार करके और हँस कर बोली हे राजन् मुझ को बरो, मैं आप की क्या सेवा करूं हे ईश्वर मैं और जो दूसरा कुछ मेरा धन है वह रात्र आपका है, विश्वास पूर्वक विवाह करो, हे राजन् हंसों का-जो बचन है वहः मुझ को जलाता है, हे चीर तेरे ही निमित्त मैंने राजा इकट्ठे किये, हे सनद तुम जो मुझ चाहने वाली को उत्तर दोगे तो मैं आप के कारण से विप अग्नि जल और फांसी में स्थित हूंगी, तव दसयं-ती से इस प्रकार कहे हुए नल ने उस को उत्तर दिया, लोकपालों के स्थित होनेः परः किस कारण से [११] मनुष्य को चाहती है, में जिन लोक कर्त्ता महात्मा ई-रावरों के पद रन की तुल्य नहीं हूं उन में मन लगाना चाहिये, मनुष्य देवताओं के अप्रिय को कत्र्ता मृत्यु हो पाता है, हे अदोए अंग मुझ को रक्षा करो और सुरोत्तमों को वर, देवताओं को प्राप्त करके रज.हीन पत्तों तथा दिव्य और चिंत्र माल्लाओं और मुख्य भूषणों को भांगो, जो इस संपूर्ण पृथ्वी को संक्षेप करके फिर निगलता है उस देवताओं के ईश्वरः यशि को कोन पति नहीं करे, जिस के दंड भयसे सव जीव समूह इकट्ठे धर्म को है। करते हैं, कौन स्त्री उसको पति नहीं बरे, उस धर्मात्मा महात्मा दैत्य दानयों के मर्दन करने वाले सब देवताओं के महेन्द्र को कौन स्त्री पति नहीं करे, इस सुहृद बचन को सुन और अशंक मन ने लोकपालों के कारण को करना चाहिये जो तू मानती है, इसके पीछे नल से इस प्रकार कही हुई वह दमयंती शोकोत्पन्न जल से पूर्ण नेत्रों के साथ इस बचन को वोली, हे पृथ्वी पति में सब देवताथो के अर्थ नमस्कार करके तुमही भरता को बरती हूँ, यह तुम से-सत्य कहती हूं, उसके पीछे राजा उस कंपित और कृतांजलि को बोला हे कल्याणीः हे भद्रे, दूत भाव से प्राप्त होकर उसी प्रकार करना उ-चित है, में विशेष कर देवताओं के समीप प्रतिज्ञा करके और दूसरे के अर्थ यत्र का आरंभ करके यहां कैसे अपने प्रयोजन को उत्साह करूं, जो यह धर्म है तो
[१२] उस से मेराभी स्वार्थ होवे, हे भद्रे इस प्रकार अपने प्रयोजन को करूंगा उसी प्रकार करना चाहिये, उस के पछि शुचि स्मिता दमयंती अश्रु से व्याकुल दचनं को धीरे २ कहती राजा नल को धोली, हे नरेश्वर यह अक्षय उपाय मैंने देखा, हे राजन् जिस से किसी प्रकार ओप का दोष न होगा, हे नर श्रेष्ट तुम और देवता जिन के आगे चलने वाले इंद्र हैं सत्र साथ छात्रो जहां मेरा स्वयंबर है, हे नरेश्वर उस के पीछे मैं तुम को लोकपालों के समीप वरूंगी हे नरोत्तम इस प्रकार दोप नहीं होगा, हे राजन् दमयंती से इस प्रकार कहा हुआ राजा नल फिर वहां आया जहां पर देवता इकट्ठे थे, लोकंपाल महेश्वरों ने इल प्रकार आते हुए उसको देखा और देखकर फिर बह सब ही वृतान्त इस का पूछा, हे राजन् शुचि स्मिता दमयंती तुमने देखी हम सब को क्या कहा, हे निष्यांप भूमि पति उस को कहों, नल बोला मैं आप से आज्ञा दिया हुया दमयंती के भवन को प्रवेश हुआ, जो कि दंडधारी वृंडे गुरुपों से युक्त (महान् राज हार प्रवेश वाला था) योप के तेज से सिचार्य उस राजपुत्री के किसी मनुष्य ने वहां प्रवेश करने वाले मुझ को नहीं देखा, हे देवेश्रों मैंने इस की सखियों देखी और उन से भी मैं देखा गया, वे सब मुझ को देख कर श्राश्चर्य युक्त हुई, हे सुरोत्तमो मेरी ओर से श्राप के वर्णन होने पर वह सुंदर मुखी दमयंती मेरा संकल्प [9] करने वाली मुझ को ही वरती है, वह बाला मुझे को बोली कि हे नरोतम सर्च देवतों सहित आओ जेहीं मेरा स्वयंवर है, 'हे नैपर्ध में 'तुम को उनके समीप बरूंगी हे महा वाहू इस प्रकार आप को दोष नहीं होर्मा हे स्वर्ग के ईश्वर देवताओ इतना ही वृत्तान्त है जिस प्रकार मैंने कहां शेष अप्रमाण हो।
पठमोऽध्यायारंभ
वृहदश्व बोले इंत के पीछे शुभः काल तथा पुण्य तिथि और क्षण के प्राप्त होने पर राजाभीमं ने स्वयंवर में राजाओं को बुलाया, काम देवासे पीडितों और दमयंती को चाहने वाले सकराजा उरूं वचन को सुनकर शीघ्र आये हुये राजा कनका स्तंभ वाले रुचिर बर्हिद्वार से शोभायमानत्ररंग में प्रवेश हुए, वहां संध और मालाओं के धारण करने वाले और उज्वल कुंडल घारी सब राजा लोग नाना प्रकार के आसनों पर बैठ गये, जिस प्रकार नागों से भोगवती और व्याधों से गुहा को पूर्ण देखें उसी प्रकार उस पवित्र राज सभा को पुरुषोत्तमाँ से पूर्ण देखा, उस सभा में परिघ की उपमा रखने वाली रूप वर्ण से मनोहर और पुष्टभुजा पांच सिंर अखने वाले सत्रों की समान दृष्टिगोचर हुई, राजाओं के सुंदर केशान्त और सुन्दर हातिका नेत्र-भू, और मुख शोभायमान हुए, जैसे नक्षत्र आकाश में, उस के पीछे शुभ मुरही-दमयंती अपनी प्रभा से राजाथों के नेत्र और मनों को हरण करती रंग में प्रवेश हुई उन देखने वाले महात्मत्यों की दृष्टि उस के झोगों पर पड़ी और उसी २ अंग पर लगी रही और वहां से चलित न हुई, हे भरतवं-शी उसके पीछे राजाश्रओं के नाम का कीर्तिन होने पर दनयंती ने तुल्य रूप बाले पांच पुरुषों को देखा, उत्त के पीछे उन सब सुल्य रूप स्थितों को देखकर दमयंती ने संदेह से राजा नल को नहीं जाना, उन्हों से जिसार को देखाः उस २को राजा नल माना इस के पीछे शोचती हुई उत्तः मानिनी ने विचार किया किस प्रकार देवतायों को जानूं और कैसे राजानल को जानूं, इसः प्रकार शोचतीः वह दमयंती अति दुखी हुई, हे सरतवंशी उसने सुने हुए देव चिन्हों को विचार क्रिया, मैंने देव देवताओं के जो चिन्ह वृद्धौंस सुने, वहां भूमि परत्थित उन देवताओं में एक भी उन चिन्ह को नहीं दे-मंती हूं, उर्तते बहुत मकाः से निश्चय करके और वारंवार विचार कर देवताओं की शरण विषय ससंङको आप्त माना, बह हाथ जोडकर वचन मन से देवताओं के श्रार्थ नमस्कार करके, कांपती हुई यह बोली, जिसःप्र कार मैंने हँसाँके व्रचन सुतकर राजा तिप्रश्न को पतित्वः में द्वरा, हे देवताओ उस सल से उसे मुझे जतलायो और जिस प्रकार मैं मन और बचने से दूसरे में अन नहीं लगाती हूं, हे देवर्ताओं उस सत्य सेन्उसै को मुझे जतलाओ और जिस प्रकार वहां राजा निषधे देवताओं की ओर से सेरॉ भर्त्ता रचा गया। उस मेले सत्य से देवता उसी को मुझे जितलाओ, जिस प्रकार मैने नल के आर/धन में यह वृतः आरम्भ किया हे देवताओ उस सत्य से उसीको मुझेजतलाओ महेन् श्चर लोकपाल। अपनेही रूपको करो, जिस प्रकार पवित्र यश वाले राज्य को मैं भी जानू, दमयन्ती के उसक रुणा बिलाप को सुनकर और नल में परम निश्चयः और सच्चे श्रनुराग को और नल के मनकी शुद्धि बुः द्दि भक्तिः और प्रीतिः को दिखक्रर, देवताओं ने शरीरी धारण विषयां अंपत्ती लामध्ये को, उसी प्रकार किया, जिस प्रकार दमयन्ती ने कहा, उसादमयन्ती ने सर्व देवताओं को स्वेदः हीनस्तवव्या लोचन [पले कालोचनः मारने से रहितानेत्र] और हृषितमाली बालम जिसे हीन और पृथ्वी क्रो स्पर्श नाकस्ते स्थित देखा, और छायाः रखने वाला म्लायमान माला वाला प्योर स्त्रेद से युक्त और ध्भूसि पर स्थित राजा नलः एक्रे निमेप में हीं जाना गया है। सरतवंशी पांडव उस भीमः कों पुत्री दमयन्ती ने उन देवताओं को और पवित्र यश वाले नल को देखकर, धर्म से राजा निषीको बरा, उस बड़े नेत्र और अंति लज्जांमाना वस्त्रांत पर पर्कड़ लिया, उसत्वरुरुवणिनी ने वहां पर प्ररम शोभाय गान माला को स्कंधदेश पर छोडा और इस को पति तत्व में बरा, हे भरतवंशी उस के पीछे वहां पर राजाओं की ओर अकस्मात हा हा शब्द कहा गया और देवतात्रों और महपियों से भला भला यह कहा गया, राजा नल की प्रशंसा करने वाले आश्चर्य युक्त पुरुर्षो से शब्द उधारण किया गया, हे कौरव्यो बोरसे-नके पुत्र राजा नन्दने अति हृष्ट अंतगत्मा के नाथ उसे बरा दन्यस्ती को आश्वासन दिया, हे कल्याणी जिस का-रण तू देवताओं के समीप पुरुषों को चाहती है, उस कारण से तेरे बचन में प्रीति करने वाले मुझ भरता को जान, हे शुचिस्मिते जब तक मेरे प्राण शरीर में स्थित रहेंगे., तच तक तुममें प्रीति रखने वाला हंगा, यह तुझ से सत्य कहता हूं, तथा कृतांजलि दमयन्ती ने बहनों से नल को प्रसन्न करके, फिर थे परस्पर प्रसन्नं हो दोनों अग्नि पुरोगम देवताओं को देख कर मन से उन्हीं देवताओं की शरण गये, दमयन्ती से राजा नल के वरे जाने पर बड़े तेजस्त्री अति हृष्ट नन सच लोकपालों ने नल के अर्थ आठ वर दिये, प्रसन्न उन शचीपति इंद्रने नलके अर्थ दो वर दिये यज्ञ में 'देवताओं का प्रत्यक्ष दर्शन, २ उत्तम और शुभ गति, हुन को भोजन करने वाले अग्नि देवता ने उन नंल अर्थ दोवर दिये- १ अपना प्रगट होना जहां पर नल चाहे, अपने तुल्य प्रभावान लोकों को, यम, देवता ने अन्न रने और धर्म में परमस्थितः को दिया, और जलों के खामी वरुणने दो वर ड़िये, १ जल्लों का प्रगट होना जहां पर नल चाहे, २ उत्तम गंध से युक्त माला, सचने दो २ वर दिये, वे देवता इस प्रकार बरा को उसे देकर रवर्ग को गये, शाश्चर्य से युक्त प्रसन राजा लोग इस के और दमयन्ती के विवाह को देख कर अपनी राजधानियों को गये, पार्थिवैदों के चले जाने पर प्रसन्न और बड़े बन वाले राजा भीमने दमयन्ती और नल के विवाह को कराया, हिपायों में श्रेष्ट नज वहां इच्छा के अनुसार वास करके भीम से आज्ञा दिया हुआ अपने नगर को गया, हे राजन् वह पवित्र यशवाला राजा स्त्री रत्न को पाकर उस के साथ रमण करने वाला हुश्रा, जिस प्रकार बल वृत्रा-सुर का मारने वाला शचि के साथ, अति प्रसन्न और सूथ की तुल्य प्रकाशमान धर्म से पालन करके बीर राजा नलन प्रजा को प्रसन्न किया, बुद्धिवान नल ने नहुप के पुत्र ययाति के समान अश्वमेध यज्ञ और पूर्ण दक्षिणा वाले दूसरे बहुत यज्ञों से भी यतन किया, फिर देवता की उपमा रखने वाला नल दमयन्ती के साथ रमण योग्य वनों और उपबनों में बिहार करने वाला हुअ', बड़े मन वाले नल ने दमयन्ती से इंद्रसेन नाम पुत्र और इंद्रसेना नाम कन्या को उत्पन्न किया हे राजन् इस प्रकार यज्ञ करते शौर बिहार करते उस राजा नलने धन से पूर्ण पृथ्ची को रक्षा किया ॥ [८]
सप्तमोऽध्यायारंभः
वृहदश्य बोले दमयन्ती से राजा नल के भरे जाने पर बड़े तेजस्वी जाते हुए लोकपालों ने कलियुग के नाथ याते हुए ह। पर को देखा, इस के पीछे चल वृत्तानुर के मारने वाले इंद्र कलि को देखकर बोले, हे कलि, अपने सारथी द्वापर के साथ कहां जायेगा, उस के पीछे कलि इंद्र को बोला में दमयन्ती के त्व-यंवर को जाकर उस को बहेंगा मेरा मन उस में लगा है, इंद्र हँस कर उस को बोले कि वह स्वयंवर समाप्त हुथा, और उस ने हमारे समीप राजा नल पति बरा, जब इंद्र से इस प्रकार कहा हुआ काल कोप से युक्त होकर सब देवताओं को संबोध करके इस बच्चन को बोला, जो उस ने देवताओं के मध्य सानुप को पति प्राप्त किया, वहां उसका बड़ा दंड धारण न्याय के योग्य होवे, कलि से इस प्रकार कहे हुए उन देवताओं ने उत्तर दिया हमारी ओर से भले प्रकार आज्ञा होने पर दमयंती से नल बरा गया, सब गुणों से युक्त राजा नल को कौन स्त्री आश्रित नहीं को जो व्रत करने वाला सब वेद धर्मों को ठी-क जानता है, और जो सब चारों वेदों को जितका [१६] पांचवां इतिहास है पढ़ता है और जिस के गृह में चारों वेद सदा धर्म से यज्ञ में तृप्त हैं, और जो अ-हिंसा में प्रीति रखने वाला सत्य वादी और हढ़ वृत है और जिस को लोकपान्त के समान पुरुषोत्तम राज में सत्य (यथार्थ भापण) धृति ज्ञान तप (सुधर्म निष्ठ) शौच (बाधाश्यन्तर को) दस (बाछेन्द्रियनिग्रह) शम (मनकानिग्रह) ये सब गुण पुत्र धर्थात विघ्ना से भी प्रवाप्य है, हे कति जो पुरुष ऐसे रूप बालें नल को ज्ञार देने की इच्छा करें वह मूढ आप को शाप देवें और छाप को सारे, हे कति आ पुरुष ऐसे गुण बान नल को शाप दिया चाहे वह बड़े अगाध हृदय रूप और कष्ट नरक नैड्य जावे, देवता कलि और डापर | को इस प्रकार कहकर स्वर्ग को गये, उस के पीछे देव-ताओं के चले जाने पर कलि द्वापर को बोला है हापर में कोप को दूर करने को उत्साह नहीं करूं, नल के शरीर में वसुंगा, मैं उस को राज से भृष् करूंगा वह दमयन्ती के साथ श्रासक्ति नहीं करेगा नू भी पाशों में प्रवेश होकर सहायता करने योग्य है !!
अषटमअध्योऽध्यायारंभः
वृहदश्व बोले वह कति द्वापर के साथ इस [२०] प्रकार संकेत करके उस के पीछे वहां से श्राया जहां राजा नल था, वह कलि नित्य अंतर को चाहता नि-पध देशों में दीर्घ काल तक बसा, फिर कलि ने घारयें घग्स इसके अंतर को देखा, राजा नल ने नूत्र करके आचमन न करके और दोनों पाद के शौच को न करके संध्योपासन किया, वहां कलि ने इस में प्रवेश किया, उसने नल में प्रवेश करके और दूसरे रूप से पुष्कर के समीप जाकर उस को यह कहा, चल नल के साथ द्यूत कर, मुझ सहित श्राप द्यूत में नल को जीतो, राज्य को और नल को जीत कर निपधदेशों को प्राप्त कर, कलि से इस प्रकार कहा हुआ पुष्कर नल के पास गया, और कलि भी श्रेष्ट पात्रो होकर पुष्कर के पास गया, फिर शत्रु के मारने वाले बता पुष्कर ने बीर नल को पाकर वारंवार कहा कि मुख्य पाशों से खेलें, उस के पीछे बड़े मनचाले राजा ने देखती दमयंती के समीप आव्हान को नहीं सहा, तब कलि से आत्रिष्ट नलने हिरण्य नान सुवर्ण और रथादि वाहन और बस्त्रों के समूह को हारा, सुद्दों में कोई पुरुप उस पाशों के मद से मतवाले खेलते अरिंदम नल के निवारण में समर्थ नहीं हुआ, हे भरतवंशी उस के पीछे सब पुरवासी जन मंत्रियों के साथ उस आतुर राजा के देखने और निवारण करने को आये, उसके पीछे सूतने पास आकर दमयंती से निवेदन किया हे देवी यह कार्यवान पोरजन द्वारपर [२१] स्थित है राजा नल से निवेदन कीजिये, राजा के व्यसन को न सहने वाले और धर्म अर्थ के दिखाने 'बॉले संब प्रकृति जन स्थितं हैं, उस के पीछे अश्रु से व्या कुल नयन और दुख से कर्षित और शोक से उपहें-तचित्त दमयंती नल को बोली, हे राजन् राजभक्ति को आगे करने वाले पौरजेन सच मंत्रियों के साथ ऑप के दर्शनाकांक्षी'द्वार पर स्थित हैं, उन के देखने यो-ग्य हो इस प्रकार वारंवार कहा, उस प्रकार बिपि कंरती उस रुचिरांगी को कति से श्राविष्ट राजानेले कुछ नहीं बोला, उसके पीछे वे सब मंत्री और पुरवासी दुख से पीड़ित और लज्जित यह नहीं है अर्थात नष्ट हुआ यह कहते अपने स्थान को गये, हे युधिष्ठिर उस प्रकार पुष्कर और नल का यह द्यूत बहुत मंहीं-नौ तक हुआ फिर पवित्र यंश वाला नल हारी ॥
नमोऽध्यायारंभः
वृहदश्व बोले हे राजन् उस के पीछे सावधान दमयन्ती उसं पवित्रः यशः बाले और खेलने में मूढः राजा को उन्मन्त्त की ससान देखकर, फिर-भय शोक सेः भरी हुई भीम की पुत्री ने राजा के विषय उस बहुत बडे कार्य को बिचार किया, वह उस पाँपी को [२२] शंका करती और उस राजा के प्रिय को करना चाहती सब धनः हारे हुए नल को जानकर, उसे बड़ी यश बान हितकारी सब अर्थ में कुशल अनुरक्त सुभापणी परिचारिका वृहतसेना नाम धात्री को यह बोली, हे वृहत्सेना; जाओ और नल की आज्ञा से श्रमात्यों को बुलाकर कहो जो द्यूत में हारा और जो धन शेप से उस के पीछे वे सब मन्त्री नल की आज्ञा को जानकर और हमारा भी भाग घेयहो यह कहकर नल के पास गये, दमयन्ती ने निवेदन किया कि हे तात सब प्रकृति जनः दूसरी बार उपस्थित हुए, उसने अंगीकार नहीं किया, वचन को अंगीकार न करने बाले भर्चा को, देखकर वह लज्जित दमयन्ती फिर भवन में प्रवेश हुई, वह दमयन्ती पवित्र यश वाले नल से पाशों को, निरन्तर विमुख और नल. को सब धन को हारने बाला सुनकर फिर धात्री को बोली, हे कल्याणी 'वृहत्सेना फिर जाओ, और नल की आज्ञा से सूत वा-प्ौय को लाओ बड़ा कार्यर्थ उपस्थित हुआ, उस वृह-त्सेना ने दमयन्ती के वचन को सुनकर आप्त काही पुरुषों के द्वारा वाष्र्णेय को बुलाया, उस के पीछे अनिदिता और देश काल को जानने बाली दमयन्ती शुद्ध और मधुर वाणी से वाष्र्णेय को सांतवन करती समय के योग्य वह बोली तू जानती है जिस प्रकार राजा तुम में अच्छी प्रीति रखता है तू उस विषमस्थ की सहायता करने व को योग्य है, राजा जैसे २पुष्कर [२३] से हारता है उसी २ प्रकार इस की मीति द्यूत में फिर बढ़ती है, तथा पुष्कर के पाशे उस के ईच्छा के अनुसार पड़ते हैं तथा नल के पाशों में बीर्थ यही रखता है, और वह सुहृद और सजनों के ठोंक बंचना को नहीं सुनता है तथा मोहित हुआ वह तेरे बचनों को भी अंगीकार नहीं करता, मैं मानती हूं कि निंश्चः य महात्मा नल का दोष नहीं है जो मोहित हुआ, राजा मेरे वचनों को अंगीकार नहीं करता है, हे, सारथी में तेरी शरण प्राप्त हूं मेरे बचनों को कर, मेरे चिच का आंशय शुद्धं नहीं होता है, कभी नल नाश को भी पावे, नल के प्रियं और मन के तुल्य वेग बारघोड़ों को जोड़कर इस मिथुन (पुत्र पुत्री) को रथ में विठलाकर कुंडलपुर जाने के योग्य है, है, इन दोनों कुमार कुमारी तथा रंथ और इन घोड़ों को मेरे ज्ञाति जनों में छोड़कर इच्छा के अनुसार बास करो अथवा दूसरी जगह जाओ नल के सारथी वाणैय ने दमयन्ती के उस वाक्य को सुनकर सम्पूर्ण वृत्तान्त मल के गुख्य अमात्यों से निवेदन किया, हे राजन वह उन मंत्रियों के साथ मिलकर और विशेष निश्चर्य करके आज्ञा पाया हुआ दोनों कुमार कुमारियों को बिठलाकर उस घोड़ों के रर्थ द्वारा विदर्भ देशों को गया, वह सूत वहां घोड़ों को और उस रथ श्रेष्ट को तथा उस इन्द्रसेना नाम कन्या और इन्द्रसेन नाम बालक को वहाँ छोड़कर, राजा भीस को पूछकर तब [२४]
उस के पीछे राजा नल को शोचता पीड़ा मांन और वेलनार्थी घूमता अयोध्या नगरी को गया, वह अत्ति दुखी राना ऋतुपर्ण के समीप स्थित हुआ और उस राजा के सारथ्य से वेतन को प्राप्त किया ॥
दशमोऽध्यायारंभः
वृहदश्व. चोले उस के पीछे वाष्र्णेय के चले जाने. पर खेलने बाले नल का राज्य और जो दूसग कुछ. धन. था पुष्कर ने हरन किया, हे राज़न हंसता हुआ पुष्कर उस नल को जिस का राज दुरगया बोला फिर यूत प्रवृत करो पण में लगाने के योग्य आपका. द्रव्य कौन है, आप की एक दमयन्ती शेप है दूसरा सब धन मैंने जीता, दमयन्ती का पण करो जो अच्छा मानते हो, पुष्कर से इस कहे हुए पवित्र यशं वाले नल का हृदय क्रोध से मानो फट गया और- दुसयन्ती को कुछ नहीं बोला, उस के पीछे बड़ा क्रुद्ध-सहा यशवान, नल पुष्कर को देखकर और सब अंगों से भूषणों को उतार कर, एक वस्त्र से अच्छादित्त सुहृदों को शोक का बढ़ाने वाला राजा बुड़ी लक्ष्मी को छोड़कर वहां से निकला, फिर एक वस्त्र धारी दुमयन्ती उस चलते के पीछे चली वह नल उस के [२५] साथ नगर से बाहर तीन रातं वसा, हे महाराज | फिर पुष्कर ने पुर में प्रसिद्ध कराया कि जो पुरुषः नल के पास भले प्रकार स्थित होवे वह मेरें हाथ से वध्यता को पात्रे, हे युधिष्ठिर पुरवासियों नेःउस. पुष्कर के वाक्य और उस नल के विद्वेषण से उस का सत्कार नहीं किया, उस प्रकार वह सत्कार के योग्य असत्कृत राजा नल मात्र से निर्वाह करताः नगर के समीप तीन रात बसा, उस के पीछे वहाँ भूख से पीड़ामान और फल मूलों को चुनता राजा चल दिया और दमयन्ती उस के पीछे चली, फिर भूख से पीड़ामान नल ने बहुत दिनों के पीछे सुनहरी पक्ष वाले पक्षियों को देखा, तब उस बली राजा नि-षध ने चिन्ता की कि अब यह मेरा भक्ष्य है और यही धन होगा, उस के पीछे उसने अपने दुपट्टे से उन को ढाक दिया वे सब उस के वंस्त्र को लेकर आकाश मार्ग से गये, उस के पीछे उड़ते हुए पक्षियों नें उस दिगम्बर हीन और अधोमुख भूमि पर स्थित नल को देखकर यह बचन कहा, हे दुर्बुद्धि ! तेरा बस्त्र हरने के इच्छांमान् हम पाशे आये तुम वस्त्र सहित के जाने में हमारी कुशलाता नहीं, हे राजन् तब पचित्र यश वाले नल उस के समीप आये, पाशों और वस्त्र, हीनः आप को देखकर फिर दमयंती को बोला, हे अनिंदिते मैं जिन्हों के अति कोपः से ऐश्वर्य से च्युत हुआ क्षुधा से युक्त और दुख में प्राण यात्रा (आजीविका) को
४[२६]
नहीं पाता हूं, और जिस के कारण से निषध नित्रा-सियों ने मेरा सत्कार नहीं किया हे भीत्वे ! ये पक्षी होकर गेरे वस्त्र को हरते हैं, मैं तेरा भत्ती दुखी गत चे-तन बड़ी २ विषमता को प्राप्त हुआ अपने हितकारी इस चचन को सुन, यह बहुत मार्ग तीक्षिण पथ अ-बंति और ऋक्षचत पर्वत को उल्लंघन कर जाते हैं, यह बड़ा पहाड़ विध्य है और समुद्र में मिलने वाली पयोप्णी नदी है और महर्षियों के आश्रम बहुत मूल फल से युक्त हैं, यह मार्ग विदर्भ देशों का है यह कोश को जाता है इस से परे दक्षिण में यह दक्षिण देश है, हे भरतवंशी! सावधान और पीड़ामान राजा नल ने दमयन्ती को संबोधन करके चोरंवार यह बचन कहा, उस के पीछे वह दुख से कर्षित दमयन्ती वष्वाकुल बचन के साथ उस नल को दीन बचन बोली, हे राजन् वारंवार मुझ से आपके संकल्प को शोचने वाली का हृदय उद्वेग को पाता है और सब अंग अचल होते हैं, मैं क्षुधा श्रम से युक्त वा हीन तुम को जिस का राज्य और द्रव्य हरी गई, निर्जन बन में छोड़कर कैसे चली जाऊं, हे महाराज! मैं घोर बन मैं उस राज्य सुख को शोचने वाले शान्त क्षुधा से पीड़ित के श्रम को नाश करूंगी, सब दुखों में भार्या के समान कुछ औषध नहीं है यह वैद्यों का मत है यह तुम से सत्य कहती हूं नल बोला हे सु-मध्यमे दमयन्ती यह इसी प्रकार है जैसा तुम ने कहा
[२७]
पीड़ित मनुष्य का मित्र और औषधं भार्या के समान नहीं है, मैं तुम 'को छोड़ने का इच्छामान नहीं, 'हे' भीरु अत्यंत क्या कहती है, हे अनिदिते में शरीर को त्यागूं परन्तु तुझ को नहीं त्यागू, दमयंती बोली हे महाराज जो तुम मुझ को छोड़ना नहीं चाहते, तो, किस लिये विदर्भ देशों के मार्ग को दिखलाते हो, हे नृपति मैं तुम्हारी शरण हूं मुझे त्यागने, को योग्य नहीं हो हे महीपति? कलि से कर्षित चित्त द्वारा मुझ को. मत त्यागो, हे नरोत्तम ? तुम निरंतर मार्ग बताते हो, हे अमरोपम इस कारण से मेरे शोक को बढ़ाते हो, जो: आपका यह अभिप्राय है किः ज्ञाति बालों के पास जाबै तो दोनों साथः विदर्भ देशों को चलेंगे. जो तुम मानते हो, हे मानंद वहां राजा विदर्भ तुम को पूजेगा हे राजन उस से पूंजित तुम सुख पूर्वक गृह में बास नहीं करोगे ॥
दशमोऽध्यायस्समाप्तः
ग्यारमोऽध्यायारंभः
नल बोला जिस प्रकार, तेरे पिता का राज्य है उसी प्रकार मेरा है इस में संशय नहीं परन्तु विषमरथ में किसी प्रकार वहां नहीं जाऊंगा, मैं तेरे हर्ष का बढ़ाने बाला ऐश्वार्य बान जाकर फिर
[२८]
ऐश्वर्य से च्युत तेरे शोक का बढ़ाने वाला कैसे जा-ऊँगा, वृहदश्व बोले इस प्रकार बारंबार कहते राजा नल ने अर्द्ध वस्त्रा से संवीत यहां वहां घूमने वाले भूख प्यास से परिश्रांत किसी सभा में पहुंचे, तब नि-षध 'देशों का राजा नल उस सभा को पाकर दमयंती के साथ पृथ्वी तल पर बैठ गया, वहःवस्त्र हीने तृणा सन से रहित धूल से गुंठित मालन नल दमयन्ती के साथ आंत पृथ्वी तल पर सो गया, उस के पीछे अति कोमल श्रंगः तपस्विनी कल्याणी दमयंती भी अकस्मात दुख को पाकर निद्रा से हरण की गई, अर्थात. सो गई, हे राजन् दमयंती के सो जाने पर शोक से मथितचित्त राजा नल पहिले की समान नहीं सोया, उर्स में उस राज्य हरण और सब प्रकार से सुहृदों का त्याग और वनमें काल से वस्त्र हरण आ-दि क्लेश को बिचारकर चिंता को पाया, इंस करके मेरा क्या हो और मुझे न करने बाले का क्या हो, क्या मेरा मरण श्रेष्टं है वा जन (भार्या) का त्याग उचित है, निश्चय यह मेरी अनुरक्त भार्या मेरे कारण से इस प्रकार दुख को पाती है फिर मुझ से विहीन यह कभी स्वजन (माता पिंतां) के पास चली जावै, यह अनुवृता मेरे 'पोस 'दुख को पावैगी इस में संशय नहीं और त्याग में संशय हो कहीं सुख को भी पावै, સસુરતા हे नराधि, हे राजन्, उस नल ने बहुत प्रकार से निश्चय करके और बारं वार बिचार कर दमयंती
[२६]
के त्याग को श्रेष्ठ माना, वह अपने तेज से मार्ग में किसी से घर्षणा करने को योग्य नहीं क्योंकि यह यशस्विनी महां भागा पत्तिवृता मेरी भक्त है, तत्र उस की बुद्धि दमयंती के विपर्य निवृत्तं हुई, और दुष्टभाव। काल के द्वारा दमयंती के त्याग में वर्त्तमान हुई उस राजाने अपनी अवत्रता को और उसकी भी एक वस्त्रता को चिंता करके अई वस्त्रके कीटने को चाहा, किस प्रकार वा को कांटू, और मेरी प्रिया नही जागै, तब राजा नल इस प्रकार विचार कर सभा के चारोंओर घूमा, हे भरतवंशी? इस के पीछे इंधर उधर से चारों ओर दौड़ते नल ने सभी को किसी स्थान पर कोशरहित उत्तम खङ्ग को पाया, शत्रु को तपाने बाला नल उस खङ्ग से अर्द्धवस्त्र को काट कर और धारण करके अचेत सोई हुई दमयंती को छोड़कर शीघ्र चला, तब उस के निवृत हृदय नल ने फिर सभा में आकर और दमयंती को देखकर रुंदन किया, पूर्व काल में जिसे मेरी प्रिया को न वायु देखते थे न सूर्य वह यह अब अनाथ की समान संभा के मध्य भूमिपर सोती है, यह चारु हासिनी बरारा है। कटे हुए बस्त्र से संबीत उन्मत्त की समान जागर कैसे होगी, यह सतीशुभा दमयन्ती मुझे निरदित अकेली इस मृग व्याघ्रं से सेवित घोर बन में कैसे बिचरेगी, हे महाभागे द्वादशं सूर्य श्रेष्ट वसु एकादशेराद्र और दोनों अश्विनी कुमार मरुतंगणों के साथ तुम को रक्षा [३०] करें तू धर्म से युक्त है कलि से अपहृत ज्ञान और उद्यत नल उस भूमिपर रूप में अप्रतिम प्रिय (भार्या) को इस प्रकार कहकर चल दिया, राजार्नल काल से कर्षि त'जाजाकर प्रीति से आकर्षण होने पर फिर बारंवार स-भामें आता था, तब उत्त दुखी का हृदय दो प्रकार का हुआ होला के समान वारंवार सभा नं. याता था और जाता था, कति से कर्षित और श्रहित नल बहुत क-रुणा विलाप करके और उस सोती हुई भार्या को छोड़कर शीघ्र चला, कलि से स्पर्श किया हुआ नष्ट बुद्धि और दुखी राजा नल उस बात को विचारता प्ररोला भार्या को शून्य बन में छोड़कर चल दिया ॥
द्वादशमोऽध्यायारंभः
.. बृहदश्य बोले हे राजन नल के दूर चले जाने पर गत श्रमा वरारोहा दमयन्ती निर्जन बन में भय युक्त जागपड़ी, शोक युक्त दुख से भयभीत दमयन्ती सर्वा नल को न देखती ऊंचेस्वर से पुकारी हे महाराज हा री हा महाराज हा स्वामी मुझ को क्यों त्याग ते हो हा? मारी गई नष्ट हुई और निर्जन वनः में अयभीत हूं हे महाराज विख्यात है कि निश्चय तुम थर्मज्ञ और सत्यबादी हो उस प्रकार सत्य कहकर [३१] अर्थात स्वयंवर में यह प्रतिज्ञाः करके कि. तुम को नहीं। त्यागूंगा फिर बन में छोड़कर कैसे चले गये, शत्रु की ओर से अपकार होने पर विशेषकर मेरे अपकार के न होने में मुझ दक्ष अनुवृत सार्या को छोड़कर कैसे गये हो, हे नरेश्वर मेरे साथ वे बचन भले प्रकार करने को समर्थ हो जोकि पूर्व काल में उन लोक पालों के समीप कहे गये, जिस स्थान पर आप की त्यागी हुई कान्ता एकः मुहूर्त भी जीविती है. हे पुरुषोत्तम धहां कारण यह है कि बिना काल मनुष्यो की मृत्यु नहीं रची गई, हे पुरुषोत्तम यह इतना ही परिहास यथेष्ट है है दुर्धर्ष में अति डरती हूं हे ईश्वर अपना दर्शन दो हे राजनः दीखते हो हे निषध के स्वामी यह दीखे हो गुल्मों से शरीर से शरीर को छिपाकर मुझ से क्यों नहीं, बोलते हो, हे राजेंद्र दुख की बात और निर्णय पण है जो इस अवस्था वाली, और विलाप करती मुझ को मिलकर आश्वान नहीं, करते हो, मैं आप को और दूसरी कुछ बात को नहीं शोचती हूं हे राज़न तुम अकेले कैसे होगे यह शोचती हूं, हे हे राजन प्यासे भूखे और श्रमः से कर्षित तुम सायंकाल में वृक्षों की सूलः परं मुझ को न देखते किस प्रकार होगे, उस के पीछे वह अत्यंत शोक से पीड़ित और शोक से प्रदीप्त दुर्खी रोती इधर उधर चारों ओर दौड़ी, वह विह्वला और भय युक्त बाला बारंवार उठती थी और बारंबार गिरती थी और बारंबार [३२] छिपती थी, और बारंबार, पुकार पुकारती और रोती थी, इस के पीछे पत्तिवृताः शोक से अत्यंत दुखी विवला दमयंती बारंबार स्वास. लेकर रोती हुई बोली, जिस के पीछे शाप द्वारा दुख सेत्पीडितं नल दुख को पाता है उस प्राणी को हमारें-दुख से भी अधिक दुख होंवे, जिस पापी ने पप से शून्य मन नल को इस अवस्था वाला किया उससे अधिक दुख पाकर दुख की जीविका से जीवो, इस प्रकार महात्मा राजा की भार्या विलाप करती और स्वपद से सेवित बन में भर्ती को ढूंढती, दमयंती उन्मत्त के समान पुकारती बहुत शोचती बारंबार विलाप करत्ती इधर से उधर भौर उधर से इधर दौडने वाली हुई, उस अत्यंत सेती और कुररी पक्षी की समान पुकारती, बहुत शो-चती वारंवार विलाप करती, अकस्मात आई हुई औद्या समीपवर्त्तमान दमयंती के अजगर की तुल्य बड़े शरीर वाले क्षुधा युक्त सर्प ने पकड़ लिया, वहां सर्प से निगली हुई और शोक से डूवी उस प्रकार आप को नही शोचती थी जिस प्रकार नल को शोच-ती थी, हा नाथ! यही निर्जन वन में अनाथ के समान मुझ सर्प से श्रसी हुई के पीछे किस लिये नहीं दौड़ते हो, हे निपध के स्वामी पापों से युक्त तुम फिर मनं बुद्धि और धनों को प्राप्तकर और मुझ को स्मरण कर के फिर कैसे जोबोग, हे प्रभु! अब आप मुझ को बन में छोड़कर कैसे चलेगये हे निष्पाप्र नृपोत्तम तुम [३३] श्रांत और क्षुबा से-पीड़ित परित्मात के श्रम को कौन नाज़ करेगा, उस के पीछे कोई सृगों का व्यात्रा गहन बन में घूमता-उस रोती पुकारती को सुनकर वेणुसे पास आया, उस प्रकार सर्प से ग्रस्त दीर्घनेन्ना-दमयंती को देखकर शीघ्रता करने गृग व्याध ने वेगसे पोस' आकर, रीक्षण घार रास्त्र द्वारा मुख से चीर-डाला मृग जीवन ने उस निविचेष्ट सर्प. को चीरकर, फिर उस व्याध ने उस को छुड़ाकर जल से प्रक्षालन करें और आश्वासन करके फिर उसे आहार करने वाली को पूछा, हे नृग ग्रायाक्षी तुम किस की हो और किस प्रकार बन को आई हे भाविनी किस प्रकार इन बड़े कष्ट को पाया है, हे भरतवंशी राजा युधिष्ठिर उस प्रकार उस से पूछी हुई दमदती नें यह सब जैसा वृत्तान्त था इसे से कहा, वहः मृग व्याव उस अॅर्द्ध वस्त्र संवीतं पुष्टि श्रेणि पयोधरवाली फोगल शरी निर्दोपं अंग पूर्णचन्द्रमा की तुल्य मुखं, फुटिल वा शोभास्णन यक्ष्मा और नयन वाली तथा मयूर भापिणी दमयंती को देखकर काम के वश प्राप्त हुआ, उस कांम से पीडित लुब्धकने मृदु पूर्वक त्ष्ण बचन के साथ उस को सांत्वन किया उस भांविनी ने उस को जाना, पतिक्रेता दमयन्ती भी उस दुष्ट को जानकर तीव्र रोप से, प्राविष्ट और क्रोथ से प्र-ज्वलित हुई, फिर उस पापमति नीच आतुर ने उसः दुर्धर्षः श्रऔर प्ति श्रग्नि शिंजा की तुल्य दमयंती के घर्षणा को विचारा, फिर पति और राज से रहितं दुख से पीडित [३४] क्रोध से युक्त दमयंती ने बचन मार्ग के बंद होने पर अर्थात् बचन से निवार्ण न होने पर इस को शाप दिया, जो में मन से भी नल के सिवाय दूसरे पुरुष को स्मण नहीं करती हूं उसी प्रकार यह नीच मृगजीवन प्राणों से रहित गिरपडे, उस प्रकार बच्चन के कहते ही वह मृगजीवन पुरुप निर्जीव भूमि पर गिर पड़ा जिस प्रकार अग्नि से दग्ध वृक्ष ॥
त्रयोदशमोऽध्यायारंभः
वृहदश्व बोले वह कमल लोचन दमयन्ती मृग व्याध को मार कर बन को चली जोकि भीषण शून्य और झिल्ली के गण से नादित, सिंह हाथी रुरु व्याघ्र भैंसा रीछों के गणों से युक्त वहुत प्रकार के पक्षी गणों से आकीर्ण म्लेच्छ और चोरों से सेवित, शाल, वेणु, धव, पीपर, तिंदुक, इंगुद, किंशुक, अर्जन, अरिष्ट, स्पंदन, ओशाल्मक नाम वृक्षों से ढका हुआ, जंबु, आम्र, लोभ, खदिर, सात, और वेत्र जाम वृक्षों से समा कुल और पद्मक आमल्क, प्लक्ष, कदंब, उंदुवर नाम वृों से आवृत, वहरी, बिल्व से ढका हुआ बंर्गद प्रियाल, ताल, खजूर, हरीतकी और विभीतक नास वृक्षों से समाकुल था, उस दमयन्ती ने नाना प्रकार [३५] की सैकड़ों घातुओं से सजे हुए नाना प्रकार के पर्वतों को और चारों ओर से शब्दित निकुंजओं को और अद्भुत दर्शन गुफाओं को नदी, सरोवर, वावड़ी, और नाना प्रकार के सृग पक्षियों को, और भयानक रूपः बहुत पिशाच उरग राक्षसों को, पल्वल तडाग और पहाड़ों की सब शिखरों की नदी और अद्भुत दर्शन झिरना-ओं को देखा, वहां भीम नंदनी ने भैंसा, वराह, रीछ और बन सर्पों के झुंडको देखा तब तेज यश शोभा बड़े धैर्य से युक्त दमयन्ती नल को ढूढ़ती अकेली बिचरती थी, इस के पीछे वहां वह राज पुत्री दमयन्ती भर्ता के दुख से पीड़ित दारुण मार्ग, को पाकर किसी से नहीं डरी, हे राजन् इस के पीछे अति दुखी और भरता शोक में व्याप्त अंग शिलातल पर बैठी हुई दमयन्ती ने विलाप किया, दमयन्ती बोली हे व्यूढ़ोस्क महा वाहु निषध देशों के स्वामी अब तुम मुझ को निर्जन बन में छोड़कर कहां गये हो, हे बीर नरोत्तम बड़ी दक्षिणा वाले अश्वमेध आदि यज्ञों में पूजन करके कैसे मेरे साथ रूष बरतावा करते हो, हे बड़े तेजस्वी नरोत्तम राजाओं में श्रेष्ठ तुम ने मेरे समीप जो कहा उस बचन के स्मरण करने को योग्य हो, हे राजनुः आकाश गामी हंसों ने आप के समीप जो, कहा मेरे सामने जो कहा उसी के बिचार ने को योग्य हो, हे पुरषोत्तम निश्चय भले प्रकार पढ़े हुए चारों बेद अंग उप. अंग विस्तार सहित एक ओर और सत्य एक [३६] ओर अर्थात 'दोनों एक समान हैं, दे शत्रु नाशक नरेश्वर बीर, उत्ल करुणा से उस के सत्य करने को योग्य हो जो बचन पूर्वी कॉल में मेरे ममीप कहा है, हा ! वीर निष्पाप राजा नल प्रत्यक्ष हैं, कि मैं तेरे दियोग से इस घोर मार्ग' में नष्ट हुई मुझ से क्यों नहीं बोलते हो, चॅट' रोद खुला मुर्ख भयानक रूप सूखा रागर्दूल मुझ को भक्षण करता है क्यों मेरी रक्षा करने को योग्यं नहीं हो, हे कल्योण रूप राजा नल तुमने सदा यही कहा कि, तेरे सिवायं मेरी कोई प्रिया नहीं है उस पूर्व कही हुई बाणी को सत्य करो, हे नराधिप तुम मेरे ईक्षित हो फिर मुझ लेन्मत इष्ट ईक्षित चौर विलाप करती को क्यों उत नहीं देने हो, हे प्रभु ला चर्ने गरि कर्पण श्रन्मनल तुम मुझे कुश दीन विवर्ण महिने अर्द्ध वस्त्र से ढकी अकेली और अना थ की हुल्य विलाप करती, गेती और भौड से रहित अकेली हरेणी की तुल्य सुझ को नहीं मानते हो, हे महाराने में लेती दमयन्ती महाबन के बीच अकेली तुम को बोलती ने मुझ को क्यों उत्तर नहीं देते, हे कुल शैल से यक्त सुन्दर सब अंग शोभन नशे-चम् अर्च में इसे पर्वत में तुझ को नहीं देखती हूं, 'इरी महाघोर सिंह व्याघ्रों से सेत्रित वन में सोते बैठे वा स्थितं को किस से एन्तूं, हैं एन्तूं, हैं न श्रेष्ठ निषेधदेश के 'स्वामी दुख से पीडित और तेरे अर्थ शोक से कर्पित मैं तुम मेरे शोक में।ने वाले प्रस्थितं को किस से [३७] पूहूं कि इस धन से तुम ने मिलकर राजा नलः देखा और इस बन में चले जानें वाले नल को कौन पूछने योग्य है, अब नै किस की मधुग्रत्चाणी से मुनूंगी क्रिः जिस महात्मा शत्रु सेना के मारने वाले कमल लोचन राजा नलः को ढूढ़ती है. वह यह है, गृह श्रीमानात्चार डाढ़ और बड़ी हनु रखने वाली बन काप्यजी शा दूज सन्मुख आता है, अझंकित। में इसके पास जाती हूं आप मृगों के राजा हैं और तुम इस वनों में प्रभुः हो, मुझ को विदर्भ राजाः की पुत्री दमयंती नाम और शत्रु के मारने वाले नल राजा की निषेध की भार्या जानों; हे मृगेंद्र जो यहां तुमने नल देखा तो मुझे अकेली दुखी शोक कर्षित और पति ढूढने बालीको आश्वासन करो, है बन के स्वामी मृगों में श्रेष्ठ अथ वा जो तुम नल को नहीं कहते हो, ता मुझ को खान ओ और सब दुख से छुटाओ, बन मोबिलाप करनेवाली मुस्तको सुनकर यह आश्वासन नहीं करता है ख्स स्वाद जल वाली और सागर में मिलने वाली नदी के पास जाऊं, 'प्रकाशमान बहुत वर्ण वाली सन्तोरस ऊंची बहुत शिखरों से युक्त इस पर्वत को, जोक्रिनाना प्रकार की धातुओं से भरा हुआ नाना प्रकार के पाषाणों से भूषित और इस महाबन की ध्वजा रूप ऊंचा, सिंह, शार्दूल, हाथा, वसहं, रीछ, और मृगों से युक्त और चार।ओर बहुत प्रकार के पक्षियों से अनुनादित सुंदर पुष्प वाले किंशुक, अशोक, बकुल, पुंनाम कर्णकार [३८] थत्र, और प्लक्ष, नाम वृक्षों से उपशोभित, पक्षी युक्त नदियों और शिखरों से व्याप्त है तब तक इस गिरिराज को नल के विषय पूछती हूं, हे! भगवन् पर्वों में श्रेष्ठ हें। दिव्य दर्शन विख्यात है शरण्य बहु कल्याण पर्वत तुम को नमस्कार हो, मैं पास आकर तुमःको प्रणाम करती हूं मुझ को राजा पुत्री राजा की पुत्रवधू और राजा की भार्या दमयंती नाम से विख्यात जानो, मेराः पिता राजा भोम नाम महारथी विदर्भ देशों का स्वामी और चारों वर्ण का रक्षक है, बड़े सुंदर और कमल नेत्र वाला राजाओं में श्रेष्ठ दक्षिणा युक्त राजसूय अश्वमेध यज्ञों का करने वाला, ब्रह्म ब्राह्मण जाति 'बेद वैद्य कर्म वा परमात्मा में भक्ति रखने वाप्ता साधुओं का चलन रखने वाला सत्य वाक्य दूसरे के गुणों में दोष. दोष न लगाने वाला शील वान पराक्रमी बड़ी लक्ष्मीवान सर्वज्ञ पवित्र, विदर्भदेशों की भले प्रकार रक्षा करने वाला और शत्रु समूह का जीतने वाली प्रभु है, हे भगवन् अपने संमीपस्थित मुझ को उस की पुत्री जानों, और नरों में उत्तम महाराजा वीरसेन नाम से बिख्यात मेरा श्वशुर निषध देशों में है, उस राजा का पुत्र वीर श्रीमान सत्य पराक्रम है जोकि क्रम से प्राप्त पिता के राज्य धन को शासना करता है, वह. शत्रुका मारने वाला. चोलनें में चतुर पवित्र कर्मा यज्ञ में अमृत का पान करनेवाला और अग्निमान है, यज्ञ करता दान देने वाला युद्धः [३९] करने वाला और भले प्रकार प्रजा शासन करने वाला है यहां आई हुई मुझ अवला को उस की श्रेष्ठ भार्या जानो, हे पर्वत सत्य तुम मुझ को लक्ष्मी रहित भर्त्ता दीन अनाथ व्यसन से युक्त और भर्त्ता के ढू-ढ़ने वाली जानों, हे पर्वतों में श्रेष्ठ तुमने आकाश को युक्त स्पर्श करने वाली इन सैकरों शिखरों के द्वारा इस दारुण बन में राजा नल भी देखा, मेरा भन्र्त्ता गजेंद्र के तुल्य चलने वाला बुद्धिमान दीर्घ वाहु को-धी विक्रान्त बलवान और बड़े यश वाला है, निषध देशों का राजा नल कहीं तुमने देखा, हे पर्वत श्रेष्ठ अब मुझ अकेली विलाप करती बिह्वल दुखी को अपनी पुत्री की वाणी से आश्वान क्यों नहीं करते हे! हे! वीर विक्रांत धर्मज्ञ सत्य प्रतिज्ञ, राजा नल जो तुम इस बन में हो तो आप अपना दर्शन दो मैं कब महात्मा राजा निषध की कही हुई स्निग्ध गंभीर शब्द वादल की तुल्य और अमृत की उपमा रखने वाली शुभ उस वाणी को सुनूंगी कि हे बिदर्भ की पुत्री, जो कि सत्य अदीन और मेरे शोक को नाश करने वाली है हे धर्म वत्सल राजन् मुझ डरी हुई को आं 'श्वासन करो, उस के पीछे वह पार्थिवनन्दनी दमयंती उस गिरि श्रेष्ठको यह कहकर फिर उत्तर दिशा को गई, उस पद्माङ्गना ने तीन दिनः रात चलकर तप-स्त्रियों का बड़ा बन देखा जो कि दिव्य कानों से शोभित था, तथा वशिष्ठ, भृगु अत्रि, ऋषियों के समान [४०] जितेन्द्री जिताहार हम शौच से युक्त, जल बायु भक्षी पत्तों का आहार करने वाले वल्कल और गुग चर्मधारी सुनि जितेंद्री, तपस्वियों से उपशोभित था' तपस्वियों का वास स्थान और रग्य आश्रम मंडल को देखा, उसने, नाना प्रकार के नूग समूहों से सेवितशाखा मृग के गणों युक्त तापसौं संयुक्त, आश्रम को देखकर आश्वासन को पाया, वह शुभ्र, गुकेशी, सुकुचा, सुन्दर दंत और सुखंवाली तेजरिवनी मु जंधना, सुंदर काले और बड़े नेत्र नाली, नल की प्रिया महायाग | तपस्विनी ख़ी, नलं दमयन्ती स्थान श्राश्रम में प्रवेश हुई, वह लप से वृद्ध ऋपिओं को दंडवत' करके विनय से नंस्र खड़ी हुई वह उन सत्र तपस्वियों से यह कही गई. तेरा आना, शुभ हो, वहां, तणेबन ऋपि न्याय, के अनुसार इस की पूजाको करके फिर यह बोले कि बैठो, और कहो हम तेरा क्या करें वह वरारोहा उनको बोली कि हे निप्पाप महा भागो यहां तंप में अग्निओं में धर्मों में मृग पक्षियों में और सुधर्म आचरणों में पट ऐश्वर्य के स्वामी आप लोगें की कुशलता है वह उन से कही गई, हे भद्रे दश-रिवनी सब जगहं हसारी कुशल है, हे निर्दोप सच अंग तू कौन है और क्या करना चाहती है, यहां तेरे श्रेष्ठ रूप और पदम फांति को देखकर, हम को आश्चर्य उत्पन्न हुआ सावधान हो सोच मतं कर, हे कल्याणी आश्चर्य कि तू इस बन वा इस पहाड [४१] श्यध्दा इस नदी की देवी है हे अनिदिते सत्य कहो वह उन ऋषियों को बोली हे ब्राह्मणो मैं, इस, वनकी देवता नहीं हूं, और इस पहाड़ वा नदी की भी है बता नहीं हूं तुम संब-तपोधनो मुझ को मानुषी आना, विस्तार सहित कहूंगी वह सब मुझ से सुनो विमे देलों में भीग नाम राजा पृथ्वी का पालन करनेवाला है. हे हिज सत्तमो तुम सब मुझ को उसकी पुत्री जानो निपध देशों का रवामी बुद्धिमान बड़ा यशमात-नल नाम, वीर विद्वान् संग्राम को जय करने, बाला राजा मेरा भचर्चा है, जोकि देवपूजन में तत्पर और हिजात जन वत्सल, निषघ, वंशका रक्षक महा तेज स्त्री महावली सत्यवान धर्मज्ञ बड़ा ज्ञानी सत्य प्र तिज्ञ शत्रु को मर्दन करने वाला, ब्रह्मम्य ईश्वर-का उपासक श्रीमान् शत्रुओं के पुरको जय करने वाला, राजाओं में श्रेष्ठ देवराज के समान तेजस्वी विशालाक्ष-पूर्ण चंद्रमा के समान मुखवाला शत्रु नाशक नल नामः मेरा भर्त्ता, मुख्य यज्ञों का करने वाला वेद और वेदांग के पार पहुंचने बाला सूर्य-चंद्रमा की समान. प्रभावान युद्ध में शत्रुओं को मारने वाला है, बह, सत्य धर्म परायण राजा-कोई, छल बुद्धि नीच अशुद्ध अं तःकरण पुरुषों से बुलाकर, द्युत खेलने में कुशल, कुटिल मनुष्यों से राज और सब धुन हरागया मुझ को उस राज ऋषि की भार्या जानों, निश्चय मुझ दुखी भर्त्ता के दर्शन की इच्छामात दुमयंती नाम, से [४२] विख्यात को जानौ, वह दुख में शिखरों और पहाड़ों नदियों सरोवरों, पल्लवों तथा सत्र बनों में रणविशारद सहात्मा अत्वज्ञ नलं भर्त्ता को ढूंढ़ती घूमती हूं कहीं भगवंत ऋपिओं के इस तपोवन में निपों का राजां नल नाम प्राप्त होवे, 'हें ब्राह्मण में जिंस के कारण से इस अति दारुण, भयानक और शार्दूल नृगाँ से से-वित बन को प्राप्त हुई, जो मैं कई दिन रात में राजा नल को नहीं देखूंगी तो मैं इस देह के त्याग से आप को मोक्ष से युक्त करूंगी अर्थात योगानले से देहं को त्याग कर मोक्ष को पाऊंगी उस पुरुषोत्तम के बिर्ता 'जीवन' से मेरा क्या प्रयोजन, अब भर्त्ता के शोक से पीड़ित में कैसे जीवूगी, इस के पीछे वे संत्यदर्शी 'तपस्वी उस प्रकार बन में विलाप करने वाली भीम नंदनी दमयंती को बोले, हे कल्याणी हे शुभे 'तेरे 'अगले दिन अच्छे होंगे हम तप के द्वारा देखते हैं तू नेल को देखैगी, हे भीम की पुत्री तू निषेधदेशों के स्वामी शत्रु के गिराने वाले घर्म धारियों में श्रेष्ठ जल्दी राजा नलं को देखेगी, हे कल्यांणी सच पांपों से मुक्त सब रत्नों से युक्त और उसी श्रेष्ठ नगर में शासना करने हाले अरिंदम, शत्रुओं के भयं कर्ता मित्रों के शोक नाशक कल्याणोभिंजन राजा, पति अपेन को देखेगी, इस प्रकार उस राजपुत्री नल की प्रिय पटरानी को कहकर वे सब तपस्वी अग्नि होत्र और आसनों के साथ अंतरंध्यान होगये, तंत्र वह [४३] निर्दोष अंग राजा वीरसेन की पुत्र वधू दमयंती उस बड़े आश्चर्य को देखकर निस्मित हुई, क्या मैंने स्वप्न देस्ता यहां यह कौन विधि हुई वे सब तपस्वी कहां गये और वह आश्रममंगल कहा पक्षियों से सेचित पवित्र जन्म वाली वह रग्य नदी-कहां और वे फल पुष्प से शोभित मनोहर वृक्ष कहां, वृहदश्त्र जी बोले वह पवित्र गुरत्रशन वाली भीम की पुत्री दमयंती देर तकध्यान करके भर्त्ता के शोक से पूर्ण दीन विर्ण मुख हुई, इराके पीछे वह वाष्प से संदिग्ध के साथ विलाप करने लगी फिर अश्रु से पूर्ण नेत्र ने दूसरी भूमिपर जाकर और अशोक वृक्ष को देखकर, और बन में कमपुष्पित पत्रों पत्रों से भूषित मनोहर पक्षियों से अनुनादित श्रेष्ठ वृक्ष अशोक के पास जाकर कहा, आश्चर्य कि इन बन के बीच श्रीमान वृक्ष फल पुष्न रूप बहुत अलंकारों से श्रीमान गिरराज की तुल्य प्रकाश करता है, हे प्रिय दर्शन श्रशोक मुझ को शीघ्र शोक रहित करो क्या तुमने शोक मय वाघा से ही राजानल को देखा, गन्त्रुह्मन: मुझ दमयंती के प्रियपति निपधदेशों के रखामी नेरे प्रिय नल को तुम ने देखा है, एक वस्त्र के अईसे संवीत और कोमत्त गरीर की त्यचा रखेनवाले व्यसन से पीन्ति और इस वन में आये हुए वीरनल को देखा है, है- अशोक वृक्ष- जिस प्रकार शोक रहित मैं जाऊं उस का करो हे शोक नाशक शोक रहित अशोक वृक्ष-तुम सत्य-नाम होजाओ, वह भीम की [૪૪] पुत्री श्रेष्ठ स्त्री पीडीमान इस प्रकार उस अशोक वृक्ष को 'प्राप्त होकर अति दारुण देश में गई, उस ने बहुत वृक्षों को तथा वहुत नदियों को और बहुत ग्म्य पर्वतों को बहुत मृग पक्षियों को देरग, तब उस भीम की पुत्री पतिको ढूंढ़ने वाली ने कंदराओं नितंबों और श्र-द्भुत दर्शन नदियों को देखा, इसके पीछे पवित्र मुस्कान दमयन्ती ने मार्ग को प्राप्त होकर हाथी घोडे और रथ से व्याप्त बड़े जन समूह को देखा, जोकि रम्य शुद्ध जल से पूर्ण शुभ शीतल जल वाली बिर्तार्ण हृदय युक्त बेतों से युन, फ्रेंच कुरर नाम पक्षियों से घोपित चक्र वाक से राजित कूर्म ग्राह भष नाम जीवों से जाकीर्सा बडे द्वीप से शोभित' नदी को उतरता था, ह यह यशस्विनी वगरोहा नल की पत्नी मह। जन स-मूह को देखते ही पास गई और पुरुषो के मध्य प्रवेश हुई, जोकि उन्मत्त रूपी शोक रो पीड़ित तथा अर्द्ध वस्त्र से युक्त कृशाववर्ग मलिन और धूलि से ध्वस्तमेश थी, वहां कितने ही मनुष्य उस को देख कर डरे हुए भागे कितने हीने बड़ी चिंता को पाया, कोई वहां पर पुकारे, कोई उस को हंसने लो दूसरों ने निन्दा की हे भरतवंशी कितनों हीने दया की और पूछा, भी हे कल्याणी तूं कौन है किस की है वनमें क्या ढूंढती है हम यहां तुमको देखकर पीड़ामान है क्या तू मानुषीं है, हे कल्याणी सत्य कहो कि तू इस वन वा पर्वत अ-थी' दिशा की देवता है हम तेरी शरण को प्राप्त [४५] हुए, हे अनिदिते आश्चर्य कि श्रेष्ठ स्त्री तू यक्षी है या राक्षसी है सब प्रकार हमारा कल्याण कर और हम को रक्षा कर हे कल्याणी जिस प्रकार'यह जनं संमूह यहां से सब प्रकार की कुशल वाला शीघ्र जावै उसी प्रकार करो जैसा हमारा कल्याण होवै, उस के पीछ उस जन समूह से उस प्रकार कही हुई राजकुमारी साध्वी दमयन्ती जोकि भत्ती के व्यसन से पीड़ित थी उन जन समूह और उस के स्वामी को और जो कोई मनुष्य युवा वृद्ध बालक और उस समूह के अगुर्वा थे उनको बोली, कि मुझ को राजाकी पुत्री मानुषी राजा की पुत्र वधू राजा की भार्या भर्त्ता के दर्शन की 'इच्छावान जानो, मेरा पिता विदर्भ का राजा है और 'महाभाग नल नाम राजा निषध मेरा भत्ती है उसे अप्रराजित को ढूंढ़ती हूं, जो शत्रुगण को मारनेवाले मेरे प्रिय पुरुषोत्तम राजा नल को जानते हो तौ शीघ्र कहो, उस जन समूह का वहां प्रभुशुचिनाम सार्थवाह उस निर्दोष अंग दमयंती को बोला हे कल्याणी मेरे वचन को सुन, हे शुचिस्मते निश्चय मैं इस जन समूह का शासन करता सार्थ वाहक हूं हे यशस्त्रिसी मैं नल नाम मनुष्य को नहीं देखता हूं, मैं इस अमानुष से-वित से संपूर्ण बन में हाथी भैंसाः शार्दूल रीछऔर मृगा को देखता हूं, महावन में सिवाय तुझ मानुषी को दूसरे मनुष्य को नहीं देखता हूं तो यक्षों का राजा म-सि भन्द्र हम पर प्रसन्न हो, उस के पीछे ब्रहृन्दमयन्ती | [४६] सच व्यौपारियों और सार्थवाह को चोलो, कि यह जन समूह कहां जावेगा यह कहने के योग्य हो, सार्थवाह बोला हे राजपुत्री यह जन समूह लाभ के श्रर्थ शीघ्र सत्य दर्शी मुत्राहु नाम राजा चंदरी के देश को जावेगा ॥
चतुर्दशोऽध्यायारंभः
वृहदश्व बोले तब वह पति की लालसा रखने 'वाली। निर्दोष अंग दमयंती सार्थवाह के उस बचन को सुनकर उसी जन समूह के साथ चली, फिर बहु-ततिथि बाले काल के पीछे वडे भयानक बन में सब "ओर से कल्याण रूप पद्मसौगंधिक नामक जनों से युक्त बडे सरोवर का, व्योपारियों ने देखा जोकि रम्य बहुत घास और इंधन रखने वाला बहुत पुष्प फों सेयुक्त नाना प्रकार के पक्षियों से सेवित्त, निर्मल और स्वाद जल से पूर्ण मनोहर अति शीतल था उन थकी सवारी त्राले पुरुषों ने ठहरने के अर्थ मन किया सार्थवाह की संमति में उत्तम वन को प्रवेश हुए बड़े जन समूह ने पश्चिम संध्या को पाक़र बास किया, तर इस के पीछे शब्द रहित होने से अचंचल खाती रात के समय पर थके हुए जन समूह के सोजाने पर [४৩] हाथियों का झुंड, मद के झरने व्याकुल'जल पान के अर्थ पहाड़ी नदी पर आपहुंचा इस के पीछे उस भुंड़ने उस जन' समूह को और जन समूह के मध्य बहुत हाथियों को देखा तब वे सब महोत्कर वन के हाथी उन ग्राम के हाथियों को देखकर, मारने के इच्छा बान वेग से दौड़े उन दौड़ते हुए हाथियों. का वेग दुःमह हुच्ण जैसे पहाड़ के श्रम से पृथ्वी पर पड़े हुए शीर्ण शिग्नरों को हाथियों के गिरते बन के मार्ग नष्ट हुए सरोबर के मार्ग को रोन्कर सोए हुए और पृथ्वी तलपर चेष्टा करते उस उत्तम जनः समूह को उन हाथियों ने अकस्मात मल डाला हाहाकार को छोड़ते गरणार्थी जन समूह, वन के गुल्मों की ओर दौड़ते निद्रा से अधे हुए कितने ही हाथियों के दांतों से कोई सूंडों से कोई पाबों से मारे गये तव जिनके. बहुत ऊंट, और घोड़े मारे गये वे पदाति जन से। युक्त, भय से दौड़ते परस्पर हतघोर शब्दों को छोड़ते। पृथ्वी तलपर गिरपड़े और वे संरव्ध वृक्षों पर चढ़कर विषम स्थानों पर गिरपडे, हे राजनः दैव, योग से इस प्रकार के बहुत हाथियों से दबाकर वह धन वान जन समूह से नष्ट हुआ और तीनों लोकः कोउमय। बग्ने बाले बढ़े शव्द हुए, वह कष्ट अग्निः उठी अत्र दौड़ों रक्षा करो यह रत्नों की" ।री फैली हुई है ग्रहण करो क्यों दौड़ते हो यह धेन सामान्य है मेरा बचन मिथ्या नहीं है, तब उस प्रकार बोलते वे मनुष्य भय से भागे [१८] हे विवस पांडवो.. फिर कहूंगा बिचार मत करो, उस प्रकार की दारुगाजन तप को वर्त्तमान होने पर भय से संनस्त मन दमयंती जगउठी, वहां सब लोक को भय देने वाली, और पहिले न देखी हुई भय को देखा कमल. लोचन बाला उस को देख कर बंद मुग्ब श्वासलेली भय से विद्वल उठ खड़ी हुई वहां उन समूह से जो कोई मनुष्य आविक्षत मुक्त हुए, वे सच साथ चोले कि यह किसके कर्म का फल है निश्चय हम लोगों ने बड़े यशवान मणिभद्र को नहीं पूजा, तथा यक्षों के राजा श्रीमान प्रभु कुवेरजी नहीं पूजे अथवा प्रथम बिश्न करने वालों की पूजा नहीं की, अथवा शकुनों का फल विपरीत है यह निश्चय है फिर महा विपरीत नहीं थे दूसरी क्या बात है कि यह आपद प्राप्त हुई, ज्ञाति और द्रव्य से रहित और हीन दूसरे पुरुप वोले 'कि अच जो यह उन्मत्त दर्शन स्त्री बड़े जन समूह में, चिकृताकार मानुप रूप को धारण करके प्रवेश हुई प्रथम उसने यह परम दारुण माया रची, निश्चय वह सक्षसी है अथवा भयंकरी पक्षी या पिंगाची है यह सच उस का पाप है इस में विचारनाः नहीं, जो हम उसत्यापन बहुत दुखदाई, जन समूह नाशक को देवें र्तो लोष्ट घूलि, तृण काष्ट से और मुष्टिओं सें, उस जन समूहः की कुत्सितं कृत्याः को अवश्य हीः मारें फिर दमयंती उन्हों के उस अति दारुण वचन को सुनकर, लज्जित भर्य युक्त और संत्रिन्न भागी जिधर [४९].: बन था अपने उस पाप को शंका करने वाली ने वि लाप किया, आश्चर्य किः मेरे ऊपर ईश्वर का दारुण कोप है कुशल को नहीं करता यह किस के कर्म का फल है, मैं शरीरं मन वाणी से किया हुआ किसी का कुछ थोड़ा अशुभ भी स्मरण नहीं करती हूं यह किंस कर्म का फल है, निश्चय जन्मांतर में किया हुआ बड़ा पाप तुझपर पड़ा इस अफ्रा बार्चनी क ठिन आपद को मैंने प्राप्त किया, भर्ता के राज्यका हरण सुजन से पराजय अर्ता के साथ वियोग पुत्रों. से अलग होना, श्रनाथ होना बहुत सर्षों से सेवित बन में वास इन सब दुखों को पाया, हे राजन् ! तंत्र इस के पीछे दूसरा दिन प्राप्त होने पर भरने से शेप मनुष्यों ने, उस देश से निकलकर बड़े नाशः को और भाई पिता पुत्र और मित्र को शोचा, वहां द-मयन्ती ने शोच किया, कि मैंने कौन पाप किया जो यह जन समूह निर्जन वन में भी मुझ को प्राप्त हुआ, वह मेरे मंदद्भाग्य सेः हाथियों के झुंड से मारा गया निश्चय अव भी मुझ को दीर्घ काल तक दुख प्राप्त होने के योग्य है, मैंने वृद्धों का शासन सुना जिस का फाल प्राप्त नहीं हुआ वह नहीं मरता है जो दुखियों में अब हाथियों के झुंड से मर्दन नहीं की गई निश्चय इस लोक में ननुष्यों का कुछ कर्म. बि-ना दैव के कियाः हुआ विधान नहीं है, मैंने वाल अवस्था में भी कुछ पाप कर्म नहीं किया, जोकि [५०] शरीर मन और वाणी से होता है जो यह दुख प्राप्त हुआ मैं मानती हूं कि स्वयंबर के कारण लोकपाल आये, वहां नंल के अर्थ देवता मुझ से उत्तर दिये गये निश्चय मैंने उन्हों के प्रभाव से वियोग को पाया, तब वह पतिव्रता वारांगना दुख से पीड़ित दमयन्ती इस प्रकार के उन प्रलापों को करके, तत्र मरने से शेष वेद पारग ब्राह्मणों के साथ चली, हे राजाओं में श्रेष्ठ जैसे शरत ऋतु की चंद्रकला, थोड़े काल के पीछे उस चलती हुई वाला ने सायान्ह समय सत्य दर्शी सुंवाहु राजा चंदेरी के बड़े पुरको प्राप्त किया, इस के पीछे अर्द्ध वस्त्र से संवीत उत्तम पुर में प्रवेश हुई उस विह्वल कृश दीन युक्त के शीघ्रसरवेणी, उन्मन्त की तुल्य चलती दमयंती को पुरवासियों ने देखा, तब राजा चंदेरी के पुर में प्रवेश करने वाली उस दमयंती को देखकर, वहां आप्रियों के बालक पुत्र कुतूहल से पीछे चले, उस से घिरी हुई वह दमयंती राज भवन के समीप गई, प्रासाद के ऊपर खड़ी हुई राजे माता ने मनुष्यों से युक्त उस को देखा और धात्री को बोली कि इस को यहां मेरे पास लाओ, शरणार्थिणी वाला मनुष्यों से क्लेश पाती है वैसे रूप को देखती हूं कि मेरे घर को प्रकाशित करती है यह कल्याणी उन्मत्त वंश और लक्ष्मी के तुल्य आयत लोचन है, वह उस जन समूह को हटा कर और उत्तम भवन के ऊपर, चढकर आश्चर्य [५१] युक्त ने दमयन्ती को पूछा इस प्रकार दुख से आविष्ट भी परम रूप को धारण करती है, बादलों में बिजली के समान प्रकाश करती है मुझ से कहो कौन है और किस की है भूषणों से वर्जित भी तेरा रूप मानुषी नहीं है अर्थात दिव्य है, हे देव प्रभासहाय रहित तू मनुष्य से उद्वेग नहीं करती है दमयंती उस के उन बचनों को सुनकर वोली, मुझ को भर्त्ता की अनुब्रता सैरंध्रीदासी इच्छाके अनुसारवास करनेवालीमानुषी जानो, मुझे फल मूल को भोजन करने वाली और जहां सायंकाल हो वहीं ठहरने वाली अकेली जानों मेरा भर्त्ता असंख्येय मुर्गों का स्वामी और सदा मेरा अ-नुव्रत है और मैं भी उस की भक्त छाया की तुल्य मार्ग में उस बीर के पीछे चलने वाली हूं, दैव इच्छा से उसका अति प्रसंग श्रेष्ठ द्यूत में हुआ, उस द्यूत में निर्जित अकेले ने बनको प्राप्त किया, उस एक वस्त्र रखने वाले बीर उन्मत्त की समान विह्वल भर्चा को आश्वासन करती मैं भी बन को गई कभी बन में उस भूखे विमना वीर ने किसी कारण के वीच उस एक वस्त्र को भी त्याग किया, तब उस एक वस्त्र वाले नान उन्मत्त की समान अचेत के पी छे चलती में बहुधा रातों को नहीं सोई, उस के पीछे मुझ सोती निप्पाप को अर्द्ध वस्त्र काटकर त्याग किया, सो भर्त्ता को ढूंढ़ती दिन रात जलती मैं उस कमल गर्भ की तुल्य अभागिन हृदय प्रिय प्रभुको नहीं [५२] देखती उस देवता की तुल्य प्राणों के ईश्वर प्रिय प्रभु को नहीं पाती हूं, पीड़ामान आप राजमाता उरा प्रकार अश्रु से पूर्ण नेत्र बहुत विलाप करने वाली, पीड़ितस्त्रर उत्त दमयन्ती को बोली, हे कल्याणी मेरे पास बासकर तुझ पर मेरी परम प्रीति है, हे भद्रे मेरे पुरुष तेरे भर्त्ता को ढूंढ़गे इधर उधर से घूमता हुआ आरही याजावे, हे भद्रे यहां ही वास करती हुई भर्त्ता को पावेगी, दमयन्ती राजमाता के बचन सुनकर यह बचन बोली, हे वीरों की माता में नियम के साथ तेरे निकट बास करने को उत्साह करती हूं उ-च्छष्टि भोजन नहीं करूं पादश्रावन नहीं करूं और किसी अवस्था में दूसरे पुरुषों से बात नहीं करूं जो कोई गुझ को चाहे वह पुरुष तेरे यहां दंड के योग्य होवै, यह संद तेरा वध्य होवै यह मेरा बत स्थापित है, परंतु मैं भर्त्ता के अर्थ ब्राह्मणों को देखूं जो इस प्रकार होतो तेरे समीप बांस करूंगी संशय नहीं, इसके विपरीत कहीं वास करना मेरे हृदय में नहीं बर्तता है राजमाता श्रति प्रसन्न मन के साथ उस को यह बोली, तेरे ऐसे वृत को देखकर यह सब कटंगी, हे भरतवंशी राजा युधिष्ठर राजमाता दमयन्ती को इस प्रकार कहकर उस के पीछे; अपनी पुत्री सुनंदा नाम को बोली हे सुनंदा इस देवी रूप सैरंधों को मानो, यह आयु मैं तुल्य तेरी सखी हो निरुद्विग्र मनः तू इसके साथ आनंद कर, उस के पीछे सखियों से परिवारित अति [ ५३ ] प्रसन्न सुनंदा दमयन्ती को लेकर गृह को आई, तब वह दमयन्ती वहां अच्छे प्रकार रचे हुए सब काम्य पदार्थों से पूजित और उद्वेग रहित बहुत आनंद युक्त हुई और वास किया ॥
पंचदशोऽध्यायारंभः
वृहदश्च बोले हे राजन राजा नल ने दमन्यती को छोड़कर गहन बन में बड़े दावानल को देखा, निश्च-य वहां बन के मध्य किसी प्राणि के शब्द को सुना कि हे पवित्र यश वाले राजा नल दौड़ो यह ऊंचेस्वर से बारंवार कहा, मत भय करो नल ने यह कहकर चौर आनि के मध्य प्रवेश करके उस कुंडली वांध कर शयन करने वाले सर्प राज को देखा, तब उस कंपित सर्प ने प्रांजली होकर जल को कहा कि हे राजन सुझ को कर्कोट नाम सर्प जानो, हे. राजन मैंने बड़े तपस्वी ब्रह्म ऋषि नारदजी का अपमान किया हे राजन उस कोप, युक्त से. शाप दिया गया हूं, कि तू. जड़ की तुल्य ठहरो जवतक नल तुझ को वहां से नहीं ले जावेगा, वहां तू मेरे दिये हुए शाप से मुक्त, होगा, मैं उस के शाप से पद से पद चलने को समर्थ नहीं हूं तुम को कल्याण का उपदेश करूंगा [५४] आंप मेरी रक्षा करने को योग्य हों, मैं तेरा सखा हूंगा मेरी समान पन्नग नहीं और भार रहित हूंगा मुझ को लेकर शीघ्र चल, वह नागेंद्र. इस प्रकार कहकर अंगूठे की तुल्य हुआ और नल उस को लेकर दावानल से रहित देश में आया, फिर करकोटक नाम अग्नि से मुक्त आकाशं देश को पाकर उस छोड़ ने के इच्छा मान नल को बोला, हे राजा निषत्र आपने कितने ही पढ़ा को गिनता हुआ चल हे महा वाहु मैं वहां तेरे परम कल्याण को करूंगा, उस के पछि गिनतीं कां आरंभ करने वाले नल को दशवें पद पर काटा उस काटे हुए का वह रूप शीघ्र अंतर ध्यान होगया, वह नल अपने रूप विकार को देख कर बिस्मितं खड़ा हुआ उस राजाने तिज रूप धारी नाग को देखा, उसके पीछे करकोटक नाग सात्वन करता नल को बोला मुझ से तेरा रूप अंतरं ध्यान कियां गया तो तुझ को मंनुष्य नहीं जाने, हे नल जिस पुरुष के कारण से चड़े दुख से वंचित हुआ है वह तेरे शरीर के बीच मेरे विष से दुखी बास करेगा, जचतकं व्रह विष से युक्त अंग तुझ को नहीं छोडेगा हे संहाराज निश्चय तचतक तेरे शरीर में दुख से बास करेगा, हे राजेन्द्र जिस ने निष्पाप और इस दुख के अयोग्य तुम को वंचित किये मैंने क्रोध से उस की निन्दा करके आप की रक्षा की, हे नरोत्तम तुम कोः डाढ़ रखने वाले प्राणियों में और शत्रुओं में। [५५] भी भय नहीं होगा और हे राजन मेरी कृपा से ब्रह्म ज्ञानियों से भी नहीं होगा, हे राजन विष की पीड़ा तुझ को नहीं होगी, हे गजेंद्र संग्रामों में निरंतर जय को पाओगे, हे राजेन्द्र तुम यह कहते कि में वाहुक नाम सुत हूं यहां से राजा ऋतुर्पण के समीप जाओ वह अक्ष विद्या में निपुण है, हे निषध के ईश्वर अभी अयोध्या नगरी को जाओ वह राजा अश्व हृदयः [अश्व विद्या] के बदले अक्ष हृदय [ पाशों की विद्या] तुझ को देगा, वह इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न श्रीमान राजा तेरा मित्र होगा, जब तू चतुर होगा तब कल्याण से युक्त होगा, तुम स्त्री राज्य और पुत्रों से मिलोगे शोक मत करो, यह तुम से सत्य कहता हूं, हैं रोजन जब तुम स्वरूप को देखा चाहो तब मैं तुम से स्मरण के योग्य हूं और इस वस्त्र को धारण करना, इस वस्त्र से ढका हुआ निज रूप को पावेगा, तब नांग राजने यह कहकर उस के अर्थ दिव्य वस्त्र का जोड़ा दिया, हे कौरव राज बह नाग राजा नलको इस प्रका-र उपदेश करके और वस्त्र देकर उसके पीछे वहां ही अंतर ध्यान हो गया [ ५६ ]
पठदशमोऽध्यायारंभः
बृहदश्व बोले नल राजा निषध उस नाग के अंतर ध्यान होने पर चला और दशवें दिन ऋतुपर्ण के नगर में प्रवेश हुआ, वह राजा को इस प्रकार बोलता कि मैं बाहुक नाम घोड़े के चलाने में योग्य हूं और पृथ्वी पर मेरे समान नहीं है, सभीपस्थित हुआ, फिर मैं कष्टों और बुद्धिमानी के कार्यों में पूछने के योग्य हूं इस लोक में जो शिल्प विद्या और.. दूसरे कठिन कर्म हैं उन सब के करने को यल करूंगा, हे ऋतुपर्ण मुझ को पालन करें, ऋतुपर्ण बोला, हे वाहुक तेरा कल्याण हो, वासकर, तू यह सब करेगा, सदा मेरी बुद्धि बाहनों के शीघ्र चलने में विशेप इच्छा रखती है, सो तुम उस योग्य में स्थित हो, जिस से मेरे घोड़े शीघ्र चलने वाले होवें, तू इस का अध्यक्ष है तेरा वेतन (मासिक) दशसहस्र सुवर्ण हैं, वार्शोय-और जीवन नाम सूत सदा तेरे समीप स्थित होगे, तू इन्हीं के साथ प्रीतिमान होगा, हे वाहुक मेरे पास वासकर, वृहद-श्व बोले उस राजा से इस प्रकार कहा हुआ पूजित नल वार्शोय और जीवन के साथ ऋतुपर्ण के उस नगर में बसा, दमयंती को शोचते उस राजा ने वहां वास किया और सदा सायंकाल पर इस श्लोक को पाठ किया, वह भूख प्यास से पीड़ित श्रांत तपश्विनी कहां सोती है अथवा उस मंद को स्मरण करती अपने [५७] जीवन अर्थ किस, के पास स्थित है, रात में इस प्रकार बोलते राजा को 'जीवन बोला, हे वाहुक तुम किस को सदा शोचते हो मैं सुना चाहता हूं, हे आयुष्मान वह किस की स्त्री है जिस को इस प्रकार शोचते हो राजानंल उस को बोला कि किसी मंदबुद्धि की स्त्री बहुमती हुई उस का बृचन अंति दृढ़ नहीं था उसे मंदने किसी प्रयोजन से उस के साथ वियोग किया, वह मंद बुद्धि वियोगी हुख से पीड़ित दिन रात शोक सें. दधृमान और अलंदित घूमता है, रात्रि के समय उस का स्मरण करता एक श्लोक को गाता है वह सब पृथ्वी पर घूमती कहीं कुछ पाकर, फिर भी उस का स्मरण करता उसः दुखं के अयोग्य बास करता हैं वह स्त्रीं कष्ट के बीच ओ बन में उस पुरुष के पीछे गई, उस अल्प पुण्य पुरुष से त्यागी गई जो बह जीवे है तो दुष्कर कर्म है अकेली बाला सागौ को न जानने वालीं उस अन्तला के अयोग्य, भूक प्यास से प्ररीतांग जो जीवे है सो कठिन कर्म है, हे श्रेष्ठ उस अल्प-भाग्य मंद बुद्धि. ने. सदा स्वापदों से आरित बडेः दारुण वंन. में. त्यागी इस प्रकार राजा नल दमयन्ती को स्मरण करता उस राजा के स्थान में अज्ञात वासः को. वसा. ॥
सप्तदशमोऽध्यायारंभः
वृहदश्व बोले नल के राज्य हरण और भार्या सह दासभाव के पाने पर राजा भीमने नल के दर्शन की इच्छा से ब्राह्मणों को भेजा, राजा भीमने चहुत धन देकर उनको उपदेश किया नलको और मेरी पुत्री दभयन्ती को ढूंढो, इस कर्म के सिद्ध होने और राजा नल के विज्ञात होने पर सहस्र गौ दूंगा तुम मैं जो उन दोनों को लावेगा, क्षेत्रादि और नगर की तुल्य ग्राम को दूंगा जो दमयन्ती वा नल भी यहां लाने को योग्य नहीं है, तो जानने पर भी सहस्र गौ धन दूंगा इस प्रकार कहे हुए वे प्रसन्न ब्राह्मण सब दिशाओं को गये, भार्या सहित राज नज़ को प्रदेशों में ढूंढते गये कहीं भी नल वा दमयंती को नहीं कहत थे, उसके पीछे ढूंढ़ते हुए सुदेव नाम ब्राह्मण ने रम्यपुरी चंदेरी में राजभवन के बीच उस दनयंती को देखा, राजा के पुरायाह वाचन में सुनंदा के साथ स्थित और मंद भाग्य को कहते अप्रतिम रूप से युक्त, और धूम जाल से निवद्ध सूर्य की प्रभा के तुल्य अति मलिन कृश विशालाक्षी को देखकर कारणों से निश्चय करता तर्कना करने लगा कि यह भीम की पुत्री हैं, सुदेत्र बोला जिस प्रकार यह मैंने पहले देखी यह अंगना उसी रूपवाली है अब मैं इस श्लोक कांता लक्ष्मी की तुल्य को देखकर कृतार्थ हूं पूर्ण चंद्रमा की तुल्य [५६] प्रकाशमान श्यामा (सदा पोड़श बार्षी की) सुंदर और गोत पयोधर वाली और सत्र दिशाओं को अंध-कार से रहित करने वाली देवी, सुंदर कमल की तुल्य विशाल नेत्र कामदेव की रतिकी समानः और सब लोक की इष्टपूर्ण चंद्र प्रभा की तुल्य, उस विदर्भसरोवर से दैव दोप के कारण मल कीच से 'लिप्त अंग कमलनी कीसी समान उठाई हुई, पूर्णमासी की रात्रि में राहु से असे हुए चंद्रमा की समानः पति के शोक से व्याकुल दीनं शुष्क ब्राह नदी की तुल्य, और उस कमल सरोबर की तुल्य जिस के पत्र क्र मल टूट गये हों और पक्षी उड़ गये हों और हाथी की सूड़ से परामृष्ट व्याकुल हो, अति कोमल और सुडोल अंग रत्न जटित गृहः के योग्य सूर्य से दधुमान उखाड़ी हुई कमलनी की तुल्य, रूप उदारता और गुर्गों से युक्त शृंगार योग्य, परन्तु श्रृंगार से हीन और आकाश में नीले बादल से ढकी हुई नबीन चंद्रकला की तुल्य, त्रिय काम भोगों से हीन बंधुजनों से हीनों दीन और भती के दर्श की इच्छा से देहधारण करने वाली को देखकर कृतार्थ हूं, प्रगट है कि विनां भूषणः के स्त्री का परमभूषण भर्त्ता है यह शोभामान उस से रहित शोभा नहीं पाती है, नल अत्यंत दुष्कर कर्म करता है जो इस से हीन आत्मा के द्वारा देह को धारण करता है और शोक से पीड़ा नहीं पाता है; इस काले के शांत और कमल की तुल्य बड़े नेत्र
[६०]
वाली सुख योग्य को दुखी देखकर मेरा मन भी पीन ड़ित होता है, निश्चय यह शुभा साध्वी कभी भर्ता के मिलाप से दुख के अंत को पावेगी, जिस प्रकार रोहिणी चंद्रमा के समागम से, निश्चय, राजा नल इस दमयंती के पुनर्लाभ से प्रीति को पात्रेगा जैसे राज से भृष्टराजा पृथ्वी को फिर पांकर, अपने तुल्य शील स्वभाव और अवरथा और अपने समान कुलमें युक्त दमयंती को राजा नल योग्य है और यह असितेक्षणा उस के योग्य है, उस अप्रमेय पराक्रम वल से युक्त नलकी भार्या पति दर्शन की इच्छामान को मुझ से आश्वासन करना योग्य है, मैं इस पूर्णचंद्र की तुल्य रूपवाली दुख से पीड़ित ध्यान में तत्पर को जिसने पहले दुख को नहीं देखा आश्वासन करता हूं, वृहदश्व बोले सुदेव ब्राह्मण इस प्रकार नानाः विधि के कारण और लक्षणों से उस को बिचार कर और पास जाकर दमयंती को बोला, हे दमयंती मैं तेरे भ्रता का प्रिय सखा सुदेव ब्राह्मण हूं राजा भीम के बचन से तेरे ढूंढ़ने को यहां आया, हे रानी तेरे माता पिता और सब आता कुशली है और वे दोनों पुत्र पुत्री आयुष्मंत कुशली वहाँ स्थित हैं, तेरे कारण से बंधुवर्ग निर्जीव की तुल्य और ढूंढ़ने वाले. सैकड़ों ब्राह्मण पृथ्वी पर घूमते हैं, हे युधिष्टिर दमयंती, ने उस सुदेव को जानकर उस से अपने सुहृदों को क्रम पूर्वक पूछा, 'हे राजन् राजा विदर्भ की पुत्री शोक़ से [६१] कर्षित दमयंती ने आता के सख्खा द्विजोत्तम सुदेव | को अकस्मात देखकर अत्यंत रुदन किया, हे भरत-वंशी उस के पीछे उस रोती और सुदेव के साथ एकांत में चात करती दमयन्ती को देखकर शोक से. कर्षित सुनंदाने, अपनी माता से कहा कि सैरंध्री ब्राह्मणों से मिलकर अत्यंत रोती है उस को जानो जो मानो, तब इस के पीछे राजा चंदेरी की माता अंतःपुर से वहां गई जहां वह वाला ब्राह्मणों के साथ स्थित थी, हे राजन् उस के पीछे राजमाता ने सुदेव को बुलाकर पूछा कि यह भाविनी किस की भार्या है वा किस की पुत्री है, यह वाम लोचना भर्त्ता और ज्ञाति वालों से कैसे नष्टः हुई, हे विप्र ऐसी अवस्था वाली सती यह तुमने कैसे जानी, मैं तुमसे यह सब निशेष सुना चाहती हूं, इस देच रूपिणी को पूछने वाली मुझ को तत्व पूर्वक कहो, हे राजन् उस से इस प्रकार कहे और सुख से बैठे हुए हिजो उत्तम सुदेवने दमयंती का जैसा वृत्तान्त था कह सुनाया ॥
अष्टदशमोऽध्यायारंभः
सुदेब बोला बड़ा तेजस्वी धमोत्मा.. भीम. नाम. [.६२] विदर्भ देशों का राजा है यह कल्याणी दमयन्ती नाम से विख्यात उस की पुत्री है, फिर बीरसेन का बेटा नल नाम निषध का राजा है यह कल्याणी उस बुद्धि मान पवित्र यश वाले की भार्या है, वह राजा द्यूत में आता से पराजित और हतराज्य, दमयन्ती के साथ गया वह किसी से नहीं जाना गया, सो हम दमयन्ती के अर्थ इस पृथ्वी पर घूर्मते हैं वह यह बाजा तेरे पुत्र के भवन में मिली, इस के समान रूप वान मानुषी विद्यमान नहीं है इस की त्रके मध्य शरीर के साथ उत्पन्न होने वाला यह उत्तम पिप्लु [रक्त मसा] है, मैंने इस श्यामा का पिप्लु कमल के तुल्यप्रकाशमान मल से युक्त देखा जैसे बादल से ढका हुआ चंद्रमा, यह ईश्वर का रचा हुआ, पिप्लु ऐश्वर्य के अर्थ चिन्ह अत्यंत प्रकाश नहीं करता है, जैसे कृष्णप्रक्ष के परिवा की चन्द्र कला इसः का रूप और शरीर मल से ढका हुआ नष्ट नहीं होता और बिना श्रृंगार के भी सुबर्ण के तुल्य--प्रत्यक्षय में प्रकाश करता है, इस शरीर और इस पिप्लु से सूचित यह बाला देवी मुझ से लक्षित हुई जैसे आतप से ढका हुआ अग्नि, हे राजन उस सुदेव के उस बंचन को सुनकर सुनंदा ने पिप्लु के ढांकने वाले मलको घोडाला, दूर किये हुए मल से उस दमयंती का पिप्लु शोभायमान हुआ जैसे चांदल रहित आकाश में चन्द्रमा, हे भरत वंशी सुनंदा और राजमाता पिप्लु को देखकर रुदन करती उस को मिलकर [६३] एक मुहूर्त्त स्थित हुई, राजमाता वाष्प [आंसू को छोड़कर धीरे से यह बोली तू. मेरी भगिनी की पुत्री है इस पिप्लु से जानी गई, हे सुंदर दर्शन मैं और तेरी माता दोनों उस. सुदामा नाम महात्मा राजा दशार्ण की पुत्री हैं, वह राजा भीम को दी फिर मैं बीर बाहु को दी और उत्पन्न हुई तू दशार्ण में अपने पिता के घर मैंने देखी, हे भाविनी जैसा तेरे पिता का गृह है वैसा ही मेरा गृह है और जैसा मेरा ऐश्वर्य है उसी प्रकार तेरा है, हे राजन दमयंती अति प्रसन्न मन के साथ मांता की भगिनी को यह बचन बोली, मैं बिना जानी हुई सब कामनाओं से तृप्त और सदा तुझ से रंक्षित सुख सेः तेरे पास बसी हूं, सुख से.मी अति सुख वाला बासः होगा संशय नहीं है माता दीर्घ काल से मुझ परदेश बासनी के थाज्ञा देने योग्य हो, वे. मेरे दोनों बालक वहां बात करते हैं वे पिता से और मुझ से हीन और शोक से पीड़ित, कैसे होंगे, जो तुम यहां मुझे पर, कुछ भी प्यार किया चाहती हो तो शीघ्र मेरे जाने को आज्ञा दो मैं विदर्भ पुरीको जाना चाहती हूं, हे राजनः प्रसन्न मोसी ने बहुत अच्छा कहकर फिर पुत्र की अनुमति से बड़ी सेना से रक्षित उस दमयंती को बिदा किया, हे भरत श्रेष्ठ राजमाता ने सुंदर अन्न पान और सामग्री से युक्त श्रीमती दमयंती को ऐसे बाहन से जिस को मनुष्य ले चलें भेज दिया, फिर उस के पीछे वह थोड़े काल से ही [६४] विदर्भ देशों में पहुंची श्रति दृष्ट सत्र बंधु जन ने उस को भले प्रकार पूजा हे राजन यशस्विनी देवी दमयंती ने सब बांधवों को और उन दोनों पुत्र पुत्री को दोनों मांता पिता को और सब लखी जन को कुशली देखकर परन विधि के साथ देवता और ब्राह्मणों को पूजा, प्रसन्न गंजा ने पुत्रों को देखकर सहस्र गौ ग्राम और धने से सुदेव को तृप्त किया, हे राजन वह भाविनी वहां पिता के भवन में एक रात वास करके विश्रांत होकर माता को यह बचनः बोली, हे माता जो मुझ को जीवती चाहती है तो में तुझ को सत्य कहती हूं नर बीर नल राजा चंदेरी के ढूंढकर लाने में यल करो, दमयंती से उल प्रकार कही अति दुखी आश्रुपात से पूर्ण अंग उस देवी रानी ने कुछ उत्तर नहीं दिया, तब उस अवस्था वाली उस रानी को देखकर सब अंतः पुर (नागे भवन) अत्यंत हाहा भूत हुआ और अत्यंत रुदन किया, उस के पीछे भायी महाराज भीम को बोली, आप की पुत्री दमयंती भर्त्ता को शोचती प्रेच्छ जन पवित्र यश वाले नल के ढूंढने में यत्ल करो, उस से प्रेरित राजाने वश वर्ती ब्राह्मण सव दिशा को भेजे और आज्ञा दी कि नल के ढूंढ़ने का यत्न करो, तव उस के पीछे राजा विदर्भ की आज्ञा से भेजे हुए ब्राह्मण दमयंती के पास जाकर उसी प्रकार दमयंती को बोले, फिर दमयंती उन को बोली है, हे नृप उस ने लज्जा को दूर करके [६५] कि सब देशों में सत्पुरुषों के बीच तहां २ वारंवार इस वचन को कहो, हे प्रिय ! छलिया तुम मेरे अर्ड वस्त्र को काटकर और मुझ प्रिया अनुरक्त, सोती हुई को बन में छोड़कर कहां चले गये? निश्चय यह वाला जिस प्रकार तुम ने देखी उसी प्रकार बाट देखने बाली अर्जु बल से संवृत और अति दधृमान है, हे बीर पार्थिव कृपा करो और उस शोक से निरंतर रुदन करने बाली उम प्रिया के उत्तर को कह।, इस प्रकार और भी कहने योग्य है जैसे सुस्त पर कृपा करे, वायु से घुयमान अग्नि वन को जल्लाती है, सड़ा पल्ली पति से पालन और रक्षा के योग्य है तुम धर्मज्ञ और सत्पुरुष के वे दोनों गुण किस कारण से नष्ट हुए, थाप सदा विख्यात ज्ञानी कुलीन और दयांवान हैं, मैं शंका करती हूं कि मेरे भाग के निक्षय से तुमने दया को त्याग क्रिया, हे नरोत्तम सो तुम मुझ पर दया करो दया ही परम धर्म है मैंने तुम से सुना, जो इस प्रकार बोलने वाले तुमको किसी प्रकार उत्तर देवे वह नल सच प्रकार से जानने योग्य है, यह कौन है... और कहां रहता है, हे द्विजोत्तमो. जो मनुष्य इस वचन को सुनकर उत्तर दैवे उसका वह बचन सुनकर उ-तर, दैवे, उसका वह बचन सुनकर मुझ से कहने योग्य हो, जिस प्रकार मेरी आज्ञा से कहने वाले तुम को नहीं जाने उसी प्रकार अंतर्हत तुम लोगों से पुनरागमन करने योग्य है, जो यह धनवान होवै [६६] अथवा अधन होवै वा असमर्थ भी होवै इस को चिकीर्षित जानने योग्य है, हे राजन् जब इसी प्रकार कहते हुए वे ब्राह्मण उस प्रकार व्यसनी नल के ढूं ढ़ने अर्थ सब दिशाओं को गये, हे राजन् पुर देश ग्राम द्योत्र तथा आश्रमों को ढूंढते उन ब्राह्मणों ने नलको नहीं पाया, हे राजन् उसी प्रकार उन सत्र ब्राह्मणों ने तहां २ दमयंती के उस बचन को जैसे कहा था श्रवण कराया ॥
एकोनविंशोऽध्यायारंभः
वृहदश्व बोले फिर दीर्घ काल के पीछे पर्णाद नाम ब्राह्मण नगर को आकर दमयंती को यहः वचन वोला, हे दमयंती नल राजा निषध का ढूंढने वाला मैं अयोध्या नगरी को जाकर ऋतुपर्ण के समीप स्थित हुआ, देव वर्णिनी मैं ने वह तेराः वाक्य जिस प्रकार कहा महाजन के वीच महाभाग ऋतुपर्ण को सुनाया, राजा ऋतुपर्ण उस को सुन कर कुछ नहीं बोला और सुझ से वारंवार कहा हुआ कोई सभासदं भी नहीं बोला, ऋतुपर्ण का कोई पुरुष बाहुक नाम सुझ रांजा से अनुज्ञात को. यह बोला, जोकिं उस नरेंद्रका सूत विरूप हूस्व वाहुक घोड़ों के शीघ्र चलाने में [६७] कुशल और भोजन में मिष्ट करता था, वह बहुत | प्रकार से रवास लेकर और बारंवार रोकर और सुझ को कुशल पूछकर पीछे यह बोला, विषम को भी पाने वाली कुलीन स्त्रियां आप को आप रक्षा करती हैं और उन से सत्य स्वर्ग जीता गया इस में सं-शय नहीं भर्ताओं से रहित भी कभी कोप नहीं क रती हैं और श्रेष्ठ स्त्रियां प्राणों को जिन का कवच भर्ता के चरित्र हैं धारण करती हैं जो वह उस वि-षभस्थ मूढ़ और सुख हीन से त्यागी गई उस में क्रोध करने को योग्य नहीं है प्राण यात्रा चाहने वाले पक्षियों में हृत वस्त्र मन की व्यथाओं से दधूमान की श्यामा सत्कृत अथवा असत्कृत भी उस अवस्था वाले अष्ट राज्य लक्ष्मी से हीन भूखे व्यसन में डूबे पति को देखकर क्रोध करने को योग्य नहीं है मैं उस के उस बचनको सुनकर शीघ्र यहां आया सुनकर आप प्र-माण हैं राजा से निवेदन करो, हे राजन् पर्णाद के उस बचन को सुनकर अश्रु पूर्णाक्षी दमयंती माता को एकांत में मिलकर बोली हे माता यह अर्थ कभी भीम' से नल लाने योग्य नहीं है मैं तेरे समीप द्विज सन्तम सुदेव को प्रेरणा करूंगी, जिस प्रकार राजा भीम मेरे मत को नहीं जाने उसी प्रकार तुझ से करने योग्य है जो मेरा प्रिय चाहती है जिस प्रकार मैं शीघ्र सुदेव के द्वारा बांधों के प्रास लाई गई, हे माता उसी मंगल के साथ सुदेव ब्राह्मण नल के लाने को यहां [६८] से अयोध्या नगरी को शीघ्र जावे देर न करे उस के पीछे भाविनी दमयन्ती ने विश्रांत द्विजसत्तम पर्णाद को, बड़े धन से पूजा, और कहा कि यहां नंल के आने पर फिर तुझ को धन दूंगी, तुमनें मेरा बहुत कार्य किया जो दूसरा नहीं करेगा हे द्विजोत्तम जो में शीघ्र भर्ता से मिलूंगी, इस प्रकार कहा हुआ कृतार्थ बड़े मनत्राला ब्राह्मण मंगली था-र्शीवादों से आश्वान करके अपने गृह को गया, हे युधिष्ठिर उस के पीछे दुख शोक से युक्त दमयन्ती माता के समीप सुदेव को बुलाकर बोली, हे सुदेव इच्छा के अनुसार चलने वाले की समान दौड़ता हुआ अयोध्या नगरी को जाकर अयोध्या बासी राजा को कहो सीम की पुत्री दमयन्ती फिर स्वयंवर में स्थित होगी वहां सत्र राजा और राज कुमार जाते हैं, तथा जो स्वयंवर का समय कल्पना किया गयां वह कल होगा जो यह गति तुम से संभव है तो हे अरिंदमं शीघ्र चलो, बंह सूर्य उदय परं दूसरे भत्ती को वरेगी वह बीर नल नहीं जाना जाता है कि जीदिता है वा नहीं, हे महाराज तच उस से इस प्रकार कहे हुए सुदेव ब्राह्मण ने अयोध्या को जाकर राजा ऋतुपर्ण को संत्र वृत्तान्त कहां ॥ [६९]
विंशतिषोऽध्यायारंभः
वृहदश्व बोले राजा ऋतुपर्ण सुदेव के वचन को सुनकर रलक्ष्ण वाणी से सांत्वन करता वाहुक को बोत्ता, हे हय तत्व के जानने वाले बाहुक जो तू मानता है तो में एक ही दिन में विदर्भ देश के वीच दमयंती के स्वयंवर में जाना चाहता हूं, हे कौतय उस राजा से इस प्रकार कहे हुए चंल का मन दुख से फट गया और बड़े मन बोलेने वडा ध्यान किया, दुख से मोहित दमयंती यह कहैं और करें अथवा मेरे अर्थ यह वडा उपाय विचारा होयै, बड़ा दुख और निरंदयापन है कि राजा विदर्भ की पुत्री भर्चा की इच्छामान तपस्विनी मुझ नीचे कृपण पाप बुद्धि से निरादर की गई, लोक में स्त्री का स्वभाव चलित है मेरा दारुण दोष है इस प्रकार भी हों वह प्रवास से प्रीति शून्यं ऐसा भी करें, मेरे शोक और निराश से संविघ्न वह तन मध्यमा कभी ऐसा नहीं करें विशेषकर वह संतान सहित है, जो इस में सत्य वा असत्य है जाकर निश्चय को पाऊंगा निश्चय मैं ऋतुपर्ण की कामना को अपने अर्थ करता हूँ दुखी मन वाहुक मंन से यह निश्चय करके हाथ जोड़कर राजा ऋतुपर्ण को बोला, हे राजन में तेरे बचन को अंगीकार करता हूं हे पुरुषोत्तम एक ही दिन में विदर्भ नगरी को जाऊंगा, हे राजन उस के [७०] पीछे उस बाहुक से राजा ऋतुपर्ण की आज्ञा से अश्वशाला में जाकर घोड़ों की परीक्षा की, ऋतुपर्ण शीघ्र युक्त किया, वाहुक घोड़ों को जामने का इच्छा वाव बारंवार विचार कस्के, उन घोड़ों के पास गया जोकि कुश समर्थ मार्ग चलने के योग्य कांति और शक्ति से युक्त कुल और झील. (सारथी के चित्त की अनुसारता) से भले प्रकार युक्त और शतपदी आदि हीन लक्षणों से रहित बड़ी नासिका और बड़ी हनुवाले, दश भौरियों से शुद्ध सिंधु देशी, और वायु की तुल्य वेगवान थे राजा उन को देखकर कुछ कोप से युक्त बोला, यह क्या करना चाहा हम तुम से बचन योग्य नहीं ये अल्प बल प्राण वाले घोड़े मुझ को कैसे ले चलेंगे और ऐसे घोडों के द्वारा अशब्द मार्ग कैसे चलने के योग्य है [व्या] दूसरे स्वयंवर में दमयंती का विवाह शास्त्र के विपरीत और बड़ी लज्जा की बात है इसलिये गुप्त जाना चाहिये कि कोई न जाने इसी कारण से अशव्द गति को कहा, वाहुक बोला जिनके ललाटपर एक मसाक पर दो पाश्र्व और उप पाश्र्वे पर दो २ और छाती पर दो २ और पृष्ट पर एक भौंरी है, ये घोड़े विदर्भ देशों को जायेंगे संशय नहीं तुम जिन दूसरे घोड़ों को मानते हो उन को कहो उन को जोडूं, ऋतुपर्ण बोला हे वाहुक तुम ही हय तत्व के जानने वाले कुशल हो तुम जिन घोड़ों को समर्थ मानते हो शीघ्र उन को [७१] जोड़ो, उस के पीछे कुशल नल ने कुलशील से युक्त वेगवान श्रेष्ठ चारों घोडों को रथं में जोड़ों, उस के पीछे शीघ्रता से युक्त 'राजा जोडे हुए ग्थ पर चढ़ा फिर वे उत्तम घोड़े जानुओं से भूमि पर गिर पड़े, हे राजन उस के पीछे नरोत्तम श्रीमान राजा नल ने उन तेज वल से युक्त घोड़ों को सांत्वन किया, उस नल ने सूत वाष्र्णेय को बिठलाकर, और बड़े वेग में स्थित होकर और बाग डोरों से घोड़ों को उठाकर चलाना चाहा, बिधि के अनुसार वाहुक से प्रेरित वे उत्तम घोड़े रथी को मोहित करके आकाश को उछले, उस प्रकार उन बायु की तुल्य वेगवान चलते हुए घोड़ों को देखकर अयोध्या के राजा श्रीमान ने बड़े आश्चर्य को पाया, बार्णेय ने उस रथ द्योष को और घोड़ों के उस ग्रहण को सुनकर बाहुक के हयज्ञानं को शोचा, क्या यह देवराज का सारथि मातल हो तथा वीर वाहुक में वह बड़ा लक्षण दीखता है, फिर क्या यह घोड़ों के कुल और तत्व को जाननें बास्ता शालिहोत्र (अश्त्र शास्त्र प्रणेता आचार्य) परम शो-भावान रूप को प्राप्त हो, आश्चर्य कि यह रात्र के पुर को जय करने वाला राजा नल होवै सो यह राजा नत आया इस प्रकार बहुत चिंता की, अथवा 'यह बात हो. कि इस लोक में नल जिस विद्या को जानता है उस को बाहुक जानता है मैं बाहुक और नल के ज्ञान को तुल्य देखता हूं, और यह भी है कि नल [৩২] और बाहुक की अवस्था तुल्य है यह महा बली नत्ल नहीं है उसी के तुल्य विद्यमान होयें, दैव विधि और शास्त्रको निरूपणों से युक्त महात्मा इस पृथ्वी पर गुत विचरते हैं, गांत्र की वैरूप्यता में मेरी बुद्धि का भेद न हो प्रमाण से हीन होवै यह सेरी यत है, यह अवस्था का प्रगाण तुल्य है रूप से विपरीत है बाहुक को निर्णय से सब गुर्गों से युक्त नख मानता हूं, हे गद्दाराज पवित्र यश काले नल को सारथी. वाष्र्णय ने इस प्रकार बहुत विचार करके हृदय में चड़ी चिंता की, और महाराज राजा ऋतुपर्ण नाट्य सारथी के साथ बाहुक की हवक्षता को विचारता प्रसज्ञ हुय़ा, एकागूता उत्साह श्रीरघोड़ों का संग्रहण और परम यत्न को देखकर बड़े आनंद को पाया ॥
एकोविशतितमोऽध्यायारंभः
वृहदश्व बोले उन आकाश में चलन बाले राजा नल ने थोड़े ही काल में नही पर्वत बन और सरोवरों को पक्षी की समान उलंघन किया, तब उस प्रकार रथके चलने पर यात्रु के जीतने वाले राजा ऋतुर्ण ने उत्तरीय बज को नीचे गिरा देखा, तब उस के पीछे वस्त्र के गिरने पर उस बड़े मनवाले ने [७३] शीघ्र उस नल का कहा कि में इस बढ़ा को ग्रहण करूंगा, हे महा बुद्धि इन बड़े वेगवान घोड़ों को रोको, जब तक यह वाष्णेय इस मेरे वस्त्र को यहां लाओ, फिर नल ने उसको उत्तर दिया आप का वस्त्र दूर गिरा एक योजन उल्लंघन किया उस के फिर लाने को समर्थ नहीं, हे राजन् तब नल के इस प्रकार कहने पर राजा ऋतुपर्ण ने बन में फल सहित विभीतक वृक्ष को पाया, राजा उस वृक्ष को देखकर शीघ्र वाहुक को बोला हे सूत तुम संख्या करने में मेरे भी परम बल को देखो, सत्र, सभ बातों को नहीं जानते हैं, सर्वज्ञ कोई नहीं कहीं, एक ही पुरुष में ज्ञान की परिनिष्ठा नहीं है, हे बाहुक इस वृक्ष में जो पन्न और फल भी हैं, और जो यहां पड़े हैं वहां एक सौ एक हैं, हे वाहुक जिन में एक अधिक पत्र रखने वाला एक फल है और दोनों शाखाओं के पत्रों की भी संख्या पांच कोटि है, इस वृक्ष की दो शाखा चुनलो और जो उनमें दूसरी शाखा हैं, उनकी भी संख्या करो इन दोनों में दो सहस्र पंचानवे फल हैं, उसके पीछे वाहुक रथ को खड़ा करके राजा को बोला, हे शत्रु कर्षण राजा तुम मेरी परोक्ष बात को कहते हो, मैं विभीतक वृक्ष को निष्पत्र कर-प्र-त्यक्ष करूंगा, हे राजन यहां संख्या करने में परोक्षता विद्यमान नहीं है, हे महाराज आप की आंखों के सामने विभीतक को काटूंगा, मैं नहीं जानता हूं इस [৩४] प्रकार होवै वा नहीं, हे राजन् आपके देखते इस के फलों की संख्या करूंगा, बाङ्ग्रेय एक मुहूर्त घोड़ों की बाग-डोरों को पकड़ो, राजा उस सूत को बोला कि यह समय बिलंब करने को योग्य नहीं परम यत्न में स्थित । बाहुक इसको बोला, तुम एक मुहूर्त प्रतिक्ष्ण करो अथवा आप शीघ्रता करते हैं, तौ वह कल्याण रूप मार्ग जाता है वार्णेय को सारथि रखने वाले लुम जाओ, हे कुरुनंदन फिर ऋतुपर्ण सांत्वन करता भोला, हे वाहुक तुमही श. स्ता हो पृथि में भी दूसरा नहीं है, हे अश्व विद्या के पंडित तेरे कारण से विदर्भ पुरीको जाना चाहता हूं, तेरी शरण में प्राप्त हूं, विघ्न करने को योग्य नहीं है, हे बाहुक तुम जो कुछ सुझ को कहोगे तुम्हारी उसी कामना को करूंगा, 'जो अच विदर्भ पुरीको जोकर मुझ को सूर्य का दर्शन करावेगा, इसके पीछे बाहक उस को बोला कि विभीतक के संख्या करके फिर विदर्भ पुरीत्रने जाऊंगा, इस अंकार मेरे बचन को कर अनेच्छा की समान राजा उसको बोला कि गिनती करो, हे निष्पाप मैंने शाखा का. एक देश वतलाया, हे तत्व के जानने वाले इस की गिनती करो, उस से तुझ प्रसन्नता को पाओगे, उस ने रथ से शीघ्र उतर कर उस वृक्ष को निष्पत्र किया, इस के पीछे वह आश्चर्य से भरा हुआ राजा गिन्ती करके राजा को यह बोला कि जिस प्रकार कहे 'उतने ही फल हैं, हे सजन् मैंने तेरे इस अद्भुत [७५] वल को देखा, हे नृप उस विद्या को सुना चाहता हूं जिस के द्वारा इस बात को कहते हो, हे नृप उस के पीछे जाने में शीघ्रता करने वाला राजा उसको बोला सुझको अक्ष हृदय का जानने वाला और सं-ख्या करने में चतुर जानों, इसके पीछे बाहुक उस को बोला, हे पुरुपोन्तम इस विद्या को दे और मुझ से भी अश्व हृदय को ग्रहण कर, उस के पीछे राजा ऋऋतुपर्ण कार्य के गौरव और अश्य विद्या के लाभ से उस बाहुक को यह बचन बोला तथास्तु, यह अक्षों का परम हृदय (मंत्र) जिस प्रकार कहा है तुम ग्रहण करो, हे बाहुक मेरी निक्षेप अश्व हृदय तेरे पास स्थित रहै, ऋतुपर्ण ने इस प्रकार कहकर विद्या को नल के अर्थ दिया, अक्ष हृदय को जानने वाले उस बल के शरीर से कर्कोटक के तीक्षण विष को भात्र से निरंतर वमन करता कलि देवता निकला, तच. उस पीड़ामान कलियुग की वह शाप आ निकली जिस से कर्षित बह राजा दीर्घकाल तक मूढ़ रहा, उस के पीछे विष से युक्त शरीर कलि ने अपने रूपको किया, निषध देशों के राजा कुपित नल ने उसको शाप देना चाहा, भय युक्त कंपित और कृतांजलि कलि उस को बोला हे राजन् कोप को रोको तुमको परम कीर्ति दूंगा, पूर्वकाल में इंद्र-सेन की माता कुपितने मुझको शाप दिया, जब तुम से त्यागी गई, उस कारण से, मैं अति पीड़ित हूं; [७६] हे अपराजित राजेंद्र मैं नाग राज के विष से दिन रात जलता अति दुखी तेरे शरीर के मध्य स्थित हुआ, तेरी शरण में प्राप्त हूं, इस मेरे बचन को सुन जो आतांद्रत मनुष्य लोक में तेरा कीर्तिन करेंगे, मेरा उत्पन्न किया हुआ भय उनको कभी न. होगा, जो तुम मुझ भय से पीडित और शरणागत को शाप नहीं दोगे, इस प्रकार कहे हुए राजाने अपने को रोका, उसके पीछे डरा हुआ कति शीघ्र विभी-तक वृक्ष में प्रवेश हुआ, तब नलके साथ-चात करता हुआ कलि दूसरों से नहीं देखा गया, उल के पीछे शत्रु के वीरों को मारने वाला राजा निषध ज्वर से रहित हुआ कलि के अलग होने पर राजा इसके फलों को गिनकर, बड़े तेज और परम आनंद से युक्त तेजस्वी रथ पर चढ़कर वेगवान घोड़ों के द्वारा चला, और कलियुग के मिलाप से विभीतक वृक्ष अधम माना गया, नक्लने पक्षियों की तुल्य वारंवार उछलते, उत्तम घोड़ों को प्रेरित किया और वह बड़ा यशस्वी राजा अति प्रसन्न मन के साथ विदर्भ पुरी के सन्मुख चला, नत्त के दूर चले जाने पर कलि भी अपने गृह को गया, हे राजन् उसके पीछे पृथ्वी पति राजा नल ज्वर से मुक्त हुआ केवल रूप से भिन्न रहा ॥ [৩৩]
द्वाविंशतितमोऽध्यायारंभः
वृहदश्व बोले उसे के पीछे मनुष्यों ने सायंकाल पर विदर्भ पुरी में प्राप्त सच्चे पराक्रमी ऋतुपर्ण को राजा भीम से कहा, वह राजा रथ द्योष से सब दिशा-थों और विदिशाओं को नादित करता भीम के बचन से कुंडनपुर में प्रवेश हुआ, उस के पीछे वहां नल के घोड़ों ने रथ के शब्द को सुना और सुनकर हींसे जैसे पूर्व काल में नल के समीप, दमयंती ने नल के उस रथ द्योप को सुना जैसे वर्षा के आगम में गरजते मेघ का गंभीर शब्द होता है, बड़े शब्द वाले नाद को सुनकर बड़े आश्चर्य से युक्त हुई दमयंती तथा घोड़ों ने रथ द्योष को उस के समान जाना जैसे पूर्व काल में नल के हाथ से घोड़ों के ग्रहण करने पर होती थी, प्रसादों पर स्थित मोरों और शालाओं में स्थित हाथियों और घोड़ों ने उस राजा के रथ की घोष को सुना, हे सजन मेघ शब्द के उत्सुक मोरं तथा हाथी उस रथं के शब्द को सुनकर मुख को ऊंचा करके शव्द करने लगे, दमयंती बोली जिस प्रकार यह रथ शब्द पृथ्वी को पूर्ण करता मेरे चित्त को पूरण करता है यह राजा नल ही है, फिर जो मैं उस चंद्रमुखी असंख्येयगुण वाले बीर नल को नहीं देखूं तौ नाशं को पाऊंगी संशय नहीं, जो मैं अब इस बीर की भुजाओं के बीच में जिन का स्पर्श [७८]
सुखदाई है प्रवेश नहीं करती हूं तो में नहीं हूंगी संशय नहीं, जो भेष की तुल्य शब्दवान राजा नल मुझ को प्राप्त नहीं होता है, तो सोने की तुल्य प्रभावान् अग्नि में प्रवेश करूंगी, जो सिंह विक्रान्त और मतवाले हाथी की तुल्य पराक्रमी राजेंद्र नल मेरे पास नहीं थांता है तो नाश को पाऊंगी, संशय नहीं, मैं कुछ झूठ को स्मरण नहीं करती हूं और न अपकारता को स्मरण करती हूं और कभी स्वतंत्र-ताओं में भी बचन के प्रतिज्ञाति काल को उल्लंघन नहीं किया, मेरा प्रभु बीर राजा नल क्षमावान और अधिक दाता भी है एकांत में अर्थात स्त्रियों के मध्य सत्पुरुषों के आचार पर बरताव करने वाला क्लीव की समानं है, बिना उस प्यारे के शोक से दिनरात उस के गुणों को स्मरण करती मुझ तत्पराका यह हृदय फटा जाता है, हे भरत वंशी इस प्रकार वह नष्ट ज्ञान और विलाप करने वाली दमयंती पवित्र यश वाले नल के दर्शन की इच्छा से महा भवन पर चढ़ी, उस के पीछे वाष्र्णेय और वाहुक के साथ रथ में स्थित राजा ऋतुपर्ण को मध्यम कक्षा में देखा, उस के पीछे वाष्र्णेय और वाहुक ने उत्तम रथ से उतरकर उन घोड़ों को छोड़कर रथ को स्थापन कि-या, वह राजा ऋतुपर्ण रथ के ऊपर से उतर कर भया-नक पराक्रमी महाराज भीम के समीप स्थित हुआ, उस के पीछे भीम ने बड़ी पूजा के साथ उस को [७६] लिया राजा ऋतुपर्ण उस राजा से पूजित हुआ, वहाँ रम्य कुंडनपुर में बास करने वाले और बारंवार देखने वाले उस राजा न कुछ नहीं देखा, तब उस राजा ने राजा विदर्भ के साथ मिलकर, अकस्मात शीघ्र प्राप्त स्त्री मंत्र को नहीं पाया, हे भरत वंशी वह राजा से पूछा गया आप का आना शुभ हो, क्या कार्य है, उस बुद्धिमान सत्य पराक्रम राजा ऋतुपर्ण ने भी पुत्री के अर्थ आने को वर्णन नहीं किया, क्योंकि राजा या किसी राज पुत्र को नहीं देखा न स्वयंवर की कथा को और न ब्राह्मण। के समागम को; उस के पीछे कोशलाधिप राजा ने मन से विचार किया और इस को कहा कि आप को नमस्कार करने वाला आया हूं [अर्थात मिलने को आया हूं] आश्चर्य करते राजा भीम ने भी शत योजन से अधिक उस के नेक कारणों को मन से सोचा, यह नमस्कार करने वाला राजा दूसरे राजाओं को और बहुत ग्रामों को उल्लंघन कर प्राप्त हुआ इस के ठीक कारणों को नहीं जाना और उस के आने का कारण छोटा कहा, पीछे उत्तर काल में कारणों को जानूंगा जो होगा, उस राजा ने इस समय इस प्रकार विचार करके उस राजा को विदा नहीं किया, किन्तु बारंवार यह बोला कि थके हो विश्राम करों, प्रसन्नः राजा से सत्कृत और प्रसन्न गन वह राजा, जिस के पीछे राजा. के सेवक थे बताए हुए सवन में प्रवेश हुआ, हे नृप [७६] वाष्र्णेय के साथ ऋतुपर्ण के चले जाने पर, बाहुक रथ को लेकर रथ शःला में गया, वह उन घोड़ों को छोड़कर और शास्त्र के अनुसार उपचर्या करके, और आप इन को आश्यान करके रथ के उपस्थ पर बैठ गया, शोक से पीड़ित राजा विदर्भ की पुत्री दमयंती ने भी राजा ऋतुपर्ण को और सूत' के पुत्र वाष्र्णेय को और उस प्रकार रूपवान बाहुक को देखकर चिंता की, कि यह किस के रथ का शब्द है, ऐसा बड़ा शब्द नल के रथ क़ा था और उस राजा निषच को नहीं देखती हूं, निश्चय वह विद्या वाष्र्णेय ने सीखी होत्रै, उस कारण से अवश्य रथ का शब्दःनल के रथ की तुल्य बड़ा हुआ, आश्चर्य कि ऋतुपर्ण भी वैसा ही है, जैसा राजा नल है, तथा यह रथ शब्द भी नल के रथ के तुल्य दिखाई देता है, हे राजन उस शुभा दमयन्ती ने इस प्रकार तर्कना करके नल को ढूंढ़ने अर्थ दूती को भेजा ॥
त्रयोविंशतितमोऽध्यायारंभः
दमयन्ती - हे केशिनी आओ और जानों कि यह विकुन हूत्व बाहुक रथ का चलाने वाला रथ के उ-पस्थ पर बैठा हुआ कौन है, हे-अनिंदिते कल्याणी सावधान, तुम पास जाकर सूदु पूर्वक इस पुरुष को कुशल पूछो, यहां मेरीः बड़ी शंका है कि यह राजा नल होवै जिस प्रकार मेरे मन की तृप्ति औरः हृदय की निवृत्ति होवै, और जिस प्रकार पर्णाद के बचन हैं उनको कथा के अंत में कहना हे सुश्रेणि हे अ-निदिते तुम उत्तर को जानना, उस के पीछे साथधान दूती जाकर बाहुक को बोली, और भवन के ऊपर स्थित कल्याणी दमयन्ती भी देखने लगी, हे नरेंद्र आपका आना शुभ हो मैं आपकी कुशल पूछती हूं हे पुरु-पोन्तम दमयन्ती के शुभ बचन को समझो, तुम कच चले और यहां किस अर्थ आये तुम न्याय के अनुसार तत्वे बात को कहो दमयन्ती सुना चा-हती है, बाहुक बोला महात्मा राजा कोशल ने ब्रा-हह्मण से सुना कि कल दमयन्ती का दूसरा स्वयंवर होगा, राजा इसको सुनकर शत योजन पलने वाले वायु की तुल्य वेगवान सुख्य घोड़ों के द्वारा चला और मैं इसका सारथी हूं, केशिनी बोली तुम में जो यह तीसरा है वह कहां से आया फिर किस का पुत्र है और तुम किस के पुत्र हो और यह कर्म तुम में कैसे स्थापित हुआ, बाहुक बोला हे भद्रे यह पवित्र यश वाले नल का सारथी वाष्र्णेय नाम से. विख्यात है वह नल के निष्फल जाने पर राजा ऋतु-पी के पास स्थित हुआ, और अश्व विद्या में कुशल मैं भी आप राजा ऋतुपर्ण की ओर से 86/108 भोजन बनाने में नियत किया गया, केशिनी बोली फिर वाणैय जानता है कि राजा नल कहां गंग्रा हे वा-हुक इसने किसी प्रकार तुम से कहा हो, बाहुक बोला यह वार्णेय शुभ कर्मा नल के पुत्र और पुत्री को यहां छोड़कर फिर इच्छा के अनुसार चला गया वह राजा निषध को नहीं जानता है, हे यशस्विनी दूसरा कोई पुरुष भी नल. को नहीं जानता है वह राज़ा नष्ट रूप इस लोक में गुप्त बिचरता है, जो इस की प्रिया है वह आप ही नल को जानती है निश्चय नल अपने चिन्हों को कभी नहीं कहता है के-शिनी बोली तब जो यह ब्राह्मण इन नारी वचन को वारंवार कहता अयोध्यापुरी को गया, हे छलिया तुम कहाँ हो जो मेरे अर्द्ध वस्त्र को काटकर और मुझ अनुरक्त. प्रिया सोती को, बन में छोड़कर चले ग़ये, निश्चयं वह जिस प्रकार उपदेश की गई उ-सी प्रकार बड़ी प्रतीक्षा करने वाली दिन रात वृधु-मान और अर्द्ध वस्त्र से ढकी हुई है, हे वीर पार्थिव उस दुख से निरंतर रुदन करने वाली उसः प्रिया के उत्तर को कहो और कृपा करो, हे सहा मंति उल के उस प्रिया प्राख्यान को कहो अनिंदिता दमयंती उसी. बचन. को सुना चाहती है, पूर्वकाल में उस के इस. बचन को सुनकर तुमने जो उत्तर दिया उसको दमयन्ती फिर तुमसे सुना चाहती है, वृहदश्व बोले हे कुङ्गनंदन केशिनी ने इस प्रकार कहे हुए "नल कां हृदय पीड़ित हुआ और दोनों नेत्र अश्रु से पूर्ण हुए, [८३] उस दधुमान सही पति ने अपने दुख को रोकर वाप्प से संदिग्ध वाणी के साथ फिर यह कहा, चिन्मता को प्राप्त कुलीन स्त्रियां आप आप को रक्षा करती हैं उन से सत्य स्वर्ग जीता गया, संशय नहीं, भर्त्ताओं से रहित भी कभी कोध नहीं करती हैं. श्रेष्ठ स्त्रियां जिनका कच्च सर्त्ता के चरित्र हैं प्राणों को धारण करती हैं जो वह उस विषमस्थ मूढ़ सुख हीन से त्यागी गई उस में क्रोध करने को योग्य नहीं है, प्राणयात्रा की इच्छावान पक्षियों से हुत वस्त्र और मनकी पीड़ाओं, से दधुमान की श्यामा क्रोध करने को योग्य नहीं है, सकृत अथवा असकृत भी उस अवस्था वाले राजा अष्ट लक्ष्मी से हीन भूखे और व्यसन में डूबे पति को देखकर क्रोध करने को योग्य नहीं है, हे भरतवंशी इस प्रकार उस बचन को, बो-लता बड़ा दुखी मन नल अश्रुको न रोक सका और बहुत रोया, उस के पीछे उस केशिनी ने जाकर वह सब वृत्तान्त और उसके उस बिचार को दद्मयन्ती से, कहा ॥ [८४]
चतुरविंशतितमोऽध्यायारंभः
वृहदश्व बोले फिर शोझ से अति पूर्ण दमयंती उस वाक्य को सुनकर उस को नल शंका करती केशिनी को यह बोली, हे केशिनी फिर तुम जाओ और बाहुक में परीक्षा करो समीप स्थित और न बोलती तू इस के चरित्रों को देखो, हे भाविनि वहां पर जब कुछ कर्म कारण के साथ करें वहां उस चेष्टा करने बाले के चेष्टित को देखती परीक्षा कर, हे केशिनी हठ के साथ इस को अग्नि भी न देनी चाहिये और सब प्रकार शीघ्रता करने वाली तुम को इस यादना करने वाले के अर्थ जलं न देना चाहिये, तुम इस सब को भले प्रकार बिचार उस का चरित्र मुझ से कहो जो दैव और मानुषं कारण बाहुक में तुम से देखा गया हो, जो दूसरी बात भी देखो वह भी तुझ को मुझ से कहने योग्य है फिर दमयन्ती से इस. प्रकार कही हुई वह केशिनी वहा गई, फिर उल अश्व बिद्या के पंडित के लक्षणों को देखकर फिर आई उसने वह सब जैसा वृत्तान्त था दमयंती से कहा उसने जो दैव मानुष निमित्त बाहुक में देखा वह सब कहा, केशिनी बोली हे दमयंती यह पुरुष जल स्थल के दृढ़ शौच का रखने वाला है इस प्रकार मनुष्य पहिले न कहीं देखा और सुना भी नहीं, यह छोटे द्वार को पाकर कहीं नहीं झुकता है उस [८५] पर धर को देखकर छोटा द्वार भो सुख पूर्वक बड़ा होजाता है, बोटे होने पर भी इस का छिद्र बहुत बड़ा हो जाता है और ऋतुपर्ण के अर्थ नाना प्रकार के भोजन और पशुओं का बहुत मांस राजा भीम ने वहां भेजे उन के प्रक्षालन अर्थ वहां पर घड़े घरे गयेः उस के पीछे उस बाहुक से देखे हुए वे सटके पूर्ण हुए तिर वाहुक प्रक्षालन करके और चूल्हे कर, और एक मुष्टि तृण लेकर उस को सूर्य के तेज से उद्दीप्त किया इस के पीछे वहां अकस्मात अग्नि प्रचलित हुई, उस बड़े आश्चर्य को देखकर आश्चर्य युक्त मैं यहां आई और मैंने उस में दूसरे बड़े आश्चर्य को देखा, हे शुभे जो यह अग्नि को. स्पर्श करके भी दग्ध नहीं होता है उस का जल बिना रोक इच्छा के अनुसार शीघ्र प्राप्त होता है, मैंने दूसरा बहुत बड़ा आश्चर्य देखा जो उसने पुष्पों को लेकर हाथों से धीरे २ मर्दन किया हाथों से मर्दन किये हुए वे पुरुप मलिन न हुए, फिर भी वे पुष्प प्रफुल्लित सुंदर गंध वाले होते हैं मैं इन अद्भुत चिन्हों को देखकर शीघ्र आई, वृहदश्व बोले फिर दमयंती ने पवित्र यशवान नल के चेष्टित को सुनकर कर्म चेष्टाओं से सूचित नल को प्राप्त माना, फिर देह की चेष्टाओं से बाहुक को भर्त्ता शंका करती और रोती दमयंती मधुर वाणी के साथ केशिनीः को बोली हे भाविनी फिर जाओ और, रसोई गृह से प्रमन्त्त बाहुक के बज़ाये [८६] हुए उष्ण मांस को यहां लाओ, हे कुरुनंदन उस के पीछे उमः प्रिय कारिणी केशिनी ने शीघ्र बाहुक के समीप जाकर और उस अति उष्ण मांस को लेकर उसी क्षण, दमयंती के अर्थ दिया नल के बनाये हुए मास के योग्य वह दमयंती पूर्व काल में. बहुत बार, खाकर और सूत को नल मान कर अति. दुखी पुकारी हे भरत. वंशी बड़ी बिकलता को पाकर फिर मुख को धोकर, केशिनी के साथ पुत्र और पुत्री को भेजा उस के पीछे बाहुक रूप राजा ने अपने आता कें. इंद्र सेना. कन्या को जानकर, और सन्मुख जाकर और मिलकर गोद में बिठला लिया फिर-बाहुकः देव कुमार की उपमा रखने वाले पुत्रः पुत्रों को पाकर, अति दुख से व्याप्त मन् ऊंचे स्वरःसे रोया तवं राजा निषध वारंवार बिकार को दिखलाकर, और अकस्मात पुत्र पुत्री को देखकर केशिनी को यह बोला हे भद्रे यह जोड़ा मेरे पुत्र पुत्री के समान है इसः कारण से मैंने देखकर अकस्मात अश्रु को छोड़ा, मनुष्यः बहुत बार आने वाली तुझ को काम दोष से शंका करें और हम देश के अतिथि हैं हे भद्रे सुख पूर्वक जाओ ।।
पञ्चविंशतितमोऽध्यायारंभः
बृहदश्व बोले फिर केशिनी ने पवित्र यशवाले बुद्धिमान बाहुक के सत्र विकार को देखकर और आकर सत्र वृत्तान्त दमयन्ती से कहा, उसके पीले दुखले पीड़ित दमयन्ती ने नलके दर्शन की इच्छासे फिर केशिनी का गाता के समीप भेजा, मैंने बाहुंक को नलंकी संस्ः से बहुत प्रकार से परीक्षा किया मेरा एक संयाय लय में है. मैं आप जाना चाहती हूं, हे माता यह भवन में प्रवेश करो अथवा मुझे आज्ञा देने को योग्य है विदित या अज्ञात को मेरे पिता से कहो, फिर दमयन्ती में इस प्रकार कही हुई उस देवी ने पुत्री के उस अभिप्राय को राजा भीम से कहा और उस राजाने आज्ञा दी, हे भरतर्षभ उस माता पिता से अनुज्ञात ने नल' को प्रवेश करांयो जहां उसका गृह था, राजा नल अकस्मातं उस दमयंती को देखते ही शोक दुखं से आविष्ट और अश्रु से परिद्भुत हुआ, तब वर वर्णिनि दमयंती उस रूपवान नल को देखकर तीव्र शोक से आविष्टः हुई हे महाराज उस के पीछे कपाय बस्त्र और जटाधारी मलिन शरीर दमयंती बाहुक को यह वचन बोली, हे बाहुक तुमने पूर्व कालमें कोई धर्मज्ञ देखा जो पुरुप सोती हुई ल्ली को बन में छोड़कर चलागंया, फिर पवित्र यात्राले नलके सिवाय कौन पुरुप श्रम [८] से मोहित निष्पाप प्रिया भार्या को निर्जन बन में छोड़ कर चला जावे, मैंने अज्ञानता से उस राजाका कौन अपराध किया जो मुझ निद्रा से पीड़ित को बन में छोड़ कर चला गया, मैंने पूर्वकाल में साक्षात देवताओं को छोड़कर जो वह बरा उस ने सुझ अनुव्रता पुत्रवती और सब प्रकार से चाहने वाली को कैसे त्याग किया, अग्नि के पास तथा देवताओं के समीप हाथको पकड़कर और प्रीति रखूंगा यह सत्य प्रतिज्ञा करके विवाह किया वहः कहां गई, हे अरिंदम इस बचन को कहने वाली दमयंती के नेत्रों से शोक से उत्पन्न और दुखरूप बहुत जल गिरा, नल अत्यंत कृष्णसार और रक्तीत नेत्रों से गिरते हुए उस नल को देखकर उस शोक से पीड़ित दमयंती को यह-वोले, जो मेरा राज्य नष्ट हुआ. मैंने आप उसको नहीं किया हे भीरु कलिने उस को किया जो मैंने तुझ को त्यागा जो पहिले धर्मरूप कष्ट के मध्य तुझ बनस्थ दुखी और दिन रात मेरा शोच क-रने वाली के शापसे अमित हुआ, तेरे शाप से दद्धमान वह कलि मेरे शरीर में वास करने वाला. हुआ तेरे. शाप से निरंतर दग्ध वह अग्नि में अग्नि की तुल्य हत हुआ हे शुभे वह मेरे निश्चय और तपः के छांरा जीता गया इस दुख के अंत में हम दोनों को ऐश्व-र्यमान होना चाहिये, वह, पापी सुझ को छोड़कर गया, हे विपुल श्रोणी उस' के पीछे मैं यहाँ आया [τε] मेरा दूसरा प्रयोजन नहीं है, स्त्री अपने अनुरुक्त अनुव्रत भर्ता को छोड़कर किसी काल में दूसरे को कैसे वरै, जैसे तुम, हस राजा की आज्ञा से संपूर्ण पृथिवी पर घूमते हो कि निश्चय राजा भीम की पुत्री दूसरे भर्चा को बरेगी, वह इच्छा के अनुसार कर्म करने वाली अपने श्रनुरूप भर्त्ता को बरेगी इस प्र-कार सुनकर राजा ऋतुपर्ण उपस्थित हुआ, फिर दस-यंती नल के उस विलाप को सुनकर प्रांजलि कंपित और भय युक्त होकर बचन बोली, हे कल्याण रूप दोप के साथ मेरी शंका करने को योग्य नहीं हो, हे निषधाधिपे मैंने देवताओं को छोड़कर तुम को बरा, फिर आपके आगमन अर्थ ब्राह्मण लोग मेरे बचनों को गाथाओं के द्वारा गाते सत्र दिशाओं को गये, हे पार्थिव उस के पीछे विद्वान पर्णाद नाम ब्राह्मण कौश लपुरी में ऋऋतुपर्ण के गृह तुम को मिला, हे राजा निषध उस ब्राह्मण से भले प्रकार वचन के कहने और उत्तर के लाने पर तुम्हारे बुलाने के अर्थ मैंने यह उपाय देखा, हे पृथ्वी के स्वामी महाराज लोक में आपके सिवाय दूसरा मनुष्य घोड़ों के द्वारा एक दिन में शत योजन जाने को समर्थ नहीं है, हे राजन् जिस प्रकार मैं मन से भी आपका कुछ श्रसत्कार को नहीं करती हूं. उस सत्य से आप के इन दोनों चरणों को स्पर्श करती हूं, यह जीवों का साक्षी वायु देवता इस लोक में घूमता है यह मेरे प्राणों [६०.]
को छोड़ो जो मैं पाप को करती हूं, उसी प्रकार ब्रह्म से प्रेरित और तीक्षण किरणंवाले सूर्य देवता सदा भुवन पर घूमते हैं वह मेरे प्राणों को छोड़ो जो में | पाप को करती हूं चंद्रमा (चिन्ता भिमाना देवता) साक्षी को समान संत्र जीत्रों के भीतर घूमता है वह मेरे प्राणों को छोड़ो जो मैं पाप करती हूं, निश्चय यह तीनों देवता संपूर्ण त्रिलोकों को धारण करते हैं इसको संत्य कहो, हे देवताश्रो अथवा मुझ को त्यागो, इस प्रकार कहे हुए वायु देवता अंतरिक्ष से बोले यह पापं करने बाली नहीं हैं हे नल तुम से सच कहता हूं, हे राजन दमयन्ती के शीलस्वभाव की निधि वृद्धि युक्त अच्छी रक्षित है हम तीन वर्ष के इस के साक्षी और रक्षक हैं, इस ने यह बड़ा उपाय तेरे अर्थ रचा, इस लोक में तेरे सिवाय दूसरा पुरुप एक दिन में शत योजन जानें दाला नहीं है, हे महीपति दमयन्ती तेरे साथ और तुम दमयंती के साथ योग्य हो, इंस में तुम को शंका न करनी चा हिये, भार्या के साथ मिलो, उस प्रकार बायु देवता के बोलने पर पुष्पों की वर्षा गिरी, देवताओं की दु दभी बजी और आनंदरूपी पवन चली, हे भरतवंशी फिर उस श्ररिंदम राजा नंल ने उस आश्चर्य को देखकर उस शंका रहित दमयंती, को समीप बुलाया, उस के पीछे राजाने उस नाग राज को स्मरण करके उस अजर वस्त्र को धारण किया उस से अपने रूप को पाया, तब भीम की पुत्री अनिदिता दमयन्ती स्वरूप धारी पवित्र यशवाले भर्त्ता को देखकर और आलिंगन करके ऊंचे स्वर से रोई, और पहिले की समानं उस राजा नल ने भी दमयन्ती को आलिंगन किया और पुत्र पुत्री को भी यथावत प्रसन्न किया, उस के पीछे शुभानना और दीर्घ नेत्र वाली और उस दुख से व्याप्त दमयंती ने उसके मुखको अपनी छाती पर रखकर निरंतर स्वास लिये, हे पुरुषोत्तम उसी प्रकार नलं भी उस शचिस्मिता और मल्ल से लिप्त अंग दमयन्ती को मिलकर शोक से भरा हुआ देरतक रिधर हुआ, हे नृप उस केः पीछे दमयंती की माता ने नल और दमयंती का. जैसा : वृत्तान्त था वह संव प्रीति के साथ राजा भीम से कहा, उस के पीछे महाराज भीम बोले कि मैं प्रभात समय मुख से बसे और रनान आदि कर्म करने वाले नल को दमयंती के साथ पास आया हुआ देखूंगा, हे राजन् उस के पीछे रात्रि में बन में विचरने के सव पुरातन वृत्तान्त को कह और प्रसन्न दोनों साथ वास करने वाले हुए, परस्पर सुख चाहने वाले और दृष्ट संकल्प वे दोनों दमयंती औरः नल राजा भीम के गृह में बसे, इस के पीछे उस नल ने चौथे वर्ष में भार्या के साथ मिलकर और सब कामनाओं से सिद्ध अर्थ होकर परम आंनंद को पाया, और दम्यैती भी भर्चा को मिलकर अत्यंत वृद्धि युक्त हुई जैसे अथो દૂ [९२] उत्पन्न सस्प वाली पृथिवी जल को पाकर, वह दमयंती इस प्रकार मिलकर और तंद्रां को दूरकरके शांत ज्वर और हर्ष से वृद्धि युक्त बल और सिद्ध काम शोभा-मान हुई जिस प्रकार उदय हुए चन्द्रमा से रात्रि ।।
षडिविंशतिऽध्यायः.
वृहदश्व वोले इस के पीछे उस रात में बाल करने वाले दमयंती के साथ समय पर राजा भीम को देखा, उस के पीछे सावधान नल ने श्वशुरको प्रणाम, किया उस के पश्चात शुभा दमयंती ने पिता को वंदना की, प्रभु भीम ने परम आनंद के साथ उस को पुत्र की समान लिया और वहां नल के साथ पतिवृता दमयंती को यथा योग्य पूजन कर श्राश्वासन किया, राजा नल ने उस पूजा की विधि के अनुसार लेकर, अपनी परिचर्या को यथावत उस से कहा, उस के पीछे उस प्रकार आए हुए नल को देखकर नगर में अति प्रसन्न मनुष्यों के हर्ष से उत्पन्न बड़ा शब्द हुआ, पताका और ध्वजा की माला रखने वाला नगर शोभामान हुआ, शुद्धं पुष्पों से युक्त और छिड़के हुए राजमार्ग अच्छे अलंकृत हुए और | पुरवासियों के द्वारा द्वार पर पुष्प समर्द उप कल्पित
[६३] हुए, और देवताओं के सब स्थान सजे गये ऋतुपर्ण ने भी कपट रूप पाहुक नाम नल को, दमयंती से युक्त सुना वह राजा हर्षित हुआ राजा ऋतुपर्ण ने राजा नल को बुलाकर क्षमा चाही, उर्स बुद्धि संमति ने हेतुओं के द्वारा उस को क्षमा किया वह सत्कृत मुस्कान सहित मुह वाला तत्व ज्ञाता चोलने वालों में श्रेष्ठ राजा बद्नुपर्ण राजा नल को यह बचन बोला कि आप प्रारब्ध से अपनी त्री से मिले इम प्रकार प्रसन्न किया, हे गजा नल मैंने अपने गृह में अज्ञात वाम करने वाले आप का कुल अपराध नहीं किया है, जो बुद्धि पूर्वक कोई श्रकार्थ मुझ से किये गये हाँ, तुम उस के क्षमा करने योग्य हो, नल बोले हे राजन् तुम ने थोड़ा भी मेरा श्रपराध नहीं किया और करने पर भी मेरा कोप नहीं है मुझ से वह तुम्हारा क्षमा के योग्य है, हे राजन् पहिले भी मेरे लखा और संबंधी हो, हे महाराज इस के पीछे भी प्रीति करने को योग्य हो, मैं तुम्हारे पास भले प्रकार रची हुई सब कामनाओं के द्वारा सुख से वसा हूं, हे राजन् जिस प्रकार आप के घर में सदा संतुष्ट हुआ उस प्रकार अपने घर में नहीं, यह जो आप का ज्ञाने [अक्षहदय] मेरे पास स्थित है, उस का बदला दिया चाहता हूं, हे पार्थिव जो तुम मानते हो राजा निषध ने इस प्रकार कहकर ऋतु के अर्थ विद्या को दिया, उस राजा ऋतुपर्ण ने उस विद्या । [६४] को वेदोक्त कर्म के द्वारा ग्रहण किया, और अन्य हृदय को लेकर और अन्त हृदय राजा निपध को भी देकर और दूसरे सारथी को लेकर अपने पुरको गया, हे राजन् ऋतुपर्ण के जाने पर. राजा नल कुंडिन नगर में अति दीर्घ कान्त नहीं बसा ॥
सप्तविंशतितमोऽध्यायारंभः
बृहदश्व बोले हे कौंतेय यह-राजा । नेपध एक महीना बास करके घौर राजा भीम. को पूछ कर थोड़े परिवार वाला पुर से निपध देशों को गया एक उज्वल रथ सोलह हांथी और पचास घोडे और छैसौ प्यादों के साथ चला, बहं शीघ्रता करने वाला कुछ बड़े मन वाला राजा नल पृथिवी को कंपित करता वेग से पुरमें प्रवेश हुआ, उसके पीछे - वीरसेन का पुत्र नल पुष्कर को मिलकर बोला 'कि फिर लें मैंने. बहुत् धन इकट्ठा किया, दमयंती और जो कुछ दूसरा धन विद्यमान है यहीं मेरा पण है पुष्कर तेरा पण राज्य है, फिर यूत प्रवृत कुरो यह मेरी निश्चित मति है तेरा कल्याण हों एक पांसे से प्राणों का पण करें, दूसरे के राज्य को लेकर वा धन को जीत कर पुनरंयूत देने के योग्य है. यह परम [१५] धर्म कहा जाता है, जो तुम छूत को नहीं चाहते तो युद्ध को प्रवृत्त करो हे नृप निश्चय है रथ युद्ध से तेरी द मेरी शांति हो जैसे तैसे जिस किसी उपाय से भी यह राज्य वंश के भोगने अर्थ समझना चाहिये यह बड़ों की आज्ञा है, हे पुष्कर अब दोनो में से एक बात में बुद्धि करो थत्क्षवती सभा में खेलने से अथवा युद्ध नै धनुए को नत्राचो, फिर नल से इस प्रकार कहा हुआ पुष्कर हंसता हुआ अपनी जयको भुत्रमांन: कर राजा को बोला, हे नल तुम ने प्रारब्ध से पण के अर्थ धन को इकट्ठा किया और प्रारब्ध से दम-यंती के पाप कर्म ने क्षय को पायां, हे महाबाहु राजा नल प्रारव्य से स्त्री सहित जीवते हो निश्चय इस जीते हुए धन से भले प्रकार अलंकृत दमयंती प्रत्यक्ष में मेरे समीप स्थित होगी जैसे स्वर्ग में अ-प्सरा इंद्र के पास में, 'सदा तुम को स्मरण करता हूं और प्रतिज्ञा भी करता हूं, असुहृदयगणों के साथ खेलने में मेरी प्रसन्नता नहीं होती है अब मैं वरारो-हा श्रनिंदिता दमयंती को जीत कर, कृत कृत्य होऊं, वही सदा मेरे हृदय में वर्तमान रहती है, फिर कुपित नल ने उस वहुत अनुचित बोलने वाले के उन वचनों को सुनकर, खङ्ग से शिर को काटना चाहा, फिर रोष से रक्त नेत्र राजा 'नल मंद मुस्कान करता उस को बो-ला, पण करें क्या बकता है हारा हुआ नहीं बकेंगा, उंस के पीछे पुष्कर और नल का यूत प्रवृत्त हुआ।, [६६] हे युधिष्ठिर तेरा कल्याण हो वह पुष्कर रत्न को छोड़ के समूह और प्राण के साथ पण किया हुआ भी एक ही पण में नल से हारा, राजा पुष्कर को जीतकर हंसता हुआ यह बोला यह सब मेरा राज्य अव्यत्र और हतकंटक है, हे राजाओं में नीच दमयंती तुझ सेः देखने योग्य नहीं है, मूढ़ परिवार सहित तुम ने उस के हासभात्र को पाया, पूर्यकाल में वह कर्म तुमने नहीं किया जिस से मैं जीता गया वह कर्म कलिं ने किया, हे मूढ़ त् उस को नहीं जानता है, मैं किसी प्रकार दूसरे के किये हुए दोप को तुझ में धारण नहीं करता, तुम सुख पूर्वक जीवो, तेरे प्राणों को छोड़ता हूं, उसी प्रकार सब संभार, और तेरे निज अंशको देता हूं और उसी प्रकार तुझ में मेरी प्रीति है हे बीर इस में संशय नहीं, मेरी सुहृदता भी तुझ से कभी दूर न होगी, हे पुष्कर तू ही मेरा आता है शत वर्ष तक जीओ, सत्य विक्रम नल ने इस प्रकार भ्राता को सांत्वन करके और वारंवार मिल कर निजपुर को भेजा, हे राजन् तत्र राजा नल से इस प्रकार श्राश्वान किये हुए पुष्कर हाथ जोड़कर नमस्कार करके उस पवित्र यशवाले नल को उत्तर दिया, हे राजन् आप की कीर्ति अक्षय हो और सुखी अयुत वर्ष तक जीवो जो मेरे प्राणों को और राज्य को छोड़ते हो, तब राजानल से उस प्रकार सत्कृत राजा पुष्कर एक मास वास करके हृष्ट और सुजन [६७] से आवृत अपने पुर को गया, हे पुरुषोत्तम बड़ी सेना और विनीत सेवकों के साथ शरीर से सूर्य की तुल्य प्रकाशवान निजपुरी को गया, श्रीमान राजा नल उत्त बड़े धनवान और आरोग्य पुष्कर को भेजकर अत्यंत शोभित पुरी में प्रवेश हुथा, राजा निषध ने प्रवेश करके पुरवासियों को सांत्वन किया अति हृष्ट रोमशरीर पुरवासी देशवासी, और सत्र मंत्री आदि मनुष्य हाथ जोड़कर वोले हे राजन् ! अब पुर और देश से भी निवृत हैं और उपासना करने को फिर प्राप्त हुए जैसे देवता इंद्र को ॥
अष्टय विंशतितमोऽध्यायारंभः
वृहदश्व बोले पुर के प्रति शांति और हृष्ट होने और महा उत्सव के प्रवृत होने पर राजा नल ने बड़ी सेना के द्वारा दमयंती को बुलाया, शत्रुओं के वीरों को मारने वाले बड़े बुद्धिमान भयानक प-राक्रमी राजा भीम पिताने भी दमयंती को सत्कार करके भेज दिया, पुत्र सहित दमयंती के आने पर राजा नल प्रसन्न रहने लगा जैसे देवताओं का राजा नंदन वनमें, उसके पीछे उस राजां के प्रताप ने प्रकाशता को पाया और जंबू द्वीप में शोभामान हुआ महायशमान [5] ने उस राज्य को लेकर शासन किया, और विधि के अ-नुसार पूर्ण दक्षिणा बाले नाना प्रकार के यज्ञा से पूजन किया, हे राजन् उसी प्रकार तुन भी सुहृदगणों. के साथ थोडे काल में प्रकाशमान होगे, हे नरोत्तम नरतर्षभ उस शत्रु के पुरको जीतने वाले नलने खेलने से भार्या के साथ ऐसे दात्र को पायः, हे पृथ्वी पति अकेले नल' ने ऐसे घोर और बड़े दुख को पाया और फिर बड़े उदय को प्राप्त किया, हे पांडव फिर तुन आताओं और द्रोपती के साथ धर्म को हो विचारते इस महावन में रमते हो, हे राजन् तुम सदा वेद वेदांग पारग महाभाग ब्राह्मणों के साथ रहते हो उल स्थानपर कौन विलाप है, कर्कोटक नाग का नल दमयंती का और राज ऋषि ऋतुपर्ण का की-सिने कलि नाराक है, हे अच्युत राजा युधिष्टिर इत्त कलि नाशक इतिहास को भी सुन कर तुझ से पुरुष से आश्वासित होना योग्य है, तुम सदा पुरु-पार्थ की अस्थिरता बिचार कर उस के उदय और नाश में भी चिंता करने को योग्य नहीं हो, हे नृ-पति इस इतिहास को सुनकर आश्वासित हो मत शोच कर, हे महाराज तुम दुख में विपाद करने को योग्य नहीं हो, दैव के विषमावास्थित होने पर और पौरुष की अफलता पाने पर सत्वापाश्रय मनुष्य आप को विषाद युक्त नहीं करते हैं, जो पुरुष नल के इस बड़े चरित्र को कहेंगे और निरंतर सुनेंगे भी उनको [δε] अलक्ष्मी नहीं होगी, इस पुराण सनातन उत्तम इतिहास को सुनकर उस के अर्थ सिद्ध होगें और धन्यता को प्राप्त होगा, यह पुत्र पौत्र पशु और नरों में श्रेष्ठता को पाता है, वह आरोग्य और प्रीति मान होगा संशय नहीं, हे पार्थिव जो तुम पांशे के भय से डरते हो कि मुझ को फिर बुलावेगा सो मैं तेरे उस भय को नष्ट करूंगा, हे सत्य पराक्रम कुंती पुत्र में संपूर्ण अत्त हृदय को जानता हूं ग्रहण करो प्रसन्न मैं तुम से कहता हूं, वैशंपायन बोले उस के पीछे प्रसन्न राजा वृहदश्व जी को बोला हे भगवन मैं अक्षय हृदय को तत्व पूर्वक जाना चाहता हूं, बड़े तेजस्वी ऋषि ने फिर महात्मा पांडव के अर्थ अक्ष हृदय को दिया और अश्व विद्या को देकर स्नान आदि के करने को गये, वृहदश्व के चले जाने पर दृढ़ वृतवाले युधिष्ठिर ने तहां तहां २ २ तीर्थ पर्वत बन से आने वाले और मिले हुए तपस्त्री. ब्राह्मणों से उस तप में वर्तमान वायु भक्षी बुद्धिमान पांडव अर्जुन को सुना, कि महाबाहु अर्जुन दुख से प्राप्त होने के योग्य तप में स्थित हैं वैसा दूसरा कोई उग्र तपस्वी पहिले नहीं देखा, जैसा तपस्त्री नियत व्रत अकेला घूमने वाला मुनिस्वप देहधारी धर्म की तुल्य श्रीमान पां-डेव अर्जुन है, हे राजन् पांडव युधिष्ठिर ने महावन में तप करने वाले उस प्रिय भ्राता कौंतेय अर्जुन को गुनकर शोच किया, फिर महावन में शरण चाहने वाले युधिष्ठिर ने दधृमान हृदय के साथ नाना प्रकार के ज्ञानी ब्राहाणां को पूछा ॥
श्रष्टा विंशतितमोऽध्यायः समाप्तः
मिती आसाढ़ बदी 14 संवत् 1941 पूर्ण शुभमस्तु
समाप्त
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