002. नल और दमयंती संपूर्ण कथा जीत
नल और दमयंती संपूर्ण कथा
भूमिका
मेरा यह मनोरथ बहुत दिनों से था कि महात्मा राजा नल और दमयंती के जीवन-वृत्तांत का सर्वकल्याण के लिए वर्णन किया जाए, विशेष रूप से उस विपत्ति-काल का, जिसका उल्लेख हमें महाभारत के वनपर्व में मिलता है। यह कथा मूलतः संस्कृत भाषा में है। परमेश्वर की कृपा से मेरा यह उद्देश्य पूर्ण हुआ।
राजा नल और दमयंती का यह वृत्तांत पहले भी विभिन्न समयों पर और अनेक रूपों में प्रकाशित हो चुका है, परंतु मैंने महाभारत के वनपर्व में वर्णित कथा के अनुसार इसका यथासंभव सत्य और शुद्ध अनुवाद आर्य भाषा से सरल हिन्दी में करने का प्रयास किया है।
महाभारत के वनपर्व में वर्णित इस कथा को जो पाठक या श्रोता महाराज नल और दमयंती के इस प्रेमपूर्ण चरित्र का पाठ करेंगे या श्रवण करेंगे, उन्हें कलियुग की बाधा नहीं होगी—ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है। फिर भी, सज्जनों से विनम्र निवेदन है कि यदि इस ग्रंथ में कहीं कोई भूल या त्रुटि रह गई हो, तो कृपया उसे शुद्ध करें या मुझे उस भूल से अवगत कराएँ।
इस वृत्तांत के अध्ययन से शोक और हर्ष—दोनों भाव उत्पन्न होंगे तथा महात्मा नल के सत्य, धैर्य और धर्म में अडिग रहने का स्वरूप भली-भांति समझ में आएगा।
इसलिए पाठकों से आग्रह है कि आप इसे एक बार अवश्य पढ़ें अथवा सुनें।
नल दमयंती की कथा या कहानी एक ऐसी कहानी है जिसे अगर आपने पढ़ना शुरू किया तो आप इसे पूरा पढ़े बिना नहीं रह पाएंगे।
पुराणों के साथ-साथ रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में नल दमयंती की कथा का बहुत ही सुंदर वर्णन मिलता है।
लेकिन बाद में अनेक ग्रंथ लिखे गए जिनमें *नल चंपू*, *नैषधीयचरितम्* आदि प्रमुुुख ग्रंथ है। ये संस्कृत काव्य और गद्य दोनों के मिश्रित रूप में है। इनमें नल दमयंती की कथा का बहुत ही सुंदर वर्णन मिलता है।
नल दमयंती की कथा का वर्णन जैन ग्रंथों में भी मिलता है हम उन्हें सभी का अध्ययन करने के उपरांत यह कथा एक के बाद एक सिलसिलेवार जोड़कर आपके सामने प्रस्तुत कर रहे हैं क्योंकि बहुत से स्थानों पर इसका पूरा वर्णन नहीं मिलता है।
आइए आज हम आपको इस सुंदर कहानी के प्रथम भाग अर्थात प्रस्तावना से रूबरू कराते हैं।
**प्रथम अध्याय
जुए में हारे हुए पाण्डव बारह वर्ष का वनवास-दुःख भोग रहे थे। वीर अर्जुन शस्त्रास्त्रों की प्राप्ति के लिए तप करने हिमालय की की ओर जा चुका था।
अपमान की आग से जलते भीमसेन ने एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर से कहा, "भैया ! आपके जुआ खेलने की बुरी लत के कारण, हम लोग पुरुषार्थी होकर भी दीन-हीन जैसे हो गए हैं। जुए के इस खेल में फंसकर आपने ऐसा अनर्थं कर डाला कि हम कहीं के न रहे।"
"एक बार फंसे, दुबारा फिर फंसे और मुझे लगता है कि वे दुष्ट आपका फिर खेलने के लिए बुलाएंगे तो आप तीसरी बार भी फंस जाएंगे।"
युधिष्ठिर भीमसेन को समझा-बुझाकर शान्त करने का प्रयत्न कर ही रहे थे कि महर्षि वृहदश्व वहां आ पहुंचे । दुखी युधिष्ठिर ने महर्षि का सत्कार करने के बाद अपना दुखड़ा सुनाया। वे बोले, "मेरे दुखी सम्बन्धियों ने मेरी इस आदत के कारण मुझे जो तीखी और कड़वी बातें कही हैं, उनके कारण मुझे रात को नींद भी नहीं आती। इस जुए में हम कैसे ठगे गए, हमारा कैसा अपमान हुआ, भरी सभा में द्रौपदी को केशों से पकड़कर खींचा गया और फिर मिला लम्बा वनवास । मैं समझता हूं कि मुझसे बड़ा अभागा इस दुनिया में दूसरा नहीं होगा।"
महाराज युधिष्ठिर को अत्यंत शोक और विषाद में डूबे हुए देख, उन्हें धैर्य देने के उद्देश्य से राजा नल का पावन चरित्र सुनाना आरंभ किया। यह वही कथा है जिसका उल्लेख महाभारत के वनपर्व में मिलता है।
महर्षि बृहदश्व बोले, “हे अच्युत हृदय वाले महाराज युधिष्ठिर ! अपने भ्राताओं सहित सावधान होकर इस कथा को सुनो। जिस राजा ने तुमसे भी अधिक दुःख भोगा है, उसका वृत्तांत मैं तुम्हें सुनाता हूँ।”
निषध देश में वीरसेन नामक एक प्रतापी राजा राज्य करते थे। उनके पुत्र का नाम नल था। राजा नल बुद्धिमान, धर्मज्ञ, सत्यनिष्ठ और समस्त राजाओं में श्रेष्ठ माने जाते थे। वे पासे के छल में अपने ही भाई पुष्कर से पराजित हो गए। राज्य, वैभव और सब कुछ हारकर वे अपनी धर्मपत्नी दमयंती के साथ वनवास को चले गए।
हे राजन् ! उस वनवासी राजा नल के पास न तो कोई दास था, न सेवक, न भाई, न बंधु—सब कुछ उनसे छिन गया था। वे अत्यंत दुःख, अपमान और कष्ट को सहते हुए भी धैर्य से जीवन बिताते रहे।
तुम तो देवताओं के समान वीर भ्राताओं से युक्त हो, ब्रह्मस्वरूप श्रेष्ठ ब्राह्मणों की संगति तुम्हें प्राप्त है, इसलिए तुम्हें इस प्रकार शोक में डूबने योग्य नहीं है।
यह सुनकर युधिष्ठिर बोले, “हे वक्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि! मैं महात्मा राजा नल के चरित्र को विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझ पर अनुग्रह करके यह कथा विस्तार से कहिए।”
**द्वितीय अध्याय
नल–दमयंती का गुण-श्रवण और प्रेम का अंकुर**
महर्षि बृहदश्व बोले—
निषध देश में वीरसेन के पुत्र, बलशाली राजा नल राज्य करते थे। वे उत्तम गुणों से युक्त, अत्यंत रूपवान, पराक्रमी तथा अश्वविद्या में निपुण थे। तेज में वे सूर्य के समान और ऐश्वर्य में देवराज इंद्र की भाँति शोभायमान थे। युद्धभूमि में वे शत्रुओं के लिए प्रलय के समान थे।
राजा नल वेदों के ज्ञाता, शूरवीर, सत्यवादी और धर्मपरायण थे। उन्हें अक्षविद्या (पासों का खेल) प्रिय था। वे विशाल सेना के स्वामी, जितेन्द्रिय, उदार हृदय और धनुर्धारियों में श्रेष्ठ थे। ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं मनु महाराज पृथ्वी पर अवतरित हो गए हों।
उसी समय विदर्भ देश में भीम नामक एक प्रतापी राजा राज्य करते थे। वे भयानक पराक्रमी, शूरवीर और समस्त गुणों से युक्त थे, किंतु संतानहीन होने के कारण अत्यंत दुःखी रहते थे। संतान-प्राप्ति की अभिलाषा से उन्होंने बड़े सावधान भाव से कठोर तप और उत्तम यत्न किए।
हे भरतवंशी! उसी समय दमन नामक एक महर्षि राजा भीम के यहाँ पधारे। धर्मज्ञ राजा भीम ने अपनी पटरानी सहित उस तेजस्वी ऋषि का आदर-सत्कार कर उन्हें प्रसन्न किया। तब महायशस्वी दमन ऋषि ने वरदान देते हुए कहा—
“हे राजन्! तुम्हारे यहाँ एक कन्यारत्न उत्पन्न होगी, जिसका नाम दमयंती होगा, और उसके साथ तीन पराक्रमी पुत्र भी जन्म लेंगे—दम, दन्त और दमन।”
समय आने पर वही कन्या दमयंती के नाम से प्रसिद्ध हुई। वह रूप, तेज, यश, शोभा और सौभाग्य से तीनों लोकों में विख्यात हो गई। उसके यौवन को प्राप्त होते ही सैकड़ों सखियाँ और दासियाँ उसकी सेवा में रहने लगीं, जैसे इंद्राणी की सेवा में देवियाँ रहती हैं।
स्त्रियों के मध्य राजा भीम की वह पुत्री, उत्तम आभूषणों से अलंकृत और निर्दोष अंगों से युक्त, ऐसी शोभायमान होती थी जैसे वर्षा के मेघों के बीच बिजली चमक उठे। उसके दीर्घ नेत्र लक्ष्मी के समान थे। ऐसा अनुपम सौंदर्य न देवताओं में, न यक्षों में, न मनुष्यों में—कहीं भी न देखा गया, न सुना गया।
वह सुंदरी देवताओं के मन को भी मोहित करने वाली थी। और उधर नरों में श्रेष्ठ राजा नल भी पृथ्वी और अन्य लोकों में अप्रतिम थे। अपने सौंदर्य में वे साक्षात मूर्तिमान कामदेव के समान प्रतीत होते थे।
ऋषिगण राजा नल के समीप बार-बार दमयंती के गुणों का वर्णन करते थे और दमयंती के समीप नल की प्रशंसा होती रहती थी। निरंतर एक-दूसरे के गुणों को सुनते-सुनते, बिना देखे ही उन दोनों के हृदय में प्रेम उत्पन्न हो गया।
हे कौन्तेय! हृदय में निवास करने वाला कामदेव दोनों के भीतर बढ़ने लगा। राजा नल उस प्रेम को हृदय में धारण करने में असमर्थ हो गए। वे अंतःपुर के समीप स्थित वन में एकांत में रहने लगे।
एक दिन उन्होंने स्वर्ण-पंखों वाले कुछ हंसों को देखा। उनमें से एक को पकड़ लिया। तब वह हंस मानवीय वाणी में बोला—
“हे राजन्! मैं तुम्हारे हाथों मारे जाने योग्य नहीं हूँ। मैं तुम्हारा प्रिय कार्य करूँगा। हे निषधराज! मैं दमयंती के समीप जाकर तुम्हारे गुणों का ऐसा वर्णन करूँगा कि वह तुम्हारे सिवा किसी और पुरुष की कामना नहीं करेगी।”
यह सुनकर राजा नल ने हंस को छोड़ दिया। वे हंस उड़कर विदर्भ देश पहुँचे और विदर्भ नगरी में दमयंती के समीप उतर आए।
दमयंती सखियों के साथ उन अद्भुत, आकाशगामी पक्षियों को देखकर हर्षित हो उठी और उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ी। तब वही हंस, जिसकी ओर दमयंती बढ़ी, मानव-वाणी में बोला—
“हे दमयंती! निषध देश में नल नामक एक राजा है, जो अश्विनीकुमारों के समान रूपवान है। उसके समान मनुष्य कोई नहीं। वह अपने रूप से मूर्तिमान कामदेव है। हे सुमध्यमे! यदि तुम उसकी भार्या बनो, तो तुम्हारा यह जन्म और सौंदर्य दोनों सफल हो जाएँ। तुम स्त्रियों में रत्न हो और नल नरों में श्रेष्ठ। श्रेष्ठ का श्रेष्ठ से ही मेल शोभा देता है।”
हंस की यह वाणी सुनकर दमयंती ने कहा—
“हे पक्षी! तुम भी इसी प्रकार जाकर नल से मेरा संदेश कह देना।”
ऐसा कहकर हंस निषध देश को लौट गया और राजा नल से समस्त वृत्तांत कह सुनाया।
**तृतीय अध्याय
दमयंती की विरह-व्यथा और स्वयंवर की घोषणा**
महर्षि बृहदश्व बोले—
हे भरतवंशी! हंस के मुख से राजा नल के गुणों का वर्णन सुनकर दमयंती उसी क्षण से नल के विषय में व्याकुल हो उठी। उसका मन नल में इस प्रकार आसक्त हो गया कि वह अन्य किसी विषय में चित्त नहीं लगा सकी।
थोड़े ही समय में दमयंती चिंता से घिर गई। उसका मुख विवर्ण हो गया, श्वास तीव्र चलने लगी और नेत्रों में स्थिरता न रही। कभी वह ध्यानमग्न हो जाती, कभी उन्मत्त-सी दृष्टि से शून्य को निहारने लगती। उसका शरीर पांडुवर्ण हो गया और मन पूर्णतः कामदेव के वशीभूत हो गया।
वह न शय्या में सुख पाती, न आसन में, न भोग-विलास में। दिन-रात ‘हाय! हाय!’ करती हुई विलाप करने लगी। न उसे दिन में शांति मिलती, न रात्रि में निद्रा आती।
उसकी सखियों ने दमयंती के अंगों की चेष्टाओं और उसकी दशा को देखकर सब कुछ समझ लिया। तब उन्होंने विदर्भ देश के स्वामी राजा भीम के पास जाकर अपनी व्याकुल राजकुमारी की स्थिति का निवेदन किया।
राजा भीम ने यह सब सुनकर गंभीरता से विचार किया—
“मेरी यह पुत्री अत्यंत व्याकुल दिखाई देती है। इसका कारण अवश्य कोई महान कार्य है।”
तब राजा ने यह समझ लिया कि दमयंती अब विवाह योग्य हो गई है और उसके लिए स्वयंवर का आयोजन करना ही उचित है।
हे प्रभु! राजा भीम ने पृथ्वी के समस्त राजाओं को स्वयंवर का निमंत्रण भेज दिया—
“हे राजाओं! विदर्भ की राजकुमारी दमयंती का स्वयंवर शीघ्र होने वाला है।”
यह समाचार सुनते ही पृथ्वी के स्वामी राजा हाथी, घोड़े और रथों की गूँज से दिशाओं को भरते हुए, विचित्र मालाओं और आभूषणों से सुसज्जित सेनाओं के साथ विदर्भ देश की ओर चल पड़े।
महाबाहु राजा भीम ने आए हुए महात्मा राजाओं का यथायोग्य सत्कार किया और वे सब पूजित होकर वहीं निवास करने लगे।
इसी समय देवर्षियों में श्रेष्ठ, महाज्ञानी और महाव्रती नारद तथा पर्वत ऋषि देवलोक की ओर गए और देवराज इंद्र के भवन में प्रवेश किया। इंद्र ने उनका आदरपूर्वक स्वागत किया और उनकी कुशलता पूछी।
नारद जी बोले—
“हे देवेश! हम दोनों सर्वत्र कुशल हैं और पृथ्वी पर भी सभी राजा सुखपूर्वक हैं।”
यह सुनकर वृत्रासुर के संहारक इंद्र ने पूछा—
“धर्मज्ञ, शूर और युद्ध में प्राण त्यागने वाले वे क्षत्रिय राजा आज मुझे दिखाई क्यों नहीं दे रहे? मेरे प्रिय अतिथि वे कहाँ हैं?”
नारद जी बोले—
“हे इंद्र! सुनिए—विदर्भ देश की राजकुमारी दमयंती अपने अनुपम रूप से पृथ्वी की समस्त स्त्रियों में श्रेष्ठ है। थोड़े ही समय में उसका स्वयंवर होने वाला है। उसी कारण समस्त राजा वहाँ एकत्र हो रहे हैं। वे सब उस कन्यारत्न को प्राप्त करने की अभिलाषा से गए हैं।”
यह सुनते ही इंद्र सहित अग्नि, वरुण, यम और कुबेर—सभी लोकपाल हर्षित हो उठे। उन्होंने भी उस स्वयंवर में जाने का निश्चय किया और अपने-अपने वाहनों सहित विदर्भ देश की ओर प्रस्थान किया—उसी मार्ग से, जिस मार्ग से समस्त राजा जा रहे थे।
हे कौन्तेय! उधर दमयंती के प्रेम में अनुरक्त राजा नल भी राजाओं के समागम का समाचार सुनकर विदर्भ देश की ओर चल पड़े।
मार्ग में देवताओं ने पृथ्वी पर स्थित राजा नल को देखा—जो रूप और तेज से साक्षात मूर्तिमान कामदेव के समान प्रतीत हो रहे थे। सूर्य के समान दीप्तिमान उस राजा को देखकर लोकपाल विस्मित हो गए और कुछ क्षणों के लिए उनके संकल्प डगमगा गए।
तब देवता आकाश से उतर आए। अपने विमानों को अंतरीक्ष में स्थिर कर उन्होंने राजा नल से कहा—
“हे निषध देश के राजेंद्र नल! तुम सत्यव्रती और धर्मनिष्ठ हो। हमारी सहायता करो। हे नरोत्तम! तुम हमारे दूत बनो।”
**चतुर्थ अध्याय
देवताओं का दूत बनना और नल का धर्म-संघर्ष**
महर्षि बृहदश्व बोले—
हे भरतवंशी! देवताओं की बात सुनकर राजा नल ने हाथ जोड़कर पहले यह प्रतिज्ञा की कि वे सत्य का पालन करेंगे। फिर कृताञ्जलि होकर, समीप खड़े देवताओं से विनयपूर्वक पूछा—
“आप सब कौन हैं? और मैं किसके लिए दूत बनकर आया हूँ? जो कार्य आप मुझसे कराना चाहते हैं, उसे स्पष्ट रूप से कहिए।”
राजा नल के ऐसा पूछने पर देवराज इंद्र बोले—
“हे राजन्! हमें देवता जानो। दमयंती के विषय में हम यहाँ आए हैं। मैं इंद्र हूँ, यह अग्नि है, यह जल के स्वामी वरुण हैं और यह मनुष्यों के प्राणहर यमराज हैं।”
इंद्र ने आगे कहा—
“तुम जाकर दमयंती से कहो कि इंद्र, अग्नि, वरुण और यम—ये लोकपाल उसका दर्शन करना चाहते हैं। वह हम देवताओं में से किसी एक को अपने पति रूप में स्वीकार करे।”
यह सुनकर राजा नल ने हाथ जोड़कर कहा—
“हे ईश्वरो! मैं एक उद्देश्य से यहाँ आया हूँ। मुझे इस प्रकार का दूत बनाना उचित नहीं। जो मनुष्य स्वयं किसी स्त्री को चाहता हो, वह कैसे दूसरे के लिए उससे ऐसा निवेदन कर सकता है? इस कारण मुझ पर कृपा कर क्षमा करें।”
देवताओं ने कहा—
“हे निषधराज! तुमने पहले हमारी सहायता करने की प्रतिज्ञा की है। अब उस प्रतिज्ञा से विचलित मत हो। विलंब मत करो।”
महर्षि बृहदश्व बोले—
देवताओं की बात सुनकर राजा नल ने फिर कहा—
“राजभवन तो भली-भाँति रक्षित है। वहाँ प्रवेश कैसे संभव होगा?”
इंद्र ने उत्तर दिया—
“तुम निःसंकोच प्रवेश करोगे।”
यह सुनकर राजा नल ने कहा— “अति उत्तम।”
और वे दमयंती के भवन की ओर चले गए।
वहाँ उन्होंने सखियों से घिरी हुई, रूप और शोभा से दीप्तिमान, वरवर्णिनी दमयंती को देखा। उसके अंग अत्यंत कोमल थे, कमर सूक्ष्म थी, नेत्र सुंदर थे और उसका तेज चंद्रमा की प्रभा को भी तिरस्कृत कर रहा था।
उस चारु हासिनी को देखते ही राजा नल के भीतर कामदेव का वेग बढ़ गया। सत्यपालन की इच्छा से उन्होंने हृदय में उस प्रेम को कठिनता से धारण किया।
उधर वे श्रेष्ठ स्त्रियाँ जब राजा नल को देखती हैं, तो उनके तेज से अभिभूत होकर अपने आसनों से उठ खड़ी होती हैं। अत्यंत प्रसन्न और विस्मित होकर उन्होंने मौन भाव से ही उनका पूजन किया।
वे आपस में सोचने लगीं—
“यह कोई मनुष्य नहीं प्रतीत होता। यह तो अवश्य कोई देवता, यक्ष या गंधर्व होगा। इस महात्मा का रूप, कांति और धैर्य अद्भुत है।”
तेज से दबकर और लज्जा से भरकर वे उससे कुछ कह न सकीं।
तब मंद मुस्कान के साथ, आश्चर्य से युक्त दमयंती ने उस वीर नल से कहा—
“हे निर्दोष अंगों वाले! तुम मेरे हृदय में कामदेव को बढ़ाने वाले हो। मैं तुम्हें जानना चाहती हूँ—तुम यहाँ कैसे आए? मेरा भवन भली-भाँति रक्षित है और पिता राजा भीम की आज्ञा के बिना यहाँ कोई प्रवेश नहीं कर सकता।”
दमयंती की यह वाणी सुनकर राजा नल ने उत्तर दिया—
“हे कल्याणी! मुझे देवताओं का दूत समझो। इंद्र, अग्नि, वरुण और यम—ये देवता तुम्हें प्राप्त करना चाहते हैं। हे शोभने! तुम उनमें से किसी एक को पति रूप में स्वीकार करो।”
उन्होंने आगे कहा—
“देवताओं की शक्ति से मैं इस भवन में बिना देखे और बिना रोके प्रवेश कर सका हूँ। हे भद्रे! मैं इसी कारण देवश्रेष्ठों की ओर से भेजा गया हूँ। हे शुभे! अब यह बात सुनकर तुम जैसा उचित समझो, वैसा निर्णय करो।”
पंचम अध्याय
दमयंती का अटल निश्चय और धर्म का समाधान**
महर्षि बृहदश्व बोले—
हे भरतवंशी! राजा नल की बात सुनकर दमयंती ने श्रद्धापूर्वक देवताओं को नमस्कार किया। फिर मंद मुस्कान के साथ वह बोली—
“हे राजन्! मैं आपको ही वरती हूँ। बताइए, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? हे ईश्वर! मैं स्वयं और जो कुछ भी मेरा धन-वैभव है, सब आपका है। विश्वासपूर्वक मुझसे विवाह कीजिए।
हे वीर! हंसों के वे वचन मेरे हृदय को निरंतर जलाते रहे हैं। हे नरेश्वर! आपके ही लिए मैंने इन राजाओं को एकत्र किया है। यदि आप मुझे अस्वीकार करेंगे, तो आपके कारण मैं अग्नि, जल अथवा फाँसी—किसी भी मृत्यु को स्वीकार कर लूँगी।”
दमयंती की यह वाणी सुनकर राजा नल ने उत्तर दिया—
“हे देवी! जब लोकपाल स्वयं उपस्थित हैं, तब तुम किसी मनुष्य को क्यों चाहती हो? मैं उन महान देवताओं के चरणों की धूल के समान भी नहीं हूँ। जिनसे तीनों लोकों का संचालन होता है, उन्हीं में मन लगाना उचित है।
जो मनुष्य देवताओं की इच्छा के विरुद्ध आचरण करता है, वह मृत्यु को प्राप्त होता है। हे निर्दोष अंगों वाली! मेरी रक्षा करो और देवश्रेष्ठों को ही वर लो।
देवताओं को प्राप्त कर तुम दिव्य वस्त्रों, दिव्य मालाओं और श्रेष्ठ आभूषणों से विभूषित होओगी। जो सम्पूर्ण पृथ्वी को संहार के समय निगलने में समर्थ हैं, उन देवेश्वर को पति रूप में कौन स्त्री स्वीकार नहीं करेगी? जिनके दंड के भय से समस्त प्राणी धर्म में स्थित रहते हैं—उस धर्मात्मा, दैत्य-दानवों के संहारक देवराज इंद्र को कौन स्त्री पति नहीं करेगी?”
राजा नल के इन हितकारी वचनों को सुनकर दमयंती के नेत्र आँसुओं से भर आए। शोक से कंठ अवरुद्ध हो गया, फिर भी वह बोली—
“हे पृथ्वीपति! मैंने सब देवताओं को प्रणाम करके आपको ही पति रूप में चुना है। यह मैं सत्य कहती हूँ।”
यह सुनकर राजा नल कृताञ्जलि होकर बोले—
“हे कल्याणी! हे भद्रे! मैं दूत-भाव से यहाँ आया हूँ। देवताओं के समक्ष प्रतिज्ञा करके और दूसरे के प्रयोजन से यहाँ आकर, मैं अपने स्वार्थ की कैसे इच्छा कर सकता हूँ? यदि यही धर्म है, तो उसमें मेरा भी कल्याण निहित है।”
तब शुचि-स्मिता दमयंती अश्रुओं से व्याकुल, किंतु स्थिर स्वर में बोली—
“हे नरेश्वर! मैंने एक ऐसा उपाय देखा है जिससे आपको कोई दोष नहीं लगेगा। हे नरश्रेष्ठ! जहाँ मेरा स्वयंवर होगा, वहाँ आप और वे देवता—जिनके अग्रणी इंद्र हैं—सभी साथ उपस्थित हों।
उसके बाद, हे नरोत्तम! मैं लोकपालों के समक्ष ही आपको वरूँगी। इस प्रकार आपको कोई दोष नहीं लगेगा।”
दमयंती की यह बात सुनकर राजा नल वहाँ से उठे और देवताओं के समीप पहुँचे, जहाँ लोकपाल एकत्र थे।
देवताओं ने नल को आते देखा और पूछा—
“हे राजन्! शुचि-स्मिता दमयंती से तुम्हारी भेंट हुई? उसने हम सबके विषय में क्या कहा?”
राजा नल बोले—
“हे देवेश्वरो! आपकी आज्ञा से मैं दमयंती के भवन में प्रविष्ट हुआ। वह भवन महान राज-रक्षा से सुरक्षित था, किंतु आपके तेज से मैं बिना रोके प्रवेश कर सका। किसी मनुष्य ने मुझे आते नहीं देखा।
मैंने उसकी सखियों को देखा। वे मुझे देखकर विस्मित हो उठीं। हे सुरोत्तमो! देवताओं का संदेश सुनने के बाद भी वह सुंदर मुखी दमयंती अपने संकल्प से विचलित नहीं हुई। उसने मुझे ही पति रूप में चुना है।
वह मुझसे बोली—‘हे नरोत्तम! आप सब देवताओं सहित मेरे स्वयंवर में आइए। वहीं मैं लोकपालों के समक्ष आपको वरूँगी। इस प्रकार किसी को दोष नहीं होगा।’”
“हे स्वर्ग के ईश्वरो! यही समस्त वृत्तांत है। इसके अतिरिक्त कुछ भी असत्य नहीं है।”
**पञ्चमोऽध्याय
नल–दमयंती स्वयंवर और विवाह**
महर्षि बृहदश्व बोले—
उत्तम शुभकाल, पुण्य तिथि और श्रेष्ठ मुहूर्त के प्राप्त होने पर राजा भीम ने दमयंती के स्वयंवर हेतु समस्त राजाओं को आमंत्रित किया। कामदेव से पीड़ित तथा दमयंती को पाने की अभिलाषा रखने वाले इन्द्र सहित समस्त देवता और पृथ्वी के सभी राजा उस समाचार को सुनकर शीघ्र ही विदर्भ देश में आ पहुँचे।
स्वर्णस्तम्भों से सुशोभित, रमणीय एवं विविध अलंकारों से सुसज्जित उस भव्य द्वार से होकर राजागण सभा में प्रविष्ट हुए। हारों से विभूषित, उज्ज्वल कुण्डलों से दीप्त, नाना प्रकार के आसनों पर वे सभी शोभायमान हो उठे। जैसे भोगवती नगरी नागों से और पर्वत-गुहाएँ व्याघ्रों से परिपूर्ण रहती हैं, उसी प्रकार वह पवित्र राजसभा पुरुषोत्तमों से पूर्ण प्रतीत हो रही थी।
उसी सभा में पाँच ऐसे पुरुष दृष्टिगोचर हुए जिनकी भुजाएँ परिघ के समान पुष्ट थीं, जिनका रूप-वर्ण अनुपम था और जिनका तेज समान रूप से प्रकाशित हो रहा था। उनके केश, नेत्र, ललाट और मुख ऐसे शोभायमान थे मानो आकाश में नक्षत्र प्रकाशित हों।
तत्पश्चात शुभ लक्षणों से युक्त, अपनी प्रभा से राजाओं के नेत्र और मन हरती हुई दमयंती सभा में प्रविष्ट हुई। उसे देखते ही वहाँ उपस्थित समस्त महात्माओं की दृष्टि उसी पर स्थिर हो गई। हे भरतवंशी! जब राजाओं के नामों का उद्घोष हुआ, तब दमयंती ने उन समान रूप-रंग वाले पाँच पुरुषों को देखा। उन्हें देखकर वह संशय में पड़ गई और राजा नल को पहचान न सकी।
तब वह मन ही मन सोचने लगी—
“मैं देवताओं को कैसे पहचानूँ और निषधराज नल को किस प्रकार जानूँ?”
इस प्रकार चिंता से व्याकुल होकर वह अत्यंत दुःखी हुई। तभी उसे वृद्धों से सुने हुए देवताओं के लक्षण स्मरण हो आए—देवता पृथ्वी का स्पर्श नहीं करते, उन्हें पसीना नहीं आता, उनकी माला मुरझाती नहीं, वे छाया से रहित होते हैं।
यह विचार कर उसने देवताओं की शरण ली। हाथ जोड़कर, काँपते स्वर में उसने प्रार्थना की—
“हे लोकपालो! जिस प्रकार मैंने हंसों के वचन सुनकर राजा नल को अपने पति रूप में स्वीकार किया है, उस सत्य के प्रभाव से मुझे नल का परिचय कराइए। जिस प्रकार मेरा मन और वाणी किसी अन्य पुरुष में नहीं लगी है, उस सत्य के बल पर भी मुझे नल को दिखाइए। कृपा करके आप सभी अपने-अपने वास्तविक रूप धारण कीजिए, जिससे मैं निषधराज नल को पहचान सकूँ।”
दमयंती की इस करुण प्रार्थना को सुनकर, उसके नल के प्रति निष्कपट प्रेम, नल की शुद्धता, भक्ति और प्रीति को देखकर देवताओं ने उसी क्षण अपने-अपने वास्तविक स्वरूप प्रकट कर दिए।
तब दमयंती ने स्पष्ट देखा—देवताओं को न पसीना था, न पलक झपकना, न छाया थी और न उनकी मालाएँ मुरझाई थीं; वे पृथ्वी को स्पर्श भी नहीं कर रहे थे। इसके विपरीत राजा नल पृथ्वी पर स्थित थे, छाया से युक्त थे और उनके शरीर पर स्वेद भी विद्यमान था। उसी क्षण दमयंती ने नल को पहचान लिया।
तत्पश्चात राजा भीम की पुत्री दमयंती ने धर्मानुसार राजा नल के कंठ में वरमाला डाल दी। उस लज्जावती, विशाल नेत्रों वाली कन्या ने वस्त्र के छोर को पकड़ते हुए नल के स्कंध पर वह परम शोभायमान माला अर्पित की।
तुरंत ही सभा में “हा! हा!” का शब्द गूँज उठा। देवताओं और मुनियों ने “भद्रं ते” कहकर प्रशंसा की और आश्चर्य से युक्त राजाओं ने राजा नल की स्तुति की।
तब नल ने प्रसन्न होकर दमयंती से कहा—
“हे कल्याणी! जिस कारण तूने देवताओं के मध्य मुझे चुना है, उसी कारण मैं तुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय मानता हूँ। जब तक मेरे प्राण इस शरीर में रहेंगे, तब तक मैं तुझमें ही अनुरक्त रहूँगा—यह मेरा सत्य वचन है।”
दमयंती ने कृताञ्जलि होकर नल को प्रणाम किया। तत्पश्चात दोनों ने अग्नि को साक्षी मानकर देवताओं की शरण ली।
दमयंती द्वारा नल के वरण से प्रसन्न होकर लोकपालों ने नल को वरदान दिए—
इन्द्र ने यज्ञों में देवदर्शन और उत्तम गति का वर प्रदान किया।
अग्नि ने जहाँ चाहें वहाँ प्रकट होने और समान तेजस्वी लोक की प्राप्ति का वर दिया।
यम ने धर्म में स्थिरता और अन्न की अक्षयता प्रदान की।
वरुण ने जल के प्राकट्य और सुगंधित दिव्य माला का वर दिया।
इस प्रकार वर देकर देवता अपने-अपने लोकों को चले गए। स्वयंवर संपन्न होने पर सभी राजा भी अपनी-अपनी राजधानियों को लौट गए।
उनके प्रस्थान के पश्चात राजा भीम ने अत्यंत हर्ष के साथ नल और दमयंती का विवाह सम्पन्न कराया। निषधराज नल कुछ समय विदर्भ में निवास कर, भीम से अनुमति लेकर अपने नगर लौट आए। दमयंती को पाकर वह यशस्वी राजा शची सहित इन्द्र के समान शोभायमान हुआ।
धर्मपूर्वक राज्य करते हुए नल ने ययाति के समान अश्वमेध यज्ञ सहित अनेक यज्ञ किए। तत्पश्चात वह दमयंती के साथ वनों और उपवनों में रमण करने लगा। उनसे इन्द्रसेन नामक पुत्र और इन्द्रसेना नाम की कन्या उत्पन्न हुई।
इस प्रकार यज्ञ, शौर्य और विहार करते हुए राजा नल ने धन-धान्य से परिपूर्ण पृथ्वी का धर्मपूर्वक पालन किया।
छठा अध्याय
नल–दमयंती स्वयंवर
महर्षि वृहदश्व युधिष्ठिर से बोले—
हे भरतवंशी राजन्! जब शुभ काल, पुण्य तिथि और मंगल क्षण उपस्थित हुआ, तब विदर्भराज भीम ने अपनी पुत्री दमयंती के स्वयंवर का निश्चय किया। चारों दिशाओं में दूत भेजे गए और पृथ्वी के समस्त प्रतापी राजाओं को आमंत्रण दिया गया।
कामदेव से पीड़ित, दमयंती के रूप-गुण पर मोहित, इंद्र से लेकर मनुष्य लोक तक के श्रेष्ठ राजा शीघ्र ही कुण्डिनपुर पहुँचने लगे। स्वर्णस्तंभों से सुसज्जित, मणियों से जगमगाता वह राजद्वार ऐसा प्रतीत होता था मानो देवलोक का कोई अंश पृथ्वी पर उतर आया हो।
सभा में प्रवेश करते ही राजा-महाराजाओं ने सुगंधित चंदन, पुष्पमालाएँ और उज्ज्वल कुंडल धारण किए। नाना प्रकार के रत्नजटित आसनों पर वे इस प्रकार शोभित हो रहे थे, जैसे आकाश में नक्षत्र विराजमान हों। वह राजसभा पुरुषोत्तमों से परिपूर्ण थी—जैसे भोगवती नागों से या गुहा सिंहों से भरी हो।
उसी समय, अपनी अनुपम प्रभा से सबकी दृष्टि हर लेने वाली राजकुमारी दमयंती ने सभा में प्रवेश किया। उसके आते ही ऐसा लगा मानो बिजली चमक उठी हो। जो भी उसे देखता, उसकी दृष्टि वहीं स्थिर हो जाती। बड़े-बड़े तपस्वी और महात्मा भी उसकी ओर देखे बिना न रह सके।
तभी दमयंती ने देखा—सभा में पाँच पुरुष एक-से रूप, एक-सी कांति, एक-सी देहयष्टि वाले खड़े हैं। वे पाँचों नल के समान ही प्रतीत हो रहे थे। वास्तव में उनमें चार देवता थे—इंद्र, अग्नि, यम और वरुण—और पाँचवाँ स्वयं राजा नल।
यह देखकर दमयंती का हृदय विचलित हो उठा।
“मैं नल को कैसे पहचानूँ?”
उसके मन में घोर संशय उत्पन्न हुआ।
उसने वृद्धों से सुने देवताओं के लक्षण स्मरण किए—देवताओं को न पसीना आता है, न उनकी छाया पड़ती है, उनके नेत्र न झपकते हैं, उनकी मालाएँ कभी मुरझाती नहीं और उनके चरण पृथ्वी को स्पर्श नहीं करते।
किन्तु यहाँ पाँचों पुरुष पृथ्वी पर खड़े थे—किसी में भी देवचिह्न स्पष्ट नहीं दिख रहे थे। यह देखकर दमयंती और अधिक व्याकुल हो उठी।
अंततः उसने मन ही मन निश्चय किया— “अब देवताओं की ही शरण लेनी होगी।”
वह हाथ जोड़कर, कांपते स्वर में बोली— “हे देवताओं! मैंने हंस के वचनों पर विश्वास कर राजा नल को अपने पति रूप में स्वीकार किया है। मन, वचन और कर्म से मैं किसी और को नहीं चाहती। यदि मेरा यह सत्य बलवान है, तो कृपा कर मुझे मेरे नल का दर्शन करा दीजिए। हे लोकपालों! अपने दिव्य स्वरूप प्रकट कीजिए।”
दमयंती की करुण पुकार, उसका अडिग प्रेम, नल के प्रति उसकी निष्कपट भक्ति—इन सबको देखकर देवताओं का हृदय पिघल गया। उन्होंने उसी क्षण अपने दिव्य लक्षण प्रकट कर दिए।
दमयंती ने देखा— देवताओं के शरीर पर न पसीना था, न उनकी छाया थी, उनके नेत्र अचल थे, मालाएँ अम्लान थीं और उनके चरण पृथ्वी से ऊपर थे।
और तब— एक क्षण में— उसने पहचान लिया—
“यही हैं मेरे नल!”
वे पसीने से युक्त, पृथ्वी को स्पर्श करते, म्लान पुष्पमाला धारण किए खड़े थे—मानवीय सौंदर्य से दीप्त।
लज्जा से झुकी दृष्टि, कांपते हाथों से दमयंती ने वरमाला उठाई और नल के कंधों पर डाल दी।
क्षण भर में सभा में “हा-हा!” का स्वर गूँज उठा।
देवता, ऋषि और राजा—सबने “धन्य! धन्य!” कहा।
नल की कीर्ति दिशाओं में फैल गई।
नल ने हर्षित होकर दमयंती से कहा— “हे कल्याणी! जब तक मेरे प्राण शरीर में हैं, मैं तुम्हें ही अपना सर्वस्व मानूँगा।”
दमयंती ने कृतज्ञ दृष्टि से नल को देखा और दोनों ने अग्नि साक्षी मानकर देवताओं को प्रणाम किया।
प्रसन्न होकर देवताओं ने नल को वर दिए—
- इंद्र ने—यज्ञों में देवदर्शन और उत्तम गति
- अग्नि ने—जहाँ चाहें वहाँ प्रकट होने की शक्ति
- यम ने—धर्म और न्याय में अडिग बुद्धि
- वरुण ने—जहाँ चाहें वहाँ जल की उपलब्धि और दिव्य सुगंधित माला
इसके बाद देवता स्वर्गलोक को लौट गए।
राजा-महाराजा अपने-अपने नगरों को चले गए।
राजा भीम ने विधिपूर्वक नल-दमयंती का विवाह कराया।
नल दमयंती को साथ लेकर निषध नगरी पहुँचे।
उन्होंने प्रजा का पालन धर्मपूर्वक किया, अनेक यज्ञ किए, अश्वमेध भी संपन्न किया।
वन-उपवनों में विहार करते हुए, प्रेम और धर्म से संयुक्त जीवन बिताते हुए, नल-दमयंती के यहाँ इंद्रसेन नाम का पुत्र और इंद्रसेना नाम की कन्या उत्पन्न हुई।
इस प्रकार— धर्म, प्रेम और यश से युक्त राजा नल ने सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन किया।
सप्तम अध्याय
वृहदश्व ऋषि बोले—
जब दमयंती ने राजा नल को पति रूप में वरण कर लिया, तब अत्यंत तेजस्वी लोकपाल अपने-अपने लोकों की ओर प्रस्थान करने लगे। उसी समय मार्ग में उन्होंने कलियुग के अधिपति कलि को देखा, जो अपने सारथी द्वापर के साथ जा रहा था।
इन्द्र ने कलि से पूछा—
“हे कलि! तुम द्वापर के साथ कहाँ जा रहे हो?”
इस पर कलि ने उत्तर दिया—
“मैं दमयंती के स्वयंवर में जाने वाला था। मेरा मन उसी में लगा हुआ था।”
इन्द्र यह सुनकर हँस पड़े और बोले—
“हे कलि! वह स्वयंवर तो समाप्त हो चुका है। दमयंती ने हमारे सामने ही राजा नल को अपना पति चुन लिया है।”
इन्द्र की यह बात सुनकर कलि अत्यंत क्रोधित हो उठा। क्रोध से भरकर उसने समस्त देवताओं से कहा—
“जिस स्त्री ने देवताओं के रहते हुए किसी मनुष्य को पति रूप में चुना है, वह दंड के योग्य है। उसे अवश्य दंड मिलना चाहिए।”
तब देवताओं ने कलि को उत्तर दिया—
“हे कलि! यह विवाह हमारी पूर्ण अनुमति और आज्ञा से हुआ है। दमयंती ने सब गुणों से सम्पन्न राजा नल का वरण किया है। ऐसे राजा को कौन सी स्त्री नहीं चाहेगी?”
देवताओं ने आगे कहा—
“राजा नल व्रतशील हैं, वे समस्त वेदों और धर्मों के ज्ञाता हैं। उनके यहाँ चारों वेद सदा यज्ञों में प्रतिष्ठित रहते हैं। वे अहिंसाप्रिय, सत्यवादी, दृढ़व्रती, धर्मनिष्ठ, शुद्ध आचरण वाले, इन्द्रियसंयमी, मनोनिग्रह करने वाले, धैर्यवान, ज्ञानी और तपस्वी हैं। लोकपालों के समान उनमें सभी श्रेष्ठ गुण विद्यमान हैं।”
“हे कलि! जो पुरुष ऐसे गुणवान राजा नल को दंड देने की इच्छा करेगा, वह स्वयं अपने लिए विनाश का कारण बनेगा। ऐसे व्यक्ति को घोर दुःख और नरक की प्राप्ति होगी।”
इस प्रकार कलि और द्वापर को समझाकर देवता स्वर्गलोक को चले गए।
देवताओं के चले जाने के बाद कलि ने द्वापर से कहा—
“अब मैं अपने क्रोध को शांत नहीं करूँगा। मैं राजा नल के शरीर में प्रवेश करूँगा और उन्हें उनके राज्य से भ्रष्ट कर दूँगा। मैं ऐसा उपाय करूँगा कि वे दमयंती से भी वियोग भोगें। तुम भी उचित समय पर पासों (जुए) के रूप में प्रवेश कर मेरी सहायता करना।”
अष्टम अध्याय का आरम्भ
वृहदश्व ऋषि बोले—
इस प्रकार कलि ने द्वापर के साथ गुप्त संकेत किया और वहाँ से चल पड़ा, जहाँ निषध देश में राजा नल निवास कर रहे थे। अवसर की खोज में कलि ने दीर्घकाल तक निषध देश में वास किया। वह नित्य राजा नल की त्रुटि की प्रतीक्षा करता रहा, परंतु नल धर्मात्मा थे—उनमें कोई दोष सरलता से दिखाई नहीं देता था।
अंततः एक दिन कलि को वह अवसर मिल ही गया, जिसकी उसे प्रतीक्षा थी।
एक दिन राजा नल ने संध्या-वंदन तो किया, किंतु अनजाने में आचमन और पाद-शौच नहीं किया। उसी क्षण कलि ने उस सूक्ष्म दोष को देख लिया। बस, वही क्षण उसके लिए द्वार बन गया। उसी समय कलि ने राजा नल के शरीर में प्रवेश कर लिया।
कलि के प्रवेश करते ही नल की बुद्धि पर धीरे-धीरे अंधकार छाने लगा।
इसके बाद कलि ने अपना दूसरा रूप धारण किया और राजा नल के भाई पुष्कर के पास जाकर उससे कहा—
“आओ, राजा नल के साथ द्यूत खेलो। मैं तुम्हारे साथ रहूँगा। इस खेल में तुम नल को पराजित करोगे, उसका राज्य छीन लोगे और निषध देश पर अधिकार करोगे।”
कलि के इन वचनों से पुष्कर का लोभ जाग उठा। वह तुरंत राजा नल के पास गया। स्वयं कलि भी श्रेष्ठ पात्र (पासों) का रूप धारण कर पुष्कर के साथ उपस्थित हुआ।
पुष्कर ने बार-बार राजा नल को द्यूत खेलने के लिए उकसाया—
“आओ भैया! श्रेष्ठ पासों से खेलते हैं।”
दमयंती सब देख रही थीं। वे राजा नल को संकेतों से रोकना चाहती थीं, किंतु कलि से आक्रांत नल ने किसी की ओर ध्यान नहीं दिया। नल का मन विचलित हो चुका था।
द्यूत प्रारम्भ हुआ।
धीरे-धीरे खेल उग्र होता गया। राजा नल ने पहले स्वर्ण, फिर रथ, हाथी, वस्त्र, आभूषण—सब कुछ हारना आरम्भ कर दिया। पासों के नशे में चूर राजा नल को रोकने का साहस किसी में नहीं रहा। कलि के प्रभाव से कोई भी व्यक्ति उस द्यूत को रोकने में समर्थ नहीं था।
हे भरतवंशी! यह समाचार पूरे नगर में फैल गया।
मंत्री, सभासद और नगरवासी व्याकुल होकर राजसभा में पहुँचे। सबने राजा को समझाने का प्रयास किया, परंतु व्यसन में डूबे नल किसी की बात सुनने को तैयार नहीं थे।
तब सूत ने आकर रोती हुई दमयंती से निवेदन किया—
“हे देवी! नगरवासी और मंत्री द्वार पर खड़े हैं। वे राजा को इस विनाशकारी खेल से रोकना चाहते हैं। आप ही राजा से निवेदन करें।”
आँसुओं से भरी आँखों, काँपते स्वर और दुःख से बोझिल हृदय से दमयंती राजा नल से बोलीं—
“हे राजन! नगरजन और मंत्री आपके दर्शन की प्रतीक्षा में द्वार पर खड़े हैं। वे आपकी भलाई चाहते हैं। कृपा कर उनके दर्शन दीजिए।”
उन्होंने यह बात बार-बार कही।
किन्तु कलि से ग्रस्त राजा नल ने एक शब्द भी उत्तर नहीं दिया।
दमयंती का हृदय टूट गया।
निराश होकर मंत्री और नगरवासी लज्जा और शोक से भरकर यह कहते हुए लौट गए—
“राजा नल अब नष्ट हो चुके हैं।”
हे युधिष्ठिर! इस प्रकार पुष्कर और नल के बीच यह द्यूत अनेक महीनों तक चलता रहा। अंततः पुण्ययशस्वी, वीर और धर्मात्मा राजा नल सर्वस्व हार गए।
और उसी क्षण से उनके जीवन का सबसे भयानक अध्याय आरम्भ हुआ…
नवम अध्याय
वृहदश्व ऋषि बोले—
हे राजन्! इसके पश्चात सावधान और दूरदर्शी दमयंती ने उस पवित्र यशस्वी किंतु द्यूत में मूढ़ हुए राजा नल को उन्मत्त-सा होते देखा। उनका तेज धुंधला पड़ रहा था, विवेक जैसे किसी अदृश्य आवरण में बंध गया हो। यह दृश्य दमयंती के हृदय को भय और शोक से भर गया।
भीम की पुत्री ने तत्काल यह समझ लिया कि अब विलंब विनाश को निमंत्रण देना होगा। वह उस पापी शक्ति की शंका कर रही थी जो राजा को भीतर से जकड़ चुकी थी, और साथ ही वह अपने प्रिय पति का हित भी करना चाहती थी।
जब उसने जान लिया कि राजा नल अपना समस्त धन हार चुके हैं, तब उसने अपनी परम हितैषी, बुद्धिमती, सभी कार्यों में कुशल और नल की प्रिय धात्री वृहत्सेना को बुलाया और बोली—
“हे वृहत्सेना! जाओ। राजा नल की आज्ञा से मंत्रियों को बुलाओ। उनसे कहो कि जिन्होंने द्यूत में हानि देखी है और जिनके पास राज्य का हित है—वे सब पुनः उपस्थित हों।”
मंत्री राजा नल के पास गए। दमयंती ने निवेदन किया—
“हे तात! समस्त प्रकृति-जन द्वार पर खड़े हैं, वे पुनः आपके दर्शन चाहते हैं।”
परंतु कलि से आच्छन्न राजा नल ने एक बार फिर कोई उत्तर नहीं दिया।
वचन का स्वीकार न होते देखकर दमयंती लज्जा और पीड़ा से भर उठीं और मौन होकर भवन में लौट आईं।
कुछ समय पश्चात उसने सुना कि राजा नल अब भी द्यूत से विमुख नहीं हुए हैं और पुनः सब कुछ हारने को तत्पर हैं। तब उसने फिर धात्री से कहा—
“हे कल्याणी! पुनः जाओ। इस बार राजा की आज्ञा से सूत वर्ष्णेय को बुलाओ। अब एक अत्यंत बड़ा कार्य उपस्थित है।”
वृहत्सेना ने दमयंती की आज्ञा से विश्वस्त पुरुषों द्वारा वर्ष्णेय को बुलवाया।
तत्पश्चात देश, काल और परिस्थिति को भली-भाँति समझने वाली दमयंती ने शुद्ध, मधुर और संयत वाणी में वर्ष्णेय से कहा—
“तू जानती है कि राजा नल तुम पर कितना विश्वास रखते हैं। इस संकट में वही सहायता कर सकता है।
जैसे-जैसे राजा पुष्कर से हार रहे हैं, वैसे-वैसे उनका द्यूत-व्यसन बढ़ता जा रहा है। पुष्कर के पासे उसकी इच्छा के अनुसार गिरते हैं, और नल के पासे जैसे निष्फल हो गए हैं।
वह न सुहृदों की सुनते हैं, न मंत्रियों की, और अब तो मेरे वचनों को भी नहीं मानते।”
दमयंती का स्वर काँप उठा—
“मैं जानती हूँ, यह राजा का दोष नहीं है। वे किसी माया से मोहित किए गए हैं। परंतु यदि यह यूँ ही चलता रहा, तो राजा का सर्वनाश निश्चित है।
हे सारथी! मैं तेरी शरण में हूँ। मेरे वचन को पूरा कर।”
फिर उसने निर्णायक स्वर में कहा—
“राजा नल के प्रिय, तीव्र वेग वाले घोड़ों को रथ में जोतो। मेरे पुत्र इन्द्रसेन और पुत्री इन्द्रसेना को उस रथ में बैठाकर उन्हें कुंडलपुर—मेरे पिता राजा भीम के यहाँ पहुँचा दो।
वहाँ उन्हें मेरे स्वजनों के संरक्षण में छोड़ देना। उसके बाद तुम जहाँ चाहो, वहाँ चले जाना।”
वर्ष्णेय ने यह सब सुनकर राजा नल के प्रधान मंत्रियों को समस्त वृत्तांत बताया। मंत्रियों ने गंभीर विचार के बाद यह आज्ञा दी कि ऐसा ही किया जाए।
तब वर्ष्णेय ने दोनों कुमार-कुमारियों को रथ में बैठाया और तीव्र वेग से विदर्भ देश की ओर प्रस्थान किया। कुंडलपुर पहुँचकर उसने घोड़े, रथ और दोनों बच्चों को राजा भीम के संरक्षण में सौंप दिया।
इसके पश्चात वह स्वयं आगे चला गया।
इधर राजा नल—
राज्य खो चुके, पत्नी से वियोग की ओर बढ़ते, मन में असह्य पीड़ा लिए, एक अनजानी दिशा में भटकते हुए अयोध्या पहुँचे।
वहाँ वे अत्यंत दुःखी होकर राजा ऋतुपर्ण के समीप पहुँचे और उनके सारथी के रूप में वेतन पर रहने लगे।
और इस प्रकार—
निषध का सम्राट अब एक साधारण सारथी बन चुका था।
कलि का जाल कस चुका था…
और भाग्य की अग्निपरीक्षा अभी शेष थी।
दशमोऽध्यायारंभः
वृहदश्व बोले—
हे राजन्! वासुदेव के वंशज के चले जाने के बाद जुए में आसक्त राजा नल का राज्य, कोष और जो कुछ धन था, सब पुष्कर ने जीत लिया। हँसते हुए पुष्कर ने उस नल से, जिसका राज्य नष्ट हो चुका था, फिर कहा—
“अब जुए में लगाने योग्य तुम्हारे पास क्या बचा है? तुम्हारे पास केवल एक ही वस्तु शेष है—दमयन्ती। शेष सारा धन तो मैं जीत चुका हूँ। यदि उचित समझो तो दमयन्ती को दाँव पर रखो।”
यह सुनकर पवित्र यश वाले नल का हृदय क्रोध से फट-सा गया, पर उन्होंने दमयन्ती से कुछ नहीं कहा। अत्यन्त क्रुद्ध, यशस्वी राजा नल ने पुष्कर को देखा, अपने समस्त आभूषण उतार दिए और केवल एक वस्त्र धारण कर, अपने सुहृदों के शोक को बढ़ाते हुए, लक्ष्मी का परित्याग कर वहाँ से निकल पड़े।
एक वस्त्र धारण किए दमयन्ती भी उनके पीछे चल पड़ी। नगर से बाहर वे दोनों तीन रात्रियाँ ठहरे।
इसके बाद पुष्कर ने नगर में यह घोषणा करवा दी—
“जो कोई भी पुरुष नल के पास जाएगा या उनका आदर करेगा, वह मेरे हाथों मारा जाएगा।”
हे युधिष्ठिर! पुष्कर के इस भयावह वचन और नल से द्वेष के कारण नगरवासियों ने उनका सत्कार नहीं किया। इस प्रकार सत्कार के योग्य होते हुए भी अपमानित राजा नल नगर के समीप केवल जीवन निर्वाह करते हुए तीन रात्रियाँ रहे।
फिर भूख से पीड़ित होकर, फल और मूल चुनते हुए, राजा नल आगे बढ़ चले और दमयन्ती उनके पीछे-पीछे चलती रहीं। बहुत दिनों बाद, भूख से अत्यन्त व्याकुल नल ने स्वर्ण-पंखों वाले पक्षियों को देखा। तब निषधराज ने सोचा—
“अब यही मेरा भोजन हैं और यही मेरा धन।”
उन्होंने अपने वस्त्र से उन्हें ढँक लिया, पर वे पक्षी उसी वस्त्र को लेकर आकाशमार्ग से उड़ गए। उड़ते हुए उन पक्षियों ने, वस्त्रहीन और लज्जित नल को भूमि पर अधोमुख देखकर कहा—
“हे दुर्बुद्धे! हम तुम्हारा वस्त्र हरने की इच्छा से ही आए थे। वस्त्र सहित तुम्हारा जाना हमारी शक्ति से बाहर था।”
हे राजन्! यह सुनकर पवित्र यश वाले नल अत्यन्त दुःखी हुए। अपने पास आई दमयन्ती को देखकर उन्होंने कहा—
“हे अनिन्दिते! मैं जिनके अति क्रोध के कारण ऐश्वर्य से च्युत हुआ हूँ, भूख से पीड़ित हूँ और दुःख में जीवन निर्वाह भी नहीं कर पा रहा हूँ। जिनके कारण निषध की स्त्रियाँ तक मेरा सत्कार नहीं करतीं—आज वही पक्षी बनकर मेरे वस्त्र भी हर ले गए।
हे भीरु! मेरी बात ध्यान से सुनो। यह मार्ग अत्यन्त कठिन है—यह अवन्ति और ऋक्षवत् पर्वत को पार करता है। आगे विध्य पर्वत है, समुद्र में मिलने वाली पयोष्णी नदी है और महर्षियों के आश्रम हैं जहाँ फल-मूल प्रचुर हैं। यही मार्ग विदर्भ देश को जाता है। इसके आगे दक्षिण देश है।”
इस प्रकार पीड़ा से व्याकुल राजा नल बार-बार दमयन्ती को समझाने लगे।
तब दुःख से कर्षित दमयन्ती ने काँपते स्वर में कहा—
“हे राजन्! जब-जब मैं आपके संकल्प को सोचती हूँ, मेरा हृदय व्याकुल हो उठता है और मेरे अंग शिथिल हो जाते हैं। आप भूख और श्रम से पीड़ित हैं, आपका राज्य और धन छिन चुका है—मैं आपको इस निर्जन वन में छोड़कर कैसे जा सकती हूँ?
हे महाराज! इस घोर वन में मैं आपके दुःख, श्रम और क्षुधा को शांत करूँगी। सब दुःखों में भार्या के समान कोई औषध नहीं—यह वैद्यों का मत है। मैं आपसे सत्य कहती हूँ।”
नल बोले—
“हे सुमध्यमे! तुम ठीक कहती हो। पीड़ित मनुष्य के लिए भार्या के समान न मित्र है, न औषध। हे भीरु! मैं शरीर का त्याग कर सकता हूँ, पर तुम्हारा नहीं।”
दमयन्ती बोली—
“हे महाराज! यदि आप मुझे छोड़ना नहीं चाहते, तो बार-बार विदर्भ देश का मार्ग क्यों दिखाते हैं? हे नृपति! मैं आपकी शरण में हूँ, आप मुझे त्यागने योग्य नहीं हैं। कलि से पीड़ित चित्त के कारण मुझे मत छोड़िए, हे नरोत्तम!
यदि आपका अभिप्राय यह है कि हम अपने बंधु-बांधवों के पास जाएँ, तो हम दोनों साथ विदर्भ देश चलेंगे। वहाँ विदर्भराज आपका सत्कार करेंगे। हे राजन्! उनके द्वारा पूजित होकर क्या आप सुखपूर्वक वहाँ निवास नहीं करेंगे?”
ग्यारहवें अध्याय
वृहदश्व बोले—
नल ने दमयंती से कहा—
“जिस प्रकार तेरे पिता का राज्य है, उसी प्रकार यह राज्य भी मेरा ही था—इसमें कोई संदेह नहीं।
परंतु हे प्रिये! इस विषम अवस्था में, इस टूटे हुए रथ के समान जीवन के साथ मैं वहाँ कैसे जाऊँ?
जो कभी तेरे हर्ष को बढ़ाने वाला ऐश्वर्यवान पति था, वही यदि आज ऐश्वर्य से च्युत होकर तेरे शोक का कारण बने—तो ऐसा लौटना मैं कैसे सहन करूँ?”
वृहदश्व बोले—
इस प्रकार बार-बार कहते हुए, अर्धवस्त्र धारण किए, भूख-प्यास से अत्यंत क्लांत, इधर-उधर भटकते हुए राजा नल एक सुनसान सभा में पहुँचे।
निषध देश का वही सम्राट—अब भाग्य से पराजित और असहाय।
उस सभा में नल ने दमयंती के साथ पृथ्वी पर ही आसन किया।
वस्त्रहीन, तृणासन से रहित, धूल से आच्छादित—नल और दमयंती दोनों भूमि पर ही लेट गए।
अत्यंत कोमल, तपस्विनी, पतिव्रता कल्याणी दमयंती, अकस्मात आए दुःखों से थककर शीघ्र ही निद्रा में लीन हो गई।
परंतु हे राजन्!
दमयंती के सो जाने पर शोक से मथितचित्त नल को नींद न आई।
उसका मन बीते वैभव और वर्तमान विनाश के बीच झूलने लगा।
राज्य का हरण, सुहृदों का त्याग, वन में वस्त्रों का छिन जाना—इन सब क्लेशों का स्मरण कर उसका हृदय व्याकुल हो उठा।
वह सोचने लगा—
“अब मेरा क्या होगा?
और इसका क्या होगा, जिसे मैं अपना कहता हूँ?
क्या मेरा मर जाना ही श्रेष्ठ है?
या इस प्रिय भार्या का त्याग?”
उसकी चेतना काँप उठी—
“यह मेरी अनुरक्त पत्नी, मेरे कारण ही इस प्रकार दुःख भोग रही है।
यदि मेरे साथ रही, तो और भी कष्ट पाएगी।
यदि मुझसे विछुड़ जाए, तो संभव है अपने माता-पिता के पास जाकर कुछ सुख पा ले।”
इस प्रकार अनेक बार विचार कर, नल ने अंततः यह निश्चय किया कि—
दमयंती का त्याग ही उसके हित में है।
फिर भी उसका अंतःकरण विद्रोह कर उठा—
“यह यशस्विनी, महाभागा, पतिव्रता—
मेरे तेज के कारण मार्ग में किसी से टकराने योग्य नहीं।
यह मेरी भक्त है, मेरे साथ हर दुःख सहने को तत्पर।”
परंतु दुष्टभावी कलि के प्रभाव से उसकी बुद्धि भ्रमित हो गई और वह त्याग के मार्ग पर बढ़ चला।
अब वह सोचने लगा—
“मेरे पास केवल एक वस्त्र है, और इसके पास भी एक ही।
यदि मैं इसे छोड़ जाऊँ, तो इसे कैसे ढँकूँ?”
दमयंती को बिना जगाए—
यह विचार उसके हृदय को चीर रहा था।
वह सभा के चारों ओर घूमने लगा।
तभी उसे एक स्थान पर म्यान-रहित, उत्तम खड्ग दिखाई दिया।
शत्रुओं को तपाने वाला राजा नल उस खड्ग से अपने अर्धवस्त्र को दो भागों में काटकर एक भाग स्वयं धारण कर,
दूसरा भाग दमयंती पर रखकर—
अचेत सोई हुई प्रिया को वहीं छोड़कर शीघ्र आगे बढ़ गया।
परंतु कुछ ही दूर जाकर उसका हृदय द्रवित हो उठा।
वह लौट आया।
सभा के मध्य भूमिपर सोई दमयंती को देखकर वह फूट-फूट कर रो पड़ा—
“जिसे पहले न वायु छू पाती थी, न सूर्य देख पाता था—
वही आज अनाथ की भाँति धूल में सो रही है।
यह चारुहासिनी, कटे वस्त्र से ढकी हुई—
जागेगी तो कैसे सहन करेगी?”
उसकी वाणी काँप उठी—
“यह सती, यह शुभा,
मुझसे रहित इस मृग-व्याघ्रों से भरे घोर वन में कैसे विचरेगी?”
फिर उसने आकाश की ओर देखकर कहा—
“हे महाभागे!
आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार और मरुद्गण—
सब मिलकर तुम्हारी रक्षा करें।
तू धर्मयुक्त है, और यह नल—
कलि द्वारा अपहृत बुद्धि वाला—तुझे छोड़कर जा रहा है।”
इतना कहकर वह फिर आगे बढ़ गया।
पर प्रेम की डोर उसे बार-बार खींच लाती।
वह जाता—फिर लौट आता।
लौटता—फिर चला जाता।
उसका हृदय दो भागों में विभक्त हो चुका था।
अंततः—
कलि से स्पर्शित, बुद्धि-नष्ट, करुण विलाप करता हुआ
राजा नल
अपनी सोती हुई भार्या को
उस शून्य, भयावह वन में छोड़कर
चल पड़ा।
और उसी क्षण—
नल के पतन की रात्रि पूर्ण हुई,
और दमयंती की परीक्षा का प्रभात आरंभ हुआ।
नल–दमयंती : ग्यारहवाँ अध्याय — विरह की रात्रि
नल बोला—
“जिस प्रकार तुम्हारे पिता का राज्य है, उसी प्रकार यह राज्य भी मेरा ही था; इसमें मुझे कोई संदेह नहीं। परन्तु अब जिस दशा में मैं हूँ, उस विषम अवस्था में वहाँ जाना मेरे लिए संभव नहीं। मैं जो कभी तुम्हारे हर्ष का कारण था, ऐश्वर्य से युक्त होकर तुम्हारे जीवन को आलोकित करता था, वही आज ऐश्वर्य से च्युत होकर तुम्हारे शोक को कैसे बढ़ाऊँ? इस रूप में तुम्हारे सामने जाना मुझे स्वीकार नहीं।”
वृहदश्व कहते हैं—
इस प्रकार बार-बार अपने ही हृदय से संवाद करता हुआ, अर्धनग्न, भूख-प्यास से पीड़ित, वन-वन भटकता हुआ राजा नल किसी सभा-स्थान में जा पहुँचा। वही निषध देश का प्रतापी राजा नल—आज धूल से लिपटा, माला-विहीन, तृणासन से भी वंचित—दमयंती के साथ पृथ्वी तल पर बैठा और वहीं लेट गया।
अति कोमल अंगों वाली, तपस्विनी-सी शुद्ध, कल्याणी दमयंती भी अकस्मात आए इस घोर दुःख से थककर वहीं सो गई।
परन्तु हे राजन्, दमयंती के सो जाने पर भी नल को निद्रा न आई।
उसका चित्त शोक से मथा जा रहा था।
राज्य-हरण, मित्रों का विछोह, वन में वस्त्रों का छिन जाना—इन सब क्लेशों को स्मरण कर उसका हृदय विदीर्ण हो उठा।
वह सोचने लगा—
“मेरा क्या होगा? और मेरे कारण इसे क्या-क्या सहना पड़ेगा?
क्या मेरा मर जाना श्रेष्ठ है? या इस प्रिय भार्या का त्याग?
यह निश्चय है कि मेरी अनुरक्त पत्नी मेरे कारण इस प्रकार दुःख भोग रही है।
यदि यह मुझसे अलग हो जाए, तो संभव है अपने माता-पिता के पास लौट जाए।
मेरे साथ रहकर यह निरंतर कष्ट पाएगी, इसमें कोई संदेह नहीं।
परन्तु त्याग में—कौन जाने—शायद इसे कुछ सुख मिल जाए।”
इस प्रकार बार-बार विचार कर, अत्यंत पीड़ा के साथ, राजा नल ने दमयंती के त्याग को ही श्रेष्ठ मान लिया।
उसने सोचा—
“यह यशस्विनी, महाभागा, पतिव्रता मेरी भक्त है।
मेरे तेज से यह किसी के स्पर्श योग्य भी नहीं।
परन्तु काल की दुष्ट प्रेरणा से मेरी बुद्धि विपरीत हो गई है।”
अब नल एक और चिंता में पड़ गया—
“मेरे पास केवल एक ही वस्त्र है, और दमयंती के पास भी एक।
यदि मैं इसे काटूँ, तो कैसे काटूँ कि मेरी प्रिया जाग न जाए?”
यह सोचकर वह सभा-स्थान के चारों ओर घूमने लगा।
इधर-उधर भटकते हुए उसे एक स्थान पर म्यान रहित, उत्तम, तेजस्वी खड्ग मिला—शत्रुओं को संताप देने वाला वही खड्ग।
नल ने काँपते हाथों से अपने वस्त्र को दो भागों में काटा।
एक अंश स्वयं धारण किया—और दूसरे में लिपटी, अचेत सोई हुई दमयंती को वहीं छोड़ दिया।
कुछ दूर जाकर उसका हृदय फिर लौट आया।
वह पुनः सभा-स्थान में आया, दमयंती को देखा—और फूट-फूटकर रो पड़ा।
“जिसे पहले न वायु देखती थी, न सूर्य—
वही आज अनाथ-सी सभा के मध्य भूमि पर सो रही है।
यह चारु-हासिनी, यह सुकुमारी—
कटे वस्त्रों में लिपटी, उन्मत्त-सी जागेगी तो क्या होगा?”
उसकी आँखों से अश्रुधारा बह चली—
“यह सती-शुभा दमयंती, मेरे बिना इस मृग-व्याघ्रों से भरे घोर वन में कैसे विचरेगी?
हे महाभागे!
द्वादश आदित्य, वसु, एकादश रुद्र, दोनों अश्विनी कुमार और मरुद्गण—
सब मिलकर तुम्हारी रक्षा करें।”
इतना कहकर, कलि द्वारा अपहृत बुद्धि, दुख से विह्वल राजा नल फिर आगे बढ़ गया।
परन्तु उसका हृदय बार-बार उसे खींच लाता।
वह जाता—फिर लौट आता।
लौटता—फिर जाता।
अंततः करुण विलाप करते हुए, अश्रुओं से भरी आँखों से,
उस सोई हुई भार्या को अंतिम बार देखकर
राजा नल ने अपने हृदय पर पत्थर रख लिया—
और उस शून्य वन में
दमयंती को छोड़कर
शीघ्र आगे बढ़ गया।
कलि से स्पर्शित, नष्ट-बुद्धि, दुःखी राजा नल
अपनी प्रिय भार्या को निर्जन वन में छोड़कर
अंधकार में विलीन हो गया।
द्वादश अध्याय : वन में विलाप
महर्षि बृहदश्व बोले—
हे राजन् युधिष्ठिर!
नल के दूर चले जाने के बाद जब रात्रि का अंधकार गहराने लगा, तब दमयंती की नींद टूटी। शीतल वनवायु में उसका शरीर काँप उठा। नेत्र खुलते ही उसने चारों ओर देखा—पर नल कहीं दिखाई न दिए। वही नल, जिनके सान्निध्य में भय भी शरण बन जाता था, आज उस निर्जन वन में नहीं थे।
दमयंती का हृदय धक् से रह गया। वह उठ खड़ी हुई। भय, शोक और पीड़ा से उसका कंठ भर आया। ऊँचे स्वर में वह पुकार उठी—
“हे महाराज! हा री… हा महाराज!
हे स्वामी! मुझे क्यों त्याग गए?
मैं तो यहाँ मारी गई, नष्ट हुई, निर्जन वन में भय से काँप रही हूँ!”
वह इधर-उधर दौड़कर नल को खोजने लगी। हर झाड़ी, हर वृक्ष से मानो प्रश्न कर रही थी—“क्या तुमने मेरे स्वामी को देखा है?”
“हे निषध के नरेश्वर!” वह विलाप करने लगी,
“तुम तो धर्मज्ञ और सत्यवादी हो। स्वयंवर में सबके सामने तुमने प्रतिज्ञा की थी कि मुझे कभी नहीं त्यागोगे। फिर आज इस वन में मुझे अकेली छोड़कर कैसे चले गए?
क्या शत्रु का अपकार भी इतना कठोर होता है?”
उसकी वाणी काँप रही थी, पर हृदय से निकली पुकार निरंतर गूँज रही थी—
“हे पुरुषोत्तम!
यदि यह केवल परिहास है तो अब बहुत हो चुका। मैं अत्यंत भयभीत हूँ। मुझे अपने दर्शन दो।
क्या तुम झाड़ियों में छिपकर मुझे देख रहे हो और बोलते नहीं?”
दमयंती बार-बार गिरती, फिर उठती। कभी झाड़ियों में छिप जाती, कभी दौड़ पड़ती। उसकी दशा उस कुररी पक्षी के समान हो गई थी जो अपने बिछुड़े साथी को पुकार-पुकार कर विलाप करता है। आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे।
फिर वह रुकी और भारी साँसें लेते हुए बोली—
“जिस किसी के शाप से मेरे स्वामी इस दुःख को प्राप्त हुए हैं, उस प्राणी को मेरे दुःख से भी अधिक दुःख प्राप्त हो।
और जिस पापी ने निष्पाप नल को इस दशा में डाला है, वह जीवनभर क्लेश में जिए।”
इस प्रकार विलाप करती हुई, पति-व्रता दमयंती वन में भटकने लगी। वह उन्मत्त के समान कभी इधर, कभी उधर दौड़ती, नल का नाम पुकारती जाती।
अचानक, घने वन में छिपा एक विशाल अजगर, जो भूख से व्याकुल था, फुफकारता हुआ उसके समीप आया और उसे जकड़ लिया। सर्प की कुंडलियों में बँधी हुई दमयंती को अपने प्राणों की भी चिंता न रही। उस घोर संकट में भी उसके मुख से वही पुकार निकली—
“हा नाथ!
मैं यहाँ अनाथ की तरह सर्प से ग्रसी जा रही हूँ। क्या तुम मेरे लिए दौड़कर नहीं आओगे?”
इसी समय वन में घूम रहा एक मृग-व्याध उसकी करुण पुकार सुनकर वहाँ आ पहुँचा। उसने देखा कि एक भयंकर सर्प दमयंती को निगल रहा है। बिना विलंब किए उसने अपने तीक्ष्ण शस्त्र से उस सर्प को चीर डाला और दमयंती को मुक्त किया। जल से उसके अंग धोए, उसे आश्वासन दिया और विनम्र स्वर में पूछा—
“हे सुंदरी! तुम कौन हो? इस भयानक वन में कैसे आई? ऐसे महान कष्ट तुम्हें कैसे प्राप्त हुए?”
दमयंती ने आँसुओं के बीच राजा नल से लेकर अब तक का समस्त वृत्तांत सुना दिया।
व्याध ने जब उस अर्द्ध-वस्त्रधारिणी, चंद्रमा-समान मुखवाली, मयूर-सी नेत्रों वाली दमयंती को देखा, तो उसके हृदय में काम-विकार जाग उठा। उसने कोमल वाणी में उसे सांत्वना देने के बहाने अनुचित बातें कहनी आरंभ कीं।
दमयंती ने उसके भाव को तुरंत पहचान लिया। वह क्रोध से भर उठी। पति-व्रता नारी के तेज से उसका मुख दहकने लगा।
उसने कठोर स्वर में कहा—
“दुष्ट! तू अपनी मर्यादा भूल बैठा है।”
पर जब व्याध न माना, तब दमयंती ने दृढ़ संकल्प के साथ उसे शाप दिया—
“यदि मैंने मन, वचन और कर्म से नल के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष का कभी स्मरण भी नहीं किया है, तो इसी क्षण तू प्राणों से रहित होकर भूमि पर गिर पड़े!”
शाप पूरा होते ही वह मृग-व्याध वैसे ही धरती पर गिर पड़ा जैसे अग्नि से दग्ध वृक्ष धराशायी हो जाता है।
इस प्रकार हे राजन्, दुःखों से घिरी हुई, पर पतिव्रत के तेज से युक्त दमयंती वन में आगे बढ़ी—अपने स्वामी नल की खोज में, अडिग विश्वास और अमिट प्रेम को हृदय में धारण किए हुए।
त्रयोदश अध्याय : वन-पथ की यातना और आशा का दीप
महर्षि बृहदश्व बोले—
हे राजन् युधिष्ठिर!
मृग-व्याध को शाप देकर भूमि पर गिरा देने के पश्चात कमलनयनी दमयंती फिर उसी दारुण वन में आगे बढ़ चली। वह वन अत्यंत भीषण था—शून्य, निर्जन और झिल्लियों के निरंतर नाद से गुंजायमान। सिंह, हाथी, व्याघ्र, भैंसे, रीछ और रुरु मृगों के झुंड वहाँ विचरते थे। असंख्य पक्षियों की किलकारियों से दिशाएँ गूँज रही थीं। कहीं म्लेच्छ और चोरों का भय था, तो कहीं घने वृक्षों की अजेय दीवार।
शाल, वेणु, धव, पीपल, तेंदु, इंगुद, किंशुक, अर्जुन, अरिष्ट और शाल्मलि—असंख्य वृक्षों से वह वन आच्छादित था। जामुन, आम, खदिर, बेंत, पद्मक, आमलक, प्लक्ष, कदंब, गूलर, बिल्व, प्रियाल, ताल, खजूर, हरितकी और विभीतक—मानो पूरी पृथ्वी की हरित संपदा उस वन में एकत्र हो गई हो।
दमयंती ने विचित्र धातुओं से सुसज्जित पर्वत देखे, गूँजती हुई गुफाएँ देखीं, नदियाँ, सरोवर, बावड़ियाँ और झरने देखे। कहीं दलदल थे, कहीं ऊँची शिखर-मालाएँ। उसने पिशाचों, उरगों और राक्षसों के भयानक रूपों की कल्पना से भी मन को दृढ़ रखा। भैंसों, वराहों, रीछों और वन-सर्पों के झुंडों के बीच वह अकेली चलती रही—नल को खोजती हुई।
भीम की पुत्री दमयंती, पति-वियोग के दुःख से पीड़ित होते हुए भी, उस कठिन मार्ग में किसी से न डरी। अंततः अत्यंत थकी हुई, शिला-तल पर बैठकर वह फूट-फूट कर विलाप करने लगी।
“हे महाबाहु, हे निषधदेश के स्वामी!” वह बोली,
“तुम मुझे इस निर्जन वन में छोड़कर कहाँ चले गए?
हे वीर नरोत्तम! जिन हाथों से तुमने अश्वमेध और राजसूय जैसे यज्ञों में दान दिया, उन्हीं हाथों से आज मुझ पर ऐसा रूक्ष व्यवहार क्यों?”
उसका कंठ भर आया—
“हे राजन! तुमने जो वचन मुझसे कहा था, क्या वह स्मरण के योग्य नहीं?
आकाशगामी हंसों ने जो संदेश तुम्हारे पास पहुँचाया था, क्या उसका भी कोई मूल्य नहीं?”
दमयंती ने आकाश की ओर देखा—
“हे पुरुषोत्तम! वेद और सत्य—दोनों समान माने गए हैं।
हे शत्रुनाशक! पूर्वकाल में जो सत्य वचन तुमने दिया था, उसे पूर्ण करो।”
वह चारों ओर देखकर पुकारने लगी—
“क्या तुम मुझे प्रत्यक्ष नहीं देखते कि तुम्हारे वियोग से मैं इस घोर वन में नष्ट हो रही हूँ?
यहाँ भयानक सिंह और व्याघ्र घूम रहे हैं—क्या मेरी रक्षा करने वाला कोई नहीं?”
फिर वह रोती हुई बोली—
“हे कल्याणरूप राजा नल! तुम सदा कहते थे—‘तेरे अतिरिक्त मेरी कोई प्रिया नहीं।’
आज उस वाणी को सत्य क्यों नहीं करते?”
दमयंती अकेली, अर्धवस्त्र में, धूलि से मलिन, दुर्बल शरीर लिए, वन की हरणी के समान भटक रही थी। पर्वतों, वृक्षों और दिशाओं से प्रश्न करती हुई वह पुकार उठी—
“किससे पूछूँ कि नल इस वन में किस ओर गए?
किसकी मधुर वाणी सुनकर अपने प्राणों को धारण करूँ?”
तभी उसने वन के राजा—एक विशाल सिंह—को सामने आते देखा। निर्भय होकर वह उसके समीप गई और हाथ जोड़कर बोली—
“हे मृगराज! तुम इस वन के स्वामी हो।
मुझे विदर्भराज की पुत्री दमयंती और निषधदेश के राजा नल की पत्नी जानो।
यदि तुमने मेरे स्वामी को देखा हो तो मुझे आश्वासन दो,
और यदि नहीं, तो मुझे भक्षण कर लो—ताकि मेरा दुःख समाप्त हो जाए।”
पर सिंह ने कोई उत्तर न दिया।
तब दमयंती आगे बढ़ी। एक दिव्य, ऊँचे शिखरों वाला पर्वत उसने देखा—जो अनेक धातुओं से शोभित था, सिंह, शार्दूल और पक्षियों से अनुनादित। उसे देखकर वह बोली—
“हे पर्वतराज! तुम शरण देने वाले और विख्यात हो।
मैं राजा की पुत्री, राजा की पुत्रवधू और राजा की पत्नी दमयंती हूँ।
क्या तुमने निषध के राजा नल को इस वन में देखा है?”
पर पर्वत भी मौन रहा।
तीन दिन-रात निरंतर चलने के बाद दमयंती ने एक दिव्य तपोवन देखा। वहाँ वसिष्ठ, भृगु और अत्रि जैसे महर्षियों के समान तेजस्वी तपस्वी निवास करते थे—वल्कल और मृगचर्म धारण किए, जितेन्द्रिय और शुद्ध।
आश्रम में प्रवेश कर उसने वृद्ध ऋषियों को दंडवत प्रणाम किया। उन्होंने उसका सत्कार कर कहा—
“हे कल्याणी! बैठो और बताओ, हम तुम्हारे लिए क्या करें?”
दमयंती ने अपना संपूर्ण वृत्तांत सुना दिया—नल का राज्य-हरण, वन-प्रवेश और वियोग।
तपस्वियों ने ध्यान करके कहा—
“हे भीमकन्या! तुम्हारे दिन शुभ होंगे।
तुम शीघ्र ही राजा नल को देखोगी—वह शत्रुओं का दमन करने वाला, धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ है।”
यह कहकर वे तपस्वी अग्निहोत्र सहित अंतर्धान हो गए।
दमयंती आश्चर्यचकित रह गई। कुछ समय ध्यान में स्थिर रहने के बाद वह फिर आगे बढ़ी। मार्ग में उसने एक अशोक वृक्ष देखा—पुष्पों और पक्षियों से शोभित। वह उसके समीप गई और बोली—
“हे अशोक! अपने नाम को सत्य करो।
यदि तुमने मेरे प्रिय नल को देखा हो, तो मुझे शोक-रहित करो।”
फिर वह चलती रही—नदियाँ, पर्वत, कंदराएँ पार करती हुई।
अंततः उसने एक विशाल जन-समूह देखा—हाथी, घोड़े और रथों सहित व्यापारी-कारवाँ, जो एक शीतल, निर्मल नदी को पार कर रहा था।
दमयंती उनके मध्य जा पहुँची। उसकी अवस्था देखकर कोई भयभीत हुआ, कोई हँसा, कोई निंदा करने लगा, तो किसी ने दया से पूछा—
“हे कल्याणी! तुम कौन हो? मानुषी हो या वन-देवी?”
तब दमयंती ने दृढ़ स्वर में कहा—
“मुझे राजा की पुत्री, राजा की पुत्रवधू और राजा की भार्या जानो।
मैं निषधदेश के राजा नल को खोज रही हूँ—यदि तुम उन्हें जानते हो तो बताओ।”
तब उस कारवाँ के स्वामी, सार्थवाह शुचिनाम ने कहा—
“हे राजपुत्री! हम इस वन में किसी मनुष्य को नहीं देखते।
हम लाभ के लिए चेदि देश के राजा सुबाहु के नगर की ओर जा रहे हैं।”
इस प्रकार हे राजन्, नल की खोज में भटकती हुई, असह्य दुःख सहकर भी आशा को हृदय में संजोए, दमयंती उस जन-समूह के साथ आगे बढ़ चली—अपने भाग्य की अगली परीक्षा की ओर।
चतुर्दश अध्याय : विपत्ति की रात्रि और आश्रय का प्रभात
महर्षि बृहदश्व बोले—
हे राजन् युधिष्ठिर!
पति के दर्शन की लालसा से व्याकुल, निर्दोष अंगों वाली दमयंती ने जब सार्थवाह के वचन सुने, तब वह उसी व्यापारी-जनसमूह के साथ चल पड़ी। बहुत दिनों तक यात्रा करने के पश्चात वे एक ऐसे भयानक वन में पहुँचे, जहाँ चारों ओर कल्याणरूप पद्म-सौगंधिक नाम का एक विशाल सरोवर था। वह सरोवर रमणीय था—घास और ईंधन से परिपूर्ण, नाना प्रकार के पुष्पों से सुशोभित, असंख्य पक्षियों से सेवित, निर्मल और मधुर शीतल जल से भरा हुआ।
थके हुए पशु, ऊँट, घोड़े और मनुष्यों ने वहाँ विश्राम करने का निश्चय किया। सार्थवाह की अनुमति से संध्या होते-होते वह जनसमूह सरोवर के समीप ठहर गया। धीरे-धीरे रात्रि का सन्नाटा फैल गया। थकान से चूर सब लोग निद्रा में लीन हो गए।
उसी समय पर्वतीय नदी की ओर से मद से उन्मत्त हाथियों का एक विशाल झुंड जल पीने के लिए आ पहुँचा। उन्होंने दूर से ही मनुष्यों, पशुओं और पालतू हाथियों को देखा। बस फिर क्या था—वन के वे महाकाय गजराज क्रोध और मद से भर उठे। पहाड़ से टूटे शिलाखंडों की भाँति वे वेग से दौड़े।
उनके पैरों से वन के मार्ग टूट गए, सरोवर का तट रौंदा गया। जो सो रहे थे, जो जाग रहे थे—सब पर अकस्मात मृत्यु टूट पड़ी। हाहाकार मच गया। कोई सूँड से कुचला गया, कोई दाँतों से फाड़ा गया, कोई पैरों तले रौंद दिया गया। ऊँट, घोड़े, रथ—सब नष्ट हो गए। भयभीत लोग वृक्षों पर चढ़ने लगे, पर वहाँ से भी गिर पड़े। चारों ओर केवल चीख-पुकार, भगदड़ और मृत्यु का तांडव था।
“भागो! बचाओ!”
“यह रत्नों की थैली है, इसे छोड़ दो!”
“यह साधारण धन है, मेरा वचन सत्य है!”
ऐसी व्यर्थ पुकारों के बीच भी कोई न बच सका। दैवयोग से वह समृद्ध जनसमूह क्षण भर में नष्ट हो गया। आकाश, पृथ्वी और दिशाएँ उस भयानक कोलाहल से काँप उठीं।
उस कोलाहल में भय से दमयंती की आँख खुल गई। उसने ऐसा दृश्य देखा, जैसा उसने कभी स्वप्न में भी न देखा था। कमलनयनी भय से थरथराती हुई उठ खड़ी हुई। जो थोड़े-से लोग किसी प्रकार बच निकले थे, वे विलाप करने लगे—
“यह किस कर्म का फल है?
क्या हमने यक्षराज मणिभद्र और कुबेर की पूजा नहीं की?
क्या शकुनों का फल विपरीत था?”
तभी कुछ हीन बुद्धि वाले लोग चिल्ला उठे—
“यह वही उन्मत्त-सी स्त्री है, जो इस जनसमूह में आई थी!
इसी ने यह भयानक माया रची है!
निश्चय यह राक्षसी है, पिशाचिनी है!
इसी के कारण यह विनाश हुआ!”
वे क्रोध से भर उठे और बोले—
“इसे पत्थरों, लकड़ियों और मुट्ठियों से मार डालो!”
उनके उन दारुण वचनों को सुनकर दमयंती लज्जा, भय और शोक से भर उठी। वह सबको छोड़कर वन की ओर भाग गई। भागते हुए वह विलाप करने लगी—
“आश्चर्य है! क्या ईश्वर मुझ पर अत्यंत कुपित हैं?
मैंने शरीर, मन और वाणी से किसी का भी अशुभ नहीं किया—फिर यह कैसा कर्मफल है?
निश्चय यह किसी पूर्वजन्म का महापाप है।”
वह अपने दुःख गिनाने लगी—
“पति का राज्य छिन गया, सज्जनों से पराजय हुई,
पति से वियोग हुआ, पुत्रों से बिछुड़ना पड़ा,
अनाथ होकर सर्पों और हिंसक पशुओं से भरे वन में वास मिला—
इन सब दुःखों का अंत कहाँ है?”
प्रभात होने पर जो लोग बचे थे, वे अपने मृत पिता, पुत्र, भाई और मित्रों का शोक करते हुए उस स्थान से चले गए। दमयंती ने भी मन ही मन कहा—
“मेरे दुर्भाग्य से यह जनसमूह हाथियों के झुंड से नष्ट हुआ।
निश्चय मेरे लिए अभी और दीर्घ दुःख शेष हैं।
बिना दैव के कोई कर्म फलित नहीं होता।”
इस प्रकार विलाप करती हुई वह शेष बचे वेदपारग ब्राह्मणों के साथ चल पड़ी।
कुछ ही समय बाद, जैसे शरद् ऋतु की निर्मल चंद्रकला प्रकट होती है, वैसे ही उसने चेदि देश के राजा सुबाहु के सुंदर नगर—चंदेरी—को देखा। सायंकाल के समय, अर्धवस्त्रधारिणी, कृश और दीन, उन्मत्त-सी चलती हुई दमयंती नगर में प्रवेश कर गई।
नगरवासी उसे देखकर चकित रह गए। बालक कौतूहल से उसके पीछे-पीछे चल पड़े। वह राजभवन के समीप पहुँची। महल की छत पर खड़ी राजमाता ने उस विलक्षण रूप वाली स्त्री को देखा और धात्री से कहा—
“इसे मेरे पास लाओ।
यह शरणार्थिनी है, पर इसका रूप मेरे घर को प्रकाशित कर रहा है।”
दमयंती को ऊपर लाया गया। राजमाता ने आश्चर्य से पूछा—
“तू कौन है?
आभूषणों से रहित होते हुए भी तेरा रूप दिव्य है।
तू न भयभीत है, न विचलित—निश्चय तू साधारण स्त्री नहीं।”
दमयंती ने हाथ जोड़कर कहा—
“मुझे पति-व्रता सैरंध्री दासी जानो।
मैं फल-मूल खाकर और जहाँ संध्या होती है वहाँ ठहरने वाली हूँ।
मेरा पति द्यूत में पराजित होकर वन को गया, और मैं उसके पीछे चली।
दैववश उसने अपना वस्त्र भी त्याग दिया।
मैं उसी प्रिय प्रभु को खोजती फिर रही हूँ, पर अब तक उन्हें नहीं पा सकी।”
यह कहते-कहते उसके नेत्र अश्रुओं से भर गए।
राजमाता का हृदय द्रवित हो उठा। उसने कहा—
“हे कल्याणी! मेरे पास रहो।
मेरे पुरुष तुम्हारे पति को ढूँढेंगे।
यहीं रहकर तुम अपने स्वामी को पाओगी।”
दमयंती ने विनय से उत्तर दिया—
“हे माता! मैं आपके पास नियमपूर्वक रहूँगी—
उच्छिष्ट भोजन नहीं करूँगी,
किसी पुरुष से बात नहीं करूँगी।
यदि कोई मुझे अनुचित दृष्टि से देखे, तो वह दंडनीय हो।
पर मैं ब्राह्मणों से अपने पति के विषय में पूछ सकूँ—बस यही मेरी प्रार्थना है।”
राजमाता अत्यंत प्रसन्न हुई। उसने अपनी पुत्री सुनंदा से कहा—
“यह देवी-तुल्य सैरंध्री तुम्हारी सखी होगी।
तुम दोनों साथ रहो और आनंद करो।”
सखियों से घिरी हुई सुनंदा दमयंती को अपने साथ गृह में ले आई। वहाँ दमयंती का सत्कार हुआ। राजभवन में, सभी सुविधाओं के बीच, उद्वेग से मुक्त होकर—पर हृदय में नल की स्मृति संजोए—दमयंती वहाँ निवास करने लगी।
इस प्रकार हे राजन्, घोर विपत्तियों के बाद दमयंती को आश्रय मिला, और उसके भाग्य में आशा का एक नया दीप प्रज्वलित हुआ।
पंचदश अध्याय : कर्कोटक नाग और नल का रूपांतर
महर्षि वृहदश्व बोले—
हे राजन् युधिष्ठिर!
दमयंती को वन में छोड़कर जब राजा नल अकेले गहन अरण्य में भटक रहे थे, तब उनके हृदय में अपराध-बोध और पीड़ा की अग्नि धधक रही थी। उसी समय उन्होंने वन के मध्य एक भयानक दावानल को देखा। चारों ओर लपटें उठ रही थीं, वृक्ष जल रहे थे, पशु-पक्षी व्याकुल होकर इधर-उधर भाग रहे थे।
उसी दावानल के भीतर से एक करुण किंतु तीव्र स्वर बार-बार सुनाई दिया—
“हे पवित्र यश वाले राजा नल! दौड़ो… दौड़ो… मुझे बचाओ… मत भय करो!”
राजा नल क्षणभर के लिए ठिठके, परंतु क्षत्रिय हृदय भय को नहीं जानता। उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा—
“मत भय कर! मैं आ रहा हूँ।”
यह कहकर वे धधकती अग्नि के बीच निर्भीक होकर प्रवेश कर गए। अग्नि की ज्वालाएँ मानो उनके तेज से पीछे हट गईं। अग्नि-कुंड के मध्य उन्होंने देखा—एक विशाल सर्पराज कुंडली बाँधकर शयन कर रहा था। उसका शरीर काँप रहा था, नेत्र भय से भरे थे।
उस नाग ने काँपते हुए, हाथ जोड़कर कहा—
“हे राजन्! मुझे कर्कोटक नाम का नाग जानो। मैंने तपस्वी ब्रह्मर्षि नारद का अपमान कर दिया था। उनके कोप से मुझे शाप मिला है—
‘तू जड़ के समान यहीं पड़ा रहेगा, जब तक राजा नल तुझे यहाँ से उठाकर बाहर न ले जाए।’
हे निषधनाथ! उस शाप के कारण मैं एक भी पद चलने में समर्थ नहीं हूँ। यदि आप मेरी रक्षा करेंगे, तो मैं आपका सखा बनूँगा और आपके कल्याण का उपदेश दूँगा।”
यह कहकर कर्कोटक अंगूठे के समान छोटा हो गया। राजा नल ने उसे अपनी हथेली पर रखा और तीव्र गति से दावानल से बाहर निकल आए। जैसे ही वे अग्नि से रहित शीतल प्रदेश में पहुँचे, नाग शाप-मुक्त होकर अपने वास्तविक तेजस्वी रूप में प्रकट हुआ।
कर्कोटक ने कृतज्ञ होकर कहा—
“हे महाबाहु! आपने मुझे मुक्त किया है। अब मैं आपके परम कल्याण का उपाय करूँगा। आप कुछ दूर तक मेरे कहे अनुसार गिनती करते हुए चलिए।”
नल गिनती करने लगे। जैसे ही वे दसवें पद पर पहुँचे, कर्कोटक ने उन्हें डस लिया। क्षणभर में राजा नल का शरीर विकृत हो गया—वर्ण बदल गया, तेज छिप गया, राजसी रूप विलीन हो गया।
नल विस्मित होकर अपने बदले हुए स्वरूप को देखने लगे। तभी कर्कोटक नाग प्रकट हुआ और बोला—
“हे नल! भय मत करो। यह विकार तुम्हारे कल्याण के लिए है। अब तुम्हें कोई पहचान नहीं पाएगा।
जिस पापकर्म के कारण तुम इस दुःख को प्राप्त हुए हो, वही दैत्य—कलि—मेरे विष के प्रभाव से तुम्हारे शरीर में पीड़ित होकर वास करेगा। जब तक यह विष तुम्हारे अंगों में रहेगा, तब तक वही दुःखी रहेगा, तुम नहीं।
तुम्हें विष की पीड़ा नहीं होगी, न शत्रुओं का भय, न संग्राम में पराजय। ब्रह्मज्ञानियों तक से तुम्हें कोई भय नहीं होगा।”
फिर कर्कोटक ने आगे कहा—
“अब तुम ‘वाहुक’ नाम से विख्यात होओगे। अयोध्या नगरी में इक्ष्वाकु कुलोत्पन्न राजा ऋतुपर्ण के पास जाओ। वह अक्ष-विद्या में निपुण है। तुम उसे अश्व-विद्या सिखाओगे और बदले में वह तुम्हें पाशों (जुए) की विद्या देगा।
समय आने पर तुम्हारी बुद्धि प्रखर होगी, भाग्य जागेगा और तुम पुनः अपनी पत्नी, राज्य और पुत्रों को प्राप्त करोगे। यह सत्य है—शोक मत करो।”
इतना कहकर कर्कोटक ने एक दिव्य वस्त्रों का जोड़ा दिया और बोला—
“जब कभी तुम अपना वास्तविक स्वरूप देखना चाहो, मेरा स्मरण करना और इन वस्त्रों को धारण करना। उसी क्षण तुम्हारा निज रूप प्रकट हो जाएगा।”
हे कौरव राज!
यह उपदेश देकर, दिव्य वस्त्र प्रदान करके, नागराज कर्कोटक वहीं अंतर्धान हो गया। और राजा नल—अब वाहुक—भाग्य के रहस्यमय पथ पर आगे बढ़ चले, यह जानते हुए कि यह अंधकार भी अंततः प्रकाश की ओर ही ले जाएगा।
षोडश अध्याय : वाहुक के रूप में राजा नल का अज्ञातवास
महर्षि बृहदश्व बोले—
हे राजन् युधिष्ठिर!
जब नागराज कर्कोटक उपदेश देकर और दिव्य वस्त्र प्रदान करके अंतर्धान हो गया, तब राजा नल—अब अपने वास्तविक स्वरूप से रहित—गहन विचारों में डूबे आगे बढ़ चले। उनका शरीर विकृत था, तेज छिपा हुआ था, पर हृदय में वही राजधर्म, वही करुणा और वही दमयंती के प्रति अटूट प्रेम विद्यमान था।
दिन बीतते गए। वन, ग्राम और निर्जन मार्गों को पार करते हुए दसवें दिन वे अयोध्या-नगरी के समीप पहुँचे, जहाँ इक्ष्वाकु कुल में उत्पन्न, अक्ष-विद्या में निपुण राजा ऋतुपर्ण राज्य करते थे। नगर के द्वार पर पहुँचते ही नल ने अपने मन को स्थिर किया—आज से वे राजा नहीं, सेवक हैं; पति नहीं, विरही हैं; विजेता नहीं, भाग्य-परीक्षा के पथिक हैं।
नगर में प्रवेश कर वे सीधे राजसभा की ओर गए। वहाँ उन्होंने अत्यंत विनम्र स्वर में कहा—
“हे राजन्! मेरा नाम वाहुक है। मैं घोड़ों को साधने और शीघ्र गति से चलाने में पृथ्वी पर अनुपम हूँ। रथ-चालन, अश्व-विद्या और कठिन कार्यों में मेरी बुद्धि कुशल है। यदि आप कृपा करें, तो मैं आपके यहाँ सेवक रूप में निवास करना चाहता हूँ।”
ऋतुपर्ण ने वाहुक को ध्यान से देखा। उसका वेश साधारण था, रूप विकृत था, पर आँखों में असामान्य तेज और वाणी में आत्मविश्वास था। राजा बोले—
“हे वाहुक! तुम्हारा कल्याण हो। मैं सदा ऐसे सेवक की खोज में रहता हूँ, जो मेरे घोड़ों को अतिशीघ्र चलाने में समर्थ हो। यदि तुम इस कार्य में निपुण हो, तो आज से तुम मेरे अश्वाध्यक्ष हो।”
फिर उन्होंने आगे कहा—
“तुम्हारा वेतन प्रति मास दस सहस्र सुवर्ण होगा। वार्ष्णेय और जीवन नामक मेरे सूत सदा तुम्हारे साथ रहेंगे। तुम उन्हीं के साथ प्रीतिपूर्वक निवास करोगे।”
इस प्रकार राजा नल—वाहुक के नाम से—ऋतुपर्ण के नगर में बस गए। बाहर से वे एक साधारण सेवक थे, पर भीतर से उनका हृदय दमयंती के वियोग में निरंतर जल रहा था।
दिन में वे अश्वों की देखभाल करते, उन्हें साधते, रथों की गति का अभ्यास कराते। घोड़े उनके संकेत मात्र से दौड़ पड़ते। ऋतुपर्ण अचंभित होकर सोचते—“यह पुरुष साधारण नहीं है।”
परंतु रात्रि आते ही नल का मन किसी भी कार्य में नहीं लगता। जब सारा नगर निद्रा में डूब जाता, तब वाहुक एकांत में बैठकर दमयंती का स्मरण करते। उनकी आँखों से आँसू बहते, कंठ अवरुद्ध हो जाता।
प्रतिदिन सायंकाल वे एक ही श्लोक का उच्चारण करते—
“वह भूख और प्यास से पीड़ित, थकी हुई तपस्विनी अब कहाँ सोती होगी?
किसे स्मरण करती होगी?
किसके सहारे वह अपने जीवन को धारण किए होगी?”
उनकी करुण वाणी सुनकर पास ही बैठा जीवन—जो ऋतुपर्ण का विश्वस्त सूत था—एक दिन पूछ ही बैठा—
“हे वाहुक! तुम प्रतिदिन रात्रि में किसी स्त्री का शोक करते हो। मैं यह जानना चाहता हूँ—वह कौन है? किसकी पत्नी है, जिसके लिए तुम्हारा हृदय इतना व्याकुल है?”
यह सुनकर नल कुछ क्षण मौन रहे। फिर उन्होंने अपने आँसू छिपाते हुए उत्तर दिया—
“हे जीवन! वह किसी मंदबुद्धि पुरुष की पत्नी है। वह स्त्री बहुमती थी, पर उस पुरुष की बुद्धि दृढ़ न थी। किसी कारणवश उस मूढ़ ने उसका त्याग कर दिया।
वियोग से पीड़ित वह पुरुष दिन-रात शोक में जलता है, पृथ्वी पर भटकता है, और रात्रि में उसी का स्मरण कर श्लोक गाता है।”
कुछ रुककर वे आगे बोले—
“वह स्त्री कष्टों से घिरी हुई, उस पुरुष के पीछे-पीछे वन में चली गई। परंतु वह अल्प-पुण्य पुरुष उसे वहाँ त्याग आया।
भूख और प्यास से पीड़ित, मार्गों से अनभिज्ञ, अकेली वह अब भी जीवित है—यह जानना ही उस पुरुष के लिए असह्य पीड़ा है।”
नल की वाणी और भी करुण हो उठी—
“हे श्रेष्ठ! वह मंदबुद्धि पुरुष स्वयं को धिक्कारता है कि उसने उस निष्पाप स्त्री को भयानक वन में, हिंस्र पशुओं के बीच छोड़ दिया।
वह जानता है कि वह स्त्री इस दुःख के योग्य नहीं थी, फिर भी उसके कर्मों ने ऐसा परिणाम दिया।”
जीवन यह सब सुनकर स्तब्ध रह गया। वह समझ गया कि वाहुक का हृदय किसी साधारण स्त्री के लिए नहीं, बल्कि किसी महान और पतिव्रता नारी के लिए रो रहा है।
इस प्रकार राजा नल—दमयंती के स्मरण में डूबे हुए—ऋतुपर्ण के यहाँ अज्ञातवास करने लगे। बाहर से वे अश्वाध्यक्ष थे, भीतर से विरही पति।
दिन कर्म में बीतता, रात शोक में।
पर उनके हृदय में एक विश्वास जीवित था—
यह अंधकार सदा नहीं रहेगा।
एक दिन सत्य प्रकट होगा,
दमयंती से मिलन होगा,
और यह पीड़ा ही उस मिलन की भूमिका बनेगी।
हे राजन् युधिष्ठिर!
इस प्रकार धर्मात्मा राजा नल, अपने ही भाग्य से पराजित होकर भी, धैर्य और प्रेम का दीप जलाए हुए अज्ञातवास में स्थित रहे।
सप्तदश अध्याय : दमयंती की पहचान और आशा का दीप
महर्षि बृहदश्व बोले—
हे राजन् युधिष्ठिर!
जब राजा नल का राज्य नष्ट हो गया और वे अपनी प्रिय भार्या दमयंती सहित दासत्व और वनवास के दुःख में पड़ गए, तब विदर्भराज भीम का हृदय अत्यंत व्याकुल हो उठा। पुत्री के वियोग ने उनके प्राणों को जैसे जकड़ लिया था। न दिन में शांति थी, न रात्रि में निद्रा। हर क्षण उन्हें यही चिंता खाए जाती थी—
“मेरी दमयंती कहाँ होगी? नल किस दशा में होंगे?”
राजा भीम ने निश्चय किया कि अब विलंब उचित नहीं। उन्होंने अनेक विद्वान, तेजस्वी और विश्वसनीय ब्राह्मणों को बुलाया। उन्हें भरपूर धन दिया, सम्मानपूर्वक आसन पर बैठाया और गंभीर स्वर में कहा—
“हे द्विजोत्तमो! तुम सब चारों दिशाओं में जाओ। राजा नल और मेरी पुत्री दमयंती को खोजो।
जो मुझे दोनों को यहाँ ले आएगा, उसे मैं सहस्र गौ दान करूँगा, नगरों के समान ग्राम प्रदान करूँगा।
और यदि कोई उन्हें यहाँ न ला सके, परंतु उनका समाचार निश्चित रूप से दे दे, तो उसे भी सहस्र गौ का दान दूँगा।”
राजा के ये वचन सुनकर ब्राह्मण अत्यंत प्रसन्न हुए। वे आशीर्वाद देकर अलग-अलग दिशाओं में निकल पड़े। कोई पर्वतों की ओर गया, कोई वनों में भटका, कोई नगर-नगर खोज करता रहा।
परंतु न राजा नल मिले, न दमयंती।
बहुत समय बीत गया।
उसी खोज में लगे ब्राह्मणों में एक थे—सुदेव। वे विदर्भ के परिचित, बुद्धिमान और सूक्ष्म दृष्टि वाले ब्राह्मण थे। खोज करते-करते वे रम्यपुरी चंदेरी पहुँचे। वहाँ के राजमहल में उन्होंने एक दृश्य देखा जिसने उनके हृदय को कंपा दिया।
राजमहल के अंतःपुर में, राजमाता की सेवा में एक सैरंध्री (दासी) खड़ी थी—नाम था सुनंदा के साथ रहने वाली वह स्त्री।
उसका वेश साधारण था, शरीर कृश हो चला था, मुख पर तेज मलिन पड़ा हुआ था।
परंतु उसके नेत्र… वे नेत्र असाधारण थे—विशाल, कमल के समान, करुणा और शोक से भरे हुए।
सुदेव उसे देखते ही ठिठक गए।
उन्होंने मन ही मन विचार किया—
“यह स्त्री साधारण नहीं हो सकती। यह वही है… वही दमयंती!”
उन्होंने ध्यान से देखा।
जैसे धुएँ से ढका सूर्य अपनी प्रभा नहीं खोता, वैसे ही दुःख और दासत्व के आवरण में भी उसका सौंदर्य दबा नहीं था।
वह ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो कीचड़ में लिपटी कमलिनी हो—स्वयं मलिन, पर मूलतः दिव्य।
जैसे पूर्णिमा का चंद्रमा राहु से ग्रस्त हो जाए, वैसे ही पति-वियोग से उसका तेज ढँक गया था।
सुदेव के मन में एक-एक कर उपमाएँ उमड़ने लगीं—
“यह वही है—
जो कभी लक्ष्मी के समान शोभायमान थी,
जो पूर्णचंद्र के समान जगत को प्रकाश देने वाली थी,
आज वही बिना आभूषण के, बिना हर्ष के, बिना पति के, सूखी नदी के समान प्रतीत हो रही है।”
उनका हृदय द्रवित हो उठा। वे सोचने लगे—
“निश्चय ही स्त्री का परम भूषण उसका पति होता है।
भूषणों के बिना भी स्त्री शोभा पा सकती है,
पर पति के बिना उसका सौंदर्य भी शोक में बदल जाता है।”
उन्होंने दृढ़ निश्चय कर लिया—
“यह विदर्भराज की पुत्री, निषधराज नल की पत्नी दमयंती ही है।”
सुदेव ने मन ही मन संतोष की श्वास ली—
“आज मैं कृतार्थ हुआ। इस दुखियारी चंद्रकला को पहचान पाया।”
उन्होंने यह भी सोचा—
“नल अत्यंत धैर्यवान है, जो ऐसी भार्या से वियोग सहकर भी जीवित है।
पर यह दुःख सदा नहीं रहेगा।
जैसे रोहिणी चंद्रमा से मिलती है, वैसे ही दमयंती नल से अवश्य मिलेगी।”
फिर वे साहस बटोरकर धीरे-धीरे दमयंती के समीप गए और कोमल स्वर में बोले—
“हे देवी!
मैं तुम्हारे पति राजा नल का मित्र सुदेव ब्राह्मण हूँ।
राजा भीम के आदेश से तुम्हें खोजता हुआ यहाँ पहुँचा हूँ।”
यह सुनते ही दमयंती का धैर्य टूट गया।
वर्षों से रुका हुआ आँसुओं का वेग फूट पड़ा।
वह सुदेव के चरणों में गिर पड़ी और फूट-फूटकर रोने लगी।
“हे ब्राह्मणदेव!
मेरे माता-पिता कुशल हैं न?
मेरे भाई-बहन… सब ठीक हैं न?”
सुदेव ने उसे उठाया, सांत्वना दी और कहा—
“हे रानी!
तुम्हारे माता-पिता, भाई-बहन—सब कुशल हैं।
पर तुम्हारे वियोग में वे सब निर्जीव के समान हो गए हैं।
सैकड़ों ब्राह्मण पृथ्वी पर भटक रहे हैं, केवल तुम्हारी खोज में।”
दमयंती यह सुनकर और अधिक विलाप करने लगी।
सुनंदा ने उसे इस प्रकार रोते देखा तो राजमाता को सूचना दी—
“माता! यह सैरंध्री किसी ब्राह्मण से मिलकर अत्यंत विलाप कर रही है। इसमें कोई गूढ़ रहस्य प्रतीत होता है।”
राजमाता स्वयं वहाँ आईं। उन्होंने सुदेव को बुलाकर पूछा—
“हे विप्र!
यह स्त्री कौन है?
किसकी पत्नी है या किसकी पुत्री?
ऐसी सुंदर और सती स्त्री इस दशा को कैसे पहुँची?”
तब सुदेव ने शांत स्वर में, विस्तारपूर्वक दमयंती और राजा नल का संपूर्ण वृत्तांत सुनाया—
स्वयंवर, प्रेम, राज्य, जुआ, वनवास, वियोग—सब कुछ।
यह सुनकर राजमाता भी शोकाकुल हो उठीं।
महर्षि बृहदश्व बोले—
हे युधिष्ठिर!
इस प्रकार दमयंती की पहचान हुई।
अंधकार के बीच आशा का दीप जला।
अब मिलन का मार्ग प्रशस्त होने लगा था,
और दुःख की रात्रि धीरे-धीरे समाप्ति की ओर बढ़ रही थी।
अष्टादश अध्याय : दमयंती की पहचान, विदर्भ-गमन और नल की खोज
महर्षि वृहदश्व बोले—
हे राजन् युधिष्ठिर!
जब सुदेव ब्राह्मण ने चंदेरी के राजभवन में दमयंती को पहचान लिया, तब उसने राजमाता और राजकुमारी सुनंदा के समक्ष स्पष्ट शब्दों में कहा—
“यह कोई साधारण सैरंध्री नहीं है।
विदर्भ देश के प्रतापी राजा भीम की यह पुत्री है, जिसका नाम दमयंती है।
और निषध देश के वीर राजा नल—वीरसेन के पुत्र—इनके पति हैं।
राजा नल द्यूत-क्रीड़ा में पराजित होकर राज्य से वंचित हो गए और दमयंती को साथ लेकर वन में चले गए। उसके बाद वे दोनों किसी को दिखाई नहीं दिए।
हम ब्राह्मण इन्हीं दमयंती की खोज में समस्त पृथ्वी पर भटक रहे हैं, और सौभाग्य से यह देवी आपके पुत्र के भवन में मिली है।”
सुदेव आगे बोला—
“इस संसार में इस स्त्री के समान रूपवती कोई दूसरी मानुषी नहीं है।
इसके शरीर पर जो यह ‘पिप्पिलु’ (जन्मचिह्न) है, यही इसकी सच्ची पहचान है।
मैंने इसे पहले भी देखा है—कमल के समान उज्ज्वल, पर आज दुःख के मल से ढका हुआ, जैसे बादलों से ढका चंद्रमा।
ईश्वर ने इसे ऐश्वर्य का चिह्न बनाकर रचा है, परंतु अभी इसका तेज पूर्ण प्रकट नहीं हो रहा, जैसे कृष्ण पक्ष में चंद्रकला।
बिना श्रृंगार के भी यह सुवर्ण के समान दमकती है।
जैसे धूप से ढकी अग्नि अपने तेज को नहीं खोती, वैसे ही दुःख से ढकी यह देवी भी अपने स्वरूप को नहीं खो सकती।”
सुदेव के ये वचन सुनकर सुनंदा ने स्वयं आगे बढ़कर दमयंती के शरीर से मलिनता दूर की।
जैसे ही जन्मचिह्न स्पष्ट हुआ, वह चंद्रमा के समान चमक उठा—मानो आकाश से बादल हट गए हों।
राजमाता और सुनंदा उसे देखकर रो पड़ीं।
उन्होंने दमयंती को गले लगा लिया और कुछ समय तक मौन खड़ी रहीं।
फिर राजमाता ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से कहा—
“वत्से! तू मेरी भगिनी की पुत्री है।
तेरी माता और मैं—दोनों दशार्ण देश के राजा सुदामा की पुत्रियाँ हैं।
मेरी बहन का विवाह विदर्भराज भीम से हुआ और मेरा विवाह वीरबाहु से।
तुझे मैंने बचपन में अपने पिता के घर देखा था।
आज तू मेरे घर आई है—यह मेरा सौभाग्य है।
जैसा तेरा पिता का घर है, वैसा ही यह घर भी तेरा है।
यहाँ का ऐश्वर्य तेरा ही है।”
दमयंती ने अत्यंत विनय और कृतज्ञता से कहा—
“माता!
आपके संरक्षण में मैं सब कामनाओं से तृप्त हूँ।
आपके स्नेह से मुझे परदेश में भी अपने घर जैसा सुख मिला है।
परंतु मेरा हृदय शांत नहीं है।
मेरे दोनों पुत्र विदर्भ में हैं—पिता और माता से वंचित, शोक से पीड़ित।
यदि आप मुझसे प्रेम करती हैं, तो मुझे शीघ्र विदर्भ लौटने की आज्ञा दें।”
राजमाता ने उसकी वेदना समझ ली।
उन्होंने अपने पुत्र से अनुमति ली और बड़ी सेना के संरक्षण में दमयंती को विदर्भ भेजने की व्यवस्था की।
उत्तम वाहन, सुंदर वस्त्र, भोजन और सेवक—सब प्रदान किए गए।
कुछ ही समय में दमयंती विदर्भ पहुँची।
अपने माता-पिता, भाई-बहनों और दोनों पुत्रों को कुशल देखकर उसका हृदय भर आया।
राजा भीम और रानी ने उसे प्रेम से आलिंगन किया।
देवताओं और ब्राह्मणों का विधिपूर्वक पूजन किया गया।
राजा भीम ने प्रसन्न होकर सुदेव ब्राह्मण को सहस्र गौ, धन और ग्राम दान दिए।
उस रात्रि दमयंती अपने पिता के भवन में विश्राम करने के बाद प्रातः अपनी माता से बोली—
“माता!
यदि आप सचमुच मुझे जीवित देखना चाहती हैं, तो मैं सत्य कहती हूँ—
राजा नल के बिना मेरा जीवन अधूरा है।
कृपा करके राजा चंदेरी में उनके खोजने का यत्न कीजिए।”
यह सुनकर रानी की आँखों से अश्रु बहने लगे।
वे कुछ बोल न सकीं।
संपूर्ण अंतःपुर में हाहाकार मच गया।
तब दमयंती ने स्वयं अपने पिता राजा भीम से निवेदन किया—
“पिताजी!
मैं अपने पति को खोजे बिना चैन नहीं पा सकती।
कृपा करके ब्राह्मणों को सब दिशाओं में भेजिए।”
राजा भीम ने पुत्री के दुःख से व्याकुल होकर तुरंत आज्ञा दी।
अनेक ब्राह्मण पुनः चारों दिशाओं में भेजे गए।
दमयंती ने उन ब्राह्मणों से कहा—
“जहाँ-जहाँ सत्पुरुष हों, वहाँ यह वचन दोहराना—
‘हे प्रिय! तुमने मेरी अर्धवस्त्र काटकर, मुझे सोती हुई वन में छोड़ दिया—कहाँ चले गए?
वह नारी आज भी उसी प्रकार तुम्हारी बाट देख रही है—धैर्य से, आँसुओं से, प्रेम से।
हे धर्मज्ञ! दया ही परम धर्म है—मेरे प्रति दया करो।’
जो पुरुष इस वचन को सुनकर उत्तर देगा, वही राजा नल है।
उसका उत्तर स्मरण करके मेरे पास लौट आना।”
यह कहकर दमयंती ने उन्हें विदा किया।
हे युधिष्ठिर!
ब्राह्मण नगर-नगर, ग्राम-ग्राम, वन-आश्रमों में गए।
नल कहीं दिखाई नहीं दिए,
पर हर स्थान पर दमयंती का यह करुण संदेश सुनाया गया—
और वही संदेश आगे चलकर नल और दमयंती के पुनर्मिलन का कारण बना।
इस प्रकार दुःख की कथा अब आशा की ओर बढ़ने लगी।
एकोनविंश अध्याय : दमयंती की युक्ति और नल के पुनर्मिलन की भूमिका
महर्षि वृहदश्व बोले—
हे धर्मराज युधिष्ठिर!
समय सदा एक-सा नहीं रहता। जैसे रात्रि के बाद प्रभात निश्चित है, वैसे ही घोर दुःख के पश्चात आशा का दीपक अवश्य प्रज्वलित होता है। दमयंती के जीवन में भी ऐसा ही एक क्षण आया, जब लंबे विरह और अनंत प्रतीक्षा के बाद भाग्य ने करवट ली।
बहुत समय बीत चुका था। विदर्भ की राजकुमारी दमयंती अपने पिता राजा भीम के भवन में रहकर भी भीतर से वनवासी ही थी। शरीर महलों में था, पर मन नित्य उसी निर्जन अरण्य में भटकता, जहाँ उसे नल ने अचेत अवस्था में छोड़ दिया था। दिन-रात उसके नेत्र मार्ग की ओर लगे रहते, कान किसी समाचार की प्रतीक्षा में थके रहते, और हृदय—हृदय तो केवल नल के नाम से ही धड़कता था।
उसी समय पर्णाद नामक एक वृद्ध ब्राह्मण विदर्भ पहुँचा। उसके मुख पर यात्रा की थकान थी, पर नेत्रों में एक विचित्र चमक—मानो वह कोई महत्वपूर्ण समाचार लेकर आया हो। वह सीधे दमयंती के पास पहुँचा और विनयपूर्वक बोला—
“हे राजकुमारी!
मैं वही ब्राह्मण हूँ जिसे आपने राजा नल की खोज के लिए भेजा था। आपकी आज्ञा से मैं अयोध्या नगरी पहुँचा और वहाँ इक्ष्वाकु कुल के राजा ऋतुपर्ण के समीप रहा।
वहीं, मैंने आपके द्वारा दिए गए वे करुण वचन—जैसे आपने कहे थे—वैसे ही महाजन के बीच दोहराए।”
दमयंती का हृदय धड़क उठा। उसने अधीर स्वर में पूछा—
“फिर? क्या राजा ऋतुपर्ण ने कुछ कहा? क्या किसी ने उत्तर दिया?”
पर्णाद ने गहरी साँस ली और बोला—
“राजकुमारी, राजा ऋतुपर्ण ने वे वचन सुने, पर उन्होंने कोई उत्तर नहीं दिया। सभा में उपस्थित अन्य सभासद भी मौन रहे।
परंतु… एक व्यक्ति था, जिसने उन वचनों को सुनकर विचित्र व्यवहार किया।”
दमयंती के नेत्र फैल गए।
“कौन?”
पर्णाद बोला—
“राजा ऋतुपर्ण का एक सूत है—वाहुक नाम का।
वह रूप से विरूप, कद से कुछ छोटा, पर घोड़ों को चलाने में अद्भुत कुशल है।
वह भोजन बनाता है तो उसमें एक अलग ही माधुर्य होता है, और अश्वों को इस प्रकार हाँकता है मानो वे उसके विचार समझते हों।”
यह सुनते ही दमयंती का हृदय जैसे किसी अदृश्य संकेत को पहचान गया।
पर्णाद आगे बोला—
“हे देवी!
आपके वचनों को सुनते ही वह वाहुक बार-बार करवट बदलने लगा।
उसने गहरी साँसें लीं, नेत्रों में जल भर आया।
फिर वह मेरे पास आया, बार-बार मेरा कुशल पूछने लगा, और अंत में ऐसे वचन बोला, जिन्हें सुनकर मेरा हृदय काँप उठा।”
दमयंती ने हाथ जोड़ लिए—
“हे द्विजश्रेष्ठ! कृपा करके उसके शब्द ज्यों के त्यों कहिए।”
पर्णाद ने गंभीर स्वर में कहा—
“उस वाहुक ने कहा—
‘कुलीन स्त्रियाँ चाहे कितने ही संकटों में पड़ जाएँ, स्वयं अपनी रक्षा करती हैं।
जो स्त्री सत्य पर अडिग रहती है, वही स्वर्ग को जीतती है—इसमें संशय नहीं।
श्रेष्ठ स्त्रियाँ पति से वियोग में भी क्रोध नहीं करतीं, क्योंकि उनके प्राणों का कवच पति का चरित्र होता है।’
फिर उसने कहा—
‘जो स्त्री भूखी-प्यासी, वस्त्रहीन, मन से पीड़ित होकर भी अपने पतित, राज्यहीन और व्यसनग्रस्त पति को देखकर क्रोध नहीं करती—वही सच्ची साध्वी है।
ऐसी स्त्री उस पति पर कोप करने योग्य नहीं है, जिसने अज्ञानवश उसे त्याग दिया।’”
यह कहते-कहते पर्णाद की वाणी भी भर्रा गई।
“हे देवी!
ये वचन सुनकर मुझे निश्चय हो गया कि वह व्यक्ति साधारण नहीं है।
उसके शब्दों में ऐसा दर्द था, ऐसा पश्चाताप, जो केवल वही जान सकता है जिसने स्वयं उस अपराध को किया हो।”
यह सुनते ही दमयंती के नेत्रों से अश्रुधारा बह चली।
वह उठी, अपनी माता के पास गई और एकांत में बोली—
“हे माता!
अब मुझे पूर्ण विश्वास है—नल जीवित हैं।
और वे अयोध्या में ही हैं।
परंतु यदि पिता स्वयं राजा भीम उनसे मिलने जाएँ, तो नल संकोचवश सामने नहीं आएँगे।
मुझे एक युक्ति करनी होगी।”
माता ने स्नेह और चिंता से उसे देखा—
“कौन-सी युक्ति, पुत्री?”
दमयंती ने दृढ़ स्वर में कहा—
“मैं सुदेव ब्राह्मण को पुनः अयोध्या भेजूँगी।
जैसे पहले उन्होंने मुझे वहाँ से यहाँ लाया, वैसे ही अब वे नल को वहाँ से यहाँ लाएँगे।
हे माता! यदि आप सचमुच मेरा हित चाहती हैं, तो इस योजना में मेरा साथ दीजिए।”
माता ने दमयंती की आँखों में वही अटल निश्चय देखा, जो कभी स्वयंवर में था।
उन्होंने मौन में ही स्वीकृति दे दी।
दमयंती ने पर्णाद ब्राह्मण का विधिपूर्वक पूजन किया—स्वर्ण, वस्त्र और धन देकर।
फिर उसने कहा—
“हे द्विजोत्तम!
आज आपने जो कार्य किया है, वैसा कोई दूसरा नहीं कर सकता।
नल के आने पर मैं आपको और अधिक दान दूँगी।
आपका यह उपकार मैं जीवन भर नहीं भूलूँगी।”
पर्णाद ने आशीर्वाद दिया और प्रसन्न मन से अपने गृह को लौट गया।
इसके बाद दमयंती ने सुदेव ब्राह्मण को बुलाया।
वह स्वयं उनके सामने आई और बोली—
“हे सुदेव!
आप मेरे परम हितैषी हैं।
अब बिना विलंब किए अयोध्या नगरी जाइए।
वहाँ राजा ऋतुपर्ण से कहिए—
‘विदर्भराज भीम की पुत्री दमयंती पुनः स्वयंवर करने जा रही है।
समस्त राजाओं और राजकुमारों को आमंत्रण है।
स्वयंवर का समय कल प्रातः सूर्य उदय के पश्चात निश्चित है।’”
सुदेव चौंक पड़े—
“कल? इतनी शीघ्रता क्यों, देवी?”
दमयंती ने भारी स्वर में कहा—
“क्योंकि मैं नहीं जानती कि नल जीवित हैं या नहीं।
यदि वे जीवित हैं, तो यह समाचार सुनकर वे अवश्य आएँगे।
और यदि नहीं… तो मेरा यह जीवन भी व्यर्थ है।”
फिर उसने कहा—
“हे अरिंदम!
आपको शीघ्रता से जाना होगा—इतनी शीघ्रता से कि घोड़े भी थक जाएँ।
राजा ऋतुपर्ण को यह समाचार ठीक वैसे ही सुनाइए, जैसे मैं कह रही हूँ—एक शब्द भी कम या अधिक नहीं।”
सुदेव ने हाथ जोड़कर कहा—
“देवी! आपकी आज्ञा मेरे लिए धर्म है।”
और वह तुरंत अयोध्या के लिए प्रस्थान कर गया।
हे युधिष्ठिर!
जब सुदेव अयोध्या पहुँचा और उसने राजा ऋतुपर्ण को दमयंती का संदेश सुनाया, तब राजा चकित रह गया।
परंतु उससे भी अधिक विचलित वह वाहुक हुआ—जिसके हृदय में वर्षों से दबा हुआ अपराध, प्रेम और पश्चाताप एक साथ जाग उठा।
यहीं से नल और दमयंती के पुनर्मिलन की कथा ने नया मोड़ लिया।
जो विरह वर्षों तक असह्य रहा, वही अब मिलन की ओर अग्रसर हुआ।
और धर्म, धैर्य तथा पतिव्रता नारी की बुद्धि ने वह मार्ग प्रशस्त किया, जहाँ भाग्य भी झुकने को विवश हो गया।
—
(यह अध्याय नल–दमयंती के पुनर्मिलन की भूमिका है, जहाँ दमयंती की बुद्धि और प्रेम कथा को निर्णायक मोड़ देते हैं।)
नीचे विंशतिषोऽध्यायारंभः को आधार बनाकर उसे लगभग 1500 शब्दों की प्रवाहपूर्ण कथा के रूप में रूपांतरित किया गया है। भाषा वही भाव-प्रधान, काव्यात्मक और कथा-शैली में रखी गई है, जैसे महर्षि वृहदश्व स्वयं युधिष्ठिर को सुना रहे हों।
विंशतिषोऽध्याय : बाहुक की प्रतिज्ञा और विद्यर्भ-गमन
वृहदश्व बोले—
हे राजन् युधिष्ठिर! सुदेव ब्राह्मण के वचनों को सुनकर राजा ऋतुपर्ण के अंतःकरण में एक विचित्र उत्कंठा जाग उठी। दमयंती का नाम सुनते ही उसका हृदय चंचल हो गया, मानो किसी अदृश्य शक्ति ने उसे विदर्भ की ओर खींच लिया हो। उसने उसी क्षण अपने समीप स्थित बाहुक की ओर दृष्टि डाली, जो सिर झुकाए मौन खड़ा था—बाहुक, जिसके भीतर नल की ज्वाला धधक रही थी, परंतु बाहर से वह केवल एक सूत मात्र प्रतीत होता था।
ऋतुपर्ण ने अत्यंत कोमल और सांत्वनापूर्ण वाणी में कहा—
“हे बाहुक! तू अश्वविद्या का पारंगत ज्ञाता है। यदि तू स्वीकार करे, तो मैं एक ही दिन में विदर्भ देश पहुँचना चाहता हूँ। दमयंती के स्वयंवर का समाचार सुना है—वहाँ मुझे अवश्य पहुँचना है।”
राजा के ये शब्द सुनते ही बाहुक का हृदय जैसे विदीर्ण हो गया। भीतर छिपा राजा नल करुण क्रंदन करने लगा, पर मुख पर संयम का आवरण था। वह सोचने लगा—
“क्या यह दमयंती का कोई और उपाय है? क्या वह मुझे खोजने के लिए यह स्वयंवर रच रही है, या सचमुच किसी और को वरण करने का निश्चय कर चुकी है? यदि वह तपस्विनी, पतिव्रता, दुःख सहने वाली स्त्री है, तो वह ऐसा कैसे कर सकती है? और यदि ऐसा है, तो यह मेरा ही दोष है—मेरा अपराध, मेरा पाप, जिसने उसे इस मार्ग पर ढकेल दिया।”
उसके हृदय में शोक, ग्लानि और दया—तीनों का संग्राम चल रहा था। वह स्वयं को धिक्कारने लगा—
“हाय! मैंने उसे निर्जन वन में त्याग दिया। भूख-प्यास से पीड़ित, भयभीत, अकेली—वह किस सहारे जीवित रही होगी? यदि उसने यह स्वयंवर मेरे लिए किया है, तो मैं उसे पहचानने अवश्य जाऊँगा; और यदि वह किसी और के लिए है, तो भी सत्य जानना आवश्यक है।”
इस निश्चय के साथ बाहुक ने दोनों हाथ जोड़कर कहा—
“हे राजन! आपकी आज्ञा शिरोधार्य है। यदि आप चाहें, तो मैं एक ही दिन में विदर्भ नगरी पहुँचा सकता हूँ।”
ऋतुपर्ण प्रसन्न हुआ। उसने तुरंत अश्वशाला जाने की आज्ञा दी। बाहुक वहाँ पहुँचा और घोड़ों की परीक्षा करने लगा। उसने एक-एक घोड़े को देखा—उनकी आँखें, नासिका, वक्ष, पृष्ठ, चरण, भौंरियाँ—सब कुछ सूक्ष्म दृष्टि से परखा। अंततः उसने चार ऐसे घोड़े चुने जो साधारण दृष्टि में दुर्बल प्रतीत होते थे, परंतु जिनमें वायु के समान वेग और अद्भुत सहनशक्ति थी।
राजा ऋतुपर्ण यह देखकर क्रोधित हो उठा।
“बाहुक! ये तो दुर्बल और अल्पप्राण से प्रतीत होते हैं। ऐसे घोड़े मुझे विदर्भ कैसे ले जाएँगे? वह भी अशब्द मार्ग से, जहाँ किसी को हमारे जाने का ज्ञान न हो!”
बाहुक शांत स्वर में बोला—
“हे राजन! जिन घोड़ों के ललाट पर एक भौंरी, दोनों पार्श्वों पर दो-दो, वक्ष पर दो और पृष्ठ पर एक भौंरी होती है—वे कभी मार्ग में विफल नहीं होते। ये ही घोड़े विदर्भ ले जाने में समर्थ हैं। जिन अन्य घोड़ों को आप श्रेष्ठ मानते हैं, वे इस कार्य में असफल होंगे।”
ऋतुपर्ण ने कुछ क्षण विचार किया। उसे बाहुक की वाणी में ऐसा आत्मविश्वास और विद्या का प्रकाश दिखाई दिया कि उसने अपना संशय त्याग दिया।
“हे बाहुक! तू ही अश्वतत्त्व का ज्ञाता है। जो तू उचित समझे, वही कर।”
तब नल—अर्थात् बाहुक—ने उन चार घोड़ों को रथ में जोड़ा। राजा ऋतुपर्ण रथ पर आरूढ़ हुआ। वाष्र्णेय भी वहाँ उपस्थित था। जैसे ही रथ आगे बढ़ा, वे घोड़े मानो पृथ्वी को स्पर्श ही न करते हों—वे उछलते, उड़ते, वायु को चीरते हुए आगे बढ़ने लगे।
घोड़ों का ऐसा वेग देखकर ऋतुपर्ण विस्मय से भर गया।
“यह कैसा अद्भुत दृश्य है!” वह मन ही मन सोचने लगा।
वाष्र्णेय तो और भी अधिक चकित था। वह बाहुक की ओर देखता और विचार करता—
“क्या यह देवराज इंद्र का सारथि मातलि है? या अश्वशास्त्र के प्रवर्तक शालिहोत्र स्वयं? अथवा… कहीं यह राजा नल तो नहीं?”
वह बाहुक के स्वरूप को देखता—विकृत देह, अस्त-व्यस्त केश—और फिर उसकी विद्या, संयम, धैर्य और करुणा को स्मरण करता।
“नल और बाहुक का ज्ञान एक-सा है। नल और बाहुक का धैर्य एक-सा है। केवल रूप में भेद है। क्या यह दैव की लीला है कि महात्मा इस पृथ्वी पर गुप्त रूप में विचरते हैं?”
उसका हृदय संदेह और श्रद्धा—दोनों से भर उठा।
रथ निरंतर वेग से आगे बढ़ता रहा। वन, पर्वत, नदियाँ—सब पीछे छूटते गए। सूर्य जैसे थम गया हो और पृथ्वी जैसे सिमट गई हो। राजा ऋतुपर्ण बाहुक के कौशल से अत्यंत प्रसन्न हुआ। उसके हृदय में बाहुक के प्रति सम्मान उत्पन्न हो गया।
वह सोचने लगा—
“ऐसा सारथि मैंने आज तक नहीं देखा। इसका संयम, इसकी दृष्टि, इसका ज्ञान—सब अद्भुत है।”
और उधर बाहुक—नल—हर क्षण दमयंती के स्मरण में डूबा था। रथ की गति जितनी तीव्र थी, उसके हृदय की व्यथा उतनी ही गहन। वह विदर्भ की ओर नहीं, मानो अपने प्रारब्ध की ओर बढ़ रहा था—जहाँ या तो पुनर्मिलन था, या अंतिम परीक्षा।
वृहदश्व बोले—
हे युधिष्ठिर! इस प्रकार राजा ऋतुपर्ण बाहुक के अद्भुत कौशल से आनंदित होकर विदर्भ की ओर बढ़ा, और नल—अपने ही भाग्य के रथ पर आरूढ़—धैर्य, मौन और आशा के सहारे आगे बढ़ता रहा।
यही उस अध्याय का सार है—जहाँ मनुष्य की विद्या, नियति और प्रेम—तीनों एक साथ परीक्षा देते हैं।
यदि आप चाहें, तो अगले अध्याय को भी इसी शैली में क्रमशः कथा-रूप में लिख सकता हूँ, या इसे काव्यात्मक / नाट्य रूप में भी परिवर्तित किया जा सकता है।
नीचे एकोविशतितमोऽध्यायारंभः को आधार बनाकर उसे लगभग 1500 शब्दों की भावपूर्ण, प्रवाहशील कथा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। शैली वही रखी गई है—जैसे महर्षि वृहदश्व स्वयं युधिष्ठिर को कथा सुना रहे हों, जिसमें कथा, संवाद, भाव और दर्शन—all एक साथ प्रवाहित हों।
एकोविशतितमोऽध्याय
अक्षहृदय की प्राप्ति और कलि का निर्गमन
वृहदश्व बोले—
हे धर्मराज युधिष्ठिर! जब राजा नल बाहुक के रूप में उन वायु के समान वेगवान घोड़ों को प्रेरित करता हुआ रथ पर आरूढ़ था, तब वह मानो पृथ्वी पर नहीं, आकाश में चल रहा हो। पर्वत, वन, नदियाँ और सरोवर—सब पक्षियों की भाँति लाँघे जाते थे। जहाँ सामान्य यात्रियों को कई दिन लगते, वहाँ वे क्षणों में पहुँच जाते। रथ की गति इतनी तीव्र थी कि दिशाएँ पीछे छूटती प्रतीत होती थीं।
ऐसे ही एक क्षण में, तीव्र वेग से चलते रथ में राजा ऋतुपर्ण का उत्तरीय वस्त्र वायु के झोंके से ढीला होकर नीचे गिर पड़ा। राजा ने उसे गिरते देखा और चकित होकर पुकार उठा—
“हे बाहुक! रथ रोको, रथ रोको! मेरा उत्तरीय गिर गया है। मैं उसे स्वयं लेने जाऊँगा।”
नल ने विनम्र किंतु दृढ़ स्वर में उत्तर दिया—
“हे राजन! आपका वस्त्र एक योजन दूर जा गिरा है। इस वेग में उसे वापस लाना संभव नहीं। समय नष्ट होगा और विदर्भ पहुँचने में विलंब होगा।”
राजा कुछ क्षण मौन रहा। फिर उसकी दृष्टि वन के भीतर स्थित एक विशाल विभीतक वृक्ष पर पड़ी, जो फलों से लदा हुआ था। उसी क्षण उसके मन में एक विचार जागा। वह बाहुक की ओर देखकर बोला—
“हे सूत! आज मैं तुम्हें अपनी एक विद्या दिखाना चाहता हूँ। संसार में कोई भी सर्वज्ञ नहीं होता, और न ही एक ही मनुष्य में समस्त विद्याओं की पराकाष्ठा होती है। देखो—इस विभीतक वृक्ष में जितने पत्ते और फल हैं, और जितने भूमि पर गिरे हैं, सबकी संख्या मुझे ज्ञात है।”
बाहुक ने विस्मय से उसकी ओर देखा।
राजा ऋतुपर्ण ने आगे कहा—
“इस वृक्ष में कुल एक सौ एक फल हैं। इनमें एक फल ऐसा है जिसमें एक पत्ता अधिक है। इसकी दोनों मुख्य शाखाओं में पाँच करोड़ पत्ते हैं। यदि इन दोनों शाखाओं की उपशाखाओं को गिनो, तो उनमें दो हजार पंचानवे फल हैं।”
यह सुनकर बाहुक रथ से उतर पड़ा। उसके मुख पर गंभीरता छा गई। वह बोला—
“हे शत्रुकर्षण! आप परोक्ष बात कह रहे हैं। संख्या का सत्य प्रत्यक्ष से ही जाना जाता है। मैं इस वृक्ष को निष्पत्र कर दूँगा और आपके कथन की परीक्षा करूँगा। वाष्र्णेय! एक मुहूर्त रथ की बागडोर थामे रहो।”
राजा ऋतुपर्ण को विलंब अच्छा नहीं लगा। वह बोला—
“हे बाहुक! यह समय ठहरने का नहीं है। स्वयंवर का क्षण समीप है।”
परंतु बाहुक शांत रहा।
“हे राजन! थोड़ी प्रतीक्षा से सत्य का प्रकाश होगा। यदि आप शीघ्रता करेंगे, तो मार्ग का कल्याण न होगा।”
ऋतुपर्ण ने बाहुक की वाणी में अद्भुत विश्वास और अधिकार देखा। उसने सांत्वना देते हुए कहा—
“हे बाहुक! तू ही इस पृथ्वी पर श्रेष्ठ है। तेरे कारण ही मैं विदर्भ जाना चाहता हूँ। तू जो चाहे, वही करो। जो मुझे सूर्य के दर्शन से पहले विदर्भ पहुँचा दे, वही मेरा रक्षक है।”
तब बाहुक ने कहा—
“पहले विभीतक वृक्ष की संख्या पूर्ण होगी, फिर विदर्भ गमन होगा।”
अनिच्छा से ही सही, राजा ने सहमति दी।
नल ने कुल्हाड़ी उठाई और उस विशाल वृक्ष को काट डाला। पत्ते, फल, शाखाएँ—सब अलग किए गए। राजा ऋतुपर्ण स्वयं गिनती करने लगा। जितना वह गिनता, उतना ही उसका आश्चर्य बढ़ता जाता। अंततः उसने विस्मित होकर कहा—
“हे सज्जन! जैसा तुमने कहा था, ठीक उतनी ही संख्या है। यह अद्भुत है!”
उसका हृदय विस्मय और आदर से भर गया।
“हे बाहुक! यह कौन-सी विद्या है, जिसके द्वारा तुम ऐसा कह सके? मैं उसे जानना चाहता हूँ।”
बाहुक ने गंभीर स्वर में कहा—
“हे पुरुषोत्तम! यदि आप मुझे यह विद्या देंगे, तो मैं आपसे अश्वहृदय विद्या ग्रहण करना चाहता हूँ।”
राजा ऋतुपर्ण समझ गया कि यह सामान्य सूत नहीं है। उसने कार्य की महत्ता और अश्वविद्या के लाभ को देखकर कहा—
“तथास्तु! मैं तुम्हें अक्षहृदय—अर्थात् संख्या और जुए का परम रहस्य—देता हूँ। और तुम मुझसे अश्वहृदय ग्रहण करो।”
जैसे ही ऋतुपर्ण ने वह विद्या नल को प्रदान की, उसी क्षण नल के शरीर से तीव्र विष का वमन होने लगा। नागराज कर्कोटक के विष से जो कलि देवता नल के शरीर में स्थित था, वह पीड़ा से कराहता हुआ बाहर निकल आया। वर्षों से जो मूढ़ता, ज्वर और भ्रम नल को घेरे हुए था, वह उसी क्षण समाप्त होने लगा।
कलि काँपता हुआ, भयभीत और कृतांजलि होकर नल के सामने खड़ा हो गया।
“हे राजेंद्र! क्रोध मत करो। मैं शरणागत हूँ। जब तुमने दमयंती को त्यागा, तब इंद्रसेन की माता के शाप से मैं पीड़ित हुआ। नागराज के विष से दिन-रात जलता हुआ तुम्हारे शरीर में वास करता रहा। यदि तुम मुझे शाप न दोगे, तो मनुष्य लोक में तुम्हारी कीर्ति का विस्तार होगा। जो तुम्हारी शरण में आएगा, उसे मेरे भय से कष्ट न होगा।”
नल ने उसे देखा। उसके हृदय में क्रोध उठा, परंतु करुणा ने उसे रोक लिया।
“जा, मैं तुझे शाप नहीं देता।”
यह कहकर उसने अपने को संयमित किया। उसी क्षण कलि काँपता हुआ विभीतक वृक्ष में प्रवेश कर गया और नल से अलग हो गया। उस दिन से वह वृक्ष कलियुग के स्पर्श के कारण अधम माना गया।
कलि के निकलते ही राजा नल ज्वर से मुक्त हो गया। उसकी बुद्धि स्वच्छ हो गई, तेज लौट आया। केवल उसका रूप ही अभी विकृत था। वह पुनः रथ पर आरूढ़ हुआ। वेगवान घोड़े फिर से वायु के समान दौड़ने लगे। नल पक्षियों की भाँति उछलते घोड़ों को प्रेरित करता हुआ, अत्यंत प्रसन्न मन से विदर्भ पुरी की ओर चल पड़ा।
उधर कलि भी अपने लोक को लौट गया।
वृहदश्व बोले—
हे युधिष्ठिर! इस प्रकार राजा नल कलि के बंधन से मुक्त हुआ। उसका तेज, उसकी बुद्धि और उसका भाग्य फिर जाग उठा। केवल बाह्य रूप शेष था—जो शीघ्र ही बदलने वाला था।
यही उस अध्याय की कथा है—जहाँ विद्या के आदान-प्रदान से भाग्य बदलता है, और जहाँ धैर्य से ही मुक्ति का द्वार खुलता है।
यदि आप चाहें, तो अगले अध्याय में
👉 दमयंती–नल का पुनर्मिलन,
👉 रूप परिवर्तन की कथा,
👉 या नाट्य रूपांतरण / काव्य रूप
भी इसी शैली में प्रस्तुत कर सकता हूँ।
नीचे द्वाविंशतितमोऽध्यायारंभः को आधार बनाकर उसे लगभग 1500 शब्दों की प्रवाहशील, भावप्रधान कथा के रूप में रूपांतरित किया गया है। शैली वही रखी गई है—जैसे महर्षि वृहदश्व स्वयं युधिष्ठिर को कथा सुना रहे हों, जिसमें वर्णन, संवाद, अंतःसंघर्ष और करुणा एक साथ प्रवाहित हों।
द्वाविंशतितमोऽध्याय
रथ-नाद और दमयंती का जाग्रत हृदय
वृहदश्व बोले—
हे धर्मराज युधिष्ठिर! कलि के बंधन से मुक्त होकर, परंतु अभी भी बाह्य रूप से परिवर्तित राजा नल, बाहुक के वेष में, राजा ऋतुपर्ण के साथ उस संध्या समय विदर्भ देश की सीमा में पहुँचे। सूर्य अस्ताचल की ओर झुक चुका था और आकाश में लालिमा फैल रही थी। उसी समय नगर के प्रहरी और नागरिकों ने उस अद्भुत रथ को आते देखा, जिसकी गर्जना ने दिशाओं और विदिशाओं को नादित कर दिया।
नगर में यह समाचार शीघ्र फैल गया कि कोशलाधिपति, सत्य पराक्रमी राजा ऋतुपर्ण, विदर्भ की राजधानी कुंडिनपुर में प्रवेश कर रहे हैं। महाराज भीम को यह सूचना दी गई। उनके आदेश से नगरद्वार खुले और वह रथ, जो मानो मेघ की गर्जना के समान शब्द करता हुआ चला आ रहा था, कुंडिनपुर में प्रविष्ट हुआ।
जैसे ही रथ का वह गूढ़, गंभीर और वेगपूर्ण नाद नगर में गूँजा, एक विचित्र घटना घटी।
राजा नल के हाथों में पले, प्रशिक्षित और उनके स्पर्श के अभ्यस्त घोड़े—जो वर्षों से विदर्भ में थे—उस शब्द को सुनते ही चौंक उठे। वे हिनहिनाने लगे, मानो अपने स्वामी को पहचान गए हों। ठीक उसी प्रकार जैसे पूर्वकाल में, जब राजा नल स्वयं रथ हाँकते थे, ये घोड़े उनके संकेत मात्र से सजग हो उठते थे।
उसी क्षण राजमहल के अंतःपुर में स्थित दमयंती ने भी उस रथ-नाद को सुना।
वह ध्वनि साधारण नहीं थी। वह नाद ऐसा था जैसे वर्षा के आगमन से पूर्व आकाश में मेघ गरजते हैं—गंभीर, भरपूर और हृदय को कंपित करने वाला। दमयंती का शरीर काँप उठा। उसका हृदय जैसे उसी क्षण किसी भूले हुए सत्य को पहचान गया।
उसने विस्मय और उत्कंठा से कहा—
“यह रथ-शब्द… यह ध्वनि… मेरे चित्त को वैसे ही भर रही है, जैसे कभी नल का रथ भरता था। यह वही नाद है, जो पृथ्वी को ही नहीं, मेरे हृदय को भी पूर्ण कर देता था। यह नल ही है… निश्चय ही यह नल है!”
महल की ऊँची अटारियों पर बैठे मोर उस नाद को सुनकर पंख फैलाकर नृत्य करने लगे। हाथी, जो शालाओं में बँधे थे, सूँड उठाकर चिंघाड़ने लगे। अश्व भी अपने खुर पटकने लगे। मानो संपूर्ण कुंडिनपुर ने उस रथ को पहचान लिया हो।
दमयंती का मन व्याकुल हो उठा।
“यदि आज मैं उस चंद्रमुख, असंख्य गुणों से युक्त, सिंह-विक्रम वीर नल को नहीं देख पाई,” उसने स्वयं से कहा,
“तो मेरा जीवन व्यर्थ हो जाएगा। यदि मैं आज उन भुजाओं के मध्य प्रवेश न कर सकी, जिनका स्पर्श मेरे लिए जीवन था, तो मेरा अस्तित्व ही न रहेगा।”
उसकी आँखों से अश्रु बहने लगे।
“यदि वह नल—जो अग्नि के समान तेजस्वी है—मुझ तक नहीं पहुँचा, तो मैं स्वयं अग्नि में प्रवेश कर लूँगी। यदि वह मतवाले गज के समान पराक्रमी राजा नल आज मेरे सामने नहीं आया, तो निश्चय ही मेरा अंत समीप है।”
विलाप करते हुए भी दमयंती के स्वर में सत्य की दृढ़ता थी।
“मैंने कभी असत्य नहीं कहा, न किसी का अपकार स्मरण किया। मैंने कभी अपने वचन की मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। मेरा स्वामी नल क्षमावान है, दानी है, और स्त्रियों के मध्य भी सत्पुरुषों के समान मर्यादा में रहने वाला है। उसी के गुणों का स्मरण करते हुए मेरा हृदय दिन-रात शोक से फटा जाता है।”
इस प्रकार विलाप करती हुई दमयंती, नल के दर्शन की उत्कट इच्छा से, महल की ऊँची छत पर चढ़ गई।
वहाँ से उसने देखा—
राजा ऋतुपर्ण मध्यम कक्षा में रथ पर बैठे हैं। उनके साथ वाष्र्णेय हैं और वही बाहुक—जो रूप में साधारण, किंतु आभा में विलक्षण प्रतीत हो रहा था।
कुछ ही क्षणों में वाष्र्णेय और बाहुक रथ से उतरे। उन्होंने शास्त्र-विधि से घोड़ों को खोला और रथ को रथशाला की ओर ले गए। राजा ऋतुपर्ण भी रथ से उतरकर महाराज भीम के समीप पहुँचे।
राजा भीम ने उनका भव्य स्वागत किया। यथोचित पूजा, सत्कार और आदर के साथ उन्हें महल में प्रवेश कराया। कुंडिनपुर में रहते हुए राजा ऋतुपर्ण ने चारों ओर दृष्टि डाली, पर न तो स्वयंवर की कोई तैयारी दिखी, न राजाओं का समागम, न ब्राह्मणों की चहल-पहल।
महाराज भीम ने औपचारिकता से पूछा—
“आपका आगमन शुभ है। क्या कोई विशेष प्रयोजन है?”
परंतु राजा ऋतुपर्ण ने दमयंती के स्वयंवर का कोई उल्लेख नहीं किया। न उन्होंने किसी पुत्री के विषय में बात की, न विवाह की। यह देख महाराज भीम स्वयं भी मन में विचार करने लगे—
“यह राजा सौ योजन से अधिक मार्ग एक ही दिन में तय कर यहाँ पहुँचा है। इसका कारण अवश्य ही साधारण नहीं है, किंतु अभी इसे प्रकट नहीं कर रहा। समय आने पर सत्य प्रकट होगा।”
इस विचार से उन्होंने ऋतुपर्ण को विदा नहीं किया, बल्कि आग्रहपूर्वक कहा—
“आप थके होंगे। विश्राम करें।”
सत्कृत और प्रसन्न राजा ऋतुपर्ण, सेवकों के साथ निर्दिष्ट भवन में विश्राम के लिए चले गए।
इधर, वाष्र्णेय के साथ ऋतुपर्ण के चले जाने पर, बाहुक रथ को लेकर रथशाला पहुँचा। उसने घोड़ों को विधिपूर्वक जल पिलाया, चारा दिया, उनकी सेवा की और फिर रथ के उपस्थ पर बैठ गया।
उधर दमयंती ने—राजा ऋतुपर्ण को, वाष्र्णेय को और उस रूपवान बाहुक को देखकर—गहन चिंता में डूब गई।
“यदि यह रथ-नाद नल का ही था,” उसने मन में विचार किया,
“तो नल कहाँ है? क्या वाष्र्णेय ने ही वह विद्या सीख ली है, जिससे रथ का शब्द नल के समान हो गया? अथवा यह ऋतुपर्ण ही नल के समान सामर्थ्यवान है? या फिर… यह बाहुक…”
उसकी दृष्टि बार-बार बाहुक पर ठहर जाती थी।
“आश्चर्य है,” उसने सोचा,
“यह रथ-नाद नल के समान है, यह राजा ऋतुपर्ण भी नल के तुल्य है, और यह बाहुक… इसके स्वरूप में कुछ तो ऐसा है, जो मेरे हृदय को विचलित कर रहा है।”
इस प्रकार तर्क और शंका में डूबी हुई, पर आशा से जीवित, दमयंती ने निश्चय किया—
“सत्य को जाने बिना मैं चैन नहीं लूँगी।”
तत्क्षण उसने एक विश्वासपात्र दूती को बुलाया और नल—अर्थात् बाहुक—के विषय में पता लगाने के लिए भेज दिया।
वृहदश्व बोले—
हे युधिष्ठिर! इस प्रकार रथ-नाद ने दमयंती के हृदय में सुप्त आशा को जगा दिया। पहचान अभी शेष थी, परंतु सत्य अब अधिक दूर नहीं था। अगले अध्याय में नल और दमयंती का वह साक्षात्कार होगा, जो वर्षों के वियोग को समाप्त करेगा।
यदि आप चाहें, तो अगले चरण में मैं
👉 दूती और बाहुक का संवाद,
👉 दमयंती की परीक्षा,
👉 नल की पहचान का क्षण,
👉 या पुनर्मिलन का भावुक अध्याय
इसी शैली में प्रस्तुत कर सकता हूँ।
नीचे त्रयोविंशतितमोऽध्याय को आधार बनाकर उसे लगभग 1500 शब्दों की प्रवाहपूर्ण, भावनात्मक और कथा-शैली में रूपांतरित किया गया है। भाषा वही रखी गई है—जैसे महर्षि वृहदश्व स्वयं युधिष्ठिर से करुण, रहस्यमयी और उत्कंठा से भरी कथा कह रहे हों।
त्रयोविंशतितमोऽध्याय
दूती–संवाद और नल का अश्रुपूरित हृदय
वृहदश्व बोले—
हे धर्मराज युधिष्ठिर! जब विदर्भ पुरी में उस अद्भुत रथ का नाद गूँजा और दमयंती का हृदय अनजानी पहचान से काँप उठा, तब उसने निश्चय किया कि अब संशय को और नहीं सहा जा सकता। नारी का हृदय जब सत्य को पहचान लेता है, तब वह संकेतों से आगे बढ़कर प्रत्यक्ष प्रमाण चाहता है।
दमयंती ने अपनी विश्वासपात्र, बुद्धिमती और चतुर दूती केशिनी को बुलाया। उसकी आँखों में व्याकुलता थी, स्वर में अधीरता और हृदय में वर्षों का संचित शोक।
दमयंती बोली—
“हे केशिनी! सावधान होकर जाओ और जानो कि यह विचित्र वेषधारी बाहुक, जो रथ के उपस्थ पर बैठा है, वास्तव में कौन है। हे अनिंदिते! उसके समीप जाकर मधुर और सुसंस्कृत वाणी में उसकी कुशल पूछो। मेरे हृदय में प्रबल शंका है—कहीं यह वही राजा नल तो नहीं?”
उसने क्षण भर रुककर गहरी साँस ली।
“मेरे मन की तृप्ति और हृदय की शांति उसी सत्य में निहित है। और हे सुश्रेणि! अंत में, जैसे पर्णाद ब्राह्मण ने जिन वचनों का संकेत दिया था, उन्हें भी कथा के अंत में कहना। जो उत्तर वह दे, उसे सूक्ष्मता से समझना।”
दमयंती स्वयं महल की ऊपरी अटारी पर खड़ी हो गई, जहाँ से वह सब कुछ देख और सुन सकती थी। उसका हृदय धड़क रहा था, जैसे कोई खोया हुआ स्वप्न जागने ही वाला हो।
केशिनी सावधानी से चली और रथशाला पहुँची। वहाँ बाहुक शांत भाव से बैठा था—साधारण वस्त्र, किंतु असाधारण संयम। केशिनी ने आदरपूर्वक कहा—
“हे नरेंद्र! आपका आगमन शुभ हो। मैं आपकी कुशल पूछती हूँ। हे पुरुषोत्तम! दमयंती के मंगल वचनों को स्वीकार करें। आप यहाँ किस कारण से आए हैं और कहाँ से पधारे हैं—न्याय और सत्य के अनुसार बताइए। दमयंती यह सब जानना चाहती हैं।”
बाहुक ने सिर झुकाकर उत्तर दिया। उसका स्वर संयत था, पर भीतर कहीं कंपन था।
“महात्मा कोशलाधिपति राजा ऋतुपर्ण ने ब्राह्मणों से सुना कि कल विदर्भ में दमयंती का दूसरा स्वयंवर होने वाला है। यह समाचार सुनकर वे शत योजन की दूरी एक ही दिन में तय करने को उद्यत हुए। वायु के समान वेगवान अश्वों के द्वारा वे यहाँ आए हैं, और मैं उनका सारथी हूँ।”
केशिनी ने बाहुक को ध्यान से देखा। उसके शब्दों में असत्य नहीं था, पर सत्य भी अधूरा था।
उसने आगे पूछा—
“तुम्हारे साथ जो यह तीसरा पुरुष है—वाष्र्णेय—वह कौन है? तुम स्वयं किसके पुत्र हो? और यह कर्म—सारथ्य और पाककला—तुम में कैसे प्रतिष्ठित हुआ?”
बाहुक का हृदय क्षण भर को काँप उठा, फिर वह बोला—
“हे भद्रे! यह वाष्र्णेय, पवित्र यश वाले राजा नल का सारथी था। नल के वनवास और गुप्त गमन के पश्चात वह राजा ऋतुपर्ण के पास आ गया। मैं भी अश्व-विद्या में निपुण हूँ और राजा ऋतुपर्ण के यहाँ भोजन बनाने के कार्य में नियुक्त हूँ।”
केशिनी की आँखें और तीक्ष्ण हो गईं।
“क्या वाष्र्णेय जानता है कि राजा नल कहाँ हैं? या तुम जानते हो, हे बाहुक?”
बाहुक ने गहरी साँस ली।
“वाष्र्णेय, नल के पुत्र और पुत्री को विदर्भ में छोड़कर अपने मार्ग चला गया था। वह भी नहीं जानता कि राजा निषध कहाँ हैं। हे यशस्विनी! कोई भी पुरुष नल को नहीं जानता। वह इस लोक में नष्ट-रूप होकर गुप्त विचरण कर रहा है। केवल उसकी प्रिया ही उसे पहचान सकती है। नल कभी अपने चिह्न स्वयं प्रकट नहीं करता।”
केशिनी को अब निर्णायक प्रश्न करना था। उसने वही वचन दोहराए, जो ब्राह्मणों द्वारा नगर-नगर में कहे गए थे—दमयंती के हृदय की पुकार।
“हे छलिया! तुम कहाँ हो? जिसने मेरे अर्द्ध वस्त्र को काटकर, मुझ अनुरक्त प्रिया को सोते हुए वन में छोड़ दिया—वह कहाँ गया? वह स्त्री, जैसी तुमने देखी थी, वैसी ही आज भी अर्द्ध वस्त्र में, दिन-रात प्रतीक्षा करती हुई, भूख-प्यास और शोक से दग्ध है। हे वीर पार्थिव! उस निरंतर रुदन करने वाली प्रिया के उत्तर को कहो। कृपा करो। दमयंती वही उत्तर फिर सुनना चाहती है, जो तुमने पूर्वकाल में दिया था।”
वृहदश्व बोले—
हे कुरुनंदन! जैसे ही केशिनी ने वे शब्द दोहराए, बाहुक का हृदय चीर दिया गया। वर्षों से रोके गए भाव बाँध तोड़कर उमड़ पड़े। उसकी आँखों से अश्रु बहने लगे। वह राजा, जिसने असंख्य युद्ध जीते थे, आज अपने ही मन से हार गया।
काँपती हुई वाणी में उसने वही उत्तर दोहराया—वही, जो केवल नल का हृदय जानता था।
“कुलीन स्त्रियाँ, जो धर्म में स्थित होती हैं, स्वयं अपनी रक्षा करती हैं। उनसे ही सत्य स्वर्ग जीता जाता है—इसमें संशय नहीं। भर्ता से रहित होकर भी वे कभी क्रोध नहीं करतीं। जिन स्त्रियों के प्राणों का कवच उनके पति का चरित्र होता है, वे उस मूढ़, विषम अवस्था में पड़े, सुखहीन पति पर भी क्रोध करने योग्य नहीं होतीं।”
उसकी आवाज़ और भर्रा गई।
“वह श्यामा, जो वस्त्र-हरण से पीड़ित, मन की व्यथा से दग्ध है, वह भी क्रोध के योग्य नहीं। सकृत अथवा असकृत—किसी भी अवस्था में—अष्ट लक्ष्मी से हीन, भूखे और व्यसन में डूबे पति को देखकर भी वह क्रोध नहीं करती।”
यह कहते-कहते नल अपने अश्रुओं को रोक न सका। उसका वक्ष सिसकियों से भर गया। वह सिर झुकाकर रो पड़ा—राजा होकर भी, पति होकर भी, आज वह केवल एक अपराधबोध से ग्रस्त मनुष्य था।
केशिनी ने यह दृश्य देखा। उसके नेत्र भी सजल हो उठे। वह समझ गई—यह उत्तर कोई साधारण पुरुष नहीं दे सकता। यह वही है, जिसकी प्रतीक्षा विदर्भ की महारानी कर रही है।
वह शीघ्र लौटी और जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया—सब दमयंती को कह सुनाया।
वृहदश्व बोले—
हे युधिष्ठिर! इस प्रकार शब्दों ने नहीं, अश्रुओं ने नल को पहचान लिया। अभी मिलन शेष था, पर हृदय अब अज्ञात नहीं रहा। अगले अध्याय में दमयंती स्वयं परीक्षा लेगी—और वहीं सत्य पूर्ण रूप से प्रकट होगा।
यदि आप चाहें, तो अगले चरण में मैं
👉 दमयंती द्वारा नल की अंतिम परीक्षा,
👉 अश्व-हृदय और पहचान का क्षण,
👉 नल–दमयंती का पुनर्मिलन (महाकरुण अध्याय)
इसी शैली और विस्तार में प्रस्तुत कर सकता हूँ।
नीचे प्रस्तुत कथा चतुरविंशतितमोऽध्याय को आधार बनाकर लगभग 1500 शब्दों में, प्रवाहपूर्ण, भावनात्मक और कथा-रूप में रूपांतरित की गई है। भाषा शुद्ध, कथात्मक और महाभारतीय शैली के अनुरूप रखी गई है।
चतुरविंशतितमोऽध्याय : अग्नि, जल और प्रेम की परीक्षा
वृहदश्व बोले—
हे धर्मराज युधिष्ठिर!
जब दमयन्ती ने केशिनी के मुख से बाहुक के अद्भुत वचनों और उसके करुण भाव को सुना, तब उसका हृदय आशा और शंका—दोनों से एक साथ भर उठा। एक ओर वह मन ही मन जान चुकी थी कि यह साधारण सूत नहीं हो सकता, दूसरी ओर वर्षों का विरह और छलित भाग्य उसे सावधान कर रहा था।
उसकी आँखों में आँसू थे, पर बुद्धि स्थिर थी। उसने मन में निश्चय किया—
“हृदय का भाव पर्याप्त नहीं, अब कर्मों की परीक्षा होगी।”
दमयन्ती ने केशिनी को समीप बुलाकर मधुर किंतु गंभीर स्वर में कहा—
“हे केशिनी!
अब केवल वचनों से मेरा हृदय संतुष्ट नहीं होता।
तुम पुनः जाओ और इस बाहुक की परीक्षा करो—
पर ऐसी परीक्षा, जिसमें वह स्वयं कुछ न बोले।
उसके कर्मों को देखो, उसकी चेष्टाओं को पहचानो।”
दमयन्ती कुछ क्षण रुकी, फिर और भी गंभीर होकर बोली—
“उसके निकट रहते हुए भी तुम उससे अधिक बोलना नहीं।
न हठ से उसे अग्नि देना,
न बिना कारण जल देना।
जो कुछ वह स्वयं करे—
उसी से उसके भीतर छिपे सत्य को पहचानो।
दैवी और मानवी—
जो भी लक्षण तुम उसमें देखो,
सब मुझसे कहो।”
केशिनी ने सिर झुकाकर आज्ञा स्वीकार की और रसोईगृह की ओर चली गई, जहाँ बाहुक अपने कर्म में तल्लीन था।
बाहुक की मौन परीक्षा
रसोईगृह में प्रवेश करते ही केशिनी ने देखा—
बाहुक शांत, गंभीर और एकाग्र था।
उसके नेत्र झुके हुए थे,
पर उनमें एक ऐसी स्थिर ज्योति थी
जो केवल महान आत्माओं में होती है।
राजा ऋतुपर्ण के लिए अनेक प्रकार के भोजन, पशुओं का मांस और जल के बड़े-बड़े घट लाए गए थे।
केशिनी चुपचाप एक कोने में खड़ी होकर देखने लगी।
उसने देखा—
बाहुक ने बिना किसी दास की सहायता लिए,
एक-एक पात्र को स्वयं उठाया।
जहाँ द्वार संकीर्ण था,
वहाँ वह झुका नहीं—
बल्कि ऐसा प्रतीत हुआ मानो द्वार स्वयं विस्तृत हो गया हो।
जहाँ छोटे पात्र थे,
वहाँ जल ऐसे भर गया
मानो वे पात्र विशाल हों।
यह देखकर केशिनी का हृदय विस्मय से भर उठा।
अग्नि का चमत्कार
इसके बाद बाहुक ने रसोई की तैयारी आरंभ की।
न चूल्हा जलाने को कोई लकड़ी थी,
न अग्नि का कोई स्पष्ट साधन।
तब उसने केवल
एक मुष्टि तृण उठाया
और उसे सूर्य की ओर कर दिया।
क्षणमात्र में—
मानो सूर्य स्वयं उतर आया हो—
अग्नि प्रज्वलित हो उठी।
न धुआँ,
न प्रयास,
न मंत्रोच्चार—
केवल सहज कर्म।
केशिनी विस्मय से काँप उठी।
और इससे भी अधिक आश्चर्य—
बाहुक अग्नि के इतने निकट था,
फिर भी उसका शरीर दग्ध नहीं हुआ।
न हाथ जले,
न वस्त्र।
और जब जल की आवश्यकता हुई—
तो बिना किसी आदेश के
जल स्वयं समीप आ गया।
पुष्पों का रहस्य
इसके बाद बाहुक ने कुछ पुष्प उठाए।
केशिनी ने सोचा—
“अब ये मुरझा जाएँगे।”
पर उसने देखा—
बाहुक ने उन्हें
हथेलियों में लेकर
धीरे-धीरे मर्दन किया।
न फूल कुचले,
न रंग उड़ा।
बल्कि—
वे और अधिक प्रफुल्लित हो उठे,
उनसे सुगंध प्रवाहित होने लगी।
केशिनी समझ गई—
यह साधारण पुरुष नहीं।
दमयन्ती के पास लौटना
वह शीघ्र लौटकर दमयन्ती के पास आई।
उसका मुख आश्चर्य से दमक रहा था।
उसने एक-एक करके
सब वृत्तांत सुनाया—
अग्नि, जल, द्वार, पात्र, पुष्प—
सब।
केशिनी बोली—
“हे दमयन्ती!
ऐसा पुरुष मैंने न पहले देखा,
न शास्त्रों में सुना।
यह जल-स्थल में समान शुद्ध है।
अग्नि इसे दग्ध नहीं करती।
जल इसकी आज्ञा मानता है।
और पुष्प इसके स्पर्श से और भी पवित्र हो जाते हैं।”
दमयन्ती का हृदय काँप उठा।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
वह जान चुकी थी—
यह नल है।
अंतिम परीक्षा : स्वाद की स्मृति
फिर भी, विरह ने उसे पूर्ण निश्चय से रोका।
उसने केशिनी से कहा—
“हे भाविनी!
अब अंतिम परीक्षा शेष है।
रसोईगृह से
बाहुक द्वारा बनाया हुआ
उष्ण मांस यहाँ ले आओ।”
केशिनी शीघ्र गई और
अभी-अभी बना हुआ
उष्ण मांस ले आई।
दमयन्ती ने एक ग्रास लिया।
और—
उसका शरीर काँप उठा।
वही स्वाद,
वही सुगंध,
वही स्पर्श—
जो केवल नल के हाथों में था।
वह फूट-फूटकर रो पड़ी।
संतान और सत्य
दमयन्ती ने अपने अश्रु पोंछे,
मुख धोया
और केशिनी के साथ
अपने पुत्र और पुत्री को भेजा।
जब बाहुक ने उन्हें देखा—
उसका धैर्य टूट गया।
वह आगे बढ़ा,
दोनों को गोद में उठा लिया।
उसकी आँखों से अश्रु
अविरल बहने लगे।
वह ऊँचे स्वर में रोया—
पर शीघ्र स्वयं को सँभाल लिया।
फिर केशिनी से बोला—
“हे भद्रे!
यह जोड़ा
मेरे पुत्र-पुत्री के समान है।
इसलिए इन्हें देखकर
मेरे नेत्र भर आए।
अतिथियों के भाव से
तुम यहाँ आई हो।
सुखपूर्वक जाओ।”
पर केशिनी जान चुकी थी—
यह अश्रु
अभिनय के नहीं,
पिता के थे।
वृहदश्व बोले—
हे युधिष्ठिर!
इस प्रकार कर्मों, चेष्टाओं और प्रेम की
अग्नि-परीक्षा से
दमयन्ती ने नल को पहचान लिया।
जहाँ वाणी मौन थी,
वहाँ कर्म बोले।
जहाँ रूप नष्ट था,
वहाँ प्रेम अटल था।
और वहीं से
विरह का अंत
और पुनर्मिलन का आरंभ हुआ।
यदि चाहें तो मैं
👉 अगला अध्याय (पुनर्मिलन का साक्षात् दृश्य)
👉 संवाद रूप में नल-दमयन्ती की पहचान
👉 या इसे पद्य / काव्य रूप में
भी प्रस्तुत कर सकता हूँ।
नीचे दिया गया पाठ आपके प्रस्तुत पञ्चविंशतितमोऽध्याय को आधार बनाकर पूर्णतः कहानी-रूप में लिखा गया है। यह श्लोकानुवाद या टीका नहीं, बल्कि भावप्रधान, प्रवाहयुक्त, कथात्मक गद्य है—जिसे कोई भी पाठक एक निरंतर कथा की तरह पढ़ सके। शैली वही रखी गई है जो नल–दमयन्ती आख्यान की मर्यादा, करुणा और गरिमा के अनुकूल है।
नल–दमयन्ती : शंका से साक्ष्य तक, विरह से मिलन तक
वृहदश्व बोले—
हे धर्मराज युधिष्ठिर!
जिस प्रकार अग्नि तपाकर सुवर्ण को शुद्ध करती है, उसी प्रकार विपत्ति ने नल और दमयन्ती के प्रेम को तपाकर उज्ज्वल किया। अब वह समय आ पहुँचा था जब शंका का अंधकार साक्ष्य के प्रकाश में विलीन होने वाला था।
केशिनी की अंतिम परीक्षा
दमयन्ती की सखी केशिनी अब तक बाहुक के आचरण, उसकी चेष्टाओं, उसकी मौन गरिमा और असामान्य गुणों को भलीभाँति देख चुकी थी। वह जानती थी कि यह साधारण मनुष्य नहीं हो सकता। उसके भीतर किसी महान आत्मा का वास था, जो विवश होकर मौन ओढ़े हुए थी।
केशिनी ने आकर दमयन्ती से कहा—
“हे देवी! मैंने बाहुक के रूप-विकारों को देखा है, पर उसके भीतर जो तेज है, वह किसी सूत-पुत्र का नहीं। उसका संयम, उसकी पीड़ा, उसकी मौन दृष्टि—सब किसी महान राजा की स्मृति जगाते हैं।”
यह सुनकर दमयन्ती का हृदय और अधिक व्याकुल हो उठा। उसका मुख पीला पड़ गया, नेत्रों में जल भर आया। अब वह केवल अनुमान पर नहीं जी सकती थी। उसे सत्य चाहिए था—भले ही वह सत्य हृदय को चीर दे।
पिता से आज्ञा
दमयन्ती ने दृढ़ स्वर में कहा—
“हे केशिनी! मैं अब और प्रतीक्षा नहीं कर सकती। या तो वह नल है, या नहीं—यह आज स्पष्ट हो जाना चाहिए। तुम मेरी माता के पास जाओ और उनसे कहो कि मैं बाहुक को अपने भवन में बुलाना चाहती हूँ। यह कार्य पिता की आज्ञा से ही होना चाहिए।”
माता ने पुत्री के हृदय की व्याकुलता को समझा। वे राजा भीम के पास गईं और समस्त वृत्तांत कह सुनाया। राजा भीम गंभीर हो गए। वे जानते थे—यह केवल पुत्री का प्रश्न नहीं, एक टूटे हुए धर्म, एक बिखरे हुए जीवन का प्रश्न है।
राजा भीम ने कुछ क्षण विचार किया और फिर कहा—
“यदि मेरी पुत्री का हृदय इसी में शांति पाता है, तो बाहुक को उसके भवन में प्रवेश की अनुमति दी जाए।”
आमना-सामना
जब बाहुक—वह मलिन वेशधारी, जटाजूट से युक्त, कापाय वस्त्र पहने पुरुष—दमयन्ती के भवन में प्रवेश करता है, तो समय जैसे ठहर जाता है।
दमयन्ती जैसे ही उसकी ओर देखती है—
उसका हृदय काँप उठता है।
और नल—
दमयन्ती को देखते ही शोक, लज्जा और करुणा से भर उठता है। उसके नेत्रों से अश्रु बहने लगते हैं।
दोनों मौन हैं—
पर मौन में भीषण वेदना है।
दमयन्ती का प्रश्न
दमयन्ती अब मौन नहीं रह सकी। उसका शोक वाणी बनकर फूट पड़ा—
“हे बाहुक!
क्या इस संसार में कोई ऐसा धर्मज्ञ पुरुष है,
जो अपनी निर्दोष, प्रेमवती पत्नी को
निद्रा की अवस्था में
घोर वन में छोड़कर चला जाए?
क्या पवित्र यात्राओं में लगे हुए
राजा नल के सिवा
कोई और ऐसा पुरुष है
जो श्रम और मोह से अंधा होकर
अपनी निष्पाप भार्या को त्याग दे?
मैंने कौन-सा अपराध किया था?
क्या मैंने कभी पति-धर्म से विचलन किया?
मैंने तो देवताओं को छोड़कर
उसी को वरा था!
अग्नि और देवताओं के सामने
हाथ पकड़कर
जिसने जीवनभर साथ निभाने की प्रतिज्ञा की—
वह प्रतिज्ञा कहाँ गई?”
यह कहते-कहते दमयन्ती फूट-फूटकर रोने लगी। उसके अश्रु मानो वर्षों के विरह को बहा ले जाना चाहते थे।
नल का विलाप और सत्योद्घाटन
नल अब और सहन न कर सका। उसके नेत्र रक्तिम हो उठे। वह बोला—
“हे भीरु!
मैं स्वीकार करता हूँ—
राज्य का नाश मेरा अपराध नहीं था,
पर तुम्हें त्यागना—
वह अपराध मेरा ही है।
पर जान लो—
वह मैं नहीं था जो उस समय निर्णय कर रहा था।
वह कलि था—
तेरे शाप से दग्ध,
मेरे शरीर में प्रविष्ट हुआ हुआ।
मैं स्वयं उस पाप से जल रहा था।
दिन-रात तुम्हें स्मरण करता रहा।
कलि ने मुझे विवश किया—
पर तप, धैर्य और पश्चात्ताप से
मैंने उसे जीत लिया।”
दमयन्ती की शपथ
दमयन्ती काँपती हुई खड़ी हुई। उसने हाथ जोड़कर देवताओं को साक्षी बनाया—
“यदि मैंने कभी मन से भी
अपने पति नल का अपमान किया हो—
तो वायु मेरे प्राण हर ले।
यदि मैंने कभी पाप का विचार किया हो—
तो सूर्य मेरी चेतना हर ले।
यदि मैंने कभी अन्य पुरुष का
स्वप्न में भी स्मरण किया हो—
तो चंद्रमा मुझे त्याग दे।
हे देवताओ!
यदि मैं निष्पाप हूँ—
तो सत्य प्रकट हो!”
देववाणी और दिव्य साक्ष्य
तभी आकाश से वायु देवता की वाणी गूँज उठी—
“हे नल!
दमयन्ती निष्पाप है।
हम तीनों—वायु, सूर्य और चंद्र—
तीन वर्षों से इसकी रक्षा कर रहे हैं।
इसने तेरे लिए ही यह उपाय रचा।
तेरे सिवा कोई पुरुष
एक दिन में शत योजन नहीं जा सकता।
तुम दोनों एक-दूसरे के योग्य हो।
अब शंका त्यागो—
और मिलो।”
आकाश से पुष्पवर्षा होने लगी।
देवदुन्दुभियाँ बज उठीं।
मंद सुगंधित पवन बहने लगी।
नल का वास्तविक रूप
नल ने नागराज कर्कोटक का स्मरण किया।
क्षणमात्र में वह विकृत वेश त्यागकर
अपने वास्तविक राजसी रूप में प्रकट हुआ।
दमयन्ती ने जैसे ही अपने
स्वरूपधारी पति को देखा—
वह दौड़कर उससे लिपट गई।
दोनों ऊँचे स्वर में रो पड़े—
यह रोना शोक का नहीं,
मुक्ति का था।
पुत्र-पुत्री भी पिता को पहचानकर
उससे लिपट गए।
शांत अंत
दमयन्ती ने नल का मुख
अपनी छाती से लगा लिया।
नल भी उसे थामे देर तक स्थिर रहा।
राजा भीम को जब समस्त वृत्तांत ज्ञात हुआ,
उन्होंने कहा—
“प्रभातकाल
मैं स्वयं अपने नेत्रों से
तुम दोनों को साथ देखूँगा।”
उस रात्रि
नल और दमयन्ती
साथ रहे—
पुराने दुखों को कहकर,
मन को हल्का करके।
आगे चलकर
चार वर्षों में
नल ने दमयन्ती के साथ
सभी कामनाओं को सिद्ध किया।
दमयन्ती भी
पति को पाकर
वैसी ही खिल उठी
जैसे जल पाकर पृथ्वी।
जैसे उदित चंद्रमा से
रात्रि शोभायमान होती है।
यदि आप चाहें तो मैं
👉 इसके बाद नल का राज्य पुनः प्राप्त करना,
👉 या इस पूरे अध्याय को पद्यात्मक काव्य में,
👉 या केवल दमयन्ती की दृष्टि से पुनर्लेखन
भी कर सकता हूँ।
नीचे प्रस्तुत कथा षड्विंशतितमोऽध्याय को आधार बनाकर पूर्ण कथा-रूप में लिखी गई है। यह न तो श्लोकानुवाद है, न टीका—बल्कि सुगठित, भावपूर्ण गद्य कथा है, जिससे नल-दमयन्ती आख्यान का प्रवाह बना रहे।
**षड्विंशतितमोऽध्याय
नल का सम्मान, क्षमा और विदर्भ से प्रस्थान**
वृहदश्व बोले—
हे धर्मराज युधिष्ठिर!
दमयन्ती और नल के पुनर्मिलन के पश्चात वह रात्रि बीती, जिसमें वर्षों के विरह, शोक और अपमान का भार दोनों के हृदय से उतर गया। प्रभातकाल आया तो विदर्भ नगरी के आकाश में जैसे नवजीवन का प्रकाश फैल गया।
उस प्रातःकाल राजा भीम ने अपने नेत्रों से देखा—
दमयन्ती अपने पति नल के साथ खड़ी है।
न कोई संशय, न कोई भय—
केवल शांति और संतोष।
राजा नल ने अत्यंत सावधानी और विनय के साथ अपने श्वशुर राजा भीम को प्रणाम किया। उसके पश्चात पतिव्रता दमयन्ती ने भी पिता के चरणों में मस्तक झुकाया। राजा भीम का हृदय उस दृश्य को देखकर भर आया। उन्होंने नल को पुत्र के समान उठाकर गले लगाया और दमयन्ती को स्नेहपूर्वक आश्वासन दिया।
राजा भीम ने विधिपूर्वक नल और दमयन्ती—दोनों का सम्मान किया। योग्य आसन, उत्तम वस्त्र, शुभ आशीर्वाद और प्रसन्न वाणी से उनका सत्कार हुआ। नल ने भी समस्त पूजा-विधि को आदरपूर्वक स्वीकार किया और अपने जीवन की संपूर्ण कथा—वनवास, द्यूत, कलि का प्रभाव, कष्ट और तप—सब यथार्थ रूप से राजा भीम के सामने निवेदन की।
नगर का उत्सव
जब यह समाचार नगर में फैला कि निषधाधिप राजा नल पुनः अपने स्वरूप में दमयन्ती के साथ विदर्भ आए हैं, तो कुंडिनपुर हर्ष से गूँज उठा।
नगर के मार्ग पुष्पों से सजाए गए।
राजपथों पर सुगंधित जल छिड़का गया।
द्वार-द्वार पर पुष्पसमूह सजाए गए।
पताकाएँ और ध्वजाएँ वायु में लहराने लगीं।
देवालयों को सजाया गया, मंगलवाद्य बजने लगे।
स्त्री-पुरुष, वृद्ध-बालक—सबके मुख पर प्रसन्नता थी।
यह केवल एक राजा का आगमन नहीं था—
यह धर्म की विजय थी,
धैर्य की सफलता थी,
और प्रेम की परीक्षा का पूर्ण फल था।
ऋतुपर्ण की क्षमायाचना
इसी समय अयोध्याधिप राजा ऋतुपर्ण ने भी यह सुना कि जिन बाहुक के रूप में उन्होंने अपने यहाँ सेवक की तरह रखा था, वही निषधाधिप राजा नल हैं—और अब वे दमयन्ती के साथ विदर्भ में सम्मानित होकर स्थित हैं।
यह जानकर राजा ऋतुपर्ण अत्यंत हर्षित हुए। वे स्वयं नल के पास आए। विनयपूर्वक उन्होंने कहा—
“हे महाराज नल!
अज्ञानवश मैंने आपको बाहुक रूप में अपने गृह में सेवक की भाँति रखा। यदि उस समय किसी प्रकार का अपराध हुआ हो, तो मैं हृदय से क्षमा चाहता हूँ।”
राजा नल, जो तत्वज्ञान में स्थित और क्षमाशील थे, मंद मुस्कान के साथ बोले—
“हे राजन्!
आपका मुझ पर कोई अपराध नहीं है।
आपने अज्ञात रूप में भी मेरा आदर ही किया।
यदि कुछ हुआ भी हो, तो वह क्षमा के योग्य है—और वह मैं पहले ही क्षमा कर चुका हूँ।”
फिर नल ने स्नेहपूर्वक आगे कहा—
“आप तो मेरे पूर्व परिचित और मित्र समान हैं।
आपके गृह में मैं जिस प्रकार संतोष से रहा,
वैसा सुख मुझे अपने ही घर में भी नहीं मिला।
आपके प्रति मेरे हृदय में सदा प्रीति रहेगी।”
विद्याओं का आदान-प्रदान
इसके पश्चात राजा नल ने कहा—
“हे ऋतुपर्ण!
आपने मुझे ‘अक्षहृदय’ विद्या प्रदान की थी—
जिससे मैंने द्यूत के रहस्य को जाना और कलि से मुक्त हुआ।
अब मैं चाहता हूँ कि उसके प्रतिदान में
मैं आपको ‘अश्वहृदय’ विद्या प्रदान करूँ।”
राजा ऋतुपर्ण ने प्रसन्न होकर यह प्रस्ताव स्वीकार किया। वेदोक्त विधि से राजा नल ने अश्वहृदय विद्या उन्हें प्रदान की। ऋतुपर्ण ने भी उसे श्रद्धापूर्वक ग्रहण किया।
इसके साथ ही राजा नल ने अक्षहृदय विद्या को पुनः ऋतुपर्ण को लौटा दिया, जिससे दोनों विद्याएँ अपने-अपने योग्य अधिपति के पास लौट आईं।
ऋतुपर्ण ने एक नया सारथी ग्रहण किया और निषधाधिप राजा नल को प्रणाम कर अपने नगर अयोध्या की ओर प्रस्थान किया।
नल का विदर्भ से प्रस्थान
राजा ऋतुपर्ण के जाने के पश्चात राजा नल ने भी यह निश्चय किया कि वे कुंडिनपुर में अधिक काल तक नहीं ठहरेंगे। उनका उद्देश्य अब पूर्ण हो चुका था—
दमयन्ती पुनः प्राप्त हो चुकी थीं,
पुत्र-पुत्री मिल चुके थे,
कलि का प्रभाव समाप्त हो चुका था।
राजा भीम से विदा लेकर, नगरवासियों का आशीर्वाद स्वीकार कर, राजा नल दमयन्ती सहित निषध की ओर प्रस्थान करने की तैयारी करने लगे।
हे धर्मराज!
इस प्रकार विदर्भ की भूमि, जो वर्षों तक शोक की साक्षी रही थी, उस दिन आनंद और संतोष की साक्षी बनी।
नल-दमयन्ती की कथा यहाँ से फिर राजसुख और धर्म के मार्ग की ओर अग्रसर हुई।
यदि आप चाहें, तो अगला चरण
👉 नल का निषध में पुनः राज्याभिषेक,
👉 कलि का अंतिम पतन,
👉 या पूरी कथा का संक्षिप्त महाकाव्यात्मक रूप
भी मैं लिख सकता हूँ।
नीचे प्रस्तुत पाठ को अष्टविंशतितमोऽध्याय के आधार पर कथा रूप में व्यवस्थित किया गया है। यह कथा न केवल घटनाओं को स्पष्ट करती है, बल्कि भावनात्मक गहराई और पात्रों के मनोभाव को भी प्रकट करती है।
अष्टविंशतितमोऽध्याय – नल और दमयंती का पुनर्मिलन तथा महा उत्सव
वृहदश्व बोले—
हे धर्मराज युधिष्ठिर!
कुंडिनपुर और विदर्भ में उस समय, जब नल और दमयंती का पुनर्मिलन हुआ, वहाँ का दृश्य अद्भुत और मनोहर था। राजा नल ने अपने विशाल राज्य की पूरी शक्ति के साथ दमयंती को बुलाया। नगरवासियों के हृदय में आनंद का संचार हुआ और नगर के चारों ओर मानो उज्जवल दीप जला दिए गए।
राजा भीम, जो स्वयं पराक्रम, वीरता और धर्म के प्रतीक थे, अपनी संपूर्ण सेना के साथ उपस्थित हुए। उन्होंने दमयंती का स्वागत बड़े आदर और सम्मान के साथ किया। पुत्र के साथ दमयंती का आगमन राजा नल के हृदय में अपार प्रसन्नता का कारण बना। मानो नंदन वन में देवताओं का राजा स्वयं प्रकट हो गया हो।
राजा नल का उत्साह और आनंद जंबू द्वीप में भी प्रतिध्वनित हुआ। उनका राज्य शांति, वैभव और महायश के प्रकाश से जगमगा उठा। विधिपूर्वक और धर्मसंगत रीति से नल ने सभी प्रकार के यज्ञों और पूजाओं का आयोजन किया। नाना प्रकार के यज्ञों, दक्षिणाओं और उपहारों के साथ नल ने अपने राज्य और प्रजा के कल्याण की भावना प्रकट की।
धैर्य और विजय का प्रमाण
नल ने अपने वीरता और बुद्धि का प्रदर्शन करते हुए शत्रुओं के पुत्रों और सैन्यबल को परास्त किया। उनकी विजय और प्रताप की कहानियाँ पूरे महायशमान राज्य में फैल गईं। नल के उत्साह और वीरता का प्रकाश सम्पूर्ण जंबू द्वीप में देखा गया। सभी प्रजा ने उन्हें हृदय से सम्मान दिया और उनके आदर्शों से प्रेरणा ली।
राजा नल ने इस विजय के उपलक्ष्य में अपने सखाओं और मित्रों के साथ मिलकर महायश के उत्सव का आयोजन किया। यहाँ पर प्रत्येक स्थल, प्रत्येक मार्ग और नगर का प्रत्येक द्वार उत्सव के रंग में रंगा हुआ था। नगरवासियों के चेहरे पर आनंद और हर्ष था, और उनके हृदय में नल और दमयंती के प्रति असीम श्रद्धा।
युद्ध और वीरता के स्मरण
वृहदश्व ने बताया—
राजा भीम ने उस समय देखा कि नल और दमयंती के साथ नगर में शांति और हर्ष का वातावरण बना हुआ है। उन्होंने स्वयं नल को प्रणाम किया और अपने पुत्रवत स्नेह के साथ उनका सम्मान किया। नल ने भी शुद्ध हृदय से राजा भीम का आदर किया और उन्हें अपने राज्य के कार्यों की सूचना दी।
इस महा उत्सव और आनंद के बीच, विदर्भ और कुंडिनपुर में धर्म और विजय की कहानियाँ फैल गईं। नगर की पथरीली सड़कें, राजमार्ग और नगर के द्वार पुष्पों और पुष्पमालाओं से सजाए गए। पताकाएँ और ध्वजाएँ हवा में लहराने लगीं, और नगरवासियों ने नगर की शोभा में योगदान दिया।
पांडवों का साक्ष्य
वृहदश्व ने आगे बताया—
इस समय पांडवों का महावन में आगमन भी हुआ। युधिष्ठिर, अर्जुन और उनके अन्य भ्राताओं ने इस उत्सव में भाग लिया। युधिष्ठिर ने नल और दमयंती के पुनर्मिलन और नगर में उत्सव के दृश्य को देखकर मन से प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने महावन में तप करने वाले अर्जुन का भी स्मरण किया और उनकी वीरता और तपस्या की सराहना की।
अर्जुन, जो नाना प्रकार के ज्ञानी ब्राह्मणों और तपस्वियों के बीच तपस्या में लगे थे, उन्होंने अपने गुणों और पराक्रम से नगरवासियों और पांडवों को प्रभावित किया। इस प्रकार, नल और दमयंती के पुनर्मिलन के साथ-साथ महावन में धर्म, तपस्या और वीरता का वातावरण भी बना रहा।
देवताओं का आशीर्वाद
इस महा उत्सव के दौरान, वायु देवता, सूर्य और चंद्रमा की किरणें नगर में जैसे विशेष रूप से प्रकाशित हुईं। फूलों की वर्षा हुई, देवताओं की स्तुतियाँ और मंगलवाद्य बजाए गए। सम्पूर्ण महायशमान राज्य में एक दिव्य वातावरण बन गया।
वृहदश्व ने स्पष्ट किया—
“हे युधिष्ठिर! जो पुरुष नल के इस महान चरित्र को निरंतर सुनते हैं और उनके गुणों को स्मरण करते हैं, उन्हें अलक्ष्मी नहीं छू सकती। यह कथा न केवल सुख और धन्यता देती है, बल्कि स्वास्थ्य, प्रीति और सम्पूर्ण जीवन में सौभाग्य का कारण भी बनती है। नल और दमयंती के पुनर्मिलन से यह संदेश मिलता है कि सच्चा धर्म, वीरता और प्रेम सभी बाधाओं और कठिनाइयों के बाद भी विजय प्राप्त करता है।”
नल और दमयंती का जीवन
इस प्रकार, नगर में उत्सव और आनंद के बीच, नल और दमयंती अपने गृह में लौटे। उनके हृदय में शांति और संतोष था। उनके चारों ओर परिवार, पुत्र-पुत्रियाँ और प्रजा के हर्ष का वातावरण था।
नल ने विधिपूर्वक नगरवासियों का अभिनंदन किया और उन्हें धर्म, न्याय और सत्कर्मों के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। दमयंती ने पति के साथ अपने कर्तव्यों का पालन किया और अपने गृहस्थ जीवन में पूर्ण संतोष और आनंद का अनुभव किया।
इस महा उत्सव और आनंद के साथ, नल और दमयंती का जीवन फिर से स्थिर और समृद्ध हुआ। नगर और राज्य में धर्म, न्याय और विजय का वातावरण कायम हुआ, और इस प्रकार इस कथा का संदेश सम्पूर्ण संसार में फैल गया।
समाप्त
यदि आप चाहें, तो मैं इस पूरी कथा का एक और रूप – अत्यंत विस्तार और भावनात्मक रोमांच के साथ, लगभग 3000–3500 शब्दों में भी लिख सकता हूँ, जिसमें हर पात्र की मनोस्थिति, दृश्य, उत्सव, नल-दमयंती का पुनर्मिलन, नगरवासियों का उत्साह और देवताओं का आशीर्वाद विस्तार से होगा।
क्या मैं वह रूप तैयार कर दूँ?
Comments
Post a Comment