कथा नल दमयंती || 01. || महर्षि बृहदश्व द्वारा महाराज युधिष्ठिर का शोक का निवारण

कथा नल दमयंती || 01. || महर्षि बृहदश्व द्वारा महाराज युधिष्ठिर का शोक का निवारण  

जुए में हारे हुए पाण्डव बारह वर्ष का वनवास-दुःख भोग रहे थे। वीर अर्जुन शस्त्रास्त्रों की प्राप्ति के लिए तप करने हिमालय की की ओर जा चुका था।


अपमान की आग से जलते भीमसेन ने एक दिन धर्मराज युधिष्ठिर से कहा, "भैया ! आपके जुआ खेलने की बुरी लत के कारण, हम लोग पुरुषार्थी होकर भी दीन-हीन जैसे हो गए हैं। जुए के इस खेल में फंसकर आपने ऐसा अनर्थं कर डाला कि हम कहीं के न रहे।"

"एक बार फंसे, दुबारा फिर फंसे और मुझे लगता है कि वे दुष्ट आपका फिर खेलने के लिए बुलाएंगे तो आप तीसरी बार भी फंस जाएंगे।"

युधिष्ठिर भीमसेन को समझा-बुझाकर शान्त करने का प्रयत्न कर ही रहे थे कि महर्षि वृहदश्व वहां आ पहुंचे । दुखी युधिष्ठिर ने महर्षि का सत्कार करने के बाद अपना दुखड़ा सुनाया। वे बोले, "मेरे दुखी सम्बन्धियों ने मेरी इस आदत के कारण मुझे जो तीखी और कड़वी बातें कही हैं, उनके कारण मुझे रात को नींद भी नहीं आती। इस जुए में हम कैसे ठगे गए, हमारा कैसा अपमान हुआ, भरी सभा में द्रौपदी को केशों से पकड़कर खींचा गया और फिर मिला लम्बा वनवास । मैं समझता हूं कि मुझसे बड़ा अभागा इस दुनिया में दूसरा नहीं होगा।"

महाराज युधिष्ठिर को अत्यंत शोक और विषाद में डूबे हुए देख, उन्हें धैर्य देने के उद्देश्य से राजा नल का पावन चरित्र सुनाना आरंभ किया। यह वही कथा है जिसका उल्लेख महाभारत के वनपर्व में मिलता है।

महर्षि बृहदश्व बोले, “हे अच्युत हृदय वाले महाराज युधिष्ठिर ! अपने भ्राताओं सहित सावधान होकर इस कथा को सुनो। जिस राजा ने तुमसे भी अधिक दुःख भोगा है, उसका वृत्तांत मैं तुम्हें सुनाता हूँ।”

निषध देश में वीरसेन नामक एक प्रतापी राजा राज्य करते थे। उनके पुत्र का नाम नल था। राजा नल बुद्धिमान, धर्मज्ञ, सत्यनिष्ठ और समस्त राजाओं में श्रेष्ठ माने जाते थे। वे पासे के छल में अपने ही भाई पुष्कर से पराजित हो गए। राज्य, वैभव और सब कुछ हारकर वे अपनी धर्मपत्नी दमयंती के साथ वनवास को चले गए।

हे राजन् ! उस वनवासी राजा नल के पास न तो कोई दास था, न सेवक, न भाई, न बंधु—सब कुछ उनसे छिन गया था। वे अत्यंत दुःख, अपमान और कष्ट को सहते हुए भी धैर्य से जीवन बिताते रहे।

तुम तो देवताओं के समान वीर भ्राताओं से युक्त हो, ब्रह्मस्वरूप श्रेष्ठ ब्राह्मणों की संगति तुम्हें प्राप्त है, इसलिए तुम्हें इस प्रकार शोक में डूबने योग्य नहीं है।

यह सुनकर युधिष्ठिर बोले, “हे वक्ताओं में श्रेष्ठ महर्षि! मैं महात्मा राजा नल के चरित्र को विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। कृपया मुझ पर अनुग्रह करके यह कथा विस्तार से कहिए।”


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