कथा नल दमयंती || 03. || दमयंती का जन्म
कथा नल दमयंती || 03. || दमयंती का जन्म
महर्षि वृहदश्व ने युधिष्ठिर को इस प्रकार से कथा सुनाई
वृहदश्व ऋषि बोले, " हे धर्मराज युधिष्ठिर ! विदर्भ देश में एक धर्मात्मा, प्रजावत्सल और पराक्रमी राजा हुआ, नाम था भीम। राज्य वैभव से पूर्ण था, प्रजा सुखी थी, परंतु राजा के हृदय में एक गहन वेदना सदा निवास करती थी। वह वेदना थी—संतान का अभाव।"
राजा भीम प्रायः राजप्रासाद की वाटिकाओं में अकेले चहल-कदमी करते हुए सोचते, “काश! ईश्वर ने हमें भी संतान का सुख दिया होता। निसंतान होना कितना बड़ा कष्ट है—यह वही जानता है, जिसके वंशदीप न जले हों।”
एक दिन ऐसा ही चिंतन करते हुए वे बैठे थे कि तभी राजदरबार में घोषणा हुई, "महर्षि दमन पधार रहे हैं।"
राजा भीम यह सुनते ही श्रद्धा से भर उठे। वे सिंहासन छोड़कर उठ खड़े हुए और महर्षि को दण्डवत प्रणाम किया।
महर्षि दमन ने करुण दृष्टि से राजा को देखा और बोले, “उठो राजन ! तुम्हारा स्थान भूमि पर नहीं, सिंहासन पर है। बिना राजा के सिंहासन का कोई अर्थ नहीं। ईश्वर शीघ्र ही तुम्हारे कष्ट दूर करेगा।”
राजा भीम ने हाथ जोड़कर कहा, “ऋषिवर ! यदि आज्ञा हो तो कुछ दिन आपकी सेवा का सौभाग्य मिले।”
महर्षि दमन ने स्वीकार किया और एक मास तक विदर्भ में ठहरने का निश्चय किया, पर यह भी कहा कि वे केवल तप और शक्ति की उपासना करते हैं, अतः रानी को सेवा से दूर रखा जाए। राजा ने विनम्रता से यह आज्ञा स्वीकार कर ली।
एक मास पूर्ण होने पर महर्षि ने राजा को बुलवाया। उन्होंने कहा, “राजन ! परसों शुभ मुहूर्त है। उस दिन यज्ञ कराओ। उस यज्ञ का फल तुम्हें मनवांछित वर देगा।”
यज्ञ विधिपूर्वक सम्पन्न हुआ। यज्ञ के अंत में महर्षि ने राजा को एक दिव्य फल प्रदान करते हुए कहा, “राजन ! जितनी संतान चाहिए, उतने टुकड़े इस फल के करो। पुत्र की इच्छा हो तो अपने हाथों से महारानी को खिलाना। यदि वह स्वयं खाएगी, तो पुत्री होगी।”
राजा भीम ने श्रद्धापूर्वक फल स्वीकार किया। उनके लिए पुत्र-पुत्री में भेद न था, परंतु राज्य की रक्षा हेतु उत्तराधिकारी की आवश्यकता वे समझते थे। महर्षि दमन आशीर्वाद देकर वहां से चले गए।
राजा भीम ने महारानी को महर्षि का कथन बताया और
उस फल के चार टुकड़े करके महारानी को दे दिए। राजा ने एक एक करके तीन टुकड़े स्वयं अपने हाथों से महारानी को खिलाए। चौथे टुकड़े के समय महारानी को कंठ में बाधा हुई। जल मँगाया गया।
उसी क्षण का फायदा उठाते हुए महारानी ने वह चौथा टुकड़ा स्वयं खा लिया और मुस्कुरा दी। राजा भीम सब समझ गए, और मुस्कुरा उठे।
कालचक्र घूमा। समय आने पर महारानी ने तीन पुत्र और एक पुत्री को जन्म दिया। उसी क्षण महर्षि दमन पुनः आ पहुंचे। उन्होंने बिना पूछे ही कहा, “राजन ! मुझे सब ज्ञात है। तुम्हें तीन पुत्र और एक पुत्री की प्राप्ति हुई है।”
राजा भीम ने विनम्रता से कहा, “ऋषिवर ! कृपा कर इनके नामकरण भी आप ही करें।”
महर्षि बोले, “तुम्हारे पुत्रों के नाम होंगे—दम, दांत और दमन।
और यह कन्या—दमयंती—विश्व में तुम्हारा नाम उज्ज्वल करेगी।”
इतना कहकर महर्षि पुनः चले गए। राजा भीम ने विनम्रता से रोकते रहे परंतु वह नहीं रूके।
वृहदश्व ऋषि ने कथा विराम दी और युधिष्ठिर की ओर देखा।
“हे धर्मराज! यही है दमयंती का दिव्य जन्म-वृत्तांत। जिस कन्या ने आगे चलकर निषधराज नल का वरण किया और धर्म, प्रेम तथा धैर्य की अमर मूर्ति बनी।”
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