कथा नल दमयंती || 02. || नल जन्म वृत्तान्त
कथा नल दमयंती || 02. || नल जन्म वृत्तान्त
वृहदश्व ऋषि बोले, " हे धर्मराज युधिष्ठिर ! दुःख में पड़े मनुष्य को यदि प्राचीन राजाओं की कथाएँ सुनाई जाएँ, तो उसका चित्त स्थिर होता है। तुम सत्य और धर्म से विचलित नहीं हुए हो, इसीलिए मैं तुम्हें निषधाधिपति नल के जन्म का यह पुण्य वृतांत सुनाता हूँ। यह वही नल है, जिसकी कथा आगे चलकर तुम्हारे जीवन से भी उपमा पाएगी।
पूर्वकाल में पर्वतों से सुशोभित, नदियों से पवित्र और वनों से परिपूर्ण निषध नामक देश था। । उस देश की भूमि उस समय कुछ विलक्षण तेज से प्रकाशित होने लगी थी। नदियाँ मानो मधुर स्वर में गान कर रही थीं, वृक्ष असमय पुष्पित हो उठे थे और पक्षियों की उड़ान में भी किसी मंगल की सूचना दिखाई देती थी। ऐसा प्रतीत होता था, मानो प्रकृति स्वयं किसी महापुरुष के आगमन की तैयारी कर रही हो।
उस देश के राजा थे वीरसेन; धर्मज्ञ, सत्यप्रिय और प्रजावत्सल। उनकी धर्मपत्नी रानी सुधर्मा पतिव्रता, शीलवती और तपस्विनी थीं। राज्य ऐश्वर्य से पूर्ण था, प्रजा संतुष्ट थी, किंतु राजमहल के अंतःपुर में एक गूढ़ शोक निवास करता था। जिसमें छिपा था, संतान का अभाव। वर्षों बीत गए थे, पर वंश की दीपशिखा प्रज्वलित न हो सकी थी।
रानी सुधर्मा प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्यदेव को अर्घ्य अर्पित कर, महादेव के चरणों में जल चढ़ाकर मौन प्रार्थना किया करती थीं। राजा वीरसेन भी राजधर्म का पालन करते हुए भीतर ही भीतर उस रिक्तता से लड़ते रहते थे, जिसे केवल संतान-सुख ही भर सकता है।
हे कुन्तीनन्दन, ! एक समय ऐसा आया कि राजमहल में एक ब्रह्मतेजस्वी महर्षि दमन का आगमन हुआ। उनकी जटाएँ हिम के समान उज्ज्वल थीं, नेत्र करुणा से पूर्ण और वाणी गंभीर शांति से युक्त थी। उनके चरण पड़ते ही जैसे समस्त वातावरण स्थिर हो गया। राजा वीरसेन ने उन्हें आदरपूर्वक आसन प्रदान किया, पाद्य और अर्घ्य से सत्कार किया।
तब महर्षि दमन ने राजा से कहा, “हे राजन् ! तुम्हारा धैर्य और संयम देवताओं को प्रिय है। संतान के लिए जो तप और निष्ठा तुमने धारण की है, उसका फल अब दूर नहीं। पर यह स्मरण रखो कि जो पुत्र तुम्हें प्राप्त होगा, वह केवल तुम्हारा पुत्र न होगा, अपितु धर्म का रक्षक और सत्य का आश्रय बनेगा।”
इतना कहकर महर्षि दमन ने रानी सुधर्मा को एक दिव्य फल प्रदान किया और कहा कि शुभ नक्षत्र में उसका सेवन करें। तत्पश्चात वे उन्हें आशीर्वाद देकर चले गए।
निर्दिष्ट शुभ दिन आने पर रानी ने उस फल का सेवन किया। उसी क्षण राजमहल में अद्भुत सुगंध फैल गई। दीपक बिना तेल के प्रज्वलित से प्रतीत होने लगे। शंख स्वयं ही निनाद करने लगे। समय के साथ रानी के गर्भ की कीर्ति सम्पूर्ण निषध में फैल गई। ज्योतिषियों ने राजा से कहा, “यह गर्भ साधारण नहीं है। इसमें सत्य और धर्म दोनों एक साथ वर्धमान हैं।”
हे धर्मराज ! नवम मास की पूर्णिमा आई। आकाश निर्मल था और चंद्रमा मानो राजमहल की ओर झुक आया हो। उसी रात्रि रानी सुधर्मा ने एक तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। जैसे ही शिशु ने प्रथम श्वास ली, महल के प्रांगण में कोमल वर्षा हुई—न अधिक, न न्यून—केवल उतनी, जितनी पृथ्वी को आशीष देने के लिए पर्याप्त हो। दूर कहीं बिजली चमकी, किंतु मेघ गर्जन नहीं हुआ। समस्त जनों ने इसे देवकृपा का संकेत माना।
राजा वीरसेन ने शिशु को गोद में लिया। उसके मुख पर अद्भुत शांति थी। नेत्र खुले तो उनमें असामान्य गाम्भीर्य झलक उठा। वह शिशु रोया नहीं, अपितु अपने पिता की ओर देखता रहा, मानो उन्हें पहचानता हो। राजपुरोहित ने वेदघोष के साथ नाम घोषित किया, “यह बालक ‘नल’ कहलाएगा। इसकी वाणी सत्ययुक्त, भुजाएँ बलशालिनी और हृदय करुणा से परिपूर्ण होगा।”
तत्पश्चात संपूर्ण राज्य में जन्मोत्सव मनाया गया। प्रजा को दान दिए गए, बंदियों को मुक्त किया गया और राजमहल के द्वार सभी के लिए खोल दिए गए। उस दिन निर्धन के गृहों में भी दीप प्रज्वलित हुए। कहते हैं, उसी क्षण देवसभा में भी नल के जन्म की चर्चा हुई और शक्र ने प्रसन्न होकर कहा, “धरती को ऐसा राजा प्राप्त हुआ है, जो धर्म को केवल जानता नहीं, अपितु जीवन में धारण करेगा।”
बालक नल का बाल्यकाल विलक्षण था। वह खेलते हुए भी बालकों के विवाद शांत कर देता। घायल पक्षी को देखता तो स्वयं उठाकर सुरक्षित स्थान पर रख देता। गुरुजन आश्चर्य करते थे। वह विद्या को केवल स्मरण नहीं करता था, उसे आत्मसात करता था। अस्त्र-शस्त्र में निपुणता के साथ-साथ वह सत्य बोलने का साहस भी धारण करता गया।
एक दिन उसने अपने पिता से पूछा, “पिताश्री ! राजा होना क्या है ?”
राजा वीरसेन ने उत्तर दिया, “ पुत्र ! राजा वह है, जो अपने से पहले प्रजा के सुख-दुःख को रखे।”
यह सुनकर नल बोला, “तो फिर मैं पहले सुनना सीखूँगा।”
उस दिन से, हे युधिष्ठिर, वह राजप्रासाद की चौखट पर खड़ा होकर प्रजा की बातें सुनने लगा—न भय से, न अहंकार से।
समय बीता। नल युवावस्था की ओर बढ़ा और उसके साथ निषध की आशाएँ भी। पर उस सबकी नींव उसी दिव्य रात्रि में रखी गई थी। जब चंद्रमा झुका था, वर्षा ने आशीष दी थी और पृथ्वी ने एक ऐसे पुत्र को जन्म दिया था, जो आगे चलकर धर्म, प्रेम और परीक्षा—तीनों का साक्षी बनने वाला था।
हे धर्मराज! इस प्रकार राजा नल का जन्म केवल एक राजकुमार का आगमन नहीं था, वह एक महान कथा का आरंभ था। जो युगों तक कही जाएगी और सुनी जाएगी।
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