001. और भी दमयंती
01.
नल-दमयंती की कथा हमारे प्राचीन ग्रंथों-पुराणों में आई है। यह कथा वास्तव में पुरुष और स्त्री के आकर्षण और पवित्र प्रेम की कथा है, जिसमें कलियुग के कुप्रभाव और शनि की कुदृष्टि के कारण राजा नल को बुरे दिन देखने पड़े थे, दमयंती को अपार कष्ट हुआ था पर सती दमयंती ने हिम्मत नहीं हारी और डटकर समय का सामना किया। भाइयो ! यह कलियुग या शनि आदि ग्रह वास्तव में जीवन के उतार-चढ़ाव को बताते हैं। बुद्धिहीन मनुष्य को दुख ही दुख झेलने पड़ते हैं। पहले के राजाओं को जुआ खेलना पड़ता था, अगर कोई राजा चुनौती दे देता तो युद्ध की तरह उसे स्वीकार करना पड़ता था, पर उसका गलत परिणाम भी तो उन्हें भोगना पड़ता था। इसी जुए के कारण पांडवों को वनवास का कष्ट झेलना पड़ा, राज्य गंवाना पड़ा - महाभारत का युद्ध तक हो गया। इसलिए हर हाल में जुआ विनाश की जड़ है। आदमी के जीवन में दुख कई रास्तों से आता है और वह कहकर नहीं आता। नल-दमयंती की यह कथा सिखाती है कि दुख चाहे कितना भी बड़ा आ जाए पर हमारा धीरज नहीं छूटना चाहिए। यह धैर्य ही हमारा मार्गदर्शक होता है। दमयंती यह साबित करती है कि स्त्री सहनशील भी होती है शक्तिशाली भी और यदि वह चाहे तो अपने जीवन को एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत भी कर सकती है।"
यह कथा विदर्भदेश के राजा भीम की पुत्री दमयंती के जन्म से आरंभहोगी फिर निषध देश के राजकुमार नल के राजा बनने, दमयंती के साथ प्रेम और विवाह होने के साथ-साथ आगे बढ़ेगी। इसे ध्यानपूर्वक सुनें और गुनें।
02.
"विदर्भ नरेश महाराज भीम की राजधानी कुण्डिनपुर के राजमहल के अन्तःपुर में हलचल बढ़ गई थी। धीमे स्वरों में कोलाहल भी हो रहा था। तब तक सूचना मिली कि महाराज भीम स्वयं वहाँ पधार रहे हैं। इस सूचना के आते ही शांति छा गई। महाराज आए पर वे चिन्तित लग रहे थे। उनका सुंदर मुख कुम्हलाया हुआ था। चीते की-सी स्फूर्ति रखनेवाला बलिष्ठ शरीर भीतर-भीतर कंपित हो रहा था। कोई अज्ञात भय, कोई आशंका उनके मन को किसी कुडंलित सर्प की तरह कसे जा रही थी पर गहरी चिन्ता के बाद भी वे अपने आंतरिक उल्लास को छिपा नहीं पा रहे थे। आज वे पुनः पिता बनने वाले हैं, संभवतः यह समाचार उन्हें शीघ्र ही मिलनेवाला था। उनके भीतर-भीतर एक इच्छा उसी प्रकार हिलोरें ले रही थी जैसे नदी की तेज जलधारा तटों से टकराती रहती है।
"क्या मुझे पुत्री के मुख-दर्शन का सुख प्राप्त होगा? मेरे तीन पुत्र दम, दान्त और दमन मेरे सौभाग्य की वृद्धि कर रहे हैं पर मैं कन्या चाहता हूँ।" उनके हृदय से मानो एक तीव्र पुकार उठी "प्रभो! मैं अपनी संतान के रूप में चाहता हूँ कि मेरे घर देवी का पदार्पण हो। स्त्री की महाशक्ति के बिना जीवन शून्य हो जाता है, जब तक पुत्री उत्पन्न नहीं होती तबतक पितृत्व अधूरा रहता है। पुत्री है मनुष्य की करुणा का प्रकाशन, उसके कुल का विस्तार, अन्य को स्व में बदलने की कला, दो भिन्न कुलों की एकता, वही तो सिखाती है त्याग। इस त्याग के बिना तप भी तो अधूरा होता है। मैं देखना चाहता हूँ चंद्रिका का रजत स्वरूप, ऐसी दिव्य शीतलता जो हृदय को ठंडक पहुँचा दे।"
राजा सोच-विचार रहे थे कि प्रधान सेविका दौड़ती हुई आई। उसका मुख प्रसन्नता के आवेग से खुल गया था। शब्द ठीक से उच्चरित नहीं हो रहे थे। -"बोली धन्य भाग हमारे ! पुत्री हुई है।"
"कैसी है मेरी पुत्री ? - महाराज अपना आवेग छिपा नहीं पा रहे थे।
'बिल्कुल चंद्र-ज्योत्स्ना जैसी। राज महल उसके दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठा है महाराज!"
महाराज भीम ने सेविका को अलंकरण प्रदान किया। उनका तन-मन उतावला हो रहा था। कब और कैसे पुत्री के चंद्रमुख का वे दर्शन करेंगे? उनकी विकलता बढ़ गई थी। वे प्रसन्नता से कुछ कुछ कंपित हो रहे थे। वे हाथ बाँधे घूम रहे थे। कुछ क्षणों के पश्चात् अन्तःपुर में पधारने का संवाद मिला। वे स्थिर भाव से चल रहे थे पर उनकी अस्थिरता छिपाए नहीं छिप रही थी। अन्तःपुर में अपनी पत्नी सुकीर्त्ति के पास जाकर उन्होंने देखा उनकी कन्या मृणाल नाल से अभी-अभी तोड़े गए कमल की तरह चमक रही थी, सौंदर्य से पूरित किसी अमृत पात्र की तरह उसका रूप तरंगित हो रहा था, उसकी रक्तिम हथेलियाँ नव पल्लवों की तरह अत्यंत कोमल थीं। महाराज ने सावधान होकर उस नवजात बालिका को अपने दोनों हाथों से ऐसे उठाया जैसे समुद्र-मंथन के समय विष्णु ने अमृत कलश उठाया था। राजा भीम का वात्सल्य उनके रोम-रोम से हर्ष बनकर प्रकट हो रहा था, अमृत की मानो बाढ़ आ गई थी। इस शुभ समाचार से भीम का राजमहल अनेक प्रकार के अंक्य और ऊर्ध्वक नामक तुरहियों के वाद्य से निनादित हो उठा। सर्वत्र शंखध्वनि सुनाई दे रही थी, पवन भी शीतल मंद सुगंध से भरा, ऐसे चल रहा था कि वृक्षों के पत्ते नृत्य करते दिखाई पड़ रहे थे। उत्साहित होकर राजा भीम ने कहा "ऋषिवर ! दमन की कृपा से हमें तीन पुत्र दम, दान्त और दमन प्राप्त हुए थे, इस चौथी संतान को हम दमयन्ती के नाम से पुकारेंगे। हमारी दमयन्ती रूप, गुण, शील सबमें श्रेष्ठ होगी।"
महर्षि दमन की कृपा से ही विदर्भ नरेश को अब चार संतानों का सुख मिल चुका था। तीन पुत्रों के जन्म के बाद महाराज भीम का चित्त उदास रहता था। उनके वंश में वृद्धि हो गई, राज्य का उत्तराधिकारी भी मिल गया फिर कौन-सी कमी रह गई थी? महाराज सोचते एक पुत्री चाहिए जो किसी कली की तरह प्रस्फुटित हो, नन्हीं चिड़िया की तरह उनके आंगन में फुदकती चले, जो उदित होते ही सूर्य और चंद्रमा की लालिमा चुरा ले, जिसमें पृथ्वी-सा धैर्य, आकाश की निर्मलता, विद्युत की प्रभा और मेघों की शीतलता हो। पुत्री मन की करुणा है। यह करुणा ही मानव जीवन को पूर्णता प्रदान करती है। सचमुच पुरुष असहनशील क्रोधाग्नि है तो स्त्री में सहनशीलता और निर्झर के समान प्रवाहमय चित्त है। यह विचार करते-करते महाराज अपने महल के बाह्य कक्ष में आ विराजे। तब तक पुत्री के जन्म की सूचना सर्वत्र फैल गई थी। महामंत्री अपने सहयोगियों के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे, उन्होंने राज-ज्योतिषी को भी आमंत्रण भेजकर बुला लिया था।
महाराज पुत्री के जन्म से प्रसन्न थे, पर ज्योतिषी को देख कर उनके मन में भविष्य जानने की उत्कंठा भी प्रबल हो गई। अतीत हमारा अनुभव होता है, वर्तमान चुनौतियों से लड़ने की शक्ति देता है पर भविष्य तो एक अंधकार में अज्ञात पथ पर किसी अज्ञात लक्ष्य की ओर चलनेवाली यात्रा है जो शंकाओं, चिन्ताओं से भरी होती है।
महाराज की इच्छा को जानकर राज ज्योतिषी ने कहना आरंभ किया -
"विदर्भ नरेश! आपकी यह नवजात कन्या सृष्टि का एक अमूल्य उपहार है। सौंदर्य, गुण और साहस नारी के ये तीन मुख्य आभूषण माने गए हैं, इनसे यह बालिका संपन्न दृष्टिगत हो रही है। किसी महान् प्रतापी सम्राट की यह अत्यंत प्रिय पत्नी सिद्ध होगी, इस बालिका में सतीत्व और तेज का दैवी अंश स्पष्ट झलक रहा है, बड़े-बड़े देवता भी इसके स्वरूप के समक्ष नतमस्तक होंगे। किन्तु राज-ज्योतिषी का स्वर अचानक रुक गया था।"
महाराज की मुद्रा चिंतित हो गई, बोले "किन्तु क्या? क्या कोई अघटित घटना का संकेत है, क्या कोई बाधा, कोई दुर्योग, कोई दैवी प्रकोप घटित होनेवाला है, यदि है तो स्पष्ट बताएँ। एक पिता के हृदय की विकलता का आप सहज ही अनुमान लगा सकते हैं। ज्योतिषी भी एक प्रकार से विधाता है जो भाग्य का दर्शन कर सकता है। वह दर्शक है अर्थात् देख भी सकता है और दिखा भी सकता है। मेरा हृदय भविष्य की चिन्ता से पीड़ित हो रहा है, कृपया शीघ्र बताएँ।"
"देव! कभी-कभी दैवी शक्तियों को भी समय-समय पर भाग्य लेख का अनुपालन करना पड़ता है। आपकी कन्या में दैवी तेज है, अतः दैविक शक्तियों का भी प्रकोप उसे झेलना पड़ सकता है पर परिणाम सुखद दीख रहा है और जीवन के सुख-दुख का निर्णय उसके परिणाम से ही निर्धारित होता है। इसलिए चिन्ता व्यर्थ है। भवितव्यता का आदरपूर्वक वरण करने में ही हमारी भलाई है।"
महाराज का उद्वेग तनिक कम हुआ। नवजात कन्या का नामकरण 'दमयंती' उन्हें अत्यंत प्रिय लगा।
03.
कुण्डिनपुर के राजमहल के बाहरी उद्यान में किशोरिका दमयंती अपनी सखियों के साथ कन्दुक क्रीड़ा में व्यस्त थी। देखते-देखते वह कब बड़ी हो गई, किसी को पता न चला। दमयंती बड़ी तीव्रता से अपने दाहिने हाथ से कन्दुक को उछालती हुई दौड़ रही थी। उसके हाथों की ताल पर कन्दुक बार-बार पृथ्वी से टकराकर ऊपर आता और फिर हाथों की चोट से वह नीचे जाता। सखियाँ तीव्र गति से भागती हुई दमयन्ती को पकड़ नहीं पा रही थीं। अन्त में वे थककर रुक गईं और बोली- "हम सब हार गईं, तुम्हीं जीती, अब तो रुक जाओ! दमयंती रुक गई। उसके माथे पर स्वेद कण झिलमिला रहे थे। ऐसा लग रहा था मानो समुद्र जल से सूर्य का लाल बिम्ब धीरे-धीरे ऊपर उठ रहा है। वह बिम्ब, वह सौंदर्य अग्नि के ताप और जल की शीतलता से ओत-प्रोत था। तेज चलती हुई सांस से उसका वक्ष भी मानो कन्दुक की ही तरह उठ-गिर रहा था। सखियों ने समवेत स्वर में कहा-
"तुम पवन वेग से दौड़ लगा रही थी और हम तुम्हारे पीछे-पीछे वैसे ही तुम्हारा अनुसरण कर रही थीं, जैसे जल से भरे हुए मेघ धीमी गति से चलते हैं।"
दमयन्ती ने कहा- "सखि ! देखो यह कन्दुक मेरी इच्छा के अधीन है। मेरे आदेश पर यह नृत्य कर रहा है। वह मेरे हाथों का खिलौना बन गया है। मेरे हाथों के संकेत और उसकी चोट पर नीचे जाता और ऊपर आता है।"
एक वयस्क सखी ने हंसते हुए कहा- प्रिय सखि दमयन्ती! तुम अपने माता-पिता की ही नहीं, हमारी आंखों की भी पुतली हो। देखो, आंखों की यह छोटी-सी पुतली छोटी-सी कनीनिका में पूरे विश्व को देखने और एक ही दृष्टि में समेट लेने की क्षमता है। देखो, आँखों की पलकें भी तो उठती-गिरती हैं। सांसों के उठने-गिरने से हृदय तरंगित होता है। यह कन्दुक भी तो मनुष्य जीवन के उत्थान-पतन का संकेत करता है। विधाता जब अनुकूल होता है तो जीवन शिखरों की तरह ऊँचा और भव्य हो जाता है, लेकिन जब वाम होता है तो उसके पतन में विलम्ब नहीं होता।"
"संभवतः तुम ठीक कह रही हो जयन्ती ! एक राज कन्या होने के नाते, समस्त सुख-सुविधाओं में पलने के कारण हमें यह अनुभव होता है कि हम किसी राज्य के शासक नहीं हैं, समय के भी शासक हैं और मनुष्य की सीमा देखो! वह सारी दुनिया जीत सकता है पर समय से हार जाता है।"
जयन्ती ने कहा- "राजकुमारी! आप स्वयं को ही देखिए, आप कब शैशव से किशोरावस्था में आ गई और अब आपका शरीर और मन यौवन के आकर्षण और तर्क-वितर्क का अनुभव कर रहा है। वह समय भी अब समीप आ गया है जब कोई शक्तिशाली और कीर्त्तिशाली जीवन-साथी आपको प्राप्त होगा, तब संसार को आप परिपूर्णता से देख सकेंगी।"
"किन्तु जयन्ती ! जीवन और संसार का अनुभव करने के लिए क्या हम पर्याप्त नहीं हैं?"
"नहीं राजकुमारी! संसार का बाहरी ढाँचा ही द्वैत पर आधारित है। पुरुष और स्त्री कहने को दो हैं मगर उनकी एकता में ही सृष्टि के विकास का रहस्य छिपा हुआ है। मनुष्य के शरीर के अंग भी तो दो भागों में हैं। आँख, नाक, कान इन्द्रियाँ इसकी प्रमाण है। मगर उनका अनुभव एक ही होता है।"
"जयन्ती! तुमने जीवन के विषय में अच्छी बातें बताई। सचमुच कुछ दिनों से मैं अपने भीतर परिवर्तन का अनुभव कर रही हूँ। मैं वन-वृक्षों से बात करती हूँ, उड़ान भरते हुए पक्षियों के साथ मेरा मन भी आकाश के नील विस्तार में खो जाता है। मुझे यह समस्त प्रकृति तुम सखियों की तरह सहचरी लगने लगी है।" जयन्ती ने हँसते हुए कहा- "राजकुमारी! सच्ची बात तो यह है कि आपको अब जीवन-संगी की आवश्यकता है। वह समय आ रहा है जब कोई आपके चित्त को चुरा लेगा, आपके हृदय में प्रवेश कर जायेगा और आपको पता भी नहीं चलेगा। हाँ, जब आपकी विकलता बढ़ जाए, मन अनमना हो जाए, किसी का चित्र बार-बार आँखों के सामने आने लग जाए, और आपका हृदय परवश हो जाए तो समझ लीजिएगा आपको किसी से प्रेम हो गया है।"
दमयंती ने एक सलज्ज मुस्कान में कहा- "जयन्ती! तुम तो इस प्रेम-विद्या में पारंगता निकली? अगर प्रेम में सचमुच ऐसी अनुभूति होती है तो वह कितनी रोमांचकारी होगी!"
तभी सूचना आई कि महाराज भीम दमयंती से मिलना चाहते हैं, वे किसी सुदूर यात्रा पर जा रहे हैं। दमयंती शीघ्रता से चलती हुई राजमहल के अन्तःपुर में पहुँची जहाँ उसके पिता यात्रा के लिए तैयार हो रहे थे। महाराज भीम ने उल्लसित स्वर में कहा "बेटी दमयंती ! हम एक बड़े महोत्सव में सम्मिलित होने के लिए निषध देश जा रहे हैं। वहाँ हमारे पुराने मित्र राजा वीरसेन के सुपुत्र युवराज नल ने अभी-अभी एक बड़ा यज्ञ किया है। सचमुच वे वीर, महान और सुदर्शन पुरुष हैं। मैं पहली बार उनसे मिलूंगा। सुना है उनके जैसा सौंदर्य त्रिलोक में भी कहीं नहीं है। अनेक बार हमारे दरबार में चारणों ने भी उनकी प्रशंसा के गीत गाए हैं। उनकी कीर्त्ति-गाथा सुनकर मेरा हृदय भी आकर्षित हुआ है। मैं कुछ दिनों बाद लौटूंगा, यह बताना तुम्हें आवश्यक था।"
युवराज नल के विषय में दमयन्ती ने भी बहुत कुछ सुना था। बार-बार चारणों के गीत और दूर देश से आने वाले समाचारों में युवराज नल के सौंदर्य और शील की प्रशंसा से उसके हृदय में भी जिज्ञासा उठ रही थी। कौन हैं भला कैसे हैं ये नल? वह सोचने लगी। अनेक देशों को जीतनवाला नल क्या उसका हृदय भी जीत लेगा? यह सोचते ही दमयन्ती का मुख लज्जा से आरक्त हो गया।
04.
वन-मार्ग पर युवा अश्वारोही अपने घोड़े को बड़ी तीव्र गति से दौड़ाए चला जा रहा था। ग्रीष्म ऋतु की उष्णता बढ़ गई थी। निरंतर दौड़ने के कारण घोड़े के मुख से फेन निकल रहा था, जब-जब ऍड़ पड़ती, उसकी गति बढ़ जाती, उसके पांवों से निकलता टाप का स्वर किसी मृदंग की तरह बज रहा था। अश्वारोही निश्चय ही कोई राजपुत्र था, उसके शरीर पर कसे हुए वस्त्र और गले में दमकता रत्नजटित स्वर्णहार झूल रहा था, उसके कंधों पर छितराए केश हवा में उड़ रहे थे, बायें हाथ में धनुष और दायें में तीर और घोड़े की लगाम सँभाले वह सामने से चौकड़ी भरते हरिणों का दूर से ही पीछा करता चला आ रहा था। पीछे-पीछे घुड़सवारों की एक छोटी-सी टुकड़ी अस्त्र-शस्त्रों से लैस चली आ रही थी, वे सभी सवार काफी पीछे छूट गए थे पर उनके कोलाहल से ज्ञात हो रहा था कि वे बहुत दूर नहीं हैं। अश्वारोही ने अचानक देखा कि वन-पथ समाप्त हो रहा है और दूर बसे हुए आश्रम दिखाई दे रहे हैं। कुलाँचे भरते हरिण भी जैसे कहीं अदृश्य हो गए थे। जैसे ही आश्रम के समीप अश्वारोही रुका, सामने एक वृद्ध ऋषि के दर्शन हुए, क्षणभर में कुछ अन्य युवा ऋषि भी वहाँ आ गए। अश्वारोही घोड़े से उतरा। उसका शरीर स्वेद से लथपथ था, अपना शिकार नहीं मिलने से उसकी भृकुटि तन गई थी, उसने कटि में बंधे उत्तरीय से अपना स्वेद सुखाया। युवराज के सामने एक वृद्ध ऋषि खड़े थे। ऋषि उत्तंक उस राजपुत्र को देखत ही ठगे से रह गए। एक अपूर्व पुरुष-सौंदर्य की साकार सुगठित प्रतिमा उनके सामने खड़ी थी। सूर्य किरणों में उसका शरीर चमक रहा था। कानों के कुंडल हवा में धीमे-धीमे हिल रहे थे। उसका उत्तरीय फड़फड़ा रहा था, प्रतीत हो रहा था, मानो श्वेत पक्षियों का दल पंख खोलकर उड़ना चाहता हो। भुजाओं की रेखाएँ परिश्रम से उभर आई थीं। उस पर स्वेद कण पिघले हुए रजत की तरह चमक रहे थे। उसकी मसें अभी भींग रही थी। प्रायः अठारह वर्ष का यह नवययुवक दृढ़ इच्छाशक्ति संपन्न प्रतीत हो रहा था। घोड़े से उतरते ही उसने ऋषि को प्रणाम कर सबसे पहले अपने घोड़े पर ध्यान दिया।
उत्तंक ने कहा- यह आश्रम वैदिक ऋषि पिप्पलाद के अनेक आश्रमों में से एक है और मैं उनका शिष्य उत्तंक हूँ।
फिर वृद्ध ऋषि उत्तंक ने पूछा
"महाशय आप कौन हैं? कहाँ से पधारे हैं? देखने से तो यही लगता है कि आप कोई तेजस्वी राजपुत्र हैं। कृपया परिचय देकर हमें कृतार्थ करें।"
"मुनिवर! मैं इस निषध देश के सम्राट् का पुत्र नल हूँ, मैं मृगया के लिए निकला था और हिरणों का पीछा करते-करते यहाँ आपके आश्रम तक पहुँच गया।"
ऋषि बोले- "धन्य भाग हमारे। हमारे आश्रम में निषध नरेश के सुपुत्र का आगमन हुआ। आप पधारें, आसन ग्रहण करें, हम जलपानादि से आपका उचित सत्कार करेंगे। युवराज नल को काष्ठ पर बिछे मृग चर्म के आसन पर बिठाया गया। तिलक, पुष्प और जल से पाद्य-अर्ध्य आचमन द्वारा उनका सत्कार किया गया।"
नल ने कहा- "मुनिवर! आपके स्नेह और सत्कार से मैं संतुष्ट हूँ, पर मुझे यह नहीं समझ में आ रहा कि हमारी मृगया के वे हरिण अचानक कहाँ लुप्त हो गए? यह वन-मार्ग तो यहीं आकर समाप्त हो गया।"
"युवराज! वे हरिण आश्रम के प्रिय पालित जीवों में से हैं। वन भले ही पशुता का प्रतीक है पर आश्रमों के होने से उनकी पशुता की वृत्ति समाप्त हो जाती है। वे मनुष्य के हृदय की उदारता और करुणा से परिचित और अभ्यस्त हो जाते हैं। यही कारण है कि वे हरिणों के छौने अपने-अपने परिवारों में जा मिले हैं।"
राजकुमार नल इस उत्तर को सुनकर किंचित विचलित हुए - "ठीक है, ऋषिवर ! किन्तु राजन्य वृत्ति मृगया के अपने शिकार को हर स्थिति में पाना चाहती है। प्राणियों के रक्षण से अधिक वह इसे मनोरंजन, व्यसन और अपने शक्ति-प्रदर्शन का विषय मानती है। ऋषि के तपः कार्य से इन पशुओं का क्या लेना-देना?
"युवराज ! तपस्वियों ने सदैव प्रकृति की रक्षा की है, उन्होंने वृक्षों को अपना वात्सल्य दिया है, फूल-फल ही उनके स्नेही स्वजन और सहयोगी होते हैं। वन के मार्ग में कहीं कुश-कंटक नहीं रह जाएँ, इसके लिए ब्रह्मचारी गण सदैव सावधान होते हैं। मनुष्य तो मनुष्य कुश-कंटकों से वन्य जीवों को भी तो कष्ट हो सकता है। हम इसी ममता का दान देते हैं। मनुष्य की यही करुणा उसका देवत्व है, यही भाव महाभाव है। अखिल जीव के प्रति दया की भावना हो तो हमारी हर मनोकामना पूर्ण हो सकती है। राजा का कार्य अनाचार को समाप्त करना है, मूक और असहाय जीवों का नाश करना नहीं।
नल ने विनम्रता से कहा- "मुनिवर! आपका कथन मेरे लिए एक शिक्षा की भांति है। मेरे पिता महाराज वीरसेन युद्धप्रिय अवश्य हैं पर वह आखेट प्रिय नहीं हैं।"
मेरी विमाता का पुत्र मेरे कनिष्ठ भ्राता पुष्कर को आखेट में इतनी रुचि है कि वह जीव-दया को मनुष्य की दुर्बलता कहता है। वह तो यहाँ तक कहता है आखेट एक स्वर्णिम अवसर है, वह वाण विद्या और लक्ष्यवेध की प्रवीणता का सूचक है। उसकी उपस्थिति में हमारी आपकी ये बातें संभव नहीं थीं।"
"युवराज ! आपके तेज ने मुझे प्रभावित किया है। पुरुष - सौंदर्य भी इतना प्रभावकारी और इतना दिव्य हो सकता है, इसकी मुझे कल्पना नहीं थी। आप साक्षात् देवपुरुष की तरह हमारे इस तपोवन में पधारे हैं, आपका स्वागत मैं किन शब्दों में करूँ?"
"मुनिवर! आपकी वाणी में मैं शीतलता और शांति का अनुभव कर रहा हूँ। निश्चय ही, यह आपकी अपनी दीर्घ साधना का ही फल है। मैं आपके इस आश्रम के विषय में अधिक से अधिक जानने के लिए उत्कंठित हो रहा हूँ। राजकुल में राजकुमारों को बाल्यकाल से ही गुरुकुल में पठन-पाठन के लिए भेजने की प्रथा रही है। पर महाराज की इच्छा होते हुए भी मैं गुरुकुल में विद्याध्ययन के लिए नहीं जा सका, क्योंकि मेरी अपनी माता रानी माँ उसी समय दिवंगत हो गईं जब मैं दुधमुहाँ बालक था। बाद में दूसरी रानी माँ के आदेश से ऐसा नहीं हो सका। उन्हें अपने एक मात्र पुत्र पुष्कर से असीम अनुराग है, वे उसे एक क्षण भी अपनी आंखों से दूर नहीं करना चाहतीं, इसलिए उनके हठ के कारण महाराज ने राजमहल में ही हमें शस्त्र विद्या, मल्ल विद्या, राजनीति एवं शास्त्र-पुराणों का अध्ययन करवाया। हमारे आचार्यगण महर्षि पिप्पलाद की शिष्य परंमरा के थे।"
"युवराज! यह जानकर मुझे अतीव आनंद हो रहा है क्योंकि हमलोग भी उन्हीं महान् ऋषियों की शिष्य परंपरा में रहे हैं। हमारे वे ऋषि संभवतः आपलोगों की शिक्षा-दीक्षा के लिए ही दस-बारह वर्षों तक राजमहल की ही छत्र-छाया में रहे। उनकी मृत्यु के बाद महाराज ने जो हमारी तपस्या के लिए भूमि प्रदान की उसमें हम हिमाचल क्षेत्र से आकर यहाँ बस गए।"
"युवराज! हमारी गुरु परंपरा ऋषिवर दधीचि से प्रारंभ होती है। उनके ही शरीर-दान की अस्थियों से इन्द्र का वज्र बना था जिससे वृत्रासुर का वध हुआ, उन्हीं के पुत्र थे पिप्पलाद, जो शिव के भक्त और उनके अवतार स्वरूप थे। पीपल के वृक्ष के नीचे ही रहकर उनकी माता सुवर्चा ने शरीर त्याग दिया था। पीपल के वृक्षों द्वारा वे लालित-पालित होते रहे। ऋषि पिप्पलाद का वृक्षों से गहरा संबंध रहा।
आज भी हम वृक्षों को पूजते हैं, पीपल या पिप्पल, आमलक, आम्र, निम्ब, शमी ये सभी वृक्ष हम मनुष्यों के सहोदर की तरह हैं। ऋषिवर पिप्पलाद ने वृक्षों का पोषण और संरक्षण किया। हम सब तपस्वी उसी परंपरा का पालन कर रहे हैं, हमारी साधना इन वृक्षों की छत्रछाया में ही पूरी होती है। वन भी तो वृक्षों का समूह ही है। यही हरीतिमा तो पृथ्वी का परिचय बन जाती है।"
05.
युवराज नल की श्रान्ति मिट चुकी थी पर वन्य जीवन और आश्रमों की संस्कृति से वे प्रभावित हो रहे थे। उन्होंने पूछा-
"मुनिश्रेष्ठ! आप सभी यहाँ वन्य जीवन के अभ्यस्त हो गए हैं पर यह समस्त वन प्रदेश हिंसक पशुओं से भरा पड़ा है, क्या आप लोगों को भय नहीं लगता? यहाँ जीवन और मृत्यु के मध्य कितनी क्षीण रेखा खिंची हुई है।" "वत्स नल!" तुम्हारा ऐसा सोचना अत्यंत स्वाभाविक है पर भय का विज्ञान इतना ही है कि जिससे हम भयभीत होते हैं, वह स्वयं हमसे भयभीत रहता है। दूसरे, शास्त्र वचन हैं कि भय जब तक सामने समुपस्थित न हो जाए तब तक किस बात का भय? यह आश्रम-संस्कृति इसी भय को निर्मूल करती है। हम सब प्रीति और करुणा के भाव से भरे लोग हैं। हमारी आँखों में न हिंसा है, न विरोध, न विनाश की इच्छा, न किसी से कुछ छीनने का भाव। प्रेम की यह भाषा तो पशु भी समझते हैं। हमारे यहाँ ब्रह्मचारीगण ब्राह्ममुहूर्त में ही यज्ञ समिधा जलाकर जब हवन की आहुतियाँ देते हैं, सबका दीर्घ और सम्मिलित मंत्रोच्चार होता है तो वन की झाड़ियों के पीछे छिपी भयानक और बर्बर वन्य पशुओं की चमकती हरी-हरी आँखें यह सब देखकर मौन भाव से लौट जाती हैं। हमारी यह आहुति केवल साकल्य की आहुति ही नहीं आत्माहुति भी है। यही यज्ञ हमे जीवनी शक्ति देता है।"
"महात्मन्! आज इस वन-यात्रा से मेरी अनेक जिज्ञासाएँ शांत हो रही हैं। आप सब निर्विघ्न यज्ञ करते रहें और आपके मंगल आशीर्वाद से प्रजा का कष्ट दूर हो, हम तो यही चाहेंगे। आप पर कभी कोई विपत्ति आए तो आपके स्मरण करते ही यह नल आपकी सेवा में प्रस्तुत हो जाएगा।"
"राजकुमार! हम यह जानकर कृतकृत्य हैं कि आपके हृदय में मानुषी करुणा का अपार समुद्र बह रहा है। जब आपने जानना चाहा है तो मैं इस समूचे मध्य देश के किनारे बसे वन और ग्राम प्रांतरों के विषय में आपको कुछ बताना चाहूँगा। यह क्षेत्र क्षेत्रमात्र नहीं वन्य देश है। यहाँ के विराट वन खनिज और फल संपदाओं के भंडार हैं। यहाँ छोटी-छोटी जन जातियाँ, वन्य प्रजातियाँ बात-बात पर युद्धरत रहती हैं। इन्होंने हिंसक पशुओं से ही जीवन जीने का ज्ञान प्राप्त किया है। इनके कारण प्रजाजनों को भी घोर कष्ट झेलना पड़ता है। वन्य जातियों का मुख्य शासक राक्षसी स्वभाव वाला क्रूर राजा चूर्णक है। उसके तीन पुत्र हैं -अर्णक, ज्वालमुख और कुणिक। इनमें अर्णक और ज्वालमुख अत्यंत भयंकर, हिंसक और तामसी हैं, संपत्ति की लूटपाट और जघन्य हिंसा इनकी वृत्ति है। ये इतने क्रूर कर्मा हैं कि किसी अकेले या पूरे यात्री दल को लूटकर उनके रक्त को अपने शरीर पर उछालते, नाचते और सिर काटकर उससे कंदुक-क्रीड़ा करने लगते हैं। उनके उत्पात से लोगों ने कई वन-मार्गों पर आवागमन बंद कर दिया है, पर बाहर से आनेवाले यात्रियों और व्यापारियों को आसन्न संकट का तनिक भी अनुमान नहीं होता और वे मारे जाते हैं। चूर्णक का तीसरा-पुत्र कुणिक कई आश्रमों में आता-जाता और हमारी दिनचर्या में यदा-कदा चोरी-छिपे सहयोग भी करता है। उसके संस्कार भिन्न और दृढ़ हैं। उसी ने प्रजा की यह पीड़ा हमतक पहुँचाई है। यही नहीं आश्रमों में विविध राजाओं और श्रेष्ठियों द्वारा जो भी अन्न सामग्री, भोज्य सामग्री या स्वर्ण शृंग मंडित गौएं आती हैं, उन्हें भी वे दुष्ट बलपूर्वक छीन लेते हैं। ऐसे अत्याचारियों का अंत हो जाए, तभी ऋषि समुदाय का कल्याण संभव है।"
"मुनिवर! मात्र दो तीन पशुतुल्य बर्बर व्यक्तियों ने इतना अत्याचार और अनय मचा रखा है और निषध नरेश तक को यह ज्ञात नहीं है। इन्हें कुचलने में भला क्या समय लगेगा?"
"नहीं, युवराज! ये मनुष्य के वेश में राक्षस ही हैं। इन्हें दुर्बल समझने की भूल न करें। इन्होंने विगत वर्षों में अपनी सैन्य शक्ति बढा ली है, प्रस्तरों से एक विशाल महल की भांति सुरक्षित भवन भी निर्मित कर लिया है। ये असभ्य, अशिक्षित और कुसंस्कारी जीव केवल धन, मांसाहार और भोग-विलास में ही रुचि लेते हैं। इसके अतिरिक्त न ये कोई अन्य भाषा समझते हैं, न समझना चाहते हैं।"
"मुनिवर! मैं लौटते ही निषध-नरेश तक जन-जन की यह पीड़ा पहुँचाऊँगा और स्वयं भी चूर्णक एवं उसके सहयोगियों को कठोर दण्ड दूँगा। और कुणिक की कुशलता का ध्यान रखूँगा कभी-कभी पशु को पशुता की भाषा से ही समझाया जा सकता है। अब आप मुझे आज्ञा दें ताकि मैं शीघ्र ही इस वन को निर्विघ्न और हिंसक दुष्टों से मुक्त करा सकूँ।"
यह कहकर युवराज नल अपने घोड़े पर आसीन हो गए, लौटते समय उनकी मुखमुद्रा का तेज स्पष्ट बता रहा था कि दुष्टों का दलन और अन्याय का प्रतीकार ही किसी राजा का प्राथमिक कर्त्तव्य होना चाहिए।
06.
निषध-युवराज नल राजधानी पहुँचते ही स्नानादि से निवृत्त होकर सीधे अपने पिता महाराज वीरसेन से मिलने को तत्पर हो गए। उनके भीतर भांति-भांति के विचार किसी झंझावात की तरह उठ रहे थे। हमारे राज्य के सीमा क्षेत्र में इतना बड़ा अनर्थ हो रहा है और निषध-साम्राज्य मौन बैठा है। कहीं कभी किसी ने इसकी चर्चा तक नहीं की! जिस राज्य में मनुष्य जीवन, ऋषि-जीवन इस भयंकर आपदा से घिरा हो उसका उत्तरदायी कौन होगा? यह तो राजा का दायित्व है कि वह प्रजा की पीड़ा सुने, समझे, देखे और उसकी समस्याओं का निराकरण भी करे।
महाराज वीरसेन अस्वस्थ थे पर अपने वरिष्ठ मंत्रियों के साथ राजमहल के बाह्य कक्ष में बैठे वे राज-कार्य की योजनाओं पर विमर्श कर रहे थे। युवराज नल की आते देखकर महाराज वीरसेन के मुख पर प्रसन्नता की लहर आ गई। हर्षित होकर बोले -
"तुम आखेट से लौट आए। आज का तुम्हारा अनुभव कैसा रहा? क्या आखेट सफल रहा?"
"पिताश्री महाराज! सब कुशल है। आखेट के ही क्रम में मुझे आज वन के आश्रमों को देखने और समझने का अवसर मिला। आश्रम-जीवन की चर्चा तो हम बाल्यकाल से ही सुनते आए थे, पोथियों में पढ़ा भी था, पर प्रत्यक्ष का ज्ञान ही वास्तविक और विश्वसनीय होता है, यह आज ज्ञात हुआ।"
"हाँ, पुत्र! आश्रम-जीवन वन के महत्त्व को समझाते हैं। राजन्य वर्ग में भी गृहस्थाश्रम के बाद वानप्रस्थ आश्रम का महत्त्व है। सब कुछ त्यागकर हम वन की ओर प्रस्थान करते हैं, कठोर जीवन-शैली को स्वीकार करते हैं। हमारी राजसी वृत्ति वहाँ भी बनी रहती है। वानप्रस्थ आश्रम विश्राम के लिए नहीं सेवा के लिए होता है। राजा राजधानी की प्रजा को छोड़कर वन के जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों, जन-जातियों, ऋषि मुनियों आश्रमों, वृक्षों और वनसंपदाओं का रक्षक होता है। पुत्र नल! जीवन के चार विश्राम स्थलों या आश्रमों में वानप्रस्थ तीसरा आश्रम है। वन में निवास करते हुए शरीर तथा मन को विविध प्रकार के अनुशासनों में रखकर धार्मिक कार्यों के लिए उद्यत किया जाता है। इसका उद्देश्य ब्रह्मचिंतन के लिए चरित्र की निर्मलता, अपरिग्रही वृत्ति और सात्विक भावों की प्राप्ति है। इसके लिए यौगिक क्रियाओं द्वारा चित्तवृत्तियों का निरोध किया जाता है। यह वानप्रस्थ संन्यास आश्रम का पूर्व रूप है। हमारे समाज का निर्माण वर्ण और आश्रमों से हुआ है। वर्ण का आधार है मनुष्य की मूल प्रकृति और प्रवृत्ति, जिनसे वह जीवन में अपने प्रयत्नों और कर्त्तव्यों का पालन करता है। आश्रम का आधार है संस्कृति और व्यक्तिगत जीवन का संस्कार। यह संस्कार ही मनुष्य को शिक्षित और शीलवान बनाता है। मनुष्य जब जन्म लेता है तो वह एक अनगढ़ प्राणी मात्र होता है पर संस्कार से वह क्रमशः प्रबुद्ध और तेजवान बनता है। संपूर्ण मानव जीवन बाल्यकाल और किशोरावस्था, युवावस्था, प्रौढ़ावस्था और वृद्धावस्था के चार भागों में बँटा हुआ है। इन्हीं के अनुरूप चार आश्रम बनाए गए- वे थे-ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ और संन्यास। ये चार आश्रम चार प्रकार के पुरुषार्थों से भी जुड़े हुए हैं। वे पुरुषार्थ हैं धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। बाल्यकाल और किशोरावस्था में धर्म प्रधान होता है, युवावस्था के गृहस्थ धर्म में अर्थ और काम की प्रधानता होती है तथा वानप्रस्थ और संन्यास क्रमशः मोक्ष प्राप्ति की तैयारी और मोक्ष की प्राप्ति से जुड़े होते हैं। यह आश्रम-जीवन मनुष्य को मनुष्यता का पाठ पठाता है।"
"पिताजी ! आज मैंने राज्य के सीमावन में महर्षि उत्तंक का आश्रम देखा,
महर्षि से वार्तालाप भी हुआ। वे महर्षि पिप्पलाद की ऋषि परंपरा में आश्रमों का संचालन कर रहे हैं। किन्तु
कहते-कहते राजकुमार नल रुक गए। अकस्मात् उनके वाक् प्रवाह के रुक जाने से महाराज वीरसेन की उत्सुकता चिन्ता में बदल गई "किन्तु क्या पुत्र ! क्या कुछ अघटित घटा है? तुम्हारे एक शब्द ने मुझे चिंतित कर दिया।"
युवराज नल कुछ देर मौन बैठे रहे फिर उन्होंने वन्य सरदार राजा चूर्णक और उसके दोनों पुत्र अर्णक और ज्वालमुख के बर्बर कृत्यों की कथा कह सुनाई। महाराजा वीरसेन और उनके मंत्री इस कथा को सुनकर स्तब्ध रह गए। उनके राज्य के सीमा क्षेत्र के वन निरापद नहीं हैं, यह केवल आश्चर्य की ही नहीं अपितु लज्जा की बात थी।
अंततः, महाराज वीरसेन ने मौन भंग करते हुए कहा "पुत्र! प्रजा की इस भयंकर पीड़ा से हम परिचित नहीं थे, हमें कहीं से सूचना भी नहीं मिली। संभव है, उस क्षेत्र के हमारे गुप्तचर भी उन नराधम पशुओं द्वारा मार डाले गए हों। अब दुष्टों के संहार का समय आ गया है। तुम सेना सज्जित कर उनपर आक्रमण कर दो, यह तुम्हारा प्रथम युद्ध प्रजा पालन की शिक्षा के रूप में होगा।"
महाराज ने मंत्रियों को उचित तैयारी का आदेश दिया कि एक सप्ताह के भीतर चूर्णक और अन्य सभी अराजक तत्त्वों का नाश युवराज नल करेंगे। अब युवराज नल के प्रथम युद्ध की भूमिका बन गई थी।
युद्ध की वेशभूषा में सुसज्जित युवराज नल का चमकता मुख मंडल सूर्य की भांति प्रभावान लग रहा था। उस तेज में ऐसी उष्णता थी जो वन में दावाग्नि और समुद्र में वाड़वाग्नि बन जाती है। जैसे ही उन्होंने अपने शिर पर स्वर्ण हीरक मणि पंडित शिरस्त्राण पहना ऐसा लगा मानो पर्वत के शिखर पर नील मेदुर कांतिवाले मेघों का एक टुकड़ा आकर स्थिर हो गया हो।
युद्ध छोटा हो या बड़ा साहस, धैर्य, ओज और वीरता के साथ ही लड़ा जाता है। युवराज नल अपनी सेना की एक टुकड़ी के साथ दुगुने वेग से चल पड़े। आगे वन संकरा होता जा रह था, अभी वे वन के मध्य भाग तक पहुँच भी नहीं पाए थे कि ऊँचे वृक्षों की शाखाओं की ओर से सनसनाते हुए कुछ तीर समीप में गिरे, नल के दो सैनिकों के शरीर में वे तीर गहरे धंस गए थे और शेष वृक्षों से टकरा गए थे। राजकुमार ने तत्क्षण अपने वाणों से उन छिपे हुए शत्रुओं का विनाश कर दिया। झाड़ियों या वृक्षों में जहाँ भी सरसराहट या कोई ध्वनि होती वे शब्दवेधी वाणों से दस्युओं का संहार करना आरंभ करने लगे। शत्रु पक्ष के अनेक योद्धाओं को हताहत देखकर चूर्णक अपने परिवार के साथ घोर गर्जन करता और ललकारता हुआ सामने आ गया। बिना विचलित हुए नल अपना प्रहार करते गए और देखते-देखते सैकड़ों दस्यु योद्धाओं के शवों से वनभूमि पट गई। ज्वालमुख और अर्णक के मारे जाने से अत्यंत क्रुद्ध चूर्णक खड्ग लेकर नल पर टूट पड़ा। किन्तु नल का अश्व इतना प्रशिक्षित था कि उसने अपनी दिशा बदल दी और उसके पिछले पांवों की चोट से चूर्णक पृथ्वी पर गिर पड़ा। बड़ी सावधानी और क्षिप्रता से नल ने अपने भाले से उसका शिरश्च्छेदन कर दिया। अपने सरदार के गिरते ही शेष दस्यु भाग चले। वन में चारों ओर मृत शरीर और अस्त्र-शस्त्र बिखरे हुए थे। नल ने विजय का शंख फूंककर समस्त वन प्रदेश के निरापद होने की मानो घोषणा कर दी। यही नहीं, उन्होंने चूर्णक के छोटे पुत्र कुणिक को वन-प्रदेश का शासक बनाकर अन्याय और क्रूरता का अंत कर दिया।
07.
कुछ दिनों बाद ही राजा नल निषध देश के स्वामी बन गए थे। दिन-प्रति-दिन उनकी कीर्त्ति-गाथा फैल रही थी। वीरता, सुन्दरता और मानवीय गुणों के वे उपमान बन गए थे।, किन्तु चारणों द्वारा अन्य देशों के वर्णन के साथ-साथ कहीं-न-कहीं विदर्भ नरेश भीम की पुत्री दमयन्ती की चर्चा अवश्य होती थी, उसका अनिन्द्य सौंदर्य नल के मन में निरंतर उत्सुकता जगाता रहता था। विधाता की उस मनोरम सृष्टि के बारे में वे और भी जानना-सुनना चाहते थे और एक दिन उन्हें ऐसा सुयोग मिल भी गया। राजा नल के महल के पार्श्व में एक विशाल सरोवर था जिसमें रक्त, नील और श्वेत रंग के सहस्त्रों कमल खिलकर सुगंध और सौंदर्य का जादू बिखेरते थे। दमयंती के सौंदर्य के विषय में सोचते हुए उन्हें प्रकृति के सौंदर्य का स्मरण हो आया। एक दिन प्रातः काल अकेले राज्य के उस वाह्य उद्यान में वे पहुँच गये। वहाँ सरोवर का दृश्य अनोखा था। कमलों की पंक्तियों पर भ्रमरों का गुंजार हो रहा था, जैसे सुन्दर मुख पर काला टीका शोभा देता है वैसे ही कमल की पंखुड़ियों पर लिपटे भ्रमर उसके सौंदर्य को बढ़ा रहे थे।
उसी समय नल की दृष्टि कुछ हंसों पर पड़ी जिनके पंख सुनहले रंग के थे और किसी को भी आकर्षित करने में समर्थ थे। नल ने बड़ी सावधानी से उनमें से एक हंस को पकड़ लिया, हंस बहुत देर तक उनके हाथ से छूटने के लिए संघर्ष करता रहा। बीच-बीच में उसने अपनी चोंच से प्रहार भी करना चाहा लेकिन नल ने उस अदृष्ट पूर्व हंस को अपने हाथ में दबाये रखा। कुछ ही क्षणों में हंस ने शिथिल होकर मनुष्य की वाणी में कहना प्रारंभ किया -
"राजन्! मुझे मुक्त करने की कृपा करें। मैं तो आपके इस पद्म सरोवर से स्वयं के लिए तथा अपनी पत्नी के लिए कमल नाल तोड़ना चाहता था। आप महान् सम्राट् हैं और महान् व्यक्तियों के पास किसी प्रकार की क्षुद्रता नहीं होती। मेरी पत्नी गर्भवती है, मुझे भोजन लेकर उसके पास जाना है। आप करुणामय हैं। कृपापूर्वक आप मुझे स्वतंत्र कर दें।"
राजा नल द्विविधा में पड़कर करणीय और अकरणीय कर्म के विषय में सोचने लगे। उनके द्वन्द्व को समझकर हंस बोला
"महाराज! आपकी कीर्त्ति और सुन्दरता की कथा जैसे त्रिलोक में फैल रही है वैसे ही विदर्भ देश की राजकुमारी दमयन्ती का अपूर्व सौंदर्य सवत्र चर्चा का विषय है। यदि आप मुझे मुक्त कर देंगे तो मैं विदर्भ नगरी जाकर राजकुमारी दमयन्ती के समक्ष आपके स्वरूप और सद्गुणों की विस्तार-पूर्वक कथा कहूँगा। मुझे विश्वास है कि उसे सुनकर दमयंती के हृदय में भी अनुराग का बीज पल्लवित हो जायेगा, तब आप निश्चय ही मेरा आभार मानेंगे।"
यह सुनते ही नल के हाथ का बंधन शिथिल हो गया और हंस मुक्त होकर उड़ चला। राजा नल के हृदय में दमयंती का प्रेम उसके रूप, गुण, श्रवण के कारण पूर्वराग के रूप में स्थापित हो चुका था।
हंस अपने उत्फुल्ल रोम शरीर को अनेक बार कँपाते हुए राजा नल की कर-यंत्रणा से अपने ऊँचे-नीचे हुए पंखों को अपनी चोंच से खरोंच कर व्यवस्थित करने लगा। वह एक स्थान पर बैठकर अपने एक पैर को मोड़कर जंघे के पंख को मध्य से ऊपर तक ले जाते हुए जल्दी-जल्दी सिर खुजाने लगा। उसके चंचुपुट तेजी से चल रहे थे और पंखों को सुव्यवस्थित करने में लगे थे। वह पुनः उड़ता हुआ नल की बाँह पर आकर बैठ गया। नल का मन कौतूहल से भर गया।
हंस बोला "राजन्! आपके दया-धर्म ने मुझे प्रभावित कर लिया है। मछलियाँ अपने कुल के निर्बलों को खा जाती है, पक्षी अपने आश्रय वृक्षों को ही कष्ट पहुँचाते हैं, मृग अपने पैरों की चोट से निर्दोष घास आदि पौधों को कुचल डालते हैं, अतः इनका आखेट करने में पाप नहीं लगता। देव! मैं आपका किंचित प्रत्युपकार करना चाहता हूँ। मैं विदर्भ देश के राजा भीम की पुत्री दमयन्ती के विषय में आपको बता रहा हूँ, वह कन्या अपनी शरीर-कांति से त्रिभुवन की सुन्दरियों की कमनीयता का दमन करती हुई उत्पन्न हुई थी, इसलिए उसका नाम दमयन्ती रखा गया था। वह दमयन्ती दूसरी लक्ष्मी की तरह तथा शिव के मस्तक पर विराजित चंद्रकला की तरह सुकोमल और सुन्दर है। उसकी वयः संधि में मानो लावण्य का प्रवाह चलता रहता है। ऐसी अपूर्व सुन्दरी के योग्य वर के रूप में मैंने संपूर्ण त्रिलोक में आपको ही योग्य पाया है। राजन् ! जैसे नहीं फलनेवाले बांझ पेड़ के फूल व्यर्थ होते हैं, उसी प्रकार दमयन्ती के बिना आपका रूप व्यर्थ है, आपकी समस्त श्री सम्पन्ना भूमि निष्फल है और यह पिक कूजित वाटिका भी व्यर्थ ही है। राजन् ! मैं दमयंती के समक्ष आपकी ऐसी प्रशंसा करूँगा कि वह सुन्दरी आपको अपने हृदय में किसी देवमूर्त्ति की तरह प्रतिष्ठित कर लेगी।"
नल ने प्रीतिपूर्वक हंस का कोमल स्पर्श करते हुए कहा- "मित्र हंस ! तुम्हारा रूप और गुण दोनों अतुलनीय हैं। तुम्हारा केवल शरीर ही स्वर्णमय नहीं, वाणी भी सुवर्ण या सुशब्दमयी है। तुम्हारा पक्षपात मुझ जैसे निरवलंब व्यक्ति के लिए भी होता है, यह मैं स्पष्ट देख रहा हूँ। तुम्हारे सामीप्य से मेरा हृदय जुड़ा गया है। तुम्हारे कारण दमयंती मुझे कर्ण गोचर ही नही दृष्टिगोचर जैसी हुई है। मैं पुरुष हूँ, अधीरता पुरुषों का स्वभाव है, तुम्हारी बोली ने वैदिक ऋचाओं की तरह मुझे घृत और मधु की तरह उसकी रूप-चर्चा से मेरी कामाग्नि को प्रदीप्त कर दिया है। मेरे मन की पीड़ा समुद्र की तरह तरंगित हो रही है और उसमें मात्र तुम्हीं किसी नौका की तरह मुझे प्रतीत हो रहे हो। जाओ मित्र ! तुम्हारा मार्ग मंगलमय हो। मेरा अभीष्ट पूरा करो। पक्षिराज ! मुझे पुनः अवश्य मिलना।"
वह स्वर्ण हंस कुंडिनपुर की ओर उड़ चला। उसे मार्ग में जल भरे कलश और आम्र भार से लदे वृक्ष दिखाई पड़े जो उसकी यात्रा के लिए शुभ शकुन की तरह थे। उड़ते समय वेग के कारण उसके पंख में मीठी झंकार हो रही थी। अंत में वह दीर्घ यात्रा के बाद महाराज भीम की नगरी कुंडिनपुर पहुँचा, वहाँ के गगनचुंबी महल कैलास पर्वत की तरह अमल धवल थे। शीघ्र ही हंस कुण्डिनपुर के नगर भाग से होता हुआ दमयंती की क्रीड़ा-वन में पहुँच गया।
हंस के स्वर्णिम पंखों की झनझनाहट ने दमयंती का ध्यान सहसा आकृष्ट कर लिया। पास में चरते उस हंस को पकड़ने की इच्छा से दमयंती सांस रोककर क्षणभर शांत और निश्चल हो गई, ताकि वह कुशलतापूर्वक हंस को पकड़ सके। धीरे-धीरे वह चतुर हंस फुदकता हुआ आगे बढ़ता रहा और उसे पकड़ने के उपक्रम में दमयन्ती आगे की ओर सरकती गई। उसकी सखियाँ उसके इस प्रयत्न पर ताली बजाकर हँस पड़ीं तो दमयन्ती ने उन्हें अपने पीछे आने से रोक दिया और बोली-
"मैं स्वयं ही हंस के साथ क्रीड़ा करती हुई उसे पकड़ना चाहूँगी, तुम में से कोई मेरे पीछे-पीछे नहीं आएगा।"
हंस के नहीं पकड़ पाने के कारण वह थोड़ी लज्जित भी हो रही थी। हंस भी हंसगामिनी दमयन्ती की चाल का मानो अनुकरण करता हुआ आगे-आगे चल रहा था। वह अगला पैर उठाकर हंस को पकड़ना चाहती पर उसका वह प्रयत्न बार-बार निष्फल हो जाता। धीरे-धीरे वह हंस दमयन्ती को एकांत लता-कुंज की ओर खींच ले गया और मनुष्य वाणी में बोला-
"सुन्दरि! हम ब्रह्मा के वाहन हंस वंश के सहायक पक्षी हैं। हमारी गति आकाश में भी है और तुम केवल पृथ्वी पर चल सकती हो। ब्रह्मा से आज्ञा लेकर हम कुछ स्वर्णिम हंस नैषधीय क्रीड़ा-सरोवर का आनंद लेने और मृणाल नाल खंड का भोजन लेने आए थे। वहाँ हमने राजा नल को कामदेव से भी सुन्दर और मोहक पाया। उनकी वाणी में अमृत था, व्यवहार में मृदुता थी और उनके संस्कार में शील था। तुम्हारी चिन्ता में नल प्रतिपल चिन्तित दुखी और पीड़ित दिखाई पड़े। क्या सचमुच प्रियता मनुष्य को इतना दुर्बल और हतचेत भी बना सकती है? उनके हृदय में कल्पवृक्ष की तरह तुम्हारा ही स्वरूप स्थापित हो गया है, तुम्हारी उंगलियों के सुन्दर नख उसके अंकुर पत्र हैं तुम्हारी भृकुटियाँ उसके दो पत्ते हैं, तुम्हारा अधर उसका मध्य दल है, तुम्हारे मृदुल करतल उसके पल्लव हैं, तुम्हारी मुस्कान ही उसकी कलिका है, तुम्हारे शरीर की मृदुता ही उसके खिले हुए फूल हैं तथा तुम्हारा वक्ष ही मानो उसके फल हैं। नल की तपस्या का तुम मानो मूर्त रूप हो। मैंने राजा नल को कभी कराहते, कभी मुस्कुराते, कभी बिलखते देखा, वह तुम्हारी स्मृति के दंश से कभी मूच्छित तो कभी अत्यंत विकल हो रहे थे। तुम्हारे स्नेह-पाश से ही अब उन्हें शांति मिल सकती है।"
"हे पक्षिराज ! संभवतः तुम ठीक कह रहे हो। क्योंकि मेरे हृदय में उन्हें देखने की पिपासा जाग उठी है, वे दृष्टि से, स्पर्श से, सभी इंन्द्रियों से मुझे समीप प्रतीत होते हैं। आज तुम्हारे जैसा हितैषी बन्धु पाकर मैं कृत कृत्य हूँ। अगर नल मुझे नहीं मिले तो अनल अर्थात् अग्नि में ही मैं यह जीवन समाप्त कर दूँगी।"
कहते-कहते दमयन्ती की आँखों से अश्रुधारा बह चली। हंस ने उसे समझाने का यत्न करते हुए 'तुम्हारा मंगल हो' यह कह कर नल की राजधानी की ओर बड़े वेग से उड़ चला।
निषध देश के उसी पद्म सरोवर में वह हंस प्रातः काल पहुँच गया। वहाँ उसने विरह पीड़ा से तप्त नल को दूसरे सूर्य की तरह उदीयमान होते देखा। नल उसे देखते ही ऐसे हर्षित हो गए जैसे सूर्य किरणों के स्पर्श से कमल-दल खिल जाते हैं। हंस आकर उनके सामने बैठकर कुण्डिनपुर की यात्रा की सारी कथा सुनाता रहा। दमयन्ती की काम-वेदना नल से छिपी नहीं रह सकी। उत्तेजना और आह्लाद के कारण नल के मुख से शब्द नहीं निकल रहे थे, वे बार-बार हंस से कहते-
"सखे ! तुमने मेरा अभिप्राय सिद्ध कर दिया, मुझे फिर बताओ दमयंती के कहे हुए शब्दों को मैं पुनः पुनः सुनना चाहता हूँ। तुम बार-बार कहते जाओ और मैं बार-बार सुनता जाऊँ, यही मेरे जीवन का परम फल है।" हंस के द्वारा सारा संवाद सुन लेने के बाद भी अकेले ही नल दमयंती द्वारा उच्चारित शब्दों को एकांत में दुहराते रहे। काम और प्रेम दोनों ने उनका हृदय जीतकर उन पर अपनी विजय-ध्वजा लहरा दी थी।
08.
समय के रथ चक्र में वेग तो होता है पर वह निश्शब्द भी चलता है। केवल प्रतिक्रियाओं से ही ज्ञात होता है कि वह वेग सुखद है या दुखद।
महाराज वीरसेन ने अपने निषध देश के उत्तराधिकारी युवराज नल को स्वयं राज्याभिषिक्त कर वानप्रस्थ का आश्रय ले लिया था। अब युवराज नल महाराज और निषध देश के शासक हो गए थे। जैसे-जैसे वे युवा हो रहे थे उनकी अंग कान्ति निखर रही थी, उनका विशाल वक्ष किसी पर्वत की तरह दृढ़ था, उनकी दोनों भुजाएँ नुकीली चट्टानों की तरह शक्ति संपन्न थी। उनका चमकता हुआ भाल किसी दीप्त सूर्य की तरह प्रभावान था। शरीर सौष्ठव के साथ नल की आँखें करुणापूर्ण प्रतीत होती थीं। जैसे पर्वतों पर हरीतिमा और निर्झरों का जल प्रवाह होता है, वैसे ही नल एक संपूर्ण मनुष्य के रूप में किसी को भी सहज ही आकर्षित कर लेते थे। सुंदरता और गुणों का यह मिश्रण अनोखा था। नल के शरीर में यौवन उसी प्रकार प्रविष्ट हुआ था जैसे वन में कामदेव के मित्र वसंत का आगमन होता है। महाराज नल के शरीर की करोड़ों रोम-राजि ऐसी प्रतीत होती थी मानो ब्रह्मा ने उनके गुणों को गिनने का प्रयास किया हो। नल देश-प्रदेश से पधारे चारणों के मुख से विदर्भ कुमारी दमयन्ती के सौंदर्य का यशोगान सुनकर मन ही मन पुलकित होते तो उधर विदर्भ कुमारी दमयंती भी राजा नल की कीर्त्ति-गाथा और उनके दमकते हुए सौंदर्य और प्रभाभास्वर मुख की कल्पना से कभी रोमांचित तो कभी अनुरक्त होतीं। उस पर हंस का संदेश और महाराज नल की रूप-माधुरी के विषय में जानकर दमयंती का हृदय अपने वश में नहीं रह गया था। उधर चारण राजाओं का चरित गान करते हुए नल की ही रूप-माधुरी की चर्चा करते। निषध देश से आए ब्राह्मणों, गुणीजनों और बंदी चारणों के द्वारा नल की यशोगाथा सुनकर दमयंती कभी प्रमुदित, कभी अन्यमनस्क और कभी उदास हो जाती।
यह यौवन केवल तन में ही नहीं मन में भी आता है, वस्तुओं को देखने का ढंग बदल जाता है, कभी एकांत प्रिय लगने लगता है तो कभी कोलाहल। प्रकृति के निरंतर बदलते हुए दृश्य, सौंदर्य की गतिमयता का आभास कराते हैं। दूर देश के होकर भी नल दमयंती के स्वरूप की कल्पना करते, उसे समीप, अत्यंत समीप अनुभव कर रामांचित पुलकित होते। कैसी होगी विदर्भकुमारी?
प्रकृति के विविध पदार्थों से उसकी रूप-छवि की तुलना करते, अंत में उन्हें यही अनुभव होता कि वह किसी एक वस्तु से तुलनीय नहीं हो सकती, वह समस्त प्रकृति का समाहार है, यह सौंदर्य अखंड है और उसके समुच्चय में ही उसका आस्वादन संभव है!
राजा नल दमयंती के अनदेखे रूप पर मोहित थे और नल की सुन्दरता पर कुमारिकाएँ मुग्ध होतीं। किन्तु नल के चित्त में किसी प्रकार का विकार नहीं था। वे केवल दमयंती के ही चिन्तन में डूबे रहते। राजकार्य या समूह में बैठने पर नल की काम-दशा किसी प्रकार छिपती नहीं थी। एक दिन अपने कुछ विश्वासी मित्रों के द्वारा उन्होंने अपना 'पुरोपकंठ उपवन' देखने की इच्छा प्रकट की। उनके आदेश से उनके भृत्य एक तीव्रगति से दौड़नेवाले उज्ज्वल-धवल अश्व को अश्वशाला से लेकर आ गए। वह अश्व किसी पुरुष की ऊँचाई से भी अधिक सुदृढ़ और विशेष रूप से अलंकृत था। उसके गले में देवमणि नामक भवंरी थी तथा कंठ के पास चन्द्र किरणों की तरह स्कंध-केश लहरा रहे थे। वह अपना खुर पटक कर अपने भीतर के छिपे हुए वेग को प्रकट कर रहा था। वह यह जानता था कि अश्वविद्या में प्रवीण राजा इसलिए भी मौन हैं कि उसके वेग के दर्प को समझ रहे हैं। वह अश्व श्वेत कांति, चंचल पुच्छ और अपने दो चामर चिह्नों के कारण मानो सूर्य के रथ के घोड़ों का भी उपहास कर रहा था। महाराज नल सिन्धु देश के चन्द्रधवल उस घोड़े पर आसीन हुए जैसे सूर्य के पीछे-पीछे उनकी किरणें चलती हैं, वैसे ही उनके मित्र एवं अन्य अनेक सुरक्षाकर्मी घुड़सवार उनके पीछ-पीछे चल पड़े। क्षण भर में नगर से बाहर होते ही महाराज नल अपने सहयोगी मित्रों के साथ नाट्य-क्रीड़ा और एक काल्पनिक युद्धाभ्यास में लग गये। चारों ओर से शस्त्र उठाए, क्रोध से आँखें लाल किये 'रोको', 'मारो', 'वध कर दो' जैसा उत्तेजक स्वर आने लगा। यह एक काल्पनिक युद्धाभ्यास का खेल था, इसमें सब की नाट्यमुद्रा वैसी ही कठोर, आक्रामक थी जैसी वास्तविक युद्धभूमि में हुआ करती है। तीव्र हस्तसंचालन, मुखमुद्रा और भांति-भांति के उत्तेजक स्वरों के कोलाहल के कारण वह कृत्रिम युद्ध उस युवावर्ग की शक्ति को व्यक्त कर रहा था। उनके घोड़े अपनी तीव्रता और खुरों की चोट से पृथ्वी की धूल को आकाश तक उड़ा रहे थे।। वे सभी मित्र गर्व-मुद्रा में बोल रहे थे कि हमारी तीव्रगति के सामने यह पृथ्वी कितनी छोटी पड़ रही है। अगर सागर भी स्थल बन जाता तो हम उसे भी लाँघ जाते। नल किसी चक्रवात और बवंडर की तरह गोल-गोल घूम रहे थे। उनके इस कौशल को देखकर सभी आश्चर्यचकित थे।
इस क्रीड़ा के बाद नल को उनके उपवन के माली प्रत्येक फूल और फल का मर्म बता रहे थे। पर जब उन्होंने अनार के वृक्षों में उसके झुके हुए लालिमा युक्त फलों की देखा तो उन्हें अचानक दमयंती की देह कांति की झलक उनमें दिखाई दी। सौंदर्य भार से झुके हुए वे फल उनके मन को उड़ाकर हठात् जैसे विदर्भ देश ले गये। उनका मन पुनः विचलित हो गया। वे सोचने लगे- "दमयंती की प्रतिच्छवि मेरे साथ चलती है। मैं जो भी देखता हूँ उसमें उसी का बिम्ब झलकता है। मैंने उसे देखा नहीं है, पर मेरा रोम-रोम उसके कोमल-मादक स्पर्श का अनुभव कर रहा है। जब उसके रूप, गुण, श्रवण से उत्पन्न मुझे इतना आनंद मिल रहा है तो साक्षात् उसे देखकर, मिलकर या उसे पाकर मेरी क्या दशा होगी?"
राजा नल का चित्त फिर उद्घांत हो गया। मित्र या सखा तो तात्कालिक सुख ही दे सकते हैं। चित्त की वास्तविक परिपूर्णता और शांति तो प्रेम में ही संभव है। यह सोचकर नल ने पुनः किसी दूसरे दिन अपने इस उद्यान में अकेले आने का विचार किया। वे भांति-भांति के पक्षियों की चहचहाहट को सुनते हुए उन्हें पुनः देखने की इच्छा लेकर सबसे साथ राजधानी की ओर लौट पड़े।
09.
दमयंती से संभाषण कर वह स्वर्ण हंस तो निषध देश की ओर प्रयाण कर गया पर दमयंती अनमनी हो गई। नल जैसा महाप्रतापी सम्राट उसके हृदय में सहसा समा गया है, उनके सौंदर्य से उसका चित्त अभिभूत है, उसका शरीर उसके स्पर्श के लिए व्याकुल हो गया है, पंच तन्मात्राओं से वह नल को पाने के लिए व्यग्र हो उठी, उसे रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द सबके द्वारा नल का साक्षात्कार और सामीप्य चाहिए। यह विकलता काम-ज्वर की तरह उसके शरीर और मन को वेधने लगी। उसने घूमना, बातें करना, सखियों के साथ क्रीड़ा करना बंद कर दिया, उसे एकांत प्रिय लगने लगा था, सर्वत्र उसे नल का आभास होता और वह उस छाया-मूर्त्ति के पीछे-पीछे दौड़ पड़ती। वह निषध देश की दिशा से आनेवाली वायु को अपने श्वास में भर लेती पर अन्ततः वह भी निःश्वास के रूप में बाहर निकल जाती। नल यह एक शब्द उसके भीतर एक वीणा के निनादित स्वर या वंशी-स्वर की तरह देर तक गूंजता रहता। वह स्वयं ही नल का नाम लेती, स्वयं ही सुनती और फिर असहायता का अनुभव कर मूच्छित हो जाती।
दमयंती की सखियाँ पहले तो भाँति-भाँति के साधनों और द्रव्यों से उसका यथासंभव उपचार करने का प्रयत्न करती रहीं पर दमयंती की दशा दिनोंदिन दयनीय ही होती गई। अंततः राजमाता और राजा भीम तक यह सूचना गई। माता-पिता और वैद्यराज की पारस्परिक सहमति से निर्णय हुआ कि दमयंती अब विवाहयोग्य हो गई है, उसे उसकी प्रिय वस्तु तो मिलनी ही चाहिए। इसलिए महाराज भीम ने दमयंती के स्वयंवर का निश्चय किया। वे अपनी प्राणप्रिय पुत्री की हर अभिलाषा की पूर्ति में सचेष्ट हो गए।
उधर हंस उड़ता हुआ पुनः निषध देश में महाराज नल की पुरोपकंठ वाटिका में पहुँच गया। प्रातः काल की मधुर बेला में राजा नल सूर्यकिरणों में दमकते हुए स्वर्णपंखी हंस को पुनः देखकर विकल भाव से उसकी ओर दौड़े-"तुम आ गए? तुम मेरे सच्चे हितू और सच्चे सखा हो गए हो। मुझे बताओ, क्या तुमने मेरी प्रिया दमयंती के दर्शन किए? वह कैसी है? तुमने उससे क्या कहा? मुझे शीघ्र बताओ मित्र! मेरा कौतूहल मिटाओ, मुझे शांति तो मिले।"
हंस मीठी चाल से फुदकता हुआ स्वयं राजा नल के हाथों पर बैठ गया और मीठी वाणी में बोला-
"महाराज! मैं राजकुमारी दमयन्ती की क्रीड़ा-वाटिका में जब पहुँचा तो वे सखियों के मध्य शांत बैठी हुई किसी विचार में निमग्न थीं। मुझे देखकर उनके मन में कौतूहल जागा। वे मुझे पकड़ने के लिए आगे बढ़ीं। मैं भी धीरे-धीरे आगे बढ़ता हुआ एक सघन कुंज की ओर उन्हें ले गया। तब तक उनकी सखियाँ पीछे छूट गयी थीं। मैंने जैसे ही रुककर यह कहना चाहा कि मैं स्वर्णपंखी हंस भगवान ब्रह्मा के वाहन का वंशज हूँ, और अभी मैं निषध देश से आ रहा हूँ। निषध शब्द सुनते हीं राजकुमारी रोमांचित हो गईं। वे बोल पड़ीं- "निषध देश से? मुझे और बताओ? मैं सुनना चाहती हूँ।" मैंने कहा- "मुझे महाराज नल ने अपने हाथों में उठा लिया था और मैं उनसे बातें कर रहा था।" यह सुनते ही राजकुमारी दमयन्ती ने भी मुझे अपने हाथों में उठाया। मैं आज भी उस स्पर्श की पुलक का अनुभव कर रहा हूँ।"
"मेरे प्रिय हंस! तुम्हें छूकर मैं भी पुलकित हो रहा हूँ। हंस फिर बोला-'आपका नाम लेते ही राजकुमारी दमयंती विकल हो गईं। वे आपके विषय में पूछना चाहती थीं, बहुत कुछ कहना चाहती थीं, पर उनका कंठ रुँध गया और उनकी आँखों से टपकी हुई अश्रु की बूंदें मेरे मस्तक पर गिर पड़ीं मैंने बस इतना ही कहा- 'महाराज नल आपसे शीघ्र मिलेंगे। आप दोनों की प्रीति अक्षुण्ण रहेगी।'- यह कहकर मैं वहाँ से उड़ चला। उस समय भी वे मुझे स्नेह और कृतज्ञतापूर्ण दृष्टि से देख रही थीं। यह सुनते ही महाराज नल अत्यंत विकल हो गए। उन्होंने हंस के मस्तक को धीरे से सहलाकर चूम लिया और कहा- 'मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ, जाओ मेरे प्रिय हंस, तुम्हारी यात्रा निर्विघ्न हो।"
10.
सूर्योदय की प्रथम किरण ने निषध देश के राजमहल के स्वर्णिम शिखरों का स्पर्श करते हुए गवाक्षों द्वारा महाराज नल के प्रकोष्ठ में प्रवेश किया। उस समय महाराज नल सुसज्जित होकर किसी बड़ी यात्रा के लिए तत्पर हो रहे थे। अभी अधिक दिन नहीं बीते थे जब उनके पिता महाराज वीरसेन ने उनका राज्याभिषेक कर शासन और प्रजा का समस्त उत्तदायित्त्व उन्हें सौप दिया था और स्वयं वानप्रस्थ लेकर वन की ओर प्रस्थित हो गये थे। नल ने उन्हें रोकने की चेष्टा भी की और आग्रह किया था कि "आप अभी सर्व समर्थ, शक्ति संपन्न प्रजा के पालक और हमारे परमपूज्य पिता हैं। अभी राज्य का परित्याग करना क्या आपके लिए उचित होगा?"
"पुत्र नल! कोई भी त्याग तभी शोभा देता है जब सामर्थ्य और शक्ति शेष हो। असमर्थ व्यक्ति के त्याग का कोई अर्थ नहीं होता। और तुम त्याग क्यों कहते हो? यह तो समर्पण है, उत्तराधिकार का समर्पण, इसे तुम परंपरा का पालन भी कह सकते हो। इसमें नया कुछ नहीं है। यह इतिहास और पूर्वजों के नियमों का पालन भर है।"
तब से महाराज नल निषध देश की प्रजा के सुख-दुख में तल्लीन हो गए थे। पर इसी बीच जब से सुनहरे पंखों वाले हंस ने दमयंती के शील और सौंदर्य का वर्णन किया था। तबसे उनका चित्त उनके वश में नहीं रहा। चारणों और बंदी जनों ने विदर्भ देश की राज कन्या सुकुमारी सुन्दरी दमयंती के अपरूप लावण्य का बार-बार ऐसा स्तुतिगान किया कि नल का हृदय प्रतिपल दमयंती के रूप-दर्शन और सामीप्य की अभिलाषा से तरंगित होता रहा। उनके चित्त में चैन नहीं था। उन्होंने सुन रखा था कि स्त्री-सौंदर्य मादक और द्रावक होता है। पर वह मारक होकर चित्त को बेध सकता है, इसकी उन्हें कोई कल्पना नही थी। अब उनकी भाव-प्रिया दमयंती का स्वयंवर हो रहा था। वे शीघ्रातिशीघ्र विदर्भदेश की राजधानी कुंडिनपुर मानो उड़कर पहुँच जाना चाहते थे, तभी सेवक ने आकर सूचना दी कि बाहर स्वर्ण रथ आपकी प्रतीक्षा में तैयार खड़ा है और आपके आदेशानुसार आपके सबसे प्रिय और तीव्र गति वाले दो अश्व अर्णव और भद्र उसमें लगा दिए गए हैं। नल को दोनों अश्वों के विषय में जानकर संतोष हुआ।
नल की रुचि तीन बातों में थी एक तो वे महान वीर थे और दोनों हाथों से अश्व पर बैठे-बैठे तीव्रता के साथ अस्त्र-शस्त्रों का संचालन कर सकते थे। उनकी दूसरी रुचि अश्व-विद्या में थी। उन्होंने वैदिक मंत्रों में अश्विनी कुमारों के देवत्व और वैद्यक ज्ञान का अध्ययन किया था। वे अश्वों की शक्ति से परिचित थे। वे जानते थे कि अश्व अपनी पीठ पर सवार होनेवाले योद्धा के बैठने के ढंग से ही उसकी पहली परख कर लेते हैं। दूसरी परख वे तब करते हैं जब उनपर सवार योद्धा उन्हें अपने हाथों से स्पर्श करता और थपथपाता है। तीसरी परख योद्धा की तब होती है जब वह घोड़े की लगाम को खींचता या ढीली करता है और चौथी परख सवारी करते समय योद्धा के पाँवों की ऐंड़ से होती है। पाँवों का स्पर्श और ठोकर से घोड़े अपने स्वामी की पहचान कर लेते हैं। उनका हिनहिनाना, सिर हिलाना, पूंछ उठाना और कंधे के बालों का रोमांचित होना उनकी अनुकूलता या प्रतिकूलता को व्यक्त कर देता है। इन सबसे पहले घोड़े दृष्टि और स्पर्श की भाषा समझते हैं। स्वामी की आँखों से ही मानो उन्हें आदेश प्राप्त हो जाता है। महाराज नल इस अश्व विद्या में इतने प्रवीण थे कि घोड़े के किस अंग पर हाथ या उंगलियों की चोट से कितना थपथपाना है और लगाम पर कितना नियंत्रण रखना है, इसका उन्हें पूरा परिज्ञान था। उनके हजारों अश्वों में से अर्णव और भद्र उनके संकेत की हर भाषा समझते थे। आज वे रथ में जुतकर महाराज को दमयंती की प्राप्ति में सहयोग करने जा रहे थे। महाराज नल को एक तीसरी क्रीड़ा भी पसंद थी। वह थी द्यूत-क्रीड़ा। उन्हे पाँसे फेंकने में आनंद आता था। किसी अनिश्चित को निश्चित जीत में बदलकर उन्हें युद्ध में किसी देश पर विजय प्राप्त करने जैसा सुख मिलता था।
महाराज नल अपने सुसज्जित रथ पर आसीन हो गए। वह रथ स्वर्णिम आभा से दमक रहा था। उसमें विश्राम और विलास के अनेक साधन एकत्र थे। लम्बा चौड़ा वह रथ किसी सज्जित प्रकोष्ठ की तरह लग रहा था। उसके सभी ओर बड़े-बड़े गवाक्ष थे, जिन्हें आवश्यकतानुसार सुरक्षा की दृष्टि से खोला या बंद किया जा सकता था तलवार, कटार, गदा एवं साथ ही युद्ध की आपद स्थिति में धनुष-वाण, तूणीर, भाले जैसे अस्त्र-शस्त्रों का भंडार भी था। रथ के पीछे-पीछे लगभग सौ घुड़सवार सैनिकों का दस्ता तथा यात्रा के लिए कुछ अन्य रथ भी साथ-साथ चल रहे थे, जिनमें राज्य के कुछ प्रमुख अधिकारी और अनुभवी परामर्शदाता भी थे।
स्वयंवर के लिए महाराज नल की यह यात्रा लम्बी थी जो आर्यार्वत्त के मध्य भाग से चलकर दक्षिण-पश्चिम कोण में स्थित कुंडिनपुर तक चलनी थी। अब यात्रा आरंभ हो गई थी। अबतक नल ने जो यात्राएँ की थीं, वो प्रायः शांति स्थापना के लिए दुष्टों के दलन के लिए थी या राज्य विस्तार के लिए। पर आज नल प्रीति के क्षेत्र में पदार्पण करने जा रहे थे, कामदेव ने उनपर अपना पुष्पवाण चला दिया था और उसके सामने एक विजयी योद्धा शस्त्र समर्पण कर, घुटने टेककर पराजित मुद्रा में बैठ गया था। रथ उड़ा जा रहा था, घोड़ों की टाप किसी वाद्य की तरह बज रही थी, अब रथ वन-प्रदेश से होकर आगे दौड़ रहा था। आस-पास प्रकृति की हरीतिमा लुभा रही थी। वन-शावकों के भांति-भांति के स्वर एक मिश्रित आनंद का अनुभव करा रहे थे। रथ दौड़ रहा था पर प्रकृति स्थिर थी। वह संकेत कर रही थी कि सौंदर्य की स्थिरता में भी गतिमयता होती है। उन्होंने पहाड़ों से झरते हुए छोटे-छोटे झरने देखे। उन्हें ऐसा अनुभव हो रहा था जैसे दमयंती का सौंदर्य मानो एक समुद्र है जिसमें सारे नद-निर्झर समाहित होने वाले हैं।
11.
विदर्भ कुमारी दमयन्ती के स्वयंवर में भाग लेने के लिए राजा नल की यात्रा एक प्रकार से अविराम चल रही थी। तीव्र गति से घर्घर नाद और घोड़ों की टापों का सम्मिलित स्वर पृथ्वी से आकाश तक गुंजित हो रहा था। नल का मन रथ की गति से भी तीव्र होकर कुंडिनपुर पहुँचना चाहता था। दमयंती के दर्शन की लालसा ने नल की उत्सुकता भी बढ़ा दी थी और उनके चित्त को विकल भी कर दिया था। नल ने सोचा मनुष्य की शक्ति इतनी सीमित है, उसका समस्त जीवन पृथ्वी के राग और रंग से जुड़ा हुआ है, जबकि देवता और दानव अपनी सूक्ष्म और मायावी शक्तियों से कहीं भी प्रकट या अन्तर्धान हो सकते हैं, लेकिन मनुष्य अपने स्वरूप में स्थिर है। वह शरीर-बल और मनोबल के द्वारा ही कुछ कर पाता है, असंभव को भी संभव कर लेता है। कहते हैं, देवता अशरीरी होते हैं, वे सूक्ष्म शक्तियों के प्रतिनिधि हैं। वे अलग-अलग शक्तियों के केन्द्र के अधिपति हैं। परमात्मा ने सबके कार्यों का जैसे नियमन कर रखा है।
लेकिन मनुष्य साधारण होकर भी असाधारण है। उसमें जीने, निरंतर होने और अंत में मृत हो जाने की विशेषता है। सबसे बड़ी बात यह है कि देवता सुखों का उपभोग कर सकते है, पर प्रेम नहीं कर सकते। और मनुष्य सुखों का उपभोग करना भी जानता है और प्रेम से तो उसकी रचना ही होती है।
नल के मन में यह ऊहापोह चल ही रहा था कि सेवकों ने एक पर्वत के समतल भाग को क्षणिक विश्राम के लिए चुन लेने की सूचना दी। क्षण भर में उस शिखर पट्टिका पर राजा नल के विश्राम की व्यवस्था हो गई और उसी के समानान्तर क्षेत्रों में उनके सैनिकों ने भी विश्राम किया। राजा नल को वह एकांत पर्वतीय स्थल प्रिय लगा। अत्यंत समीप में ही झरने का कल-कल नाद स्पष्ट सुनाई दे रहा था। झरनों के प्रवाह से पर्वत के नुकीले भागों पर गहरी हरी काई जमी हुई थी और वहाँ चिड़ियों का चंचल स्वर सुनाई दे रहा था। तभी नल की दृष्टि पर्वत से उतरती छोटी पगडंडी पर पड़ी जहाँ चार तपस्वी एक साथ उतरते दिखाई पड़े। सबसे आगे का तपस्वी वयोवृद्ध था और उसकी लम्बी श्वेत दाढ़ी हवा में धीरे-धीरे हिल रही थी। उसके दाहिने हाथ में कमंडल और बायें पार्श्व में लपेटा हुआ मृगचर्म था, अन्य तीन तपस्वी अवस्था में उससे छोटे और अपेक्षाकृत प्रौढ़ तथा युवा लग रहे थे। सबसे पीछे चलने वाला तपस्वी अत्यंत कृष्णवर्ण का और शरीर से स्थूल किन्तु अत्यंत शक्तिशाली प्रतीत हो रहा था। उन्हें अपनी ओर आते देख कर राजा नल सम्मान में खड़े हो गए। विश्राम की मुद्रा में होने के कारण इस समय उनके मस्तक पर मुकुट नहीं था, पर तेजस्विता-सुन्दरता किसी वाह्य साधन पर आश्रित नहीं होती। उस समय नल की शरीर-कांति औद दमकता हुआ मुख-मंडल किसी को भी ईर्ष्यालु बनाने की क्षमता रखता था। जब चारों तपस्वी समीप आ गए तो नल ने आदरपूर्वक उन्हें प्रणाम किया और आसन देकर बैठने की प्रार्थना की। वृद्ध तपस्वी ने कहा-"आपका स्वरूप और सौंदर्य बता रहा है कि आप अवश्य कोई राज पुत्र हैं। पर्वत के निम्न भाग में सैनिकों की हलचल बता रही है कि आप अवश्य राजकुमारी दमयंती की स्वयंवर-सभा में सम्मिलित होने जा रहे हैं।"
'अवश्य तपोधन! आपका अनुमान उचित है। आप सर्वज्ञ हैं, आपसे कुछ छिप नहीं सकता। मेरा नाम नल है। आप सबों को इस एकांत स्थान में देखकर मैं सेवा के लिए उत्सुक हो गया हूँ। कृपया मेरे योग्य कोई कार्य बताएँ।"
"महाराज नल! आपका नाम विश्व विश्रुत है। हम भी आपकी सहायता चाहेंगे, यदि आप हमारी प्रार्थना और कार्य-भार के वहन का वचन दें तो हम अवश्य निवेदन करेंगे। हमें विश्वास है कि हम याचकों की याचना व्यर्थ नहीं जायेगी।"
"महात्मन् ! यह लोक प्रसिद्धि है कि कोई भी याचक राजा के द्वार से खाली नहीं जाता। किन्तु याचना किस कोटि की है यह जाने बिना अन्धवचन दे देना कहाँ तक उचित होगा, यही मेरे विचार का विषय है।"
-"राजन् ! दानी व्यक्ति मोल तोल नही करता। उसका दान वस्तु पर नहीं श्रद्धा पर आधारित होता है। आप चाहें तो मेरी याचना अस्वीकार भी कर सकते हैं।"
-" नहीं! नहीं! महात्मन् ! मेरा यह आशय कदापि नहीं था, आप स्पष्ट कहें कि आप मुझसे क्या चाहते हैं। आपकी इच्छा मेरे लिए आज्ञा है और उस आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है।"
-"तो सुनें महाराज! हम भी दमयंती के स्वयंवर में भाग लेने जा रहे हैं।" यह कहते कहते चारो तपस्वी अपने वास्तविक स्वरूप में आ गये।
नल की वाणी सहसा कुंठित हो गई। वे अपने सामने सहसा चार दिव्य देवपुरुषों को देखकर स्तब्ध रह गए। एक मनुष्य के समक्ष चार देवता आज याचक की मुद्रा में उपस्थित हो गए थे, यह नल के लिए एक विस्मयकारी और अश्रुतपूर्व अनुभव था।
"इसमें चकित होने की कोई बात नहीं है। इच्छाएँ केवल मनुष्य जाति में ही नहीं होतीं। हम देवताओं के मन में निरंतर कुछ प्राप्त करने की बलवती लालसा उत्पन्न होती रहती है। पृथ्वी हमारे लिए सदैव आकर्षण का केन्द्र रही है। मनुष्य और देवता सृष्टि के आरंभ से ही एक दूसरे के पूरक, समर्थक और सहायक रहे हैं।"
"पर महानुभाव देवगण! आप हैं कौन? आप अपना पूरा परिचय तो दें। इस प्रकार मायावी वेश में एक प्रकार से बलपूर्वक इस याचना-भाव का अर्थ क्या है?"
"अर्थ है महाराज नल! आप एक दिव्य रूप कांति वाले सभी गुणों में अग्रणी और वीरता में अद्वितीय सम्राट् हैं ऐसे दिव्य पुरुष को छोड़कर राजकुमारी दमयंती की वरमाला का योग्य सुपात्र भला त्रिभुवन में और कौन हो सकता था, बस इसी चिन्ता ने हमें ऐसा कृत्य करने पर विवश कर दिया। हम स्वयं अपना परिचय आपको दे रहे हैं।"
"मैं देवाधिपति इन्द्र हूँ और मेरे साथ ये तीन देवगण हैं- अग्नि, वरुण और यम। हम चारों विदर्भ कुमारी दमयन्ती को वरने के लिए इच्छुक हैं। दमयंती हममें से किसी एक को चुन लें, बस हम यही चाहते हैं। इसलिए आपको हमारा संदेश लेकर, राजकुमारी दमयंती के पास जाना होगा और पूरी सत्य निष्ठा से हमारे रूप गुण, आभिजात्य के साथ हमारी देवशक्तियों का बखान करना होगा ताकि दमयंती की वरमाला किसी और के गले में नहीं, हमारे ही गले में पड़े। हमें पूरा विश्वास है कि निषध नरेश अपनी वाग्मिता और अपने व्यक्तित्व की चारुता से हमारे लिए दौत्य कर्म स्वीकार करेंगे। हमारे दूत बनकर वे हमारे रूप गुण का ऐसा सुंदर वर्णन करेंगे कि दमयंती का मन हमारे प्रति मोहाविष्ट हो जाएगा।"
"किन्तु देवराज इन्द्र एवं अग्नि वरुण और यम जैसे प्रतापी और दिव्य देवगण! आपने इस दुष्कर कार्य के लिए मुझे ही क्यों चुना? आपलोग तो सर्वसमर्थ, सर्वज्ञाता हैं? फिर क्या आपको यह ज्ञात नहीं हुआ कि नल अर्थात् मैं स्वयं दमयंती के प्रीतिपाश में बंधा हुआ हूँ दमयंती के रूप, गुण और माधुर्य ने मुझे पूर्णतः विमोहित कर रखा है, जब मैं स्वयं उसके स्वयंवर में एक प्रार्थी और प्रत्याशी बनकर भाग लेने जा रहा हूँ तो मैं ही अपने मनोभावों की बलि देकर आप सबों की सहायता कैसे कर सकता हूँ? प्रेम सहज आकर्षण और समर्पण का विषय है, वह बलात् किसी के चित्त को अपनी ओर आकृष्ट करने का, अनिच्छित को इच्छित बनाने का साधन नहीं है। आपने इस दौत्य कर्म के लिए उचित व्यक्ति का चुनाव नहीं किया।"
"महाराज नल! हम देवताओं के लिए कुछ भी न दुर्जेय है न गोपन ! हमने सोच-विचारकर यह निर्णय लिया है। प्रीति का भाव कहीं भी किसी के भी मन में प्रस्फुटित हो सकता है। जैसे आप दमयंती की रूप कीर्त्ति से सम्मोहित हैं, वैसे ही हम भी तो उसके प्रीतिपात्र हो सकते हैं? जबतक स्वयंवर में वरमाला द्वारा इसका निणर्य नहीं होता तब तक सभी अपनी-अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए स्वतंत्र हैं और अब आप हमें दौत्यकर्म का वचन दे चुके हैं, अतः आप अपनी बात से मुकर भी नहीं सकते। सृष्टि में इसीलिए तो वाग्दान, वचन, संकल्प या प्रतिज्ञा की इतनी महिमा है। आप भला वचन-च्युत कैसे हो सकते हैं?"
"देवताओ! आप सबों ने मुझे बहुत बड़ी दुविधा में डाल दिया है। मैं जिस दमयंती का आठों याम स्मरण करता रहता हूँ, जिसके बिना मेरा हृदय निरंतर विकल रहता है, उसे ही मैं कैसे कह सकूँगा कि वह मुझे छोड़ आप जैसे महान वरों में से किसी एक का वरण कर ले। स्वयंवर न युद्ध का विषय है, न किसी प्रतियोगिता का यह तो प्रथम दृष्टि में एकात्मता का किया गया अनुभव है। आप यह स्पष्ट जान लें कि मुझे यह बात अच्छी तरह विदित है कि दमयंती भी मुझे प्राप्त करने के लिए अत्यंत विकल है, हमारी विकलता समान है, हम दोनों नाद संबंध से एक हो चुके हैं अब तो केवल वरमाला और विन्दु संबध की ही प्रतीक्षा है। उस स्थिति में आपलोगों के द्वारा यह दुर्वह प्रस्ताव मेरे लिए कितना कष्टकर होगा, क्या आपने इस पर विचार किया है?"
"महाराज नल! आपकी निजी पीड़ा आपके लिए अर्थवान हो सकती है पर हमारे मन में जो वेगवती इच्छाएँ तरंगित हो रही हैं, उन्हें भी व्यक्त होने का अधिकार है। अब आप वचनबद्ध हो चुके हैं, अतः आप विदर्भ के राजमहल में जाकर दमयंती से केवल हमारी गुण-चर्चा करें, उसे समझाएँ, मनाएँ और हमारे अनुकूल करने का पूरा-पूरा प्रयत्न करें।'
"किन्तु एक मनुष्य का सशरीर राजमहल में जाना वह भी कुमारी दमयंती के महल में चला जाना बिल्कुल असंभव है। ऐसा कैसे संभव है?"
"ऐसा संभव है निषध नरेश ! हम आपको ऐसी ऐच्छिक अन्तर्धान विद्या प्रदान करते हैं जिससे इच्छानुसार आप जब चाहें लोगों की दृष्टि से अन्तर्धान हो जाएँ और जब चाहें प्रकट हो जाएँ। हमारे द्वारा प्रदत्त इस शक्ति से आप राजमहल में अबाध गति से प्रवेश करेंगे और सीधे राजकुमारी के कक्ष में पहुँचकर हमारा वांछित मनोरथ सिद्ध करेंगे।" यह कहकर चारो देवता अन्तर्धान हो गए। रह गए विस्मित, कातर और पीड़ित नल! बड़े अनमने मन से उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ विदर्भ देश की राजधानी कुंडिनपुर के लिए प्रस्थान किया।
12.
देवताओं द्वारा प्रदत्त ऐच्छिक अन्तर्धान होने और प्रकट होने की शक्ति से नल का हृदय अभी भी आश्चर्य में पड़ा था। वे एक ओर दुखी और द्वन्द्वग्रस्त थे तो दूसरी ओर उन्हें इस बात पर भी हर्ष और रोमांच हो रहा था कि वे अपनी प्रिया दमयंती को बिना किसी बाधा या रोक-टोक के देख सकेंगे, मिल सकेंगे, उसके मुख से झरती अमृत वाणी का रसपान कर सकेंगे। इस समय उनके जैसा भाग्यशाली और उनके जैसा भाग्यहीन भला और कौन होगा? जो अपनी ही प्राण वल्लभा को यह कहकर समझाएगा कि वह उसे भूल जाए और इन्द्र, अग्नि, वरुण या यम जैसे शक्ति संपन्न देवताओं में से किसी एक का वरण कर ले। अपने ही हाथों अपने हृदय को कुचलना, अपनी ही आँखों के सामने अपने सर्वस्व को दूसरों को समर्पित करने का अनुरोध कितना कष्टकर होगा? इस पीड़ा से विचलित चित्त नल ने दौत्य कर्म के लिए बड़ी कठिनाई से अपने मन को तैयार किया। उन्होंने गुप्त भाव से अन्तर्धान मुद्रा में वैदर्भी दमयंती के कक्ष में प्रवेश किया। दोपहर का समय था। दमयंती का विस्तृत कक्ष सुंदर चित्रों, पुष्पवल्लरियों और वातायन से झूलते पारदर्शी परदों से सुसज्जित था। दमयंती अपनी प्रिय और पालित सारिका से बातें करने में तल्लीन थी-
"तुम्हीं बताओ सारिके मेरे नल कैसे होंगे?"
"सुन्दर अतीव सुंदर! वे मोहक हैं, उनका मन भी कोमल है।"
"क्या तुमने उन्हें देखा है?"
सारिका बोली- "नहीं सुना भर है। पर देखूंगी अवश्य !
देखूंगी अवश्य देखूंगी। शीघ्र ही देखूंगी।"
नल स्वयं को रोक नहीं सके। इन प्रीति स्निग्ध बातों ने उनका हृदय हर लिया, पर फिर भी संयत होकर वे अपनी विद्या के प्रभाव से वहाँ अकस्मात् प्रकट हो गए।
महल के अन्तः कक्ष में एक पुरुष की उपस्थिति देखकर दमयंती के मुख से चीख निकलते-निकलते बची। उसने देखा एक दिव्य सर्व सौंदर्ययुक्त सुंदर लक्षणों से विभूषित राजपुत्र उनके सामने खड़ा है। उसका सौंदर्य हीरक कांति और कामदेव के स्वरूप से भी अधिक द्युतिमान है। यह मनुष्य देवपुरुष की भांति प्रकट हुआ है, प्रकट होते ही इसने मेरे मन की सम्मोहित कर दिया। नल बोले-"राजकुमारी दमयन्ती ! चिन्ता न करें। मैं इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम देवताओं का दूत महाराज नल हूँ और प्रतिज्ञानुसार मैं उनके लिए दौत्य कर्म के लिए प्रतिश्रुत हूँ। मैं जिनका दूत हूँ, वे देवता महान शक्तिशाली और ईश्वरीय गुणों से विभूषित हैं।"
"रुकिए, ठहरिए!"- दमयंती ने चीत्कार के स्वर में कहा। "क्या आप जानते हैं, आप क्या कह रहे हैं? यह आप ही तो हैं जिन्हें मैंने अपना हृदय समर्पित कर रखा है, स्वर्णपंखों वाले राज हंसों से आपके रूप सौंदर्य और यश के विषय में सुनते ही मेरा मन आपके अधीन हो गया था, उसके अनुसार मैंने भी बार-बार आपका सौन्दर्य-वर्णन सुना था, मैंने भी बार-बार आपके स्वरूप का चित्रांकन किया। इन दीवारों पर लगे ये आपके अनेक चित्र इसके प्रमाण हैं। कई चित्रों की रचना करते समय मेरे अश्रुओं से उनके रंग धूमिल हो गए, आप ही तो हैं, जिन्हें मैंने अपने प्राणों से भी पूज्य श्रेष्ठ, प्रिय मानकर स्वीकार किया है।"
"दमयंती! मैं आपकी भावना का आदर करता हूँ, पर मनुष्य मर्त्यशील है, देवता अमर हैं। जब देवलोक के देवता आपकी वरमाला के इच्छुक हैं तो फिर क्या कहना शेष रह जाता है? यह आपका रूपगुण ही है जो संपूर्ण त्रिलोक में पुष्पगंध की तरह प्रसरित हो गया है। मैं देवताओं द्वारा प्रदत्त अन्तर्धान विद्या के प्रताप से आपके सामने प्रस्तुत हूँ। मैं जिस कठिन कार्य के लिए आया हूँ, कृपा करके उसे मुझे पूरा करने दें। चार इच्छुक देवताओं में अग्रणी हैं महाराज इन्द्र। वे वैदिक देवताओं में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अदिति के पुत्र हैं। वे ब्रह्मा के प्रपौत्र और प्रजापति कश्यप के पुत्र हैं। इन्द्र का देवत्व इस बात में है कि वे प्रजा को बल, तेज और सुख प्रदान करते हैं, वे स्वर्ग के राजा हैं और उनकी नगरी का नाम अमरावती है। देव शिल्पी विश्वकर्मा ने अपने तपोबल से उसकी रचना की है। स्वर्ग में उनका कल्पवृक्ष सभी की, सब की, सब प्रकार की इच्छाओं को पूर्ण करने में समर्थ है, उनके नंदनवन में पारिजात जैसे अनेक पुष्प हैं। उनके पास समुद्र-मंथन से प्राप्त ऐरावत हाथी और उच्चैःश्रवा नाम का दिव्य अश्व है। उनका ऐरावत नंदनवन में रहता है और वह अमृत कुण्ड से जल पीता है। उनके रथ में दस सहस्र अश्व जुते होते हैं, जब इन्द्र युद्ध के लिए चलते हैं। वज्र गदा और शूल उनके दिव्यास्त्र हैं। इन्द्र वर्षा के देवता हैं जो वृत्रासुर रूपी अनावृष्टि के राक्षस को अपने वज्र से चूर कर प्रजा का संताप हरते हैं। वेदों ने प्रायः ढ़ाई सौ से अधिक सूक्तों में उनका जयगान किया है। वे सभी देवताओं के अधिपति हैं और वे दीन भाव से तुम्हारी स्नेह-दृष्टि के प्रार्थी हैं, उनका स्वर्ग उपभोग की नगरी है और वे तुम्हें उस नगरी में आमंत्रित करना चाहते हैं। इसलिए सुमुखि ! आप उनका वरण कर सकती हैं।"
"हृदयवल्लभ ! मैं आपकी सभी बातें इसलिए सुन रही हूँ कि आप अपना धर्म निभा रहे हैं और आपके हर कार्य में सहभागिता के लिए मैं भी उद्यत हूँ। आप अपनी बातें कहने के लिए स्वतंत्र हैं।"
"देवि! दूसरे इच्छुक देवता हैं अग्नि। वे वेदों के अत्यंत महत्वपूर्ण देव और यज्ञपुरुष हैं। इनका जन्म ब्रह्मा से हुआ है। वे ब्रह्मा के ज्येष्ठ मानस पुत्र हैं। वे यज्ञों में गृहपति नाम से पूजित हैं। उनका शस्त्र शक्ति है। वे यज्ञ के अधिष्ठाता हैं। शिव विवाह से लेकर राम और सीता की कथा तक सर्वत्र अग्नि का महत्व सबने स्वीकार किया है। ऐसा तेजस्वी देव अग्नि आपके वरमाल्य का अधिकारी हो सकता है।
तीसरे इच्छुक वर हैं वरुण देव। वरुण जलाधिपति, समुद्रों के देवता हैं। वे द्वादश आदित्यों में से एक हैं और उनका जन्म देवमाता अदिति से ही हुआ है। वरुण का वाहन मकर है। वे शक्ति संपन्न योद्धा भी हैं। सृष्टि का अधिकांश जल-भाग है जिसके वे स्वामी हैं और उनकी अभिलाषा है कि स्वयंवर में आप उनका ही वरण करें।"
आपके लिए चौथे वरणीय देवता है यम। वे यमराज और धर्मराज नामों से भी जाने जाते हैं। वे भी दक्ष कन्या अदिति और कश्यप के पुत्र हैं। दक्षिण दिशा का स्वामी होने के कारण यम 'दक्षिणेश' कहे जाते हैं। 'यम की नगरी का नाम 'संयमनी' है, जो मेरु पर्वत के पूर्व में स्थित है। वे पक्षपात रहित, समदृष्टि रखनेवाले न्याय प्रिय देवता हैं। शिवभक्त यमराज विष्णुभक्त भी हैं। उनका कार्य है क्षीण आयुवालों को कर्मफल के अनुसार उचित स्थान प्रदान करना। उनमें निर्णय की क्षमता है। ऐसा व्यक्ति अपने गुणों के कारण पूज्य और आकर्षण का विषय हो सकता है। अतः दमयंती ! अब उचित निर्णय लेने का दायित्व आपकी बुद्धि पर है। आप इनमें से स्वेच्छा से किसी का भी वरण कर उन्हें स्वयंवर की माला का अधिकारी बना सकती हैं। मैंने अपना धर्म और अपने दायित्व का वहन किया है। अब आप अपना निर्णय लेने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र हैं।"
"आर्य! आप दूत बनकर आए थे और आपने अपने वचन का निर्वाह कर दिया और अब आप भी निर्णय के लिए स्वतंत्र है। मैं अपनी अंतरात्मा से महाराज नल का वरण कर चुकी हूँ वे ही मेरे स्वामी, मेरे सखा, मेरे मित्र, मेरे हृदय-वल्लभ और प्राणप्रिय हैं। अतः हे दूत ! अगर आपका दौत्य कर्म पूर्ण हो गया हो तो इन कठोर वचनों के स्थान पर मुझे अंगीकार कीजिए। यह दमयंती महाराज नल के ही गले में वरमाला डालेगी, यह उसका अंतिम निर्णय है। इसलिए आप वचनमुक्त और बंधन मुक्त होकर मुझे शक्ति प्रदान करें।"
इतना सुनना था कि नल के मन में दबी हुई सारी कामनाएँ फूट पड़ीं। वे और दमयंती एक दूसरे को निर्निमेष कुछ देर तक देखते रहे और फिर दौड़कर दोनों आलिंगनबद्ध हो गए। नल ने प्रथम बार दमयंती का स्पर्श किया, दमयन्ती ने भी प्रथम बार नल के सामीप्य का अनुभव किया। अब दोनों को केवल स्वयंवर-सभा की प्रतीक्षा थी।
महाराज नल ने इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम इन चारों देवताओं से स्पष्ट कह दिया
"देवगणो! मैंने शुद्ध बुद्धि और संयत आचरण से दमयंती के पास जाकर आपमें से किसी को भी वर रूप में चुनने की प्रार्थना की लेकिन दमयंती पूरे प्राण-मन से मुझे अपना पति स्वीकार कर चुकी है, अतः मैं विवश हो गया। मैंने तटस्थ भाव से आपकी आज्ञा शिरोधार्य कर उसका समुचित पालन किया पर जब दो आत्माएँ एक बिन्दु पर मिलना चाहती हैं तो उन्हें हठपूर्वक रोका नहीं जा सकता। अगर यही विधि का विधान है तो मुझे यह स्वीकार करना ही पड़ेगा।"
महाराज नल की बातों से देवगणों को निराशा तो हुई पर उनका मन पराजय स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
13.
प्रेम एक निर्णय भी है और मन की शक्ति भी।
विदर्भ देश की स्वयंवर-सभा सज गई थी। नाना देश द्वीपों के राजे, राजकुमार और अधिपति अपने अपने सहायकों और अंगरक्षकों के साथ विदर्भ-देश की अतिथिशाला की शोभा बढ़ा रहे थे। सभी राजागण अपने-अपने ऐश्वर्य और पराक्रम के दंभ से उन्मत्त की मुद्रा में बैठे थे। धीरे-धीरे सभी अपना स्थान ग्रहण कर रहे थे। बहुमूल्य स्वर्ण सिंहासनों की श्रृंखला उसी प्रकार सजाई गई थी, जैसे कोई विशाल रंग-बिरंगी दीपमाला हो। उसी समय जैसे किसी सिंह का शक्तिशाली शावक किसी पर्वत प्रदेश में छोटी-छोटी शिलाओं पर पाँव रखता हुआ ऊपर चढ़ता है वैसे ही प्रवेश-द्वार के पास बनी हुई सीढ़ियों पर क्रमशः चढ़ते हुए महाराज नल को सबने देखा। उस पूरे वातावरण में राजसी वस्त्रों की छटा बिखर रही थी। किन्तु जैसे स्वर्ग के नंदन-वन में पारिजात पुष्प की अलग ही छटा और सुगंध होती है, उसी प्रकार राजा नल सबसे भिन्न एक अद्वितीय पुरुष लग रहे थे। सर्वत्र सुगंधित धूप-गंध से वातावरण सात्विक और पवित्र हो रहा था। बाहर शंख ध्वनि के साथ मंगल वाद्य बज रहे थे। उत्सव की उस घड़ी में आनंद जैसे मूर्तिमान हो गया था। उसी समय महल के अन्तःकक्ष से विदर्भ-नरेश महाराज भीम धीरे-धीरे अपने राज्य सिंहासन की ओर बढ़ते वैसे ही दिखाई दिए, जैसे प्रातःकालीन प्रभा-भास्वर सूर्य उदित होता है। वह स्वयंवर-सभा सैकड़ों यशस्वी राजाओं के एकत्र होने से जगमगा रही थी। अभी भी दूर देशों से आए वर-माला के इच्छुक शताधिक राजाओं का आगमन हो रहा था। अचानक सबकी दृष्टि एक साथ आनेवाले और स्वयंवर-सभा में प्रवेश करनेवाले चार राजाओं पर जा टिकी। जैसे मत्त-मातंग दल बाँधकर चलता है वैसे ही समान गति से चलते हुए वे राजागण भीतर प्रवेश कर रहे थे। वे समान आयु के युवा, तेजवान और प्रभा मंडित लग रहे थे, जैसे अश्विनी कुमारों के स्वरूप में साम्य होता है, वैसे ही चारों के वस्त्र और उनकी वेश-भूषा एक समान थी। वे सभी धीरे-धीरे चलते हुए महाराज नल के दोनों पार्श्व में जाकर बैठ गये। अब सभा-मंडप का यह एक अद्भुत दृश्य था कि उन नवागत चार राजाओं और राजा नल के स्वरूप में कोई भिन्नता नहीं थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि ये पाँचों राजा एक ही कुलगोत्र के समान रूप गुण वाले एक स्थान पर कहाँ से और कैसे एकत्र हो गए हैं? यह दृश्य पूरी स्वयंवर सभा में एक आश्चर्यजनक घटना की तरह कानाफूसी का विषय बन गया।
वस्तुतः इन्द्रादि देवताओं को जब नल ने सूचना दे दी कि दमयंती ने स्पष्ट शब्दों में उद्घोषणा कर दी है कि नल अर्थात् मुझे ही वह पति के रूप में चुनेगी, तो यह सुनकर सभी देवता क्रोध और पश्चात्ताप से भर गए कि नल को दूत बनाकर भेजना यह उनकी भारी भूल थी। नल और दमयंती एक दूसरे के रूप-गुण की चर्चा से पूर्वराग के कारण प्रीति का अनुभव कर रहे थे, पर उनके दौत्य-कर्म की योजना से तो दोनों को साक्षात् एक दूसरे से मिलने और एक दूसरे को परखने का अवसर प्राप्त हो गया। ये सभी देवता अपने इस निर्णय से क्षुब्ध थे क्योंकि उन्होंने अग्नि में घृत डालकर उसे और भी प्रज्वलित कर दिया था।
वह देवता ही क्या जो सामान्य और मर्त्य मनुष्यों से हार मान ले।? उन्होंने पुनः नई योजना के अनुसार कपट द्वारा नल को पराजित करने का विचार किया। ये सभी देवता 'मायावी' शक्तियों से संपन्न थे। इच्छानुसार रूप बदलने में समर्थ थे। नल और उनके स्वरूपों में इतनी समानता थी कि वहाँ एक ही पंक्ति में पाँच नल विराजमान थे। सबके स्वरूप, वस्त्राभूषण, मुखमुद्रा, हावभाव और बैठने तक के ढंग में तनिक भी अंतर नहीं था। महाराज भीम भी यह दृश्य देखकर अवाक् और स्तंभित थे। उन्हें यह सत्य ज्ञात था कि उनकी पुत्री संभवतः महाराज नल के कीर्त्ति गुणों को सुनकर उनके प्रति आकृष्ट है। अपने इसी संदेह की पुष्टि के लिए इतनी बड़ी उन्होंने स्वयंवर सभा का आयोजन किया था। लेकिन विधाता का यह खेल उनकी समझ के बाहर था। एक नल के स्थान पर पाँच-पाँच नल? यह कौतूहल है या बुद्धि का विभ्रम? यह देवताओं की लीला है या राक्षसों का षड्यंत्र? ऐसी स्थिति में उनकी लाड़ली पुत्री क्या और कैसे निर्णय कर पायेगी? ऐसी घटना न तो कभी देखी गई और न कभी सुनी गई। राजा भीम का धैर्य टूट रहा था, और वे अत्यंत अधीर दीख रहे थे।
स्वयंवर-सभा के नियमानुसार मध्यभाग में अपनी सुन्दर सखियों के साथ दमयंती ने स्वयंवर-सभा में प्रवेश किया। उसके आगे की दो सखियों ने एक विशाल स्वर्ण थाल को अपने दोनों हाथों से संभालकर उठा रखा था जिसके बीच में एक बड़ी और सुन्दर माला उसी प्रकार धीमे-धीमे हिल रही थी जैसे मलयानिल के स्पर्श से प्रेमीजनों का चित्त दोलायमान हो जाता है या वासंतिक मधुवात से वृक्षों के नये पल्लव थरथरा उठते हैं। मध्य में चलती दमयंती उस वरमाला को स्पर्श करती हुई चल रही थी। उसका एक-एक पग धीरे और मंथर गति से उठ रहा था। दमयन्ती की अशेष रूपराशि को देखकर राजाओं का मन काम-चंचल हो रहा था। वे अपनी भौंहों और कटाक्षों से राजकुमारी को रिझाने और आकृष्ट करने का प्रयास कर रहे थे। कोई राजा अपने गले में पहनी मौक्तिक माला को जानबूझ कर बार-बार उसे सीधा कर मानो संकेत कर रहा था कि इस माला की तरह मैं तुम्हें हृदय से लगाकर रखूँगा तो कोई राजा अपने सिर पर सजे स्वर्ण मुकुट को छूकर बार-बार ठीक से बिठा रहा था, मानो वह यह कहना चाहता था कि मैं तुम्हें सिर-आँखों पर बिठाकर रखूँगा। बंदी और चारण-गण शीघ्रता के साथ एक-एक की कीर्त्ति-गाथा और उनका स्तुतिगान करते चल रहे थे। दमयंती अनमने भाव से यह सब सुनती और देखती आगे बढ़ती गई, पर यह क्या? राजाओं की पंक्ति के अंतिम मोड़ पर समान रूप धारी, समान वेश और मुद्राधारी पाँच नल उसे बैठे दिखायी दिये। वह एक क्षण में समझ गई कि उसे पाने के लिए चारो देवताओं ने अन्तिम कुटिल चाल चली है। वहाँ पहुँचकर वह क्षणभर के लिए ठिठक गई। उसने अपने आराध्य भगवान शिव और पार्वती का मन ही मन स्मरण किया। उसने अपनी आँखें बंदकर देवराज इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम के चरणों में मन-ही-मन प्रणाम किया
"हे देवगणो! आप मुझे शक्ति दें कि मैं आपसे पृथक् अपने प्राणप्रिय नल को पहचान सकूँ। आप कृपा करें और हमारी अभीष्ट-सिद्धि में सहायक बनें।"
यह सत्य है कि मनुष्य की करुणा देवताओं के हृदय को द्रवित कर देती है। दमयंती बार-बार सभी देवताओं लोकपालों से विनम्र भाव से गुहार लगा रही थी और स्पष्ट शब्दों में बता रही थी कि मैंने सर्वगुण संपन्न नल का वरण करके उन्हें अपना पति मान लिया है। हे देवताओ! मेरे संकल्प को पूर्ण करने की कृपा करें और शक्ति दें कि मैं देवता और मनुष्य के भेद को समझ सकूँ। उसने देवसूचक लक्षणों का विचार किया और देखा कि सभी देवताओं के किसी अंग में पसीने की बूंद नहीं है, वे स्वेद रहित हैं। उनकी आँखों की पलकें झपक नहीं रही हैं, वे स्थिर हैं। उनके गले में पड़ी पुष्प मालाएँ अम्लान हैं। वे धूलकणों से रहित पूरी तरह स्वच्छ हैं। वे चारों देवता सिंहासनों पर आसीन हैं, लेकिन पैर पृथ्वी का स्पर्श नहीं कर रहे। यहाँ तक कि उनके शरीर का प्रतिबिंब भी दिखाई नहीं दे रहा है। पर उन पाँचों में एक पुरुष ऐसा है जिसकी परछाईं दीख रही है, गले की पुष्पमाला मुर्झा गयी है, उसके अंगों में धूल कण और पसीने की बूंदें भी झलक रही हैं, पलकें भी झुक रही हैं और उनके चरण पृथ्वी का स्पर्श कर रहे हैं। अवश्य ही यही मेरे नल हैं। अब इसमें कोई संदेह नहीं रह गया। वह नल की ओर बढ़ी और उसके गले में वरमाला डालकर उनका पति रूप में वरण कर लिया। सब ओर एक विस्मय और ईर्ष्यामूलक ध्वनि गूंज उठी।
नल ने दमयंती के हाथों को स्पर्श करते हुए कहा- "देवि! तुमने इतने देवताओं की साक्षी में मुझे स्वीकार किया है। मैं स्वयं को कृतार्थ अनुभव कर रहा हूँ। आज से मैं सदैव तुम्हारी इच्छा के अधीन रहूँगा।"
देवताओं ने भी प्रसन्नचित्त होकर अनेक आशीर्वाद और वरदान दिए। इस वैवाहिक यज्ञ के बाद सभी देवता और शेष राजागण अपने-अपने स्थान को लौट गये।
राजा भीम ने शास्त्र-विधि से नल और दमयंती का विवाह कराया। उनके आग्रह पर कुछ दिनों तक राजा नल अपनी ससुराल कुडिनपुर में रहकर सुखपूर्वक विहार करते रहे। फिर वे अपने सभी सहायकों के साथ दमयंती को लेकर अपने निषध देश की ओर प्रस्थित हुए।
इधर इन्द्र आदि देवताओं के मन में नल के चारित्रिक गुण और दमयंती की निष्ठा देखकर उनके प्रति आदर का भाव आ गया था। मार्ग में उन्हें कलियुग और द्वापर दोनों साथ आते दिखाई पड़े। उन्होंने उनकी कुशल पूछी तब कलि ने प्रसन्न मुद्रा में कहा- "मैं दमयंती के स्वयंवर में भाग लेने जा रहा हूँ। दमयंती की रूप-गाथा सुनकर मैं मोहित हो गया हूँ और उससे विवाह का इच्छुक हूँ।"
इन्द्र हँसकर बोले-"अब तो बहुत बिलंब हो गया। स्वयंवर तो हो चुका। हमारे समीप ही दमयंती ने राजा नल को अपना पति चुन लिया।"
कलियुग क्रोधावेश से तिलमिलाकर बोला "देवताओं के होते हुए दमयंती ने मनुष्य का पतिरूप में वरण कर अक्षम्य अपराध किया है। वह दंड की पात्री है।"
देवताओं ने प्रत्युत्तर में कहा- "हमसे आज्ञा लेकर दमयंती ने नल का वरण किया है। राजा नल में सारे मानवोचित गुण हैं, उनसे क्रोध और विरोध पालना सर्वथा अनुचित होगा।"
किन्तु कलि पर इन बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह एक कुविचार और बुद्धिहीनता के रूप में नल के भीतर प्रविष्ट हो गया और द्वापर ने उसका सहयोग करते हुए द्यूत क्रीड़ा की लालसा जगा दी। फलतः नल का भाग्य बुद्धि के विनाश के कारण उसे अधःपतन की ओर ले जाने में प्रवृत्त हो गया।
14.
महाराज नल कुंडिनपुर से कृतकार्य होकर अपने देश लौट रहे थे। उनकी विजयी मुखमुद्रा पर मुस्कान खेल रही थी। उनके रथ के अन्तःकक्ष में दमयन्ती गवाक्ष से पीछे छूटते हुए पर्वत शृंगों और वन-वृक्षों की शोभा निहार रही थी। बीती रात वर्षा हो जाने के कारण वन का पथरीला मार्ग स्वच्छ हो गया था।
हवा की मंथर गति में शीतलता थी। दमयंती की मसृण केश-राशि की लटें बार-बार उड़कर नल के मुख से टकराती हुई उनके हृदय में जैसे कामनाओं का ज्वार उठा रही थीं। नल एकटक दमयंती की रूप-राशि को निहार रहे थे। सौंदर्य के तरंगित वेग से दमयन्ती की पलकों में कंपन हो रहा था। नल के स्पर्श और लज्जा भाव से उसकी नासिका की कोर और कर्णयुगल पर लालिमा छलक रही थी। जैसे ही नल ने दमयंती का हाथ अपने हाथ में लिया, उसका संपूर्ण शरीर वीणा के तारों की तरह झनझना उठा, जैसे क्षितिज पृथ्वी से मिलता है वैसे ही नल ने उसके कंपित होठों पर अपने अधर रख दिये। जैसे कोई कलिका खिलकर धीरे-धीरे पुष्प बनती है वैसे ही दमयंती के मन में छिपा प्रेम-प्रस्फुटित होता जा रहा था। वे दोनों इस विराट् प्रकृति की छत्र छाया में सदैव एक बने रहने का संकल्प मन ही मन दुहरा रहे थे। बीच-बीच में मधुर स्मृतियों की चर्चा होती, अपने-अपने आकुल मन की दशा का वर्णन होता, जिसे सुनहले पंखोंवाले हंस ने प्रथम बार आकर्षण का भाव जगाया था, उसके प्रति दोनों बार-बार कृतज्ञता का अनुभव कर रहे थे।
यात्रा तीव्रगति से आगे बढ़ रही थी। कभी कुलांचे भरते हरिणों के दल की नुकीली सींगों को दिखाने के बहाने नल की उंगलियाँ दमयंती के वक्ष से टकरा जातीं और दोनों में सिहरन, कंपन, रोमांच के भाव एक साथ जाग उठते। कभी सिंहों की अचानक गर्जना से दमयंती मानो नल के हृदय में समा जातीं। दोनों की बातों का कोई ओर-छोर नहीं था। उन्हें अविराम यात्रा के बावजूद न थकान का अनुभव हो रहा था, न समय का भान रह गया था। आँखों ही आँखों में एक दूसरे को पी जाने की अबुझ प्यास तृष्णा में बदल गई थी।
महाराज नल ने कुण्डिनपुर जाते समय अपने सहायकों के साथ जिस समतल चट्टान पर कुछ देर विश्राम किया था, लौटते समय वे पुनः वहीं रुके। दमयंती का हाथ पकड़ कर प्रस्तर-खंडों पर पाँव रखते हुए नल धीरे-धीरे ऊपर बढ़ते गये वहाँ झरनों का कल-कल नाद और चिड़ियों का समवेत स्वर आज भी गूंज रहा था। झरने की जलधारा में दोनों ने जल-क्रीड़ा का सुख लिया। वहाँ केवल आनंद ही आनंद था, ऐसा आनंद जो जीवन की पूर्णता का बोध कराता है और जहाँ जीने की सार्थकता भी मालूम पड़ती है। इस सार्थक अनुभूति के केन्द्र में था प्रेम, केवल प्रेम, निश्छल, उदात्त और पारदर्शी प्रेम। दमयंती ने अचानक दोनों हाथों से अपना मुख ढँक लिया और नल से लिपटकर उनके कंधे पर सिर रखकर रो पड़ी। उसे रोते देखकर नल भी पीड़ित हो गये आखिर ऐसा क्या हो गया? क्या उनके किसी व्यवहार से दमयंती दुखी हो गई। नल की आँखों में क्षमा-याचना का भाव था। उनके बार-बार पूछने पर दमयंती ने रुद्ध कंठ से कहा- "आह! इतना प्रेम, इतना अगाध प्रेम, यह प्रेम मैं सह नहीं पाऊँगी।"
भावावेश में दमयंती का श्रृंगार-भाव करुणा में बदल रहा था, आंतरिक हर्ष उसकी आँखों से अश्रु बनकर छलक रहा था। नल की पलकें भी अश्रुबोझिल हो गईं। प्रेम की इस अनोखी रीति को पूरी तरह समझना उनके भी वश की बात नहीं थी।
महाराज नल का रथ निषध देश की सीमा में प्रविष्ट हो चुका था। उनके विवाह का शुभ-समाचार संपूर्ण निषध देश में पहले ही पहुँच गया था, वैसे ही जैसे फूल से पहले उसकी सुगंध पहुँचती है। संध्या का अंधकार धीरे-धीरे पृथ्वी पर उतर रहा था। रथ के खुले गवाक्ष से दोनों की दृष्टि मार्ग के दोनों ओर के भवनों पर जगमगाती दीप-मालिका पर पड़ी। उनके विवाह की प्रसन्नता में पूरा नगर दीपोत्सव मना रहा था। दमयंती भी किसी विद्युत लता या दामिनी की तरह दमक रही थी। महाराज नल ने देखा नगर के द्वार-द्वार पर कदली-स्तंभ बाँघे गए हैं और अनगिनत दीप वंदनवार की तरह झिलमिला रहे हैं। आकाश से चंद्रमा किरणें बरसा रहा था और पृथ्वी के जलते हुए दीये मन के ताप और उसकी विकलता को सूचित कर रहे थे। अब राजकुमारी दमयन्ती महारानी दमयंती के रूप में महल में प्रवेश कर रही थीं। अनेक लौकिक शुभ उपचार किये जा रहे थे, मंगल गीतों के गायन, वादन और नर्त्तन के रोचक कार्यक्रम चल रहे थे। स्त्रियों के मंगलाचार और सहभोज के बाद दमयंती अपने शयन कक्ष में पहुँची। सर्वोत्तम सुविधाओं से युक्त वह विश्राम-खंड उन्हें प्रिय लगा। खुली हुई खिड़कियों से तारों से रंजित स्वच्छ आकाश ऐसा लग रहा था मानो किसी नीले वस्त्र पर किसी कुशल कलाकार द्वारा तारक-बिम्ब उकेरे गए हों। सब ओर मुग्ध ता और आकर्षण का जादू बिखर रहा था, बड़े-बड़े झूलते परदों के नीच टाँकी गयी किंकिणियाँ मधुर स्वर करती हुई हवा के साथ ताल मिलाती हुई बज रही थीं। वह रात्रि माधुर्य भाव में जीने और संपूर्ण समर्पण की तृप्ति की रात्रि बन गई थी।
15.
निषध-देश के राजमहल के एकांत कक्ष में महाराज नल महारानी दमयन्ती के अत्यंत समीप बैठे हुए उन्हें मुग्ध भाव से देख रहे थे।
दमयंती ने उत्सुकता से पूछा-
"आज आप मुझे बड़ी उत्कंठा से देख रहे हैं। आपकी आँखों में मुझे अनुराग और रस का ज्वार उमड़ता हुआ दीख रहा है। आर्य! आप तो स्वयं सौंदर्य के उपमान है। क्या स्वयं सुन्दरता भी सौंदर्य के प्रति आकर्षण का अनुभव करती है?"
"हाँ देवी! समानता का भाव एक आकर्षण की सृष्टि करता है। आपने उचित प्रश्न पूछा। जो स्वयं सुन्दर है वह अपनी सुन्दरता के प्रति आकृष्ट नहीं हो पाता। पर दूसरे का सौंदर्य तो उसे विचलित कर ही सकता है और रहा आपका सौंदर्य तो उसका अनुभव तो सबसे विलक्षण और अपूर्व है। आपके सौंदर्य का दमकता हुआ तेज मेरे भीतर ताप को जगा देता है। तभी तो क्षण भर का भी वियोग मुझसे सहा नहीं जाता। विरह की यह ज्वाला मुझे दग्ध करने लगती है और कभी-कभी तो आपके सौंदर्य में मुझे चन्द्र किरणों की शीतलता का, कभी कैलास की हिम धवलित चोटियों के शीत का अनुभव होता है। मैं यह निर्णय नहीं कर पा रहा कि आपके सौंदर्य में ताप है या शीतलता?"
"आर्य! आपका मन शब्द-क्रीड़ा करने पर उद्यत है। मैं तो यह कहूँगी कि
सौंदर्य में न ताप है न शीतलता। यह सब तो देखने और अनुभव करने वाले मन का अनुभव है।"
"चलिए! आपकी बात मान लेता हूँ। पर आपका इतना कोमल और मसृण शरीर उस पर दमकती हुई यह देह-कांति, एक कठोर आखेट-प्रिय और युद्ध के अभ्यासी राजा को अपनी ऐसी कोमलांगी प्रिया को अपने दोनों हाथों से उठाने में भी डर लगता है। एक वीर और निर्भीक राजा आपकी इस कोमलता के कारण भयभीत हो जाए, क्या यह अच्छी बात है?"
"महाराज! अब तो आप तर्क करने लगे। पर जरा सोचिए किसी सुन्दर वाटिका के सरोवर में खिले हुए कमल पुष्पों के सन्निकट जाते ही हवा सुगंधित हो जाती है। फूल को कोई हानि भी नहीं पहुँचती और चारों ओर सुगंध फैल जाती है। आप सुन्दरता और कोमलता का अनुभव करना चाहते हैं तो प्रकृति से क्यों नहीं सीखते? वृक्ष अपनी जगह शांत खड़ा रहता है पर उसकी जड़, उसकी डालियाँ, उसके पत्ते, फूल और फल पृथ्वी से धूप और हवा से जीवन-रस का संचय कर लेते हैं। कोमलता को तो कोमल होकर ही अंगीकार करना होगा न?"
"दमयंती! आप उचित कह रही हैं। माधुर्य से ही स्नेह परिपक्व होता है।" "महाराज! मेरे मन में कभी-कभी यह प्रश्न उठता है कि मेरे स्वयंवर में चार-चार देवता मेरे साथ विवाह करने के लिए आपका ही वेश बनाकर बैठ गए थे यह तो एक प्रकार का छल ही कहा जायेगा?"
"देवि! यह तो प्रसिद्ध बात है कि देवता छली होते हैं। वे अलग-अलग गुणों के वाचक और प्रतिनिधि हैं। इन्द्र वर्षा के देवता हैं तो अग्निदेव में केवल ताप की प्रधानता है। वायु में गति की। समुद्र में अस्थिरता और शीतलता है और यम तो मृत्यु के देवता ही ठहरे। उन्हें अपने स्वरूप पर विश्वास नहीं था, तभी तो उन्होंने मेरा रूप धारण किया मुझे ही पाँच रूपों में देखकर आप चकित और चिन्तित तो अवश्य हुईं, पर केवल मुझे ही देखकर आपकी प्रीति भी तो प्रगाढ़ हो गई।"
कहते-कहते नल ने अपने दोनों हाथों से दमयंती का मुख-मंडल बड़ी कोमलता से ऊपर उठाया। वह स्पर्श ऐसा था जैसे कोई वीणा वादक शरीर के रोम-रोम को तारों की तरह झनझना रहा हो अपने दोनों हाथों से नल उस सौंदर्य को ऐसे समेट रहे थे जैसे कदली-पत्र के दोने में भरकर कोई अमृत का रसकोष उठा रहा हो और वह भी इतनी सावधानी से कि उसकी एक बूंद भी व्यर्थ न होने पाए। इसके उत्तर में दमयंती ने भी नल को अपनी बाँहों के बंधन में बाँध लिया।
16.
विवाह के बाद राजा नल को मनोनुकूल पत्नी पाकर परम तृप्ति का अनुभव हो रहा था। विलास में समय की गति तीव्र हो जाती है। कब कितना समय बीता, इसका भान नहीं रह जाता। इस दीर्घ काल में नल और दमयंती को एक पुत्र और एक पुत्री का सुख प्राप्त हुआ। पुत्र का नाम था इंद्रसेन और पुत्री थी इन्द्रसेना। राजा नल ने अपने राज्य विस्तार के लिए अश्वमेध यज्ञ का आयोजन किया। अपने शौर्य से वे जिधर निकलते उन्हें विजय श्री प्राप्त होती। अनेक राज्यों के अधिपतियों ने बिना युद्ध किए उनकी अधीनता स्वीकार कर ली। उनकी युद्ध-नीति संहार की नहीं सामंजस्य की थी। उन्होंने इस विराट् हिन्दू-साम्राज्य को एक करने की चेष्टा की। उस समय तक निषध देश का बहुत कुछ प्रसार हो चुका था। अब प्रेमी नल का हृदय महत्त्वाकांक्षा के समुद्र में डूब उतरा रहा था। उनकी भौतिक कामनाएँ प्रबल होती जा रही थीं। कहते हैं, लोहा जब गर्म होता है तब उस पर की गई चोट सार्थक होती है। उसी समय महाराज नल की विमाता के पुत्र पुष्कर ने उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की। पुष्कर अत्यंत स्वार्थी और ईर्ष्यालु प्रवृत्ति का व्यक्ति था। नल ने उसे एक छोटे-से राज्य का कार्य-भार और शासन सौंप दिया था। क्योंकि हिंसक और हानिकारक वस्तुएँ दूर रहने पर ही कल्याणकारी होती हैं। वनैले पशु तभी तक आकर्षक होते हैं जब तक वे वन में रहते हैं, वही यदि नगर में आ जाएँ तो भय और मृत्यु के कारण बन जाते हैं।
नल ने अपने भाई पुष्कर को उचित आसन देकर उनका कुशल समाचार पूछा। पुष्कर ने कहा-
"महाराज! आप हमारे पूज्य और ज्येष्ठ भ्राता भी हैं। आपके विवाह की सूचना से हमारे छोटे से नगर के सभी पुरवासी आह्लाद का अनुभव कर रहे थे। मैं सबकी ओर से भेंट सामग्री लेकर यहाँ पहुँचा था, किन्तु आप के दर्शन नहीं हो सके थे। इसके बाद भी मैंने कई बार प्रयत्न किया पर आप युद्ध में व्यस्त रहे। आज अवसर पाकर मुझे बड़ा आनंद मिल रहा है। पिछली बार मैंने दमयंती भाभी के दर्शन किए थे और आपके निर्णय पर मुझे गर्व का बोध हुआ था। विलंब से ही सही पर हम दोनों भ्राता क्यों न मिलकर कोई क्रीड़ा करें, आनंद और उत्सव मनाएँ।"
"पुष्कर! तुम मेरे कनिष्ठ भ्राता हो, यह तो तुम्हारा सहज अधिकार है। तुम्हीं बताओ तुम कैसी क्रीड़ा चाहते हो?"
"महाराज! हमारे श्रेष्ठ अग्रज एवं महाराज ! आपके जीवन के कई महानतम क्षण मुझे उत्सव की तरह प्रतीत हो रहे हैं। आपका शुभ विवाह, दो दिव्य संतानों की प्राप्ति और निरंतर सभी युद्धों में विजय ये सब महान हर्ष और उत्सव के विषय हैं। ये आपके भाग्योदय की उच्चता के सूचक हैं। क्यों न हम दोनों भ्राता द्यूत-क्रीड़ा करें। कभी हारें, कभी जीतें। इसलिए राजकुल की परंपरा के अनुसार मैं आपको द्यूत-क्रीड़ा के लिए आमंत्रित करता हूँ। अब परंपरा के अनुसार आप इसे नकार नहीं सकते।"
महाराज नल ना नहीं कर सके। उन्होंने स्वीकृति दे दी। वहाँ उनका कुसमय और उनकी दुर्बुद्धि कलियुग के एक कालखंड की तरह विनाश का एक जाल रच रही थी। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में पतन का बुरा समय कलियुग की तरह प्रवेश करता है और द्वापर की तरह पाँसें फेंकने के लिए विवश कर देता है। बुद्धि का उचित प्रयोग ही विकास है और दुर्बुद्धि है उसका विनाश। राजा नल ज्ञानी थे पर वह ज्ञान अहंकार में परिणत हो गया था। उनकी वीरता और धीरता अति आत्मविश्वास में बदल गई थी। इस समय वे विजय के उन्माद से उत्साहित हो रहे थे। फिर क्या था? द्यूत-क्रीड़ा में रुचि रखने वाले लोग एकत्र हो गए। राज्य के मंत्री एवं अनेक परामर्शदाता भी उस द्यूत-सभा में सम्मिलित हो गए। नल के कुछ हितैषी परामर्शकों ने उन्हें समझाने की व्यर्थ चेष्टा की पर वे कृतकार्य नहीं हो सके। क्रीड़ा आरंभ हुई और पांसे फेंके गये। पहले दौर में ही महाराज नल अपनी धन-संपदा, हीरक, मोती और रत्नों का भंडार हार गए। उनके चित्त में झुंझलाहट हो रही थी।
जैसे-जैसे महाराज नल और उनके भाई पुष्कर की द्यूत-क्रीड़ा और महाराज नल की पराजय की सूचना अन्तःपुर में पहुँच रही थी, वैसे-वैसे रानी दमयन्ती का चित्त उद्विग्न होता जा रहा था। उन्होंने दूरदर्शिता-बुद्धि का उपयोग कर सारथि वाष्र्णेय से अपने बच्चों को पिता के पास कुण्डिनपुर भेज दिया था पर भविष्य की चिन्ता उन्हें खाए जा रही थी। उन्होंने महाराज को अन्तःपुर में आने के लिए बार-बार सूचना भेजी। महाराज नल एक बार अन्तःपुर में आ चुके थे। दमयंती का बार-बार आग्रह करना उन्हें प्रिय नहीं लग रहा था। फिर भी वे विवश भाव से अन्तःपुर में दमयंती के पास गए। वहाँ जाते ही तनिक कठोर स्वर में कहा-
"यों बार-बार बुलाने का तुम्हारा आग्रह मुझे दुराग्रह लग रहा है। बाहर क्रीड़ा-मंच पर पाँसों का खेल चल रहा है। किसी के भी भाग्य का कभी भी उलट-फेर संभव है। सारे सभासद, राज्य के वरिष्ठ मंत्री हमारे इस खेल के साक्षी बने हुए हैं। यह पुरुषोचित खेल है। इसमें किसी स्त्री का परामर्श आवश्यक नहीं होता।"
"किन्तु महाराज! यह द्यूत, यह जुआ छल और प्रपंच पर आधारित एक गर्हित विद्या है। जब इसमें कोई पुरुषार्थ नहीं होता तो यह पुरुषोचित कर्म कैसे है? और फिर पुरुषार्थ के चार अंग-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पालन और उसकी प्राप्ति का अधिकार स्त्री को भी है।"
"दमयंती ! तुम ठीक कह रही हो, किन्तु मेरी प्रतिष्ठा वहाँ दाँव पर लगी हुई है और इस युद्ध में मैं पीठ नहीं दिखा सकता।"
"महाराज! यह युद्ध नहीं बुद्धि का विभ्रम है। किसी हीन कार्य को अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना लेना और उसे वीरता समझ लेना यह हठ और प्रदर्शन के सिवा और कुछ नहीं है। जुए के पाँसे किसी के भविष्य का निर्णय कर दें और मनुष्य हाथ पर हाथ धरे बैठा देखता रह जाए, अपने ही हाथों अपना विनाश निश्चित कर दे मेरी दृष्टि में यह बुद्धिहीनता है और यह क्रिया किसी बड़े विनाश का संकेत करती है।"
"महारानी! आप अपनी दृष्टि से इसे उचित मान सकती हैं, पर स्त्री-बुद्धि अन्ततः एक चिन्ता-बुद्धि ही है। इस चिन्ता में उसे भय का अनुभव होता है। लेकिन वीर पुरुष बहुत आगा-पीछा नहीं सोचते। उनके सामने विनाश भी खड़ा हो तो भी वे विचलित नहीं होते। हम राज्य भले हार जाएँ पर सम्मान हारना हम कभी नहीं चाहेंगे।" - यह कहते हुए महाराज नल द्यूत-क्रीड़ा के लिए लौट गए और रानी दमयंती के मन की बहुत सारी बातें उनके मन में ही अनकही रह गयीं।
17.
आखेट प्रिय नल को वनमार्ग का पूरा परिज्ञान था। अपने बाल्यकाल से ही वे परिजनों और सैनिकों के साथ वन-यात्रा और आखेट के लिए निकलते रहते थे। जब से दमयंती के रूप गुण का परिचय उन्हें हंस से मिला था तब से उन्हें जीव-जन्तुओं, पशु-पक्षियों और प्रकृति के विराट् सौंदर्य में अभिरुचि हो गई थी। वे एकांत में प्रकृति के तत्त्वों की तुलना दमयंती के नखशिख सौंदर्य से करते और अपनी ही कल्पना पर स्वयं मुग्ध हो जाते। प्रकृति के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े पदार्थ के प्रति उनके मन में आकर्षण का भाव था। आकाश तक उठे उन्नत पहाड़ हों या पृथ्वी से लगे हुए वृक्ष या हरित शाद्वल भूमि सब उन्हें समान रूप से रिझाते थे।
आज पुनः उसी वन मार्ग पर स्वयं एक वस्त्र होकर अपनी प्यारी पत्नी दमयंती को भी एकवस्त्रा रूप में साथ लेकर पगडंडी पर चल रहे थे। आज उन दोनों के अतिरिक्त साथ में न परिजन थे, न पुरजन, न कोई बंधु, न कोई सैन्य टुकड़ी। केवल उस पथरीले कंकड़ भरे मार्ग पर उनके पदचाप का स्वर सुनाई दे रहा था। दोपहर होने को आ गई थी। हवा में ताप घुल रहा था। पक्षियों का दल भी मौन साधे वृक्षों की पत्रावलियों की ओट में संभवतः विश्राम की मुद्रा में था। हवा की साँय-साँय और पत्रों की सरसराहट बीच-बीच में गूंज रही थी।
नल भीतर-भीतर सोचते हुए आत्म-ग्लानि के भाव से भरे धीरे-धीरे आगे चल रहे थे। कभी-कभी वन का मार्ग छायादार वृक्षों के बीच से निकलता था तो कभी वह खुले आकाश के नीचे ताप तप्त हो जाता। नल को अनुभव हुआ कि बहुत समय बीत रहा है और उन्होंने अब तक अन्न का एक दाना भी नहीं लिया है, जब उन्हें भूख सता रही है तो दमयंती की भी यही दशा होगी। उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई, वहाँ जंगली वृक्ष तो बहुत थे पर उनमें फल नहीं लगे थे। भूख की इच्छा होते ही उन्हें प्यास का भी अनुभव होने लगा। वे पत्तों के दोने बनाकर पहाड़ी से झरते हुए झरने के समीप पहुँचे। दोने में जल भरकर पहले दमयंती को पिलाया फिर स्वयं भी जल पिया। हवा के बहने से झरने के छींटे शरीर के ताप को दूर कर रहे थे, जल के छीटों से दमयंती का मुख उसी प्रकार खिल गया था जैसे जल से भींगे पौधे और भी हरे हो जाते हैं। कुछ देर वहीं बैठकर उन्होंने श्रम-भार हल्का किया पर दमयंती से आँख मिलाने का साहस उनमें नहीं था। फिर भी उन्होंने कुछ कहना प्रारंभ किया
"प्रिये! जो कुछ हुआ उसकी कोई कल्पना मुझे नहीं थी, यह परिस्थिति अघटित घटना की तरह घट गयी जैसे कोई हरा-भरा वृक्ष विद्युत के गिरने से पलभर में राख हो जाता है, वैसे ही हमारा राज्य, हमारा सुख, हमारा बल सबकुछ देखते-देखते क्षण मात्र में नष्ट हो गया। मुझे एक क्षण भी यह भान नहीं हुआ कि मैं यह क्या कर रहा हूँ? इसका कुपरिणाम क्या होगा? मुझे स्वयं पर लज्जा, ग्लानि, क्रोध, आश्चर्य का मिश्रित भाव आ रहा है। क्या यह सब मेरे द्वारा ही होना था? महान शूरवीर कहे जाने वाले महाराज नल का समस्त तेज अचानक नष्ट कैसे हो गया? मेरी मति मारी गई। मैं भ्रांत और अस्थिर चित्त वाला कैसे हो गया? मैं यद्यपि राजा था पर संभवतः मैं राजा होने योग्य नहीं था! मेरा यह कार्य निन्दनीय था।"
दमयंती ने टोका "महाराज! स्वयं को या नियति को दोष देने से अब लाभ ही क्या है? मैंने तो भरसक आपको रोकने, समझाने और प्रबोधित करने की पूरी-पूरी चेष्टा की पर आप इसे युद्ध, वीरता और पुरुषार्थ का विषय मानकर अपने हठ पर अड़े रहे। आपने यह नहीं सोचा कि जब स्वयं की बुद्धि निर्णय लेने में असमर्थ हो जाए तो दूसरे से परामर्श लेना आवश्यक हो जाता है। इसीलिए राजा स्वयं अकेला पर्याप्त नहीं होता, उसे परामर्श देने के लिए योग्य मंत्रीगण, गुरुजन, पितृजन या पत्नी का महत्त्व होता है।"
"दमयंती ! जब मनुष्य का मन विभ्रमित होता है तो वह जिस मार्ग पर चल पड़ता है, उसी को सत्य समझने लगता है। मैंने उस दशा में किसी की बात नहीं मानी और स्वेच्छाचारी होकर अपने ही निर्णय को सत्य मानने की भूल कर बैठा।"
इतना कहकर नल किसी बालक की तरह फूट-फूटकर रो पड़े, वे उसी दशा में अस्फुट वाणी में बोलते गए -
"मैं किसी क्षमा का पात्र नहीं, मैं तुम्हारा अपराधी हूँ। वह अपराधी कभी क्षमा योग्य नहीं होता जो भूल पर भूल करता जाता है। अभी हम दोनों भूख से क्लांत हैं और मैं तुम्हारे लिए अन्न का दाना नहीं जुटा सकता इससे बढ़कर मुझ जैसा हतभाग्य और कौन हो सकता है?"
दमयंती ने नल को अपनी भुजाओं में समेट लिया, वे नल की आंखों से बहते अश्रुओं को पोंछ रही थी और उनकी आँखों से भी अश्रु बिन्दु साथ-साथ टपक रहे थे।
कुछ देर तक उसी मनोदशा में रहने के बाद नल ने किंचित् प्रकृतिस्थ होकर कहा- "परिस्थिति जो भी आए, हमें साहस से तो काम लेना ही होगा। चलो, धीरे-धीरे हम आगे भी यात्रा की ओर चलें।"
यह कहकर नल आगे-आगे चलने लगे। उन्होंने दमयंती को वन-मार्ग के विषय में बताना आरंभ किया "देखो हमलोग जिस मार्ग पर चल रहे हैं, उसके ठीक आगे दाहिनी ओर जो मार्ग मुड़ता है वह सीधा तुम्हारे विदर्भ देश के कुण्डिनपुर को जाता है, बायीं ओर का मार्ग निरापद नहीं है, इसलिए इस दाहिने मार्ग को अच्छी तरह पहचान लो।"
दमयंती ने प्रश्न किया "आप बार बार विदर्भ राज्य के मार्ग का संकेत क्यों कर रहे हैं? क्या हम लोग विदर्भ देश जा रहे हैं?"
नल इस प्रश्न से हतप्रभ रह गए "नहीं-नहीं! मेरा यह आशय नहीं था। यदि कोई विषम परिस्थिति उत्पन्न हो जाए तो तुम्हारे लिए विदर्भ देश का मार्ग जानना-पहचानना आवश्यक होगा।"
"जबतक आप मेरे साथ हैं मेरे समक्ष कोई विषम परिस्थिति नहीं आ सकती। मैं अनुकूल या प्रतिकूल किसी भी परिस्थिति को स्वीकार करने के लिए कृत संकल्प हूँ।"
नल धीरे धीरे उस महावन में आगे तो बढ़ते जा रहे थे पर भूख, प्यास और दुर्बलता का अनुभव उन्हें हो रहा था, वे अपनी पत्नी दमयंती की चिन्ता से व्यथित और कातर हो रहे थे।
18.
नल दमयंती एक अज्ञात पथ की ओर चल पड़े थे। नल कुछ बोल नहीं रहे थे, पर उनके हृदय में झंझावात उठ रहा था। देखते-देखते पल भर में पट-परिवर्तन हो गया था। उन्हें स्मरण आ रहा था जब जुए के अंतिम दांव में वे राज-पाट सब कुछ हार गए तब पुष्कर ने उनका उपहास करते हुए कहा था-"क्यों महाराज नल! अब तो आपके पास दांव पर लगाने के लिए कुछ न बचा है, बस एक दमयंती बच गई है।"
पुष्कर की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि नल ने उसकी ओर क्रूर दृष्टि से देखा। उसे दृष्टि में तीव्र घृणा के साथ क्रोध, पश्चात्ताप और करुणा का मिला-जुला भाव था। उनकी मुद्रा अत्यंत गंभीर हो गई थी और दारुण दुख से उनका हृदय फटा जा रहा था। इसके साथ उनकी मानसिक पीड़ा तब और भी बढ़ गई जब पुष्कर ने अपनी कठोर राजाज्ञा प्रसारित करा दी कि जो कोई नल या दमयंती को शरण या भोजन देगा वह वध का पात्र होगा। दो दिनों तक दोनों पति-पत्नी निराहार केवल जल पीकर मार्ग में विश्राम करते और चलते रहे। सुकुमार दमयंती चल नहीं पा रही थी, नल किसी प्रकार उसे सहारा देते हुए आगे बढ़ते रहे। अब घना वन आरंभ हो गया था। घने वृक्षों के कारण दिन में भी संध्या का भ्रम हो रहा था। एक विशाल वृक्ष की छाया में दमयंती थककर गिर पड़ी। दो-तीन दिन अन्न के बिना ही निराहार बीत गए थे। नल ने आस-पास के वृक्षों में कुछ फल देखे, उन्हें तोड़कर उन्होंने किसी प्रकार क्षुधा मिटायी। उन्होंने दमयंती से कहा-
"हमारे इस दुर्दिन में तुम्हारे पिता का घर ही सुरक्षित स्थान प्रतीत हो रहा है। तुम्हें किसी भी तरह विदर्भ पहुँचना होगा! इसे तुम मेरा अनुरोध और आज्ञा दोनों समझ लो।"
- "तो हम दोनों कुंडिनपुर चलें! मैंने बच्चों को पहले ही अपने पिता के पास भेज दिया था।"
-" नहीं दमयंती ! कुडिनपुर में मैं एक सम्राट् की तरह सम्मानित हुआ था,
अब भिक्षुक बनकर मैं अपने बचे-खुचे सम्मान को ठोकर नहीं लगा सकता। इसलिए तुम्हें साहस करके स्वयं जाना होगा। रही बात मेरी तो मै अपन भाग्य से लडूंगा। मेरा विश्वास है कि मैं इसमें विजयी होऊँगा और हमारे दिन भी पलटेगें।"
दमयंती ने कोई उत्तर नहीं दिया, वह अत्यंत श्रांत और क्लांत हो गई थी। वह अपने हाथ को सिरहाना बनाकर पृथ्वी पर लेट गई और क्षणभर में उसे गहरी नींद आ गई।
नल मौन होकर कुछ देर सोंचते रहे, उनके शरीर पर केवल एक अधोवस्त्र लिपटा था। उन्हें ओढ़ने के लिए कोई वस्त्र भी नहीं दिया गया था। उन्हें मन में इस बात की चिन्ता थी कि आगे भोजन का प्रबंध कैसे होगा? अचानक उन्होंने देखा कि कुछ पक्षी समीप में ही कहीं बैठे हैं और उनके पंख सोने के प्रतीत हो रहे हैं। उन्होंने सोचा कि ये पक्षी उनके आहार हो सकते हैं और उनके स्वर्ण पंखों को बेचकर कुछ धन प्राप्ति भी हो सकती है। उसी चेतना शून्य अवस्था में उन्होंने अपना अधोवस्त्र खोलकर उन पक्षियों पर सावधानी से डाल दिया। वे सारे पक्षी वस्त्र से ढंक गये पर वे सभी उस वस्त्र को लिए हुए उड़ गए। अब नल एक नग्न, क्षुधातुर और विभ्रमित व्यक्ति के सिवा कुछ नहीं थे। अपनी लज्जा निवारण के लिए उनके पास वस्त्र का कोई टुकड़ा भी नहीं बचा था। वे आस पास कोई अस्त्र या नुकीला औजार खोजने लगे। इस तरह की एक वस्तु मिल भी गई और उन्होंने बड़े निर्मम हृदय और आर्त्तता से दमयन्ती के फैले हुए आंचल का प्रायः आधा हिस्सा फाड़ लिया और किसी तरह तन ढँककर बैठ गए। थकान और पीड़ा से दमयंती की निद्रा भंग नहीं हुई और उसे भाग्य के सहारे छोड़कर समय के मारे निष्ठुर नल उद्घान्त मनः स्थिति में चल पड़े और घने वन में कहीं खो गए।
थोड़े ही समय के बाद दमयंती की निद्रा टूटी, उसकी आँखें अपने पति नल को ढूंढ़ रही थी। उसने जो साड़ी पहनी थी वह भी आधी रह गई थी। पहले तो दमयन्ती ने अपने वस्त्र को व्यवस्थित किया और आकुल स्वर में नल को पुकारने लगी। पर कोई उत्तर नहीं मिला, उसका स्वर पुनः उसी के पास वन-वृक्षों से टकराकर लौट आया।
"तो क्या उसके प्रियतम नल असहाय अवस्था में, इस भीषण वन में मुझे अकेली छोड़कर चले गए? महाराज नल के प्राणों से भी प्यारी दमयंती अर्थात् मैं परित्यक्ता हो गई?"
- दमयंती प्रलाप की मुद्रा में बुदबुदा रही थी। उसके भीतर से शब्द जैसे प्राणों को मथते हुए टूट-टूटकर बाहर निकल रहे थे। पहले उसने आसपास देखा, फिर पुकारा, फिर वह शक्तिभर पुकारती रही, वन के सन्नाटे में उसकी पुकार एक चीख की तरह गूंज रही थी।
19.
विपद एवं विषाद-ग्रस्त नल दमयन्ती से विलग होकर, अत्यन्त पीड़ित मनःस्थिति में सर्वत्र भटक रहे थे। अपनी स्त्री को उन्होंने जिस दारुण अवस्था में त्यागा था वह दृश्य बार-बार उनके नेत्रों के सामने आ जाता। एक समर्थ व्यक्ति असमर्थ होकर कितना दयनीय हो जाता है, वे उसके उदाहरण लग रहे थे। आगे बढ़ने पर वन में उन्हें पशुओं के भागने का स्वर सुनाई पड़ा। बड़े-बड़े हिंसक पशु भी प्राण-रक्षा के लिए चीखते-चिल्लाते भाग रहे थे। कुछ और आगे बढ़ने पर वे समझ गये कि पूरे वन में आग लगी है और वह दावानल में जल रहा है। अब उन्हें आगे बढ़ने का कोई मार्ग नहीं दीख रहा था। वे लौट ही रहे थे कि उन्होंने आग की लपटों से घिरी एक छोटी पथरीली गुफा देखी जिसमें एक भयानक नाग कुंडल के आकार में पड़ा था और वह बार-बार प्राण-रक्षा की गुहार लगा रहा था। उसे देखकर नल वहीं रुक गये। वह भयानक सर्प उनसे प्रार्थना कर रहा था
"राजन् मैं कर्कोटक नाग हूँ। एक दिन कभी नारद ने मुझे शाप दे दिया था कि तुम तब तक जड़ की तरह पड़े रहोगे जब तक राजा नल तुम्हें यहाँ से निकाल कर अन्यत्र न ले जाएं, तभी तुम्हारी शाप-मुक्ति संभव है। राजन् चारो ओर दावाग्नि की आग धू-धू कर जल रही है, और मैं एक पग भी नहीं चल सकता, भाग कर अपनी प्राण रक्षा भी नहीं कर सकता। आप चाहें तो मुझे दावाग्नि में जलने से मेरे प्राणों की रक्षा कर सकते हैं। नल की सहमति देखकर कर्कोटक नाग ने अपने स्वरूप को अत्यंत छोटा कर लिया और कहा- "राजन्! आज से मैं आपका मित्र हुआ।"
नागराज कर्कोटक को उठाकर नल ने सुरक्षित स्थान पर रख दिया। जब वे वहाँ से चलने को उद्यत हुए कर्कोटक ने फिर कहा- "महाराज! आप यहाँ चलते समय अपने पगों को गिनते हुए चलें। आपके ऐसा करने पर मैं आपका सहायक होऊँगा।"
राजा नल ने अपने पगों को गिनते हुए जैसे ही 'दश' का उच्चारण किया।
कर्कोटक नाग ने उन्हें डॅस लिया। उसके दंश से उनका पहला स्वरूप बदल गया और वे विकृत तथा कृष्ण वर्ण के हो गए। कर्कोटक बोला- "महाराज ! अब आपका स्वरूप पूरी तरह बदल गया है। अब आपको कोई पहचान नहीं पायेगा। आपके शरीर में मेरा विष रहकर आपके भीतर 'कलिकाल' या बुरी शक्तियों को नित्य तब तक जलाता रहेगा, जब तक वे आपको अपने कुप्रभाव से मुक्त न कर दें। आप जैसे निरपराध को छल से बहुत सताया गया, अब आपको किसी से भय नहीं रहेगा। अब आपको न कभी विष की पीड़ा होगी, न कभी आप पराजित होंगे। आप यहाँ से बाहुक नामक रथ-चालक बनकर राजा ऋतुपर्ण के पास जाएँ। वे अयोध्यापुरी के नरेश हैं। वे आपके मित्र हो जायेंगे, आपसे अश्वविद्या का रहस्य सीखेंगे और बदले में आपको द्यूत-क्रीड़ा का रहस्य समझायेंगे। मैं नागराज कर्कोटक आपको दो दिव्य वस्त्र भी प्रदान करता हूँ, जिसको धारण करते ही आप अपने पूर्व तेजस्वी रूप को प्राप्त कर लेंगे। शीघ्र ही आपके सारे दुख नष्ट होंगे और आपका अभीष्ट पूर्ण होगा।"
इस प्रकार राजा नल को चकित-विस्मित अवस्था में छोड़कर कर्कोटक नाग अन्तर्धान हो गया।
20.
घोर महावन में अकेली दमयंती का विलाप एक आर्तनाद की तरह गूँज रहा था। समय के दुर्दम आघात को वह न तो झेल पा रही थी, न समझ पा रही थी। कभी क्रोध, कभी आवेश से छटपटाती हुई दमयंती वन में इधर से उधर भाग रही थी कि अचानक ठोकर लगने से वह सीधा मुँह के बल गिर पड़ी। उसके समीप के ही वृक्ष से लिपटा विशालकाय भूखा अजगर अपने आहार को इतने समीप देख उसके पाँवों की ओर से उसे लीलने का प्रयत्न करके लगा। उस शून्य में मृत्यु को अपने इतने समीप देखकर दमयंती के रुदन का वेग बढ़ गया। अपनी प्राण-रक्षा के लिए वह भयभीत होकर पुकार कर रही थी। अजगर धीरे-धीरे उसके पाँव को मुख में खींच रहा था। उसी समय वन में आखेट के लिए घूमते हुए एक व्याध की दृष्टि इस दृश्य पर पड़ी। उसने दौड़कर बड़ी स्फूर्त्ति से अजगर का सिर और शरीर अपनी तलवार से काटकर उसे मार डाला। उसने दमयंती की प्राण-रक्षा की। उसे जल और भोजन दिया। भोजन के बाद उसने दमंयती से उसका परिचय पूछा। दमयंती ने रोते हुए अपनी कहानी कह सुनाई। उस समय मृत्यु, भय, मानसिक पीड़ा और चीत्कार की दशा में अपने शरीर का उसे कोई बोध नहीं रह गया था। वह भूल गई थी कि उसका सुकोमल शरीर मात्र आधे वस्त्रों में ही ढँका था। उसमें से छन छन कर आती हुई रूप-कांति ने व्याध के मन में कामुकता भर दी। वह दमंयती के समीप बैठकर वासना भरी दृष्टि से उसके अंग प्रत्यंग की रेखाओं को निहारता हुआ उससे अनुकूल और प्रलोभन भरी बातें करने लगा। उसने सांत्वना देने के बहाने दमयंती के शरीर का स्पर्श करना चाहा। उसकी कामुक चेष्टाओं को भाँपने में दमयंती को तनिक भी बिलंब नहीं हुआ। वह एक झटके में उठ खड़ी हुई। अपने रक्षक को ही भक्षक देखकर वह अत्यंत क्रोधाविष्ट हो गई। व्याध की कामुकता को बढ़ता देखकर दमयंती ने अपनी मानसिक शक्ति एकत्र की। उस साध्वी ने मन वचन और कर्म से नल के प्रति अपने सात्विक और शुद्ध प्रेम के बल पर उसे शाप दिया और वह व्याध एक कटे हुए वृक्ष की तरह धराशायी हो गया। उस समय उस सती का दुर्बल शरीर तेज और अग्नि के ज्वलित ताप की तरह मानो धधक रहा था। उसकी यह शक्ति नल के प्रति अनन्य चिंतन के कारण ही उत्पन्न हुई थी। वहाँ से आगे बढ़कर सबसे बचती दमयंती उस घोर वन में अपने पति द्वारा संकेत किए गए विदर्भ देश के मार्ग की ओर धीर-धीरे बढ़ने लगी।
आगे वह वन और भी घना और संकीर्ण होता जा रहा था। सिंह, व्याघ्र, भैंसों और रीछों जैसे हिंसक पशुओं से भरा हुआ वह महावन एक भयानक वातावरण की सृष्टि कर रहा था। सर्वत्र शाल, पीपल, पलाश, अर्जुन, सेमल, जामुन, आँवला, कदम्ब, वेर, बेल, बरगद आदि के वृक्षों से भरा वह विशाल वन साँय-साँय कर रहा था। वहाँ पर्वत और कंदरायें थीं, पक्षियों के कलरव से गुंजायमान कुंज थे। नदी और झरनों का वेग था किन्तु उसका भय उस समय पति के प्रेम में परिवर्त्तित हो गया था। वह इस संपूर्ण त्रिलोक में केवल नल को पाना चाहती थी। कभी वह प्रश्न और प्रलाप करती, कभी स्वयं उसका उत्तर देती। वह पर्वतों, वृक्षों और हिंस्र पशुओं से अपने पति का समाचार पूछती चल रही थी। उसने वन के किनारे एक विराट पवर्त को देखकर उसके निकट जाकर कहा-
"मैं राजा नल की पत्नी दमयंती आपके चरणों में प्रणाम करती हूँ। मैं प्रसिद्ध राजा वीरसेन की पुत्रवधू और विदर्भ नरेश महाराज भीम की दुलारी पुत्री दमयंती हूँ। इन सभी राजाओं ने बड़े-बड़े अश्वमेध यज्ञ किए हैं। मेरे पति देवतुल्य राजा नल पुण्यात्मा हैं। इस समय मैं अबला नारी धन-सम्पत्ति से वंचित, पति से विलग और संकटों की मारी हुई आपसे अपने पति की कुशलता पूछ रही हूँ। क्या आपके गगनचुम्बी शिखरों ने इस भयानक वन में मेरे पति महाराज नल को देखा है?"
आगे मार्ग में बढ़ते हुए दमयंती को व्यापारियों का एक दल दिखाई दिया। उसका वणिक सरदार उस घोर वन में एक अकेली असहाय स्त्री को देखकर चकित था। उसने दमयंती से कहा कि वह चेदिराज सुबाहु के नगर में व्यापार के उद्देश्य से जा रहा है। दमयंती आश्वस्त होकर उस दल के साथ चल पड़ी। आगे चलता हुआ वह यात्री दल एक और विशाल वन में पहुँचा। वहाँ एक बहुत बड़ा सरोवर था जिसका नाम पद्म सौगंधिक था। वहाँ फल-फूल जैसे साधन भी प्रचुर मात्रा में थे। व्यापारियों के उस दल ने वहीं डेरा डाल दिया। आधी रात में जब सब गहरी निद्रा में थे तभी अचानक जंगली हाथियों के एक दल ने उन पर आक्रमण कर दिया और सबको अपने पैरों तले कुचलने लगे। विनाश का यह तांडव बहुत देर तक चला। इस भयंकर चीख-पुकार से दमयंती की निद्रा टूट गई और वह बचने का प्रयत्न करने लगी। अन्त में बचे हुए कुछ ही लोगों के साथ प्राण बचाकर उसने सुबाहु की राजधानी में प्रवेश किया। उस समय तक राजमार्ग पर वह एक उन्मत्त स्त्री की तरह चल रही थी। कई दर्शक उसके आस पास खड़े थे। संयोगवश उसी समय राजमहल के गवाक्ष से राजमाता ने राजमार्ग पर उसे देखा। उन्हें लगा सात्विक सौंदर्यवाली लक्ष्मी स्वरूपा यह स्त्री किसी उन्मत्त की तरह ऐसा आचरण क्यों कर रही है? उन्होंने अपनी दूतिकाओं को भेजकर दमयंती को अन्तःपुर में बुलवाया। राजमहल में पहुँचकर दमयंती अपना वास्तविक परिचय नहीं बता सकी।
राजमाता के बार-बार पूछने पर उसने कहा- "मेरे पति एक संपत्तिशाली व्यक्ति थे। जुए में उन्होंने सारा धन गवां दिया और हम वन में आ गए। किसी कारण से उन्होंने मेरा आधा वस्त्र फाड़कर ले लिया और मुझे असहाय छोड़कर कहीं चले गए। हम समय के चक्र में यह दुख झेल रहे हैं। मैं अब सैरन्ध्री या सेविका का कार्य कर सकती हूँ। यदि आप मुझे शरण देंगी तो मैं आपकी सेवा में कोई त्रुटि होने दूंगी। लेकिन मैं अपने एक नियम के साथ ही कहीं कार्य कर सकती हूँ। मैं किसी का जूठा नहीं खाऊँगी, किसी के पैर नहीं धोऊँगी और किसी भी परपुरुष से कभी किसी तरह का वार्तालाप नहीं करूँगी। यदि कोई पुरुष हमसे कोई अभद्र आचरण करना चाहे तो वह दण्ड का पात्र हो। यदि वह बार-बार ऐसा अपराध करे तो उसे मृत्यु दण्ड दिया जाए। मैं अपने पति की खोज के लिए केवल ब्राह्मणों से मिल सकती हूँ। यदि आपके यहाँ ऐसी व्यवस्था हो तो आपके समीप रहने में मुझे सुख प्राप्त होगा।"
राजमाता ने कहा- "पुत्री! तुम्हारा व्रत उत्तम है। मेरे सैनिक भी तुम्हारे पति की खोज करेंगे। तुम मेरी पुत्री सुनंदा के साथ यहाँ सुखपूर्वक निवास कर सकती हो।"
21.
नल का दिव्य स्वरूप अब कर्कोटक नाग के विष के प्रभाव से विद्रूप और गहरे श्यामल रंग का हो गया था। शरीर और मन दोनों ही दशाओं में अपना पतन और परिवर्तन देखकर नल एक दुखित प्राणी के रूप में किसी प्रकार जी रहे थे। अनेक दिनों की कठिन यात्रा कर वे राजा ऋतुपर्ण की राजधानी अयोध्या पहुँचे। अब उनका नाम और परिचय बाहुक था। उन्होंने राजा ऋतुपर्ण से निवेदन किया -
"महाराज! मेरा नाम बाहुक है और सुदूर देशों की यात्रा करता हुआ आश्रय की खोज में यहाँ तक आया हूँ। मैं अश्व विद्या और अश्व संचालन की कला में सिद्धहस्त हूँ, इसके साथ ही अन्य अनेक कलाओं में रुचि है, द्यूत-क्रीड़ा से लेकर भोजन की पाक विधियों का भी जानकार हूँ, अनेक शिल्प कलाओं का मर्मज्ञ हूँ, आप मुझे शरण दें और मेरा भरण-पोषण करें।"
"बाहुक! तुम्हारे गुणों को जानकर मैं प्रभावित हुआ। तुम मेरे राज्य में निवास करो। तुम्हें एक वर्ष में दस हजार स्वर्णमुद्राओं के साथ अन्य सुविधाएँ भी प्राप्त होंगी। मेरे यहाँ के जीवल और वाष्र्णेय नामक सारथि सदैव तुम्हारा सहयोग करेंगे। मेरे अश्वों की गति तीव्र हो, यह मैं सदैव इच्छा रखता था। तुम्हारे आने से मुझे प्रसन्नता हुई है।"
नल ने राजा ऋतुपर्ण द्वारा प्रदत्त कार्य-भार संभाल लिया और उनके मन में दमयंती की चिन्ता एक कंटक की तरह भीतर-भीतर चुभ रही थी। वे बार-बार उस दृश्य का स्मरण कर विचलित होते, क्षुब्ध होते, आत्मग्लानि से भरकर स्वयं को कोसने लग जाते, अपने अपराध पर उन्हें लज्जा भी थी, ग्लानि भी, क्रोध भी था, पश्चात्ताप भी, दुःख भी था नैराश्य भी। अपनी विवेकहीनता पर उन्हें स्वयं घोर आश्चर्य होता था। वे बार-बार इस वाक्य को किसी श्लोक या मंत्र की तरह दुहराते रहते थे-
"मैंने उस तपस्विनी को भूख-प्यास से पीड़ित और अत्यंत असुरक्षित दशा में हिंस्र पशुओं से भरे वन में एकाकी छोड़ दिया, मंद बुद्धि और स्वार्थी पुरुष का क्या वह तपस्विनी दमयन्ती कभी स्मरण भी करती होगी, वह कहाँ होगी, कैसी होगी?" नल की वह पीड़ा एक मौन क्रंदन की तरह फूट पड़ती। एक दिन सारथि जीवल ने पूछ ही दिया-
"बाहुक! वह स्त्री कौन है, किसकी पत्नी है जिसकी पीड़ा के स्मरण से तुम बार-बार विचलित हो जाते हो, तुम्हारे इस महाशोक का कारण क्या है?"
"वह एक बुद्धिहीन और मूर्ख व्यक्ति की करुण कथा है जिसने आदर और स्नेह की पात्री अपनी पत्नी को वन में एकाकी छोड़ दिया, अपनी प्रतिज्ञा भूल गया। वह भाग्यहीन पुरुष कभी भी, किसी भी क्षमा का पात्र नहीं हो सकता। उसने स्त्री के आत्म-सम्मान को चोट पहुँचाई, वह हतभाग्य पत्नी के वियोग में अपनी ही करनी का फल भोगता हुआ निरंतर अपनी प्रियतमा का स्मरण कर दुखी और दग्धचित्त होता रहता है। उसकी पत्नी-वह स्त्री सच्ची पतिव्रता थी जो एकवस्त्रा होकर उसके पीछे-पीछे घोर वन में चली आई, पर उस स्वार्थी पुरुष ने केवल अपनी चिन्ता की, उस एकवस्त्रा के भी आधे वस्त्र उसने ले लिए और उस निरपराधिनी का परित्याग कर चल पड़ा। उसने पुरुष के दायित्व की पूर्ति भी नहीं की, वह पति कहलाने योग्य नहीं। उस भयंकर वन में उसकी प्रिया जीवित भी है या नहीं? इसका कोई परिज्ञान उसे नहीं। उस मंदबुद्धि, मंदभाग्य की कथा क्या सुनाऊँ, जिसमें अभाग्य और दुख के सिवा कुछ भी शेष नहीं है।"
नल इसी रूप में राजा ऋतुपर्ण के यहाँ अज्ञातवास करते रहे, वे अपने ही कर्मों से पीड़ित अपनी ही लगाई आग में स्वयं जल रहे थे।
दमयंती के पिता विदर्भराज भीम इन दुखद बातों से दिनरात सपत्नीक विह्वल रहते थे। उन्होंने अनेक ब्राह्मणों को प्रचुर मार्ग-व्यय और सुविधाओं के साथ अनेक देशों और स्थानों पर भेजा क्योंकि ब्राह्मण पूज्य होते हैं, वे सहज ही सबके नमस्य होते हैं, स्त्रियाँ भी उनका सम्मान करती हैं, अतः किसी समाचार की प्राप्ति में वे सहायक सिद्ध होते हैं। उन्होंने ब्राह्मणों को संदेश दिया कि "आप राजा नल और मेरी पुत्री दमयंती का पता लगाएँ। कार्य सिद्धि होते ही आपको मैं सहस्र गौएँ प्रदान करूँगा। साथ ही कर-मुक्त भूमि और निवास योग्य भवन दूँगा। उन्हें लाना संभव न हो तो केवल उनका पता लग जाने पर भी आप यथेष्ट पुरस्कार के पात्र होंगे।"
उनकी आज्ञा पाकर सभी ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक राज्यों, नगरों में नल और दमयन्ती का अनुसंधान करने लगे। सुदेव नामक एक ब्राह्मण ने चेदिनगर के राजमहल में विदर्भ कुमारी दमयंती को देखा। दमयंती राजा के पुण्याहवाचन के समय सुनंदा के साथ खड़ी थी यद्यपि धूप, ताप से उसका दिव्य रूप ऊपर से मलिन दिखाई दे रहा था पर जैसे राख से लिपटी हुई अग्नि का तेज नहीं छिपता वैसे ही सुदेव को विश्वास हो गया कि यह राजा भीम की पुत्री दमयंती ही है।
जैसे कमलिनी कीचड़ से कभी-कभी आवृत हो जाती है, वैसे ही दमयंती ग्रहण लगे पूर्णचन्द्र की तरह पीड़ित और मलिन दीख रही थी। सदैव सुखों में लालित-पालित यह कन्या पति-विहीन कितने दुख उठाकर यहाँ तक पहुँची होगी। सुदेव दमयंती को पहचानकर उसके समीप जाकर बोले-
"विदर्भ राजकुमारी! मैं तुम्हारे भाई का प्रिय सखा सुदेव ब्राह्मण हूँ। महाराज भीम की आज्ञा से मैं तुम्हारा अन्वेषण करता हुआ यहाँ तक पहुँचा हूँ। तुम्हारे पिता और तुम्हारी दोनों संतानें कुण्डिनपुर में सकुशल हैं। राजाज्ञा से सैकड़ों ब्राह्मण तुम्हारी और राजा नल की खोज में देश-देशान्तर में घूम रहे हैं।"
राजमाता शीघ्रता से सुदेव के पास पहुँची और पूछा- ब्राह्मण देव! आप संभवतः इसे जानते हैं। आप बताएँ यह सुंदर युवती किसकी पत्नी अथवा पुत्री है? ऐसी साध्वी नारी किस प्रकार इस दुरवस्था तक पहुँची है?
राजमाता के प्रश्न के उत्तर में सुदेव ने कहा- "देवि! यह विदर्भ देश के महाराज भीम की पुत्री दमयंती है और महाराज वीरसेन के पुत्र निषध नरेश नल की यह कल्याणमयी पत्नी है। इसके ललाट पर के चिह्न से मैंने इसे पहचान लिया है। फिर सुदेव ने पुष्कर के साथ राजा की द्यूत-क्रीड़ा और वनगमन का सारा वृत्तांत कह सुनाया। ललाटवर्ती चिह्न को देखते ही राजमाता और सुनंदा दोनों ही रोने लगीं और दमयंती को हृदय से लगाए स्तब्ध खड़ी रहीं।"
राजमाता बोली - "पुत्री! तुम मेरी बहन की पुत्री हो। मैं और तुम्हारी माता दोनों दशार्ण देश के स्वामी राजा सुदामा की पुत्रियाँ हैं। तुम्हारे बाल्यकाल का कुछ समय दशार्ण देश में मेरे पिता के ही घर पर बीता था। आज तुम्हें पाकर सुख-दुख का समान अनुभव मुझे हो रहा है। मैं समझ नहीं पा रही कि इस दशा में मैं हँसूँ या रोऊँ? तुम्हें पाकर आज मैंने सब पा लिया।"
"माता! आप मुझे पहचानती नहीं थीं, पर मैं बड़े सुख से यहाँ रही। मुझे आपसे सभी सुविधाएँ भी मिलीं और पूर्ण सुरक्षा भी। मातः ! मैं अपने बच्चों से पिता-माता से मिलने के लिए व्यग्र हूँ, मुझे वहाँ पहुँचाने की शीघ्र व्यवस्था करा दें।"
राजमाता ने सारी व्यवस्था कर दमयंती को अपनी पुत्री की तरह किसी राजकन्या की भांति विदर्भ देश के लिए जाने का प्रबंध कर दिया। कुछ ही दिनों में दमयन्ती कुण्डिनपुर पहुँचकर अपने माता-पिता से मिली। राजा भीम आनंद-विह्वल हो गए। उन्होंने सुदेव को संकल्पित दान से पूरी तरह संतुष्ट कर दिया।
दमयंती सुरक्षित अपने पिता के पास पहुँच गई थी अब उसे महाराज नल की चिन्ता थी, वे कहाँ होंगे, कैसे होंगे? नाना चिन्ताओं और दुश्चिन्ताओं से उसका चित्त निरंतर विकल रहता था। उसकी दशा देखकर महाराज भीम ने पुनः ब्राह्मण समुदाय को एकत्र कर विविध देशों, राज्यों और नगरों में महाराज नल की खोज करने के लिए नियुक्त किया।
उन्होंने कहा- "प्रिय ब्राह्मणो! आपके ही कारण मुझे अपनी प्रिय पुत्री दमयंती से मिलने का सौभाग्य मिला अब आप मेरा एक और गुरुतर कार्य पूरा करें, मुझे अपने जामाता नल की खोज करनी है। महाराज नल अपने तेज से कहीं भी पहचाने जा सकते हैं, बस सावधान होकर उन्हें ढूँढने का प्रयत्न करें।"
ब्राह्मणों ने राजकुमारी दमयन्ती से पूछा 'यदि हमें महाराज नल का पता लगाना हो तो हम आपकी ओर से क्या संदेश प्रसारित करेंगें?"
दमयंती ने कहा- "सभी स्थानों पर जन समुदाय में मेरी यह बात बार-बार दुहरावें - "ओ जुआरी प्रियतम! तुम वन में सोई हुई और अपने पति की अत्यंत प्यारी पत्नी को छोड़कर और उसका आधा वस्त्र फाड़कर कहाँ चले गए? तुम्हारी वह प्रिया तुम्हारी आज भी प्रतीक्षा कर रही है। आज भी आधे वस्त्र से ही अपना शरीर ढँककर वह तुम्हारे विरह की पीड़ा में निरंतर दग्ध हो रही है।"
"ब्राह्मणो! आप ऐसी ही बातें बार-बार दुहरायें, यह सब सुनकर अगर कोई उस बात में रुचि ले या आपको उत्तर दे तो उसका परिचय पाने का प्रयत्न कीजिएगा - यदि ऐसा व्यक्ति कोई मिले तो उसे बिना कुछ बताए, अबिलंब मुझे आकर सूचित कीजिएगा।"
वे सभी ब्राह्मण विभिन्न दिशाओं में संकटग्रस्त राजा नल के अनुसंधान के लिए निकल पड़े।
22.
समय अपनी गति से बीतता रहा। एक दिन पर्णाद नामक ब्राह्मण ने कुण्डिनपुर लौटकर दमयंती से कहा- "मैं राजा नल को ढूँढता हुआ अयोध्या के सम्राट् ऋतुपर्ण के दरबार में पहुँचा। मैंने वहाँ तुम्हारे द्वारा कही हुई बात को बार-बार दुहराया, पर उसका तात्पर्य न तो कोई समझ सका और न कोई उत्तर दे सका। लेकिन लौटते समय राजा के बाहुक नाम के एक सारथि ने एकांत में तुम्हारी बातों का उत्तर दिया। रथ हाँकने में कुशल किन्तु वह कुरूप व्यक्ति पीड़ित होकर बार-बार कहने लगा - "
"आपकी बातें बड़ी मर्म वेधक थीं। उन्हें सुनकर मेरी आँखों में अश्रु आ गए। सचमुच उत्तम कुल की स्त्रियाँ संकट में पड़कर भी धैर्य नहीं खोती हैं। परित्यक्त होने पर भी क्रोध नहीं करतीं। वह व्यक्ति निश्चय ही बड़े संकटों के कारण ही विवेकहीन हो गया होगा। अपनी क्षुधा मिटाने के लिए उसके सभी प्रयत्न निष्फल हुए होंगे। किसी कारण उसका एकमात्र वस्त्र फाड़कर अपनी लज्जा का उसने निवारण किया होगा। सारे सुखों से वंचित और दुख के सागर में डूबते व्यक्ति से भला और क्या आशा की जा सकती है?"
ब्राह्मण पर्णाद की बातें सुनकर दमयंती की भी आँखें भर आईं। उन्होंने ब्राह्मण का उचित सत्कार कर उन्हें विदा किया। दमयन्ती को बार-बार अनुभव हो रहा था कि सारथि बाहुक के वेश में महाराज नल ही हैं। उसने अपनी माता से गोपनीय रीति से कोई निश्चय किया और सुदेव ब्राह्मण को बुलाकर कहा-
"आप अतिशीघ्र मानो उड़ते हुए अयोध्या नगरी जाएँ और महाराज ऋतुपर्ण से निवेदन करें कि राजा भीम की पुत्री दमयंती का पुनः स्वयंवर हो रहा है, उसमें देश-देश के राजा-राजकुमार पधार रहे हैं। पर समय कम है। किसी दूत की भूल से आपके पास निमंत्रण पत्रिका नहीं पहुँच सकी। यह स्वयंवर कल ही है। अगर आप एक दिन में अपने सामर्थ्य के बल पर वहाँ पहुँच सकें तो यह हम सबका अहोभाग्य होगा।" सुदेव की बात सुनकर राजा ऋतुपर्ण ने बाहुक को लक्ष्य कर कहा- "बाहुक ! लगता है, तुम्हारी अश्वविद्या की परीक्षा का दिन आ पहुँचा। मुझे एक ही दिन में विदर्भ की राजधानी कुण्डिनपुर में तुम्हें पहुँचाना है क्योंकि वहाँ मुझे अतिशीघ्र दमयंती के पुनः स्वयंवर में पहुँचना है।"
नल का हृदय ऋतुपर्ण के वेधक वाक्यों से विदीर्ण हो रहा था। वे चिन्तातुर होकर सोचने लगे-
"भला दमयंती ऐसा कैसे और क्यों कर सकती है? उसने मेरी प्राप्ति के उद्योग के लिए कोई उपाय तो नहीं ढूंढ निकाला है? अथवा ऐसा तो नहीं है कि मुझ पाप बुद्धि वाले व्यक्ति ने उसे धोखा दिया, इस कारण वह ऐसा निष्ठुर आचरण कर रही है! यह सत्य है कि मेरा अपराध अक्षम्य और भयंकर है। यह भी संभव है कि मुझसे दूर हो जाने के कारण उसके स्नेह का स्रोत सूख गया हो। सत्य-असत्य के निर्णय के लिए तो राजा ऋतुपर्ण के साथ मुझे अब जाना ही होगा।"
ऐसा निश्चय कर बाहुक ने ऋतुपर्ण से निवेदन किया-"महाराज! आपकी इच्छा मेरे लिए आज्ञा है। मैं संकल्पपूर्वक कहता हूँ कि एक ही दिन में सौ योजन का मार्ग तयकर मैं आपको विदर्भ देश में पहुँचा दूँगा।"
बाहुक के साथ राजा ऋतुपर्ण भी अश्वशाला में गए। वे बाहुक को बार-बार प्रेरित कर रहे थे कि यात्रा के लिए अच्छे अश्वों का चुनाव किया जाए। बाहुक ने सिन्धु देश के चार वेगवान घोड़े चुने, उनके शरीर में दस आवर्त्त के चिह्न थे। उनकी नाक मोटी और ठोढ़ी चौड़ी थी। पर उन्हें देखकर ऋतुपर्ण प्रसन्न नहीं हुए। उन्होंने कहा-
"तुमने कैसे घोड़े चुने हैं? ये अल्पशक्ति वाले घोड़े इतना लम्बा मार्ग कैसे तय कर सकेंगे?"
बाहुक ने कहा-
"महाराज! आपकी आज्ञा सर्वोपरि होगी, पर मेरे चुने हुए घोड़े विदर्भ तक अवश्य पहुँचेगें। महाराज! कुल बारह भंवरियों या आवर्त्त पहचान कर घोड़े रथ में जोते जाने चाहिए। ललाट में एक, छाती में दोनों ओर दो-दो और पीठ में एक इस प्रकार और सब मिलाकर कुल बारह आवर्त्त होते हैं।
इसके बाद नल ने अच्छी जाति के चार वेग शाली घोड़े रथ में जोत दिए। उन्होंने अपने साथ वाष्र्णेय सारथि को भी रथ पर बिठा लिया। यह वाष्र्णेय राजा नल का ही सारथि था पर द्यूत में नल के हारने के बाद वह राजा ऋतुपर्ण के आश्रय में आ गया था। किन्तु साथ रहकर भी वह नल को पहचान नहीं पाया। उसे केवल इस बात पर आश्चर्य हो रहा था कि इतनी तीव्र गति से रथ को लेकर दौड़ते हुए घोड़ों की यह उड़ान महाराज नल के हाथों से ही संभव हो सकती थी। उसे बाहुक की प्रवीणता पर घोर विस्मय हो रहा था। बाहुक की एकाग्रता, उसका उत्साह पुचकार कर घोड़ों को काबू में रखने की कला उसे विस्मय-विमुग्ध कर रही थी।
बाहुक के हाथों में लगाम थी और रथ गरुड़ पक्षी की तरह मानो उड़ा जा रहा था। उस समय अचानक महाराज ऋतुपर्ण का उत्तरीय हवा के झोंके से गिरकर नीचे जा गिरा। ऋतुपर्ण बोले
"बाहुक ! रथ को शीघ्र रोको। हवा से मेरा उत्तरीय नीचे जा गिरा है, उसे उठा लाओ।"
बाहुक ने उत्तर दिया-
"महाराज! अब यह संभव नहीं है। वह स्थान अब बहुत पीछे छूट गया। इस बीच हमलोग चार कोस आगे आ चुके हैं।"
महाराज ऋतुपर्ण यह सुनकर स्तब्ध रह गये।
रथ अपने गंतव्य की ओर जा रहा था। इस लम्बे मार्ग में विश्राम का कोई अवकाश नहीं था। मनोरंजन के लिए ऋतुपर्ण बाहुक से बातचीत करते जा रहे थे। वे बोले- "बाहुक! संसार में जितने भी मनुष्य हैं उन सबों के भीतर कोई-न-कोई विद्या या कोई-न-कोई कला अवश्य छिपी हुई होती है। हमारा ज्ञान उन कलाओं का उद्घाटन करने में सहायक होता है। यह विद्या मनुष्य की सुरुचि, संस्कार और उचित वातावरण पाकर और भी निखर उठती है। ईश्वर ने मुझे गणित का ज्ञान और द्यूत-क्रीड़ा की कला का कौशल दिया है। देखो! सामने जो विशाल वृक्ष दीख रहा है मैं उसे देखकर क्षणमात्र में गिनकर बता सकता हूँ कि उसमें कितने हजार, लाख या करोड़ पत्ते हैं, कितने फूल और फल हैं। तुम्हारे संसर्ग से मैं अश्वविद्या और रथ-संचालन की विद्या सीखना चाहता हूँ और इसके बदले में मैं द्यूत-क्रीड़ा के रहस्य और गणित का ज्ञान तुम्हें देना चाहता हूँ। संभव है, यह ज्ञान तुम्हारे जीवन में कभी उपयोगी सिद्ध हो।"
सुबाहु ने इसके उत्तर में ऋतुपर्ण की ओर आदरसूचक दृष्टि से देखा और सिर हिलाकर सहर्ष अपनी स्वीकृति दी।
संध्या होते-होते राजा ऋतुपर्ण का रथ कुण्डिनपुर पहुँच गया। दूर से ही रथ का घर्घर नाद और घोड़ों की टाप सर्वत्र फैल गई। यह स्वर राजमहल में बैठी दमयंती के कानों में भी पड़ा। बहुत दिनों के बाद उसके कानों से यह परिचित स्वर टकरा रहा था। मोरों को लगा संभवतः यह मेघों की गर्जना है और उनके पंख धीरे-धीरे खुलने लगे। मोरों की क्रंकार ध्वनि से सारा वातावरण गूंज उठा। दमयंती का हृदय उमड़ रहा था। क्या इसी रथ में महाराज नल हैं? क्या यह उन्हीं के हाथों का कौशल है? क्योंकि रथचक्र का यह नाद मेरे शरीर और मन में, मेरे रक्त और मेरी धमनियों में किसी संगीत की तरह बज उठा है। हो-न-हो यह मेरे प्रियतम नल ही हैं। यह सोचकर दमयंती का मन और भी उद्वेलित हो गया।
बाहुक के प्रति आदर और कृतज्ञता का भाव राजा के मुख पर स्पष्ट झलक रहा था। वहाँ पहुँचकर ऋतुपर्ण को घोर आश्चर्य हुआ। वहाँ स्वयंवर की तैयारी का न कोई चिह्न था, न उत्साह। सब कुछ सामान्य था। सूचना मिलते ही राजा भीम ने वहाँ आकर उनकी अभ्यर्थना की। महाराज भीम ने पूछा-
"कुशल तो है, आपके पधारने का विशेष प्रयोजन?"
ऋतुपर्ण ने संकुचित होकर उत्तर दिया "नहीं, नहीं, मैं आपसे मिलने और सम्भाषण के लिए आ गया।"
महाराज भीम इस उत्तर से संतुष्ट तो नहीं हुए, पर उन्होंने आदरपूर्वक स्वागत, सत्कार और विश्राम की व्यवस्था की।
इधर दमयंती का शोक बढ़ता जा रहा था। रथ का वह घर्घर नाद अभी भी उसके हृदय में हलचल मचा रहा था। रथ से जो लोग उतरे, उनमें नल नहीं थे, पर यह गंभीर घोष? क्या वाष्र्णेय ने भी महाराज से यह विद्या सीख ली थी या ऐसा तो नहीं राजा ऋतुपर्ण भी नल की ही तरह अश्वविद्या में निपुण हैं?
दययन्ती ने अपनी मुख्य सेविका केशिनी को विशेष रूप से वहाँ भेजा, जहाँ ऋतुपर्ण के सेवक ठहरे थे। दमयंती ने कहा-
"यह पता लगाओ कि वह छोटी बाँहोंवाला कृष्णवर्ण का कुरूप सारथि कौन है? कहीं वे स्वयं नल तो नहीं हैं?"
केशिनी ने वहाँ जाकर बाहुक से जानना चाहा कि वे कब और कैसे और क्यों चले हैं?
बाहुक ने कहा- "यह ज्ञात होने पर कि कल दमयंती का द्वितीय स्वयंवर होनेवाला है - राजा पवन गति से चलने वाले घोड़ों से जुते रथ पर सवार होकर एक दिन में ही सौ योजन की दूरी तय कर आ गए। उसका सारथि मैं ही था और हमारे एक सहयोगी सारथि वाष्र्णेय हैं जो पहले राजा नल के सारथि थे और वे अब ऋतुपर्ण की सेवा में हैं।"
केशिनी ने बाहुक को प्रेरित करते हुए कहा- "आपने दमयंती की दीन दशा के संबंध में अयोध्या गए ब्राह्मण से कुछ प्रिय बाते कही थीं। आज विदर्भकुमारी उन्हीं बातों को आपके मुख से पुनः सुनना चाहती है।"
इसके उत्तर में बाहुक ने कहना प्रारंभ किया, पर बोलते समय उनकी वाणी थरथरा रही थी
"हाँ, मैंने कहा था कि उत्तमकुल की स्त्रियाँ महान संकट में भी धैर्य नहीं खोती हैं। वे अपने पतियों से परित्यक्त होकर भी क्रोध नहीं करतीं। क्योंकि वह पुरुष दीन-हीन, भूखा-प्यासा था। बुद्धिहीन और किंकर्तव्यविमूढ़ था। उसका अधोवस्त्र जब पक्षी ले उड़े तो लज्जा निवारण के लिए उसने पत्नी के वस्त्र फाड़े। दुख के अथाह सागर में डूबा हुआ वह व्यक्ति क्षमा चाहता है केवल क्षमा, केवल क्षमा।" यह कहते-कहते नल का धैर्य चुक गया और वह करुणक्रंदन करने लगा।
केशिनी ने जब बाहुक को रुदन करते देखा तो वह घबराई हुई दशा में दमयन्ती के पास पहुँची और सारी कथा कह सुनाई। अब दमयंती को दृढ़ प्रतीति हो गई थी कि यह बाहुक और कोई नहीं उसके पति राजा नल ही हैं। पर, उसका विकृत रूप, श्यामल रंग और अज्ञात वास की स्थिति में रहने का प्रयत्न ये सब प्रश्नवाचक चिह्न बनकर खड़े थे।
23.
दमयंती अपने मन के उतार-चढ़ाव और द्वन्द्व से कुछ भी निर्णय लेने में असमर्थ थी। उसने अपने माता-पिता से बात की, कैसे होगा समाधान? कब सुलझेंगे ये विकट प्रश्न? कैसे निश्चित हो कि यही बाहुक उसके कामदेव सरीखे स्वरूपवान महाराज नल ही हैं? अगर वे नल ही हैं तो उनके स्वरूप की विकृति का रहस्य क्या है? इन विगत तीन-चार वर्षों के जीवन में सब प्रकार के दुख किसी पर्वत-खंड की तरह अचानक टूटकर उन दोनों पर आ गिरे थे। उसने इन सभी प्रश्नों का समाधान पाने के लिए एक अंतिम प्रयत्न करना चाहा। उसने अपनी माता से निवेदन किया
"मातः! मैंने अनेक प्रकार से ऋतुपर्ण के बाहुक नामक सारथि की परीक्षा की, अनेक लक्षणों और मनोभावों से परखने की चेष्टा की, केशिनी को मैंने कई बार सत्य की परख करने के लिए बाहुक के पास भेजा पर सारे प्रयत्न और प्रश्न एक ही बिन्दु पर पहुँचकर अनुत्तरित रह जाते हैं, वह है, उसका स्वरूप ! इतना अन्तर? इतना विलोम ? भला कैसे संभव है? इसलिए मैं चाहती हूँ मैं स्वयं बाहुक के पास जाऊँ या आपलोग आदेश दें तो उसे महल में आमंत्रित कर स्वयं समझने का प्रयत्न करूँ? आप इस संबंध में अपनी सम्मति दें।"
राजा भीम और उनकी पत्नी दोनों ने एकमत से बाहुक को महल में बुला भेजा। बाहुक को उस कक्ष में ले जाया गया जो दमयन्ती का कक्ष था। अचानक दमयंती को अपने सामने देखकर बाहुक बिल्कुल जड़ हो गया, उसकी आँखें खुली की खुली थीं, उसकी पत्नी, उसकी प्रियतमा उसके सामने खड़ी थी और यह स्वप्न नहीं, सत्य था। प्रायः तीन चार वर्षों के बाद वह दमयंती को देख रहा था। अर्धवस्त्र से अपने तन को ढँके हुए, उदास दमयंती मलिनता के बाद भी अपने सतीत्व के तेज से जगमगा रही थी। जैसे पर्वतों के शिलाखंड हिमस्नात होकर उज्ज्वल तो हो जाते हैं, पर उनका वास्तविक स्वरूप ढंक जाता है, वैसे ही दमयंती का शरीर सामने खड़ा था। उस कक्ष में दमयंती का स्वर फूटा -
"मुझे छोड़कर क्यों चले गए? बोलिए, बोलिए! मुझे छोड़कर आप क्यों चले गए?"
जैसे पर्वतों को फोड़कर ज्वालामुखी का लावा बह निकलता है, वैसे ही वर्षों की दबी हुई अग्नि बाहर आ गई। दमयंती की आँखों से आँसुओं की बाढ़ प्रवाहित हो रही थी। उसके मुख से शब्द विशृंखलित अवस्था में निकल रहे थे।
"मैं भूखी थी, पर भोजन के लिए कुछ नहीं था। मैं प्यास से तड़प रही थी पर वहाँ जल नहीं था। जब मेरी आँखें खुलीं, मेरे शरीर पर आधे फटे हुए वस्त्र लिपटे थे। भीषण भय उत्पन्न करने वाला वह भयानक वन था, चारों ओर हिंसक पशु थे और उनके बीच में मैं एक अबला अकेली नारी थी। उसे इस तरह छोड़कर जाने का विचार ही आपके मन में कैसे आया, आप अपने वचन से मुकर गए, आपको हर हाल में मेरी रक्षा करनी थी। कहाँ गए वे सारे वेदमंत्र? कहा गए वे वचन? कहाँ गईं वे सात प्रतिज्ञाएँ? " दमयंती आर्त्तनाद कर उठी।
नल की आँखों से भी अश्रुधार बह रही थी। "हाँ मैं जानता हूँ। मैं अपराधी हूँ। उस समय मैं बुद्धिहीन और विवेकशून्य हो गया था। क्या करना उचित और कल्याणकारी होगा, इसकी निर्णय-शक्ति बिल्कुल समाप्त हो गई थी। मैं जानता हूँ कि इतने दुख झेलने के बाद भी तुम मुझे क्षमा कर दोगी, पर संभव है इतिहास हमें क्षमा नहीं करे। जो पौरुष स्त्री की रक्षा नहीं कर सके वह सचमुच धिक्कार योग्य है।"
"पर आर्य! हम दोनों ने तो प्रेम किया था। हमने स्थान और काल की दूरी मिटा दी थी। हम दोनों को प्रकृति ने एक दूसरे से जोड़ा था। दिव्य हंसों ने हमारे मन को एक कर दिया था। हम उस प्रेम की भाषा को कैसे भूल गए। मैं अभी भी समझ नहीं पा रही हूँ कि प्रेम शब्द क्या पुरुषों की वाणी का आभूषण है, क्या उसका उपयोग पुरुष तभी करता है जब वह स्त्री के मोहक सौंदर्य में आबद्ध हो जाता है? क्या आपका प्रेम मोहक शब्दावलियों का जालमात्र था, जो समय के थपेड़े से छिन्न-भिन्न हो गया?"
"ठहरो दमयंती! मुझे भी कुछ कह लेने दो। मैं इस बात का उदाहरण हूँ कि विचारवान व्यक्ति भी देखते-देखते अविचारी हो जाता है। लोग कहेंगे यह कलियुग का दोष और प्रभाव था, एक बुरा काल खंड था, पर मैं नल तुम्हारा प्राणोपम पति यह स्वीकार करता हूँ कि यह मेरी बुद्धिहीनता थी। मेरे भीतर के बैठे हुए पशु ने मेरा विवेक हर लिया था। कर्कोटक नाग की रक्षा मैंने दावानल में की, उसने मुझे मेरे कल्याण के लिए इस तरह हँसा कि मेरा स्वरूप विकृत हो गया। मैं असाधारण से साधारण हो गया। यह सत्य कहा गया है कि विष ही विष की औषधि है। उस नाग के विष ने मेरे भीतर कलियुग के रूप में बैठे हुए कुविचार और स्वार्थ को जला डाला। तुमने मुझे इस वेष में भी पहचान लिया, यही सबसे बड़ी बात है?"
"हाँ! आप तक पहुँचने के लिए मैंने अनेक यत्न किए। अनेक ब्राह्मण देवता, अनेक ग्रामों, नगरों और देशों में आपको ढूँढते हुए भटकते रहे, आपके स्वरूप और आपकी वाणी में परिवर्तन हो गया था, पर मेरा हृदय बार-बार यही कहता था कि आप बाहुक नहीं, नल हैं। मैं जानती हूँ कि आपके मन में दमयंती के पुनः स्वयंवर के समाचार से पीड़ा भी अवश्य पहुँची होगी, मुझ पर अविश्वास भी हुआ होगा, मुझ पर ही नहीं, समस्त स्त्री जाति के चंचल स्वभाव पर आपके मन ने टिप्पणी की होगी, मगर यह सारा प्रयत्न, यह सारी योजना केवल आपको यहाँ तक खींच लाने की थी और अन्ततः आप मुझे मिल ही गए।"
नल दमयन्ती के सामने सिर झुकाए खड़े थे। उन्होंने कर्कोटक नाग के द्वारा दिये गए दिव्य वस्त्रों को धारण किया। उसे पहनते ही महाराज नल का दिव्य गौर वर्ण वाला कांतिमान शरीर उद्भासित हो उठा। वह कायाकल्प अपूर्व और अद्भुत था। दमयंती किसी कटे हुए वृक्ष की तरह उनके वक्ष से जा लगी। दोनों के बहते हुए अश्रुओं ने सारे प्रश्नोत्तरों को जैसे बहा दिया था। अब उनकी जगह बच गया था, केवल प्रेम आग में तपे हुए कुंदन की तरह खरा और दिव्य प्रेम।"
25.
राजा नल बहुत देर तक दमयंती को अपनी बाँहों में लिए खड़े रहे। दोनों की आँखों से बहते अश्रु थमने और रुकने का जैसे नाम नहीं ले रहे थे। तीन वर्षों से अधिक का वह दुखदायी समय अब बीत गया था। थोड़ी देर के बाद दोनों का चित्त कुछ शांत हुआ तब दमयंती की माता उनके दोनों बच्चों को लेकर वहाँ आ पहुँची। नल ने अपने बच्चों को गले से लगाया। स्नेह चुम्बनों की झड़ी लगा दी। वर्षों का उनका अतृप्त मन आज सब कुछ पाकर भी तृप्त नहीं हो पा रहा था। राजमाता ने अपनी पुत्री दमयंती से कहा-
"पुत्री! आज तुम्हारे जीवन के सभी दुखों का अन्त हो गया है। तुम्हें पति-दर्शन और पति की प्राप्ति का सुख मिल रहा है। अब तुम सौभाग्य सूचक सुन्दर राजसी वस्त्र और अलंकरण धारण करो। महाराज नल भी कुछ दिन यहीं विदर्भ देश में विश्राम करेंगे।"
राजमाता ने महाराज भीम को यह सुसंवाद सुनाया। महाराज भीम इतने उत्फुल्ल हो गए कि वे बार-बार ईश्वर को धन्यवाद देने लगे। उन्होंने आदेश दिया कि सम्पूर्ण कुण्डिनपुर को सुन्दर रीति से सजाया जाए। अपनी प्रिय पुत्री और जामाता नल के मिलन का यह देश साक्षी बने। राजमार्ग पर सुगन्धित छिड़काव किया जाए, आम्र पल्लवों और रंग-बिरंगे फूलों का वंदनवार बाँधा जाए। हर चौक-चौराहे पर तोरण द्वार सजाए जाएँ, मंगल-कलश रखे जाएँ। दरिद्र और दुखी व्यक्तियों के लिए अन्न का वितरण हो। सब ओर दीपमालिका सजाई जाए।"
ऐसा ही हुआ। विदर्भ देश और उसकी राजधानी कुण्डिनपुर में कई दिनों तक यह आनंदोत्सव चलता रहा और प्रजा नल-दमयंती की प्रेम-कथा को कह-सुनकर एक अपूर्व तृप्ति का अनुभव करती रही।
आनंदोत्सव के पूर्ण होने पर अयोध्या नरेश राजा ऋतुपर्ण ने अपने देश लौटने की आज्ञा माँगी। महाराज भीम कृतज्ञतापूर्वक हाथ जोड़कर खड़े हो गए और बोले
-"महाराज ऋतुपर्ण! आपके ही कारण हमारे परिवार में वर्षों बाद सुख के दिन लौटे हैं। इस प्रेम-यज्ञ के पुरोधा आप ही हैं। आप न आते तो हमारी पुत्री दमयंती अपने पति नल से कैसे मिलती ? हम हार्दिक शुभकामनाओं और आशीर्वादों के साथ आपको विदा कर रहे हैं। इस सुख की घड़ी में सारथि वाष्र्णोय अपने स्वामी राजा नल से अब दूर रहना नहीं चाहता, इसलिए आपके रथ के संचालन के लिए मैं एक अन्य कुशल सारथि की व्यवस्था कर उसे आपके साथ भेज रहा हूँ।"
इसी बीच महाराज नल का भी पदार्पण वहाँ हुआ। ऋतुपर्ण ने आगे बढ़कर नल का सम्मान करते हुए उन्हें गले लगा लिया
"आप इतने दिनों तक मेरे सारथि रहे और मैं आपको पहचान नहीं सका। स्वामी, सेवक या सखा-हमारे किसी भी रूप में यदि हमसे कोई भूल हुई हो तो कृपया आप उसे क्षमा कर देगें।"
"एक सेवक से भी तो सेवा के क्रम में भूलों का होना संभव है, अतः आप भी मेरे प्रति क्षमाशील रहेंगे।"
-"महाराज नल ! अब हम दोनों सखा हैं और इसकी पुष्टि के लिए हम दोनों ने अपनी-अपनी विशेष विद्या एक दूसरे को सिखा दी है। आपसे मैंने रथ-संचालन की कला और अश्व-विद्या सीखी और मैंने आपको द्यूत-क्रीड़ा के रहस्य समझाए। यह द्यूत-क्रीड़ा अंत में कठोर परिणाम देकर हमें सावधान रहना सिखाती है।"
सबसे मिलने के बाद राजा ऋतुपर्ण अपनी राजधानी लौट चले। इस यात्रा में उन्हें आत्मिक संतोष का अनुभव हो रहा था।
26.
विदर्भ देश में राजा नल और दमयंती के विश्राम और सुख के दिनों को पंख लग गए थे। देखते-देखते संतोष और तृप्ति से भरे वे दिन बीते और राजा नल अपने पूरे परिवार के साथ अपने निषध देश की ओर चल पड़े। महाराज भीम ने अपनी पुत्री को विदा करते हुए प्रचुर धन प्रदान किया। नल के साथ हाथी और घोड़ों की एक छोटी सैन्य टुकड़ी भी सुरक्षा के लिए चल रही थी। निषध देश की सीमा पर नल के पहुँचते ही उनके आगमन की सूचना चारों ओर फैल गयी। पिछले तीन वर्षों में प्रजा पुष्कर के कुशासन से संत्रस्त थी। सर्वत्र अत्याचार और दमन के कारण प्रजा में रोष, विरोध और विद्रोह की भावना भड़क रही थी। राजा नल के आने की सूचना से संपूर्ण देश में उत्साह की लहर फैल गई। वहाँ से नल सीधे निषध के राजमहल में पहुँचे। इस बार उनका विरोध करने का किसी में साहस नहीं था। नल पुरुषसिंह की तरह चल रहे थे। उनके रोम-रोम में वीरता का वेग तरंगित हो रहा था। पुष्कर ने उनका सत्कार कर आसन प्रदान किया। राजा नल बोले -
"महाराज पुष्कर! अब हम पुनः प्रचुर धन-सम्पत्ति के स्वामी हो गए हैं। अतः इस बार हम आपको द्यूत-क्रीड़ा के लिए आमंत्रित करते हैं।"
पुष्कर ने व्यंग्यात्मक मुद्रा में अट्टहास करते हुए कहा-
"तो आप इतने दिनों में अर्जित की गई अपनी समस्त संपत्ति को फिर हमें भेंट में देने आए हैं। हम अवश्य 'द्यूत-क्रीड़ा' का आनंद लेंगे।" इसके बाद ही राज्य के विशिष्टजनों ने इस द्यूत-क्रीड़ा को देखने के लिए अपना-अपना स्थान ग्रहण कर लिया। सब के मन में उत्साह चरम पर था। इस बार क्या होगा? क्या महाराज नल पुनः पराजित होकर वन जायेंगे या उनके भाग्य का लेख बदलेगा?"
क्रीड़ा प्रारंभ हो गई। हर बाजी महाराज नल के पक्ष में जा रही थी। पहले धन-संपत्ति मिली, फिर बाहर के जीते हुए राज्य वापस मिल गए। अन्तिम बाजी में भी राजा नल की ही विजय हुई। निषध देश उनकी मुठ्ठी में आ गया था। पांसों के खेल में वे विजयी हुए थे। राजा ऋतुपर्ण की सिखाई हुई विद्या उनके समक्ष थी। मन-ही-मन उन्होंने ऋतुपर्ण के प्रति कृतज्ञता का भाव व्यक्त किया। अब पाँसा पलट गया था, वे जाकर राज्यसिंहासन पर आसीन हुए और उनके सामने उनका कनिष्ठ भ्राता पुष्कर चेष्टाहीन दशा में हाथ जोड़े उनके सामने खड़ा था। महाराज नल के मन में प्रतिशोध की भावना उग्र हो गई थी। पुष्कर के लिए इस पराजय का अर्थ था अपने परिवार सहित एक वस्त्र होकर, देश छोड़कर सुदूर वन में कहीं चले जाना और निर्वासन अथवा मृत्युदंड भोगना। अभी वे अपना कठोर निर्णय सुनाने के लिए सन्नद्ध हो रहे थे कि सामने अन्तःपुर से महारानी दमयंती ने उनसे अविलंब मिलने की इच्छा प्रकट की। महाराज नल अन्तःपुर में पहुँचे। बारीक पर्दे की ओट से दमयंती यह सारा दृश्य देख रही थी। महाराज नल ने उत्साहित स्वर में कहा-
"दमयंती ! पाँसे पलटने के साथ-साथ अब हमारा भाग्य भी पलट गया है। जिस पुष्कर ने कभी देश निकाले का दण्ड दिया था वह भीत और अपराधी मुद्रा में हमारे सामने भिक्षुक बनकर खड़ा है। उसके कारण हमने और तुमने अनगिनत दुख झेले हैं। मृत्यु तुल्य यंत्रणा पाई है, अपमान और तिरस्कार का सामना किया है। आज उस अन्यायी और प्रपंची पुष्कर के भाग्य के निर्णय का दिन है। मैं उसे ऐसा दण्ड दूंगा, जिसे वह तो क्या समय भी उसे नहीं भुला पायेगा।"
महारानी दमयंती ने हस्तक्षेप करते हुए कहा- "नहीं, नहीं महाराज ! आप ऐसा कुछ नहीं करेंगे। आप महान् हैं और महान् व्यक्ति नीचों का अनुकरण नहीं करते। हिंसा का उत्तर सदैव हिंसा नहीं है। दण्ड देने में समर्थ व्यक्ति की क्षमा सबसे मूल्यवान होती है। आप उसकी दुष्टता और कुचक्र को भूल जाएँ। उसे क्षमा कर दें। यही नहीं वह जिस छोटे राज्य की शासन व्यवस्था संभालते थे, वह भी उन्हें दे दें। हम नहीं चाहते कि उनके अपराधों के कारण उनके साथ उनका परिवार भी दुख झेले।"
दमयंती की बातों से महाराज नल को अपनी पत्नी के लिए गर्व और सम्मान का अनुभव हुआ। कृतघ्नता का उत्तर उपकार से देने का यह निर्णय दमयंती जैसी दिव्य स्त्री-शक्ति के वश की ही बात थी। वे उन्होंने पुष्कर को सम्बोधित कर कहा-
"हमने और महारानी दमयंती ने मिलकर यह निर्णय लिया है कि तुम्हारे सारे अपराध क्षमा किये जाएँ और तुम्हारा पुराना राज्य सम्मानपूर्वक तुम्हें लौटा दिया जाए।"
इस अभूतपूर्व निर्णय को सुनते ही एक क्षण में सभा में सन्नाटा छा गया और उसके तुरंत बाद भारी कोलाहल मच गया। पुष्कर बिलखता हुआ महाराज के चरणों में गिर पड़ा था और संपूर्ण सभा में महाराज नल की जय और महारानी दमयंती की जय का उद्घोष किसी प्रणव मंत्र की तरह गूंज रहा था।
महाराज नल ने दमयंती की ओर प्रीतिस्निग्ध दृष्टि से देखा, उस दृष्टि में गर्व, सम्मान, स्त्री-शक्ति के प्रति विनम्र आदर-भाव और अश्रु सजल प्रीति के अपूर्व रसायन का मिश्रण हो गया था।
27.
दमयंती की कथा सुनाते-सुनाते पंडित रघुवंश तिवारी अंत में थोड़ी देर मौन बैठे रह गए। कथा समाप्त हो गई थी पर हृदय में उठा भावना का ज्वार थम नहीं रहा था। सामने बैठा हुआ महिलाओं और पुरुषों का वर्ग भी कथा की पूर्णाहुति तक पहुँचते-पहुँचते स्तब्ध और भाव-विह्वल हो गया था। पंडितजी ने धीरे-धीरे फिर कहना आरंभ किया
"मेरे प्रिय ग्रामवासियो ! नल-दमयंती की यह कहानी तो हजारों साल से कही-सुनी जाती रही है पर वास्तव में यह कथा स्त्री जाति की कथा है, अथाह दुख और अपार कष्टों को सहकर भी अपने धीरज और धर्म पर स्थिर रहने वाली एक आदर्श भारतीय नारी की कथा है।
पुरुष तो आरंभ से ही उच्छृंखल और स्वच्छंद मनोवृत्ति का रहा है। उसके शरीर में शक्ति होती है, स्फूर्त्ति होती है, मन में उत्साह हिलोरें मारता रहता है। वह हर कर्म को एक चुनौती समझता है, पर स्त्री तो समर्पण, प्रेम और त्याग की मूर्ति है। वह पृथ्वी की तरह सर्वसहा है, वह सबकुछ सहती है, पर अपने आदर्श से कभी विचलित नहीं होती। आपने देखा महाराज नल की पत्नी महारानी दमयंती अपने पति के जुआ के व्यसन को लाख प्रयत्न करके भी छुड़ा नहीं सकी, नल ने अपने पुरुषोचित गर्व से उसकी बातों का तिरस्कार कर दिया और अपने भाई पुष्कर के साथ जुआ खेलने बैठ गए। ऐसा इसलिए भी हुआ कि प्राचीन काल में अगर एक राजा दूसरे राजा को जुआ के लिए आमंत्रित करता था तो वह चुनौती स्वीकार करनी ही पड़ती थी, वह आमंत्रण भी एक ललकार की तरह होता था, जिसका उत्तर देना आवश्यक होता था। जुए में सब कुछ गँवाकर नल अपनी पत्नी दमयंती के साथ वन की ओर चल पड़े। भूख, प्यास और बुद्धिहीनता ने उन्हें कहीं का नहीं रखा। अश्वमेध यज्ञ करनेवाला और अनेक देशों की जीतनेवाला वह सम्राट् भूख-प्यास की चिन्ता और अपनी प्रिय पत्नी के दुख की कल्पना से इतना भयभीत, इतना पीड़ित हो गया कि दमयंती को वन में अकेला सोती हुई अवस्था में छोड़कर चला गया। पुरुष की यह निष्ठुरता हमें सोचने पर बाध्य करती है। लेकिन दमयंती हार नहीं मानती। दुख, क्लेश में विलाप और आर्त्तनाद करती हुई, अनेक संकटों को झेलकर वह प्राण-रक्षा करती हुई वन के बाहर निकलती है और जब चेदिनगर देश की राजमाता उसकी पीड़ा और दुर्दशा देखकर उसे शरण देती हैं तो भी वह अपने पति का नाम नहीं लेती पर अपने पिता महाराज भीम के द्वारा खोज खबर लेने वाले एक ब्राह्मण से मिलकर उसके मन की दबी हुई पीड़ा बाहर आ जाती है। फिर धीरे-धीरे उसके सुख के दिन वापस लौटते हैं। अपने पिता-माता के पास पहुँचकर भी वह दसों दिशाओं में महाराज नल को ढूँढ़ने का प्रयत्न करती है और अंत में एक अद्भुत स्थिति में वह अपने पति को पा लेती है। यह कथा स्त्री के सम्मान की कथा है, उसकी बात सुनो, उसे मान दो और आप सब सावधान रहें कि कोई बुरा समय, कोई कलियुग आपको बुद्धिहीन न बना दे। बुद्धि ही आपका सबसे बड़ा पुरुषार्थ है और प्रेम एक दूसरे का सम्मान करना ही तो सिखाता है।"
पंडित रघुवंश तिवारी ने इतना कहकर नल-दमयंती की पौराणिक कथा को विराम दिया। और फिर कहा "नल दमयंती की यह कथा विशुद्ध प्रेम की कथा है, यह प्रेम सहज नहीं होता। जीवन की समस्याओं, पीड़ाओं और विरुद्ध परिस्थितियों में इसकी परीक्षा होती है। समय हमारा सबसे बड़ा परीक्षक होता है और उसके आदेश से हमें जीवन के सभी प्रश्नों को हल करना पड़ता है। प्रेम हमसे उचित कर्त्तव्य की माँग करता है, अगर हमारा मन शुद्ध रहे, हमारे कर्म पवित्र हों तो सारे दुख दूर हो सकते हैं और अंत में जैसे नल-दमयंती का मिलन हो गया वैसे ही हमारा दुख भी दूर हो सकता है और इच्छित फल की प्राप्ति हो सकती है।"
कथा-समाप्ति के बाद ठाकुरबाड़ी में भगवान की आरती हुई और सबके बीच प्रसाद-वितरण हुआ। सपरिवार ठाकुरबाड़ी से लौटते हुए नंदूबाबू समय की क्रूरता और सुख-दुख के परिवर्तन के बारे में ही बहुत देर तक सोचते रहे।
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