नल दमयंती की कथा।
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भाग - 0 भूमिका
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अर्जुन जब अस्त्र प्राप्त करने के लिये इन्द्रलोक चले गये, तब पाण्डव काम्यक वन में निवास कर रहे थे। वे राज्य के नाश और अर्जुन के वियोग से बड़े ही दुःखी हो रहे थे।
एक दिन की बात है, पाण्डव और द्रौपदी इसी सम्बन्ध में कुछ चर्चा कर रहे थे। धर्मराज युधिष्ठिर भीमसेन को समझा ही रहे थे कि महर्षि बृहदश्व उनके आश्रम में आते हुए दीख पड़े।
महर्षि बृहदश्व को आते देखकर धर्मराज युधिष्ठिर ने आगे जाकर शास्त्र विधि के अनुसार उनकी पूजा की, आसन पर बैठाया। उनके विश्राम कर लेने पर युधिष्ठिर उनसे अपना वृत्तान्त कहने लगे।
उन्होंने कहा कि ‘ महाराज !
कौरवो ने कपट – बुद्धि से मुझे बुलाकर छल के साथ जूआ खेला और मुझ अनजान को हराकर मेरा सर्वस्व छीन लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने मेरी प्राणप्रिया द्रौपदी को घसीट कर भरी सभा में अपमानित किया।
उन्होंने अन्त में हमें काला मृगछाला ओढ़ाकर घोर वन में भेज दिया। महर्षे !
आप ही बतलाइये कि इस पृथ्वी पर मुझ – सा भाग्यहीन राजा और कौन है !
क्या आपने मेरे – जैसा दुःखी और कहीं देखा या सुना है ? ‘
महर्षि बृहदश्व ने कहा – धर्मराज !
आपका यह कहना ठीक नहीं है कि मुझ – सा दुःखी राजा और कोई नहीं हुआ ; क्योंकि मैं तुमसे भी अधिक दुःखी और मन्दभाग्य राजा का वृत्तान्त जानता तुम्हारी इच्छा हो तो मैं सुनाऊँ।
धर्मराज युधिष्ठिर के आग्रह करने पर महर्षि ने कहना प्रारंभ किया।
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भाग - 1 दमयंती का स्वयंवर
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निषध देश में वीरसेन के पुत्र नल नाम के एक राजा हो चुके हैं। वे बड़े गुणवान्, परम सुन्दर, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, सबके प्रिय, वेदज्ञ एवं ब्राह्मणभक्त थे।
उनकी सेना बहुत बड़ी थी। वे स्वयं अस्त्रविद्या में बहुत निपुण थे। वे वीर, योद्धा, उदार और प्रबल पराक्रमी भी थे। उन्हें जूआ खेलने का भी कुछ – कुछ शौक था। उन्हीं दिनों विदर्भ देश में भीम नाम के एक राजा राज्य करते थे। वे भी नल के समान ही सर्वगुण सम्पन्न और पराक्रमी थे।
उन्होंने दमन ऋषि को प्रसन्न करके उनके वरदान से चार संतानें प्राप्त की थीं — तीन पुत्र और एक कन्या।
पुत्रों के नाम थे – दम, दान्त और दमन।
पुत्री का नाम था – दमयन्ती।
दमयन्ती लक्ष्मी के समान रूपवती थी। उसके नेत्र विशाल थे। देवताओं और यक्षों में भी वैसी सुन्दरी कन्या कहीं देखने में नहीं आती थी।
उन दिनों कितने ही लोग विदर्भ से निषध देश में आते और राजा नल के सामने दमयन्ती के रूप और गुण का बखान करते। निषध देश से विदर्भ में जाने वाले भी दमयन्ती के सामने राजा नल के रूप, गुण और पवित्र चरित्र का वर्णन करते। इससे दोनों के हृदय में पारस्परिक अनुराग अङ्करित हो गया।
एक दिन राजा नल ने अपने महल के उद्यान में कुछ हंसों को देखा। उन्होंने एक हंस को पकड़ लिया।
हंसने कहा- ‘ -‘आप मुझे छोड़ दीजिये तो हम लोग दमयन्ती के पास जाकर आपके गुणों का ऐसा वर्णन करेंगे कि वह आपको अवश्य – अवश्य वर लेंगी।
‘नल ने हंस को छोड़ दिया। वे सब उड़कर विदर्भ देश में गये।
दमयन्ती अपने पास हंसों को देखकर बहुत प्रसन्न हुई और हंसों को पकड़ने के लिये उनकी ओर दौड़ने लगी। दमयन्ती जिस हंस को पकड़ने के लिये दौड़ती, वही बोल उठता कि ‘अरी दमयन्ती !
निषध देश में एक नल नाम का राजा है। वह अश्विनीकुमार के समान सुन्दर है। मनुष्यों में उसके समान सुन्दर और कोई नहीं है। वह मानो मूर्तिमान् कामदेव हैं। यदि तुम उसकी पत्नी हो जाओ तो तुम्हारा जन्म और रूप दोनों सफल हो जायँ।
हमलोगों ने देवता, गन्धर्व, मनुष्य, सर्प और राक्षसों को घूम – घूमकर देखा है। नल के समान सुन्दर पुरुष कहीं देखने में नहीं आया। जैसे तुम स्त्रियों में रत्न हो, वैसे ही नल पुरुषों में भूषण हैं।
तुम दोनों की जोड़ी बहुत ही सुन्दर होगी।‘
दमयन्ती ने कहा - ‘हंस तुम नल से भी ऐसी ही बात कहना।‘ हंसने निषध देश में लौटकर नल से दमयन्ती का संदेश कह दिया। दमयन्ती हंस के मुँह से राजा नल की कीर्ति सुनकर उनसे प्रेम करने लगी।
उसकी आसक्ति इतनी बढ़ गई कि वह रात – दिन उनका ही ध्यान करती रहती। शरीर धूमिल और दुबला हो गया। वह दीन – सी दिखने लगी।
सखियों ने दमयन्ती के हृदय का भाव ताड़कर विदर्भराज से निवेदन किया कि ‘आपकी पुत्री अस्वस्थ हो गई है।‘
राजा भीम ने अपनी पुत्री के सम्बन्ध में बड़ा विचार किया। अन्त में वह इस निर्णय पर पहुँचा कि मेरी पुत्री विवाह योग्य हो गई है, इसलिये इसका स्वयंवर कर देना चाहिये।
उन्होंने सब राजाओं को स्वयंवर का निमन्त्रण – पत्र भेज दिया और सूचित कर दिया कि राजाओं को दमयन्ती के स्वयंवर में पधारकर लाभ उठाना चाहिये और मेरा मनोरथ पूर्ण करना चाहिये।
देश – देश के नरपति हाथी, घोड़े और रथों की ध्वनि से पृथ्वी को मुखरित करते हुए सज – धजकर विदर्भ देश में पहुँचने लगे।
भीम ने सबके स्वागत – सत्कार की समुचित व्यवस्था की। देवर्षि नारद और पर्वत के द्वारा देवताओं को भी दमयन्ती के स्वयंवर का समाचार मिल गया।
इन्द्र आदि सभी लोकपाल भी अपनी मण्डली और वाहनों सहित विदर्भ देश के लिये रवाना हुए। राजा नल का चित्त पहले से ही दमयन्ती पर आसक्त हो चुका था। उन्होंने भी दमयन्ती के स्वयंवर में सम्मिलित होने के लिये विदर्भ की यात्रा की।
देवताओं ने स्वर्ग से उतरते समय देख लिया कि कामदेव के समान सुन्दर नल दमयन्ती के स्वयंवर के लिये जा रहे हैं। नल की सूर्य के समान कान्ति और लोकोत्तर रूप – सम्पत्ति से देवता भी चकित हो गये।
उन्होंने पहचान लिया कि ये नल हैं। उन्होंने अपने विमानों को आकाश में खड़ा कर दिया और नीचे उतरकर नल से कहा – ‘
राजेन्द्र नल !
आप बड़े सत्यव्रती हैं। आप हम लोगों की सहायता करने के लिये दूत बन जाइये। ‘नल ने प्रतिज्ञा कर ली और कहा कि ‘करूँगा।
फिर पूछा कि ‘आप लोग कौन हैं और मुझे दूत बनाकर कौन – सा काम लेना चाहते हैं ?‘
इन्द्र ने कहा – ‘हम लोग देवता हैं। मैं इन्द्र हूँ और ये अग्नि, वरुण और यम हैं। हम लोग दमयन्ती के लिये यहाँ आये हैं। आप हमारे दूत बनकर दमयन्ती के पास जाइये और कहिये कि इन्द्र, वरुण, अग्नि और यम देवता तुम्हारे पास आकर तुमसे विवाह करना चाहते हैं। इनमें से तुम चाहे जिस देवता को पति के रूप में स्वीकार कर लो।
‘नल ने दोनों हाथ जोड़कर कहा कि ‘ देवराज !
वहाँ आप लोगों के और मेरे जाने का एक ही प्रयोजन है। इसलिये आप मुझे दूत बनाकर वहाँ भेजें, यह उचित नहीं है। जिसकी किसी स्त्री को पत्नी के रूप में पाने की इच्छा हो चुकी हो, वह भला, उसको कैसे छोड़ सकता है और उसके पास जाकर ऐसी बात कह ही कैसे सकता है ?
आप लोग कृपया इस विषय में मुझे क्षमा करें।
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भाग - 2 नल दमयंती का विवाह
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देवताओं ने कहा- ‘ नल !
तुम पहले हम लोगों से प्रतिज्ञा कर चुके हो कि मैं तुम्हारा काम करूँगा। अब प्रतिज्ञा मत तोड़ो। अविलम्ब वहाँ चले जाओ।’
नल ने कहा – ‘राजमहल में निरन्तर कड़ा पहरा रहता है, मैं कैसे जा सकूँगा ?’
इन्द्रने कहा – ‘जाओ, तुम वहाँ जा सकोगे।‘ इन्द्र की आज्ञा से नल ने राज महल में बेरोक – टोक प्रवेश करके दमयन्ती को देखा। दमयन्ती और सखियाँ भी उसे देखकर अवाक रह गईं।
वे इस अनुपम सुन्दर पुरुष को देखकर मुग्ध हो गयीं और लज्जित होकर कुछ बोल न सकीं। दमयन्ती ने अपने को सँभाल कर राजा नल से कहा – ‘वीर !
तुम देखने में बड़े सुन्दर और निर्दोष जान पड़ते हो । पहले अपना परिचय बताओ । तुम यहाँ किस उद्देश्य से आये हो और यहाँ आते समय द्वारपालों ने तुम्हें देखा क्यों नहीं ?
उनसे तनिक भी चूक हो जाने पर मेरे पिता उन्हें बड़ा कड़ा दण्ड देते हैं।‘ नल ने कहा‘ कल्याणी !
मैं नल हूँ। लोकपालों का दूत बनकर तुम्हारे पास आया हूँ। सुन्दरी !
इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम ये चारों देवता तुम्हारे साथ विवाह करना चाहते हैं। तुम इनमें से किसी एक देवता को अपने पति के रूप में वरण कर लो।
यही संदेश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ। उन देवताओं के प्रभाव से ही जब मैं तुम्हारे महल में प्रवेश करने लगा, तब मुझे कोई देख नहीं सका। मैंने देवताओं का संदेश कह दिया। अब तुम्हारी जो इच्छा हो, करो।‘
दमयन्ती ने बड़ी श्रद्धा के साथ देवताओं को प्रणाम करके मन्द–मन्द मुस्कुराकर नल से कहा –
नरेन्द्र।
आप मुझे प्रेम – दृष्टि से देखिये और आज्ञा कीजिये कि मैं यथा शक्ति आपकी क्या सेवा करूँ, मेरे स्वामी। मैंने अपना सर्वस्व और अपने आपको भी आपके चरणों में सौंप दिया है। आप मुझ पर विश्वासपूर्ण प्रेम कीजिये।
जिस दिन से मैंने हंसों की बात सुनी, उसी दिन से मैं आपके लिये व्याकुल हूँ। आपके लिये ही मैंने राजाओं की भीड़ इकट्ठी की है। यदि आप मुझ दासी की प्रार्थना अस्वीकार कर देंगे तो मैं विष खाकर, आग में जलकर, पानी में डूबकर या फाँसी लगाकर आपके लिये मर जाऊँगी।‘
राजा नल ने कहा- ‘जब बड़े – बड़े लोकपाल तुम्हारे प्रणय सम्बन्ध के प्रार्थी हैं, तब तुम मुझ मनुष्य को क्यों चाह रही हो ?
उन ऐश्वर्यशाली देवताओं के चरण – रेणु के समान भी तो मैं नहीं हूँ। तुम अपना मन उन्हीं में लगाओ। देवताओं का अप्रिय करने से मनुष्य की मृत्यु हो जाती है। तुम मेरी रक्षा करो और उनको वरण कर लो।’
नल की बात सुनकर दमयन्ती घबरा गई। उसके दोनों नेत्रों में आँसू छलक आये। वह कहने लगी –
मैं सब देवताओं को प्रणाम करके आपको ही पतिरूप में वरण कर रही हूँ। यह मैं सत्य शपथ खा रही हूँ।‘ उस समय दमयन्ती का शरीर काँप रहा था, हाथ जुड़े हुए थे।
राजा नल ने कहा – अच्छा, तब तुम ऐसा ही करो। परंतु यह तो बतलाओ कि मैं यहाँ उनका दूत बनकर संदेश पहुँचाने के लिये आया हूँ।
यदि इस समय मैं अपना स्वार्थ बनाने लगूं तो कितनी बुरी बात है। मैं अपना स्वार्थ तो तभी बना सकता हूँ , यदि वह धर्म के विरुद्ध ना हो।
तुम्हें भी ऐसा ही करना चाहिये।
दमयन्ती ने गद्गद – कण्ठ से कहा – नरेश्वर !
इसके लिये एक निर्दोष उपाय है। उसके अनुसार काम करने पर आपको कोई दोष नहीं लगेगा। वह उपाय यह है कि आप लोकपालों के साथ स्वयंवर – मण्डप में आवें। मैं उनके सामने ही आपको वरण कर लुंगी। तब आपको दोष नहीं लगेगा।
अब राजा नल देवताओं के पास आये। देवताओं के पूछने पर उन्होंने कहा- ”
मैं आप लोगों की आज्ञा से दमयन्ती के महल में गया। बाहर बूढ़े द्वारपाल पहरा दे रहे थे, परंतु उन्होंने आप लोगों के प्रभाव से मुझे देखा नहीं। केवल दमयन्ती और उसकी सखियों ने मुझे देखा। वे आश्चर्यमें पड़ गईं।
मैंने दमयन्ती के सामने आप लोगों का वर्णन किया, परंतु वह तो आप लोगों को न चाहकर मुझे ही वरण करने पर तुली हुई है। उसने कहा है कि ‘सब देवता आपके साथ स्वयंवर में आवें।
मैं उनके सामने ही आपको वरण कर लूँगी। इसमें आपको दोष नहीं लगेगा।‘ मैंने आप लोगों के सामने सब बातें कह दीं। अन्तिम प्रमाण आप लोग ही हैं।”
राजा भीम ने शुभ मुहूर्त में स्वयंवर का समय रखा और लोगों को बुलवा भेजा। सब राजा अपने – अपने निवास स्थान से आ – आकर स्वयंवर – मण्डप में यथास्थान बैठने लगे। पूरी सभा राजाओं से भर गई।
जब सब लोग अपने – अपने आसन पर बैठ गये, तब सुन्दरी दमयन्ती अपनी अङ्गकान्ति से राजाओं के मन और नेत्रों को अपनी ओर आकर्षित करती हुई रङ्गमण्डप में आई। राजाओं का परिचय दिया जाने लगा। दमयन्ती एक – एक को देखकर आगे बढ़ने लगी।
आगे एक ही स्थान पर नल के समान आकार और वेषभूषा के पाँच राजा इकट्ठे ही बैठे हुए थे। दमयन्ती को संदेह हो गया, वह राजा नल को नहीं पहचान सकी। वह जिसकी ओर देखती, वही नल जान पड़ता।
इसलिये विचार करने लगी कि ‘मैं देवताओं को कैसे पहचानूँ और ये राजा नल हैं — यह कैसे जानूँ ?
उसे बड़ा दुःख हुआ। अन्त में दमयन्ती ने यही निश्चय किया कि देवताओं की शरण में जाना ही उचित है। हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक स्तुति करने लगी- - देवताओ !
हंसों के मुँह से नल का वर्णन सुनकर मैंने उन्हें पतिरूप से वरण कर लिया है। मैं मन से और वाणी से नल के अतिरिक्त और किसी को नहीं चाहती।
देवताओं ने निषधेश्वर नल को ही मेरा पति बना दिया है तथा मैंने नल की आराधना के लिये ही यह व्रत प्रारम्भ किया है। मेरी इस सत्य शपथ के बल पर देवता लोग मुझे उन्हें ही दिखला दें। ऐश्वर्यशाली लोकपालो !
आप लोग अपना रूप प्रकट कर दें, जिससे मैं पुण्यश्लोक नरपति नल को पहचान लूँ। देवताओं ने दमयन्ती का यह आर्त – विलाप सुना। उसके दृढ़ निश्चय, सच्चे प्रेम, आत्मशुद्धि, बुद्धि, भक्ति और नल परायणता को देखकर उन्होंने उसे ऐसी शक्ति दे दी, जिससे वह देवता और मनुष्य का भेद समझ सके।
दमयन्ती ने देखा कि देवताओं के शरीर पर पसीना नहीं है। पलकें गिरती नहीं हैं। उनके गले में पड़ी पुष्पमाला कुम्हलाई नहीं है। शरीर पर मैल नहीं है। वे सिंहासन पर स्थित हैं पर उनके पैर धरती को नहीं छूते और उनकी परछाई नहीं पड़ती।
इधर नल के शरीर की छाया पड़ रही है। माला कुम्हला गई है। शरीर पर कुछ धूल और पसीना भी है। पलकें बराबर गिर रही हैं और धरती छूकर स्थित हैं। दमयन्ती ने इन लक्षणों से देवताओं और पुण्यश्लोक नल को पहचान लिया। फिर धर्म के अनुसार नल को वरण कर लिया।
दमयन्ती ने कुछ सकुचाकर घूंघट काढ़ लिया और नल के गले में वरमाला डाल दी। देवता और महर्षि साधु – साधु कहने लगे। राजाओ में हाहाकार मच गया। राजा नल ने आनन्दातिरेक से दमयन्ती का अभिनन्दन किया।
उन्होंने कहा – ‘ कल्याणी !
तुमने देवताओं के सामने रहने पर भी उन्हें वरण न करके मुझे वरण किया है, इसलिये तुम मुझको प्रेम परायण पति समझना। मैं तुम्हारी बात मानूँगा। जब तक मेरे शरीर में प्राण रहेंगे, तब तक मैं तुमसे प्रेम करूंगा – यह मैं तुमसे शपथपूर्वक सत्य कहता हूँ।‘
दोनों ने प्रेम से एक – दूसरे का अभिनन्दन करके इन्द्रादि देवताओं की शरण ग्रहण की। देवता भी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने नल को आठ वर दिये।
इन्द्रने कहा – ‘नल !
तुम्हें यज्ञ में मेरा दर्शन होगा और उत्तम गति मिलेगी। अग्नि देव ने कहा – जहाँ तुम मेरा स्मरण करोगे, वहीं मैं प्रकट हो जाऊँगा और मेरे ही समान प्रकाशमय लोक तुम्हें प्राप्त होंगे।
यमराज ने कहा- तुम्हारी बनाई हुई रसोई बहुत मीठी होगी और तुम अपने धर्म में दृढ़ रहोगे।
वरुण ने कहा - जहाँ तुम चाहोगे, वहीं जल प्रकट हो जायगा। तुम्हारी माला उत्तम गन्ध से परिपूर्ण रहेगी। इस प्रकार दो दो वर देकर सब देवता अपने अपने लोको में चले गए।
निमंत्रित राजा लोग भी विदा हो गए। भीम ने प्रसन्न होकर दमयंती का नल के साथ विधि पूर्वक विवाह कर दिया राजा नल कुछ दिनों तक विदर्भ देश की राजधानी कुंडलपुर में रहे।
उसके बाद भीम की अनुमति प्राप्त करके वह अपनी पत्नी दमयंती के साथ अपनी राजधानी लौट आए। राजा नल अपनी राजधानी में धर्म के अनुसार प्रजा का पालन करने लगे सचमुच उनके द्वारा राजा नाम सार्थक हो गया।
उन्होंने अश्वमेघ आदि बहुत से यज्ञ किये। समय आने पर दमयंती के गर्भ से इंद्रसेन नाम के पुत्र और इंद्रसेना नाम की कन्या का जन्म हुआ।
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भाग - 3 कलयुग का दमयंती से प्रतिशोध
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महर्षि बृहदश्व कहते हैं – युधिष्ठिर !
जिस समय दमयन्ती के स्वयंवर से लौटकर इन्द्रादि लोकपाल अपने – अपने लोकों में जा रहे थे, उस समय उनकी मार्ग में ही कलियुग और द्वापर से भेंट हो गई।
इन्द्र ने पूछा- क्यों कलियुग !
कहाँ जा रहे हो ?
कलियुग ने कहा- मैं दमयन्ती के स्वयंवर में उससे विवाह करने के लिये जा रहा हूँ।
इन्द्र ने हँसकर कहा – अजी, वह स्वयंवर तो कभी का पूरा हो गया। दमयन्ती ने राजा नल को वरण कर लिया, हम लोग ताकते ही रह गये।
कलियुग ने क्रोध में भरकर कहा – ओह, तब तो बड़ा अनर्थ हुआ। उसने देवताओं की उपेक्षा करके मनुष्य को अपनाया, इसलिये उसको दण्ड देना चाहिये।
देवताओं ने कहा – दमयन्ती ने हमारी आज्ञा प्राप्त करके नल को वरण किया है। वास्तव में नल सर्वगुण सम्पन्न और उसके योग्य हैं। वे समस्त धर्मो के मर्मज्ञ और सदाचारी हैं। उन्होंने इतिहास – पुराणों के सहित वेदों का अध्ययन किया है।
वे धर्मानुसार यज्ञ में देवताओं को तृप्त करते हैं, कभी किसी को सताते नहीं हैं, सत्यनिष्ठ और दृढनिश्चयी हैं। उनकी चतुरता, धैर्य, ज्ञान, तपस्या, पवित्रता, दम और शम लोकपालों के समान हैं। उनको शाप देना तो नरक की धधकती आग में गिरना है। यह कहकर देवता लोग चले गये।
अब कलियुग ने द्वापर से कहा – भाई !
मैं अपने क्रोध को शान्त नहीं कर सकता। इसलिये मैं नल के शरीर में निवास करूँगा। मैं उसे राज्यच्युत कर दूंगा। तब वह दमयन्ती के साथ नहीं रह सकेगा।
इसलिये तुम भी जुए के पासों में प्रवेश करके मेरी सहायता करना। द्वापर ने उसकी बात स्वीकार कर ली। द्वापर और कलियुग दोनों ही नल की राजधानी में आ बसे। बारह वर्ष तक वे इस बात की प्रतीक्षा में रहे कि नल में कोई दोष दीख जाय।
एक दिन राजा नल संध्या के समय लघुशंका से निवृत्त होकर पैर धोये बिना ही आचमन करके संध्या – वन्दन करने बैठ गये। यह अपवित्र अवस्था देखकर कलियुग उनके शरीर में प्रवेश कर गया।
साथ ही दूसरा रूप धारण करके वह पुष्कर के पास गया और बोला –
तुम नल के साथ जूआ खेलो और मेरी सहायता से जुए में राजा नल को जीतकर निषध देश का राज्य प्राप्त कर लो। पुष्कर उसकी बात स्वीकार करके नल के पास गया। द्वापर भी पासों का रूप धारण करके उनके साथ हो लिया।
जब पुष्कर ने राजा नल से बार – बार जूआ खेलने का आग्रह किया, तब राजा नल दमयन्ती के सामने अपने भाई की बार – बार की ललकार को सह न सके। उन्होंने उसी समय पासे खेलने का निश्चय कर लिया। उस समय नल के शरीर में कलियुग घुसा हुआ था ;
इसलिये राजा नल ने दाव में सोना, चाँदी, रथ, वाहन आदि जो कुछ लगाते, वह हार जाते। प्रजा और मन्त्रियों ने बड़ी व्याकुलता के साथ राजा नल से मिलकर जुए को रोकना चाहा और आकर फाटक के सामने खड़े हो गये।
उनका अभिप्राय जानकर द्वारपाल रानी दमयन्ती के पास गया और बोला कि आप महाराज से निवेदन कर दीजिये। आप धर्म और अर्थ के तत्त्वज्ञ हैं। आपकी सारी प्रजा आपका दुःख सह्य न होने के कारण कार्यवश दरवाजे पर आकर खड़ी है।
दमयन्ती स्वयं दुःख के मारे दुर्बल और अचेत हुई जा रही थी। उसने आँखों में आँसू भरकर गद्गद – कण्ठ से महाराज के सामने निवेदन किया – ‘ स्वामिन् !
नगर की राजभक्त मन्त्रिमण्डल के लोग, प्रजा के लोग आपसे मिलने आये हैं और ड्योढ़ी पर खड़े हैं। आप उनसे मिल लीजिये। परंतु नल कलियुग का आवेश होने के कारण कुछ भी नहीं बोले। मन्त्रिमण्डल और प्रजा के लोग शोकग्रस्त होकर लौट गये।
पुष्कर और नल में कई महीनों तक जूआ होता रहा तथा राजा नल बराबर हारते गये। राजा नल जुए में जो पासे फेंकते, वे बराबर ही उनके प्रतिकूल पड़ते। सारा धन हाथ से निकल गया।
जब दमयन्ती को इस बात का पता चला, तब उसने बृहत्सेना नाम की धाय के द्वारा राजा नल के सारथि वार्ष्णेय को बुलवाया और उससे कहा –
सारथि !
तुम राजा के प्रेमपात्र हो। अब यह बात तुमसे छिपी नहीं है कि महाराज बड़े संकट में पड़ गये हैं। इसलिये तुम घोड़ों को रथ में जोड़ लो और मेरे दोनों बच्चों को रथ में बैठाकर कुण्डिन नगर में ले जाओ। तुम रथ और घोड़ों को भी वहीं छोड़ देना। तुम्हारी इच्छा हो तो वहीं रहना। नहीं तो कहीं दूसरी जगह चले जाना। सारथि ने दमयन्ती के कथनानुसार मन्त्रियों से सलाह करके बच्चों को कुण्डिनपुर में पहुँचा दिया, रथ और घोड़े भी वहीं छोड़ दिये तथा स्वयं वहाँ से पैदल ही चलकर अयोध्या जा पहुँचा और वहीं राजा ऋतुपर्ण के पास सारथि का काम करने लगा।
वार्ष्णेय सारथि के चले जाने के बाद पुष्कर ने पासों के खेल में राजा नल का राज्य और धन ले लिया। उसने नल को सम्बोधन करके हँसते हुए कहा – और जूआ खेलोगे ?
परंतु तुम्हारे पास दाँव पर लगाने के लिये तो कुछ है ही नहीं।
यदि तुम दमयन्ती को दाँव पर लगाने के योग्य समझो तो फिर खेल हो। नल का हृदय फटने लगा। वे पुष्कर से कुछ भी नहीं बोले।
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भाग - 4 नल दमयंती का नगर से निर्वासन
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उन्होंने अपने शरीर से सब वस्त्राभूषण उतार दिये और केवल एक वस्त्र पहने नगर से बाहर निकले।
दमयन्ती ने भी केवल एक साड़ी पहनकर अपने पति का अनुगमन किया।
नल के मित्र और सम्बन्धियों को बड़ा शोक हुआ।
नल और दमयन्ती दोनों नगर के बाहर तीन रात तक रहे।
पुष्कर ने नगर में ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो मनुष्य नल के प्रति सहानुभूति प्रकट करेगा, उसको फाँसी की सजा दी जायगी। भय के मारे नगर के लोग अपने राजा नल का सत्कार तक न कर सके।
राजा नल तीन दिन – रात तक अपने नगर के पास केवल पानी पीकर रहे। चौथे दिन उन्हें बड़ी भूख लगी। फिर दोनों फल – मूल खाकर वहाँ से आगे बढ़े।
एक दिन राजा नल ने देखा कि बहुत – से पक्षी उनके पास ही बैठे हैं। उनके पंख सोने के समान दमक रहे हैं। नल ने सोचा कि इनकी पाँख से कुछ धन मिलेगा।
ऐसा सोचकर उन्हें पकड़ने के लिये नल ने उन पर अपना पहनने का वस्त्र डाल दिया।
पक्षी उनका वस्त्र लेकर उड़ गये।
अब नल नंगे होकर बड़ी दीनता के साथ मुँह नीचे किये खड़े हो गये।
पक्षियों ने कहा – ‘ दुर्बुद्धे !
तू नगर से एक वस्त्र पहनकर निकला था। उसे देखकर हमें बड़ा दुःख हुआ था। ले, अब हम तेरे शरीर पर का वस्त्र लिये जा रहे हैं। हम पक्षी नहीं, जुए के पासे हैं।
नल ने दमयन्ती से पासों की बात कह दी।
इसके बाद नल ने कहा – ‘ प्रिये !
तुम देख रही हो, यहाँ बहुत – से मार्ग हैं। एक अवन्ती की ओर जाता है, दूसरा ऋक्षवान् पर्वत पर होकर दक्षिण देश को। सामने विन्ध्याचल पर्वत है। यह पयोष्णी नदी समुद्र में मिलती है। ये महर्षियों के आश्रम हैं। सामने का रास्ता विदर्भ देश को जाता है। यह कोसल देश का मार्ग है।
इस प्रकार राजा नल दुःख और शोक से भरकर बड़ी सावधानी के साथ दमयन्ती को भिन्न – भिन्न मार्ग और आश्रम बतलाने लगे।
दमयन्ती की आँखें आँसू से भर गयीं।
वह गद्द – स्वर से कहने लगी – स्वामिन् !
आप क्या सोच रहे हैं ?
मेरे अङ्ग शिथिल हो रहे हैं और मेरा हृदय उद्विग्र हो रहा है। आपका राज्य गया, धन गया, आपके शरीर पर वस्त्र नहीं रहा, आप थके – मांदे तथा भूखे – प्यासे हैं ;
क्या मैं आपको इस निर्जन वन में छोड़कर अकेली कहीं जा सकती हूँ ?
मैं आपके साथ रहकर आपके दुःख दूर करूँगी। दुःख के अवसरों पर पत्नी पुरुष के लिये औषध है। वह धैर्य देकर पति के दुःख को कम करती। यह बात वैद्य भी स्वीकार करते हैं।
नल ने कहा – प्रिये !
तुम्हारा कहना ठीक है। पत्नी मित्र है, पत्नी औषध है। परंतु मैं तो तुम्हारा त्याग करना नहीं चाहता। तुम ऐसा संदेह क्यों कर रही हो ?
दमयन्ती बोली – आप मुझे छोड़ना नहीं चाहते, परंतु विदर्भ देश का मार्ग क्यों बतला रहे हैं ?
मुझे निश्चय है कि आप मेरा त्याग नहीं कर सकते। फिर भी इस समय आपका मन उलटा हो गया है, इसलिये ऐसी शंका करती हूँ। आपके मार्ग बताने से मेरा मन दुखता है।
यदि आप मुझे मेरे पिता या किसी सम्बन्धी के घर भेजना चाहते हों तो ठीक है, हम दोनों साथ – साथ चलें।
मेरे पिता आपका सत्कार करेंगे। आप वहीं सुख से रहियेगा।
नल ने कहा प्रिये !
तुम्हारे पिता राजा हैं और मैं भी कभी राजा था। इस समय मैं संकट में पड़कर उनके पास नहीं जाऊँगा।
राजा नल दमयन्ती को समझाने लगे।
तदनन्तर दोनों एक ही वस्त्र से शरीर ढककर वन में इधर – उधर घूमते रहे।
भूख – प्यास से व्याकुल होकर दोनों एक धर्मशाला में आये और ठहर गये।
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भाग - 5 नल का दमयन्ती को त्यागना
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बृहदश्वजी कहते हैं – युधिष्ठिर!
उस समय राजा नल के शरीर पर वस्त्र नहीं था और तो क्या, धरती पर बिछाने के लिये एक चटाई भी नहीं थी। शरीर धूल से लथपथ हो रहा था। भूख प्यास की पीड़ा अलग ही थी। राजा नल जमीन पर ही सो गये। दमयन्ती के जीवन में भी कभी ऐसी परिस्थिति नहीं आई थी। वह सुकुमारी भी वहीं सो गई।
दमयन्ती के सो जाने पर राजा नल की नींद टूटी।
सच्ची बात तो यह थी कि वे दुःख और शोक की अधिकता के कारण सुख की नींद सो भी नहीं सकते थे।
आँख के खुलने पर उनके सामने राज्य के छिन जाने, सगे – सम्बन्धियों के छूटने और पक्षियों के वस्त्र लेकर उड़ जाने के दृश्य एक – एक करके आने लगे।
वे सोचने लगे कि ‘ दमयन्ती मुझ से बड़ा प्रेम करती है। प्रेम के कारण ही वह इतना दुःख भी भोग रही है।
यदि मैं इसे छोड़कर चला जाऊँगा तो यह अपने पिता के घर चली जायगी।
मेरे साथ तो इसे दुःख – ही दुःख भोगना पड़ेगा।
यदि मैं इसे छोड़कर चला जाऊँ तो सम्भव है कि इसे सुख भी मिल जाय।
अन्त में राजा नल ने यही निश्चय किया कि दमयन्ती को छोड़कर चले जाने में ही भलाई है।
दमयन्ती सच्ची पतिव्रता है। कोई भी इसके सतीत्व को भङ्ग नहीं कर सकता। इस प्रकार त्यागने का निश्चय करके और सतीत्व की ओर से निश्चिन्त होकर राजा नल ने यह विचार किया कि मैं नंगा हूँ और दमयन्ती के शरीर पर भी केवल एक ही वस्त्र है। फिर भी इसके वस्त्रों से आधा फाड़ लेना ही श्रेयस्कर है।
परंतु फाड़ू कैसे ?
शायद यह जाग जाय ?
वे धर्मशाला में इधर – उधर घूमने लगे।
उनकी दृष्टि एक बिना म्यान की तलवार पर पड़ गई। राजा नल ने उसे उठा लिया और धीरे से दमयन्ती का आधा वस्त्र फाड़कर अपना शरीर ढक लिया।
दमयन्ती नींद में थी। राजा नल उसे छोड़कर निकल पड़े। थोड़ी देर बाद जब उनका हृदय शान्त हुआ, तब वे फिर धर्मशाला में लौट आये और दमयन्ती को देखकर रोने लगे।
वे सोचने लगे कि अब तक मेरी प्राणप्रिया अन्तःपुर के परदे में रहती थी, इसे कोई छू भी नहीं सकता था।
आज यह अनाथ के समान आधा वस्त्र पहने धूल में सो रही है।
यह मेरे बिना दुःखी होकर वन में कैसे फिरेगी ?
प्रिये।
तू धर्मात्मा है ;
इसलिये आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनी कुमार और पवन देवता तेरी रक्षा करें।
उस समय राजा नल का हदय दुःख के मारे टुकड़े – टुकड़े हुआ जा रहा था, वे झूले की तरह बार – बार धर्मशाला से बाहर निकलते और फिर लौट आते।
शरीर में कलियुग का प्रवेश होने के कारण बुद्धि नष्ट हो गई थी, इसलिये अन्ततः वे अपनी प्राणप्रिया पत्नी को वन में अकेली छोड़कर वहाँ से चले गये।
जब दमयन्ती की नींद टूटी, तब उसने देखा कि राजा नल वहाँ नहीं हैं।
वह आशंका से भरकर पुकारने लगी कि
‘महाराज !
स्वामिन् !
मेरे सर्वस्व !
आप कहाँ हैं ?
मैं अकेली डर रही हूँ, आप कहाँ गये ?
बस, अब अधिक हँसी न कीजिये।
मेरे कठोर स्वामी !
मुझे क्यों डरा रहे हैं ?
शीघ्र दर्शन दीजिये।
मैं आपको देख रही हूँ।
लो, यह देख लिया। लताओं की आड़ में छिपकर चुप क्यों हो रहे हैं ?
मैं दुःख में पड़कर इतना विलाप कर रही हूँ और आप मेरे पास आकर धैर्य भी नहीं देते ?
स्वामिन् !
मुझे अपना या और किसी का शोक नहीं है। मुझे केवल इतनी ही चिन्ता है कि आप इस घोर जंगल में अकेले कैसे रहेंगे ?
हा नाथ !
निर्मल चित्तवाले आपकी जिस पुरुष ने यह दशा की है, वह आपसे भी अधिक दुर्दशा को प्राप्त होकर निरन्तर जीवन बिताए।
दमयन्ती इस प्रकार विलाप करती हुई इधर – उधर दौड़ने लगी।
वह उन्मत्त – सी होकर इधर – उधर घूमती हुई एक अजगर के पास जा पहुँची, शोकग्रस्त होने के कारण उसे इस बात का पता भी नहीं चला।
अजगर दमयन्ती को निगलने लगा। उस समय भी दमयन्ती के चित्त में अपनी नहीं, राजा नल की ही चिन्ता थी कि वे अकेले कैसे रहेंगे।
वह पुकारने लगी ‘
स्वामिन् !
मुझे अनाथ की भाँति यह अजगर निगल रहा है, आप मुझे छुड़ाने के लिये क्यों नहीं दौड़े आते ? ‘
दमयन्ती की आवाज एक व्याध के कान में पड़ी। वह उधर ही घूम रहा था।
वह वहाँ दौड़कर आया और यह देखकर कि दमयन्ती को अजगर निगल रहा है, अपने तेज शस्त्र से अजगर का मुँह चीर डाला।
उसने दमयन्ती को छुड़ाकर नहलाया, आश्वासन देकर भोजन कराया।
दमयन्ती कुछ कुछ शान्त हुई।
व्याध ने पूछा- ‘ सुन्दरी !
तुम कौन हो ?
किस कष्ट में पड़कर किस उद्देश्य से यहाँ आई हो ?
दमयन्ती ने व्याध से अपनी कष्ट – कहानी कही।
दमयन्ती की सुन्दरता, बोल – चाल और मनोहरता देखकर व्याध काममोहित हो गया।
वह मीठी – मीठी बातें करके दमयन्ती को अपने वश में करने की चेष्टा करने लगा।
दमयन्ती दुरात्मा व्याध के मन का भाव जानकर क्रोध के आवेश से प्रज्वलित हो गई।
दमयन्ती ने व्याध के बलात्कार की चेष्टा को रोकना चाहा ;
परंतु जब वह किसी भी प्रकार न माना, तब उसने व्याध को शाप दे दिया।
यदि मैंने निषधनरेश राजा नल को छोड़कर और किसी पुरुष का मन से भी चिन्तन नहीं किया हो तो यह पापी क्षुद्र व्याध मर कर जमीन पर गिर पड़े।
दमयन्ती के मुँह से ऐसी बात निकलते ही व्याध के प्राण – पखेरू उड़ गये, वह जले हुए ठूंठ की तरह पृथ्वी पर गिर पड़ा।
व्याध के मर जाने पर दमयन्ती राजा नल को ढूँढ़ती हुई एक निर्जन और भयंकर वन में जा पहुँची।
बहुत – से पर्वत, नदी, नद, जंगल, हिंसक पशु, पिशाच आदि को देखती हुई और विरह के उन्माद में उनसे राजा नल का पता पूछती हुई वह उत्तर की ओर बढ़ने लगी।
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भाग - 6 दमयंती को दिव्य ऋषियों के दर्शन और राजा सुबाहु के महल में निवास।
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तीन दिन, तीन रात बीत जाने के बाद दमयन्ती ने देखा कि सामने ही एक बड़ा सुन्दर तपोवन है। उस आश्रम में वसिष्ठ, भृगु और अत्रि के समान मितभोजी, संयमी, पवित्र, जितेन्द्रिय और तपस्वी ऋषि निवास कर रहे हैं।
वे वृक्षों की छाल अथवा मृगछाला धारण किये हुए थे। दमयन्ती को कुछ धैर्य मिला, उसने आश्रम में जाकर बड़ी नम्रता के साथ तपस्वी ऋषियों को प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ी हो गई।🙏
ऋषियों ने ‘स्वागत है’ कहकर दमयन्ती का सत्कार किया और बोले –
बैठ जाओ।
हम तुम्हारा क्या काम करें ?
दमयन्ती ने भद्र महिला के समान पूछा–
आपकी तपस्या, अग्नि, धर्म और पशु – पक्षी तो सकुशल हैं न ?
आपके धर्माचरण में तो कोई विघ्न नहीं पड़ता।
‘ऋषियों ने कहा – ‘कल्याणी !
हम तो सब प्रकार से सकुशल हैं।
तुम कौन हो, किस उद्देश्य से यहाँ आई हो ?
हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। क्या तुम वन, पर्वत, नदी की अधिष्ठातृ देवता हो ?
दमयन्ती ने कहा – ‘महात्माओ !
मैं कोई देवी – देवता नहीं, एक मनुष्य – स्त्री हूँ। मैं विदर्भनरेश राजा भीम की पुत्री हूँ।
बुद्धिमान्, यशस्वी एवं वीर – विजयी निषधनरेश महाराज नल मेरे पति हैं।
कपटद्यूत के विशेषज्ञ एवं दुरात्मा पुरुषों ने मेरे धर्मात्मा पति को जूआ खेलने के लिये उत्साहित करके उनका राज्य और धन ले लिया है।
मैं उन्हीं की पत्नी दमयन्ती हूँ।
संयोगवश वे मुझसे बिछुड़ गये हैं। मैं उन्हीं रणबांकुरे, शस्त्र विद्या कुशल एवं महात्मा पतिदेव को ढूँढ़ने के लिये वन – वन भटक रही हूँ।
मैं यदि उन्हें शीघ्र ही नहीं देख पाऊँगी तो जीवित नहीं रह सकूँगी।
उनके बिना मेरा जीवन निष्फल है।
वियोग के दुःख को मैं कब तक सह सकूँगी।
‘तपस्वियों ने कहा ‘ कल्याणी !
हम अपनी तपःशुद्ध दृष्टि से देख रहे हैं कि तुम्हें आगे बहुत सुख मिलेगा और थोड़े ही दिनों में राजा नल का दर्शन होगा।
धर्मात्मा निषध – नरेश थोड़े ही दिनों में समस्त दुःखों से छूटकर सम्पत्तिशाली निषध देश पर राज्य करेंगे।
उनके शत्रु भयभीत होंगे, मित्र सुखी होंगे और कुटुम्बी उन्हें अपने बीच में पाकर आनन्दित होंगे।
इस प्रकार कहकर वे सब तपस्वी अपने आश्रम के साथ अन्तर्धान हो गये।
यह आश्चर्यकी घटना देखकर दमयन्ती विस्मित हो गई।
वह सोचने लगी कि अहो !
मैंने यह स्वप्न देखा है क्या ?
यह कैसी घटना हो गई।
वे तपस्वी, आश्रम, पवित्र सलिला नदी, फल – फूलों से लदे हरे – भरे वृक्ष कहाँ गये ?
दमयन्ती फिर उदास हो गई, उसका मुख मुरझा गया।
वहाँ से चलकर विलाप करती हुई दमयन्ती एक अशोक वृक्ष के पास पहुँची।
उसकी आँखों से झर – झर आँसू झर रहे थे।
उसने अशोक वृक्ष से गद्गद – स्वर में कहा -
शोकरहित अशोक !
तू मेरा शोक मिटा दे।
क्या कहीं तूने राजा नल को शोक – रहित देखा है ?
अशोक !
तू अपने शोकनाशक नाम को सार्थक कर।
दमयन्ती ने अशोक की प्रदक्षिणा की और वह आगे बढ़ी।
भयंकर वन में अनेकों वृक्ष, गुफा, पर्वतों के शिखर और नदियों के आस – पास अपने पतिदेव को ढूँढ़ती हुई दमयन्ती बहुत दूर निकल गई।
वहाँ उसने देखा कि बहुत – से हाथी, घोड़ों और रथों के साथ व्यापारियों का एक झुंड आगे बढ़ रहा है।
व्यापारियों के प्रधान से बातचीत करके और यह जानकर कि ये व्यापारी राजा सुबाहु के राज्य चेदिदेश में जा रहे हैं, दमयन्ती उनके साथ हो गई।
उसके मन में अपने पति के दर्शन की लालसा बढ़ती ही जा रही थी।
कई दिनों तक चलने के बाद वे व्यापारी एक भयंकर वन में पहुंचे।
वहाँ एक बड़ा ही सुन्दर सरोवर था।
लंबी यात्रा के कारण सब लोग थक गये थे।
इसलिये उन लोगों ने वहीं पड़ाव डाल दिया।
दैव व्यापारियों के प्रतिकूल था।
रात के समय जंगली हाथी व्यापारियों के हाथियों पर टूट पड़े और उनकी भगदड़ में सब – के – सब व्यापारी नष्ट– भ्रष्ट हो गये।
कोलाहल सुनकर दमयन्ती की नींद टूटी।
वह इस महासंहार का दृश्य देखकर बावली – सी हो गई।
उसने कभी ऐसी घटना नहीं देखी थी।
वह डरकर वहाँ से भाग निकली और जहाँ कुछ बचे हुए मनुष्य खड़े थे, वहाँ जा पहुँची।
तदनन्तर दमयन्ती उन वेदपाठी और संयमी ब्राह्मणों के साथ, जो उस महासंहार से बच गये थे, शरीर पर आधा वस्त्र धारण किये चलने लगी और सायंकाल के समय चेदिनरेश राजा सुबाहु की राजधानी में जा पहुंची।
जिस समय दमयन्ती राजधानी के राज-पथ पर चल रही थी, नागरिकों ने यही समझा कि यह कोई बावली स्त्री है।
छोटे – छोटे बच्चे उसके पीछे लग गये।
दमयन्ती राजमहल के पास जा पहुँची।
उस समय राजमाता राजमहल की खिड़की में बैठी हुई थीं।
उन्होंने बच्चों से घिरी दमयन्ती को देखकर धाय से कहा कि ‘अरी !
देख तो, यह स्त्री बड़ी दुखिया मालूम पड़ती है।
अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़ रही है।
बच्चे इसे दुःख दे रहे हैं।
तू जा, इसे मेरे पास ले आ।
यह सुन्दरी तो इतनी है, कि मानो मेरे महल को भी दमका देगी।
‘धाय ने आज्ञा का पालन किया।
दमयन्ती राजमहल में आ गई।
राजमाता ने दमयन्ती का सुन्दर शरीर देखकर पूछा –
‘देखने में तो तुम कोई दुखिया जान पड़ती हो, तो भी तुम्हारा शरीर इतना तेजस्वी कैसे है ?
बताओ, तुम कौन हो, किसकी पत्नी हो, असहाय अवस्था में भी किसी से डरती क्यों नहीं हो ?
‘दमयन्ती ने कहा- ‘ मैं एक पतिव्रता नारी हूँ।
मैं हूँ तो कुलीन परंतु दासी का काम करती हूँ।
अन्तःपुर में रह चुकी हूँ।
मैं कहीं भी रह जाती हूँ।
फल – मूल खाकर दिन बिता देती हूँ।
मेरे पतिदेव बहुत गुणी हैं और मुझसे प्रेम भी बहुत करते हैं।
मेरे अभाग्य की बात है कि वे बिना मेरे किसी अपराध के ही रात के समय मुझे सोती छोड़कर न जाने कहाँ चले गये।
मैं रात दिन अपने प्राणपति को ढूँढ़ती और उनके वियोग में जलती रहती हूँ।
इतना कहते – कहते दमयन्ती की आँखों में आँसू उमड़ आये, वह रोने लगी।
दमयन्ती के दुःख भरे विलाप से राजमाता का जी भर आया।
वे कहने लगीं – ‘कल्याणी !
मेरा तुम पर स्वाभाविक ही प्रेम हो रहा है।
तुम मेरे पास ही रहो, मैं तुम्हारे पति को ढूँढ़ने का काम करूंगी। जब वे आवे, तब तुम उनसे यहीं मिलना।
दमयन्ती ने कहा — ‘ माताजी !
मैं एक शर्त पर आपके घर रह सकती हूँ।
कभी जूठा न खाऊँगी, किसी के पैर नहीं धोऊँगी और पर – पुरुष के साथ किसी प्रकार की भी बातचीत नहीं करूँगी।
यदि कोई पुरुष मुझसे दुश्चेष्टा करे तो उसे दण्ड देना होगा।
बार – बार ऐसा करने पर उसे प्राणान्त दण्ड भी देना होगा।
मैं अपने पति को ढूँढ़ने के लिये ब्राह्मणों से बातचीत करती रहूँगी।
आप यदि मेरी यह शर्त स्वीकार करें तब तो मैं रह सकती हूँ, अन्यथा नहीं।
राजमाता दमयन्ती के नियमों को सुनकर बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने कहा कि ऐसा ही होगा।
तदनन्तर उन्होंने अपनी पुत्री सुनन्दा को बुलाया और कहा कि बेटी !
देखो, इस दासी को देवी समझना।
यह अवस्था में तुम्हारे बराबर की है, इसलिये इसे सखी के समान राजमहल में रखो और प्रसन्नता के साथ इससे मनोरंजन करती रहो।
सुनन्दा प्रसन्नता के साथ दमयन्ती को अपने महल में ले गई।
दमयन्ती अपने इच्छानुसार नियमों का पालन करती हई महल में रहने लगी।
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भाग 7 : नल का रूप बदलना।
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दमयन्ती को सोती छोड़कर आगे बढ़े, उस समय वन में दावाग्नि लग रही थी। नल कुछ ठिठक गये, उनके कानों में आवाज आई’ राजा नल !
शीघ्र दौड़ो।
मुझे बचाओ।
नल ने कहा — ‘डरो मत’ वे दौड़कर दावानल में घुस गये और देखा कि नागराज कर्कोटक कुण्डली बाँधकर पड़ा हुआ है।
उसने हाथ जोड़कर नलसे कहा राजन् !
मैं कोंटक नाम का सर्प हूँ।
मैंने तेजस्वी ऋषि नारद को धोखा दिया था। मुझे उन्होंने शाप दे दिया कि जब तक राजा नल तुम्हें न उठावें, तब तक तू यहीं पड़ा रह। उनके उठाने पर तू शाप से छूट जायगा। उनके शाप के कारण मैं यहाँ से एक पग भी हट – ( बढ़ ) नहीं सकता। तुम शाप से मेरी रक्षा करो।
मैं तुम्हें हित की बात बताऊँगा और तुम्हारा मित्र बन जाऊँगा। मेरे भार से डरो मत। मैं अभी हल्का हो जाता हूँ। वह अँगूठे के बराबर हो गया।
नल उसे उठाकर दावानल से बाहर ले आये।
कर्कोटक ने कहा- -‘राजन् !
तुम अभी मुझे पृथ्वी पर न डालो। कुछ पगों तक गिनती करते हुए चलो।
राजा नल ने ज्यों ही पृथ्वी पर दसवाँ पग डाला और कहा – दस, त्यों ही कर्कोटक नाग ने उन्हें डस लिया।
उसका नियम था कि जब कोई ‘दस‘ अर्थात् ‘डसो‘ कहता, तभी वह डसता, अन्यथा नहीं।
कर्कोटक के डसते ही नल का पहला रूप बदल गया और कोंटक अपने रूप में हो गया।
आश्चर्यचकित नल से उसने कहा- राजन् !
तुम्हें कोई पहचान न सके, इसलिये मैंने तुम्हारा रूप बदल दिया है। कलियुग ने तुम्हें बहुत दुःख दिया है, अब मेरे विष से वह तुम्हारे शरीर में बहुत दुःखी रहेगा।
तुमने मेरी रक्षा की है।
अब तुम्हें हिंसक पशु – पक्षी, शत्रु और ब्रह्मवेत्ताओं के शाप आदि से भी कोई भय नहीं रहेगा।
अब तुम पर किसी भी विष का प्रभाव नहीं होगा और युद्ध में सर्वदा तुम्हारी जीत होगी।
अब तुम अपना नाम बाहुक रख लो और द्यूतकुशल राजा ऋतुपर्ण की नगरी अयोध्या जाओ।
तुम उन्हें घोड़ों की विद्या बतलाना और वे तुम्हें जुए का रहस्य बतला देंगे तथा तुम्हारे मित्र भी बन जायेंगे। जुए का रहस्य जान लेने पर तुम्हें तुम्हारी पत्नी, पुत्री, पुत्र, राज्य सब कुछ मिल जायगा।
जब तुम अपने पहले रूप को धारण करना चाहो, तब मेरा स्मरण करना और मेरे दिये हुए वस्त्र धारण कर लेना।
यह कहकर कर्कोटक ने दो दिव्य वस्त्र दिये और वहीं अन्तर्धान हो गया।
राजा नल वहाँ से चलकर दसवें दिन राजा ऋतुपर्ण की राजधानी अयोध्या में पहुँच गये।
उन्होंने वहाँ राजदरबार में निवेदन किया कि ‘ मेरा नाम बाहुक है।
मैं घोड़ों को हाँकने तथा उन्हें तरह – तरह की चलें सिखाने का काम करता हूँ।
घोड़ों की विद्या में मेरे – जैसा निपुण इस समय पृथ्वी पर और कोई नहीं है।
अर्थ सम्बन्धी तथा अन्यान्य गम्भीर समस्याओं पर मैं अच्छी सम्मति देता हूँ और रसोई बनाने में भी मैं बहुत ही चतुर हूँ, एवं हस्तकौशल के सभी काम तथा दूसरे भी कठिन कामों को मैं करने की चेष्टा करूँगा।
आप मेरी आजीविका निश्चित करके मुझे रख लीजिये।
ऋतुपर्ण ने कहा- बाहुक !
तुम भले आये।
तुम्हारे जिम्मे ये सभी काम रहेंगे।
परंतु मैं शीघ्रगामी सवारी को विशेष पसंद करता हूँ, इसलिये तुम ऐसा उद्योग करो कि - मेरे घोड़ों की चाल तेज हो जाय।
मैं तुम्हें अश्वशाला का अध्यक्ष बनाता हूँ। तुम्हें हर महीने सोने की दस हजार मोहरें मिला करेंगी। इसके अतिरिक्त वाष्र्णेय ( नल का पुराना सारथि ) और जीवल हमेशा तुम्हारे पास उपस्थित रहेंगे। तुम आनन्द से मेरे दरबार में रहो।
राजा ऋतुपर्ण से सत्कार पाकर राजा नल बाहुक के रूप में वार्ष्णेय और जीवल के साथ अयोध्या में रहने लगे।
राजा नल प्रतिदिन रात को दमयन्ती का स्मरण करके कहा करते कि ‘ हाय – हाय, तपस्विनी दमयन्ती भूख – प्यास से घबराकर थकी – माँदी उस मूर्ख का स्मरण करती होगी और न जाने कहाँ सोती होगी ?
भला, वह अपने जीवन – निर्वाह के लिये किसके पास जाती होगी ?
इसी प्रकार वे अनेकों बातें सोचते और इस प्रकार ऋतुपर्ण के पास रहते कि उन्हें कोई पहचान न सके।
जब विदर्भनरेश भीम को यह समाचार मिला कि मेरे दामाद नल राज्यच्युत होकर मेरी पुत्री के साथ वन में चले गये हैं, तब उन्होंने ब्राह्मणों को बुलवाया और उन्हें बहुत – सा धन देकर कहा कि आप लोग पृथ्वी पर सर्वत्र जा – जाकर नल – दमयन्ती का पता लगाइये और उन्हें ढूंढ़ लाइये।
जो ब्राह्मण यह काम पूरा कर लेगा, उसे एक सहस्र गौएँ और जागीर दी जायगी।
यदि आप लोग उन्हें ला न सकें, केवल पता ही लगा लावें तो भी दस हजार गौएँ दी जायेंगी।
ब्राह्मण लोग बड़ी प्रसन्नता से नल – दमयन्ती का पता लगाने निकल पड़े।
सुदेव नामक ब्राह्मण नल – दमयन्ती का पता लगाने के लिये चेदिनरेश की राजधानी में गया।
उसने एक दिन राजमहल में दमयन्ती को देख लिया।
उस समय राजा के महल में पुण्याहवाचन हो रहा था और दमयन्ती–सुनन्दा एक साथ बैठकर वह मङ्गलकृत्य देख रही थीं।
सुदेव ब्राह्मण ने दमयन्ती को देखकर सोचा कि वास्तव में यही भीम – नन्दिनी है।
मैंने इसका जैसा रूप पहले देखा था, वैसा ही अब भी देख रहा हूँ।
बड़ा अच्छा हुआ, इसे देख लेने से मेरी यात्रा सफल हो गई।
सुदेव दमयन्ती के पास गया और बोला– ‘ विदर्भनन्दिनि !
मैं तुम्हारे भाई का मित्र सुदेव ब्राह्मण हूँ।
राजा भीम की आज्ञा से तुम्हें ढूँढ़ने के लिये यहाँ आया हूँ।
तुम्हारे माता – पिता और भाई सानन्द हैं। तुम्हारे दोनों बच्चे भी विदर्भ देश में सकुशल हैं।
तुम्हारे बिछोह से सभी कुटुम्बी प्राण – हीन – से हो रहे हैं और तुम्हें ढूँढ़ने के लिये सैकड़ों ब्राह्मण पृथ्वी पर घूम रहे हैं।
दमयन्ती ने ब्राह्मण को पहचान लिया।
वह क्रम – क्रम से सबका कुशल – मङ्गल पूछने लगी और पूछते – पूछते ही रो पड़ी।
सुनन्दा दमयन्ती को बात करते रोते देखकर घबरा गई और उसने अपनी माता के पास जाकर सब हाल कहा।
राजमाता तुरंत अन्तःपुर से बाहर निकल आईं और ब्राह्मण के पास जाकर पूछने लगीं कि, महाराज !
यह किसकी पत्नी है, यह किसकी पुत्री है, यह अपने घरवालों से कैसे बिछुड़ गई है ?
तुमने इसे पहचाना कैसे ?
सुदेव ने नल दमयन्ती का पूरा चरित्र सुनाया और कहा कि जैसे राख में दबी हुई आग गर्मी से जान ली जाती है, वैसे ही इस देवी के सुन्दर रूप और ललाट से मैंने इसे पहचान लिया है।
सुनन्दा ने अपने हाथों से दमयन्ती का ललाट धो दिया, जिससे उसकी भौंहों के बीच का लाल चिह्न चन्द्रमा के समान प्रकट हो गया।
ललाट का वह तिल देखकर सुनन्दा और राजमाता दोनों ही रो पड़ीं।
उन्होंने दो घड़ी तक दमयन्ती को अपनी छाती से सटाये रखा।
राजमाता ने कहा मैंने इस तिल से पहचान लिया कि तुम मेरी बहिन की पुत्री हो।
तुम्हारी माता मेरी सगी बहिन है।
हम दोनों दशार्ण देश के राजा सुदामा की पुत्री हैं।
तुम्हारा जन्म मेरे पिता के घर ही हुआ था, उस समय मैंने तुम्हें देखा था।
जैसे तुम्हारे पिता का घर तुम्हारा है, वैसे ही यह घर भी तुम्हारा ही है, यह सम्पत्ति जैसे मेरी है, वैसे ही तुम्हारी भी।
दमयन्ती बहुत प्रसन्न हुई।
उसने अपनी मौसी को प्रणाम करके कहा — ‘ माँ !
तुमने मुझे पहचाना नहीं तो क्या हुआ ?
मैं रही तो यहाँ लड़की की तरह ही हूँ।
तुमने मेरी अभिलाषाएँ पूर्ण की हैं तथा मेरी रक्षा की है। इसमें मुझे संदेह नहीं है कि मैं अब यहाँ और भी सुख से रहूँगी।
परंतु मैं बहुत दिनों से घूम रही हूँ।
मेरे छोटे – छोटे दो बच्चे पिताजी के घर हैं।
वे अपने पिता के वियोग से दुःखी रहते होंगे। न जाने उनकी क्या दशा होगी !
आप यदि मेरा हित करना चाहती हैं तो मुझे विदर्भ देश में भेजकर मेरी इच्छा पूर्ण कीजिये।
राजमाता बहुत प्रसन्न हुईं।
उन्होंने अपने पुत्र से कहकर पालकी मंगवाई। भोजन, वस्त्र और बहुत – सी वस्तुएँ देकर एक बड़ी सेना के संरक्षण में दमयन्ती को विदा कर दिया।
विदर्भ देश में दमयन्ती का बड़ा सत्कार हुआ।
दमयन्ती अपने भाई, बच्चे, माता – पिता और सखियों से मिली। उसने देवता और ब्राह्मणों की पूजा की।🕉️🙏
राजा भीम को अपनी पुत्री के मिल जाने से बड़ी प्रसन्नता हुई।
उन्होंने सुदेव नामक ब्राह्मण को एक हजार गौएँ, गाँव तथा धन देकर संतुष्ट किया।
हमने नल दमयंती की कहानी में अब तक जाना नल का रूप बदलना।
अब हम आगे की कहानी ( नल दमयंती की कथा) में जानेंगे नल की खोज ऋतुपर्ण की विदर्भ यात्रा। और कलयुग का उतरना।
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भाग 8 : नल की खोज ।
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अपने पिता के घर एक दिन विश्राम करके दमयन्ती ने अपनी माता से कहा कि माताजी !
मैं आपसे सत्य कहती हूँ।
यदि आप मुझे जीवित रखना चाहती हैं तो मेरे पतिदेव को ढुढ़वाने का उद्योग कीजिये।
रानी ने बहुत दुःखित होकर अपने पति राजा भीम से कहा कि ‘स्वामिन् !
दमयन्ती अपने पति के लिये बहुत व्याकुल है।
उसने संकोच छोड़कर मुझसे कहा है कि उन्हें ढूंढ़वाने का उद्योग करना चाहिये।
‘राजा ने अपने आश्रित ब्राह्मणों को बुलवाया और नल को ढूँढ़ने के लिये उन्हें नियुक्त कर दिया।
ब्राह्मणों ने दमयन्ती के पास जाकर कहा कि अब हम राजा नल का पता लगाने के लिये जा रहे हैं।
दमयन्ती ने ब्राह्मणों से कहा कि आप लोग जिस राज्य में जायँ, वहाँ मनुष्यों की भीड़ में यह बात कहें –
मेरे प्यारे छलिया !
तुम मेरी साड़ी में से आधी फाड़कर तथा मुझ दासी को वन में सोती छोड़कर कहाँ चले गये ?
तुम्हारी वह दासी अब भी उसी अवस्था में आधी साड़ी पहने तुम्हारे आने की बाट जोह रही है और तुम्हारे वियोग के दुःख से दुःखी हो रही है।
उनके सामने मेरी दशा का वर्णन कीजियेगा और ऐसी बात कहियेगा, जिससे वे प्रसन्न हों और मुझ पर कृपा करें।
मेरी बात कहने पर यदि आप लोगों को कोई उत्तर दे तो वह कौन है, कहाँ रहता है –
इन बातों का पता लगा लीजियेगा और उसका उत्तर याद रखकर मुझे सुनाइयेगा।
इस बात का भी ध्यान रखियेगा कि आप लोग यह बात मेरी आज्ञा से कह रहे हैं, यह उसे मालूम न होने पावे।
ब्राह्मणगण दमयन्ती के निर्देशानुसार राजा नल को ढूँढ़ने के लिये निकल पड़े।
बहुत दिनों तक ढूँढ़ने – खोजने के बाद पर्णाद नामक ब्राह्मण ने महल में आकर दमयन्ती से कहा- राजकुमारी !
मैं आपके निर्देशानुसार निषध नरेश नल का पता लगाता हुआ अयोध्या जा पहुँचा।
वहाँ मैंने राजा ऋतुपर्ण के पास जाकर भरी सभा में तुम्हारी बात दोहराई।
परंतु वहाँ किसी ने कुछ उत्तर नहीं दिया। जब मैं चलने लगा, तब उसके बाहुक नामक सारथि ने मुझे एकान्त में बुलाकर कुछ कहा।
देवि !
वह सारथि राजा ऋतुपर्ण के घोड़ों को शिक्षा देता है, स्वादिष्ट भोजन बनाता है ;
परंतु उसके हाथ छोटे और शरीर कुरूप है।
उसने लम्बी साँस लेकर रोते हुए कहा कि कुलीन स्त्रियाँ घोर कष्ट पाने पर भी अपने शील की रक्षा करती हैं और अपने सतीत्व के बलपर स्वर्ग जीत लेती हैं।
कभी उनका पति त्याग भी दे तो वे क्रोध नहीं करतीं, अपने सदाचार की रक्षा करती हैं।
त्यागने वाला पुरुष विपत्ति में पड़ने के कारण दुःखी और अचेत हो रहा था, इसलिये उसपर क्रोध करना उचित नहीं है।
माना कि पति ने अपनी पत्नी का योग्य सत्कार नहीं किया। परंतु वह उस समय राज्यलक्ष्मी से च्युत, क्षुधातुर, दुःखी और दुर्दशाग्रस्त था।
ऐसी अवस्था में उस पर क्रोध करना उचित नहीं है।
जब वह अपनी प्राण रक्षा के लिये जीविका चाह रहा था, तब पक्षी उसके वस्त्र लेकर उड़ गये। उसके हृदय की पीड़ा असह्य थी।
राजकुमारी !
बाहुक की यह बात सुनकर मैं तुम्हें सुनाने के लिये आया हूँ। तुम जैसा उचित समझो, करो। चाहो तो महाराज से भी कह दो।
ब्राह्मण की बात सुनकर दमयन्ती की आँखों में आँसू भर आये।
उसने अपनी माँ से एकान्त में कहा –
माताजी !
आप यह बात पिताजी से न कहें। मैं सुदेव ब्राह्मण को इस काम में नियुक्त करती हूँ।
जैसे सुदेव ने मुझे शुभ मुहूर्त में यहाँ पहुँचाया था, वैसे ही वह शुभ शकुन देखकर अयोध्या जाय और मेरे पतिदेव को लाने की युक्ति करे।
इसके बाद दमयन्ती ने पर्णाद का सत्कार करके उसे विदा किया और सुदेव को बुलाया।
दमयन्ती ने सुदेव से कहा – ब्राह्मण देवता !
आप शीघ्र – से – शीघ्र अयोध्या नगरी में जाकर राजा ऋतुपर्ण से यह बात कहिये कि भीम – पुत्री दमयन्ती फिर से स्वयंवर में स्वेच्छानुसार पति – वरण करना चाहती है।
बड़े – बड़े राजा और राजकुमार जा रहे हैं।
स्वयंवर की तिथि कल ही है।
इसलिये यदि आप पहुँच सके तो वहाँ जाइये। नल के जीने अथवा मरने का किसी को पता नहीं है, इसलिये वह कल सूर्योदय के समय दूसरा पति वरण करेगी।
दमयन्ती की बात सुनकर सुदेव अयोध्या गये और उन्होंने राजा ऋतुपर्ण से सब बातें कह दीं।
राजा ऋतुपर्ण ने सुदेव ब्राह्मण की बात सुनकर बाहुक को बुलाया और मधुर वाणी से समझाकर कहा कि बाहुक !
कल दमयन्ती का स्वयंवर है। मैं एक ही दिन में विदर्भ देश में पहुँचना चाहता हूँ।
परंतु यदि तुम इतनी जल्दी वहाँ पहुँच जाना सम्भव समझो, तभी मैं वहाँ जाऊँगा।
ऋतुपर्ण की बात सुनकर नल का कलेजा फटने लगा।
उन्होंने अपने मन में सोचा कि दमयन्ती ने दुःख से अचेत होकर ही ऐसा कहा होगा ।
सम्भव है, वह ऐसा करना चाहती हो।
परंतु नहीं नहीं, उसने मेरी प्राप्ति के लिये ही यह युक्ति की होगी। वह पतिव्रता, तपस्विनी और दीन है।
मैंने दुर्बुद्धिवश उसे त्यागकर बड़ी क्रूरता की। अपराध मेरा ही है। वह कभी ऐसा नहीं कर सकती।
अस्तु, सत्य क्या है, असत्य क्या है – यह बात तो वहाँ जाने पर ही मालूम होगी।
परंतु ऋतुपर्ण की इच्छा पूरी करने में मेरा भी स्वार्थ है।
बाहुक ने हाथ जोड़कर कहा कि मैं आपके कथनानुसार काम करने की प्रतिज्ञा करता हूँ।
बाहुक अश्वशाला में जाकर श्रेष्ठ घोड़ों की परीक्षा करने लगे। नल ने अच्छी जाति के चार शीघ्रगामी घोड़े रथ में जोत लिये।
राजा ऋतुपर्ण रथपर सवार हो गये। जैसे आकाशचारी पक्षी आकाश में उड़ते हैं, वैसे ही बाहुक का रथ थोड़े ही समय में नदी, पर्वत और वनों को लाँघने लगा।
एक स्थान पर राजा ऋतुपर्ण का दुपट्टा नीचे गिर गया।
उन्होंने बाहुक से कहा – ‘रथ रोको, मैं वार्ष्णेय से उसे उठवा मँगाऊँ।
नल ने कहा – आपका वस्त्र गिरा तो अभी है, परंतु अब हम वहाँ से एक योजन आगे निकल आये हैं। अब वह नहीं उठाया जा सकता।
जिस समय यह बात हो रही थी, उस समय वह रथ एक वन में चल रहा था।
ऋतुपर्ण ने कहा – बाहुक !
तुम मेरी गणित – विद्या की चतुराई देखो। सामने के वृक्ष में जितने पत्ते और फल दीख रहे हैं, उनकी अपेक्षा भूमि पर गिरे हुए फल और पत्ते एक सौ एक गुने अधिक हैं।
इस वृक्ष की दोनों शाखाओं और टहनियों पर पाँच करोड़ पत्ते हैं और दो हजार पंचानबे फल हैं। तुम्हारी इच्छा हो तो गिन लो।
बाहुक ने रथ खड़ा कर दिया और कहा कि मैं इस बहेड़े के वृक्ष को काटकर इनके फलों और पत्तों को ठीक – ठीक गिनकर निश्चय करूँगा।
बाहुक ने वैसा ही किया। फल और पत्ते उतने ही हुए, जितने राजा ने बतलाये थे।
नल आश्चर्यचकित हो गये।
बाहुक ने कहा – आपकी विद्या अद्भुत है। आप अपनी विद्या बतला दीजिये।
ऋतुपर्ण ने कहा- गणित विद्या की ही तरह मैं पासो की वशीकरण – विद्या में भी ऐसा ही निपुण हूँ।
बाहुक ने कहा कि आप मुझे यह विद्या सिखा दें तो मैं आपको घोड़ों की भी विद्या सिखा दूं।
ऋतुपर्ण को विदर्भ देश पहुँचने की बहुत जल्दी थी और अश्वविद्या सीखने का लोभ भी था, इसलिये उन्होंने राजा नल को पासों की विद्या सिखा दी और कह दिया कि, अश्वविद्या तुम मुझे पीछे सिखा देना।
मैंने उसे तुम्हारे पास धरोहर छोड़ दिया। जिस समय राजा नल ने पासों की विद्या सीखी, उसी समय कलियुग कर्कोटक नाग के तीखे विष को उगलता हुआ नल के शरीर से बाहर निकल गया।
कलियुग के बाहर निकलने पर नल को बड़ा क्रोध आया और उन्होंने उसे शाप देना चाहा।
कलियुग दोनों हाथ जोड़कर भय से काँपता हुआ कहने लगा –
आप क्रोध शान्त कीजिये, मैं आपको यशस्वी बनाऊँगा। आपने जिस समय दमयन्ती का त्याग किया था, उसी समय उसने मुझे शाप दे दिया था।
मैं बड़े दुःख के साथ कर्कोटक नाग के विष से जलता हुआ आपके शरीर में रहता था।
मैं आपकी शरण में हूँ, मेरी प्रार्थना सुनें और मुझे शाप न दें। जो आपके पवित्र चरित्र का गान करेंगे, उन्हें मेरा भय नहीं होगा।
राजा नल ने क्रोध शान्त किया।
कलियुग भयभीत होकर बहेड़े के पेड़ में घुस गया। यह संवाद कलियुग और नल के अतिरिक्त और किसी को मालूम नहीं हुआ।
वह वृक्ष ढूँठ – सा हो गया।
इस प्रकार कलियुग ने राजा नल का पीछा छोड़ दिया, परंतु अभी उनका रूप नहीं बदला था।
उन्होंने अपने रथ को जोर से हाँका और सायंकाल होते – न – होते वे विदर्भ देश में जा पहुँचे।
राजा भीम के पास समाचार भेजा गया। उन्होंने ऋतुपर्ण को अपने यहाँ बुला लिया।
ऋतुपर्ण के रथ की झंकार से दिशाएँ गूंज उठीं।
कुण्डिन नगर में राजा नल के वे घोड़े भी रहते थे, जो उनके बच्चों को लेकर आये थे।
रथ की घरघराहट से उन्होंने राजा नल को पहचान लिया और वे पूर्ववत् प्रसन्न हो गये। दमयन्ती को भी वह आवाज वैसी ही जान पड़ी।
दमयन्ती कहने लगी कि इस रथ की घरघराहट मेरे चित्त में उल्लास पैदा करती है, अवश्य ही इसको हाँकने वाले मेरे पतिदेव हैं।
यदि आज वे मेरे पास नहीं आयेंगे तो मैं इस धधकती आग में कूद पडूंगी।
मैंने कभी हँसी – खेल में भी उनसे झूठ बात कही हो, उनका कोई अपकार किया हो, प्रतिज्ञा करके तोड़ दी हो, ऐसी याद नहीं आती।
वे शक्तिशाली, क्षमावान, वीर, दाता और एक पत्नीव्रती हैं। उनके वियोग से मेरी छाती फट रही है।
दमयन्ती महल की छत पर चढ़कर रथ का आना और उस पर से रथी – सारथि का उतरना देखने लगी।
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भाग 9 : दमयन्ती के द्वारा राजा नल की परीक्षा पहचान और मिलन ।
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विदर्भ – नरेश भीम ने अयोध्याधिपति ऋतुपर्ण का खूब स्वागत – सत्कार किया। ऋतुपर्ण को अच्छे स्थान में ठहरा दिया गया। उन्हें कुण्डिन पुर में स्वयंवर का कोई चिह्न नहीं दिखाई पड़ा।
भीम को इस बात का बिलकुल पता नहीं था कि राजा ऋतुपर्ण मेरी पुत्री के स्वयंवर का निमन्त्रण पाकर यहाँ आये हैं।
उन्होंने कुशल – मङ्गल के बाद पूछा कि आप यहाँ किस उद्देश्य से पधारे हैं ? ‘ ऋतुपर्ण ने स्वयंवर की कोई तैयारी न देखकर निमन्त्रण की बात दबा दी और कहा –
मैं तो केवल आपको प्रणाम करने के लिये ही चला आया हूँ। भीम सोचने लगे कि सौ योजन से भी अधिक दूर कोई प्रणाम करने के लिये नहीं आ सकता। अस्तु, आगे चलकर यह बात खुल ही जायगी।
भीम ने बड़े सत्कार के साथ आग्रह करके ऋतुपर्ण को अपने यहाँ रख लिया। बाहुक भी वार्ष्णेय के साथ अश्वशाला में ठहर कर घोड़ों की सेवा में संलग्न हो गया।
दमयन्ती आकुल होकर सोचने लगी कि रथ की ध्वनि तो मेरे पतिदेव के रथ के ही समान जान पड़ती थी, परंतु उनके कहीं दर्शन नहीं हो रहे हैं।
हो – न – हो वार्ष्णेय ने उनसे रथ – विद्या सीख ली होगी, इसी कारण रथ उनका मालूम पड़ता था।
सम्भव है, ऋतुपर्ण को भी यह विद्या मालूम हो। उसने अपनी दासी को बुलाकर कहा कि केशिनी !
तू जा।
इस बात का पता लगा कि वह कुरूप पुरुष कौन है। सम्भव है, ये ही हमारे पतिदेव हों।
मैंने ब्राह्मणों के द्वारा जो संदेश भेजा था, वही उसे बतलाना और उसका उत्तर सुनकर मुझसे कहना।
केशिनी ने जाकर बाहुक से बातें कीं।
बाहुक ने राजा के आने का कारण बताया और संक्षेप में वार्ष्णेय तथा अपनी अश्वविद्या एवं भोजन बनाने की चतुरता का परिचय दिया।
केशिनीने पूछा- बाहुक !
राजा नल कहाँ हैं ?
क्या तुम जानते हो ?
अथवा तुम्हारा साथी वार्ष्णेय जानता है ?
बाहुक ने कहा – केशिनी !
वाष्र्णेय राजा नल के बच्चे को यहाँ छोड़कर चला गया था। उसे उनके सम्बन्ध में कुछ भी मालूम नहीं है।
इस समय नल का रूप बदल गया है। वे छिपकर रहते हैं। उन्हें या तो स्वयं वे ही पहचान सकते हैं या उनकी पत्नी दमयन्ती।
क्योंकि वे अपने गुप्त चिह्नों को दूसरों के सामने प्रकट करना नहीं चाहते।
केशिनी !
राजा नल विपत्ति में पड़ गये थे। इसी से उन्होंने अपनी पत्नी का त्याग किया था।
दमयन्ती को अपने पति पर क्रोध नहीं करना चाहिये। जिस समय वे भोजन की चिन्ता में थे, पक्षी उनके वस्त्र लेकर उड़ गये। उनका हृदय पीड़ा से जर्जरित था।
यह ठीक है कि उन्होंने अपनी पत्नी के साथ उचित व्यवहार नहीं किया।
फिर भी दमयन्ती को उनकी दुरवस्था पर विचार करके क्रोध नहीं करना चाहिये। यह कहते नल का हृदय खिन्न हो गया। आँखों में आँसू आ गये, वे रोने लगे।😭
केशिनी ने दमयन्ती के पास आकर वहाँ की सब बातचीत और उनका रोना भी बतलाया। अब दमयन्ती की आशंका और भी दृढ़ होने लगी कि यही राजा नल हैं।
उसने दासी से कहा कि केशिनी !
तुम फिर बाहुक के पास जाओ और उसके पास बिना कुछ बोले खड़ी रहो। उसकी चेष्टाओं पर ध्यान दो।
वह आग माँगे तो मत देना। जल माँगे तो देर कर देना। उसका एक – एक चरित्र मुझे आकर बताओ।
केशिनी फिर बाहुक के पास गई और वहाँ उसके देवताओं एवं मनुष्यों के समान बहुत – से चरित्र देखकर लौट आई और दमयन्ती से कहने लगी राजकुमारी !
बाहुक ने तो जल, थल और अग्नि पर सब तरह से विजय प्राप्त कर ली है। मैंने आज तक ऐसा पुरुष न कहीं देखा है और न सुना ही है।
यदि कहीं नीचा द्वार आ जाता है तो वह झुकता नहीं, उसे देखकर द्वार ही ऊँचा हो जाता है।
वह बिना झुके ही चला जाता है।
छोटे – से – छोटा छेद भी उसके लिये गुफा बन जाता है।
वहाँ जल के लिये जो घड़े रखे थे, वे उसकी दृष्टि पड़ते ही जल से भर गये।
उसने फूस का पूला लेकर सूर्य की ओर किया और वह जलने लगा।
इसके अतिरिक्त वह अग्नि का स्पर्श करके भी जलता नहीं है। पानी उसके इच्छानुसार बहता है।
वह जब अपने हाथ से फूलों को मसलने लगता है, तब वे कुम्हलाते नहीं और प्रफुल्लित तथा सुगन्धित दीखते हैं।
इन अद्भुत लक्षणों को देखकर मैं तो भौंचक्की – सी रह गई और बड़ी शीघ्रता से तुम्हारे पास चली आई।
दमयन्ती बाहुक के कर्म और चेष्टाओं को सुनकर निश्चित रूप से जान गई कि ये अवश्य ही मेरे पतिदेव हैं।
उसने केशिनी के साथ अपने दोनों बच्चों को नल के पास भेज दिया।
बाहुक इन्द्रसेना और इन्द्रसेन को पहचान कर उनके पास आ गया और दोनों बालकों को छाती से लगाकर गोद में बैठा लिया। बाहुक अपनी संतानों से मिलकर घबरा गया और रोने लगा।
उसके मुख पर पिता के समान स्नेह के भाव प्रकट होने लगे।
तदनन्तर बाहुक ने दोनों बच्चे केशिनी को दे दिये और कहा –
ये बच्चे मेरे दोनों बच्चों के समान ही हैं, इसलिये मैं इन्हें देखकर रो पड़ा।
केशिनी !
तुम बार – बार मेरे पास आती हो, लोग न जाने क्या सोचने लगेंगे।
इसलिये यहाँ मेरे पास बार – बार आना उत्तम नहीं है।
तुम जाओ।
केशिनी ने दमयन्ती के पास आकर वहाँ की सारी बातें कह दीं। अब दमयन्ती ने केशिनी को अपनी माता के पास भेजा और कहलवाया कि माताजी !
मैंने राजा नल समझकर बार – बार बाहुक की परीक्षा करवाई है।
अब मुझे केवल उसके रूप के सम्बन्धमें ही संदेह रह गया है।
अब मैं स्वयं उसकी परीक्षा करना चाहती हूँ।
इसलिये आप बाहुक को मेरे महल में आने की आज्ञा दे दीजिये अथवा उसके पास ही जाने की आज्ञा दे दीजिये।
आपकी इच्छा हो तो यह बात पिताजी को बतला दीजिये अथवा मत बतलाइये।
रानी ने अपने पति भीम से अनुमति ली और बाहुक को रनिवास में बुलवाने की आज्ञा दे दी।
बाहुक बुला लिया गया।
दमयन्ती के देखते ही नल का हृदय एक साथ ही शोक और दुःख से भर आया। वे आँसुओं से नहा गये।😭
बाहुक की आकुलता देखकर दमयन्ती भी शोकग्रस्त हो गई।
उस समय दमयन्ती गेरुआ वस्त्र पहने हुए थी। केशों की जटा बँध गई शरीर मलिन था।
दमयन्ती ने कहा – बाहुक !
पहले एक धर्मज्ञ पुरुष अपनी पत्नी को वन में सोती छोड़कर चला गया था।
क्या कहीं तुमने उसे देखा है ?
उस समय वह स्त्री थकी – माँदी थी, नींद से अचेत थी ;
ऐसी निरपराध स्त्री को पुण्यश्लोक निषध नरेश के सिवा और कौन पुरुष निर्जन वन में छोड़ सकता है ?
मैंने जीवन – भर में जान – बूझकर उनका कोई भी अपराध नहीं किया है।
फिर भी वे मुझे वन में सोती छोड़कर चले गये।
इतना कहते – कहते दमयन्ती के नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई।
दमयन्ती के विशाल, साँवले एवं रतनारे नेत्रों से आँसू टपकते देखकर नल से रहा न गया।
वे कहने लगे – ‘ प्रिये !
मैंने जान – बूझकर न तो राज्य का नाश किया है और न तो तुम्हें त्यागा है। यह तो कलियुग की करतूत है।
मैं जानता हूँ कि जबसे तुम मुझसे बिछुड़ी हो, तब से रात – दिन मेरा ही स्मरण – चिन्तन करती रहती हो।
कलियुग मेरे शरीर में रहकर तुम्हारे शाप के कारण जलता रहता था। मैंने उद्योग और तपस्या के बल से उस पर विजय पा ली है और अब हमारे दुःख का अन्त आ गया है।
कलियुग अब मुझे छोड़कर चला गया है, मैं एकमात्र तुम्हारे लिये ही यहाँ आया हूँ।
यह तो बतलाओ कि तुम मेरे – जैसे प्रेमी और अनुकूल पति को छोड़कर जिस प्रकार दूसरे पति से विवाह करने के लिये तैयार हुई हो, क्या कोई दूसरी स्त्री ऐसा कर सकती है ?
तुम्हारे स्वयंवर का समाचार सुनकर ही तो राजा ऋतुपर्ण बड़ी शीघ्रता के साथ यहाँ आये हैं।
दमयन्ती ने हाथ जोड़कर कहा – 🙏 आर्यपुत्र!
मुझ पर दोष लगाना उचित नहीं है। आप जानते हैं कि मैंने अपने सामने प्रकट देवताओं को छोड़कर आपको वरण किया है।
मैंने आपको ढूँढ़ने के लिये बहुत – से ब्राह्मणों को भेजा था और वे मेरी कही बात दुहराते हुए चारों ओर घूम रहे थे।
पर्णाद नामक ब्राह्मण अयोध्यापुरी में आपके पास भी पहुंचा था। उसने आपको मेरी बातें सुनाई थीं और आपने उनका यथोचित उत्तर भी दिया था।
वह समाचार सुनकर मैंने आपको बुलाने के लिये ही यह युक्ति की थी। मैं जानती हूँ कि आपके अतिरिक्त दूसरा कोई मनुष्य नहीं है, जो एक दिन में घोड़ों के रथ से सौ योजन पहुँच जाय।
मैं आपके चरणों में स्पर्श करके शपथपूर्वक सत्य – सत्य कहती हूँ कि मैंने कभी मन से भी पर पुरुष का चिन्तन नहीं किया है।
यदि मैंने कभी मन से भी पाप कर्म किया हो तो निरन्तर भूमि पर विचरने वाले वायुदेव, भगवान् सूर्य और मन के देवता चन्द्रमा मेरे प्राणों का नाश कर दें।
ये तीनों देवता सकल भूमण्डल में विचरते हैं।
वे सच्ची बात बतला दें और यदि मैं पापिनी होऊँ तो मुझे त्याग दें।
उसी समय वायु ने अन्तरिक्ष में स्थित होकर कहा – राजन् ।
मैं सत्य कहता हूँ कि दमयन्ती ने कोई पाप नहीं किया है। इसने तीन वर्ष तक अपने उज्ज्वल शीलवत की रक्षा की है।
हम लोग इसके रक्षक रूप में रहे हैं और इसकी पवित्रता के साक्षी हैं।
इसने स्वयंवर की सूचना तो तुम्हें ढूँढ़ने के लिये ही दी थी।
वास्तव में दमयन्ती तुम्हारे योग्य है और तुम दमयन्ती के योग्य हो। कोई शंका न करो और इसे स्वीकार करो।
जिस समय पवन – देवता यह बात कह रहे थे, उस समय आकाश से पुष्पों की वर्षा होने लगी, देवताओं की दुन्दुभियाँ बजने लगीं। शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चलने लगी।
ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर राजा नल ने अपना संदेह छोड़ दिया और नागराज कर्कोटक का दिया हुआ वस्त्र ओढ़कर उसका स्मरण किया। उनका शरीर तुरंत पूर्ववत् हो गया।
दमयन्ती राजा नल को पहले रूप में देखकर उनसे लिपट गई और रोने लगी।💞😭
राजा नल ने भी प्रेम के साथ दमयन्ती को गले से लगाया और दोनों बालकों को छाती से लिपटाकर उनके साथ प्यार की बातें करने लगे।
सारी रात दमयन्ती के साथ बातचीत करने में ही बीत गई।
प्रातःकाल होने पर नहा – धो कर सुन्दर वस्त्र पहनकर दमयन्ती और राजा नल भीम के पास गये और उनके चरणों में प्रणाम किया।🙏
भीम ने बड़े आनन्द से उनका सत्कार किया और आश्वासन दिया।
बात – ही- बात में यह समाचार सर्वत्र पहुँच गया।
नगर के नर – नारी आनन्द में भरकर उत्सव मनाने लगे। देवताओं की पूजा हुई।🕉️🙏
जब राजा ऋतुपर्ण को यह बात मालूम हुई कि बाहुक के रूप में तो राजा नल ही थे, यहाँ आकर वे अपनी पत्नी से मिल गये, तब उन्हें बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने नल को अपने पास बुलवाकर क्षमा माँगी।
राजा नल ने उनके व्यवहारों की उत्तमता बताकर प्रशंसा की और उनका सत्कार किया। साथ ही उन्हें अश्वविद्या भी सिखा दी।
राजा ऋतुपर्ण किसी दूसरे सारथि को लेकर अपने नगर चले गये।
राजा नल एक महीने तक कुण्डिन नगर में ही रहे।
तदनन्तर अपने ससुर भीम की आज्ञा लेकर थोड़े – से लोगों को साथ ले निषध देश के लिये रवाना हुए।
राजा भीम ने एक श्वेतवर्ण का रथ, सोलह हाथी, पचास घोड़े और छः सौ पैदल राजा नल के साथ भेज दिये।
अपने नगर में प्रवेश करके राजा नल पुष्कर से मिले और बोले कि या तो तुम कपटभरे जुए का खेल फिर मुझसे खेलो या धनुष पर डोरी चढ़ाओ।
पुष्कर ने हँसकर कहा –
अच्छी बात है, तुम्हें दाँवो पर लगाने के लिये फिर धन मिल गया। आओ, अबकी बार तुम्हारे धन तथा दमयन्ती को भी जीत लूँगा।
राजा नल ने कहा – अरे भाई।
जूआ खेल लो, बकते क्या हो !
हार जाओगे तो तुम्हारी क्या दशा होगी, जानते हो ?
जूआ होने लगा, राजा नल ने पहले ही दाव में पुष्कर के राज्य, रत्नों के भण्डार और उसके प्राणों को भी जीत लिया।
उन्होंने पुष्कर से कहा कि यह सब राज्य मेरा हो गया। अब तुम दमयन्ती की ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सकते।
तुम दमयन्ती के सेवक हो।
अरे मूढ़ !
पहली बार भी तुमने मुझे नहीं जीता था। वह काम कलियुग का था, तुम्हें इस बात का पता नहीं है।
मैं कलियुग के दोष को तुम्हारे सिर नहीं मढ़ना चाहता। तुम अपना जीवन सुख से बिताओ, मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ।
तुम पर मेरा प्रेम पहले के ही समान है। तुम मेरे भाई हो। मैं कभी तुम पर अपनी आँख टेढ़ी नहीं करूंगा। तुम सौ वर्ष तक जीओ।
राजा नल ने इस प्रकार कहकर पुष्कर को धैर्य दिया और उसे अपने हृदय से लगाकर जाने की आज्ञा दे दी।
पुष्कर ने हाथ जोड़कर राजा नल को प्रणाम किया और कहा- 🙏
जगत् में आपकी अक्षय कीर्ति हो और आप दस हजार वर्ष तक सुख से जीवित रहें। आप मेरे अन्नदाता और प्राणदाता हैं।
पुष्कर बड़े सत्कार और सम्मान के साथ एक महीने तक राजा नल के नगर में ही रहा।
तदनन्तर सेना, सेवक और कुटुम्बियों के साथ अपने नगर में चला गया।
राजा नल भी पुष्कर को पहुँचाकर अपनी राजधानी में लौट आये।
सभी नागरिक, साधारण प्रजा तथा मन्त्रि मण्डल के लोग राजा नल को पाकर बहुत प्रसन्न हुए।
उन्होंने रोमाञ्चित शरीर से हाथ जोड़कर राजा नल से निवेदन किया राजेन्द्र ! 🙏
आज हम लोग दुःख से छुटकारा पाकर सुखी हुए हैं। जैसे सब आये हैं। देवता इन्द्र की सेवा करते हैं, वैसे ही हम आपकी सेवा करने के लिये हम।
घर – घर आनन्द मनाया जाने लगा। चारों ओर शान्ति फैल गई। बड़े – बड़े उत्सव होने लगे।
राजा नल ने सेना भेजकर दमयन्ती को बुलवाया। राजा भीम ने अपनी पुत्री को बहुत – सी वस्तुएँ देकर ससुराल भेज दिया।
दमयन्ती अपनी दोनों संतानों को लेकर महल में आ गई। राजा नल बड़े आनन्द के साथ समय बिताने लगे। राजा नल की ख्याति दूर – दूर तक फैल गई।
वे धर्मबुद्धि से प्रजा का पालन करने लगे। उन्होंने बड़े – बड़े यज्ञ करके भगवान् की आराधना की।
बृहदश्वजी कहते हैं – युधिष्ठिर !
तुम्हें भी थोड़े ही दिनों में तुम्हारा राज्य और सगे – सम्बन्धी मिल जायेंगे।
राजा नल ने जूआ खेलकर बड़ा भारी दुःख मोल ले लिया था। उसे अकेले ही सब दुःख भोगना पड़ा ;
परंतु तुम्हारे साथ तो भाई हैं, द्रौपदी है और बड़े – बड़े विद्वान् तथा सदाचारी ब्राह्मण हैं।
ऐसी दशा में शोक करने का तो कोई कारण ही नहीं है। संसार की स्थितियाँ सर्वदा एक – सी नहीं रहतीं।
यह विचार करके भी उनकी अभिवृद्धि और ह्रास से चिन्ता नहीं करनी चाहिये।
नागराज कर्कोटक, दमयन्ती, नल और ऋतुपर्ण की यह कथा कहने – सुनने से कलियुग के पापो का नाश होता है और दुःखी मनुष्यों को धैर्य मिलता है। इस प्रकार नल और दमयंती की कथा सम्पूर्ण हुई।
युधिष्ठिर बोले महाराज मेरी एक शंका अभी भी बनी हुई है वह यह है कि नल और दमयंती पूर्व जन्म में कौन थे ?
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भाग 10 राजा नल और दमयन्ती के पूर्वजन्म की कथा
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युधिष्ठिर व अन्य के मन की अग्नि शांत हुई। वे मौन बैठे थे—नेत्र झुके हुए, श्वास भारी। तभी महर्षि वृहदश्व ने उन्हें ध्यान से देखा। उनके नेत्रों में करुणा थी, स्वर में शांति।
वृहदश्व बोले, "बहुत प्राचीन काल की बात है। हिमालय की तराई में एक आश्रम था—शांत, पवित्र और नियमबद्ध। इस पर्वत के पास ‘आहुक’ नाम का एक भील रहता था। उसकी परम सुन्दरी स्त्री का नाम आहुआ था। वह बड़ी पतिव्रता तथा धर्मशील थी। दोनों ही पति-पत्नी बड़े शिवभक्त तथा अतिथि सेवक थे।
एक बार भगवान शिव ने उनकी परीक्षा लेने का विचार किया। उन्होंने एक यति-मानव का रूप धारण किया और संध्या के समय उन दोनों के घर पर जा कर कहने लगे - “भील तुम्हारा कल्याण हो मैं आज रात भर यहीं रुकना चाहता हूं। क्या तुम दया कर एक रात मुझे अपने यहाँ रहने के लिए स्थान दे सकते हो?”
इसपर भील ने उनके भीमकाय शरीर को देखकर कहा कहा “स्वामिन मेरे पास स्थान बहुत थोड़ा है। उसमें आप कैसे रह सकते हैं।
यह सुनकर निराश हुए यति चलने को ही थे कि उस भील की स्त्री ने अपने पति से कहा
“स्वामी !
यति को लौटाइये नहीं;
तनिक गृहस्थ धर्म का विचार कीजिए, ऐसा उचित नहीं होगा।
इसलिए आप दोनों तो घर के भीतर रुक जाइए, मैं अपनी रक्षा के लिए कुछ बड़े अस्त्र-शस्त्रों को लेकर दरवाजे पर बैठी रह जाऊंगी।
उस भील ने मन में सोचा, बात यह ठीक ही कहती है; लेकिन इसको बाहर रखकर घर में मेरा रहना ठीक नहीं है, क्योंकि यह अबला है। अतः उसने यति तथा अपनी स्त्री को घर के भीतर रखा और स्वयं शस्त्र धारण कर बाहर बैठा रहा।
दुर्भाग्य से भील दम्पत्ति की वह आखिरी रात थी। थोड़ी रात बीतने पर हिंसक पशुओं ने, घर के बाहर बैठे उस भील पर भयानक आक्रमण किया और उसे मार डाला।
प्रातः काल होने पर यति और उस भील की स्त्री बाहर आए तो भील को मरा हुआ देखा।
यति इस पर बहुत दुखी हुए पर उस भील की पत्नी ने अपने आंसू छिपाते हुए उनसे कहा “महाराज इससे दुखी मत होइए ?
ऐसी मृत्यु तो बड़े ही भाग्य से प्राप्त होती है। अब मैं भी इनके साथ सती होने जा रही हूं। इसमें तो हम दोनों का ही परम कल्याण होगा।
ऐसा कहकर उसने अपने पति को चिता पर रखा और स्वयं भी वह उसी अग्नि में प्रविष्ट होने के लिए तैयार हो गई।
उसी समय भगवान शंकर डमरू, त्रिशूल आदि अपने आयुधों के साथ वहीँ प्रकट हो गए। उन्होंने बार-बार उस भीलनी से वर मांगने को कहा, पर वह कुछ ना बोल कर ध्यान मग्न हो गई।
🤴राजा नल का जन्म🌺
इस पर भगवान शिव ने उसे वरदान दिया कि “तुम दोनों का साथ चिरस्थायी होगा। अगले जन्म में तुम्हारा पति निषध देश के राजा वीरसेन का पुत्र नल होगा और तुम्हारा जन्म विदर्भ देश के राजा भीमसेन की पुत्री दमयंती के रूप में होगा।
यह यति भी वहां हंस के रूप में होगा और यही तुम दोनों का संयोग कराएगा। वहां तुम दोनों असीम राजसुखों का भोग कर के अंत में दुर्लभ मोक्ष पद को प्राप्त करोगे।
ऐसा कह कर ही भगवन शंकर वहीँ अचलेश्वर लिंग के रूप में स्थित हो गए और कालांतर में यह दोनों भील दंपति नल दमयंती के रूप में जन्म लिए।
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🙏🕉️हरि ॐ तत् सत्🕉️🙏
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वन की निस्तब्ध रात्रि थी। दावाग्नि की लाल लपटें दूर कहीं बुझ चुकी थीं, पर युधिष्ठिर के मन की अग्नि शांत नहीं हुई थी। वे मौन बैठे थे—नेत्र झुके हुए, श्वास भारी। तभी महर्षि वृहदश्व ने उन्हें ध्यान से देखा। उनके नेत्रों में करुणा थी, स्वर में शांति।
वृहदश्व बोले—
“राजन्, तुम वर्तमान के दुःख को देखकर अपने धर्म पर शंका कर बैठे हो। पर जो दिखाई देता है, वही सब कुछ नहीं होता। सुनो, मैं तुम्हें नल और दमयंती की एक और कथा सुनाता हूँ—उस जन्म की, जो इस जन्म से पहले था।”
युधिष्ठिर ने चौंककर ऊपर देखा। वन की हवा थम-सी गई, जैसे स्वयं प्रकृति सुनने को ठिठक गई हो।
वृहदश्व बोले, "बहुत प्राचीन काल की बात है। हिमालय की तराई में एक आश्रम था—शांत, पवित्र और नियमबद्ध। वहाँ एक तपस्वी दंपति रहते थे, जिनका जीवन व्रत, सेवा और अतिथि-सत्कार में बीतता था। वे दोनों अत्यंत सद्गुणी थे, किंतु अपने तप के अभिमान से अनभिज्ञ नहीं थे।
एक संध्या, जब सूर्य अस्त हो रहा था, एक थका हुआ अतिथि आश्रम के द्वार पर आया। देह धूल से सनी, नेत्र प्यास से सूखे। आश्रम में उस समय एक विशेष अनुष्ठान चल रहा था। अतिथि ने द्वार पर खड़े होकर पुकारा, पर अनुष्ठान की मर्यादा और अपने व्रत के गर्व में डूबे दंपति ने उसे प्रतीक्षा करने को कहा।
रात गहराती गई। अतिथि की पुकार क्षीण होती गई। अंततः वह बिना जल और अन्न के लौट गया—आहत, पर मौन।
उसी क्षण आकाश से एक गंभीर स्वर गूंजा—
“तप बिना करुणा के अधूरा है। व्रत बिना दया के अहंकार बन जाता है।”
तपस्वी दंपति काँप उठे। उन्हें बोध हुआ कि धर्म का सूक्ष्म तंतु उनसे टूट गया है। वे भूमि पर गिर पड़े और क्षमा याचना करने लगे। आकाशवाणी पुनः हुई—
“तुम्हारा तप नष्ट नहीं होगा, पर उसके अभिमान का फल तुम्हें भोगना होगा। अगले जन्म में तुम प्रेम पाओगे, पर वियोग भी। राजसुख पाओगे, पर पतन भी। और उसी दुःख में तुम्हारा तप पूर्ण होगा।”
वृहदश्व ने युधिष्ठिर की ओर देखा। उनके शब्द धीरे थे, पर गहरे।
“राजन्, वही तपस्वी अगले जन्म में नल और दमयंती बने। प्रेम अतुलनीय था, पर प्रारब्ध का ऋण शेष था। इसलिए जुए का अंधकार आया, वियोग की रात्रि आई, और वन का अकेलापन भी।”
युधिष्ठिर की आँखें भर आईं।
वृहदश्व आगे बोले—
“पर ध्यान दो, राजन्—वियोग के बाद मिलन भी आया। पतन के बाद उत्थान भी। क्योंकि जब अहंकार गल गया, तब धर्म पूर्ण हुआ।”
वन की हवा फिर चलने लगी। अग्नि की राख उड़कर आकाश में विलीन हो गई।
वृहदश्व ने अंतिम वाक्य कहा—
“जैसे नल ने दुःख को भोगकर धर्म नहीं छोड़ा, वैसे ही तुम भी मत छोड़ो। यह जन्म नहीं, कर्म की यात्रा है।”
युधिष्ठिर ने मस्तक झुका लिया। उस क्षण उनके दुःख का भार हल्का हो गया—क्योंकि अब वे केवल अपने नहीं, अनेक जन्मों के यात्री थे।
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