नल और दमयंती भाग 01

नल और दमयंती भाग 01

नैषध देश के पराक्रमी और धर्मनिष्ठ राजा वीरसेन का जीवन अत्यंत अनुशासित और आदर्श था। वे प्रतिदिन सूर्योदय से चार घड़ी पूर्व ही शय्या त्याग देते थे। ब्रह्ममुहूर्त में उठकर वे पहले प्रातःकर्मों से निवृत्त होते, तत्पश्चात एक सहस्र सूर्यनमस्कार कर अपने शरीर को सुदृढ़ और मन को एकाग्र बनाते। उसके बाद एक घड़ी तक मल्लयुद्ध का अभ्यास करते, जिससे उनकी भुजाएँ और भी सबल बनतीं। शरसंधान तथा असियुद्ध (तलवारबाज़ी) का नियमित अभ्यास उनके दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग था। इन सभी शारीरिक अभ्यासों के उपरांत वे शांत चित्त होकर गायत्री मंत्र का जप करते और ईश्वर का ध्यान करते।

जब यह नित्यकर्म पूर्ण हो जाता, तब महाराज वीरसेन महारानी वसुमती के महल में अल्पाहार के लिए जाते। यह केवल भोजन का समय न होकर पारिवारिक संवाद का भी अवसर होता था। महारानी वसुमती धर्मपरायण, सौम्य और बुद्धिमती थीं। वे राजा के स्वास्थ्य और राज्य की उन्नति दोनों का समान ध्यान रखती थीं।

अल्पाहार के पश्चात महाराज मंत्रणा-गृह में प्रवेश करते। वहाँ उनके आगमन से पूर्व ही महामात्य कुमारसेन, महामंत्री समर्थ तथा सेनापति उग्रसेन उपस्थित हो जाते। जैसे ही महाराज प्रवेश करते, तीनों आदरपूर्वक उठकर प्रणाम करते। महाराज उनके नमस्कार का स्वीकार कर सिंहासन पर विराजमान होते और संकेत मिलने पर तीनों अपने-अपने आसन ग्रहण करते।

वास्तव में ये तीनों ही महाराज वीरसेन के बाल्यकाल के सखा थे। चारों ने साथ-साथ खेलते हुए बाल्यकाल व्यतीत किया था। उन्होंने संजीवनी ऋषि के आश्रम में एक साथ शिक्षा प्राप्त की थी। वे केवल राजकीय अधिकारी ही नहीं, अपितु अंतरंग मित्र भी थे। इसी कारण महाराज राज्य-कार्य के अतिरिक्त पारिवारिक विषयों में भी उनका परामर्श लेते थे।

उस दिन जब राजकार्य की चर्चा समाप्त हुई, तो महामात्य कुमारसेन ने विनम्र स्वर में कहा,
“महाराज, आज आप कुछ चिंतित प्रतीत हो रहे हैं। यदि उचित समझें तो कारण बताने की कृपा करें।”

महाराज वीरसेन ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया,
“राजकुमार नल अब युवावस्था में प्रवेश कर चुके हैं। हमारी इच्छा है कि शीघ्र ही उन्हें राज्य-भार सौंपकर हम वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करें। परंतु उनके आचरण में अभी वह स्थिरता और गंभीरता नहीं दिखती जो एक सफल राजा में अपेक्षित होती है।”

यह सुनकर सेनापति उग्रसेन बोले,
“महाराज, ऐसा क्यों कहते हैं? कुमार नल शस्त्रविद्या में अद्वितीय हैं। वे जब रणभूमि में रिंगण लेते हैं, तो उनका भाला इतनी तीव्र गति से घूमता है कि चारों दिशाओं से छोड़े गए बाण भी उसी भाले के प्रहार से लौट जाते हैं। वे एक साथ चार तलवारधारियों का सामना कर उन्हें परास्त कर सकते हैं। युद्धनीति और कौशल में वे इतने प्रवीण हैं कि मगध जैसे विशाल राज्य की सेना को उन्होंने अल्प सैन्यबल के होते हुए भी पराजित कर दिया। उनकी योग्यता तो उन्हें चक्रवर्ती सम्राट बनने योग्य सिद्ध करती है।”

महामंत्री समर्थ ने भी समर्थन करते हुए कहा,
“महाराज, उन्होंने शिक्षा भी अल्प समय में पूर्ण की है। महामुनि बृहदश्व के आश्रम में आठ वर्षों तक रहकर उन्होंने शस्त्र-शास्त्र, अठारह विद्याएँ और चौंसठ कलाएँ आत्मसात कीं। शालिहोत्र मुनि से अश्वविद्या सीखी। संगीत, वादन, नृत्य, चित्रकला, शिल्पकला—इन सबमें वे दक्ष हैं।”

महामात्य ने आगे कहा,
“राजकार्यों में भी वे निपुण हैं। राजनीति, न्यायशास्त्र, नगर-रचना, वास्तुशास्त्र और सभा-नियम—इन सबमें वे पारंगत हैं। आपने जो भी दायित्व उन्हें सौंपा, उन्होंने सफलता से पूर्ण किया। फिर भी यदि आपके मन में संदेह है, तो अवश्य कोई गूढ़ कारण होगा।”

महाराज वीरसेन ने गहरी साँस लेते हुए कहा,
“तुम सबका कथन सत्य है। नल सर्वगुणसंपन्न हैं, किंतु एक सफल राजा के लिए दो और गुण अत्यंत आवश्यक हैं—निग्रह और संयम। इन्हीं दोनों का उनमें अभाव है। वे मृगया (शिकार) और द्यूत (जुआ) के प्रति अत्यधिक आसक्त हैं। कभी-कभी महत्वपूर्ण कार्य भी वे इनके कारण भूल जाते हैं। संयम की कमी का उदाहरण अंगदेश के राजा वरुण के प्रसंग में देख चुके हो। पराजित राजा को परंपरा के अनुसार राज्य लौटा देना चाहिए था, परंतु वरुण के अपमानजनक वचनों पर क्रोधित होकर नल ने उनका शिरच्छेद कर दिया।”

यह सुनकर सभा में क्षणभर मौन छा गया। तब महामात्य ने सुझाव दिया,
“महाराज, यदि उनका विवाह कर दिया जाए तो संभव है कि योग्य पत्नी के मार्गदर्शन से वे अधिक संयमी और उत्तरदायी बनें।”

महाराज इस प्रस्ताव पर विचार करने लगे।

उधर कुछ दिन पूर्व कुमार नल अपने चचेरे भाई, विदिशा के युवराज पुष्कर के साथ दिनभर मृगया में व्यस्त रहे थे। गांधार देश से आई वारुणी मदिरा का सेवन कर दोनों ने द्यूत-क्रीड़ा की। दांव पर लगी एक सुंदर दासी नल ने जीत ली, जिससे पुष्कर अप्रसन्न हुए। बाद में मद्रदेश से आई एक अन्य दासी उन्हें प्रदान कर उनकी नाराजगी शांत की गई।

उस रात नल देर तक जागते रहे और प्रातःकाल राज्यसभा में समय से उपस्थित न हो सके। जब महाराज वीरसेन रानी वसुमती के महल में पहुँचे, तब नल अभी-अभी निद्रा से जागे थे। महाराज ने रानी से कहा,
“यदि नल का विवाह हो जाए तो संभव है कि वे राज्य-भार संभालने के योग्य बनें।”

रानी वसुमती ने उत्तर दिया,
“महाराज, अनेक देशों की सुंदर राजकुमारियों के चित्र हमने उन्हें दिखाए, पर उन्हें कोई भी पसंद नहीं आई। उनके मन में कौन है, यह भी स्पष्ट नहीं।”

वास्तव में नल धर्मनिष्ठ और पुण्यात्मा थे। वे प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जप करते, यज्ञशाला में यज्ञ करते, शिवलिंग की पार्थिव पूजा करते, भिक्षुकों और याचकों को दान देकर संतुष्ट करते। मल्लशाला में तीन घंटे व्यायाम कर राज्यसभा में उपस्थित होते। शुचिता और मर्यादा के प्रति वे अत्यंत सजग थे। विद्वानों की सभाओं में बैठकर शास्त्रार्थ सुनते और धर्म तथा परंपराओं की गहरी समझ रखते थे।

इन्हीं गुणों के कारण अल्प आयु में ही उन्हें “पुण्यश्लोक” की उपाधि प्राप्त हुई थी। परंतु उनके व्यक्तित्व में वीरता और धर्म के साथ-साथ उच्छृंखलता की छाया भी थी, जिसे समय और उचित मार्गदर्शन से संतुलित करना आवश्यक था। महाराज वीरसेन के मन में यही चिंता थी—कि कहीं असंयम के कारण नल के उज्ज्वल भविष्य पर कोई कलंक न लग जाए।

Comments