नल-दमयन्तीकी कथा (गीता प्रेस गोरखपुर)
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॥ श्रीहरिः ॥
नम्र निवेदन
वेदव्यासजीके लिये आया है- 'अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विबाहुरपरो हरिः । अभाललोचनः शम्भुः भगवान् बादरायणः ।' अर्थात् भगवान् वेदव्यासजी चार मुखोंसे रहित ब्रह्मा हैं, दो भुजाओंवाले दूसरे विष्णु हैं और ललाटस्थित नेत्रसे रहित शंकर हैं अर्थात् वे ब्रह्मा-विष्णु-महेशरूप हैं। संसारमें जितनी भी कल्याणकारी, विलक्षण बातें हैं, वे सब वेदव्यासजीके ही उच्छिष्ट हैं-'व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्'। ऐसे वेदव्यासजी महाराजने जीवोंके कल्याणके लिये महाभारतकी रचना की है। उस महाभारतका संक्षेप जीवन्मुक्त तत्त्वज्ञ भगवत्प्रेमी महापुरुष सेठजी श्रीजयदयालजी गोयन्दकाने किया है। इस प्रकार वेदव्यासजीके द्वारा मूलरूपसे और सेठजीके द्वारा संक्षिप्तरूपसे लिखी हुई महाभारतमेंसे सबके लिये उपयोगी कुछ कथाओंका चयन किया गया है। इन कथाओंमें एक विशेष शक्ति है, जिससे इनको पढ़नेसे विशेष लाभ होता है। उनमेंसे नल-दमयन्तीकी कथा पाठकोंकी सेवामें प्रस्तुत है। पाठकोंसे मेरा विनम्र निवेदन है कि वे इस पुस्तकको स्वयं भी सपढ़ें और दूसरोंको भी पढ़नेके लिये प्रेरित करें।
विनीत-
स्वामी रामसुखदास
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॥ श्रीहरिः ॥
नल-दमयन्तीकी कथा
कर्कोटकस्य नागस्य दमयन्त्या नलस्य च।
ऋतुपर्णस्य राजर्षेः कीर्तनं कलिनाशनम् ॥
महात्मा अर्जुन जब अस्त्र प्राप्त करनेके लिये इन्द्रलोक चले गये, तब पाण्डव काम्यक वनमें निवास कर रहे थे। वे राज्यके नाश और अर्जुनके वियोगसे बड़े ही दुःखी हो रहे थे। एक दिनकी बात है, पाण्डव और द्रौपदी इसी सम्बन्धमें कुछ चर्चा कर रहे थे। धर्मराज युधिष्ठिर भीमसेनको समझा ही रहे थे कि महर्षि बृहदश्व उनके आश्रममें आते हुए दीख पड़े।
महर्षि बृहदश्वको आते देखकर धर्मराज युधिष्ठिरने आगे जाकर शास्त्रविधिके अनुसार उनकी पूजा की, आसनपर बैठाया। उनके विश्राम कर लेनेपर युधिष्ठिर उनसे अपना वृत्तान्त कहने लगे। उन्होंने कहा कि 'महाराज ! कौरवोंने कपट-बुद्धिसे मुझे बुलाकर छलके साथ जूआ खेला और मुझ अनजानको हराकर मेरा सर्वस्व छीन लिया। इतना ही नहीं, उन्होंने मेरी प्राणप्रिया द्रौपदीको घसीटकर भरी सभामें अपमानित किया। उन्होंने अन्तमें हमें काला मृगछाला ओढ़ाकर घोर वनमें भेज दिया। महर्षे ! आप ही बतलाइये कि इस पृथ्वीपर मुझ-सा भाग्यहीन राजा और कौन है! क्या आपने मेरे-जैसा दुःखी और कहीं देखा या सुना है?'
महर्षि बृहदश्वने कहा - धर्मराज ! आपका यह कहना ठीक नहीं है कि मुझ-सा दुःखी राजा और कोई नहीं हुआ; क्योंकि मैं तुमसे भी अधिक दुःखी और मन्दभाग्य राजाका वृत्तान्त जानता हूँ। तुम्हारी इच्छा हो तो मैं सुनाऊँ।
धर्मराज युधिष्ठिरके आग्रह करनेपर महर्षि बृहदश्वने कहना प्रारम्भ किया।
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दमयंती का स्वयंवर या विवाह
धर्मराज ! निषध देशमें वीरसेनके पुत्र नल नामके एक राजा हो चुके हैं। वे बड़े गुणवान्, परम सुन्दर, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, सबके प्रिय, वेदज्ञ एवं ब्राह्मणभक्त थे। उनकी सेना बहुत बड़ी थी। वे स्वयं अस्त्रविद्यामें बहुत निपुण थे। वे वीर, योद्धा, उदार और प्रबल पराक्रमी भी थे। उन्हें जूआ खेलनेका भी कुछ-कुछ शौक था। उन्हीं दिनों विदर्भ देशमें भीम नामके एक राजा राज्य करते थे। वे भी नलके समान ही सर्वगुणसम्पन्न और पराक्रमी थे। उन्होंने दमन ऋषिको प्रसन्न करके उनके वरदानसे चार संतानें प्राप्त की थीं- तीन पुत्र और एक कन्या। पुत्रोंके नाम थे-दम, दान्त और दमन। पुत्रीका नाम था - दमयन्ती। दमयन्ती लक्ष्मीके समान रूपवती थी। उसके नेत्र विशाल थे। देवताओं और यक्षोंमें भी वैसी सुन्दरी कन्या कहीं देखनेमें नहीं आती थी। उन दिनों कितने ही लोग विदर्भसे निषध देशमें आते और राजा नलके सामने दमयन्तीके रूप और गुणका बखान करते। निषध देशसे विदर्भमें जानेवाले भी दमयन्तीके सामने राजा नलके रूप, गुण और पवित्र चरित्रका वर्णन करते। इससे दोनोंके हृदयमें पारस्परिक अनुराग अंकुरित हो गया।
एक दिन राजा नलने अपने महलके उद्यानमें कुछ हंसोंको देखा। उन्होंने एक हंसको पकड़ लिया। हंसने कहा- 'आप मुझे छोड़ दीजिये तो हमलोग दमयन्तीके पास जाकर आपके गुणोंका ऐसा वर्णन करेंगे कि वह आपको अवश्य-अवश्य वर लेगी।' नलने हंसको छोड़ दिया। वे सब उड़कर विदर्भ देशमें दमयन्तीका स्वयंवर और विवाह दमयन्ती अपने पास हंसोंको देखकर बहुत प्रसन्न हुई और हंसोंको पकड़नेके लिये उनकी ओर दौड़ने लगी। दमयन्ती जिस हंसको पकड़नेके लिये दौड़ती, वही बोल उठता कि 'अरी दमयन्ती ! निषध देशमें एक नल नामका राजा है। वह अश्विनीकुमारके समान सुन्दर है। मनुष्योंमें उसके समान सुन्दर और कोई नहीं है। वह मानो मूर्तिमान् कामदेव है। यदि तुम उसकी पत्नी हो जाओ तो तुम्हारा जन्म और रूप दोनों सफल हो जायँ। हमलोगोंने देवता, गन्धर्व, मनुष्य, सर्प और राक्षसोंको घूम-घूमकर देखा है। नलके समान सुन्दर पुरुष कहीं देखनेमें नहीं आया। जैसे तुम स्त्रियोंमें रत्न हो, वैसे ही नल पुरुषोंमें भूषण है। तुम दोनोंकी जोड़ी बहुत ही सुन्दर होगी।' दमयन्तीने कहा- 'हंस ! तुम नलसे भी ऐसी ही बात कहना।' हंसने निषध देशमें लौटकर नलसे दमयन्तीका संदेश कह दिया।
दमयन्ती हंसके मुँहसे राजा नलकी कीर्ति सुनकर उनसे प्रेम करने लगी। उसकी आसक्ति इतनी बढ़ गयी कि वह रात-दिन उनका ही ध्यान करती रहती। शरीर धूमिल और दुबला हो गया। वह दीन-सी दीखने लगी। सखियोंने दमयन्तीके हृदयका भाव ताड़कर विदर्भराजसे निवेदन किया कि 'आपकी पुत्री अस्वस्थ हो गयी है।' राजा भीमने अपनी पुत्रीके सम्बन्धमें बड़ा विचार किया। अन्तमें वह इस निर्णयपर पहुँचा कि मेरी पुत्री विवाहयोग्य हो गयी है, इसलिये इसका स्वयंवर कर देना चाहिये। उन्होंने सब राजाओंको स्वयंवरका निमन्त्रण-पत्र भेज दिया और सूचित कर दिया कि राजाओंको दमयन्तीके स्वयंवरमें पधारकर लाभ उठाना चाहिये और मेरा मनोरथ पूर्ण करना चाहिये। देश-देशके नरपति हाथी, घोड़े और रथोंकी ध्वनिसे पृथ्वीको मुखरित करते हुए सज-धजकर विदर्भ देशमें पहुँचने लगे। भीमने सबके स्वागत सत्कारकी समुचित व्यवस्था की।
देवर्षि नारद और पर्वतके द्वारा देवताओंको भी दमयन्तीके स्वयंवरका समाचार मिल गया। इन्द्र आदि सभी लोकपाल भी अपनी मण्डली और वाहनोंसहित विदर्भ देशके लिये रवाना हुए। राजा नलका चित्त पहलेसे ही दमयन्तीपर आसक्त हो चुका था। उन्होंने भी दमयन्तीके स्वयंवरमें सम्मिलित होनेके लिये विदर्भदेशकी यात्रा की। देवताओंने स्वर्गसे उतरते समय देख लिया कि कामदेवके समान सुन्दर नल दमयन्तीके स्वयंवरके लिये जा रहे हैं। नलकी सूर्यके समान कान्ति और लोकोत्तर रूप-सम्पत्तिसे देवता भी चकित हो गये। उन्होंने पहचान लिया कि ये नल हैं। उन्होंने अपने विमानोंको आकाशमें खड़ा कर दिया और नीचे उतरकर नलसे कहा- 'राजेन्द्र नल ! आप बड़े सत्यव्रती हैं। आप हमलोगोंकी सहायता करनेके लिये दूत बन जाइये।' नलने प्रतिज्ञा कर ली और कहा कि 'करूँगा।' फिर पूछा कि 'आपलोग कौन हैं और मुझे दूत बनाकर कौन-सा काम लेना चाहते हैं?' इन्द्रने कहा- 'हमलोग देवता हैं। मैं इन्द्र हूँ और ये अग्नि, वरुण और यम हैं। हमलोग दमयन्तीके लिये यहाँ आये हैं। आप हमारे दूत बनकर दमयन्तीके पास जाइये और कहिये कि इन्द्र, वरुण, अग्नि और यमदेवता तुम्हारे पास आकर तुमसे विवाह करना चाहते हैं। इनमेंसे तुम चाहे जिस देवताको पतिके रूपमें स्वीकार कर लो।' नलने दोनों हाथ जोड़कर कहा कि 'देवराज ! वहाँ आपलोगोंके और मेरे जानेका एक ही प्रयोजन है। इसलिये आप मुझे दूत बनाकर वहाँ भेजें, यह उचित नहीं है। जिसकी किसी स्त्रीको पत्नीके रूपमें पानेकी इच्छा हो चुकी दमयन्तीका स्वयंवर और विवाह हो, वह भला, उसको कैसे छोड़ सकता है और उसके पास जाकर ऐसी बात कह ही कैसे सकता है? आपलोग कृपया इस विषयमें मुझे क्षमा कीजिये।'* देवताओंने कहा- 'नल ! तुम पहले हमलोगोंसे प्रतिज्ञा कर चुके हो कि मैं तुम्हारा काम करूँगा। अब प्रतिज्ञा मत तोड़ो। अविलम्ब वहाँ चले जाओ।' नलने कहा- 'राजमहलमें निरन्तर कड़ा पहरा रहता है, मैं कैसे जा सकूँगा?' इन्द्रने कहा- 'जाओ, तुम वहाँ जा सकोगे।' इन्द्रकी आज्ञासे नलने राजमहलमें बेरोक-टोक प्रवेश करके दमयन्तीको देखा। दमयन्ती और सखियाँ भी उसे देखकर अवाक् रह गयीं। वे इस अनुपम सुन्दर पुरुषको देखकर मुग्ध हो गयीं और लज्जित होकर कुछ बोल न सकीं।
दमयन्तीने अपनेको सँभालकर राजा नलसे कहा- 'वीर ! तुम देखनेमें बड़े सुन्दर और निर्दोष जान पड़ते हो। पहले अपना परिचय बताओ। तुम यहाँ किस उद्देश्यसे आये हो और यहाँ आते समय द्वारपालोंने तुम्हें देखा क्यों नहीं ? उनसे तनिक भी चूक हो जानेपर मेरे पिता उन्हें बड़ा कड़ा दण्ड देते हैं।' नलने कहा-कल्याणी ! मैं नल हूँ। लोकपालोंका दूत बनकर तुम्हारे पास आया हूँ। सुन्दरी ! इन्द्र, अग्नि, वरुण और यम-ये चारों देवता तुम्हारे साथ विवाह करना चाहते हैं। तुम इनमेंसे किसी एक देवताको अपने पतिके रूपमें वरण कर लो। यही संदेश लेकर मैं तुम्हारे पास आया हूँ। उन देवताओंके प्रभावसे ही जब मैं तुम्हारे महलमें प्रवेश करने लगा, तब मुझे कोई देख नहीं सका। मैंने देवताओंका संदेश कह दिया।
[* कथं तु जातसङ्कल्पः स्त्रियमुत्सृजते पुमान्। परार्थमीदृशं वक्तुं तत् क्षमन्तु महेश्वराः ॥(महा० वन० ५५।८)]
अब तुम्हारी जो इच्छा हो, करो।' दमयन्तीने बड़ी श्रद्धाके साथ देवताओंको प्रणाम करके मन्द-मन्द मुसकराकर नलसे कहा- 'नरेन्द्र ! आप मुझे प्रेम-दृष्टिसे देखिये और आज्ञा कीजिये कि मैं यथाशक्ति आपकी क्या सेवा करूँ। मेरे स्वामी ! मैंने अपना सर्वस्व और अपने-आपको भी आपके चरणोंमें सौंप दिया है। आप मुझपर विश्वासपूर्ण प्रेम कीजिये। जिस दिनसे मैंने हंसोंकी बात सुनी, उसी दिनसे मैं आपके लिये व्याकुल हूँ। आपके लिये ही मैंने राजाओंकी भीड़ इकट्ठी की है। यदि आप मुझ दासीकी प्रार्थना अस्वीकार कर देंगे तो मैं विष खाकर, आगमें जलकर, पानीमें डूबकर या फाँसी लगाकर आपके लिये मर जाऊँगी।'
राजा नलने कहा- 'जब बड़े-बड़े लोकपाल तुम्हारे प्रणय-सम्बन्धके प्रार्थी हैं, तब तुम मुझ मनुष्यको क्यों चाह रही हो ? उन ऐश्वर्यशाली देवताओंके चरण-रेणुके समान भी तो मैं नहीं हूँ। तुम अपना मन उन्हींमें लगाओ। देवताओंका अप्रिय करनेसे मनुष्यकी मृत्यु हो जाती है। तुम मेरी रक्षा करो और उनको वरण कर लो।' नलकी बात सुनकर दमयन्ती घबरा गयी। उसके दोनों नेत्रोंमें आँसू छलक आये। वह कहने लगी- 'मैं सब देवताओंको प्रणाम करके आपको ही पतिरूपमें वरण कर रही हूँ। यह मैं सत्य शपथ खा रही हूँ।* उस समय दमयन्तीका शरीर काँप रहा था, हाथ जुड़े हुए थे।
राजा नलने कहा- 'अच्छा, तब तुम ऐसा ही करो। परंतु यह तो बतलाओ कि मैं यहाँ उनका दूत बनकर संदेश पहुँचानेके लिये आया हूँ।
[* देवेभ्योऽहं नमस्कृत्य सर्वेभ्यः पृथिवीपते। वृणे त्वामेव भर्तारं सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ (महा० वन० ५६। १४)]
यदि इस समय मैं अपना स्वार्थ बनाने लगूँ तो कितनी बुरी बात है। मैं अपना स्वार्थ तो तभी बना सकता हूँ, यदि वह धर्मके विरुद्ध न हो। तुम्हें भी ऐसा ही करना चाहिये।' दमयन्तीने गद्गद-कण्ठसे कहा- 'नरेश्वर ! इसके लिये एक निर्दोष उपाय है। उसके अनुसार काम करनेपर आपको कोई दोष नहीं लगेगा। वह उपाय यह है कि आप लोकपालोंके साथ स्वयंवर-मण्डपमें आवें। मैं उनके सामने ही आपको वरण कर लूँगी। तब आपको दोष नहीं लगेगा।' अब राजा नल देवताओंके पास आये। देवताओंके पूछनेपर उन्होंने कहा- "मैं आपलोगोंकी आज्ञासे दमयन्तीके महलमें गया। बाहर बूढ़े द्वारपाल पहरा दे रहे थे, परंतु उन्होंने आपलोगोंके प्रभावसे मुझे देखा नहीं। केवल दमयन्ती और उसकी सखियोंने मुझे देखा। वे आश्चर्यमें पड़ गयीं। मैंने दमयन्तीके सामने आपलोगोंका वर्णन किया, परंतु वह तो आपलोगोंको न चाहकर मुझे ही वरण करनेपर तुली हुई है। उसने कहा है कि 'सब देवता आपके साथ स्वयंवरमें आवें। मैं उनके सामने ही आपको वरण कर लूँगी। इसमें आपको दोष नहीं लगेगा।* मैंने आपलोगोंके सामने सब बातें कह दीं। अन्तिम प्रमाण आपलोग ही हैं।"
राजा भीमने शुभ मुहूर्तमें स्वयंवरका समय रखा और लोगोंको बुलवा भेजा। सब राजा अपने-अपने निवासस्थानसे आ-आकर स्वयंवर-मण्डपमें यथास्थान बैठने लगे। पूरी सभा राजाओंसे भर गयी। जब सब लोग अपने-अपने आसनपर बैठ गये, तब सुन्दरी दमयन्ती अपनी अंगकान्तिसे राजाओंके मन और नेत्रोंको अपनी ओर आकर्षित करती हुई रंगमण्डपमें आयी।
[* तेषामहं संनिधौ त्वां वरयिष्यामि नैषध। एवं तव महाबाहो दोषो न भवितेति ह ॥ (महा० वन० ५६ । ३०)]
राजाओंका परिचय दिया जाने लगा। दमयन्ती एक-एकको देखकर आगे बढ़ने लगी। आगे एक ही स्थानपर नलके समान आकार और वेषभूषाके पाँच राजा इकट्ठे ही बैठे हुए थे। दमयन्तीको संदेह हो गया, वह राजा नलको नहीं पहचान सकी। वह जिसकी ओर देखती, वही नल जान पड़ता। इसलिये विचार करने लगी कि 'मैं देवताओंको कैसे पहचानूँ और ये राजा नल हैं- यह कैसे जानूँ?' उसे बड़ा दुःख हुआ। अन्तमें दमयन्तीने यही निश्चय किया कि देवताओंकी शरणमें जाना ही उचित है। हाथ जोड़कर प्रणामपूर्वक स्तुति करने लगी- 'देवताओ ! हंसोंके मुँहसे नलका वर्णन सुनकर मैंने उन्हें पतिरूपसे वरण कर लिया है। मैं मनसे और वाणीसे नलके अतिरिक्त और किसीको नहीं चाहती। देवताओंने निषधेश्वर नलको ही मेरा पति बना दिया है तथा मैंने नलकी आराधनाके लिये ही यह व्रत प्रारम्भ किया है। मेरी इस सत्य शपथके बलपर देवतालोग मुझे उन्हें ही दिखला दें।* ऐश्वर्यशाली लोकपालो ! आपलोग अपना रूप प्रकट कर दें, जिससे मैं पुण्यश्लोक नरपति नलको पहचान लूँ।' देवताओंने दमयन्तीका यह आर्त-विलाप सुना। उसके दृढ़ निश्चय, सच्चे प्रेम, आत्मशुद्धि, बुद्धि, भक्ति और नलपरायणताको देखकर उन्होंने उसे ऐसी शक्ति दे दी, जिससे वह देवता और मनुष्यका भेद समझ सके। दमयन्तीने देखा कि देवताओंके शरीरपर पसीना नहीं है। पलकें गिरती नहीं हैं। उनके गलेमें पड़ी पुष्पमाला कुम्हलायी नहीं है।
[* वाचा च मनसा चैव नमस्कारं प्रयुज्य सा। देवेभ्यः प्राञ्जलिर्भूत्वा वेपमानेदमब्रवीत् । हंसानां वचनं श्रुत्वा यथा मे नैषधो वृतः। पतित्वे तेन सत्येन देवास्तं प्रदिशन्तु मे ॥ मनसा वचसा चैव यथा नाभिचराम्यहम्। तेन सत्येन विबुधास्तमेव प्रदिशन्तु मे ॥ (महा० वन० ५७। १६-१८)]
शरीरपर मैल नहीं है। वे सिंहासनपर स्थित हैं, पर उनके पैर धरतीको नहीं छूते और उनकी परछाई नहीं पड़ती। * इधर नलके शरीरकी छाया पड़ रही है। माला कुम्हला गयी है। शरीरपर कुछ धूल और पसीना भी है। पलकें बराबर गिर रही हैं और धरती छूकर स्थित हैं। दमयन्तीने इन लक्षणोंसे देवताओं और पुण्यश्लोक नलको पहचान लिया। फिर धर्मके अनुसार नलको वरण कर लिया। दमयन्तीने कुछ सकुचाकर घूँघट काढ़ लिया और नलके गलेमें वरमाला डाल दी। देवता और महर्षि साधु-साधु कहने लगे। राजाओंमें हाहाकार मच गया।
राजा नलने आनन्दातिरेकसे दमयन्तीका अभिनन्दन किया। उन्होंने कहा- 'कल्याणी ! तुमने देवताओंके सामने रहनेपर भी उन्हें वरण न करके मुझे वरण किया है, इसलिये तुम मुझको प्रेमपरायण पति समझना। मैं तुम्हारी बात मानूँगा। जबतक मेरे शरीरमें प्राण रहेंगे, तबतक मैं तुमसे प्रेम करूँगा- यह मैं तुमसे शपथपूर्वक सत्य कहता हूँ।' दोनोंने प्रेमसे एक-दूसरेका अभिनन्दन करके इन्द्रादि देवताओंकी शरण ग्रहण की। देवता भी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने नलको आठ वर दिये। इन्द्रने कहा- 'नल ! तुम्हें यज्ञमें मेरा दर्शन होगा और उत्तम गति मिलेगी।' अग्निने कहा- 'जहाँ तुम मेरा स्मरण करोगे, वहीं मैं प्रकट हो जाऊँगा और मेरे ही समान प्रकाशमय लोक तुम्हें प्राप्त होंगे।' यमराजने कहा- 'तुम्हारी बनायी हुई रसोई बहुत मीठी होगी और तुम अपने धर्ममें दृढ़ रहोगे।'
[* सापश्यद् विबुधान् सर्वानस्वेदान् स्तब्धलोचनान्।
हृषितस्त्रग्रजोहीनान् स्थितानस्पृशतः क्षितिम् ॥ (महा० वन० ५७। २४)]
वरुणने कहा- 'जहाँ तुम चाहोगे, वहीं जल प्रकट हो जायगा। तुम्हारी माला उत्तम गन्धसे परिपूर्ण रहेगी।' इस प्रकार दो-दो वर देकर सब देवता अपने-अपने लोकोंमें चले गये। निमन्त्रित राजालोग भी विदा हो गये। भीमने प्रसन्न होकर दमयन्तीका नलके साथ विधिपूर्वक विवाह कर दिया। राजा नल कुछ दिनोंतक विदर्भ देशकी राजधानी कुण्डिनपुरमें रहे। तदनन्तर भीमकी अनुमति प्राप्त करके वे अपनी पत्नी दमयन्तीके साथ अपनी राजधानीमें लौट आये। राजा नल अपनी राजधानीमें धर्मके अनुसार प्रजाका पालन करने लगे। सचमुच उनके द्वारा 'राजा' नाम सार्थक हो गया। उन्होंने अश्वमेध आदि बहुत-से यज्ञ किये। समय आनेपर दमयन्तीके गर्भसे इन्द्रसेन नामके पुत्र और इन्द्रसेना नामकी कन्याका भी जन्म हुआ।
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कलियुगका दुर्भाव, जुएमें नलका हारना और नगरसे निर्वासन
महर्षि बृहदश्व कहते हैं - युधिष्ठिर ! जिस समय दमयन्तीके स्वयंवरसे लौटकर इन्द्रादि लोकपाल अपने-अपने लोकोंमें जा रहे थे, उस समय उनकी मार्गमें ही कलियुग और द्वापरसे भेंट हो गयी। इन्द्रने पूछा- 'क्यों कलियुग ! कहाँ जा रहे हो ?' कलियुगने कहा- 'मैं दमयन्तीके स्वयंवरमें उससे विवाह करनेके लिये जा रहा हूँ।' इन्द्रने हँसकर कहा- 'अजी, वह स्वयंवर तो कभीका पूरा हो गया। दमयन्तीने राजा नलको वरण कर लिया, हमलोग ताकते ही रह गये।' कलियुगने क्रोधमें भरकर कहा-'ओह, तब तो बड़ा अनर्थ हुआ। उसने देवताओंकी उपेक्षा करके मनुष्यको अपनाया, इसलिये उसको दण्ड देना चाहिये।'
देवताओंने कहा- 'दमयन्तीने हमारी आज्ञा प्राप्त करके नलको वरण किया है। वास्तवमें नल सर्वगुणसम्पन्न और उसके योग्य हैं। वे समस्त धर्मोंके मर्मज्ञ और सदाचारी हैं। उन्होंने इतिहास-पुराणोंके सहित वेदोंका अध्ययन किया है। वे धर्मानुसार यज्ञमें देवताओंको तृप्त करते हैं, कभी किसीको सताते नहीं, सत्यनिष्ठ और दृढनिश्चयी हैं। उनकी चतुरता, धैर्य, ज्ञान, तपस्या, पवित्रता, दम और शम लोकपालोंके समान हैं। उनको शाप देना तो नरककी धधकती आगमें गिरना है।' यह कहकर देवतालोग चले गये।¹
अब कलियुगने द्वापरसे कहा- 'भाई ! मैं अपने क्रोधको शान्त नहीं कर सकता। इसलिये मैं नलके शरीरमें निवास करूँगा। मैं उसे राज्यच्युत कर दूँगा। तब वह दमयन्तीके साथ नहीं रह सकेगा। इसलिये तुम भी जुएके पासोंमें प्रवेश करके मेरी सहायता करना।' द्वापरने उसकी बात स्वीकार कर ली। द्वापर और कलियुग दोनों ही नलकी राजधानीमें आ बसे। बारह वर्षतक वे इस बातकी प्रतीक्षामें रहे कि नलमें कोई दोष दीख जाय। एक दिन राजा नल संध्याके समय लघुशंकासे निवृत्त होकर पैर धोये बिना ही आचमन करके संध्या वन्दन करने बैठ गये। यह अपवित्र अवस्था देखकर कलियुग उनके शरीरमें प्रवेश कर गया।² साथ ही दूसरा रूप धारण करके वह पुष्करके पास गया और बोला- 'तुम नलके साथ जूआ खेलो और मेरी सहायतासे जुएमें राजा नलको जीतकर निषध देशका राज्य प्राप्त कर लो।'
[१-एवंगुणं नलं यो वै कामयेच्छपितुं कले। कृच्छ्र स नरके मज्जेदगाधे विपुले हृदे। एवमुक्त्वा कलिं देवा द्वापरं च दिवं ययुः ॥ (महा० वन० ५८। १२)
२-स नित्यमन्तरप्रेप्सुर्निषधेष्ववसच्चिरम्। अथास्य द्वादशे वर्षे ददर्श कलिरन्तरम् ॥ कृत्वा मूत्रमुपस्पृश्य संध्यामन्वास्त नैषधः। अकृत्वा पादयोः शौचं तत्रैनं कलिराविशत् ॥ (महा० वन० ५९।२, ३)]
पुष्कर उसकी बात स्वीकार करके नलके पास गया। द्वापर भी पासोंका रूप धारण करके उनके साथ हो लिया। जब पुष्करने राजा नलसे बार-बार जूआ खेलनेका आग्रह किया, तब राजा नल दमयन्तीके सामने अपने भाईकी बार-बारकी ललकारको सह न सके। उन्होंने उसी समय पासे खेलनेका निश्चय कर लिया। उस समय नलके शरीरमें कलियुग घुसा हुआ था; इसलिये राजा नल दावँमें सोना, चाँदी, रथ, वाहन आदि जो कुछ लगाते, वह हार जाते। प्रजा और मन्त्रियोंने बड़ी व्याकुलताके साथ राजा नलसे मिलकर जुएको रोकना चाहा और आकर फाटकके सामने खड़े हो गये। उनका अभिप्राय जानकर द्वारपाल रानी दमयन्तीके पास गया और बोला कि 'आप महाराजसे निवेदन कर दीजिये- आप धर्म और अर्थके तत्त्वज्ञ हैं। आपकी सारी प्रजा आपका दुःख सह्य न होनेके कारण कार्यवश दरवाजेपर आकर खड़ी है।' दमयन्ती स्वयं दुःखके मारे दुर्बल और अचेत हुई जा रही थी। उसने आँखोंमें आँसू भरकर गद्गद-कण्ठसे महाराजके सामने निवेदन किया - 'स्वामिन् ! नगरकी राजभक्त प्रजा और मन्त्रिमण्डलके लोग आपसे मिलने आये हैं और ड्योढ़ीपर खड़े हैं। आप उनसे मिल लीजिये।' परंतु नल कलियुगका आवेश होनेके कारण कुछ भी नहीं बोले। मन्त्रिमण्डल और प्रजाके लोग शोकग्रस्त होकर लौट गये। पुष्कर और नलमें कई महीनोंतक जूआ होता रहा तथा राजा नल बराबर हारते गये। राजा नल जुएमें जो पासे फेंकते, वे बराबर ही उनके प्रतिकूल पड़ते। सारा धन हाथसे निकल गया। जब दमयन्तीको इस बातका पता चला, तब उसने बृहत्सेना नामकी धायके द्वारा राजा नलके सारथि वार्ष्णेयको बुलवाया और उससे कहा- 'सारथि ! तुम राजाके प्रेमपात्र हो। अब यह बात तुमसे छिपी नहीं है कि महाराज बड़े संकटमें पड़ गये हैं। इसलिये तुम घोड़ोंको रथमें जोड़ लो और मेरे दोनों बच्चोंको रथमें बैठाकर कुण्डिननगरमें ले जाओ। तुम रथ और घोड़ोंको भी वहीं छोड़ देना। तुम्हारी इच्छा हो तो वहीं रहना। नहीं तो कहीं दूसरी जगह चले जाना।' सारथिने दमयन्तीके कथनानुसार मन्त्रियोंसे सलाह करके बच्चोंको कुण्डिनपुरमें पहुँचा दिया, रथ और घोड़े भी वहीं छोड़ दिये तथा स्वयं वहाँसे पैदल ही चलकर अयोध्या जा पहुँचा और वहीं राजा ऋतुपर्णके पास सारथिका काम करने लगा।
वार्ष्णेय सारथिके चले जानेके बाद पुष्करने पासोंके खेलमें राजा नलका राज्य और धन ले लिया। उसने नलको सम्बोधन करके हँसते हुए कहा- ' और जूआ खेलोगे ? परंतु तुम्हारे पास दाँवपर लगानेके लिये तो कुछ है ही नहीं। यदि तुम दमयन्तीको दाँवपर लगानेके योग्य समझो तो फिर खेल हो। नलका हृदय फटने लगा। वे पुष्करसे कुछ भी नहीं बोले। उन्होंने अपने शरीरसे सब वस्त्राभूषण उतार दिये और केवल एक वस्त्र पहने नगरसे बाहर निकले। दमयन्तीने भी केवल एक साड़ी पहनकर अपने पतिका अनुगमन किया। नलके मित्र और सम्बन्धियोंको बड़ा शोक हुआ। नल और दमयन्ती दोनों नगरके बाहर तीन राततक रहे। पुष्करने नगरमें ढिंढोरा पिटवा दिया कि जो मनुष्य नलके प्रति सहानुभूति प्रकट करेगा, उसको फाँसीकी सजा दी जायगी। भयके मारे नगरके लोग अपने राजा नलका सत्कारतक न कर सके। राजा नल तीन दिन-राततक अपने नगरके पास केवल पानी पीकर रहे। चौथे दिन उन्हें बड़ी भूख लगी। फिर दोनों फल-मूल खाकर वहाँसे आगे बढ़े।
एक दिन राजा नलने देखा कि बहुत-से पक्षी उनके पास ही बैठे हैं। उनके पंख सोनेके समान दमक रहे हैं। नलने सोचा कि इनकी पाँखसे कुछ धन मिलेगा। ऐसा सोचकर उन्हें पकड़नेके लिये नलने उनपर अपना पहननेका वस्त्र डाल दिया। पक्षी उनका वस्त्र लेकर उड़ गये। अब नल नंगे होकर बड़ी दीनताके साथ मुँह नीचे किये खड़े हो गये। पक्षियोंने कहा-'दुर्बुद्धे ! तू नगरसे एक वस्त्र पहनकर निकला था। उसे देखकर हमें बड़ा दुःख हुआ था। ले, अब हम तेरे शरीरपरका वस्त्र लिये जा रहे हैं। हम पक्षी नहीं, जुएके पासे हैं।' नलने दमयन्तीसे पासोंकी बात कह दी।
इसके बाद नलने कहा- 'प्रिये ! तुम देख रही हो, यहाँ बहुत-से मार्ग हैं। एक अवन्तीकी ओर जाता है, दूसरा ऋक्षवान् पर्वतपर होकर दक्षिण देशको । सामने विन्ध्याचल पर्वत है। यह पयोष्णी नदी समुद्रमें मिलती है। ये महर्षियोंके आश्रम हैं। सामनेका रास्ता विदर्भ देशको जाता है। यह कोसल देशका मार्ग है।' इस प्रकार राजा नल दुःख और शोकसे भरकर बड़ी सावधानीके साथ दमयन्तीको भिन्न-भिन्न मार्ग और आश्रम बतलाने लगे। दमयन्तीकी आँखें आँसूसे भर गयीं। वह गद्गद-स्वरसे कहने लगी- 'स्वामिन् ! आप क्या सोच रहे हैं? मेरे अंग शिथिल हो रहे हैं और मेरा हृदय उद्विग्न हो रहा है। आपका राज्य गया, धन गया, आपके शरीरपर वस्त्र नहीं रहा, आप थके-माँदे तथा भूखे-प्यासे हैं; क्या मैं आपको इस निर्जन वनमें छोड़कर अकेली कहीं जा सकती हूँ? मैं आपके साथ रहकर आपके दुःख दूर करूँगी। दुःखके अवसरोंपर पत्नी पुरुषके लिये औषध है। वह धैर्य देकर पतिके दुःखको कम करती है। यह बात वैद्य भी स्वीकार करते हैं। नलने कहा- 'प्रिये ! तुम्हारा कहना ठीक है। पत्नी मित्र है, पत्नी औषध है। परंतु मैं तो तुम्हारा त्याग करना नहीं चाहता। तुम ऐसा संदेह क्यों कर रही हो ?' दमयन्ती बोली-'आप मुझे छोड़ना नहीं चाहते, परंतु विदर्भ देशका मार्ग क्यों बतला रहे हैं? मुझे निश्चय है कि आप मेरा त्याग नहीं कर सकते। फिर भी इस समय आपका मन उलटा हो गया है, इसलिये ऐसी शंका करती हूँ। आपके मार्ग बतानेसे मेरा मन दुखता है। यदि आप मुझे मेरे पिता या किसी सम्बन्धीके घर भेजना चाहते हों तो ठीक है, हम दोनों साथ-साथ चलें। मेरे पिता आपका सत्कार करेंगे। आप वहीं सुखसे रहियेगा।' नलने कहा- 'प्रिये ! तुम्हारे पिता राजा हैं और मैं भी कभी राजा था। इस समय मैं संकटमें पड़कर उनके पास नहीं जाऊँगा।' राजा नल दमयन्तीको समझाने लगे। तदनन्तर दोनों एक ही वस्त्रसे शरीर ढककर वनमें इधर-उधर घूमते रहे। भूख-प्याससे व्याकुल होकर दोनों एक धर्मशालामें आये और ठहर गये।
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नलका दमयन्तीको त्यागना, दमयन्तीको संकटोंसे बचते हुए दिव्य ऋषियोंके दर्शन और राजा सुबाहुके महलमें निवास
बृहदश्वजी कहते हैं- युधिष्ठिर ! उस समय राजा नलके शरीरपर वस्त्र नहीं था और तो क्या, धरतीपर बिछानेके लिये एक चटाई भी नहीं थी। शरीर धूलसे लथपथ हो रहा था। भूख-प्यासकी पीड़ा अलग ही थी। राजा नल जमीनपर ही सो गये।
दमयन्तीके जीवनमें भी कभी ऐसी परिस्थिति नहीं आयी थी। वह सुकुमारी भी वहीं सो गयी। दमयन्तीके सो जानेपर राजा नलकी नींद टूटी। सच्ची बात तो यह थी कि वे दुःख और शोककी अधिकताके कारण सुखकी नींद सो भी नहीं सकते थे। आँखके खुलनेपर उनके सामने राज्यके छिन जाने, सगे-सम्बन्धियोंके छूटने और पक्षियोंके वस्त्र लेकर उड़ जानेके दृश्य एक-एक करके आने लगे। वे सोचने लगे कि 'दमयन्ती मुझपर बड़ा प्रेम करती है। प्रेमके कारण ही वह इतना दुःख भी भोग रही है। यदि मैं इसे छोड़कर चला जाऊँगा तो यह अपने पिताके घर चली जायगी। मेरे साथ तो इसे दुःख-ही-दुःख भोगना पड़ेगा। यदि मैं इसे छोड़कर चला जाऊँ तो सम्भव है कि इसे सुख भी मिल जाय।' अन्तमें राजा नलने यही निश्चय किया कि 'दमयन्तीको छोड़कर चले जानेमें ही भला है। दमयन्ती सच्ची पतिव्रता है। कोई भी इसके सतीत्वको भंग नहीं कर सकता।'* इस प्रकार त्यागनेका निश्चय करके और सतीत्वकी ओरसे निश्चिन्त होकर राजा नलने यह विचार किया कि 'मैं नंगा हूँ और दमयन्तीके शरीरपर भी केवल एक ही वस्त्र है। फिर भी इसके वस्त्रोंमेंसे आधा फाड़ लेना ही श्रेयस्कर है। परंतु फाड़ें कैसे ? शायद यह जग जाय?' वे धर्मशालामें इधर-उधर घूमने लगे। उनकी दृष्टि एक बिना म्यानकी तलवारपर पड़ गयी। राजा नलने उसे उठा लिया और धीरेसे दमयन्तीका आधा वस्त्र फाड़कर अपना शरीर ढक लिया। दमयन्ती नींदमें थी। राजा नल उसे छोड़कर निकल पड़े। थोड़ी देर बाद जब उनका हृदय शान्त हुआ, तब वे फिर धर्मशालामें लौट आये और दमयन्तीको देखकर रोने लगे।
[* न चैषा तेजसा शक्या कैश्चिद् धर्षयितुं पथि। यशस्विनी महाभागा मद्भक्तेयं पतिव्रता ॥ -নতিক দলকে একি(महा० वन० ६२। १४)]
वे सोचने लगे कि 'अबतक मेरी प्राणप्रिया अन्तःपुरके परदेमें रहती थी, इसे कोई छू भी नहीं सकता था। आज यह अनाथके समान आधा वस्त्र पहने धूलमें सो रही है। यह मेरे बिना दुःखी होकर वनमें कैसे फिरेगी ? प्रिये ! तू धर्मात्मा है; इसलिये आदित्य, वसु, रुद्र, अश्विनीकुमार और पवनदेवता तेरी रक्षा करें।' उस समय राजा नलका हृदय दुःखके मारे टुकड़े-टुकड़े हुआ जा रहा था, वे झूलेकी तरह बार-बार धर्मशालासे बाहर निकलते और फिर लौट आते। शरीरमें कलियुगका प्रवेश होनेके कारण बुद्धि नष्ट हो गयी थी, इसलिये अन्ततः वे अपनी प्राणप्रिया पत्नीको वनमें अकेली छोड़कर वहाँसे चले गये।
जब दमयन्तीकी नींद टूटी, तब उसने देखा कि राजा नल वहाँ नहीं हैं। वह आशंकासे भरकर पुकारने लगी कि 'महाराज ! स्वामिन् ! मेरे सर्वस्व ! आप कहाँ हैं? मैं अकेली डर रही हूँ, आप कहाँ गये ? बस, अब अधिक हँसी न कीजिये। मेरे कठोर स्वामी ! मुझे क्यों डरा रहे हैं? शीघ्र दर्शन दीजिये। मैं आपको देख रही हूँ। लो, यह देख लिया। लताओंकी आड़में छिपकर चुप क्यों हो रहे हैं? मैं दुःखमें पड़कर इतना विलाप कर रही हूँ और आप मेरे पास आकर धैर्य भी नहीं देते ? स्वामिन् ! मुझे अपना या और किसीका शोक नहीं है। मुझे केवल इतनी ही चिन्ता है कि आप इस घोर जंगलमें अकेले कैसे रहेंगे ? हा नाथ ! निर्मल चित्तवाले आपकी जिस पुरुषने यह दशा की है, वह आपसे भी अधिक दुर्दशाको प्राप्त होकर निरन्तर दुःखी जीवन बितावे*।'
[* न शोचाम्यहमात्मानं न चान्यदपि किंचन। कथं नु भवितास्येक इति त्वां नृप शोचिमि ॥ यस्याभिशापाद् दुःखार्तो दुःखं विन्दति नैषधः । तस्य भूतस्य नो दुःखाद्दुःखमप्यधिकं भवेत् ॥ अपापचेतसं पापो य एवं कृतवान् नलम्। तस्माद् दुःखतरं प्राप्य जीवत्वसुखजीविकाम् ॥ (महा० वन० ६३।११, १६-१७)]
दमयन्ती इस प्रकार विलाप करती हुई इधर-उधर दौड़ने लगी। वह उन्मत्त-सी होकर इधर-उधर घूमती हुई एक अजगरके पास जा पहुँची, शोकग्रस्त होनेके कारण उसे इस बातका पता भी नहीं चला। अजगर दमयन्तीको निगलने लगा। उस समय भी दमयन्तीके चित्तमें अपनी नहीं, राजा नलकी ही चिन्ता थी कि वे अकेले कैसे रहेंगे। वह पुकारने लगी -'स्वामिन् ! मुझे अनाथकी भाँति यह अजगर निगल रहा है, आप मुझे छुड़ानेके लिये क्यों नहीं दौड़ आते ?' दमयन्तीकी आवाज एक व्याधके कानमें पड़ी। वह उधर ही घूम रहा था। वह वहाँ दौड़कर आया और यह देखकर कि दमयन्तीको अजगर निगल रहा है, अपने तेज शस्त्रसे अजगरका मुँह चीर डाला। उसने दमयन्तीको छुड़ाकर नहलाया, आश्वासन देकर भोजन कराया। दमयन्ती कुछ-कुछ शान्त हुई। व्याधने पूछा- 'सुन्दरी ! तुम कौन हो ? किस कष्टमें पड़कर किस उद्देश्यसे यहाँ आयी हो ?' दमयन्तीने व्याधसे अपनी कष्ट-कहानी कही। दमयन्तीकी सुन्दरता, बोल-चाल और मनोहरता देखकर व्याध काममोहित हो गया। वह मीठी-मीठी बातें करके दमयन्तीको अपने वशमें करनेकी चेष्टा करने लगा। दमयन्ती दुरात्मा व्याधके मनका भाव जानकर क्रोधके आवेशसे प्रज्वलित हो गयी। दमयन्तीने व्याधके बलात्कारकी चेष्टाको बहुत रोकना चाहा; परंतु जब वह किसी भी प्रकार न माना, तब उसने शाप दे दिया- 'यदि मैंने निषधनरेश राजा नलको छोड़कर और किसी पुरुषका मनसे भी चिन्तन नहीं किया हो तो यह पापी क्षुद्र व्याध मरकर जमीनपर गिर पड़े।'* दमयन्तीके मुँहसे ऐसी बात निकलते ही व्याधके प्राण-पखेरू उड़ गये, वह जले हुए दूँठकी तरह पृथ्वीपर गिर पड़ा।
व्याधके मर जानेपर दमयन्ती राजा नलको ढूँढ़ती हुई एक निर्जन और भयंकर वनमें जा पहुँची। बहुत-से पर्वत, नदी, नद, जंगल, हिंस्र पशु, पिशाच आदिको देखती हुई और विरहके उन्मादमें उनसे राजा नलका पता पूछती हुई वह उत्तरकी ओर बढ़ने लगी। तीन दिन, तीन रात बीत जानेके बाद दमयन्तीने देखा कि सामने ही एक बड़ा सुन्दर तपोवन है। उस आश्रममें वसिष्ठ, भृगु और अत्रिके समान मितभोजी, संयमी, पवित्र, जितेन्द्रिय और तपस्वी ऋषि निवास कर रहे हैं। वे वृक्षोंकी छाल अथवा मृगछाला धारण किये हुए थे। दमयन्तीको कुछ धैर्य मिला, उसने आश्रममें जाकर बड़ी नम्रताके साथ तपस्वी ऋषियोंको प्रणाम किया और हाथ जोड़कर खड़ी हो गयी। ऋषियोंने 'स्वागत है' कहकर दमयन्तीका सत्कार किया और बोले- 'बैठ जाओ। हम तुम्हारा क्या काम करें ?' दमयन्तीने भद्र महिलाके समान पूछा- 'आपकी तपस्या, अग्नि, धर्म और पशु-पक्षी तो सकुशल हैं न ? आपके धर्माचरणमें तो कोई विघ्न नहीं पड़ता।' ऋषियोंने कहा- 'कल्याणी ! हम तो सब प्रकारसे सकुशल हैं। तुम कौन हो, किस उद्देश्यसे यहाँ आयी हो ? हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। क्या तुम वन, पर्वत, नदीकी अधिष्ठातृदेवता हो ?' दमयन्तीने कहा- 'महात्माओ ! मैं कोई देवी-देवता नहीं, एक मनुष्य-स्त्री हूँ।
[* यद्यहं नैषधादन्यं मनसापि न चिन्तये। तथायं पततां क्षुद्रो परासुर्मृगजीवनः ॥ (महा० वन० ६३। ३८)]
मैं विदर्भनरेश राजा भीमकी पुत्री हूँ। बुद्धिमान्, यशस्वी एवं वीर-विजयी निषधनरेश महाराज नल मेरे पति हैं। कपटद्यूतके विशेषज्ञ एवं दुरात्मा पुरुषोंने मेरे धर्मात्मा पतिको जूआ खेलनेके लिये उत्साहित करके उनका राज्य और धन ले लिया है। मैं उन्हींकी पत्नी दमयन्ती हूँ। संयोगवश वे मुझसे बिछुड़ गये हैं। मैं उन्हीं रणबांकुरे, शस्त्रविद्याकुशल एवं महात्मा पतिदेवको ढूँढ़नेके लिये वन-वन भटक रही हूँ। मैं यदि उन्हें शीघ्र ही नहीं देख पाऊँगी तो जीवित नहीं रह सकूँगी। उनके बिना मेरा जीवन निष्फल है। वियोगके दुःखको मैं कबतक सह सकूँगी।' तपस्वियोंने कहा- 'कल्याणी! हम अपनी तपःशुद्ध दृष्टिसे देख रहे हैं कि तुम्हें आगे बहुत सुख मिलेगा और थोड़े ही दिनोंमें राजा नलका दर्शन होगा। * धर्मात्मा निषध-नरेश थोड़े ही दिनोंमें समस्त दुःखोंसे छूटकर सम्पत्तिशाली निषध देशपर राज्य करेंगे। उनके शत्रु भयभीत होंगे, मित्र सुखी होंगे और कुटुम्बी उन्हें अपने बीचमें पाकर आनन्दित होंगे।' इस प्रकार कहकर वे सब तपस्वी अपने आश्रमके साथ अन्तर्धान हो गये। यह आश्चर्यकी घटना देखकर दमयन्ती विस्मित हो गयी। वह सोचने लगी कि 'अहो! मैंने यह स्वप्न देखा है क्या ? यह कैसी घटना हो गयी। वे तपस्वी, आश्रम, पवित्रसलिला नदी, फल-फूलोंसे लदे हरे-भरे वृक्ष कहाँ गये ?' दमयन्ती फिर उदास हो गयी, उसका मुख मुरझा गया।
वहाँसे चलकर विलाप करती हुई दमयन्ती एक अशोक वृक्षके पास पहुँची। उसकी आँखोंसे झर-झर आँसू झर रहे थे।
[* उदर्कस्तव कल्याणि कल्याणो भविता शुभे। वयं पश्याम तपसा क्षिप्रं द्रक्ष्यसि नैषधम् ॥ (महा० वन० ६४।९२)]
उसने अशोक-वृक्षसे गद्गद स्वरमें कहा- 'शोकरहित अशोक ! तू मेरा शोक मिटा दे। क्या कहीं तूने राजा नलको शोकरहित देखा है? अशोक ! तू अपने शोकनाशक नामको सार्थक कर।' दमयन्तीने अशोककी प्रदक्षिणा की और वह आगे बढ़ी। भयंकर वनमें अनेकों वृक्ष, गुफा, पर्वतोंके शिखर और नदियोंके आस-पास अपने पतिदेवको ढूँढ़ती हुई दमयन्ती बहुत दूर निकल गयी। वहाँ उसने देखा कि बहुत-से हाथी, घोड़ों और रथोंके साथ व्यापारियोंका एक झुंड आगे बढ़ रहा है। व्यापारियोंके प्रधानसे बातचीत करके और यह जानकर कि ये व्यापारी राजा सुबाहुके राज्य चेदिदेशमें जा रहे हैं, दमयन्ती उनके साथ हो गयी। उसके मनमें अपने पतिके दर्शनकी लालसा बढ़ती ही जा रही थी। कई दिनोंतक चलनेके बाद वे व्यापारी एक भयंकर वनमें पहुँचे। वहाँ एक बड़ा ही सुन्दर सरोवर था। लंबी यात्राके कारण सब लोग थक गये थे। इसलिये उन लोगोंने वहीं पड़ाव डाल दिया। दैव व्यापारियोंके प्रतिकूल था। रातके समय जंगली हाथी व्यापारियोंके हाथियोंपर टूट पड़े और उनकी भगदड़में सब-के-सब व्यापारी नष्ट-भ्रष्ट हो गये। कोलाहल सुनकर दमयन्तीकी नींद टूटी। वह इस महासंहारका दृश्य देखकर बावली-सी हो गयी। उसने कभी ऐसी घटना नहीं देखी थी। वह डरकर वहाँसे भाग निकली और जहाँ कुछ बचे हुए मनुष्य खड़े थे, वहाँ जा पहुँची। तदनन्तर दमयन्ती उन वेदपाठी और संयमी ब्राह्मणोंके साथ, जो उस महासंहारसे बच गये थे, शरीरपर आधा वस्त्र धारण किये चलने लगी और सायंकालके समय चेदिनरेश राजा सुबाहुकी राजधानीमें जा पहुँची।
जिस समय दमयन्ती राजधानीके राज-पथपर चल रही थी, नागरिकोंने यही समझा कि यह कोई बावली स्त्री है। छोटे-छोटे बच्चे उसके पीछे लग गये। दमयन्ती राजमहलके पास जा पहुँची। उस समय राजमाता राजमहलकी खिड़कीमें बैठी हुई थीं। उन्होंने बच्चोंसे घिरी दमयन्तीको देखकर धायसे कहा कि 'अरी! देख तो, यह स्त्री बड़ी दुखिया मालूम पड़ती है। अपने लिये कोई आश्रय ढूँढ़ रही है। बच्चे इसे दुःख दे रहे हैं। तू जा, इसे मेरे पास ले आ। यह सुन्दरी तो इतनी है, मानो मेरे महलको भी दमका देगी।' धायने आज्ञापालन किया। दमयन्ती राजमहलमें आ गयी। राजमाताने दमयन्तीका सुन्दर शरीर देखकर पूछा- 'देखनेमें तो तुम दुखिया जान पड़ती हो, तो भी तुम्हारा शरीर इतना तेजस्वी कैसे है? बताओ, तुम कौन हो, किसकी पत्नी हो, असहाय अवस्थामें भी किसीसे डरती क्यों नहीं हो?' दमयन्तीने कहा-'मैं एक पतिव्रता नारी हूँ। मैं हूँ तो कुलीन परंतु दासीका काम करती हूँ। अन्तःपुरमें रह चुकी हूँ। मैं कहीं भी रह जाती हूँ। फल-मूल खाकर दिन बिता देती हूँ। मेरे पतिदेव बहुत गुणी हैं और मुझसे प्रेम भी बहुत करते हैं। मेरे अभाग्यकी बात है कि वे बिना मेरे किसी अपराधके ही रातके समय मुझे सोती छोड़कर न जाने कहाँ चले गये। मैं रात-दिन अपने प्राणपतिको ढूँढ़ती और उनके वियोगमें जलती रहती हूँ।' इतना कहते-कहते दमयन्तीकी आँखोंमें आँसू उमड़ आये, वह रोने लगी। दमयन्तीके दुःखभरे विलापसे राजमाताका जी भर आया। वे कहने लगीं-'कल्याणी ! मेरा तुमपर स्वाभाविक ही प्रेम हो रहा है। तुम मेरे पास रहो, मैं तुम्हारे पतिको ढूँढ़नेका प्रबन्ध करूँगी। जब वे आवें, तब तुम उनसे यहीं मिलना।' दमयन्तीने कहा- 'माताजी ! मैं एक शर्तपर आपके घर रह सकती हूँ। मैं कभी जूठा न खाऊँगी, किसीके पैर नहीं धोऊँगी और पर-पुरुषके साथ किसी प्रकार भी बातचीत नहीं करूँगी। यदि कोई पुरुष मुझसे दुश्चेष्टा करे तो उसे दण्ड देना होगा। बार-बार ऐसा करनेपर उसे प्राणान्त दण्ड भी देना होगा। मैं अपने पतिको ढूँढ़नेके लिये ब्राह्मणोंसे बातचीत करती रहूँगी। आप यदि मेरी यह शर्त स्वीकार करें तब तो मैं रह सकती हूँ, अन्यथा नहीं।' राजमाता दमयन्तीके नियमोंको सुनकर बहुत प्रसन्न हुईं और उन्होंने कहा कि ऐसा ही होगा। तदनन्तर उन्होंने अपनी पुत्री सुनन्दाको बुलाया और कहा कि 'बेटी! देखो, इस दासीको देवी समझना। यह अवस्थामें तुम्हारे बराबरकी है, इसलिये इसे सखीके समान राजमहलमें रखो और प्रसन्नताके साथ इससे मनोरंजन करती रहो।' सुनन्दा प्रसन्नताके साथ दमयन्तीको अपने महलमें ले गयी। दमयन्ती अपने इच्छानुसार नियमोंका पालन करती हुई महलमें रहने लगी।
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नलका रूप बदलना, ऋतुपर्णके यहाँ सारथि होना, भीमके द्वारा नल-दमयन्तीकी खोज और दमयन्तीका मिलना
बृहदश्वजीने कहा- युधिष्ठिर ! जिस समय राजा नल दमयन्तीको सोती छोड़कर आगे बढ़े, उस समय वनमें दावाग्नि लग रही थी। नल कुछ ठिठक गये, उनके कानोंमें आवाज आयी- 'राजा नल ! शीघ्र दौड़ो। मुझे बचाओ।' नलने कहा-'डरो मत' वे दौड़कर दावानलमें घुस गये और देखा कि नागराज कर्कोटक कुण्डली बाँधकर पड़ा हुआ है।
[* उच्छिष्टं नैव भुञ्जीयां न कुर्यां पादधावनम् । न चाहं पुरुषानन्यान् प्रभाषेयं कथंचन । प्रार्थयेद् यदि मां कश्चिद् दण्ड्यस्ते स पुमान् भवेत्। वध्यश्च तेऽसकृन्मन्द इति मे व्रतमाहितम् ॥ भर्तुरन्वेषणार्थं तु पश्येयं ब्राह्मणानहम् । यद्येवमिह वत्स्यामि त्वत्सकाशे न संशयः।(महा० वन० ६५। ६८-७०)]
उसने हाथ जोड़कर नलसे कहा- 'राजन् ! मैं कर्कोटक नामका सर्प हूँ। मैंने तेजस्वी ऋषि नारदको धोखा दिया था। उन्होंने शाप दे दिया कि जबतक राजा नल तुम्हें न उठावें, तबतक यहीं पड़ा रह। उनके उठानेपर तू शापसे छूट जायगा। उनके शापके कारण मैं यहाँसे एक पग भी हट-बढ़ नहीं सकता। तुम शापसे मेरी रक्षा करो। मैं तुम्हें हितकी बात बताऊँगा और तुम्हारा मित्र बन जाऊँगा। मेरे भारसे डरो मत। मैं अभी हलका हो जाता हूँ।' वह अँगूठेके बराबर हो गया। नल उसे उठाकर दावानलसे बाहर ले आये। कर्कोटकने कहा- 'राजन् ! तुम अभी मुझे पृथ्वीपर न डालो। कुछ पगोंतक गिनती करते हुए चलो।' राजा नलने ज्यों ही पृथ्वीपर दसवाँ पग डाला और कहा-'दस', त्यों ही कर्कोटक नागने उन्हें डस लिया। उसका नियम था कि जब कोई 'दस' अर्थात् 'डसो' कहता, तभी वह डसता, अन्यथा नहीं। कर्कोटकके डसते ही नलका पहला रूप बदल गया और कर्कोटक अपने रूपमें हो गया। आश्चर्यचकित नलसे उसने कहा- 'राजन् ! तुम्हें कोई पहचान न सके, इसलिये मैंने तुम्हारा रूप बदल दिया है। कलियुगने तुम्हें बहुत दुःख दिया है, अब मेरे विषसे वह तुम्हारे शरीरमें बहुत दुःखी रहेगा। * तुमने मेरी रक्षा की है। अब तुम्हें हिंसक पशु-पक्षी, शत्रु और ब्रह्मवेत्ताओंके शाप आदिसे भी कोई भय नहीं रहेगा। अब तुमपर किसी भी विषका प्रभाव नहीं होगा और युद्धमें सर्वदा तुम्हारी जीत होगी।
[* यत्कृते चासि निकृतो दुःखेन महता नल। विषेण स मदीयेन त्वयि दुःखं निवत्स्यति ॥ (महा० वन० ६६ । १५)]
अब तुम अपना नाम बाहुक रख लो और द्यूतकुशल राजा ऋतुपर्णकी नगरी अयोध्यामें जाओ। तुम उन्हें घोड़ोंकी विद्या बतलाना और वे तुम्हें जुएका रहस्य बतला देंगे तथा तुम्हारे मित्र भी बन जायेंगे। जुएका रहस्य जान लेनेपर तुम्हारी पत्नी, पुत्री, पुत्र, राज्य सब कुछ मिल जायगा। जब तुम अपने पहले रूपको धारण करना चाहो, तब मेरा स्मरण करना और मेरे दिये हुए वस्त्र धारण कर लेना। यह कहकर कर्कोटकने दो दिव्य वस्त्र दिये और वहीं अन्तर्धान हो गया।
राजा नल वहाँसे चलकर दसवें दिन राजा ऋतुपर्णकी राजधानी अयोध्यामें पहुँच गये। उन्होंने वहाँ राजदरबारमें निवेदन किया कि 'मेरा नाम बाहुक है। मैं घोड़ोंको हाँकने तथा उन्हें तरह-तरहकी चालें सिखानेका काम करता हूँ। घोड़ोंकी विद्यामें मेरे-जैसा निपुण इस समय पृथ्वीपर और कोई नहीं है। अर्थ-सम्बन्धी तथा अन्यान्य गम्भीर समस्याओंपर मैं अच्छी सम्मति देता हूँ और रसोई बनानेमें भी बहुत ही चतुर हूँ, एवं हस्तकौशलके सभी काम तथा दूसरे भी कठिन कामोंको मैं करनेकी चेष्टा करूँगा। आप मेरी आजीविका निश्चित करके मुझे रख लीजिये।' ऋतुपर्णने कहा- 'बाहुक ! तुम भले आये। तुम्हारे जिम्मे ये सभी काम रहेंगे। परंतु मैं शीघ्रगामी सवारीको विशेष पसंद करता हूँ, इसलिये तुम ऐसा उद्योग करो कि मेरे घोड़ोंकी चाल तेज हो जाय। मैं तुम्हें अश्वशालाका अध्यक्ष बनाता हूँ।
[* न ते भयं नरव्याघ्र दंष्ट्रिभ्यः शत्रुतोऽपि वा। ब्रह्मविद्भ्यश्च भविता मत्प्रसादान्नराधिप ॥ राजन् विषनिमित्ता च न ते पीडा भविष्यति। संग्रामेषु च राजेन्द्र शश्वज्जयमवाप्स्यसि ॥ (महा० वन० ६६ । १८-१९)]
तुम्हें हर महीने सोनेकी दस हजार मोहरें मिला करेंगी। इसके अतिरिक्त वाष्र्णेय (नलका पुराना सारथि) और जीवल हमेशा तुम्हारे पास उपस्थित रहेंगे। तुम आनन्दसे मेरे दरबारमें रहो।' राजा ऋतुपर्णसे सत्कार पाकर राजा नल बाहुकके रूपमें वाष्र्णेय और जीवलके साथ अयोध्यामें रहने लगे। राजा नल प्रतिदिन रातको दमयन्तीका स्मरण करके कहा करते कि 'हाय-हाय, तपस्विनी दमयन्ती भूख-प्याससे घबराकर थकी-माँदी उस मूर्खका स्मरण करती होगी और न जाने कहाँ सोती होगी ? भला, वह अपने जीवन-निर्वाहके लिये किसके पास जाती होगी ?' इसी प्रकार वे अनेकों बातें सोचते और इस प्रकार ऋतुपर्णके पास रहते कि उन्हें कोई पहचान न सके।
जब विदर्भनरेश भीमको यह समाचार मिला कि मेरे दामाद नल राज्यच्युत होकर मेरी पुत्रीके साथ वनमें चले गये हैं, तब उन्होंने ब्राह्मणोंको बुलवाया और उन्हें बहुत-सा धन देकर कहा कि आपलोग पृथ्वीपर सर्वत्र जा-जाकर नल-दमयन्तीका पता लगाइये और उन्हें ढूँढ़ लाइये। जो ब्राह्मण यह काम पूरा कर लेगा, उसे एक सहस्र गौएँ और जागीर दी जायगी। यदि आप लोग उन्हें ला न सकें, केवल पता ही लगा लावें तो भी दस हजार गौएँ दी जायँगी। ब्राह्मणलोग बड़ी प्रसन्नतासे नल-दमयन्तीका पता लगानेके लिये निकल पड़े।
सुदेव नामक ब्राह्मण नल-दमयन्तीका पता लगानेके लिये चेदिनरेशकी राजधानीमें गया। उसने एक दिन राजमहलमें दमयन्तीको देख लिया। उस समय राजाके महलमें पुण्याहवाचन हो रहा था और दमयन्ती-सुनन्दा एक साथ बैठकर वह मंगलकृत्य देख रही थीं। सुदेव ब्राह्मणने दमयन्तीको देखकर सोचा कि वास्तवमें यही भीम-नन्दिनी है। मैंने इसका जैसा रूप पहले देखा था, वैसा ही अब भी देख रहा हूँ। बड़ा अच्छा हुआ, इसे देख लेनेसे मेरी यात्रा सफल हो गयी। सुदेव दमयन्तीके पास गया और बोला- 'विदर्भनन्दिनि ! मैं तुम्हारे भाईका मित्र सुदेव ब्राह्मण हूँ। राजा भीमकी आज्ञासे तुम्हें ढूँढ़नेके लिये यहाँ आया हूँ। तुम्हारे माता-पिता और भाई सानन्द हैं। तुम्हारे दोनों बच्चे भी विदर्भ देशमें सकुशल हैं। तुम्हारे बिछोहसे सभी कुटुम्बी प्राणहीन-से हो रहे हैं और तुम्हें ढूँढ़नेके लिये सैकड़ों ब्राह्मण पृथ्वीपर घूम रहे हैं। दमयन्तीने ब्राह्मणको पहचान लिया। वह क्रम-क्रमसे सबका कुशल-मंगल पूछने लगी और पूछते-पूछते ही रो पड़ी। सुनन्दा दमयन्तीको बात करते-रोते देखकर घबरा गयी और उसने अपनी माताके पास जाकर सब हाल कहा। राजमाता तुरंत अन्तःपुरसे बाहर निकल आयीं और ब्राह्मणके पास जाकर पूछने लगीं कि 'महाराज ! यह किसकी पत्नी है, किसकी पुत्री है, अपने घरवालोंसे कैसे बिछुड़ गयी है? तुमने इसे पहचाना कैसे ?' सुदेवने नल-दमयन्तीका पूरा चरित्र सुनाया और कहा कि जैसे राखमें दबी हुई आग गर्मीसे जान ली जाती है, वैसे ही इस देवीके सुन्दर रूप और ललाटसे मैंने इसे पहचान लिया है। सुनन्दाने अपने हाथोंसे दमयन्तीका ललाट धो दिया, जिससे उसकी भौंहोंके बीचका लाल चिह्न चन्द्रमाके समान प्रकट हो गया। ललाटका वह तिल देखकर सुनन्दा और राजमाता दोनों ही रो पड़ीं। उन्होंने दो घड़ीतक दमयन्तीको अपनी छातीसे सटाये रखा। राजमाताने कहा- 'दमयन्ती ! मैंने इस तिलसे पहचान लिया कि तुम मेरी बहिनकी पुत्री हो। तुम्हारी माता मेरी सगी बहिन है। हम दोनों दशार्ण देशके राजा सुदामाकी पुत्री हैं।
तुम्हारा जन्म मेरे पिताके घर ही हुआ था, उस समय मैंने तुम्हें देखा था। जैसे तुम्हारे पिताका घर तुम्हारा है, वैसे ही यह घर भी तुम्हारा ही है, यह सम्पत्ति जैसे मेरी है, वैसे ही तुम्हारी भी।' दमयन्ती बहुत प्रसन्न हुई। उसने अपनी मौसीको प्रणाम करके कहा- 'माँ! तुमने मुझे पहचाना नहीं तो क्या हुआ ? मैं रही हूँ यहाँ लड़कीकी ही तरह। तुमने मेरी अभिलाषाएँ पूर्ण की हैं तथा मेरी रक्षा की है। इसमें मुझे संदेह नहीं है कि मैं अब यहाँ और भी सुखसे रहूँगी। परंतु मैं बहुत दिनोंसे घूम रही हूँ। मेरे छोटे-छोटे दो बच्चे पिताजीके घर हैं। वे अपने पिताके वियोगसे दुःखी रहते होंगे। न जाने उनकी क्या दशा होगी! आप यदि मेरा हित करना चाहती हैं तो मुझे विदर्भ देशमें भेजकर मेरी इच्छा पूर्ण कीजिये।' राजमाता बहुत प्रसन्न हुईं। उन्होंने अपने पुत्रसे कहकर पालकी मँगवायी। भोजन, वस्त्र और बहुत-सी वस्तुएँ देकर एक बड़ी सेनाके संरक्षणमें दमयन्तीको विदा कर दिया। विदर्भ देशमें दमयन्तीका बड़ा सत्कार हुआ। दमयन्ती अपने भाई, बच्चे, माता-पिता और सखियोंसे मिली। उसने देवता और ब्राह्मणोंकी पूजा की। राजा भीमको अपनी पुत्रीके मिल जानेसे बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने सुदेव नामक ब्राह्मणको एक हजार गौएँ, गाँव तथा धन देकर संतुष्ट किया।
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नलकी खोज, ऋतुपर्णकी विदर्भ-यात्रा, कलियुगका उतरना
बृहदश्वजी कहते हैं- युधिष्ठिर ! अपने पिताके घर एक दिन विश्राम करके दमयन्तीने अपनी मातासे कहा कि 'माताजी ! मैं आपसे सत्य कहती हूँ। यदि आप मुझे जीवित रखना चाहती हैं तो मेरे पतिदेवको ढूँढ़वानेका उद्योग कीजिये।' रानीने बहुत दुःखित होकर अपने पति राजा भीमसे कहा कि 'स्वामिन् ! दमयन्ती अपने पतिके लिये बहुत व्याकुल है। उसने संकोच छोड़कर मुझसे कहा है कि उन्हें ढूँढ़वानेका उद्योग करना चाहिये।' राजाने अपने आश्रित ब्राह्मणोंको बुलवाया और नलको ढूँढ़नेके लिये उन्हें नियुक्त कर दिया। ब्राह्मणोंने दमयन्तीके पास जाकर कहा कि 'अब हम राजा नलका पता लगानेके लिये जा रहे हैं।' दमयन्तीने ब्राह्मणोंसे कहा कि "आपलोग जिस राज्यमें जायँ, वहाँ मनुष्योंकी भीड़में यह बात कहें- 'मेरे प्यारे छलिया ! तुम मेरी साड़ीमेंसे आधी फाड़कर तथा मुझ दासीको वनमें सोती छोड़कर कहाँ चले गये ? तुम्हारी वह दासी अब भी उसी अवस्थामें आधी साड़ी पहने तुम्हारे आनेकी बाट जोह रही है और तुम्हारे वियोगके दुःखसे दुःखी हो रही है।'* उनके सामने मेरी दशाका वर्णन कीजियेगा और ऐसी बात कहियेगा, जिससे वे प्रसन्न हों और मुझपर कृपा करें। मेरी बात कहनेपर यदि आपलोगोंको कोई उत्तर दे तो 'वह कौन है, कहाँ रहता है'-इन बातोंका पता लगा लीजियेगा और उसका उत्तर याद रखकर मुझे सुनाइयेगा। इस बातका भी ध्यान रखियेगा कि आपलोग यह बात मेरी आज्ञासे कह रहे हैं, यह उसे मालूम न होने पावे।" ब्राह्मणगण दमयन्तीके निर्देशानुसार राजा नलको ढूँढ़नेके लिये निकल पड़े।
[* क्व नु त्वं कितवच्छित्त्वा वस्त्रार्धं प्रस्थितो मम। उत्सृज्य विपिने सुप्तामनुरक्तां प्रियां प्रिय ॥ सा वै यथा त्वया दृष्टा तथाऽऽस्ते त्वत्प्रतीक्षिणी। दह्यमाना भृशं बाला वस्त्रार्धेनाभिसंवृता ॥ (महा० वन० ६९ । ३७-३८)]
बहुत दिनोंतक ढूँढ़ने-खोजनेके बाद पर्णाद नामक ब्राह्मणने महलमें आकर दमयन्तीसे कहा- "राजकुमारी ! मैं आपके निर्देशानुसार निषधनरेश नलका पता लगाता हुआ अयोध्या जा पहुँचा। वहाँ मैंने राजा ऋतुपर्णके पास जाकर भरी सभामें तुम्हारी बात दुहरायी। परंतु वहाँ किसीने कुछ उत्तर नहीं दिया। जब मैं चलने लगा, तब उसके बाहुक नामक सारथिने मुझे एकान्तमें बुलाकर कुछ कहा। देवि ! वह सारथि राजा ऋतुपर्णके घोड़ोंको शिक्षा देता है, स्वादिष्ट भोजन बनाता है; परंतु उसके हाथ छोटे और शरीर कुरूप है। उसने लम्बी साँस लेकर रोते हुए कहा कि 'कुलीन स्त्रियाँ घोर कष्ट पानेपर भी अपने शीलकी रक्षा करती हैं और अपने सतीत्वके बलपर स्वर्ग जीत लेती हैं। कभी उनका पति त्याग भी दे तो वे क्रोध नहीं करतीं, अपने सदाचारकी रक्षा करती हैं। * त्यागनेवाला पुरुष विपत्तिमें पड़नेके कारण दुःखी और अचेत हो रहा था, इसलिये उसपर क्रोध करना उचित नहीं है। माना कि पतिने अपनी पत्नीका योग्य सत्कार नहीं किया। परंतु वह उस समय राज्यलक्ष्मीसे च्युत, क्षुधातुर, दुःखी और दुर्दशाग्रस्त था। ऐसी अवस्थामें उसपर क्रोध करना उचित नहीं है। जब वह अपनी प्राण-रक्षाके लिये जीविका चाह रहा था, तब पक्षी उसके वस्त्र लेकर उड़ गये। उसके हृदयकी पीड़ा असह्य थी।' राजकुमारी ! बाहुककी यह बात सुनकर मैं तुम्हें सुनानेके लिये आया हूँ। तुम जैसा उचित समझो, करो। चाहो तो महाराजसे भी कह दो।"
[* वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः। आत्मानमात्मना सत्यो जितः स्वर्गो न संशयः ॥ रहिता भर्तृभिश्चैव न कुप्यन्ति कदाचन। प्राणांश्चारित्रकवचान् धारयन्ति वरस्त्रियः ॥ (महा० वन० ७०।८-९)]
ब्राह्मणकी बात सुनकर दमयन्तीकी आँखोंमें आँसू भर आये।
उसने अपनी माँसे एकान्तमें कहा- 'माताजी ! आप यह बात पिताजीसे न कहें। मैं सुदेव ब्राह्मणको इस काममें नियुक्त करती हूँ। जैसे सुदेवने मुझे शुभ मुहूर्तमें यहाँ पहुँचाया था, वैसे ही वह शुभ शकुन देखकर अयोध्या जाय और मेरे पतिदेवको लानेकी युक्ति करे।' इसके बाद दमयन्तीने पर्णादका सत्कार करके उसे विदा किया और सुदेवको बुलाया। दमयन्तीने सुदेवसे कहा-'ब्राह्मणदेवता ! आप शीघ्र-से-शीघ्र अयोध्या नगरीमें जाकर राजा ऋतुपर्णसे यह बात कहिये कि भीम-पुत्री दमयन्ती फिरसे स्वयंवरमें स्वेच्छानुसार पति-वरण करना चाहती है। बड़े-बड़े राजा और राजकुमार जा रहे हैं। स्वयंवरकी तिथि कल ही है। इसलिये यदि आप पहुँच सकें तो वहाँ जाइये। नलके जीने अथवा मरनेका किसीको पता नहीं है, इसलिये वह कल सूर्योदयके समय दूसरा पति वरण करेगी।' दमयन्तीकी बात सुनकर सुदेव अयोध्या गये और उन्होंने राजा ऋतुपर्णसे सब बातें कह दीं।
राजा ऋतुपर्णने सुदेव ब्राह्मणकी बात सुनकर बाहुकको बुलाया और मधुर वाणीसे समझाकर कहा कि 'बाहुक ! कल दमयन्तीका स्वयंवर है। मैं एक ही दिनमें विदर्भ देशमें पहुँचना चाहता हूँ। परंतु यदि तुम इतना जल्दी वहाँ पहुँच जाना सम्भव समझो, तभी मैं वहाँ जाऊँगा।' ऋतुपर्णकी बात सुनकर नलका कलेजा फटने लगा। उन्होंने अपने मनमें सोचा कि 'दमयन्तीने दुःखसे अचेत होकर ही ऐसा कहा होगा। सम्भव है, वह ऐसा करना चाहती हो। परंतु नहीं-नहीं, उसने मेरी प्राप्तिके लिये ही यह युक्ति की होगी। वह पतिव्रता, तपस्विनी और दीन है। मैंने दुर्बुद्धिवश उसे त्यागकर बड़ी क्रूरता की। अपराध मेरा ही है। वह कभी ऐसा नहीं कर सकती। अस्तु, सत्य क्या है, असत्य क्या है- यह बात तो वहाँ जानेपर ही मालूम होगी। परंतु ऋतुपर्णकी इच्छा पूरी करनेमें मेरा भी स्वार्थ है।'
बाहुकने हाथ जोड़कर कहा कि 'मैं आपके कथनानुसार काम करनेकी प्रतिज्ञा करता हूँ।' बाहुक अश्वशालामें जाकर श्रेष्ठ घोड़ोंकी परीक्षा करने लगे। नलने अच्छी जातिके चार शीघ्रगामी घोड़े रथमें जोत लिये। राजा ऋतुपर्ण रथपर सवार हो गये।
जैसे आकाशचारी पक्षी आकाशमें उड़ते हैं, वैसे ही बाहुकका रथ थोड़े ही समयमें नदी, पर्वत और वनोंको लाँघने लगा। एक स्थानपर राजा ऋतुपर्णका दुपट्टा नीचे गिर गया। उन्होंने बाहुकसे कहा- 'रथ रोको, मैं वाष्र्णेयसे उसे उठवा मँगाऊँ।' नलने कहा- 'आपका वस्त्र गिरा तो अभी है, परंतु अब हम वहाँसे एक योजन आगे निकल आये हैं। अब वह नहीं उठाया जा सकता।' जिस समय यह बात हो रही थी, उस समय वह रथ एक वनमें चल रहा था। ऋतुपर्णने कहा- 'बाहुक ! तुम मेरी गणित-विद्याकी चतुराई देखो। सामनेके वृक्षमें जितने पत्ते और फल दीख रहे हैं, उनकी अपेक्षा भूमिपर गिरे हुए फल और पत्ते एक सौ एक गुने अधिक हैं। इस वृक्षकी दोनों शाखाओं और टहनियोंपर पाँच करोड़ पत्ते हैं और दो हजार पंचानबे फल हैं। तुम्हारी इच्छा हो तो गिन लो।' बाहुकने रथ खड़ा कर दिया और कहा कि 'मैं इस बहेड़ेके वृक्षको काटकर इनके फलों और पत्तोंको ठीक-ठीक गिनकर निश्चय करूँगा।' बाहुकने वैसा ही किया। फल और पत्ते उतने ही हुए, जितने राजाने बतलाये थे। नल आश्चर्यचकित हो गये। बाहुकने कहा- 'आपकी विद्या अद्भुत है। आप अपनी विद्या बतला दीजिये।' ऋतुपर्णने कहा-'गणित-विद्याकी ही तरह मैं पासोंकी वशीकरण-विद्यामें भी ऐसा ही निपुण हूँ।' बाहुकने कहा कि 'आप मुझे यह विद्या सिखा दें तो मैं आपको घोड़ोंकी भी विद्या सिखा दूँ।' ऋतुपर्णको विदर्भ देश पहुँचनेकी बहुत जल्दी थी और अश्वविद्या सीखनेका लोभ भी था, इसलिये उन्होंने राजा नलको पासोंकी विद्या सिखा दी और कह दिया कि 'अश्वविद्या तुम मुझे पीछे सिखा देना। मैंने उसे तुम्हारे पास धरोहर छोड़ दिया।'
जिस समय राजा नलने पासोंकी विद्या सीखी, उसी समय कलियुग कर्कोटक नागके तीखे विषको उगलता हुआ नलके शरीरसे बाहर निकल गया। कलियुगके बाहर निकलनेपर नलको बड़ा क्रोध आया और उन्होंने उसे शाप देना चाहा। कलियुग दोनों हाथ जोड़कर भयसे काँपता हुआ कहने लगा- 'आप क्रोध शान्त कीजिये, मैं आपको यशस्वी बनाऊँगा। आपने जिस समय दमयन्तीका त्याग किया था, उसी समय उसने मुझे शाप दे दिया था। मैं बड़े दुःखके साथ कर्कोटक नागके विषसे जलता हुआ आपके शरीरमें रहता था। मैं आपकी शरणमें हूँ, मेरी प्रार्थना सुनें और मुझे शाप न दें। जो आपके पवित्र चरित्रका गान करेंगे, उन्हें मेरा भय नहीं होगा।' राजा नलने क्रोध शान्त किया। कलियुग भयभीत होकर बहेड़ेके पेड़में घुस गया। यह संवाद कलियुग और नलके अतिरिक्त और किसीको मालूम नहीं हुआ। वह वृक्ष ठूंठ-सा हो गया। *
इस प्रकार कलियुगने राजा नलका पीछा छोड़ दिया, परंतु अभी उनका रूप नहीं बदला था। उन्होंने अपने रथको जोरसे हाँका और सायंकाल होते-न-होते वे विदर्भ देशमें जा पहुँचे।
[* ये च त्वां मनुजा लोके कीर्तयिष्यन्त्यतन्द्रिताः।
मत्प्रसूतं भयं तेषां न कदाचिद् भविष्यति ॥
भयार्तं शरणं यातं यदि मां त्वं न शप्स्यसे।
एवमुक्तो नलो राजा न्ययच्छत् कोपमात्मनः ॥
ततो भीतः कलिः क्षिप्रं प्रविवेश बिभीतकम्। कलिस्त्वन्यैस्तदादृश्यः कथयन् नैषधेन वै ॥
(महा० वन० ७२। ३६-३८)]
राजा भीमके पास समाचार भेजा गया। उन्होंने ऋतुपर्णको अपने यहाँ बुला लिया। ऋतुपर्णके रथकी झंकारसे दिशाएँ गूँज उठीं। कुण्डिननगरमें राजा नलके वे घोड़े भी रहते थे, जो उनके बच्चोंको लेकर आये थे। रथकी घरघराहटसे उन्होंने राजा नलको पहचान लिया और वे पूर्ववत् प्रसन्न हो गये।
दमयन्तीको भी वह आवाज वैसी ही जान पड़ी। दमयन्ती कहने लगी कि 'इस रथकी घरघराहट मेरे चित्तमें उल्लास पैदा करती है, अवश्य ही इसको हाँकनेवाले मेरे पतिदेव हैं। यदि आज वे मेरे पास नहीं आयेंगे तो मैं धधकती आगमें कूद पड़ेंगी। मैंने कभी हँसी-खेलमें भी उनसे झूठ बात कही हो, उनका कोई अपकार किया हो, प्रतिज्ञा करके तोड़ दी हो, ऐसी याद नहीं आती। वे शक्तिशाली, क्षमावान्, वीर, दाता और एकपत्नीव्रती हैं। उनके वियोगसे मेरी छाती फट रही है।' दमयन्ती महलकी छतपर चढ़कर रथका आना और उसपरसे रथी-सारथिका उतरना देखने लगी।
दमयन्तीके द्वारा राजा नलकी परीक्षा, पहचान, मिलन, राज्यप्राप्ति और कथाका उपसंहार
बृहदश्वजी कहते हैं- युधिष्ठिर ! विदर्भ-नरेश भीमने अयोध्याधिपति ऋतुपर्णका खूब स्वागत-सत्कार किया। ऋतुपर्णको अच्छे स्थानमें ठहरा दिया गया। उन्हें कुण्डिनपुरमें स्वयंवरका कोई चिह्न नहीं दिखायी पड़ा। भीमको इस बातका बिलकुल पता नहीं था कि राजा ऋतुपर्ण मेरी पुत्रीके स्वयंवरका निमन्त्रण पाकर यहाँ आये हैं। उन्होंने कुशल-मंगलके बाद पूछा कि 'आप यहाँ किस उद्देश्यसे पधारे हैं?' ऋतुपर्णने स्वयंवरकी कोई तैयारी न देखकर निमन्त्रणकी बात दबा दी और कहा- 'मैं तो केवल आपको प्रणाम करनेके लिये ही चला आया हूँ।' भीम सोचने लगे कि 'सौ योजनसे भी अधिक दूर कोई प्रणाम करनेके लिये नहीं आ सकता। अस्तु, आगे चलकर यह बात खुल ही जायगी।' भीमने बड़े सत्कारके साथ आग्रह करके ऋतुपर्णको अपने यहाँ रख लिया। बाहुक भी वाष्र्णेयके साथ अश्वशालामें ठहरकर घोड़ोंकी सेवामें संलग्न हो गया।
दमयन्ती आकुल होकर सोचने लगी कि 'रथकी ध्वनि तो मेरे पतिदेवके रथके ही समान जान पड़ती थी, परंतु उनके कहीं दर्शन नहीं हो रहे हैं। हो-न-हो वाष्र्णेयने उनसे रथ-विद्या सीख ली होगी, इसी कारण रथ उनका मालूम पड़ता था। सम्भव है, ऋतुपर्णको भी यह विद्या मालूम हो। उसने अपनी दासीको बुलाकर कहा कि 'केशिनी ! तू जा। इस बातका पता लगा कि वह कुरूप पुरुष कौन है। सम्भव है, ये ही हमारे पतिदेव हों। मैंने ब्राह्मणोंके द्वारा जो संदेश भेजा था, वही उसे बतलाना और उसका उत्तर सुनकर मुझसे कहना।' केशिनीने जाकर बाहुकसे बातें कीं। बाहुकने राजाके आनेका कारण बताया और संक्षेपमें वाष्र्णेय तथा अपनी अश्वविद्या एवं भोजन बनानेकी चतुरताका परिचय दिया। केशिनीने पूछा- 'बाहुक ! राजा नल कहाँ हैं? क्या तुम जानते हो ? अथवा तुम्हारा साथी वाष्र्णेय जानता है?' बाहुकने कहा-'केशिनी ! वाष्र्णेय राजा नलके बच्चेको यहाँ छोड़कर चला गया था। उसे उनके सम्बन्धमें कुछ भी मालूम नहीं है। इस समय नलका रूप बदल गया है। वे छिपकर रहते हैं। उन्हें या तो स्वयं वे ही पहचान सकते हैं या उनकी पत्नी दमयन्ती । क्योंकि वे अपने गुप्त चिह्नोंको दूसरोंके सामने प्रकट करना नहीं चाहते। केशिनी ! राजा नल विपत्तिमें पड़ गये थे। इसीसे उन्होंने अपनी पत्नीका त्याग किया। दमयन्तीको अपने पतिपर क्रोध नहीं करना चाहिये। जिस समय वे भोजनकी चिन्तामें थे, पक्षी उनके वस्त्र लेकर उड़ गये। उनका हृदय पीड़ासे जर्जरित था। यह ठीक है कि उन्होंने अपनी पत्नीके साथ उचित व्यवहार नहीं किया। फिर भी दमयन्तीको उनकी दुरवस्थापर विचार करके क्रोध नहीं करना चाहिये।' यह कहते नलका हृदय खिन्न हो गया। आँखोंमें आँसू आ गये, वे रोने लगे। केशिनीने दमयन्तीके पास आकर वहाँकी सब बातचीत और उनका रोना भी बतलाया।
अब दमयन्तीकी आशंका और भी दृढ़ होने लगी कि यही राजा नल हैं। उसने दासीसे कहा कि 'केशिनी ! तुम फिर बाहुकके पास जाओ और उसके पास बिना कुछ बोले खड़ी रहो। उसकी चेष्टाओंपर ध्यान दो। वह आग माँगे तो मत देना। जल माँगे तो देर कर देना। उसका एक-एक चरित्र मुझे आकर बताओ।' केशिनी फिर बाहुकके पास गयी और वहाँ उसके देवताओं एवं मनुष्योंके समान बहुत-से चरित्र देखकर लौट आयी और दमयन्तीसे कहने लगी- 'राजकुमारी !' बाहुकने तो जल, थल और अग्निपर सब तरहसे विजय प्राप्त कर ली है। मैंने आजतक ऐसा पुरुष न कहीं देखा है और न सुना ही है। यदि कहीं नीचा द्वार आ जाता है तो वह झुकता नहीं, उसे देखकर द्वार ही ऊँचा हो जाता है। वह बिना झुके ही चला जाता है। छोटे-से-छोटा छेद भी उसके लिये गुफा बन जाता है। वहाँ जलके लिये जो घड़े रखे थे, वे उसकी दृष्टि पड़ते ही जलसे भर गये। उसने फूसका पूला लेकर सूर्यकी ओर किया और वह जलने लगा। इसके अतिरिक्त वह अग्निका स्पर्श करके भी जलता नहीं है।
पानी उसके इच्छानुसार बहता है। वह जब अपने हाथसे फूलोंको मसलने लगता है, तब वे कुम्हलाते नहीं और प्रफुल्लित तथा सुगन्धित दीखते हैं। इन अद्भुत लक्षणोंको देखकर मैं तो भौंचक्की-सी रह गयी और बड़ी शीघ्रतासे तुम्हारे पास चली आयी।' दमयन्ती बाहुकके कर्म और चेष्टाओंको सुनकर निश्चित रूपसे जान गयी कि ये अवश्य ही मेरे पतिदेव हैं। उसने केशिनीके साथ अपने दोनों बच्चोंको नलके पास भेज दिया। बाहुक इन्द्रसेना और इन्द्रसेनको पहचानकर उनके पास आ गया और दोनों बालकोंको छातीसे लगाकर गोदमें बैठा लिया। बाहुक अपनी संतानोंसे मिलकर घबरा गया और रोने लगा। उसके मुखपर पिताके समान स्नेहके भाव प्रकट होने लगे। तदनन्तर बाहुकने दोनों बच्चे केशिनीको दे दिये और कहा- 'ये बच्चे मेरे दोनों बच्चोंके समान ही हैं, इसलिये मैं इन्हें देखकर रो पड़ा। केशिनी ! तुम बार-बार मेरे पास आती हो, लोग न जाने क्या सोचने लगेंगे। इसलिये यहाँ मेरे पास बार-बार आना उत्तम नहीं है। तुम जाओ।' केशिनीने दमयन्तीके पास आकर वहाँकी सारी बातें कह दीं।
अब दमयन्तीने केशिनीको अपनी माताके पास भेजा और कहलाया कि 'माताजी ! मैंने राजा नल समझकर बार-बार बाहुककी परीक्षा करवायी है। अब मुझे केवल उसके रूपके सम्बन्धमें ही संदेह रह गया है। अब मैं स्वयं उसकी परीक्षा करना चाहती हूँ। इसलिये आप बाहुकको मेरे महलमें आनेकी आज्ञा दे दीजिये अथवा उसके पास ही जानेकी आज्ञा दे दीजिये। आपकी इच्छा हो तो यह बात पिताजीको बतला दीजिये अथवा मत बतलाइये ।' रानीने अपने पति भीमसे अनुमति ली और बाहुक को रनिवास में बुलवानेकी आज्ञा दे दी। बाहुक बुला लिया गया। दमयन्तीक देखते ही नलका हृदय एक साथ ही शोक और दुःखसे भर आया।
वे आँसुओंसे नहा गये। बाहुककी आकुलता देखकर दमयन्ती भी शोकग्रस्त हो गयी। उस समय दमयन्ती गेरुआ वस्त्र पहने हुए थी। केशोंकी जटा बँध गयी थी, शरीर मलिन था। दमयन्तीने कहा-'बाहुक ! पहले एक धर्मज्ञ पुरुष अपनी पत्नीको वनमें सोती छोड़कर चला गया था। क्या कहीं तुमने उसे देखा है? उस समय वह स्त्री थकी-माँदी थी, नींदसे अचेत थी ऐसी निरपराध स्त्रीको पुण्यश्लोक निषधनरेशके सिवा और कौन पुरुष निर्जन वनमें छोड़ सकता है? मैंने जीवन-भरमें जान-बूझकर उनका कोई भी अपराध नहीं किया है। फिर भी वे मुझे वनमें सोती छोड़कर चले गये।' इतना कहते-कहते दमयन्तीके नेत्रोंसे आँसुओंकी झड़ी लग गयी। दमयन्तीके विशाल, साँवले एवं रतनारे नेत्रोंसे आँसू टपकते देखकर नलसे रहा न गया। वे कहने लगे - 'प्रिये! मैंने जान-बूझकर न तो राज्यका नाश किया है और न तो तुम्हें त्यागा है। यह तो कलियुगकी करतूत है।¹ मैं जानता हूँ कि जबसे तुम मुझसे बिछुड़ी हो, तबसे रात-दिन मेरा ही स्मरण-चिन्तन करती रहती हो। कलियुग मेरे शरीरमें रहकर तुम्हारे शापके कारण जलता रहता था। मैंने उद्योग और तपस्याके बलसे उसपर विजय पा ली है और अब हमारे दुःखका अन्त आ गया है। कलियुग अब मुझे छोड़कर चला गया, मैं एकमात्र तुम्हारे लिये ही यहाँ आया हूँ। यह तो बतलाओ कि तुम मेरे-जैसे प्रेमी और अनुकूल पतिको छोड़कर जिस प्रकार दूसरे पतिसे विवाह करनेके लिये तैयार हुई हो, क्या कोई दूसरी स्त्री ऐसा कर सकती है?² तुम्हारे स्वयंवरका समाचार सुनकर ही तो राजा ऋतुपर्ण बड़ी शीघ्रताके साथ यहाँ आये हैं।'
[१-मम राज्यं प्रणष्टं यन्नाहं तत् कृतवान् स्वयम्। कलिना तत् कृतं भीरु यच्च त्वामहमत्यजम् ॥ (महा० वन० ७६ । १७)
२-कथं नु नारी भर्तारमनुरक्तमनुव्रतम्। उत्सृज्य वरयेदन्यं यथा त्वं भीरु कर्हिचित् ॥ (महा० वन० ७६। २२)]
दमयन्तीने हाथ जोड़कर कहा- 'आर्यपुत्र ! मुझपर दोष लगाना उचित नहीं है। आप जानते हैं कि मैंने अपने सामने प्रकट देवताओंको छोड़कर आपको वरण किया है। मैंने आपको ढूँढ़नेके लिये बहुत-से ब्राह्मणोंको भेजा था और वे मेरी कही बात दुहराते हुए चारों ओर घूम रहे थे। पर्णाद नामक ब्राह्मण अयोध्यापुरीमें आपके पास भी पहुँचा था। उसने आपको मेरी बातें सुनायी थीं और आपने उनका यथोचित उत्तर भी दिया था। वह समाचार सुनकर मैंने आपको बुलानेके लिये ही यह युक्ति की थी। मैं जानती हूँ कि आपके अतिरिक्त दूसरा कोई मनुष्य नहीं है, जो एक दिनमें घोड़ोंके रथसे सौ योजन पहुँच जाय। मैं आपके चरणोंमें स्पर्श करके शपथपूर्वक सत्य-सत्य कहती हूँ कि मैंने कभी मनसे भी पर-पुरुषका चिन्तन नहीं किया है। यदि मैंने कभी मनसे भी पापकर्म किया हो तो निरन्तर भूमिपर विचरनेवाले वायुदेव, भगवान् सूर्य और मनके देवता चन्द्रमा मेरे प्राणोंका नाश कर दें। ये तीनों देवता सकल भूमण्डलमें विचरते हैं। वे सच्ची बात बतला दें और यदि मैं पापिनी होऊँ तो मुझे त्याग दें।' उसी समय वायुने अन्तरिक्षमें स्थित होकर कहा- 'राजन् ! मैं सत्य कहता हूँ कि दमयन्तीने कोई पाप नहीं किया है। इसने तीन वर्षतक अपने उज्ज्वल शीलव्रतकी रक्षा की है। हमलोग इसके रक्षकरूपमें रहे हैं और इसकी पवित्रताके साक्षी हैं। * इसने स्वयंवरकी सूचना तो तुम्हें ढूँढ़नेके लिये ही दी थी। वास्तवमें दमयन्ती तुम्हारे योग्य है और तुम दमयन्तीके योग्य हो। कोई शंका न करो और इसे स्वीकार करो।' जिस समय पवनदेवता यह बात कह रहे थे, उस समय आकाशसे पुष्पोंकी वर्षा होने लगी, देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं।
[* एवमुक्तस्तथा वायुरन्तरिक्षादभाषत।
नैषा कृतवती पापं नल सत्यं ब्रवीमि ते ॥
राजञ्छीलनिधिः स्फीतो दमयन्त्या सुरक्षितः।
साक्षिणो रक्षिणश्चास्या वयं त्रीन् परिवत्सरान् ॥ (महा० वन० ७६ । ३६-३७)]
शीतल, मन्द, सुगन्ध वायु चलने लगी। ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर राजा नलने अपना संदेह छोड़ दिया और नागराज कर्कोटकका दिया हुआ वस्त्र ओढ़कर उसका स्मरण किया। उनका शरीर तुरंत पूर्ववत् हो गया। दमयन्ती राजा नलको पहले रूपमें देखकर उनसे लिपट गयी और रोने लगी। राजा नलने भी प्रेमके साथ दमयन्तीको गलेसे लगाया और दोनों बालकोंको छातीसे लिपटाकर उनके साथ प्यारकी बात करने लगे। सारी रात दमयन्तीके साथ बातचीत करनेमें ही बीत गयी।
प्रातःकाल होनेपर नहा-धो, सुन्दर वस्त्र पहनकर दमयन्ती और राजा नल भीमके पास गये और उनके चरणोंमें प्रणाम किया।
भीमने बड़े आनन्दसे उनका सत्कार किया और आश्वासन दिया। बात-की-बातमें यह समाचार सर्वत्र पहुँच गया। नगरके नर-नारी आनन्दमें भरकर उत्सव मनाने लगे। देवताओंकी पूजा हुई। जब राजा ऋतुपर्णको यह बात मालूम हुई कि बाहुकके रूपमें तो राजा नल ही थे, यहाँ आकर वे अपनी पत्नीसे मिल गये, तब उन्हें बड़ा आनन्द हुआ और उन्होंने नलको अपने पास बुलवाकर क्षमा माँगी। राजा नलने उनके व्यवहारोंकी उत्तमता बताकर प्रशंसा की और उनका सत्कार किया। साथ ही उन्हें अश्वविद्या भी सिखा दी। राजा ऋतुपर्ण किसी दूसरे सारथिको लेकर अपने नगर चले गये।
राजा नल एक महीनेतक कुण्डिननगरमें ही रहे। तदनन्तर अपने ससुर भीमकी आज्ञा लेकर थोड़े-से लोगोंको साथ ले निषधदेशके लिये रवाना हुए। राजा भीमने एक श्वेतवर्णका रथ, सोलह हाथी, पचास घोड़े और छः सौ पैदल राजा नलके साथ भेज दिये। अपने नगरमें प्रवेश करके राजा नल पुष्करसे मिले
और बोले कि 'या तो तुम कपटभरे जुएका खेल फिर मुझसे खेलो या धनुषपर डोरी चढ़ाओ।' पुष्करने हँसकर कहा- 'अच्छी बात है, तुम्हें दाँवोंपर लगानेके लिये फिर धन मिल गया। आओ, अबकी बार तुम्हारे धन तथा दमयन्तीको भी जीत लूँगा।' राजा नलने कहा- 'अरे भाई! जूआ खेल लो, बकते क्या हो ! हार जाओगे तो तुम्हारी क्या दशा होगी, जानते हो?' जूआ होने लगा, राजा नलने पहले ही दावँमें पुष्करके राज्य, रत्नोंके भण्डार और उसके प्राणोंको भी जीत लिया। उन्होंने पुष्करसे कहा कि 'यह सब राज्य मेरा हो गया। अब तुम दमयन्तीकी ओर आँख उठाकर भी नहीं देख सकते। तुम दमयन्तीके सेवक हो। अरे मूढ़ ! पहली बार भी तुमने मुझे नहीं जीता था। वह काम कलियुगका था, तुम्हें इस बातका पता नहीं है। मैं कलियुगके दोषको तुम्हारे सिर नहीं मढ़ना चाहता। तुम अपना जीवन सुखसे बिताओ, मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ। तुमपर मेरा प्रेम पहलेके ही समान है। तुम मेरे भाई हो। मैं कभी तुमपर अपनी आँख टेढ़ी नहीं करूँगा। तुम सौ वर्षतक जीओ।' राजा नलने इस प्रकार कहकर पुष्करको धैर्य दिया और उसे अपने हृदयसे लगाकर जानेकी आज्ञा दी। पुष्करने हाथ जोड़कर राजा नलको प्रणाम किया और कहा- 'जगत्में आपकी अक्षय कीर्ति हो और आप दस हजार वर्षतक सुखसे जीवित रहें। आप मेरे अन्नदाता और प्राणदाता हैं।' पुष्कर बड़े सत्कार और सम्मानके साथ एक महीनेतक राजा नलके नगरमें ही रहा। तदनन्तर सेना, सेवक और कुटुम्बियोंके साथ अपने नगरमें चला गया। राजा नल भी पुष्करको पहुँचाकर अपनी राजधानीमें लौट आये। सभी नागरिक, साधारण प्रजा तथा मन्त्रिमण्डलके लोग राजा नलको पाकर बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने रोमांचित शरीरसे हाथ जोड़कर राजा नलसे निवेदन किया- 'राजेन्द्र ! आज हमलोग दुःखसे छुटकारा पाकर सुखी हुए हैं। जैसे देवता इन्द्रकी सेवा करते हैं, वैसे ही आपकी सेवा करनेके लिये हम सब आये हैं।'
घर-घर आनन्द मनाया जाने लगा। चारों ओर शान्ति फैल गयी। बड़े-बड़े उत्सव होने लगे। राजा नलने सेना भेजकर दमयन्तीको बुलवाया। राजा भीमने अपनी पुत्रीको बहुत-सी वस्तुएँ देकर ससुराल भेज दिया। दमयन्ती अपनी दोनों संतानोंको लेकर महलमें आ गयी। राजा नल बड़े आनन्दके साथ समय बिताने लगे। राजा नलकी ख्याति दूर-दूरतक फैल गयी। वे धर्मबुद्धिसे प्रजाका पालन करने लगे। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञ करके भगवान्की आराधना की।
बृहदश्वजी कहते हैं- युधिष्ठिर ! तुम्हें भी थोड़े ही दिनोंमें तुम्हारा राज्य और सगे-सम्बन्धी मिल जायँगे। राजा नलने जूआ खेलकर बड़ा भारी दुःख मोल ले लिया था। उसे अकेले ही सब दुःख भोगना पड़ा; परंतु तुम्हारे साथ तो भाई हैं, द्रौपदी है और बड़े-बड़े विद्वान् तथा सदाचारी ब्राह्मण हैं। ऐसी दशामें शोक करनेका तो कोई कारण ही नहीं है। संसारकी स्थितियाँ सर्वदा एक-सी नहीं रहतीं। यह विचार करके भी उनकी अभिवृद्धि और ह्राससे चिन्ता नहीं करनी चाहिये। नागराज कर्कोटक, दमयन्ती, नल और ऋतुपर्णकी यह कथा कहने-सुननेसे कलियुगके पापोंका नाश होता है और दुःखी मनुष्योंको धैर्य मिलता है।
सूक्तियाँ
१. विशिष्टया विशिष्टेन संगमो गुणवान् भवेत्। (महा० वन० ५३। ३१)
'यदि किसी विशिष्ट नारीका विशिष्ट पुरुषके साथ संयोग हो तो वह विशेष गुणकारी होता है।'
२. नास्ति भार्यासमं मित्रं नरस्यार्तस्य भेषजम् ॥
(महा० वन० ६१।३०)
'दुःखी मनुष्यके लिये पत्नीके समान दूसरा कोई मित्र या औषध नहीं है।'
३. नाकाले विहितो मृत्युर्मर्त्यानाम् ।'
'मनुष्योंकी मृत्यु असमयमें नहीं होती।' (६३। ७)
४. चत्वार एकतो वेदाः साङ्गोपाङ्गाः सविस्तराः ।
स्वधीता मनुजव्याघ्र सत्यमेकं किलैकतः ॥ (६४।१७)
'एक ओर अंग और उपांगोंसहित विस्तारपूर्वक चारों वेदोंका स्वाध्याय हो और दूसरी ओर केवल सत्यभाषण हो तो वह निश्चय ही उससे बढ़कर है।'
५. 'नाप्राप्तकालो म्रियते।' (६५। ३९)
'जिसकी मृत्युका समय नहीं आया है, वह इच्छा होते हुए भी मर नहीं सकता।'
६. न ह्यदैवकृतं किंचिन्नराणामिह विद्यते । (६५।४०)
'मनुष्योंको इस जगत्में कोई भी सुख या दुःख ऐसा नहीं मिलता, जो विधाताका दिया हुआ न हो।'
७. भर्ता नाम परं नार्या भूषणं भूषणैर्विना । (६८। १९)
'वास्तवमें पति ही नारीका सबसे श्रेष्ठ आभूषण है। उसके होनेसे वह बिना आभूषणोंके सुशोभित होती है।'
८. सर्वः सर्वं न जानाति सर्वज्ञो नास्ति कश्चन ।
नैकत्र परिनिष्ठास्ति ज्ञानस्य पुरुषे क्वचित् ॥ (७२।८)
'सब लोग सभी बातें नहीं जानते। संसारमें कोई भी सर्वज्ञ नहीं है तथा एक ही पुरुषमें सम्पूर्ण ज्ञानकी प्रतिष्ठा नहीं है।'
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९. वैषम्यमपि सम्प्राप्ता गोपायन्ति कुलस्त्रियः । आत्मानमात्मना सत्यो जितः स्वर्गो न संशयः ॥ (७०।८; ७४। २५)
'उत्तम कुलकी स्त्रियाँ बड़े भारी संकटमें पड़कर भी स्वयं अपनी रक्षा करती हैं। ऐसा करके वे स्वर्ग और सत्य दोनोंपर विजय पा लेती हैं, इसमें संशय नहीं है।'
१०. रहिता भर्तृभिश्चापि न क्रुध्यन्ति कदाचन। प्राणांश्चारित्रकवचान् धारयन्ति वरस्त्रियः ॥ (७०। ९; ७४। २६)
'श्रेष्ठ नारियाँ अपने पतिसे परित्यक्त होनेपर भी कभी क्रोध नहीं करतीं। वे सदा सदाचाररूपी कवचसे आवृत प्राणोंको धारण करती हैं।'
११. अस्थिरत्वं च संचिन्त्य पुरुषार्थस्य नित्यदा।
तस्योदये व्यये चापि न चिन्तयितुमर्हसि ॥ (७९।१२)
'पुरुषको प्राप्त होनेवाले सभी विषय सदा अस्थिर एवं विनाशशील हैं। यह सोचकर उनके मिलने या नष्ट होनेपर तुम्हें तनिक भी चिन्ता नहीं करनी चाहिये।'
१२. विषमावस्थिते दैवे पौरुषेऽफलतां गते।
विषादयन्ति नात्मानं सत्त्वोपाश्रयिणो नराः॥ (७९।१४)
'जब दैव (प्रारब्ध) प्रतिकूल हो और पुरुषार्थ निष्फल हो जाय, उस समय भी सत्त्वगुणका आश्रय लेनेवाले मनुष्य अपने मनमें विषाद नहीं लाते।'
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