📖 रानी मंझा और 101 चावलों की कथा

नरवरगढ़ का राजमहल बाहर से जितना भव्य था, भीतर उतना ही सूना। एक संध्या रानी मंझा गंभीर स्वर में राजा वीरसेन के पास आईं।

“हे महाराज, हमारी कोई संतान नहीं है। हमारा वंश अब कैसे आगे चलेगा? हमें कोई न कोई उपाय तो ढूँढना ही होगा, वरना हमारे सिंहासन की गद्दी खाली रह जाएगी।”

राजा ने भारी स्वर में कहा, “रानी, मैंने यज्ञ कराए, दान दिए, तपस्वियों की सेवा की, पर भाग्य साथ नहीं देता। 101 रानियाँ हैं मेरे महल में, पर किसी की गोद नहीं भरी। क्या यह राज्य अनाथ हो जाएगा?”

मंझा बोलीं, “प्राणनाथ, जब तक प्राण हैं, आशा है। अवश्य कोई उपाय होगा।”

उधर महल की अन्य रानियाँ आपस में फुसफुसातीं—
“यदि मंजा रानी के पुत्र पैदा हो गया तो महाराज हमें रानी का अधिकार कभी नहीं देंगे। हमें षड्यंत्र रचना होगा।”

समय बीतता गया। राजा की आयु बढ़ती गई, चिंता भी। उसी समय नरवरगढ़ के समीप वन में महान योगी गुरु गोरखनाथ पधारे। वे शाही बगीचे में एक वृक्ष के नीचे समाधि लगाकर बैठ गए। रानी मंझा को जब यह समाचार मिला, तो उन्होंने राजा से कहा, “हे नाथ, ऐसे सिद्ध महात्मा हमारे बाग में ठहरे हैं। यदि हम सेवा करें तो संभव है हमारी मनोकामना पूर्ण हो।”

राजा और मंझा दोनों उनकी सेवा में लग गए। वर्षों बीत गए। कहते हैं बारह वर्ष तक उन्होंने निःस्वार्थ सेवा की। अंततः एक दिन गुरु की समाधि भंग हुई। उन्होंने नेत्र खोले और सामने दंपति को विनीत भाव से खड़ा देखा।

मंझा उनके चरणों में गिर पड़ीं, “बाबा, मेरी आयु व्यथित हो गई। महाराज वृद्ध हो चले हैं। हमारे घर में 101 रानियाँ हैं, पर कोई संतान नहीं। कृपा करके हमें पुत्र रत्न प्रदान करें।”

गुरु ने प्रसन्न होकर कहा, “राजन, मैं तुम पर और इस रानी पर प्रसन्न हूँ। तुम्हें पुत्र होगा।”

मंझा ने फिर हाथ जोड़कर कहा, “गुरुदेव, मेरी सौ बहनें और हैं। यदि सबकी गोद भर जाए तो यही सच्चा आशीर्वाद होगा।”

गुरु ने 101 चावल अभिमंत्रित किए और राजा को देकर कहा, “प्रातः स्नान, पूजा और नियम से प्रत्येक रानी को एक-एक दाना खिला देना। जिसने खाया, उसके यहाँ पुत्र होगा। जिसने न खाया, उसे संतान नहीं होगी।”

राजा आनंदित होकर लौटे। दूसरे दिन विधि-विधान से पूजा हुई। 101 रानियों को एक-एक चावल दिया गया। मंझा ने श्रद्धा से खा लिया। पर शेष सौ रानियाँ मन ही मन सोचने लगीं—“यदि सचमुच इससे गर्भ ठहर गया तो मंजा की प्रतिष्ठा और बढ़ जाएगी।” ईर्ष्या ने उन्हें अंधा कर दिया। उन्होंने अवसर पाकर चावल पीछे फेंक दिए।

कुछ समय बाद महल में समाचार फैला—“देखिए ना महाराज, मैं गर्भवती हो गई हूँ,” मंझा ने लज्जा और आनंद से कहा। राजा की आँखों में वर्षों बाद चमक लौटी। वे बोले, “अब मेरा बुढ़ापा सुधर जाएगा।”

पर सौ रानियों के मन में भय छा गया। वे एकत्र हुईं—
“बहनों, यदि मंजा रानी के पुत्र पैदा हो गया तो महाराज हमें कभी महत्व नहीं देंगे। हमें कुछ करना होगा।”

उधर समय आया और मंझा ने एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया। पर षड्यंत्र पहले से तैयार था। दाइयों को बहकाकर बालक को गुप्त रूप से हटवा दिया गया और राजा से कहा गया कि शिशु जीवित नहीं रहा।

परंतु ईश्वर की लीला निराली थी। बालक सुरक्षित बच गया और वन में एक आश्रम में पला-बढ़ा। वही बालक आगे चलकर राजा नल कहलाया—इस कथा का नायक।

महाभारत में भी राजा नल का उल्लेख आता है। जब पांडव वनवास में थे, तब युधिष्ठिर ने धैर्य देते हुए कहा था कि इस धरती पर एक राजा नल भी हुआ था जिसने विपत्ति में बारह वर्ष कठिन जीवन बिताया, साधारण भोजन किया, पर धैर्य नहीं छोड़ा। यदि वह सह सकता है, तो हम भी धैर्य धारण करें।

वही नल, नरवरगढ़ के राजा वीरसेन का पुत्र था। ईश्वर की कृपा और गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से जन्मा, षड्यंत्रों से बचा, और आगे चलकर महान राजा बना। उसकी कथा धैर्य, सत्य और भाग्य के संघर्ष की कथा है।

इस प्रकार जो बालक ईर्ष्या के कारण जन्मते ही मिटा देने की चेष्टा की गई, वही आगे चलकर यशस्वी राजा बना। और यह सिद्ध हुआ कि जो ईश्वर चाहता है वही होता है; मानव की चालें अंततः उसी की इच्छा के आगे झुक जाती हैं।



नरवरगढ़ का महल सांझ की सुनहरी रोशनी में डूबा था। आँगन में शहनाइयों की धुनें कभी बजती थीं, पर आज वहाँ एक अजीब सन्नाटा पसरा था। राजा प्रथम अपने विशाल कक्ष में अकेले बैठे थे। उनके चेहरे पर वैभव नहीं, विषाद था। इतने बड़े राज्य के स्वामी होकर भी वे भीतर से रिक्त थे।

उसी समय पटरानी मंझा धीरे-धीरे उनके पास आईं। उन्होंने देखा—राजा की आँखें नम हैं।

मंझा ने कोमल स्वर में पूछा, “महाराज, आज फिर आप चिंतित हैं?”

राजा ने गहरी साँस ली, “रानी… मेरे जीवन का संध्या समय आ पहुँचा है। राज्य है, धन है, यश है… पर उत्तराधिकारी नहीं। मेरे बाद इस नरवरगढ़ का क्या होगा? 101 रानियाँ हैं मेरे महल में, पर किसी की गोद नहीं भरी। क्या हमारा वंश यहीं समाप्त हो जाएगा?”

मंझा की आँखें भी भर आईं। “महाराज, यही पीड़ा मेरे हृदय में भी है। महल में उत्सव होते हैं, पर शिशु की किलकारी नहीं। मैं ईश्वर से प्रतिदिन प्रार्थना करती हूँ।”

राजा ने कहा, “मैंने यज्ञ कराए, दान दिए, तीर्थ किए… पर भाग्य साथ नहीं देता।”

मंझा कुछ क्षण मौन रहीं, फिर बोलीं, “महाराज, मैंने सुना है कि वन में महान सिद्ध योगी गुरु गोरखनाथ तप कर रहे हैं। उनकी कृपा से असंभव भी संभव हो जाता है। यदि आप अनुमति दें तो मैं उनके चरणों में जाकर प्रार्थना करूँ।”

राजा ने आशा भरी दृष्टि से देखा, “यदि तुम्हें विश्वास है, तो अवश्य जाओ। मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा।”

अगले दिन दोनों वन की ओर चले। तपोवन में योगी ध्यानमग्न बैठे थे। मंझा उनके चरणों में गिर पड़ीं, “बाबा, मेरी आयु व्यथित हो गई। महाराज वृद्ध हो चले हैं। हमारे महल में 101 रानियाँ हैं, पर संतान नहीं। कृपा कर हमें पुत्र रत्न प्रदान करें।”

गुरु ने नेत्र खोले। उनकी दृष्टि करुणा से भरी थी। “राजन, मैं तुम पर और इस रानी पर प्रसन्न हूँ। तुम्हारे यहाँ पुत्र होगा।”

तभी मंझा ने हाथ जोड़कर कहा, “गुरुदेव, मेरी सौ बहनें और हैं। यदि सबकी गोद भर जाए तो यही सच्चा आशीर्वाद होगा।”

गुरु मुस्कराए। उन्होंने 101 चावल अपने हाथों में लिए, मंत्र पढ़े, और उन्हें तेज से अभिमंत्रित कर राजा को देते हुए बोले, “इन चावलों को नियमपूर्वक प्रातः स्नान और पूजा के बाद प्रत्येक रानी को एक-एक दाना खिला देना। जिसने खाया, उसके यहाँ पुत्र होगा। जिसने न खाया, उसे संतान नहीं होगी।”

राजा और मंझा आनंदित होकर नरवरगढ़ लौट आए। अगले दिन पूरे विधि-विधान से स्नान, पूजा और मंत्रोच्चार हुआ। राजा ने अपने हाथों से 101 रानियों को एक-एक चावल दिया।

रानियाँ चावल हाथ में लेकर मन ही मन सोचने लगीं—“यदि मंझा को पुत्र हो गया तो वह और अधिक प्रिय हो जाएगी। हम सब पीछे रह जाएँगी।” ईर्ष्या ने श्रद्धा को ढक लिया। एक-एक कर सौ रानियों ने चुपके से वे चावल पीछे फेंक दिए। केवल मंझा ने आँखें बंद कर श्रद्धा से चावल ग्रहण किया।

समय बीता। कुछ महीनों बाद समाचार फैला—मंझा गर्भवती है। अब सौ रानियों के हृदय में भय समा गया। “हमने चावल फेंक दिए… और उसने खा लिया। अब वह महारानी बनेगी। महाराज उसे ही सर्वाधिक मान देंगे। हमारा क्या होगा?”

ईर्ष्या ने षड्यंत्र का रूप लिया। वे एकत्र हुईं और योजना बनाई कि जन्म होते ही शिशु को नष्ट कर दिया जाए।

रात आई। प्रसव का समय आया। बिजली चमकी, बादल गरजे। मंझा ने एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया। उसके जन्म के साथ ही महल में दीपक स्वयं प्रज्वलित हो उठे। वातावरण सुगंधित हो गया।

पर षड्यंत्र पहले से तैयार था। दाइयों को बहकाया गया। राजा को कह दिया गया कि मृत बालक जन्मा है। शिशु को चुपचाप वन की ओर ले जाया गया।

दाई जब उसे छोड़ने लगी तो बालक मुस्कराया। उसकी आँखों में असाधारण तेज था। दाई का हृदय पिघल गया। उसे गुरु की वाणी स्मरण हुई। उसने बालक को एक साधु के आश्रम के पास सुरक्षित छोड़ दिया।

वर्ष बीतते गए। बालक आश्रम में पला, वीर और धर्मनिष्ठ बना। उधर नरवरगढ़ में वृद्ध राजा और शोकाकुल मंझा जीवन बिताते रहे।

एक दिन शत्रुओं ने आक्रमण किया। सेना हारने लगी। तभी वन से एक युवा वीर आया। उसने अद्भुत साहस से शत्रुओं को परास्त किया। राजा ने उसे दरबार में बुलाया। उसकी आँखों में अपना ही प्रतिबिंब देखा।

उसी समय दाई ने सत्य प्रकट कर दिया। राजा स्तब्ध रह गए। मंझा की आँखों से आँसू बह निकले। सौ रानियाँ भय से काँप उठीं।

राजा ने घोषणा की, “सत्य कभी छिपता नहीं। ईर्ष्या अंततः स्वयं का नाश करती है।” सौ रानियों को दंड मिला। वीर युवक को युवराज घोषित किया गया। मंझा की गोद पुनः भर गई।

और दूर कहीं वन में गुरु गोरखनाथ ध्यानमग्न मुस्करा रहे थे—जैसे कह रहे हों, “जो ईश्वर चाहता है, वही होता है।”

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हे महाराज हमारी कोई संतान नहीं है। हमारा वंश अब कैसे आगे चलेगा? महाराज हमें कोई ना कोई उपाय तो ढूंढना ही होगा वरना हमारे सिंहासन की गद्दी खाली रहजाएगी।

देखिए ना महाराज मैं गर्भवती हो गई हूं। अब मैं मेरी संतान के सभी सुख भोगूंगी। 

बहनों यदि मंजा रानी के पुत्र पैदा हो गया तो महाराज हमें रानी का अधिकार कभी नहीं देंगे। हमें षड्यंत्र रचना होगा। 

दोस्तों राजा नल जो इस कथा का नायक है। इस कहानी का मूल नायक है। उस राजा नल का जन्म कहां से हुआ? कैसे हुआ। राजा नल का जन्म। 

दोस्तों, राजा नल से संबंधित लेख महाभारत में भी मिलता है। महाभारत में पांडव वनवास में होते हैं। तो युधिष्ठिर उस समय पांडवों को धैर्य बनाते हुए कहते हैं कि इस धरती पर एक ऐसा राजा भी पैदा हुआ था जिसने 12 वर्ष तक तेली के घर पूजन किया था। खेल कहते हैं जिसे जो पशुओं के लिए चढ़ाई जाती हैखिलाई जाती है। हल्का भोजन किया था। परंतु हम तुम तो अन्न का भोजन कर रहे हैं। केवल 12 वर्ष का वनवास है तो है तो आप धैर्य धारण करें। 

उसी राजा नल की कुछ महत्वपूर्ण कथाएं हैं आपकी सेवा में प्रस्तुत करूंगा। 

 नरवरगढ़ नामक एक राज्य था और उस राज्य पर उस किले पर उस शहर पर एक राजा वीरसेन राज किया करते थे जिन्हें नल पुराण में राजा प्रथम भी कहा गया है। राजा प्रथम वहां राज किया करती थी। राजा प्रथम एक बड़े धर्मात्मा ईश्वर भक्त और बड़े नियम वाले थे। परंतु श्रोताओं समय और ईश्वर यह दोनों बड़े प्रभावी होते हैं। उस महापराक्रमी नरेश के घर 101 रानियां थी और उन रानियों में सबसे बड़ी रानी का नाम था । रानी मंझा और उन समस्त 101 रानियों के भी कोई भी संतान नहीं हुई। राजा के घर में जब कोई पुत्री या पुत्र का जन्म नहीं हुआ तो राजा बड़ी दुखी रहने लगे। राजा दिन प्रतिदिन संतान के बारे में ही सोचते।

राजा की व्यवस्था वृद्धि होने लगी। राजा की अवस्था बढ़ गई और 101 रानी महलों में निवास करती थी। राजा की 101 पत्नियां थी। परंतु छोटाओं दुर्भाग्यवश किसी के गर्भ से भी एक भी संतान की उपत्ति नहीं हुई। अब तो राजा प्रथम जिन्हें युधिष्ठिर भी कह सकते हैं। लेकिन राजा प्रथम भी और नाम है उनका।

राजा प्रथम बड़े चिंतित रहने लगे। समस्तरानियों के ऊपर जो 100 रानियां होती हैं उन्हें पटरानी कहते हैं। तो मंझा पटरानी थी और राजा प्रथम की सबसे प्रिय रानी भी थी कि राजा अजयपाल की पुत्री थी रानी मंझा।

उसके बारे में भी मैं आपको अलग से बता दूंगा जो वीडियो बढ़ने के अर्थ्ता तो रानी मंझा महाराज वीरसेन से कहने लगी कि देखिए प्राणनाथ हमारी और तुम्हारी आयु समाप्त हो चलेगी। परंतु हमारे तुम्हारे कोई संतान की उत्पत्ति नहीं हुई। इस गद्दीको कोई वारिस नहीं मिला। क्या होगा इस गद्दी कायह गद्दी सुनी जा रही है।

श्रोताओं राजा भी व्यवस्था आखिर क्या कर सकता थाउसी समय ईश्वर की कृपा थी। गुरु गोरखनाथ महंत व श्री संगत गुरु गोरखनाथ नरवरगढ़ पधारी और उन्होंने नरवरगढ़ केजंगलों में आसन की समाधि लगा ली। प्राचीन समय के जो संत होते थेवह अखंड तपस्या किया करते थे और ध्यान लगाकर के बैठ जाते थे और अखंड समय तक वह ईश्वर का चिंतन करते रहते थे। तो गुरु गोरखनाथ ने नरवरगढ़ के पास ही आकर के नरवरगढ़ के एक बाग में शाही बगीचा था। उसमें जाकर के समाधि लगाकर के ध्यान मग्न अवस्था में बैठ जाते हैं। तपस्या में लीन हो गई। 

जब मंझ रानी को इस बात का पता चला कि नरवरगढ़ में गुरु गोरखनाथ जी आए हुए हैं तो मंझ रानी महाराज वीरसेन से कहने लगी कि हे नाथ कि इस संसार के महान तपस्वी गुरु गोरखनाथ हम पर दया करने के लिए हमारी शाही बाग में ठहरे हुए हैं। शाही बाग में तपस्यारत हैं। मंत हम दोनों चलते हैं और गुरु गोरखनाथ को सेवा करके प्रसन्न करेंगे। तो देखिए श्रोताओ रानी मंझा और राजा प्रथम दोनों चल देते हैं अपने शाही बगीचे में और देखा कि गुरु गोरखनाथ एक वृक्ष के नीचे ध्यान मग्न अवस्था में बैठे हुए हैं। तो मंझ रानी और महाराज प्रथम ने गुरु गोरखनाथ की सेवा करना आरंभ कर दिया। कई वर्ष व्यतीत हो गए।

परंतु गोरखनाथ की समाधि भंग नहीं हुई। सेवा करते-करते ऐसे कहा जाता है तब गुरु गोरखनाथ की समाधि भंग हुई हो। हो सकता है 12 वर्ष ना हो लेकिन जो गाने वाले हैंउनके हिसाब से 12 वर्ष है। अर्थात बहुत समय व्यतीत हो गया। जब बहुत समय व्यतीत हो गया तब गोरखनाथ की समाधि भंग हुई और समाधि भंग हुई तो सामने एक जानू परम सुंदरी और राजा प्रथम को देखा कि रानी मंझा गुरु गोरखनाथ के चरणों में गिर पड़ी और रानी मंझा गोरखनाथ से कहने लगी कि बाबा मेरी उम्र व्यथित हो गई। महाराज की उम्र गई।

महाराज के घर में 101 पत्नियां हैं। 101 रानियां हैं। परंतु कोई भी संतान पैदा नहीं हुई है। अब कृपा करके आप हमें एक संस्थान रूपी रत्न प्रदान करें। तो गुरु गोरखनाथ उनकी सेवा से प्रभावित हो गए और राजा प्रथम से कहने लगे कि राजन मैं तुम पर और तुम्हारी इस रानी पर बड़ा प्रसन्न हूं और मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करता हूं। तभी मंझा रानी कहने लगी नहीं गुरु शेष मेरी 100 बहनें और हैं। 

यदि उनके भी संतान पैदा हो जाए तो भला आशीर्वाद होगा। तो गुरु गोरखनाथ रानी मंझा और राजा प्रथम की बात मान लेते हैं और पढ़ करके अभिमंत्रित करके तेज युक्त 100 101 चावल राजा प्रथम को देते हैं कि राजा प्रथम यह 101 चावल हैं। इनको नियम और व्रत से

प्रातः काल स्नान करके और ईश्वर का ध्यान करके रानियों को खिला देना। आपके घर 101 पुत्रों का जन्म हो जाएगा। परंतु पूरा ध्यान रखना कि यह चावल यदि नहीं खाए तो फिर कोई संतान पैदा नहीं होगी। अब तो राजा प्रथम बड़े प्रसन्न हो गए। राजा प्रथम 101 चावलों को लेकर के आशीर्वाद स्वरूप गुरु गोरखनाथ से लेकर के चल देते हैं औरखुशी-खुशी अपनी रानी मंझा के साथ आ जाते हैं नरवरगढ़। नरवरगढ़ में आ गए। 

राजा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। राजा मन में विचार कर रहे हैं कि ईश्वर आपने मेरी बहुत अच्छी सुनी। अब तो मेरे महलों में बालिकाओं की किलकारियां सुनने को मिलेंगी।

अब तो मेरा चौथापन सुधर जाएगा। मेरा बुढ़ापा सुधर जाएगा। राजा प्रथम और मंझझ रानी दूसरे दिन समस्त रानियों जो 100 रानियां थी उनको बुलाते हैं और उन्हें स्नान कराकर पाठ पूजा कराने के बाद राजा प्रथम 101 रानियों को भी खिलाकर लेते हैं और सबको एक-एक चावल वितरित कर देती हैं।

अब देखिए श्रोताओं वो 100 रानियां चावलों को हाथ में लेकर के मन में विचार करने लगेंगी कि देखिए ईश्वर की माया होती है।

जो ईश्वर चाहता है वही होता है। मानव के चाहने से कुछ नहीं होता है। बताओ। अब तो वह 100 रानियां मन में विचार करने लगेंगी कि यदि चावल को खाने से कहीं गर्भ रह जाए, कहीं बालक पैदा हो जाए तो फिर यह दुनिया व्यवहार करना बंद कर देगी। इसलिए उन्होंने ऊंची वृद्धि को सोच लिया। देखिए मैं आपको बताना चाहूंगा कि संतान उत्पत्ति के कई तरीके होते हैं। 

आप कुछ लोग यह कहेंगे कि नहीं होते हैं। परंतु दृष्टि द्वारा संताने पैदा होती हैं। जैसे भगवान वेदव्यास ने की थी पांडवों को। के पांडवों के बीच में जो धृष्ट राष्ट्र पांडुभित परती थे और प्राचीन समय में मानस संपत्तिभी पैदा होती थी। शरीर के किसी तेज अवयव वाले भाग से भी संतान की उत्पत्ति हुई देखी गई है। जैसे मकरध्वज के पसीने से हनुमान जी के पसीने से मकरध्वज का जन्म हुआ। पार्वती के शरीर के मैल से भगवान गणेश का जन्म हुआ। ऐसे अनेकों संत पुत्र पैदा इस संसार में हुए हैं। उन्हें बड़े-बड़े नामधारी हैं। वह सभी इसी तरीके से मानस संपत्ति से पैदा हुए हैं। तो ईश्वर की माया थी। 

100 रानियों का दिमाग घूम गया और दिमाग घूम गया तो उन्होंने मनमें विचार किया कि महाराज वृद्ध हुए हैऔर इनकी मति मारी गई है। साथ-साथ इस मंझारानी की मति भी खराब हो गई है। इस 100 का दाब महाराज ने कहा कि इन्हें आप खा जाएं। तो श्रोताओं उन रानियों के हाथ ईश्वर की कृपा से पीछे की तरफ चले गए और छड़ के ऊपर से उन चावलों को फेंक दिया। परंतु पतिव्रता रानी मंझा और जिसने गुरु गोरखनाथ की सेवा की थी। गुरु में बड़ी आस्था थी।

ईश्वर की भक्त थी। उसने उस चावल को खा लिया था। श्रोताओं जो ईश्वर करता है वही होता है। मैं पहले भी कह चुका हूं। देखिए वह तो चावलों को फेंक करके अपने-अपने महलों में चली जाती हैं और मंझ रानी भी उस चावल को खाने के बाद अपने महल में चली जाता है। धीरे-धीरे कुछ समय व्यतीत हुआ और मंझा रानी गर्भवती हो गई। जब मंझा रानी के गर्भ का पता और रानियों को चला उन 100 रानियों को मंझा सहित 101 थी। मंझा पट रानी थी तो अब 100 रानियों के पैरों तले की जमीन खिसक गई। रानियां मन में विचार करने लगी कि हमने उन चावलों को फेंक दिया और इसने खा लिया जो मंझा है। इसने वह चावल खा लिया। अब तो महाराज पहले ही यह पटरानी थी और अब तो हमारी सुनने वाले नहीं हैं।

महाराज हो सकता है हमें मरवा दें। अब तो हमें कोई ना कोई उपाय सोचना पड़ेगा इस मंझा रानी को मरवाने का। 100 रानियां एक साथ बैठ जाती है। आपको यह बताना चाहूंगा कि वह 100 रानियां बहने थी इसलिए तो एक स्थान पर एक साथ रहती थी और मंझा अकेली थी जो राजा अजयपाल से उसकी पुत्री थी रानी मंझा। तो सौ रानी मन में विचार करती हैं कि किस तरीके से इस मंझा को मरवाया जाए। यह विचारकर रही हैं और आपस में विचार विमर्श चल रहा है और उधर मंझ रानी का गर्भ धीरे-धीरे आ रहा है। वृद्धि कर रहा है और उधर उस रानी को मारने का षड्यंत्र रानियों द्वारा किया जा रहा।

 

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नरवरगढ़ का विशाल किला सूर्य की किरणों में चमक रहा था, पर उस वैभव के भीतर एक गहरी पीड़ा छिपी थी।
राजा प्रथम वृद्ध हो चले थे। उनके महल में 101 रानियाँ थीं, पर किसी की गोद नहीं भरी थी।

एक दिन पटरानी मंझा, व्याकुल हृदय लेकर, वन में तप कर रहे महान योगी गुरु गोरखनाथ के चरणों में गिर पड़ी।

“बाबा… मेरी आयु व्यथित हो गई। महाराज वृद्ध हो चले हैं। हमारे महल में संतान का प्रकाश नहीं है। कृपा कर हमें पुत्र रत्न दें।”

गुरु ने करुण दृष्टि से देखा।
वे बोले —
“राजन, मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। तुम्हारे यहाँ पुत्र जन्म होगा।”

तभी मंझा ने हाथ जोड़कर कहा —
“गुरुदेव, मेरी सौ बहनें और हैं। यदि सबकी गोद भर जाए तो यही सच्चा आशीर्वाद होगा।”

गुरु मुस्कराए। उन्होंने 101 चावल अभिमंत्रित किए, तेज से दीप्त।
“राजा, इन्हें नियमपूर्वक प्रातः स्नान और पूजा के बाद प्रत्येक रानी को एक-एक दाना खिला देना। जिसने खाया, उसके यहाँ पुत्र होगा। जिसने न खाया — उसे संतान नहीं।”

राजा की खुशी का पार न रहा।


🌾 101 चावल

अगले दिन महल में स्नान, पूजा और मंत्रोच्चार हुआ।
राजा ने अपने हाथों से 101 रानियों को एक-एक चावल दिया।

रानियाँ चावल हाथ में लेकर सोचने लगीं —

“क्या सचमुच इससे संतान होगी? यदि मंझा को पुत्र हो गया तो वह और अधिक प्रिय हो जाएगी…”

ईर्ष्या ने विवेक को ढक लिया।

एक-एक कर सौ रानियों ने चुपके से वे चावल पीछे फेंक दिए।
केवल मंझा ने श्रद्धा से आँखें बंद कर चावल खा लिया।


🌸 गर्भ का समाचार

कुछ महीनों बाद समाचार फैला —
मंझा गर्भवती है।

अब सौ रानियों के पैरों तले की भूमि खिसक गई।
“हमने चावल फेंक दिए… और उसने खा लिया! अब वह महारानी बनेगी। हमारा क्या होगा?”

ईर्ष्या भय में बदल गई। भय षड्यंत्र में।

वे एक कक्ष में एकत्र हुईं।
“मंझा को समाप्त करना होगा।”


🌑 षड्यंत्र

समय आया। प्रसव पीड़ा शुरू हुई।
रात गहरी थी, बिजली चमक रही थी।

मंझा ने एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया। उसके जन्म के साथ ही महल में दीपक अपने आप प्रज्वलित हो उठे। वातावरण सुगंधित हो गया।

पर षड्यंत्र पहले से रचा जा चुका था।

दाइयों को सोने के आभूषण देकर सौ रानियों ने कहा था —
“राजा को कहना कि मृत बालक जन्मा है। और उस शिशु को कहीं दूर ले जाकर समाप्त कर देना।”

दाई काँपते हाथों से शिशु को लेकर वन की ओर चली।
पर जैसे ही उसने बालक को देखा — वह मुस्करा रहा था। उसकी आँखों में असाधारण तेज था।

उसी क्षण उसे गुरु गोरखनाथ की वाणी स्मरण हुई —
“जिसने चावल खाया, उसके यहाँ पुत्र होगा — और वह महान होगा।”

दाई का हृदय बदल गया।
उसने बालक को एक साधु के आश्रम के समीप सुरक्षित छोड़ दिया।


🌳 वन में पालन

साधु ने उस बालक को अपनाया।
उसका नाम रखा — वीर तेजपाल

वह बड़ा होकर अद्वितीय पराक्रमी, सत्यनिष्ठ और धर्मप्रिय बना।
उसे बचपन से ही अपने जन्म का रहस्य ज्ञात न था, पर उसके भीतर राजसी तेज स्पष्ट था।


⚔️ सत्य का उद्घाटन

वर्षों बाद नरवरगढ़ पर शत्रुओं ने आक्रमण किया।
राजा प्रथम वृद्ध हो चुके थे। सेना पराजित हो रही थी।

तभी वन से एक युवा वीर आया —
तेजपाल।

उसने अद्भुत साहस से शत्रुओं को परास्त किया।
राजा ने उसे दरबार में बुलाया। उसकी आँखों में अपना ही प्रतिबिंब देखा।

उसी समय वही दाई काँपते हुए आगे आई और सारा सत्य कह सुनाया।

राजा स्तब्ध रह गए।
मंझा रानी की आँखों से अश्रु बहने लगे।
सौ रानियाँ भय से काँप उठीं।


👑 न्याय

राजा ने घोषणा की —

“सत्य कभी छिपता नहीं। ईर्ष्या विनाश का कारण बनती है।”

सौ रानियों को दंड दिया गया — कुछ कथाओं में वनवास, कुछ में पश्चाताप का आदेश।

तेजपाल को युवराज घोषित किया गया।
मंझा की गोद में उसका पुत्र लौटा।

और दूर कहीं, वन में, गुरु गोरखनाथ ध्यानमग्न मुस्करा रहे थे।


🌺 कथा का संदेश

  • श्रद्धा का फल अवश्य मिलता है।
  • गुरु का आशीर्वाद अटल होता है।
  • ईर्ष्या अंततः स्वयं का नाश करती है।
  • जो ईश्वर चाहता है, वही होता है।

यदि आप चाहें तो मैं इसी कथा को
📜 पाँच अंकों के नाटक रूप में
या
📖 और भी विस्तार से महाकाव्य शैली में प्रस्तुत कर सकता हूँ।

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