नल और दमयंती भाग 02
कुमार नल को केवल शस्त्रों का तेज ही प्राप्त नहीं था, अपितु उनके भीतर धर्म का दिव्य प्रकाश भी प्रज्वलित था। उनके व्यक्तित्व में वीरता और साधुता का अद्भुत संगम था। वे युद्धभूमि में सिंह के समान प्रचंड और देवालय में तपस्वी के समान शांत दिखाई देते थे। यही कारण था कि उनके शत्रु उनसे केवल शारीरिक बल के कारण ही नहीं, बल्कि उनके आध्यात्मिक प्रभाव से भी भयभीत रहते थे।
एक बार उनके विरोधियों ने पिशाच्च विद्या का प्रयोग कर उनके प्राण लेने का षड्यंत्र रचा। गुप्त मंत्रों और तांत्रिक अनुष्ठानों के माध्यम से उनके चारों ओर अशुभ शक्तियाँ भेजी गईं। किंतु नल के चारों ओर मानो अदृश्य दिव्य कवच विद्यमान था। उनके नियमित जप, यज्ञ, दान और शिवपूजन से उत्पन्न धर्मतेज ने उन दुष्ट शक्तियों को उनके समीप भी नहीं आने दिया। जो भी अनिष्ट उनके निकट आया, वह उसी क्षण भस्म हो गया।
नल के तीन परम मित्र थे—चंडप्रताप (सेनापति उग्रसेन के पुत्र), अंगद (महामात्य कुमारसेन के पुत्र) और चारुदत्त (महामंत्री समर्थ के पुत्र)। ये तीनों बचपन से ही उनके साथ पले-बढ़े थे। चारों ने साथ शिक्षा प्राप्त की, साथ युद्धाभ्यास किया और साथ ही युवावस्था में प्रवेश किया। मित्रता इतनी गहरी थी कि वे एक-दूसरे के बिना अधूरे प्रतीत होते थे।
राज्य की व्यवस्था भी उल्लेखनीय थी। वीरसिंह, जो महाराज वीरसेन के ज्येष्ठ पुत्र थे, को संपूर्ण निषध राज्य का उत्तराधिकार प्राप्त था। किंतु वीरसेन ने न्यायप्रियता दिखाते हुए अपने धाकटे भ्राता वज्रबाहु को भी आधा राज्य प्रदान किया और उनकी राजधानी विदिशा में स्थापित की। वज्रबाहु के पुत्र पुष्कर नल के समवयस्क थे।
नल और पुष्कर दोनों रूपवान और कलाओं में निपुण थे, परंतु उनके स्वभाव में पृथ्वी-आकाश का अंतर था। नल सरल, निष्कपट, पराक्रमी और करुणाशील थे, जबकि पुष्कर के मन में ईर्ष्या और स्वार्थ की प्रवृत्ति प्रबल थी। उन्हें दूसरों की उन्नति सहन नहीं होती थी। इच्छित वस्तु पाने के लिए वे किसी भी सीमा तक जा सकते थे। द्यूत-क्रीड़ा में वे अत्यंत निपुण थे और सदैव नल को पराजित करने का प्रयास करते रहते थे। परंतु नल ने महामुनि बृहदश्व से अक्षविद्या सीखी थी, जिसके कारण वे द्यूत में कभी पराजित नहीं होते थे।
राजकुमारों को अन्य कलाओं के साथ-साथ कामशास्त्र और सुरत-कला का भी प्रशिक्षण दिया जाता था। शरीर को स्वस्थ और समर्थ रखने के लिए विशेष योगासन, वीर्यवर्धक औषधियाँ और वाजीकरण रसायनों का प्रयोग सिखाया जाता था। नल ने भी ये शिक्षाएँ प्राप्त की थीं, परंतु उनके मन में केवल भोग की इच्छा नहीं थी। वे एक ऐसी पत्नी की कामना करने लगे थे जो केवल रूपवती ही नहीं, बल्कि सुशील, बुद्धिमती, गृहकार्य में दक्ष, धर्मपरायण और पति को उचित मार्गदर्शन देने वाली हो।
उनके तीनों मित्र विवाह कर चुके थे। चंडप्रताप के यहाँ तो एक पुत्र भी जन्म ले चुका था। मित्रों के घर जाकर जब नल उनके सुखी दांपत्य जीवन को देखते, तो उनके मन में भी एक आदर्श जीवनसंगिनी की आकांक्षा प्रबल हो उठती। वे चाहते थे कि उनकी पत्नी ऐसी हो जो उनके हृदय की आधी बात समझ जाए, उनके कर्तव्यों में सहभागी बने और जीवन के प्रत्येक सुख-दुःख में साथ निभाए।
एक दिन वे राजउद्यान की ओर जा रहे थे। उनके पीछे उनकी प्रिय दासियाँ—वेत्रावती और रसिका—उचित दूरी बनाए चल रही थीं। नल ने वेत्रावती से चित्र बनाने का सामान लाने को कहा। वे पुष्करणी के किनारे बैठ गए, कुछ क्षण नेत्र बंद किए और अपने मन में उभरती एक दिव्य मूर्ति को अनुभव करने लगे। जब उन्होंने कुंची उठाई, तो वह कल्पना धीरे-धीरे भूर्जपत्र पर आकार लेने लगी।
चित्र पूर्ण होते-होते ऐसा प्रतीत हुआ मानो स्वर्ग की कोई अप्सरा धरती पर उतर आई हो। मुखमंडल पर कोमलता, नेत्रों में करुणा, अधरों पर लज्जित मुस्कान और व्यक्तित्व में दिव्य तेज—नल स्वयं उस चित्र को देखकर विस्मित रह गए।
भोजन का समय बीत गया, किंतु नल वहीं तल्लीन बैठे रहे। अंततः उनके मित्र ने आकर उन्हें बुलाया। रसिका वह चित्र लेकर महारानी वसुमती के पास पहुँची और बोली,
“महारानी, आज कुमार ने छह घड़ी तक बैठकर यह चित्र बनाया है।”
महारानी ने चित्र देखा तो क्षणभर के लिए स्तब्ध रह गईं। तभी नल आकर प्रणाम करते हुए खड़े हुए।
वसुमती ने स्नेहपूर्वक उन्हें समीप बिठाया और पूछा,
“कुमार, यह सुकन्या कौन है?”
नल ने विनम्रता से उत्तर दिया,
“माते, यह केवल मेरी कल्पना की मूर्ति है। इसका वास्तविक अस्तित्व नहीं।”
रानी बोलीं,
“मैंने अनेक राजकन्याओं के चित्र देखे हैं, परंतु ऐसा सौंदर्य और ऐसी नम्रता कहीं नहीं देखी। यदि यह कन्या मेरी पुत्रवधू बने, तो मैं स्वयं को धन्य समझूँगी।”
उस रात्रि नल को देर तक निद्रा नहीं आई। बार-बार वह चित्र उनकी आँखों के सामने उभर आता। धीरे-धीरे उस चित्र के प्रति उनका आकर्षण बढ़ता गया। वे संध्या समय अकेले पुष्करणी के पास बैठकर उसे निहारते रहते।
एक दिन जब वे उसी चित्र को देख रहे थे, रसिका मोतियों से भरा पात्र लेकर आई और बोली,
“कुमार, इस वर्ष भी मानसरोवर से हंसों का जोड़ा आया है। उनके लिए मोती लाई हूँ।”
नल ने अपनी हथेली में मोती भरकर उन स्वर्णकांति हंसों के सामने रख दिए। हंसों ने मोती चुगे और उड़ने ही वाले थे कि उनकी दृष्टि उस चित्र पर पड़ी। वे ठिठक गए। हंसिनी ने अपने साथी से कहा,
“नाथ, यह तो विदर्भ की राजकुमारी दमयंती के समान प्रतीत होती है।”
नल को पशु-पक्षियों की भाषा का ज्ञान था। उन्होंने आश्चर्य से पूछा,
“हे हंसराज, क्या आप इस रूपवती को पहचानते हैं?”
हंस बोला,
“हाँ कुमार, यह विदर्भ नरेश भीमसेन की कन्या दमयंती है। अनेक वर्षों तक संतानहीन रहने के बाद महर्षि दमन के आशीर्वाद से उन्हें तीन पुत्र और यह एक पुत्री प्राप्त हुई। दमयंती अब यौवनावस्था में है और उसके लिए योग्य वर की खोज चल रही है।”
नल का हृदय धड़क उठा। उन्होंने कहा,
“पक्षीराज, सत्य कहूँ तो मैं उसे नहीं जानता था। यह रूप तो मेरे मन में स्वयं साकार हुआ। यदि वह मेरी जीवनसंगिनी बने तो मैं स्वयं को धन्य समझूँगा।”
हंस ने आश्वस्त करते हुए कहा,
“कुमार, आपकी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी। हम आज ही विदर्भ जाकर राजकुमारी दमयंती को आपका संदेश देंगे।”
इतना कहकर हंसों का वह दिव्य जोड़ा आकाश में उड़ गया। नल देर तक उन्हें निहारते रहे। उनके हृदय में पहली बार प्रेम का मधुर स्पंदन जाग उठा था—एक ऐसा प्रेम, जो अभी केवल कल्पना था, परंतु शीघ्र ही इतिहास बनने वाला था।
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