Raja Nal ki Sampoorm katha Part 02
11.
0:03
इतिहास के पन्नों में यह कहानी साफ-साफ
0:06
लिखी हुई है। नमस्कार दोस्तों, इस पर
0:09
उपस्थित समस्त श्रोताओं का, भक्तों का और
0:11
सब्सक्राइब बंधुओं का एक बार फिर से
0:13
स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है। श्रोताओं,
0:16
जैसा कि आप जानते हैं हमारी कहानी चल रही
0:18
थी नल पुराण इतिहास से और उसके 10 भाग 10
0:22
एपिसोड में आपकी सेवा में प्रसारित कर
0:24
चुका था। आइए श्रोताओं आपका ध्यान मैं
0:26
वापस 10वें एपिसोड
से छोड़ता हूं। 10वें
0:29
एपिसोड में मैंने आपको बताया था कि राजा
0:31
नल नागोक में जीवित हो जाते हैं और वहां
0:35
से नागराज वासुकी उन्हें एक कायापलट
0:39
अंगूठी देते हैं और उस अंगूठी की विशेषता
0:42
थी कि जिसको धारण करने से बाएं हाथ की
0:44
उंगली में धारण कर लिया तो उसकी आयु बदल
0:46
करके 80 वर्ष की हो
जाती थी। उस अंगूठी को
0:50
लेकर के राजा नल चले देते हैं और आ जाते
0:52
हैं दक्षिणपुर को। दक्षिणपुर में अपनी
0:54
माता मंझा से मिलने के बाद पहले माता मंझा
0:57
से मिलते हैं और माता मंझा को आश्वासन
0:59
देकर के कि मैं नरवरगढ़ जा रहा हूं।
1:02
नरवरगढ़ को चले जाते हैं और नरवरगढ़ में
1:04
80 वर्ष के ब्राह्मण का रूप धारण करते हैं
1:07
और पहुंच जाते हैं महाराज प्रथम के दरबार
1:09
में और महाराज प्रथम के दरबार में वह नल
1:12
पुराण की कथा सुना रहे हैं और नल पुराण की
1:14
कथा सुनने के लिए वहां समस्त स्थल नरवरगढ़
1:18
की जो प्रजा थी बैठी हुई है और उसी प्रजा
1:21
में चिंतामणि जल्लाद और गंगाधर ब्राह्मण
1:23
भी बैठे हुए हैं। स्वामी महाराज प्रथम
1:26
विराजमान है और रानी जो गज मोतिन थी गज
1:29
मोतिनी भी उस सभा में विराजमान है। तो
1:32
राजा नल नल पुराण की कथा सुना रहे हैं और
1:34
राजा नल ने बताया कि मंझा रानी को किस
1:37
तरीके से गंगाधर ब्राह्मण ने धन लेकर के
1:40
मरवाने की साजिश की और चिंतामणि जल्लाद
1:42
मंझ रानी को लेकर के चल देता है। श्रोताओं
1:45
राजा नल दूसरे दिन की कथा जब आरंभ करते
1:48
हैं तो समस्त प्रजा और जो सुनने वाले थे
1:50
महाराज प्रथम बड़े ध्यान मग्न सुन रहे हैं
1:53
कि क्या मेरी रानी आज भी जीवित है? राजा
1:56
का मन उस रानी गजमोतनी से हट गया और राजा
1:58
का ध्यान वहां चला गया। क्या मेरी
2:00
पतिव्रता रानी मंझा आज भी जीवित है।
2:03
श्रोताओं यह बात सुनकर के फिर राजा नल
2:05
ब्राह्मण मेषधारी कहने लगे कि महाराज
2:07
प्रथम आपके आदेशानुसार रानी मंझा वन में
2:10
ले जाया गया। विकट वन में ले गए जल्लाद और
2:13
आपका यह चिंतामणि जल्लाद बैठा है महाराज
2:15
इस जल्लाद को ही पूछा जाए कि रानी को मार
2:18
दिया छोड़ दिया चिंतामणि जल्लाद अपने मन
2:20
में सोचने लग रहे थे सभी लोग चुपचाप बैठे
2:22
हुए सुन रहे हैं और राजा नल कह रहे हैं कि
2:25
चिंतामणि जल्लाद बड़ा वफादार जल्लाद था
2:27
बड़ा राजभक्त जल्लाद था और उसने मन में
2:30
विचार किया कि यदि मैं रानी मंझा को मार
2:32
देता हूं तो इसके गर्भ में पल रही संतान
2:34
भी मर जाएगी और हमारे राजा का विनाश हो
2:36
जाएगा इसलिए हे राजन उस चिंतामणि जल्लाद
2:39
ने महारानी मंझा को जीवित छोड़ दिया है कि
2:41
महारानी मंझा एक शीश के वृक्ष में घुस
2:44
जाती है और चिंतामणि जल्लाद एक मृग को मार
2:46
करके रानी के वस्त्रों को उसके रक्त में
2:49
रंग लेते हैं और उसके नेत्रों को निकाल
2:51
करके महाराज वीरसेन को लाकर के देते हैं
2:53
और राजा प्रथम उन नेत्रों को फोड़ देते
2:55
हैं और वस्त्रों को जलवा देते हैं। अब
2:57
देखिए महाराज उधर क्या होता है। राजा नल
3:00
सुना रहे हैं कि रानी मंझा कुछ भी करके उस
3:02
शीश के वृक्ष में अपना समय गुजार रही है।
3:04
वह पत्ता खाती है। पत्ता ही पहनती है और
3:06
पत्तों पर ही सोती है और 9 महीने का
उसके
3:09
पेट में गर्व है। इधर जब समय निकल गया तो
3:11
उसके गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ। पुत्र
3:14
बड़ा प्रभावशाली, बड़ा कांत
परंतु वन में
3:16
उसका जो प्रसव किया था रानी मंझा का
3:19
ब्रह्मलोक की स्वयं देवी माता आई और देवी
3:21
माता ने रानी मंझा का प्रसव किया। परंतु
3:24
प्रसव के बाद महारानी मंझा के स्तनों में
3:26
दूध नहीं आया। तो राजा का पुत्र रानी मंझा
3:28
का पुत्र रोने लगा और जब रोने लगा तो रानी
3:30
मंझा बड़ी दुखी हुई। इसलिए हे राजन वहीं
3:33
समीप एक शेरनी ने भी दो बच्चों को जन्म
3:35
दिया था। जब उसने उस बच्चे की आवाज सुनी
3:38
तो शेरनी रानी मंझा के पास आई और उससे
3:41
कहने लगी कि बहन तेरा पुत्र भी रो रहा है
3:43
और मेरे पुत्र हंस रहे यह क्या कारण है?
3:45
तो मंझा रानी ने शेरनी को अपनी व्यथा बताई
3:47
और शेरनी ने राजा नल को दूध पिलाया। बड़ा
3:50
पराक्रमी पुत्र राजा नल क्योंकि उसका नार
3:53
पेट से कटा हुआ आया था। इसीलिए उसका नाम
3:56
नल था। और हे महाराज यहीं से नल पुराण का
3:59
और नया इतिहास आरंभ हो रहा है। रानी मंझा
4:01
का धीरे-धीरे कुछ समय निकल गया है उस हस
4:04
के वृक्ष में। वहां एक दक्षिणपुर एक
4:06
लक्ष्य सेठ कला आता है कि महाराज प्रथम के
4:09
राज्य में एक दक्षिणपुर नामक शहर था और
4:11
उसमें कुलक्षेत्रत्रा रहा करती थी। लक्ष्य
4:13
सेठ एक दिन वन में निकल कर जा रहे थे। रथ
4:16
में विराजमान थे और जब उन्होंने देखा कि
4:18
इस वृक्ष से किसी बच्चे के रोने की आवाज आ
4:20
रही है। जो हीस इसका वृक्ष था उसमें से
4:22
किसी बच्चे के रोने की आवाज आ रही है। तो
4:25
लक्ष्य सेठ रथ से नीचे उतरते देखा और कहने
4:27
लगे कि तू कौन है? तो श्रोताओं
रानी मंझा
4:30
लक्ष सेठ को यह बता देती है कि मैं एक
4:32
दुखिया हूं। धरती ने आसमान से गिरी हूं।
4:34
पृथ्वी ने छीन लिया है। तो लक्ष्य सेठ
4:37
बड़े सज्जन सेठ थे। हे महाराज राजा नल कह
4:40
रहे हैं ब्राह्मण वेशधारी हे महाराज लक्ष
4:42
सेठ उस मंझा को धर्म की पुत्री बनाकर के
4:45
अपने शहर दक्षिणपुर ले जाते हैं और मंझा
4:48
रानी वहां बड़े आराम से रह रही है। कुछ
4:50
समय बाद लक्ष सेठ के दोनों पुत्र पन्नालाल
4:52
और फूलचंद जाते हैं और जब पन्नालाल और
4:55
फूलचंद को पता चला कि उनकी धर्म की बहन है
4:57
मंझा तो उन्होंने उसके पुत्र का उद्घाटन
4:59
किया दास्तान किया और उस दास्तान में
5:02
स्वयं महाराज वीरसेन गए थे और महाराज
5:04
वीरसेन ने उस पुत्र को गोदी में खिलाया
5:06
था। अब तो राजा के पैरों से जमीन खिसकने
5:08
लगी। श्रोताओं और राजा प्रथम सोचने लगे कि
5:11
हे भगवान यह क्या हुआ? यह इस दुष्ट
गंगाधर
5:13
ब्राह्मण ने क्या करवा दिया? अब राजा
5:15
प्रथम कहने लगे कि हे महाराज आप आगे की
5:18
कथा सुनाइए। अब आगे की कथा बड़ी रोचक है।
5:20
बड़ी दुख भरी कहानी है। एक दिन का समय है
5:23
कि दोनों बड़े पुत्र सेठ के दोनों पुत्र
5:25
की पन्नालाल और फूलचंद व्यापार करने के
5:27
लिए विदेश के लिए चले जाते हैं। हे राजन
5:29
जब विदेश को गए तो उन्होंने उनको समुद्र
5:31
के तट पर समुद्र के तीर पर एक गोट और एक
5:34
मोचरी मिली थी और उस गोट और मोचरी को लेकर
5:36
के पन्नालाल और फूलचंद आ जाते हैं
5:38
दक्षिणपुर और दक्षिणपुर में आकर के
5:40
उन्होंने विचार किया कि इस गोट को और
5:42
मोचरी को महाराज प्रथम के दरबार में भेंट
5:44
कर दिया जाए तो महाराज ना जाने हमें कितना
5:46
इनाम देंगे। श्रोताओं यह सोचकर के
5:49
पन्नालाल और फूलचंद महाराज प्रथम के दरबार
5:51
में आ जाते हैं और राजा प्रथम के दरबार
5:53
में वे गोट और मोहरी भेंट कर दी। राजा
5:55
प्रथम सोचने लगे कि यह तो बिल्कुल सही कह
5:57
रहा है। यहां तक तो सत्य बात है और हे
5:59
राजन राजा नल कह रहे हैं आपने ही राजा
6:02
प्रथम ने आदेश दिया उनको कि इसके साथ की
6:04
15 गोट और लाओ और इसके जोड़ा की मोचरी
6:07
लेकर के आओ और हो सके तो इसके पहनने वाली
6:09
भी लाओ नहीं तो आपको परिवार सहित फांसी की
6:11
सजा दी जाएगी। यह सुनकर के बनिया डर गए।
6:14
पन्नालाल और फूलचंद दोनों डर गए और दोनों
6:16
अपने घर आकर के विचार कर रहे हैं। विचार
6:18
बदलने के सेठों के घर शोक मनाया जा रहा है
6:20
कि हमने जानबूझकर के मृत्यु को आमंत्रण दे
6:23
दिया। हे राजन अब ध्यान से सुनो। उसी समय
6:25
वह राजा का पुत्र नल जो बनियों के पास रह
6:27
रहा था वह चला आता है और कहने लगा मामाओं
6:30
क्या कारण है? आप क्यों रो
रहे हैं? तो
6:32
उन्होंने संपूर्ण व्यथा अपने भांजे राजा
6:34
नल को समझा दी। तो राजा नल कहने लगे कि बस
6:36
छोटी सी बात है। मैं चलूंगा तुम्हारे साथ
6:38
और मैं लाऊंगा उनको गोटों को और मैं
6:40
लाऊंगा मोचरी। आप चिंता मत करो। मुझे अपने
6:43
साथ ले चलिए। बड़े पुत्र पन्नालाल और
6:45
फूलचंद राजा नल को अपने साथ ले जाते हैं।
6:47
बाहरबन अपने साथ ले जाते हैं उस समुद्र की
6:50
यात्रा पर और समुद्र के कई दिन की यात्रा
6:52
करने के बाद उस तट पर पहुंच जाते हैं जहां
6:54
गोट है और मोचरी मिली थी। राजा नल को कह
6:57
दिया कि देख बेटे इस स्थान पर हमें गोट और
6:59
मोचरी मिली थी। तो राजा नल ने कहा और अपने
7:02
मामाओं से कि मामा आप इस समुद्र के तट पर
7:04
बैठे रहो। मैं तीन दिन में आपको गोट और
7:06
मोचरी दोनों लेकर के लौट आऊंगा। मैं इस वन
7:08
में जा रहा है। महाराज दोनों बड़े पुत्र
7:10
तो उस समुद्र के तट पर बैठ गए और उस राजा
7:13
प्रथम का पुत्र नल उस विकट वन में चला गया
7:15
है। महाराज अब यहां से आगे की कथा मैं
7:17
नहीं जानता ना जाने क्या हुआ उसके साथ।
7:20
मुझे पता नहीं है उस विकट वन में वह पुत्र
7:22
मारा गया या जीवित रहा। राजा प्रथम का
7:24
शरीर कंपायमान हो गया। राजा नल कहने लगे
7:27
कि हे ब्राह्मण फिर ब्राह्मण देव आप मुझे
7:29
संपूर्ण कथा सुनाएं। मैं सुनने को लालायित
7:32
हूं। आपको मुंह मांगा इनाम दूंगा। मेरा यह
7:34
संपूर्ण राज्य तुम्हें दे दूंगा। पर आपके
7:36
संपूर्ण यह कथा सुनाएंगे। राजा प्रथम तो
7:38
सोच रहा था क्या मेरा पुत्र जीवित है या
7:40
मर गया। जब संपूर्ण सभासदों ने प्रजा ने
7:42
उस वहमर से बलपूक कहा कि ब्राह्मण आप कथा
7:45
सुनाएं तो फिर राजा नल कथा सुनाने लगे कि
7:48
हे राजन ध्यान से सुनो। उस विकट वन में
7:50
राजा नल चला जा रहा है। बहुत आगे जाने पर
7:53
उसे एक बुढ़िया मिली जो शांति ब्रह्मा थी
7:55
और विधि पर अम्मा के पास राजा नल पहुंच
7:57
गए। राजा नल ने ब्रह्मा से कहा कि आप कौन
8:00
है? तो विधि ब्रह्मा ने राजा नल को
8:03
संपूर्ण जीवनी बता दी और कहा कि इस वन में
8:06
तीन दिन में तेरा विवाह हो जाएगा। चला जा
8:09
यहां से काम ले। आगे एक दानव है घूमासुर
8:13
नामक। उसकी परम सुंदरी कन्या है कि गजमतिन
8:16
और उसके साथ तेरा विवाह होगा।
8:19
अब तू गजमुतिन मी मन में विचार करने लगी
8:22
कि यही ब्राह्मण वेशधारी ही राजा नल है।
8:24
परंतु हे भगवान यह तो 70 80 वर्ष का वृढ़
8:27
है। जबकि मेरे पति तो एक 18 वर्षीय युवक
8:30
थे। यह क्या हो गया? तो जो राजा
नल से
8:34
संपूर्ण राजा प्रथम की प्रजा कहने लगी कि
8:37
हे ब्राह्मण आगे की कथा सुनाओ आगे क्या
8:40
हुआ? और राजा नल कहने लगे कि भाई माता के
8:43
कहने से राजा नल आगे चले जाते हैं और
8:46
वियावान वन में घुमासुर नामक दानव का किला
8:49
मिला। उस किले पर राजा नल पहुंच जाते हैं
8:52
और उस किले में हीरो तारो राजा नल कह रहे
8:55
हैं कि उस किले में भय भगवान शंकर का
8:58
वरदानी दैत्य रहा करता था और उस दैत्य की
9:01
एक पुत्री की जिसका नाम गजमतिन रहा है।
9:04
परंतु गजमतिन ने किसी मनुष्य को देखा ही
9:06
नहीं था। वह आराम से उस किले में रहती थी।
9:09
बड़ी सुंदर कन्या थी और वहीं राजा नल
9:12
पहुंच जाते हैं। उस किले के चारों ओर देख
9:14
रहे हैं जिसका दरवाजा कहां है। जब दरवाजा
9:17
नहीं मिला दरवाजे पर 108 मन की शिला
लगी
9:21
हुई थी। उस शिला को ब्रह्मा ने हटा दिया।
9:24
स्वयं देवी माता उसकी रक्षा कर देंगी और
9:26
राजा नल उस किले में प्रवेश कर गया। और हे
9:30
महाराज अब यहां से आगे की कथा अब मैं नहीं
9:32
जानता। हो सकता है उस किले में उस दानव ने
9:35
उस पत्थर को मार दिया। तो राजा मन में
9:38
विचार करने लगे कि अभी यहां तक मेरा पुत्र
9:41
जीवित है और गजमुतिन मन में विचार करने
9:43
लगी कि यहां तक की बात तो सही है लेकिन
9:46
किले में तो मेरा पति जीवित था नहीं मरा
9:48
था किंतु संपूर्ण सभासदों ने फिर कहा कि
9:51
ब्राह्मण आप आगे की कथा सुनाएं। आगे क्या
9:54
हुआ यह तो बताओ। आगे की कथा यदि तुम जिद
9:57
करते हो तो चलो मैं सुना रहा हूं। उस किले
10:00
में उस राजा नल ने उस भगवान शंकर के
10:03
वरदानी दैत्य को मार दिया। दैत्य की
10:05
मृत्यु कर दी और दैत्य को मारने के बाद
10:08
उसकी परम सुंदरी कन्या गजमोतिन के साथ
10:10
विवाह कर लिया और वह घोट और वह मोर्चरी
10:13
उसी कन्या की थी जो पन्नालाल और फूलचंद
10:16
लेकर के आए थे और उस पुत्री का विवाह करने
10:19
के बाद राजा नल उसे लेकर के चल देता है और
10:23
उसके साथ जो राजा नल को वहां से दहेज मिला
10:26
था एक वीरवरन नामक घोड़ा एक सात धार की
10:29
तलवार सात मणियों की माला और कि नागराज
10:32
वासुकी से उसकी दोस्ती मित्रता हो गई।
10:35
इतनी संपत्ति उसको मिली और उन वजह से उसे
10:38
नारद पुराण नारद जी ने नल पुराण सुनाया और
10:42
नल पुराण इस संसार में केवल दो ही व्यक्ति
10:44
जानते हैं। या तो स्वयं राजा नल और या
10:47
उसकी पत्नी गजमतिन बाकी के कोई भी नल
10:50
पुराण नहीं जानता। तो यह बात उस ओर राजा
10:54
ने सुनी प्रथम ने। तो राजा नल से प्रथम
10:56
कहने लगे कि ब्राह्मण देव आप भी तो सुना
10:59
रहे हैं नल पुराण की कथा कि राजन मैंने
11:02
कुछ थोड़ी सी कथा सुनी थी कि यहां तक की
11:04
और वह कथा मैंने आपको सुनाई। अब यहां से
11:07
आगे राजा नल गजमूतिन को लेकर के समुद्र के
11:10
तट पर आ गए हैं। समुद्र के तट पर राजा नल
11:13
आ जाते हैं। वहीं पन्नालाल और फूलचंद बैठे
11:16
हुए थे। फिर बताओ जब दूसरे दिन की कथा
11:19
आरंभ की तो पन्नालाल और फूलचंद को भी
11:21
महाराज के दरबार में बुलवा लिया था। वह
11:24
पन्नालाल और फूलचंद कहने लगे कि यह
11:26
ब्राह्मण अब हमारी पोल खुलने वाले हैं। यह
11:29
हमें मृत्यु के घाट उतरवाएंगे। और राजा नल
11:32
कह रहे हैं कि उन सेठों ने अपने भांजे से
11:34
पूछा कि यह लड़की कौन है? तो राजा नल
ने
11:37
उनको बताया कि मैंने भगवान शंकर के वरदानी
11:41
घूमासुर नामक दानव का वध कर दिया है। उसको
11:44
मार दिया है और यह उसी की पुत्री है। इसने
11:46
मेरे गले में वरमाला डाल दी है और मेरे
11:49
साथ विवाह कर लिया है। मैं उसको लेकर के
11:51
आया हूं। उसी का यह घोड़ा है और उसी की
11:54
तलवार लेकर के आया हूं। अब तो पन्नालाल और
11:56
फूलचंद ने विचार किया। वहीं सभा में बैठे
11:59
हुए थे। राजा नल की कथा सुन रहे हैं और
12:01
राजा प्रथम बड़े गौर से सुन रहे हैं कि हे
12:04
महाराज वो पन्नालाल और फूलचंद मन में
12:07
विचार करने लगे कि यह ना जाने कौन है। यह
12:10
भगवान शंकर के वरदानी दैत्य को मार सकता
12:12
है और यह लड़का हमारे पास रहता है। यदि
12:15
इसकी किसी दिन हमसे कोई बात हो गई, कोई
12:17
विवाद हो गया तो यह हमको नहीं छोड़ेगा।
12:20
हमको भी मृत्यु के घाट उतार देगा। इसलिए
12:22
इसको समुद्र में फेंक देना चाहिए। तो
12:24
बनियों ने उस लड़के को उस नल को बहला करके
12:28
पुचकार करके जहाज में बैठा लिया और जहाज
12:30
में अपने पास बैठा लिया। गजमोतिन और उसका
12:33
वीरवरण घोड़ा तो सो जाते हैं और राजा नल
12:36
सो जाते हैं। जब राजा नल सेठों ने जगाया
12:39
आखिरी के समय तो राजा नल अर्धन्याद्रिक
12:42
अवस्था में जगे और जग करके जैसे मुख धोने
12:45
के लिए जहाज से पानी लेने लपके वैसे ही
12:48
सेठों ने धक्का मार दिया। राजा नल समुद्र
12:50
में गिर गए और हे महाराज वहां के आगे का
12:53
अब मैं कुछ नहीं जानता। राजा नल की समुद्र
12:56
में मृत्यु हो गई या नहीं हुई यह मुझे पता
12:59
नहीं है महाराज। तो राजा प्रथम कहने लगे
13:02
ब्राह्मण देव यहां से आगे की कथा बताओ कि
13:06
नहीं महाराज मैं यहां से आगे की कथा नहीं
13:08
जानता कल याद करूंगा सुनी है मैंने जरूर
13:11
लेकिन याद करके आपको सुनाने की कोशिश
13:13
करूंगा गज मोतिन मन में विचार कर रही है
13:16
कि यह 100% राजा नल है
परंतु यह तो 80
13:20
वर्ष की आयु में है और राजा प्रथम भी रो
13:22
रहे हैं और वह पन्नालाल और फूलचंद मन में
13:25
विचार कर रहे हैं कि अब तो हमें अवश्य सजा
13:28
देंगे। गंगाधर ब्राह्मण विचलित हैं और
13:31
चिंतामणि जंगलात बड़े प्रसन्न है कि उनका
13:34
जो बलिदान था उन्होंने रानी मंझा को जीवित
13:37
रखा उनकी वफादारी से तो आज वफादारी ही फली
13:40
फूली परंतु हे भगवान क्या राजा नल का अंत
13:43
हो गया यह सोच रहे हैं और ऐसा कहने के बाद
13:47
महाराज प्रथम से राजा नल की अब यह कथा
13:49
समाप्त करता हूं कल की कथा मैं आपकी सेवा
13:52
में लेकर के सिर्फ उपस्थित हो जाऊंगा।
13:54
राजा नल कह रहे हैं और याद करके आपको कथा
13:57
सुनाऊंगा। तो देखिए यह बताओ मैं भी आपसे
14:00
यह अनुरोध कर रहा हूं कि आज की यह कथा मैं
14:03
यहीं समाप्त कर रहा हूं। देखिए श्रोताओं
14:06
आज की वीडियो यहीं समाप्त होती है। यदि
14:08
वीडियो पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक करें
14:10
और चैनल को सब्सक्राइब करें। इसी के साथ
14:13
वीडियो समाप्त होती है। जब तक के लिए जय
14:16
हिंद जय भारत।
12.
0:03
इतिहास के पन्नों में यह कहानी साफ-साफ
0:06
लिखी हुई है।
0:09
YouTube चैनल उपस्थित समस्त श्रोताओं का,
0:12
भक्तों का और सब्सक्राइबर बंधुओं का एक
0:15
बार फिर से स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है।
0:18
श्रोताओं, जैसा कि आप
जानते हैं, हमारी
0:21
कहानी चल रही थी नल पुराण इतिहास से, और
0:25
उसके 11 एपिसोड मैं
आपकी सेवा में
0:28
प्रसारित कर चुका था। और 12वां एपिसोड
आज
0:31
आपकी सेवा में लेकर के उपस्थित हूं।
0:34
श्रोताओं, ध्यान से
सुनिए। कहानी बड़े
0:37
रोचक मोड़ पर आ चुकी है कि राजा नल एक
0:41
ब्राह्मण का रूप धारण करके अपने पिता
0:44
वीरसेन को नल पुराण इतिहास सुना रहे हैं।
0:48
और नल पुराण इतिहास सुनाते सुनाते राजा नल
0:53
ने बताया कि राजा नल को उसके मामा
0:57
पन्नालाल और फूलचंद ने समुद्र में धकेल
1:00
दिया और जब समुद्र में धक्का दिया तो नल
1:03
समुद्र में गिर गया और समुद्र में गिर कर
1:07
के मर गया परंतु गजमोतनी ये जानती थी कि
1:11
मेरे पिता के पास सात मणियों की माला थी
1:14
और वह माला मेरे पति के गले में थी इसलिए
1:17
इसलिए समुद्र में तो मर नहीं सकते। तो
1:20
गजमोतनी कहने लगी कि ब्राह्मण देव आप यहां
1:23
से आगे की जो कथा सुना रहे हैं वो सत्य
1:26
नहीं है। आप सही कथा सुनाएं। तो राजा नल
1:29
कहने लगे कि सुनो ध्यान से। अब राजा प्रथम
1:33
भी उस कथा को बड़े गौर से सुन रहे हैं और
1:37
राजा प्रथम के नेत्रों से आंसुओं की झड़ी
1:40
लग रही है क्योंकि उसी का पुत्र राजा नल
1:43
समुद्र में गिर गया। अब राजा वीरसेन तो यह
1:48
जानते नहीं थे कि राजा नल के पास मणियों
1:50
की माला है। वो तो यही सोच रहे थे कि मेरे
1:53
पुत्र का इन मणिक पुत्रों ने कितनी
1:56
निर्ममता से अंत कर दिया। श्रोताओं
1:59
गजमोतनी राजा नल से कहने लगी कि हे
2:03
ब्राह्मण देव आप यहां से आगे की कथा सही
2:05
नहीं सुना रहे हैं क्योंकि मेरे पति के
2:08
पास तो दिव्य मणियों की माला थी। वो
2:10
समुद्र में नहीं मर सकती। तो यह बात सुनकर
2:14
के ब्राह्मण रूप धारी राजा नल कहने लगे कि
2:18
देखिए राजा नल के पास मणियों का प्रभाव
2:21
था। इस वजह से राजा नल के प्रभाव से राजा
2:25
नल के मणियों के प्रभाव से समुद्र का पानी
2:28
हटता चला गया और राजा नल नागोक में पहुंच
2:32
गए। राजा नल नागोक में पहुंचे तो वहां
2:36
राजा नल का सामना नागों से होने लगा।
2:39
नागों ने राजा नल पर आक्रमण किया। परंतु
2:42
राजा नल से वह डर कर सब भाग गए। और
2:45
उन्होंने अपने प्रधान सेनापति तक्षक से
2:49
कहा तो तक्षक ने कहा उनसे कि चलिए मैं
2:53
देखता हूं कौन है। और तक्षक ने धोखे से
2:57
राजा नल को काट लिया। नाग लोक में राजा नल
3:01
की मृत्यु हो जाती है। श्रोताओं जब
3:04
ब्राह्मण देव ने यह कहा कि तक्षक के काटने
3:07
से राजा नल की मृत्यु हो गई तो महाराज
3:10
वीरसेन सिंहासन से पछाड़ खाकर धरनी पर गिर
3:14
पड़े और उसकी पत्नी गजमोतनी भी पछाड़ खाकर
3:17
रोने लगी। जब वीरसेन ने यह हाल देखा तो
3:20
पूछने लगे कि तुम क्यों रो रही हो? तो
3:23
गजमतनी कहने लगी कि वो मेरे पति थे। अब तो
3:27
श्रोताओं दोनों सुसुर बहुओं का मिलन हो
3:30
जाता है। अब तो वीरसेन महाराज प्रथम गज
3:35
मोतनी को गले से लगा के विलाप कर रहे हैं।
3:38
करुण क्रंदन कर रहे हैं कि वह हत्यारा
3:41
पिता मैं ही हूं। मैंने ही मेरे पुत्र और
3:44
पत्नी को इतना कष्ट दिया। मेरी पत्नी को
3:47
वन को भेजा। मेरे पुत्र की मृत्यु समुद्र
3:50
में किस तरीके से हुई। मेरा वंश समाप्त हो
3:53
गया।
3:54
यह सोच कर के महाराज वीरसेन बार-बार धरनी
3:59
पर गिर रहे हैं। श्रोताओं
4:02
फिर रानी श्रोताओं फिर रानी गजमोतनी होश
4:07
संभाल कर कहने लगी कि ब्राह्मण देव ऐसा
4:10
नहीं हो सकता कि मेरे पति की मृत्यु हो
4:13
जाए क्योंकि मुझे स्वयं नारद ने बताया था
4:16
कि तुम्हारे पति का दूसरा विवाह होगा तो
4:18
वो मृत्यु के बाद तो हो नहीं सकता। आप
4:21
सत्य कथा कहिए कि नहीं देवी मैं यहां से
4:24
आगे की कथा नहीं जानता कि नहीं ब्राह्मण
4:27
देव आप असत्य कथा सुना रहे हैं आप जानते
4:30
हैं फिर भी मुझे गुमराह कर रहे हैं तो
4:33
राजा नल गजमोत्नी की बात सुनकर के कहने
4:36
लगा कि कुछ समय बाद जब महाराज नल को
4:40
समुद्र में पड़े हुए सात दिन हो जाते हैं
4:43
तो उनका परम मित्र वासुकी आ जाता है
4:47
वासुकी को उन्होंने घूमासुर दैत्य की कैद
4:49
से छुड़ाया था
4:51
और जब वासुकी ने यह देखा कि उसका मित्र
4:54
मरा पड़ा है। राजा नल मर गया है। तो
4:57
उन्होंने तक्षक को बुलाया और तक्षक से कहा
5:00
कि दुष्ट ये मेरा मित्र है। इन्होंने ही
5:03
मुझे घूमासुर दानव की कैद से मुक्त कराया
5:06
था और तने इसको मार दिया।
5:10
तो हे सभासदो राजा नल कह रहे हैं कि
5:13
वासुकी ने तक्षक को बुलाकर के राजा नल को
5:16
जीवित करा लिया। राजा नल जीवित हो गए और
5:20
नाग लोक में आराम से रहने लगे तो महाराज
5:24
प्रथम और रानी गजमोतनी के थोड़ी तसल्ली
5:27
हुई कि ठीक है हमारा पुत्र जीवित है
5:30
श्रोताओं अब ध्यान से सुनने की बात है
5:33
राजा नल कहने लगे ब्राह्मण भषधारी कि देखो
5:36
अब यहां से आगे की कथा मैं नहीं जानता तो
5:39
समस्त सभासद और महाराज वीरसेन कि नहीं
5:43
ब्राह्मण देव मैं आपको मेरा संपूर्ण राज्य
5:45
दे सकता हूं लेकिन आज इस संपूर्ण कथा को
5:48
सुनाएं। तो यह बात सुनकर के ब्राह्मण देव
5:53
राजा नल क्योंकि ब्राह्मण भषधारी थे। कहने
5:56
लगे कि महाराज ध्यान से सुनिए। राजा नल
6:00
नागोक में कुछ समय तक रहे और कुछ समय रहने
6:04
के बाद राजा नल ने महाराज वासुकी से कहा
6:08
कि हे नागेश्वर हे नागराज अब मुझे अपने घर
6:11
जाना है क्योंकि मेरी पत्नी गजमतनी और
6:14
मेरी माता मंझा मुझे याद कर करके विलाप कर
6:18
रही होंगी करण क्रंदन कर रही होंगी इसलिए
6:20
मुझे अब अवश्य ही अपने घर जाना होगा। यह
6:24
बात जब वासुकी ने सुनी तो बासुकी ने शहर
6:29
राजा नल को समुद्र के तट पर बाहर छोड़
6:32
दिया और राजा नल वह समुद्र के तट से ना
6:36
जाने कहां चले गए। अब यहां से आगे की कथा
6:39
मैं नहीं जानता हूं। श्रोताओं समस्त सभासद
6:44
कहने लगे कि हे ब्राह्मण देव अब यहां से
6:47
आगे की कथा तो आप कहिए कि नहीं सभासदों
6:50
मैं कुछ नहीं जानता। श्रोताओं जब गजमोतनी
6:54
ने यह स्थिति देखी कि ये ब्राह्मण देव आगे
6:57
कथा सुनाना नहीं चाहते तो गजमोतनी मन में
7:00
विचार करने लगी कि मेरे और महाराज नल के
7:04
अलावा दूसरा व्यक्ति इस संसार में नहीं है
7:06
कि जो नल पुराण कथा को जानता है और तीसरे
7:10
स्वयं देव ऋषि नारद है तो ये ब्राह्मण देव
7:12
देव ऋषि नारद तो हो नहीं सकते और मैं
7:15
स्वयं खड़ी हुई हूं तो ये अवश्य ही मेरे
7:18
पति राजा नल हैं। गजमतनी ने उस ब्राह्मण
7:21
का हाथ पकड़ लिया कि ब्राह्मण देव सच सच
7:24
बताओ आप कौन हो? राजा नल कहने
लगे अरे एक
7:27
तो मैंने कथा सुनाई है और आप मुझे ये क्या
7:31
कर रही हो? मेरा हाथ भी
पकड़ रही हो कि
7:33
नहीं आप सत्य बताएं कौन है? गजमतनी ने
7:37
बड़ा निवेदन किया। बड़ी अननय विनय की।
7:41
महाराज वीरसेन भी उस ब्राह्मण को देख के
7:44
कहने लगे कि हे ब्राह्मण देव मैं मेरे किए
7:47
हुए पर पश्चाताप कर रहा हूं। समस्त 100
7:50
रानियां भी कहने लगी कि हे ब्राह्मण देव
7:53
आप हमारे एकमात्र इकलौते पुत्र की कथा
7:56
सुनाइए और गंगाधर ब्राह्मण भी कहने लगे कि
8:00
हे महाराज हे ब्राह्मण देव आप बताएं कि
8:03
हमारे इस राजकुल के दीपक का क्या हुआ क्या
8:07
वो जीवित बचने के बाद समुद्र के तट पर आने
8:10
के बाद कहां है उनका कुछ पता है क्या तो
8:14
गजमोतनी ने राजा नल का हाथ नहीं छोड़ा
8:16
राजा नल से कहने लगी गजमोतनी कि नहीं
8:19
ब्राह्मण देव इस संसार में राजा नल के
8:22
अलावा कोई भी नल पुराण इतिहास की कथा नहीं
8:24
सुना सकता और यहां तक की कथा तो केवल
8:27
महाराज नल ही जानते हैं। आप बताएं आप कौन
8:30
हैं? श्रोताओं समस्त सभासदों और उन सबके
8:36
गजमोतनी महाराज वीरसेन और ब्राह्मण गंगाधर
8:41
के आग्रह पर राजा नल उस मंच से नीचे उतर
8:44
आते हैं। श्रोताओं गजमोतनी के सामने खड़े
8:48
हो जाते हैं और अपनी जो बाएं हाथ में
8:51
अंगूठी धारण कर रखी थी नागराज वासुकी की
8:54
दी हुई है। उस अंगूठी को अपनी उंगली से
8:58
उतार देते हैं। और जैसे ही उंगली से वह
9:01
अंगूठी उतारी तो एक बड़ा सुंदर सजीला
9:07
18 वर्षीय युवक वीर नल सामने खड़ा है।
9:11
गजमतनी अपने पति को पहचान जाती है। उनके
9:14
चरणों में गिर जाती है। श्रोताओं महाराज
9:18
वीरसेन अपने पुत्र और पुत्रवधू को सामने
9:21
खड़ा देख के अश्रुधारा से रोने लगे।
9:26
और जो भी वहां सभासद थे जितनी प्रजा थी
9:30
समस्त प्रजा के नेत्रों से अश्रुधारा बह
9:33
रही है। स्वयं ब्राह्मण गंगाधर जो कि इस
9:37
संपूर्ण साजिश का मास्टरमाइंड था। कहना
9:41
चाहूंगा ये संपूर्ण साजिश रचने वाला था वो
9:44
ब्राह्मण देव भी रोने लगे। राजा अनल के
9:47
चरणों में गिरने की कोशिश की तो राजा अनल
9:51
कहने लगे नहीं ब्राह्मण देव आप ब्राह्मण
9:53
हैं मुझे पाप लगेगा मैं क्षत्रिय हूं
9:56
इसलिए आप मेरे चरणों में गिरने की कोशिश
9:59
ना करें ब्राह्मण गंगाधर समझ गए कि अब
10:02
मेरी मृत्यु नजदीक है अब मुझे महाराज
10:04
अवश्य मृत्युदंड देंगे संपूर्ण दरबार में
10:08
गंगाधर ब्राह्मण कहने लगे कि इस संपूर्ण
10:10
साजिश का जिम्मेदार मैं हूं मुझे इसके लिए
10:13
मृत्युदंड मिलना चाहिए 100 रानियां भी
10:16
महाराज वीरसेन से यही कहने लगी कि महाराज
10:19
इस संपूर्ण साजिश के जिम्मेदार हम हैं।
10:22
हमने ही हमारी बहन मंझा को भगवाया था।
10:26
मरवाने की कोशिश की थी। इसलिए हमें
10:28
मृत्युदंड मिलना चाहिए। और स्वयं महाराज
10:31
वीरसेन कहने लगे कि नहीं रानियों और
10:34
ब्राह्मण देव आप भी नहीं। ये मेरी बुद्धि
10:38
राज्य करने योग्य नहीं रही। मैंने एक
10:40
ब्राह्मण के बहकावे में आकर के बिना विचार
10:43
किए ही अपनी पतिव्रता रानी को मारने का
10:46
आदेश दे दिया। इसलिए मृत्युदंड मुझे मिलना
10:50
चाहिए। तभी श्रोता राजा नल कहने लगे कि
10:53
देखिए पिता श्री आपसे मैंने पहले ही वचन
10:55
लिया था कि आपको किसी को भी परेशान नहीं
10:58
करना है। मैं नल पुराण कथा तो सुना सकता
11:01
हूं लेकिन आपको किसी को परेशान नहीं करना
11:04
है। तो आप मेरे वचन का पालन कीजिए। इन 100
11:08
माताओं को और ब्राह्मण गंगाधर को आप
11:11
बिल्कुल परेशान मत कीजिए। इन्होंने अपना
11:14
काम किया और हमने अपना काम किया। श्रोताओं
11:18
जो बड़ित पुत्र थे पन्नालाल और फूलचंद
11:22
गिड़गिड़ाने लगे कि महाराज प्रथम ना जाने
11:24
हमें कितना दंड देंगे। तो राजा नल कहने
11:27
लगे कि नहीं मामाओं मैं आपको कोई दंड नहीं
11:30
दिलाऊंगा क्योंकि आपने भी मेरे डर की वजह
11:33
से आपने सोचा था कि
11:37
मैं कहीं आपको ना मार दूं। इस डर की वजह
11:40
से आपने मुझ में समुद्र में धक्का दिया
11:42
था। जबकि आपने तो हमें पाला है, बड़ा किया
11:46
है। हमारी माता को शरण दी है। आपको भी इस
11:49
दरबार में सम्मानित पद दिया जाएगा।
11:52
श्रोताओं राजा नल सम्मान सहित दक्षिणपुर
11:56
जाते हैं और अपनी माता मंझा को सादर
12:02
सुसज्जित रथ में राजकीय सम्मान के साथ
12:06
लेवा करके नरवरगढ़ लाते हैं। रानी मंजा को
12:10
देखकर के संपूर्ण प्रजा अश्रुधारा से रोने
12:14
लगी। संपूर्ण प्रजा के नेत्रों से आंसू
12:17
बहने लगे कि हमारी रानी आज हमसे 20 वर्ष
12:21
के बाद मिली है। हमारी राजमाता जो इतनी
12:24
पवित्र है जिसने इस राज्य कुल को आगे
12:26
बढ़ाया। पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ है।
12:29
वही राजमाता इतने कष्ट पा के इस राजकुल को
12:33
आगे बढ़ाने के लिए प्रयत्नरत रही। हे
12:36
श्रोताओं महाराज वीरसेन ने भी महारानी
12:38
मंजा से क्षमा मांगी। परंतु महारानी मंजा
12:41
कहने लगी कि नहीं महाराज मैं पतिव्रता हूं
12:44
और आप मुझसे क्षमा मांगेंगे तो मेरा धर्म
12:46
नष्ट होगा। इसलिए आप मुझसे क्षमा नहीं
12:49
मांगे। आप राजा हैं और आपने जो उस समय
12:52
किया वो उचित किया था। अनुचित नहीं।
12:55
क्योंकि राज आज्ञा सर्वोपरि होती है।
12:58
श्रोताओं उस संपूर्ण परिवार का वहां एक
13:01
भव्य मिलन होता है। अब तो महाराज वीरसेन
13:06
कहने लगे अपने सभासदों से कि सभासदों और
13:09
मेरे सभा में उपस्थित विद्वानों मैं अब
13:12
राज्य संचालन करने के योग्य नहीं रहा। मैं
13:15
इस राज्य का त्याग मेरे पुत्र के लिए करना
13:17
चाहता हूं। मैं आज ही मेरे पुत्र नल को इस
13:22
नरवरगढ़ का राजा घोषित करता हूं। श्रोताओं
13:26
महाराज वीरसेन ने और गंगाधर ब्राह्मण ने
13:28
महाराज नल को राज्य सिंहासन पर बैठा दिया।
13:33
राज्य सिंहासन पर बैठा के उसका राज्य तिलक
13:36
कर दिया और महारानी मंझा को जो उसकी 100
13:40
सौत थी जिन्होंने मरवाया था वो अपने साथ
13:44
ले जाती है। उनके चरणों में गिर रही है।
13:46
उनसे क्षमा मांग रही है। इस तरीके से इस
13:49
संपूर्ण नल परिवार का एक मधुर मिलन हुआ और
13:53
अब नरवरगढ़ के राजा स्वयं महाराज नल हो
13:56
गए। राजा वीरसेन ने नल को राजा बना दिया।
14:01
और देखिए श्रोताओं यहां से आगे की कथाएं
14:04
बड़ी रोचक हैं। अभी तो महाराज नल राजा बने
14:07
हैं। और यहां से अगली कथा मैं आपको
14:09
सुनाऊंगा। बड़ी शानदार और बड़ी सुंदर कथा
14:13
है। लगभग इसके 100 से 150 एपिसोड आपकी
14:16
सेवा में प्रसारित करूंगा। परंतु हो सकता
14:19
है कि मेरी कुछ परिस्थितियों के कारण कुछ
14:22
व्यवधान हो। इसके लिए मैं आप सभी से क्षमा
14:25
प्रार्थी हूं। श्रोताओं अब ये वीडियो मैं
14:28
यहीं समाप्त करता हूं। राजा नल नरवरगढ़ के
14:31
राजा बन जाते हैं और बड़े आराम से अपने
14:35
राज्य का संचालन कर रहे हैं और जो सेठ थे
14:39
पन्नालाल और फूलचंद वो भी महाराज नल ने
14:41
अपने दरबार में उचित पदों पर रख लिए
14:45
मंत्री पदों पर रख लिए। श्रोताओं इस तरीके
14:48
से संपूर्ण नल परिवार का मिलन हुआ। अब मैं
14:52
यह कथा यहीं समाप्त कर रहा हूं। इसी के
14:54
साथ जय हिंद जय भारत।
13.
0:00
समस्त श्रोताओं का, भक्तों का और
सब्सक्राइबर बंधुओं का एक बार फिर से
0:06
स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है। श्रोताओं, जैसा कि आप जानते हैं हमारी कहानी चल रही
0:13
थी नल पुराण इतिहास से। मैंने आपको बताया था कि राजा नल ने
जब नल पुराण की कथा
0:22
महाराज प्रथम के दरबार में नरवरगढ़ नरेश के दरबार में
सुनाई। तो वहां उस कथा को
0:29
सुनने के बाद संपूर्ण परिवार का मिलन हो जाता है। महारानी
मंझा को दक्षिणपुर के
0:36
लक्ष्मी सेठ के यहां से सम्मान सहित बुलवा लिया जाता है और
राजा प्रथम ने अपने पुत्र
0:44
नल को राज्या अभिषेक कर दिया। उसे राजा घोषित कर दिया कि अब
यहां से आगे का राज्य
0:51
का संचालन मेरे पुत्र नल करेंगे और महाराज प्रथम
0:56
आराम से महल में रहने लग जाते हैं। श्रोताओं जब कुछ समय
व्यतीत हो गया तो एक दिन की
1:06
बात है कि महाराज प्रथम महाराज वीरसेन अपनी रानी मंझा से
कहने लगे कि हे प्रिय
1:14
तुम मुझे आज अपने हाथों से भोजन कराओ। मुझे तुम्हारे हाथों
से भोजन किए हुए 20
1:20
वर्ष का समय व्यतीत हो गया है। 20 वर्ष बीत चुके हैं। जब महाराज प्रथम ने यह बात
1:27
मंझ रानी से कही तो मंझ रानी कहने लगी कि नहीं महाराज मैं
आपको भोजन नहीं करा सकती।
1:34
तो राजा प्रथम कहने लगे कि क्यों रानी ऐसी क्या बात हो गई? अब भी तुम्हारे मन में
1:40
कुछ नाराजगी है कि नहीं महाराज? मेरे मन में नाराजगी तो तब भी नहीं थी जब आपने
1:46
मुझे जल्लादों को सौंप दिया था। मैं तब भी बड़ी प्रसन्न थी।
परंतु मैं आपको एक वजह
1:53
बताना चाहती हूं कि मैं पतिव्रता हूं और मैं मेरा यह शरीर
आपने जब मुझे जल्लादों
2:00
के हाथ सौंप दिया था तो उन जल्लादों से छिम गया था। मेरा
शरीर जल्लादों से टच हो
2:06
गया। स्पर्श कर गया जल्लादों को। इसलिए मेरे पतिव्रत धर्म
में कुछ मुझे यह आशंका
2:14
है कि पतिव्रता स्त्रियों का शरीर यदि पराए पुरुष से स्पर्श
करता है तो उसका पतिव्रत धर्म नष्ट हो जाता है। तो इसलिए
2:22
महाराज मैं अपवित्र हो गई। जल्लादों ने मेरे शरीर को छू
लिया। मुझे पकड़ कर के ले
2:27
गए थे। इसलिए मैं आपको भोजन नहीं करा सकती। तो जब यह बात
महाराज वीरसेन ने सुनी
2:36
तो महाराज वीरसेन कहने लगे कि नहीं रानी ऐसी कोई बात नहीं
है कि तो रानी कहती है
2:42
कि नहीं महाराज यह मेरा धर्म है। मैं एक पतिव्रताओं में
सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता
2:47
स्त्री हूं और मैं आपको भोजन नहीं करा सकती। आप मुझसे केवल
दूर से बैठकर के बात
2:54
कर सकते हैं। श्रोताओं महाराज वीरसेन ने जब अपनी रानी की यह
बात सुनी तो महाराज
3:01
वीरसेन व्याकुल हो उठे। तो यह बात सुनकर के महाराज प्रथम
रानी मंझा को बहुत समझाने
3:08
की कोशिश करते हैं कि नहीं रानी ऐसा कुछ भी नहीं है। मेरे
मन में कोई विचार नहीं
3:13
है। तो मंझा रानी नहीं कहती है कि महाराज ऐसा कुछ नहीं है।
आप सोच रहे हैं वो
3:20
बिल्कुल अनुचित है। पतिव्रताओं के लिए अपने शरीर का स्पर्श
भी किसी पुरुष से हो
3:26
जाने पर उनका पवित्रता उनकी जो पवित्रता है वो भंग हो जाती
है। इसलिए महाराज यदि
3:33
आप मेरे हाथों से भोजन करना चाहते हैं तो आपको एक काम करना
होगा। तो राजा प्रथम
3:39
कहने लगे कहो रानी जो आप कहेंगी आपकी इच्छा अनुसार मैं वही
काम करने को तैयार
3:45
हूं। तो रानी मंझा कहने लगी कि महाराज यदि आप मेरे हाथों से
भोजन करना चाहते हैं तो
3:52
आप मुझे गंगा स्नान कराइए। और जब मैं गंगा में स्नान करूंगी
तो मेरा यह शरीर पवित्र
3:58
हो जाएगा। जो जल्लादों ने मेरे शरीर को स्पर्श किया था वो
स्पर्श उनका समाप्त हो
4:04
जाएगा। गंगा में पवित्रता है और गंगा से मैं भी पवित्र हो
जाऊंगी। पापियों के
4:10
पापों को तारने वाली उस गंगा में मुझे आप स्नान कराएं।
श्रोताओं जब महाराज प्रथम ने
4:18
ये बात सुनी अपनी महारानी मंझा की तो राजा प्रथम ने आदेश दे
दिया अपने सेनापति को कि
4:25
60 हजार की सेना तैयार की जाए। हम कल धोसा बजाते हुए
अपनी महारानी मंझा को गंगा
4:33
स्नान कराएंगे। कल गंगा स्नान के लिए रवाना होंगे। कुछ
4:39
करना है हमें गंगा स्नान करने के लिए। देखिए श्रोताओं
4:44
महाराज के आदेश सेनापति ने अपनी समस्त सेना को आदेश दिया कि
आप तैयार हो जाएं।
4:52
महाराज प्रथम के आदेशानुसार 60 हजार की सेना
महाराज प्रथम ने तैयार की। 60 हजार
5:00
की सेना के साथ महाराज प्रथम और रानी मंझा गंगा स्नान करने
के लिए चल देते हैं। राजा
5:09
नल अपने राज्य का संचालन कर रहे हैं और महाराज प्रथम धूमधाम
से अपनी महारानी मंझा
5:17
को साथ लेकर के गंगा स्नान करने चले जा रहे हैं। अब देखिए
श्रोताओं महाराज स्नान
5:24
महाराज प्रथम गंगा स्नान के लिए गढ़ गंगा पर पहुंच गए।
5:30
और वहां पर्व चल रहा था गंगा स्नान का। गंगा स्नान का समय आ
रहा था। एक सोम
5:39
सोमवती कहते हैं या सोमवती अमावस्या पड़ने वाली थी। उसका
पर्व नजदीक था।
5:46
तो उस सोमवती अमावस्या के कारण वहां गढ़ गंगा पर देश के
महाराज बामनगढ़ के राजा
5:56
अपने अपने तंबू डेरा डाल के पड़े हुए थे। अपनेप शिविर लगा
के गंगा स्नान के लिए
6:03
वहां ठहरे हुए थे। और जब महाराज प्रथम 60 हजार की सेना लेकर के पहुंचे तो वो
6:10
उन्होंने भी अपना तंबू गंगा के पूर्व दिशा में डाल दिया। और
महाराज प्रथम उस पवित्र
6:19
गंगा में स्नान करने के लिए उस शुभ समय का इंतजार करने लगे
कि जब पर्व आएगा तो सबसे
6:27
पहले मैं मेरी महारानी को स्नान कराऊंगा। श्रोताओं दूसरे
दिन जब सोमवती अमावस्या का पर्व आया
6:35
तो महाराज प्रथम ने सर्वप्रथम अपनी रानी को स्नान कराया
गंगा में और महारानी मंझा
6:42
को एक सोने की नाव लेकर के कह दिया कि आप गंगा में भ्रमण
कीजिए। जल क्रीड़ा का आनंद
6:50
लीजिए। माता गंगा में आप सैर कीजिए। तो मंझ रानी वहां उस
गंगा में एक सोने की नाव
6:59
में विचरण कर रही थी। सैर कर रही थी पानी में। अब देखिए
श्रोताओं होनी बड़ी बलवान
7:07
होती है। वही उसी गंगा में स्नान करने के लिए एक फूल सिंह
पंजाबी कंपिलगढ़ का राजा
7:16
था और वह महापराक्रमी देवी उसके साथ लड़ती थी। 14 विद्याधान उसकी एक लड़की थी जिसका
7:24
नाम था सरती। वह उस महाराज फूल सिंह की पुत्री भी गंगा
7:31
स्नान करने के लिए अपने पिता के साथ गणगंगा पर आई हुई थी।
और जब वो गणगंगा पर
7:37
आई तो वह भी गंगा स्नान करने करते हुए एक नाव में बैठकर के
गंगा में सैर करने चली
7:44
जाती है। उधर से नरवरगढ़ की महारानी
7:50
मंझा की नाव आ रही थी और इधर से फूल सिंह पंजाबी की पुत्री
सरवती की नाव आ रही थी।
7:58
होनी बड़ी बलवान होती है। श्रोताओं पानी का कोई ऐसा भंवर
पड़ा कोई ऐसा चक्कर
8:07
फंसा उस चक्कर में दोनों नाव फंस गई और दोनों नावों में
टक्कर हो जाती है। जब
8:13
दोनों नावों में टक्कर हुई तो मल्ल्हाों ने नाव को तो संभाल
लिया डूबने नहीं दिया
8:20
परंतु मंझ रानी और वो लड़की आमने-सामने आ गई। तो वो लड़की
एकदम देख के मंझ रानी से
8:28
कहने लगी कि तू कौन है? कहां की रहने
वाली है? और किसकी नारी है? तुझे होश
नहीं किने
8:37
मेरी नाव में टक्कर मार दी है। तो मंजा कहने लगी कि नहीं
बेटी ये मैंने टक्कर
8:43
नहीं मारी। मेरे मल्ल्हा ने टक्कर नहीं मारी। ये पानी का
ऐसा ही जाल था। और इस
8:49
जाल में हमारी दोनों नाव फंस गई। भंवर पड़ रहा था। उस भंवर
में नाव फंस गई और नाव
8:55
टकरा गई। तो सरती कहने लगी कि तुम कौन हो ये बताओ।
9:01
और तुम किस राजा की रानी हो? तुम यहां
अकेली भ्रमण कर रही हो। और तुम्हें तुम तो
9:09
इतनी सुंदरी हो। यदि तुम अकेली भ्रमण कर रही हो तो तुम्हें
तो मेरे पिता के साथ
9:15
चलना चाहिए। तुम मेरे पिता की महारानी बनके कंपिलगढ़ चलो।
तुम्हें अकेले स्नान
9:22
करने के लिए नहीं भेजा जाएगा। मंझ रानी ने जब ये बात सुनी
तो मंझ रानी कहने लगी कि
9:28
बेटी सुन ध्यान से। मैं वामनगढ़ में एक श्रेष्ठ गढ़ है
नरवरगढ़ और वहां के महाराज
9:37
वीरसेन की महारानी हूं। मेरा नाम मंजा है और मैं गंगा स्नान
के लिए आई हूं। परंतु
9:44
मैं तो बेटी विवाहित हूं। मेरे पति है। परंतु तू यह बता कि
तेरा विवाह हो गया या
9:51
नहीं हुआ। तो मंझा से वह लड़की कहने लगी कि नहीं मेरा विवाह
नहीं हुआ है। तो मंझा
9:57
कहती है कि देख बेटी तेने बात तो मुझसे बहुत बड़ी कही है कि
मैं तेरे पिता के साथ
10:02
चलूं। परंतु मैं तो जा नहीं सकती क्योंकि मेरा विवाह हो
चुका है। मेरी संतान है।
10:09
मैं महारानी हूं। परंतु मैं तुझसे कहती हूं यदि आज मेरे साथ
मेरा पुत्र होता। मैं
10:15
उसे गंगा स्नान के लिए लाती तो तुझे अवश्य मेरी पुत्रवधू
बना करके नरवरगढ़ ले जाती।
10:22
और जब यह बात मंझा रानी ने उस सरवती से कही तो सरवती
क्रोधित हो गई। तमतमा गई और
10:30
कहने लगी कि मंझा तेने मेरा अपमान किया है। तू नहीं जानती
मेरे पिता के साथ
10:37
महाकाली युद्ध करती है। मेरे पिता के पास चार वीर हैं जो
अदृश्य होकर के युद्ध करते
10:45
हैं। इन वामन गढ़ों में मेरे पिता फूल सिंह का मुकाबला करने
वाला कोई राजा नहीं
10:50
है। तो मंजा कहने लगी कि ठीक है बेटी परंतु अब मैं कुछ
ज्यादा नहीं कह सकती। तू
10:57
यहां से चली जा। अच्छा रहेगा क्योंकि मेरा पुत्र यहां नहीं
है। नहीं बलपूक मैं तेरा
11:02
विवाह करवा ले जाती। श्रोताओं दोनों में विवाद हो गया।
लड़ाई की जड़ जम गई और
11:10
क्रोधित होकर के सरवती मल्ल्हा से कहती है कि मेरी नाव को
मेरे तंबू की तरफ लौटा दो।
11:17
मेरे शिविर की तरफ मेरी नाव को लौटाइए। और महारानी मंझा का
मल्ला भी महारानी मंझा की
11:23
नाव को लेकर के महाराज प्रथम के शिविर की तरफ चल देता है।
11:28
दोनों अपनेप शिविरों में आ जाती हैं। महारानी मंझा तो
समझदार थी तो राजा से कुछ
11:34
नहीं कहा लेकिन वो नौजवान लड़की एक 18 वर्षीय युवती अपने क्रोध को नहीं रोक सकी
11:42
और अपने पिता फूल सिंह के सामने जाकर के रोने लगी। तो फूल सिंह
कहने लगा कि बेटी
11:49
तेरे रोने का कारण क्या है? क्यों रो रही
है? मुझे यह बता। यदि किसी ने तेरी तरफ
11:55
हाथ किया है तो उसका हाथ कटवा दूंगा। आंख निकाली है तो
आंखें निकलवा दूंगा। और यदि
12:01
किसी ने जबान चलाई है तो उसकी जीभ कटवा दूंगा। मुझे बताइए
तू क्यों रो रही है?
12:09
परंतु देखिए श्रोताओं जिस तरीके से रावण के पास सुपण खा गई
थी। त्रिया जाल रच दिया
12:17
उस लड़की ने। रोने लगी। रुधन करने लगी कि मेरे पिता इतने
बड़े बलवान हैं। काली के
12:26
भक्त हैं। काली साक्षात साथ में लड़ती हैं। और उनकी पुत्री
से किसी एक छोटे-मोटे
12:33
राजा की रानी यह कह जाए कि मेरी पुत्रवधू बना लूं? तो क्या यह शोभा देता है महाराज?
12:39
जब यह बात फूल सिंह ने सुनी तो कहने लगा कि बेटी मुझे बताइए
वो कौन थी जिसने तेरा
12:46
अपमान किया है। जो अपने पुत्र की पत्नी तुझे बनाना चाहता
है। मैं उसे जीवित नहीं
12:52
छोडूंगा। इस गणगंगा में मेरी मां भवानी की सौगंध खाकर कहता
हूं इस गणगंगा में काट
12:58
काट करके बहा दूंगा। देखिए श्रोताओं सरवती अपने पिता फूल
सिंह
13:03
से कहने लगी कि पिताजी एक छोटा सा राज्य नरवरगढ़ और उसका
कोई राजा प्रथम बताया और
13:11
उसकी महारानी मंजा ने मेरी नाव में टक्कर मरवा दी अपने
मल्हा से और मुझसे कहने लगी
13:18
कि मेरा पुत्र यहां होता तो मैं तुझे बलपूर्वक अपनी
पुत्रवधू बनाकर ले जाती। जब
13:25
अपनी पुत्री की यह बात महाराज फूल सिंह ने सुनी, फूल सिंह पंजाबी ने सुनी, कंपिलगढ़
13:32
के राजा ने सुनी तो राजा का क्रोध सातवें आसमान पर छा गया।
फूल सिंह क्रोधित हो उठा
13:39
और कहने लगा कि बेटी किसकी मौत आ गई? मैं नरवरगढ़ के एक-एक नर बच्चा को भवानी मां
13:48
की सौगंध खाकर कहता हूं काट काट करके गढ़ गंगा में बहा
दूंगा। जीवित नहीं छोडूंगा।
13:54
एक को भी जिंदा नहीं जाने दूंगा। मैं अभी उसको जाकर के
देखता हूं। अपनी पुत्री को
14:02
समझाने के बाद फूल सिंह ने अपनी सेना को आदेश दिया। तैयार
हो जाओ योद्धाओं। हमारी
14:10
पुत्री का अपमान एक छोटे से राज्य नरवरगढ़ की महारानी ने
किया है। हम बलपूर्वक उस
14:17
महारानी को लेकर के चलेंगे और उस राजा को पराजित करेंगे।
श्रोताओं महाराज फूल सिंह
14:24
पंजाबी ने अपनी सेना को आदेश दे दिया। सेना सुसज्जित हो गई।
रण के बाजे बजने लगे
14:31
और कासिद को बुला लिया। उसी समय कासिद कहते हैं जो खत लेकर
के जाता है जो दूत
14:37
होता है। एक दूत को बुलाया और दूत से कहा कि दूत मैं तुझे
एक खत लिख के दे रहा हूं।
14:44
और इसे नरवरगढ़ के महाराज प्रथम को उसका शिविर पूर्व दिशा
में लगा हुआ है। उसको
14:51
सौंप देना। तो फूल सिंह पंजाबी ने एक खत लिखा और खत में
लिखता है कि दुष्ट नरेश
15:00
तेरी महारानी ने मेरी पुत्री का अपमान किया है। यदि तू
जीवित रहना चाहता है तो
15:06
अब भी समय है तू यहां से गंगा का घाट छोड़ के नरवरगढ़ लौट
जा। और यदि गंगा में स्नान
15:13
किया गंगा के घाट पर रहा तो मेरे हाथों से वीरगति को
प्राप्त हो जाएगा। मुझसे युद्ध
15:20
करने के लिए तैयार रहे। नीचे अपनी मोहर लगा दी। कंपिलगढ़ की
मोहर लगा के फूल सिंह
15:26
ने अपने हस्ताक्षर कर दिए और वह परवाना वो खत दे दिया एक
दूत को। दूत उस खत को लेकर
15:35
के चला जाता है और पहुंच जाता है महाराज वीरसेन के दरबार
में क्योंकि ये राजा थे
15:44
वहां शिविर लगाते थे वहां इनका दरबार भी लगता था महाराज
वीरसेन के दरबार में
15:50
उपस्थित हो गया और खत महाराज के सामने प्रस्तुत कर दिया जब
महाराज ने वो खत पढ़ा
15:57
तो महाराज वीरसेन क्रोध में तमता गए कहने लगे कि किसी का
इतना दुस्साहस कि हमें गढ़
16:05
गंगा से स्नान करने से वंचित कर दे। हम नरवरगढ़ के नरेश
हैं। और कहा उससे कि दूत
16:14
ध्यान से सुन लखियावन के से हाथी नहीं मिलते हैं। नरवर के
से नरच्चा नहीं मिलते
16:20
हैं। और संकलदीप की सी पद्मनी रानी नहीं मिलती है और महवे
के से क्षत्रिय नहीं
16:26
मिलते हैं। जाकर के अपने महाराज से बोल देना कह दो अपने
महाराज से कि राजा प्रथम
16:33
युद्ध करने के लिए तैयार हैं। युद्ध की तैयारी करवाओ।
महाराज प्रथम कभी भी गंगा
16:39
का घाट नहीं छोड़ेंगे। हमको वह कमजोर समझता है और हमें डरा
करके
16:46
यहां से भगाना चाहता है। जबकि अपनी पुत्री का दोष नहीं देख
रहा है। श्रोताओं
16:53
उस दूत को महाराज प्रथम ने वापस भेज दिया और दूत महाराज फूल
सिंह के दरबार में आ
17:00
जाता है। कंपिलिगढ़ नरेश के दरबार में आ जाता है। और
कंपिलगढ़ नरेश को समस्त
17:06
दास्तान आ करके सुनाई कि महाराज वह अहंकारी नरेश वीरसेन
लड़ने को तैयार है।
17:14
उसके साथ 60 हजार की फौज
है। 60 हजार की फौज को उसने सुसज्जित होने का आदेश दे
17:21
दिया है। वो गणगंगा का घाट छोड़ना नहीं चाहता है। महाराज वो
हमसे युद्ध करेगा। तो
17:27
फूल सिंह पंजाबी भी क्रोधित हो उठते हैं। श्रोताओं सुसज्जित
सेना दोनों पक्षों की
17:34
महाराज प्रथम के साथ 60 हजार की सेना
है और फूल सिंह पंजाबी के साथ भी 1 लाख की
17:42
सेना है। दोनों पक्षों के योद्धा मैदान में आमने-सामने हैं
और युद्ध की तैयारी
17:49
में आदेश की पालना में खड़े हुए हैं कि कब अपने-अपने नरेशों
का आदेश मिले। जब फूल
17:56
सिंह पंजाबी ने अपनी सेना को आदेश दिया कि बंदी बना लो इन
दोनों को। इस राजा की सेना
18:04
सहित इसका नाश कर दो। सबको काट काट के गढ़ गंगा में बहा दो।
श्रोताओं अब तो दोनों
18:11
तरफ की सेनाओं में युद्ध आरंभ हो गया। उन्हीं की भाषा में
मैं आपको बयान करता
18:17
हूं। दोनों अनि बराबर मिल गई। मची परस्पर मारा मार। गुर परग
और गदा चल रही कोता
18:25
खानी चले कतार खटखट खटखट तेगा चल चल रही छपक छपक तलवार डेढ़
पहर तक बजो दोधार और
18:32
बहने लगी रक्त की धार देखिए श्रोताओं उनमें बड़ा भयानक
युद्ध हुआ बड़ा कठिन ये
18:40
संग्राम चल रहा है गढ़ गंगा पर इधर तो नरवर के नरच्चा
18:46
और उधर पंजाबी फूल से कंपिलगढ़ का महाराज
18:51
दोनों की सेनाएं आमने सामने युद्ध के मैदान में डटी हुई है।
श्रोताओं
18:57
बड़ा घोर संग्राम चल रहा है। काट काट के गंगा की धारा में लाशों
को बहाया जा रहा
19:04
है। दोनों पक्षों के वीर जवान अपने अपने राजाओं के नाम की
जय जयकार करके युद्ध कर
19:11
रहे हैं। दोनों में महासंग्राम चल रहा है। अब देखिए,
19:17
जब फूल सिंह पंजाबी की नरवर नरेश से कोई भी पेश नहीं पड़ी।
फूल सिंह पंजाबी को पता
19:25
था कि नरवर नरेश कोई छोटे-मोटे राजा नहीं है। महान राजा
हैं। अतुलित पराक्रमी हैं।
19:34
और इस राजा को युद्ध में हराना आसान काम नहीं है। तो, फूल सिंह पंजाबी अपनी पुत्री
19:42
सरवती के पास वापस अपने शिविर में जाता है और कहने लगा, "पुत्री, मेरे पास 1 लाख की
19:49
सेना है। और महाराज प्रथम के पास 60,000 सैनिक हैं। और हमें युद्ध करते-करते तीन
19:56
पहर का समय व्यतीत हो चुका है। परंतु कोई हारजीत किसी पक्ष
की नहीं हुई है। तो सरती
20:03
कहने लगी कि पिताजी मेरे पास जादू है। मैं 14 विद्या निधान हूं। मैं आपको एक जादू की
20:11
पोथी देती हूं। एक जादू का डिब्बा देती हूं। मंत्र देती
हूं। और इस डिब्बा में एक
20:18
भस्मी है। एक भस्म है। और उस भस्म को आप
20:24
जितने बीच में बिखेर दोगे, उतने बीच के
जवान पत्थर के हो जाएंगे। वो युद्ध करने
20:31
में सक्षम नहीं रहेंगे, बेहोश हो जाएंगे
और उन्हें आप आसानी से काट सकते हैं।
20:37
श्रोताओं अब देखिए सरवती अपने पिता फूल सिंह को उस जादू के
डिब्बे
20:44
को दे देती है। क्योंकि सरवती भी मां काली की भक्त थी और उस
जमाने में जादू प्रचलित
20:52
था। कुछ शास्त्रों में और पुराणों में ऐसा बताया जाता है कि
कुछ राजाओं के साथ तो
20:59
मां भवानी स्वयं युद्ध किया करती थी। जैसे कंपिलगढ़ नरेश
फूल सिंह के साथ स्वयं मां
21:06
काली युद्ध करती थी। अब देखिए श्रोताओं फूल सिंह उस जादू के
डिब्बे को लेकर के चल
21:14
देता है रणभूमि में। रणभूमि में फूल सिंह ने जाकर देखा तो
उसकी सेना में भगदड़ मची
21:21
हुई है। नरवर के जवानों ने उसकी सेना को पछाड़ रखा है। सेना
भाग रही है और नरवर के
21:30
वीर योद्धा उनके पीछे पड़ रहे हैं। जब अपनी सेना को पीछे
हटते हुए देखा तो फूल
21:37
सिंह कंपिलगढ़ नरेश जादू के डिब्बा को लेकर के आगे बढ़ जाता
है। और सामने महाराज
21:44
प्रथम को देखा तो कहने लगा नरेश क्यों इन सेनाओं का अंत
करवा रहे हो? आओ दोद हाथ
21:51
आमने सामने हम करेंगे। देखिए श्रोताओं महाराज प्रथम कोई
छोटे-मोटे बलवान नहीं
21:59
थे। महाराज प्रथम में और फूल सिंह पंजाबी में दोनों में तलवार
का युद्ध चल रहा है।
22:06
परंतु फूल सिंह पंजाबी महाराज प्रथम को आसानी से नहीं पकड़
सकती थी। आसानी से
22:12
नहीं हरा सकते थे और ना महाराज प्रथम ही फूल सिंह को आसानी
से हरा सकते थे। जब
22:19
महाराज प्रथम ने अपनी तलवार का प्रहार किया और फूल सिंह
पंजाबी अचेत अवस्था में
22:25
पृथ्वी पर गिरा तो मां भवानी उसी समय अपना खड़क आगे लगा
देती है और फूल सिंह की
22:31
रक्षा कर देती है। इस तरीके से कई बार महाराज प्रथम ने फूल
सिंह पंजाबी को धरनी
22:37
पर पछाड़ दिया। लेकिन मां भवानी स्वयं अपना तेगा फूल सिंह
की सुरक्षा में आगे
22:43
बढ़ा देती और फूल सिंह पंजाबी महाराज प्रथम के बारों से
सुरक्षित बच जाता। ये
22:50
सोच कर के फूल सिंह पंजाबी ने मन में विचार किया कि अब मेरे
पास कोई दूसरा
22:55
विकल्प नहीं रहा। अब मैं युद्ध नहीं जीत सकता। यदि कुछ समय
तक और युद्ध हुआ तो
23:02
महाराज प्रथम के जवानों ने नरवरगढ़ के महायोद्धाओं ने मेरी
सेना को छिन्नभिन्न
23:08
कर दिया है। मेरी सेना भाग रही है। मेरे सेनापति मारे जा
चुके हैं। इसलिए अब मुझे
23:16
जादू का प्रहार करना होगा। श्रोताओं उस दुष्ट उस धोखेबाज
नरेश ने
23:24
जादू का डिब्बा लेकर के उसमें जो अवमंत्रित भस्मी थी जिसको
सम्मोहक भस्मी
23:29
भी कहा गया है वेद पुराणों में वो सम्मोहक भस्मी महाराज
प्रथम की सेना पर छोड़ दी और
23:37
जहां जहां जैसे-जैसे वो भस्म उड़कर पहुंची तो महाराज प्रथम
की सेना बेहोश होने लगी
23:44
महाराज प्रथम की सेना जैसे ही बेहोश होती और कंपिलगढ़ के
जवान उनका शीश धड़ से अलग
23:51
कर देते। काट काट करके महाराज प्रथम के 60 हजार जवानों को गढ़ गंगा में बहा दिया
23:58
गया। महान रक्तपात हुआ श्रोताओं महाराज प्रथम
24:03
की सेना में से केवल दो व्यक्ति शेष बच गए। महाराज प्रथम की
पराजय हो गई। महाराज
24:10
प्रथम ने देखा कि उसकी समस्त सेना का संहार हो चुका है और
कंपिलगढ़ नरेश फूलसेन
24:18
और उसके कुछ सेनापति महाराज प्रथम को बंदी बनाने के लिए आगे
बढ़ रहे हैं। रानी मंझा
24:25
और महाराज प्रथम दोनों खड़े हुए ये देख रहे हैं। रानी मंझा
को भी
24:32
पता चल गया कि मेरे समस्त सैनिक योद्धा मारे जा चुके हैं।
और अब महाराज की हार
24:37
निश्चित है। श्रोताओं फूल सिंह ने कुछ ही समय में महाराज
प्रथम को चारों तरफ से
24:44
घिरवा लिया और बंदी बना लिया। महाराज प्रथम की के हाथों में
हथकड़ी डाल दी गई।
24:52
पैरों में बेड़ियां डाल दी गई। महाराज प्रथम को जंजीरों से
जकड़ दिया गया। और
24:58
रानी मंझा को भी जंजीरों से जकड़ दिया गया। और डोंसा बजाते
हुए ले गए अपने शिविर
25:05
को। अब देखिए श्रोताओं जो राजा
25:11
सात हाथ के सिंहासन पर बैठता था। वही महाराज
25:17
नरवरगढ़ नरेश आज फूल सिंह पंजाबी की कैद में कैदी हो गए।
फूल सिंह ने अपने सैनिकों
25:25
को आदेश दिया कि सेना का कच कंपिलगढ़ की तरफ कराया जाए।
गंगा का स्नान पूर्ण हुआ
25:32
और मेरी बामनगढ़ नरेशों को बंदी बनाने की अभिलाषा थी। मैं
बामनगढ़ बामनगढ़ के
25:38
राजाओं को बंदी बना चुका हूं। समस्त राजा मेरे यहां टैक्स
देते हैं। कर देते हैं
25:44
कर। इसलिए चलो कंपिलगढ़ की तरफ पयान किया जाए। श्रोताओं
25:51
अपने महाराज फूल सिंह का आदेश सुनकर के सैनिकों ने उत्साह
पूर्वक विजय का धोसा
25:57
बजवाया और कंपिलगढ़ के लिए सेना ने कूच कर दिया। कई दिनों
का सफर करने के बाद फूल
26:05
सिंह की सेना कंपिलगढ़ पहुंच जाती है। कंपिलगढ़ में महाराज
प्रथम ने अपना दरबार
26:13
सजाया। अपने दरबार में समस्त सामंत बड़े-बड़े धवल, योद्धा और सेनापतियों को
26:21
बुलाया। अपने सलाहकारों को बुलाया और कहा कि दो बंदी युद्ध
भूमि से लेकर के आए हैं
26:29
जो स्वयं महाराज प्रथम नरवरगढ़ के महाराज और उनकी पटरानी मन
जाए दोनों को मेरे
26:36
सामने दरबार में पेश किया जाए। देखिए श्रोताओं समय-समय की
बात समय को परखे ज्ञानी एक समय
26:44
पे धूप एक पे बरसे पानी। समय बहुत बड़ा बलवान होता है। समय
की बात होती है। जिस
26:52
राजा के आदेश में इतनी दम थी कि संपूर्ण नरवर पर शासन चलता
था जो स्वयं एक सिंहासन
27:01
पर बैठकर के न्याय किया करते थे। वही राजा बंदी बन के
कंपिलगढ़ नरेश महाराज फूल सिंह
27:09
के दरबार में खड़े हुए हैं। उनका शरीर जंजीरों से जकड़ा हुआ
है और चार सैनिक उन
27:16
पर भाला ताने हुए हैं। और यही हाल नरवर की महारानी
27:22
मंझा का है। महाराज फूल सिंह दरबार में उपस्थित हो गए और
नरवर नरेश से कहने लगे
27:30
कहो नरवर के महाराज आप बड़ा युद्ध करना चाहते थे। हमने आपको
27:36
आदेश दिया था कि आप वापस लौट जाए तो बहुत अच्छे रहेंगे।
परंतु आपने नहीं माना। आप
27:42
बोलिए आपको क्या सजा दी जाए। नरवर नरेश महाराज प्रथम बिना
घबराए हुए उस राजा से
27:49
कहने लगे कि दुष्ट नरेश जो राजा एक राजा के साथ व्यवहार
करता है वो व्यवहार किया
27:55
जाए। मैं भी एक राजा हूं। तो फूल सिंह पंजाबी
28:00
हंसा कहने लगा कि नहीं तुम राजा जैसे व्यवहार करने के योग्य
नहीं है। तुम्हारी
28:07
इस पत्नी ने मेरी पुत्री का अपमान किया था। अपने पुत्र के
साथ विवाह करने की बात
28:13
कही थी। तुमने अपने आप को नरवर के नर बच्चा कहा
28:21
था। अब तुम्हें मैं सजा देता हूं। श्रोताओं
28:26
महाराज प्रथम को फूल सिंह पंजाबी क्या सजा सुना रहा है कि
देखिए तुम्हें मेरे बंदी
28:33
गृह में रहना होगा। आपके हाथ में एक चाकी दे दी जाएगी। और
28:40
5 किलो अनाज आपको रोजाना पीसना होगा। आपको
28:46
चाकी चलानी होगी। और खाने के लिए सूखी दो रोटी दी जाएंगी।
28:52
सब्जी भी नहीं होगी। जाइए इनको ले जाया जाए और जहां जिस
बंदी
28:59
गृह में चाकी पीसी जाती है उस बंदी गृह में इस महाराज प्रथम
को कैद कर दिया जाए।
29:06
श्रोताओं राजा प्रथम देखिए समय का प्रभाव। फूल सिंह पंजाबी
ने कैद में डलवा दिया। और
29:15
एक चाखी रख दी गई और उसके सामने अनाज रख दिया गया। कि इसको
पीस ले। महाराज प्रथम
29:24
की यह हालत हो गई। हाथ हथेला छूटे और बांस पीठ पर टूटे। जब
महाराज प्रथम के हाथ से
29:31
वो चाकी का हथेला बोलते हैं उसको वो छूटता है और वैसे ही जो
प्रहरी होते हैं वो
29:36
महाराज प्रथम की पीठ पर बांसों की मार लगाते हैं। महाराज
प्रथम बंदी गृह में
29:43
चक्की पीस रहे हैं। चाकी चला रहे हैं। हाथों में छाले पड़
गए महाराज प्रथम की।
29:50
अब देखिए मंझ रानी को क्या सजा दी जाती है। श्रोताओं मंझ
रानी से महाराज फूल सिंह
29:57
नरवरगढ़ की राजा की पटरानी से क्या कहने लगे? देखिए श्रोताओं ये भी समय का ही
30:03
प्रभाव है कि रानी वह बहुत उछल रही थी। मेरी पुत्री ने
तुझसे क्या गलत कहा था कि
30:10
तू अकेली गंगा में विहार कर रही है। तू मेरे पिता के साथ
चल। जबकि तेने मेरी बात
30:18
को नहीं मेरी पुत्री की बात को नहीं माना और मेरी पुत्री का
अपमान किया। अब बताइए
30:25
तू मेरी कैद में है और मेरी घरवाली बनेगी।
30:30
अब बोल क्या क्या किया जाए तेरा? तो यह बात सुनकर के मंजा रानी कहने लगी
30:39
दुष्ट कायर राजा तू ध्यान रख मैं तेरे इस कंपिलगढ़ को धूल
30:46
में मिलवा दूंगी जब मेरा शेर इस कंपिलगढ़ पर आक्रमण करेगा
30:52
मंझ रानी की बात सुनकर के फूल सिंह पंजाबी हंसा कि तेरा शेर
क्याने कोई शेर पैदा
30:59
किया था कि हां मैंने शेर पैदा कि शेर तो बनी में पैदा होते
हैं। हां,
31:06
मैंने बनी में ही पैदा किया। कि शेर तो हिंस के बेड़े में
पैदा होते हैं। तो मंजा
31:12
कहने लगी हां हिंस के बेड़े में ही पैदा किया था। फूल सिंह
कहने लगा शेरनी का दूध
31:18
कि हां मेरे पुत्र ने शेरनी का दूध पिया है। और जब वो आएगा
तो तेरा एक कंपिलगढ़
31:24
धूल में मिल जाएगा। कंपिलगढ़ में कोई रोने वाला नहीं रहेगा।
यह स्थिति तेरे इस
31:30
कंपिलगढ़ की हो जाएगी। फूल सिंह पंजाबी क्रोधित हो उठा कि
रानी जबान को संभाल और
31:38
अब मेरी पटरानी बनने के लिए तैयार हो जा। तो मंजा ने जब यह
बात सुनी तो मंजा कहने
31:44
लगी कायर तू मुझे स्पर्श भी नहीं कर सकता। यदि स्पर्श करने
का भी दुस्सा किया तो मैं
31:52
तेरा सर धड़ से अलग कर दूंगी। तू मुझे कौन जानता है?
31:57
श्रोताओं फूल सिंह पंजाबी ने मंझ रानी को बहुत परेशान किया।
परंतु मंझ रानी एक भी
32:06
बात नहीं मानती है उसकी। तो फूल सिंह पंजाबी मन में विचार
करता है
32:11
कि इसको बैलाया जाए और बहला के पटरानी बनाया जाए। फूल सिंह
पंजाबी ने मंजा से
32:17
कहा तो बता तेरा पुत्र यदि तुझे छुड़ाने नहीं आया तो क्या
करेगी? कि तब मैं तेरी
32:24
पटरानी बन जाऊंगी। तो फूल सिंह कहने लगा कितना समय लगेगा कि
32:30
छ महीने का छ महीने तक तू मेरा धर्म का पिता है और मैं तेरी
धर्म की पुत्री हूं।
32:37
फूल सिंह पंजाबी कहने लगा ठीक है। मैंने बामनगढ़ के राजाओं
को कैद कर लिया। कोई
32:44
ऐसा नरेश नहीं है। कोई ऐसा पैदा नहीं हुआ है जो मुझे पराजित
करे। मां भवानी मेरे
32:50
साथ युद्ध करती हैं। तो मुझे तो कोई हराने वाला है ही नहीं।
कि ठीक है मंजा हम तुझे
32:56
छ महीने का आश्वासन देते हैं। परंतु याद रहे छ महीने के बाद
तुझे हमारी पटरानी
33:04
बनना पड़ेगा। मंजा कहती है ठीक है मैं वायदा करती हूं।
श्रोताओं फूल सिंह पंजाबी
33:11
कहने लगा कि मैं आपको इस तरीके से पुत्री के महल में तो भेज
नहीं सकता। आपको भी मैं
33:17
यह सजा देता हूं। छ महीने तक आपको मेरे महल पर एक बहुत लंबा
बांस लेकर के
33:25
काग उड़ाने पड़ेंगे। मेरे महल पर जो कौवा आते हैं उनको
उड़ाना पड़ेगा। काग उड़ानी
33:32
कर दी रानी कि जाइए एक लंबा बांस दे दीजिए इसके हाथ में और
भेज दीजिए इसको महल पर।
33:39
महल के पक्षियों की सुरक्षा यह करेगी। महल पर कोई पक्षी
नहीं आ जाए। कोई कौवा नहीं आ
33:46
जाए। जा श्रोताओं महारानी मंझा को जो नरवर
33:51
गढ़ की रानी थी उसको फूल सिंह पंजाबी ने एक लंबा बांस देकर
के अपने महल पर काग
34:00
उड़ाने के लिए भेज दिया और कह दिया कि भोजन में दो रोटियां
सुबह और दो रोटी शाम
34:05
को दी जाएंगी। अब देखिए श्रोताओं यही तो समय होता है।
34:13
श्रोताओं समय की बात होती है। समयसमय का फेर है समय बड़ा
बलवान। भीलन लूटी गोपिका
34:21
जब बुई अर्जुन बेईमान श्रोताओं आपको ज्ञात होगा कि एक बार
उस अर्जुन की टंकार को
34:28
सुनकर के संसार दहल जाता था। उसी अर्जुन से जब द्वारका
समुद्र में डूब रही उस समय
34:36
भगवान श्री कृष्ण अपने धाम को चले गए थे तो भीलों ने पकड़
लिया था अर्जुन को।
34:41
अर्जुन से गोपिकाओं को लूट लिया। अर्जुन गांडीव को नहीं उठा
सके। तो यही समय होता
34:46
है। इस संसार में सबसे बड़ा बलवान समय है। जो समय करता है
वह कोई नहीं कर सकता। बड़े
34:54
से बड़ा दुश्मन नहीं कर सकता। समय की मार से कोई नहीं बच
सकता। देखिए श्रोता वही
35:00
मंज रानी उस महल पर कौवा उड़ा रही है। काग
35:06
उड़ानी होकर के बांस से चारों तरफ देख रही है। महल की
सुरक्षा में है। और महाराज
35:13
प्रथम बंदी गृह में चक्की चला रहे हैं। हाथों से पीसते हैं 5 किलो अन्न प्रतिदिन
35:22
और खाने के लिए दो रोटी मिलती है। अब देखिए उधर क्या होता
है कि काफ़ी समय गण
35:30
गंगा पर हो गया। 60 हज़ार की
सेना महाराज की गण गंगा पर समाप्त हो गई। और इधर राजा
35:40
नल और गजमोतनी अपने राजमहल में बड़े आराम से रह रहे हैं।
35:47
तो उसी रात्रि को गजमतनी ने एक स्वप्न देखा। स्वप्न देखा और
स्वप्न बड़ा बुरा था। अपने
35:56
पति महाराज नल को महल में बुला लिया और राजा नल से कहने लगी
कि हे महाराज मैंने
36:04
आज बड़ा भयानक सपना देखा है। राजा नल कहने लगा कहो रानी
क्या स्वप्न देखा कि महाराज
36:11
स्वप्न नहीं यह सत्य है। मैंने ऐसा स्वप्न कभी नहीं देखा। मेरा
स्वप्न यह झूठा नहीं
36:18
है। राजा नल कहने लगे कहो रानी कौन सा स्वप्न
36:23
है कि महाराज गढ़ गंगा पर महासंग्राम करते हुए मैंने हमारे
सुसर
36:31
साहब महाराज प्रथम को देखा है। बड़ा भयंकर युद्ध हो रहा है
भगवन गण गंगा पर। वहां
36:39
दोनों दोनों पक्षों की सेनाएं आमने सामने युद्ध के मैदान
में डटी हुई है और उस
36:45
युद्ध में नरवरगढ़ की हार हो गई। राजा नल कहने लगे
36:51
रानी क्या तेरा दिमाग सही है? कहीं पागल तो
नहीं हो गई? महाराज प्रथम को हराने वाला इस दुनिया में
36:59
कोई नहीं है। महाराज प्रथम कोई अट्टे पट्टे राजा नहीं है।
महाराज प्रथम महा
37:04
बलवान है। महा पराक्रमी नरेश हैं। कि नहीं महाराज आप कह रहे
हैं वो सत्य नहीं है। मैं कह
37:11
रही हूं वो सत्य है। और यहीं तक सीमित नहीं रहा। आपके
माता-पिता बंदी बन चुके
37:19
हैं। दोनों को जंजीरों में जकड़ करके एक कंपिलगढ़ का राजा
बंदी बना करके ले गया
37:26
है। और राजन यहीं तक सीमित नहीं रहा। मेरे स्वप्न में तो
मैंने यह भी देखा कि
37:32
तुम्हारी माता उस राजा के महल पर काग उड़ा रही है और
तुम्हारे पिता को बंदी गृह में
37:40
बंद कर कर दिया है और वहां वो चाकी चला रहे हैं। फटे हुए
वस्त्र उसके बदन पर धारण करा दिए
37:48
गए हैं। और महाराज प्रथम उस राजा की जेल में बंद है और 5 किलो अन्न
37:55
पीसते हैं रोजाना। खाने के लिए दो सूखी रोटी दी जाती है।
38:00
तो राजा नल सोचने लगे कि रानी तुझे कुछ भ्रम हुआ है। ऐसा
सत्य नहीं हो सकता। मैं
38:07
अभी सूचना भिजवाता हूं और माता-पिता की खुशखबरी गणगंगा से
मंगाता हूं। वो तो 60
38:14
हजार की फौज लेकर के बड़े-बड़े योद्धाओं को साथ लेकर के गढ़
गंगा पर स्नान करने गए
38:20
थे और मेरे पिताजी को हराना इतना आसान नहीं है। कोई भी
उन्हें आसानी से नहीं हरा
38:26
सकता। जब तक उनके हाथ में तलवार रहेगी तब तक उन्हें पराजित
नहीं किया जा सकता। कि
38:33
नहीं महाराज मैं जो कह रही हूं वो सत्य है। कहते हैं कि
मेरे पिता को कोई बंदी
38:39
नहीं बना सकता। रानी यह सब झूठ है। तुझे भ्रम हुआ है। तो
गजमोतनी रानी नल से कहने
38:46
लगी कि नहीं नाथ मुझे भ्रम नहीं हुआ। मैं जो कह रही हूं वो
सत्य प्रतीत होता है। तो
38:53
राजा नल कहने लगे कि कुछ सूचना तो आनी चाहिए। कोई सैनिक 60 हजार की सेना है। लाख
39:00
ब्राह्मण साथ में है। और कोई ना कोई सैनिक गुप्तचर कुछ
सूचना तो लेकर के आता।
39:08
श्रोताओं अब देखिए उधर क्या होता है। गढ़ गंगा पर जब युद्ध
चल रहा था तो वहां
39:17
राजा प्रथम के ब्राह्मण थे। राजपरोहित थे लाखा ब्राह्मण
क्योंकि पंडित गंगाधर को
39:23
उन्होंने अपदस्त कर दिया था। हटा दिया था राजपरो के पद से।
और लाखा दादा को ही
39:31
उन्होंने अपना राजपुरोहित घोषित कर दिया था। तो लाखा दादा
या लाखा ब्राह्मण
39:38
वहां गंगा के घाट पर छिप जाते हैं कुछ पत्थरों की ओठ में
सेना की ओठ में और जब
39:45
वो जादू से पत्थर के नहीं बने तो वहां उन पत्थरों में से
निकल कर के चल देते हैं
39:53
नरवरगढ़ के लिए। राजा नल का दरबार लगा हुआ है। राजा नल
दरबार में विराजमान है और उसी
40:03
समय लाखा दादा का हड़बड़ाते हुए प्रवेश। लाखा दादा हड़बड़ा
रहे हैं। लाखा दादा के
40:11
जो पत्रा पोथी हैं वो भी उनके साथ नहीं है। लाखा दादा सीधे
महाराज नल के पास
40:18
पहुंच जाते हैं। राजा नल ने जब लाखा ब्राह्मण को देखा तो
कहने लगे कि दादा
40:24
क्या हुआ? मुझे यह
बताएं। साफ-साफ बताएं तुम अकेले क्यों आए हैं? मेरे
माता-पिता
40:32
मेरी 60 हजार की फौज
कहां चली गई? क्या हुआ उनके साथ और वो अब तक क्यों नहीं आए?
40:39
तो लाखा ब्राह्मण कहने लगा कि बेटे नल क्या बताऊं तुझे? कुछ बताने के लिए मेरे
40:46
पास शब्द नहीं है। तो राजा नल कहने लगे दादा आप बताएं कि
क्या बात है।
40:54
तो लाखा दादा ने जो गढ़ गंगा पर युद्ध हुआ था उस युद्ध का
वृतांत सुना दिया और लाखा
41:02
दादा राजा नल से कहने लगे कि बेटे नरवर के
41:08
नरेशों ने कभी हार नहीं मानी। अपने प्राण दे दिए लेकिन
दूसरे राजा से पराजय स्वीकार
41:15
नहीं की। वही काम आपके पिता श्री महाराज प्रथम ने किया। गढ़
गंगा पर महान युद्ध
41:21
हुआ। बड़ा भयंकर संग्राम हुआ और उस संग्राम में जब कंपिलगढ़
नरेश की कोई पेस
41:29
नहीं चली तो जादू के बल पर उसने हमारे सैनिकों को पत्थर का
बना दिया और तेरे
41:36
माता-पिता को कैद करके कंपिलगढ़ ले गया। अब तो राजा नल अपनी
रानी गजमोतनी की बात
41:43
को समझ जाते हैं कि यह बिल्कुल सही कहा मेरी रानी ने कि
मेरे माता-पिताओं की जेल
41:50
हो गई है। श्रोताओं राजा नल ने आपातकालीन सभा बुलाई और
आपातकालीन सभा में विचार
41:58
विमर्श करने लगे। आपातकालीन सभा एक विशेष सभा होती है
जिसमें 10 से 20 चुनिंदा
42:06
विश्वास पात्र सैनिक सेनापति और पुरोहित
42:11
और अपने परिवारिक के सदस्य होते हैं। तो आपातकालीन सभा में
विचार होने लगा कि किस
42:19
तरीके से माता-पिता की जेल को छुड़ाया जाए। अब श्रोताओं
लाखा दादा जो कि विद्वान
42:26
ब्राह्मण थे। लाखा दादा कहने लगे राजन सेना सजाइए और आक्रमण
कीजिए कंपिल गढ़ पर।
42:34
राजा नल कहने लगे कि कितनी फौज से काम चल जाएगा। मेरे पास 1 लाख की फौज है। लाखा
42:42
ब्राह्मण कहने लगे बेटा 1 लाख की फौज
से काम चलने वाला नहीं है। क्योंकि 1 लाख की
42:49
फौज कंपिलगढ़ पर आक्रमण करके विजय नहीं हो सकती। हमारी 60 हजार की फौज थी और मैंने
42:57
स्वयं अपने नेत्रों से देखा कि 60 हजार की फौज देखते ही देखते काट के गढ़ गंगा में
43:03
बहा दी गई। अब तो श्रोताओं राजा नल सोच में पड़ गए कि
43:09
मेरे पास 1 लाख फौज है
और 1 लाख से कुछ होने वाला नहीं है। तो पास में खड़ी
43:16
गजमोतनी कहने लगी कि महाराज यदि
43:23
आप अनुमति दें तो मैं आपसे एक बात कहूं तो राजा नल कहने लगे
कहो रानी क्या बात है तो
43:29
रानी कह रही है कि धीरज धर्म मित्र और नारी आप तत्काल परखिए
चारी कि हे महाराज
43:38
अपने धैर्य को धर्म को और नारी
43:44
नारी कहते पत्नी को और अपने मित्र को जब आपत्ति आए, आपातकाल हो, कोई विपत्ति
आ
43:52
जाए, उस समय उसकी परीक्षा लेनी चाहिए। महाराज आपने कुछ समय
पहले
44:00
एक श्याम नगर के राजा के पुत्र मनसुख को
44:05
अपना मित्र बनाया था। पगड़ी पलटा यार बनाया था। और आज समय
है अपने मित्र की
44:12
पहचान करने की। अपने मित्र की परख करने की और उस मनसुख
गुर्जर ने अपने पिता मैनपाल
44:19
सहित यह वायदा किया था कि नल जहां तेरा काम पड़ेगा जहां
तेरा पसीना बहेगा वहां
44:25
हमारा खून बहा देंगे तेरे साथ मर मिटेंगे तो हे महाराज आप
अपने मित्र मनसुख को परचा
44:34
लीजिए उसकी परीक्षा ले लीजिए यदि वो लड़ने के लिए तैयार है
तो उसके पास 1 लाख की फौज
44:41
है और 1 लाख की फौज
लेकर के वो हमारा साथ दे। हमारे माता-पिता की जेल छुड़ाने में
44:48
हमारी मदद करें। अब श्रोताओं राजा नल को याद आ गई अपने
मित्र की। देखिए ये कथा मैं
44:55
अलग से सुना दूंगा कि मनसुख गुर्जर से राजा नल की मित्रता
कैसे हुई थी। वो एक अलग वीडियो में बता दूंगा। तो राजा नल ने
45:05
आपातकालीन सभा में एक पत्र वाहक को बुलाया। पत्र ले जाने
वाले को बुलाया और
45:12
एक कागज मंगाया। उस कागज पर राजा नल ने
45:18
महाराज मैनपाल के पुत्र मनसुख को देखिए महाभारत में भी
मनसुख
45:25
गुर्जर का वर्णन किया गया है। ऋतुपर्ण के नाम से। वही मनसुख
गुर्जर को महाराज नल एक
45:35
पत्र लिख रहे हैं और पत्र में पूरा वृतांत लिख दिया कि
कंपिलगढ़ के फूल सिंह पंजाबी
45:41
ने हमारे माता-पिता को कैद कर लिया है। हे मित्र यदि तुम
सच्चे मित्र हो तो 1 लाख की
45:49
फौज को लेकर के चार दिन बाद बंगाल के बॉर्डर पर मिल जाइए।
जहां बंगाल देश है
45:58
उसके बॉर्डर पर मिल जाइए। वहां से हम आगे जब आप आ जाएंगे
तभी ही कूच
46:03
करेंगे कंपिलगढ़ की तरफ। श्रोताओं यह पत्र लिख दिया। नीचे
अपने मोहर और हस्ताक्षर
46:10
लगा के राजा नल ने उसे पत्रवाहक को दे दिया और पत्रवाहक को
भेज दिया श्याम नगर
46:18
के लिए। अब श्रोताओं पत्रवाहक तो श्याम नगर को चला जाता है
पत्र देने के लिए। इधर
46:25
राजा नल ने लाखा दादा को आदेश दे दिया कि दादा 1 लाख की फौज को सजाइए।
46:31
लाखा दादा ने फौज को आदेश दे दिया और देखिए श्रोताओं राजा
नल की फौज तैयार
46:40
हो रही है। सज जाओ सज जाओ मेरे शहजादे अब क्यों राखी देर
लगाए। ये आला में वर्णित
46:46
होता है इस तरीके से। और देखिए श्रोताओं जो जितनी भी फौज थी
46:54
राजा नलकी वो सज जाती है। युद्ध के लिए तैयार हो जाती है।
झिलम टोप बख्तर पहन पहन
47:00
कर के योद्धा युद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं। इधर राजा नल
और गजमोतनी रानी दोनों
47:09
विचार विमर्श कर रहे हैं। गजमोतनी रानी बड़ी विद्वान थी।
श्रोताओं घूमासुर दाने
47:15
की पुत्री थी। 14 विद्या निधान
थी। राजा नल से कहने लगी कि महाराज माता-पिता की
47:23
जेल छुड़ाने में मैं भी आपके साथ चलूंगी। राजा नल कहने लगा
रानी क्या तेरा दिमाग
47:29
सही है कि महाराज मेरा दिमाग सही है यदि मैं आपके साथ चली
गई तो आप निश्चित ही
47:36
अपने माता-पिता की जेल छुड़ाने में समर्थ हो जाओगे। और यदि
मैं आपके साथ नहीं गई तो
47:42
महाराज आप 2 लाख की फौज
तो क्या 50 लाख की
47:47
फौज से भी माता-पिता की जेल नहीं छुड़ा सकती। राजा नल कहने
लगा रानी क्यों कि
47:53
महाराज रास्ते में बंगाल देश पड़ेगा। पूर्ण रूप से जादू से
भरा हुआ क्षेत्र है।
48:01
वहां पर एक से एक बड़ा जादू है। वहां के राजाओं के साथ वहां
की जो खेरे की देवियां
48:10
होती हैं जिनको चंडी कहते हैं वो युद्ध करती हैं। राजाओं के
साथ लड़ती हैं। और
48:17
उनकी जो स्त्रियां हैं, उनकी पुत्री
हैं, वो जादुओं में पारंगत हैं। किसी भी समय
48:24
युद्ध का पासा पलट सकती हैं। इसलिए राजन मुझे आप अपने साथ
ले चलिए। परंतु राजा नल
48:31
कहने लगे नहीं रानी जब मेरा मित्र मनसुख आएगा और उसे पता चल
गया कि मैं रानी
48:38
गजमोतनी को युद्ध भूमि में साथ लेकर आया हूं तो वो रिस हो
के नाराज होकर के वापस
48:44
लौट जाएगा। मेरा साथ नहीं देगा। बंगाल के बॉर्डर से अपनी सेना
को वापस ले आएगा। तो
48:51
नल की बात सुनकर के गजमोतनी राजा नल से कहने लगी कि महाराज
मैं यह
48:58
मर्दाना भष धारण करूंगी ये जनाना बाना उतार दूंगी जनाना भष
धारण नहीं करूंगी और
49:05
तुम्हारा मित्र मुझे पहचान नहीं पाएगा श्रोताओं नल कहने लगा
रानी देखिए औरत और
49:12
आदमी इन दोनों में ईश्वर ने बड़ा अंतर बनाया है तू पहचान
अवश्य पड़ जाएगी कि
49:18
नहीं महाराज कि रानी तेरे केशों को कहां छिपाएगी? महाराज रानी कहने लगी कि मैं ऐसा
49:27
छत्र धारण करूंगी कि मेरे केश दिखाई नहीं देंगे। रानी तेरे
नेत्र इनको कहां ले
49:34
जाएगी कि नहीं महाराज मैं नेत्रों में काजल नहीं लगाऊंगी कि
हे रानी तुम्हारा ये
49:41
जो छाती है ये ऊंची उठी हुई है इस छाती को कहां छुपाओगी कि
महाराज मैं ऐसा बख्तर
49:48
धारण करूंगी जो मेरी छाती दिखाई नहीं देगी। देखिए महाराज
मैं पूर्णत मर्दाना
49:53
भेष धारण करूंगी। कोई भी मुझे पहचान नहीं सकता कि मैं
गजमतनी हूं। और मैं यदि आपके
50:00
साथ युद्ध भूमि में चली गई तो राजन आप जानते हैं कि इस
संसार में इस वक्त मेरे
50:07
समान विद्या में कोई भी परिपूर्ण नहीं है। मैं 14 विद्या जानती हूं। संपूर्ण जादू
50:14
मेरे साथ रहता है। श्रोताओं राजा नल और गजमोतनी दोनों आपस
में विचार विमर्श करके
50:21
राजा नल अनुमति दे देते हैं गजमोतनी को कि गजमोतनी जाइए
पुरुषों का बाना धारण कीजिए।
50:28
देखिए श्रोताओं भारत में यह भारत ऐसी भूमि है जहां
वीरांगनाओं की कमी नहीं रही। एक
50:35
से एक बढ़कर के वीरांगनाएं प्राचीन काल से ही होती चली आई।
वही गजमोतनी
50:42
पुरुषों का बाना धारण कर लेती है। बन जाती है एक पुरुष
50:48
दिखाई देती है एक महान योद्धा की तरह। और इधर महाराज नल
अपनी सेना का निरीक्षण कर
50:55
रहे हैं। लाखा दादा ने सेना को तैयार कर दिया है और राजा नल
देख रहे हैं अपने
51:01
सैनिकों को अपनी व्यवस्थाओं को और लाखा दादा से कहने लगे कि
दादा यदि आपकी अनुमति
51:08
हो तो सेना को कूच का आदेश दे दिया जाए। लाखा दादा कहने लगे
कि देखिए बेटे नल
51:17
कच का आदेश तो मैं दे रहा हूं पर अभी एक घड़ी इंतजार कीजिए
शुभ समय की प्रतीक्षा
51:24
कीजिए क्योंकि मार्ग में बंगाल का बॉर्डर पड़ेगा कंपिलगढ़
के लिए जो मार्ग जाता है
51:31
वो बंगाल से निकलता है और जब हम बंगाल में प्रवेश करेंगे तो
वहां आप जानते हैं राजन
51:38
वहां जादू का क्षेत्र है और उस जादू साधु के क्षेत्र में
हमारा विजय होना संभव नहीं
51:44
है। इसलिए शुभ समय पर हम यहां से पयान करेंगे। श्रोताओं
राजा नल लाखा दादा के
51:52
कथन अनुसार एक घड़ी इंतजार करते हैं और अपनी सेना का पूरा
जायजा लेते हैं। अपनी 1
52:00
लाख की फौज के साथ राजा नल और गजमोतनी घोड़ों पर सवार होकर
के कच कर देते हैं
52:08
बंगाल के बॉर्डर की तरफ। सेना राजा नल की चली जा रही है
अपने माता-पिता की कैद को
52:14
छुड़ाने के लिए। अब देखिए श्रोताओं इधर क्या होता है। जब वो
पत्रवाहक
52:23
महाराज मनसुख गुर्जर के दरबार में पहुंचा। श्याम नगर में
पहुंचा और उसने अपना पत्र
52:31
मनसुख गुर्जर को दे दिया। तो मनसुख गुर्जर ने जब पत्र को
पढ़ा तो श्रोताओं मनसुख
52:39
गुर्जर के नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। सैनिक और
सेनापति राजपुरोहित पूछने
52:46
लगे कि महाराज क्या हुआ? तो मनसुख
गुर्जर कहने लगा कि आज मेरे
52:53
मित्र पर बहुत बड़ा संकट है। मेरे मित्र के माता-पिताओं की
कैद हो गई है और मैं
53:02
युद्ध भूमि में मित्र की सहायता के लिए जाना चाहता हूं। कुछ
राजपुरोहित और कुछ
53:07
सेनापतियों ने इस बात का विरोध किया कि महाराज आप इतना बड़ा
खतरा उठा रहे हैं कि
53:15
अपने मित्र के लिए अपना समस्त न्योछावर करने जा रहे हैं।
युद्ध भूमि में अपनी
53:21
संपूर्ण सेना को झोंक रहे हैं। तो मनसुख गुर्जर क्या कहने
लगा? मनसुख गुर्जर ने
53:27
कहा कि जो ना मित्र दुख होए दुखारी ते विलोकत पातक भारी।
53:33
अर्थात इस दुनिया में मित्रों का कई तरीका होता है। चार
तरीके के मित्र होते हैं।
53:40
श्रोताओं आपको बताना चाहूंगा। एक मित्र तो ऐसा होता है जो
पैसे के लिए दोस्ती करता
53:46
है। कोई पैसे वाला है और दूसरा आदमी सोच
53:52
रहा है कि इससे पैसे लेकर के काम चलाऊं तो वो उससे दोस्ती
करेगा।
53:57
दूसरे तरीके का मित्र होता है। किसी के घर कोई सुंदर पत्नी
लड़की या कोई औरत है तो
54:07
उसके चक्कर में दोस्ती करता है। और तीसरे तरीके का मित्र
ऐसा होता है जो कि एक
54:16
सामाजिक तरीके से मित्रता करता है। और चौथे तरीके का मित्र
ऐसा होता है जो मित्र
54:23
के लिए अपने प्राण दे सकता है। तो मनसुख गुर्जर कहने लगा कि
मैं चौथे नंबर वाला
54:31
मित्र हूं। मैं मेरे मित्र के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर
दूंगा। परंतु मित्र के
54:37
माता-पिताओं को कैद से मुक्त कराऊंगा। अपने सेनापति को आदेश
दिया कि सेना को
54:43
सुसज्जित किया जाए। युद्ध के बाजे बजवाए जाए और कुछ किया
जाए बंगाले की तरफ। मेरे
54:51
मित्र को चार दिन बाद बंगाले के बॉर्डर पर मुझे मिलना है।
सेना सहित शीघ्रता से सेना
54:58
को तैयार किया जाए। श्रोताओं मनसुख का आदेश सुनकर के
55:06
गुर्जरों की सेना सुसज्जित हो रही है। समस्त योद्धा झिलम
टोप बख्तर पहन पहन करके
55:14
अपने आप को युद्ध के लिए सुसज्जित कर रहे हैं। हाथी, घोड़ा फौज, पलटन सब कुछ
तैयार
55:22
कर रहे हैं। श्रोताओं, जब सेना
संपूर्ण रूप से तैयार हो गई। 1 लाख सैनिक
तैयार हो
55:30
गए तो राजा मनसुख श्यामनगर का नरेश अपनी 1 लाख की फौज को
55:38
आदेश दे देते हैं कि कोच किया जाए बंगाल की बॉर्डर की तरफ
बंगाल के बॉर्डर पर मेरा
55:44
मित्र मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। अब देखिए श्रोताओं इधर
राजा नलकी सेना बंगाले के
55:52
बॉर्डर पर आ गई। गजमोतनी ने आदेश दे दिया सैनिकों को कि कोई
भी यदि बंगाल के बॉर्डर
55:58
के भीतर चला जाएगा तो वो वापस नहीं आ सकता। ध्यान रखें बिना
मेरी अनुमति के
56:04
क्योंकि ये जादुई क्षेत्र है। श्रोताओं गजमोतनी
56:10
राजा नल दोनों विचार कर रहे हैं। गजमोतनी कह रही है कि
महाराज तुम्हारा कोई मित्र
56:17
नहीं है। तुम तो केवल एक झूठे मित्र के फंदे में फंस गए थे।
तुम्हारा मित्र नहीं
56:23
आ सकता। कौन मरवाएगा अपनी सेना को? ऐसा कौन है जो
56:29
स्वयं अपनी जान को जोखिम में डालेगा? हे राजन हमें 1 लाख की फौज
से ही कंपिलगढ़ को
56:36
विजय करना है। कंपिलगढ़ को जीतना है। तो
56:41
श्रोताओं इधर श्याम नगर के नरेश महाराज मनसुख गुर्जर भी
अपनी 1 लाख की फौज को
56:50
लेकर के सुसज्जित होकर के रण के बाजे बजवाते हुए चल देते
हैं बंगाले की बॉर्डर
56:56
की तरफ। जहां राजा नर अपनी सेना के साथ पड़े हुए
57:02
थे। तीन दिन का लगातार सफर करके चौथे दिन
57:07
मनसुख गुर्जर बंगाले के बॉर्डर पर पहुंच जाते हैं। जहां
राजा नल अपनी सेना के साथ
57:14
पड़े हुए हैं। इंतजार कर रहे थे अपने मित्र मनसुख गुर्जर के
आने का। जब राजा
57:23
नल्ल मनसुख गुर्जर को आते हुए देखा तो अपनी रानी गजमोतनी से
कहने लगी कि गजमोतनी
57:30
देखिए मेरा मित्र मनसुख आ गया है। 1 लाख
57:35
गुर्जर योद्धाओं के साथ युद्ध भूमि में बलिदान होने के लिए
तैयार है। मेरे साथ
57:42
मरने के लिए तैयार है। मित्र हो तो मनसुख जैसा। मित्रता की
एक परम मिसाल है मेरा
57:49
मित्र। श्रोताओं दोनों मित्रों आकर के बहा फैला के भुजा
पसार करके मिले।
57:57
एक दूसरे से मिलने के बाद कुशलक्षेम पूछने के बाद दोनों
मित्र आपस में विचार विमर्श
58:05
करने लगे। गजमोतनी भी दूर से देख रही है
58:10
कि यह क्या बातें कर रहे हैं। श्रोताओं मनसुख गुर्जर मन में
विचार करके कहने लगा
58:17
कि मित्र मेरी सेना 1 लाख की है
परंतु मुझे तेरा कुछ विश्वास नहीं है क्योंकि
58:23
तेरे 60 हजार योद्धा
तो गढ़ गंगा पर मारे जा चुके हैं। मैं तेरी सेना का जायजा लेना
58:29
चाहता हूं। तेरी सेना का निरीक्षण करना चाहता हूं कि तेरे
पास कैसे-कैसे योद्धाएं। तो नल कहने लगा ठीक है। मनसुख
58:38
कीजिए मेरी सेना का निरीक्षण। तो मनसुख गुर्जर राजा नल की
सेना का
58:44
निरीक्षण कर रहा है। देख रहा है सैनिकों को कि कौन कैसा
योद्धा है और सैनिकों का
58:51
निरीक्षण करतेकरते श्रोताओं उसका ध्यान गजमोतनी पर ठहर जाता
है। जब गजमोतनी पर
59:00
ध्यान ठहरा तो राजा नल से मनसुख कहने लगा कि इस
59:05
योद्धा को कहां से लाए हो आप? वास्तव में
वाकई में बहुत बड़ा योद्धा दिखाई पड़ता
59:11
है। गोरा शरीर है। बिल्कुल मोटाजा बदन है इसका। इस योद्धा
को
59:18
आप कहां से लेकर आए? तो नल कहने
लगा कि इस योद्धा को मैंने अभी कुछ दिन पहले ही
59:25
भर्ती किया था। बड़ा वफादार सैनिक है और यह मेरे सेनापतियों
के पद पर है। मैंने
59:32
इसे धीरे-धीरे सेनापति का पद दे दिया है। यह एक टुकड़ी की
कमान संभालता है। तो
59:38
मनसुख गुर्जर कहने लगा कि मित्र युद्ध करने तो हम चल रहे
हैं। परंतु तुम्हें इस
59:46
सिपाही को मुझे देना होगा। नल सोचने लगा कि यह तो मेरी
पत्नी को मांग रहा है। तो
59:52
नल बोला कि नहीं भाई इस सिपाही को तो मैं नहीं दे सकता।
मनसुख कहने लगा इसके बदले
59:59
मैं तुझे 1000 सैनिक दूंगा।
पर यह सिपाही मेरे साथ रहना चाहिए। इसे मैं मेरा
1:00:06
बॉडीगार्ड नियुक्त करना चाहता हूं। अंगरक्षक बनाना चाहता
हूं। नल कहने लगा कि
1:00:11
नहीं मैं 1000 में भी नहीं
दूंगा। मनसुख गुर्जर ने कहा 10,000 सैनिक दूंगा
लेकिन
1:00:18
इस सैनिक को मुझे दे दीजिए। तो नल ने फिर भी मना कर दिया और
जब नल ने मना किया तो
1:00:25
मनसुख ने विचार किया कि मैं तो तेरे लिए लड़ने को और मर
मिटने को तैयार हूं। तू एक
1:00:31
जवान के लिए नाट गया मुझसे। मना कर दिया। इसलिए तेरी मेरी
यारी खत्म होती है। मैं
1:00:37
मेरी सेना लेकर के वापस जा रहा हूं श्याम नगर को। अब राजा
नल के पास कोई जवाब नहीं
1:00:43
था। राजा नल कहने लगा कि मित्र ऐसा मत कीजिए कि नहीं मुझे
यह सैनिक चाहिए। मैं
1:00:51
यह सैनिक मेरे अंगरक्षक के लिए नियुक्त करता हूं। श्रोताओं
1:00:57
मनसुख गुर्जर नाराज होकर के अपने सैनिकों को लौटने का आदेश
दे देता है। तभी नल कहने
1:01:04
लगा मोतनी से कि तू नहीं मानी। तेने मेरा मित्र भी नाराज कर
दिया। अब क्या करूं? तो
1:01:12
गजमोतनी कहने लगी कि तेरे मित्र को मैं मनाऊंगी। श्रोताओं
1:01:17
गजमोतनी मनसुख गुर्जर को पीछे से आवाज लगा रही है। और घोड़ा
पर दौड़ के मनसुख गुर्जर
1:01:25
को आगे से घेर लीजिए। जब मनसुख गुर्जर ने गजमोतनी की आवाज
सुनी तो पहचान गया। कहने
1:01:34
लगा कि भाभी इस भष में तुम कि हां
1:01:39
तो मनसुख कहने लगा कि अब तो मैं बिल्कुल नहीं जाऊंगा कि
क्यों कि मैं स्त्रियों को
1:01:45
साथ लेकर के युद्ध भूमि में जाऊं ये मुझे शोभा नहीं देता।
क्षत्रियों का बाना धारण
1:01:51
किया है हमने। हम स्त्रियों को युद्ध भूमि में साथ नहीं ले
जाते। मित्र नल तुमने ये
1:01:56
क्या किया? तुम भाभी को
युद्ध के मैदान में ले आए। तो गजमोतनी कहने लगी देखिए
1:02:02
देवर तुम नहीं जानते कि यहां से आगे बंगाल देश आरंभ हो रहा
है। बंगाल की सीमा पर
1:02:10
हमारे फौजी डेरा लगे हुए हैं। यहां से आगे का क्षेत्र जादू
का है और इस
1:02:17
क्षेत्र में आप मेरे बिना कभी भी विजय प्राप्त नहीं कर
सकते। आप कहीं बकरा
1:02:24
मुर्गा या तोता बन के पिंजों में कहीं बाड़ों में मिलेंगे।
आप युद्ध भूमि तक
1:02:31
पहुंच ही नहीं सकते। कंपिलगढ़ तक जा नहीं सकते। अब तो मनसुख
गुर्जर के दिमाग में
1:02:37
बात बैठी। मनसुख गुर्जर भी जानता था कि गजमोतनी 14 विद्या निधान है। श्रोताओं
1:02:43
गजमोतनी के समझाने पर मनसुख गुर्जर गजमोतनी को साथ लाने की
अनुमति स्वीकार कर
1:02:51
लेते हैं और वहीं अपनी सेना को वापस बुलाने बुला लेते हैं।
अब श्रोताओं उन
1:02:58
चारों में क्योंकि चारों बड़े अधिकारी थे। राजा नल, गजमोतनी,
1:03:03
लाखा ब्राह्मण और मनसुख गुर्जर चारों एक तंबू में बैठे हुए
हैं। एक शिविर में बैठे
1:03:10
हुए हैं और चारों में मंत्रणा चल रही है कि किस तरीके से
कंपिलगढ़ को जीता जाए। अब
1:03:18
देखिए गजमोतनी मन में विचार करने लगी कि ये तीनों ये नहीं
चाहते थे कि मैं इनके
1:03:25
साथ आऊं। तो मुझे अब इनकी परीक्षा लेनी चाहिए। दूसरा दिन
हुआ तो गजमोतनी ने लाखा
1:03:33
ब्राह्मण से कहा कि पंडित जी तुम यह नजदीक
1:03:38
शहर है इस बंगाले में। इस बंगाल के इस शहर को चले जाइए।
बंगाले को जाइए आप और यहां
1:03:46
से मेरे बालों के लिए आप चमेली का तेल लेकर के आओ। यहां कोई
तेली का घर मिल
1:03:53
जाएगा और उस तेली के घर से मुझे चमेली का तेल लेकर के आना।
1:03:59
यहां बंगाल के इस शहर का तेल प्रसिद्ध है, नामी है। श्रोताओं लाखा दादा मन में विचार
1:04:06
करने लगे कि ठीक है बेटी मैं इस बहाने से इस शहर को भी देख
आऊंगा। यहां के हालचाल
1:04:13
भी जान लूंगा। यहां की जनता को देख आऊंगा कि यहां कैसी जनता
है। चलो और तेरे लिए
1:04:19
मैं चमेली का तेल ले आऊंगा। लाखा ब्राह्मण और राजा नल मनसुख
और गजमोतनी से अनुमति
1:04:28
लेकर के बंगाल के लिए चल देते हैं। बंगाल में जब लाखा
ब्राह्मण ने प्रवेश किया
1:04:37
तो चला जा रहा है। कई मार्गों से गुजरते हुए उसने देखा कि
तेली का घर नहीं मिल रहा
1:04:45
है। श्रोताओं पहले तेल की बिक्री तेली के यहां ही होती थी।
खोजते खोजते पूछते पूछते
1:04:53
लाखा ब्राह्मण तेली के घर पहुंच जाता है। तेली के घर पहुंचा
तो वह देखा कि आदमी कोई
1:05:00
नहीं था। व्यक्ति कोई नहीं था। कुछ औरतें बैठी हुई एक कमरे
में बात कर रही थी। चौ
1:05:08
पर औरतें बैठी थी और वह आपस में बात कर रही थी। तो लाखा
दादा उन औरतों के पास
1:05:14
पहुंच जाता है और उनसे कहने लगा कि मैं ब्राह्मण हूं। तो वे
औरत कहने लगी कि हे
1:05:22
पंडित जी आप हमारी हस्तरेखा देखिए। लाखा पंडित जी उन तेलनों
के यहां हस्तरेखा देख
1:05:30
रहे हैं और उनको बैला रहे हैं। अपने पांडित्य का प्रभाव जमा
रहे हैं। परंतु
1:05:37
देखिए श्रोताओं तभी एक तेली की लड़की जो 14 विद्या निधान थी। जादू महा जादूगरनी
1:05:44
थी। वो महा जादूगरनी तेली की लड़की बाहर निकल के आई और उसने
जब लाखा ब्राह्मण को
1:05:51
देखा तो मन में विचार करने लगी कि ये आदमी बंगाल देश का
नहीं है। हमारे देश में ऐसे
1:05:58
व्यक्ति नहीं होते। यह तो अलग ही व्यक्ति है। इसका पहनावा
अलग है। इसकी बोली भाषा
1:06:04
अलग है। ये तो कहीं दूसरे देश का है। और मुझे एक बकरे की
आवश्यकता है। मैं इसको
1:06:13
बकरा बना देती हूं। अब देखो श्रोताओं उस लड़की ने अपने जादू का झोला निकाला।
1:06:22
मंत्र को अभिमंत्रित किया और उड़द पढ़ करके फेंक दिए लाखा
ब्राह्मण पर। और लाखा
1:06:29
ब्राह्मण बकरा बन गया। बकरा बना के लाखा ब्राह्मण को मूंद
दिया बकरियों में। लाखा
1:06:36
ब्राह्मण बकरियों में मुंद गए। अब देखिए श्रोताओं लाखा
ब्राह्मण तो वहां बकरियों
1:06:42
के खिरक में मुदे हुए हैं। और इधर जब दो चार घंटे का समय
निकल गया तो गजमतनी मनसुख
1:06:51
गुर्जर से कहने लगी कि देवर ब्राह्मण को गए काफी समय हो गया
और न जाने वो क्यों
1:06:57
नहीं लौटे। लाखा दादा तो बातचीतों में बहुत निपुण हैं। कहीं
बात करने लग गए
1:07:03
होंगे और हमें तो बहुत आगे चलना है। कंपिलगढ़ तक जाना है।
तुम जाओ और शीघ्रता
1:07:09
से लाखा दादा को लेकर के आओ। श्रोताओं गजमोतनी की बात सुनकर
के मनसुख कहने लगा
1:07:16
ठीक है भाभी मैं जा रहा हूं। तो मनसुख गुर्जर अपने भाई नल
से कह के कि मैं अभी
1:07:23
दो घंटे में वापस लौटता हूं। श्रोता वो चल देता है। चला जा
रहा है। खोज रहा है अपने
1:07:30
ब्राह्मण लाखा दादा को। परंतु उस बंगाली शहर में लाखा दादा
का कोई अता पता नहीं
1:07:37
है। लाखा दादा का कहीं कोई ठिकाना नहीं मिल रहा है। खोजते
खोजते चला जा रहा है।
1:07:43
और तभी वो निकल रहा था धोबियों के घर के सामने से। एक
धोबियों का घर था और वहां से
1:07:52
निकल रहा था। तो वहां कुछ धोबी की धोबियों की स्त्रियां
बैठी हुई थी। बंगाले की
1:07:57
स्त्री बड़ी जादूगरनी होती थी। तो उनमें से एक स्त्री ने
देखा कि कितना सजीला युवक
1:08:04
है। कोई राजकुमार प्रतीत होता है। और मेरे पास एक गधे की
कमी है। तो क्यों ना इसको
1:08:12
गधा बना लिया जाए और रात को इसे आदमी बना लूंगी। ये सोच कर
के धोबी की लड़की ने
1:08:19
अपने जादू का झोला निकाला। मंत्र को आमंत्रित किया महाकाली
का नाम लेकर के
1:08:26
मंत्र को छोड़ दिया मनसुख गुर्जर पर श्रोताओं मंत्र जैसे ही
मनसुख गुर्जर पर
1:08:32
चला आकर के टकराया और मनसुख गुर्जर का शरीर बदल कर के गधा
बन गया और धोबिनों ने
1:08:41
पकड़ करके उसको बांध दिया। अब श्रोताओं मनसुख गुर्जर भी गधा
बने हुए
1:08:48
धोबियों के घर बंध रहे हैं। अब सुनिए ध्यान से जब दो से तीन
घंटा मनसुख गुर्जर
1:08:55
को हो गए तो गजमोतनी तो जान रही थी सब चीज कि लाखा दादा तो
वहां बकरा बन गए हैं। और
1:09:04
मनसुख गधा बन गया है। इसको ज्यादा सजा मिलनी चाहिए क्योंकि
यह बहुत भाग रहा था
1:09:11
कि मैं मंझा को कि मैं गजमोतनी को साथ नहीं ले जाऊंगा।
1:09:16
इसलिए इन दोनों को सजा मिलना जरूरी था। परंतु अब महाराज
1:09:21
नल का नंबर है। मेरे पति का नंबर है। क्योंकि ये भी मुझे
लाना नहीं चाहते थे।
1:09:27
तो गजमोतनी नल से कहने लगी कि देखिए महाराज
1:09:32
माता-पिता हमारे जेल में मुदे हैं। लाखा ब्राह्मण और मनसुख
गुर्जर को क्या पता उन
1:09:39
वो क्या जाने दूसरे का कष्ट। वो तो हमारे साथ सेना लेकर के
आ गए शर्मा शर्मी। नहीं
1:09:46
तो वो तो निश्चिंत है। सुबह के गए हैं और साझ होने को आ गई
लेकिन अभी से कहीं लौटने
1:09:53
का नाम तक नहीं है। कोई अता पता नहीं है उनका। तो महाराज हे
पतिदेव आप जाइए और
1:10:01
लाखा ब्राह्मण को और मनसुख गुर्जर को दोनों को आप लेकर के
आइए। नल कहने लगा
1:10:07
रानी देख मैं जा रहा हूं। ठीक है। पर तू इस सेना का
निरीक्षण करते रहना। सेना की
1:10:14
हेयर कमांडर इस समय तू है। तुझे ध्यान रखना है सेना को
युद्ध के लिए हाई अलर्ट
1:10:21
मोड़ पर रखना है। तैयार रखना है। कोई किसी भी तरीके की
स्थिति हो तो युद्ध के लिए
1:10:28
तैयार रहना है। गजबतनी कहने लगी महाराज आप चिंता ना करें।
मैं एक दाने की पुत्री हूं
1:10:35
और मैं समस्त विद्याओं की ज्ञाता हूं। युद्ध कला में भी
निपुण हूं। तलवारबाजी
1:10:40
में भी निपुण हूं और जादू में मेरा मुकाबला नहीं। श्रोताओं
गजमोतनी और नल से
1:10:45
और कहने लगी कि देखिए महाराज आज मेरे पान समाप्त हो गए तो
आप मुझे दो पान ले आना।
1:10:53
तो नल कहने लगा ठीक है मैं जा रहा हूं मनसुख को खोजूंगा और
लाखा दादा को खोजना
1:10:59
है और तुझे दो पान ले आऊंगा। नल भी बंगाल शहर को चला जाता
है। चला जा रहा है शहर
1:11:07
में। खोज रहा है लाखा दादा को और मनसुख गुर्जर को। परंतु
दोनों का उस शहर में कोई
1:11:14
ठिकाना नहीं मिल रहा है। कोई अता पता नहीं है। खोजते-खोजते
चला जा रहा है। तो एक चौराहे पर एक लड़की
1:11:24
पान की दुकान पर बैठी हुई थी। बड़ी सुंदर लड़की थी। राजा नल
मन में विचार करने लगा
1:11:31
कि चलो पहले पान खरीद लेता हूं। गजमोतनी ने पान मंगाया है।
उसको पान खरीद लूं और
1:11:39
एक पान मैं खा लेता हूं। तो यह सोच कर के राजा नल पान
खरीदने के लिए उस लड़की के
1:11:47
पास दुकान पर आ जाता है और उस लड़की से कहने लगा कि दो पान
तो मुझे एक कागज की
1:11:55
पुड़िया में बंद कर दीजिए, पैक कर दीजिए
और एक पान मुझे खिला दीजिए। तो लड़की कहने
1:12:01
लगी ठीक है लड़की पहचान जाती है कि कितना सुंदर ऐसा सुंदर
राजकुमार है किसी देश के
1:12:09
राजा का लड़का है और यदि यह मुझे मिल जाए इसके साथ मेरा
विवाह हो जाए तो मेरा जीवन
1:12:16
धन्य हो जाए श्रोताओं वो लड़की ये विचार करके उसे पान बना
रही है। पान को पान के
1:12:24
पत्ते निकाले तंबाकू डाली, सुपारी डाली, शहद लगाया और
1:12:30
पान बना करके पान पर अभिमंत्रित करके उड़द
1:12:35
डाल दिए। मंत्र चला दिया। और राजा नल से कहा कि लो पहले आप
पान खाइए और बाद में आप
1:12:43
पान ले जाना। तो राजा नल समझ नहीं पाया। राजा नल ने उस पान
को मुंह में दबाया और
1:12:50
जैसे ही पान की पीक मुंह के अंदर गई श्रोता वो राजा नल तोता
बन गई और राजा नल
1:12:59
तोता बना उस लड़की ने पकड़ा और एक पिंजरे में बंद कर दिया
राजा नल चिचर रही चिचचिर
1:13:07
उस पिंजरे में कभी ऊपर चढ़ता है कभी नीचे गिरता है टिटा रहा
है राजा नल राजा नल
1:13:14
कहने लगा मन में सोच रहा है कि यही हाल लाखा दादा का और मनसुख
का होगा। यही तो
1:13:22
कारण है कि वह इतने समय से नहीं लौटे। पर अब माता-पिता की
जेल का क्या होगा?
1:13:29
माता-पिता की जेल तो क्या हमको ही बंगाले से अब कौन
छुड़ाएगा?
1:13:34
अब क्या किया जाए? मैं तो यहां
इस लड़की ने तोता बना दिया। श्रोताओं राजा नल उस
1:13:42
पिंजरे में कभी तो पिंजरे की डंडियों को पकड़ता है। कभी
फड़फड़ाता है, कभी बाहर
1:13:48
निकलने की कोशिश करता है। परंतु वह लड़की
1:13:53
टस से मस नहीं हुई। अब तोता उसमें बैठा हुआ है। हैरान हो
गया और उस पिंजरे में
1:13:59
आराम से बैठा है। अब देखिए श्रोताओं जब काफी समय हो गया तो
गजमोतनी ने मन में
1:14:07
विचार किया कि अब मेरे वीरों को बुलाया जाए। गजमोतनी महा
जादूगरनी थी। तो गजमोतनी
1:14:14
ने अपने वीरों का स्मरण किया। गजमोतनी के पास आठ वीर बताते
हैं। हीरे राजे के पास
1:14:22
72 वीर बताते हैं। तो गजमोतनी ने अपने वीरों को याद किया
और चार वीर हाजिर हो
1:14:29
गए। गजमोतनी से कहने लगे कहो रानी आपने हमें किस लिए बुलाया
कि वीरों आप ये देख
1:14:36
के आओ कि मनसुख लाखा दादा और हमारे पति महाराज राजा नल
1:14:44
कहां पर है? उनका कुछ पता
लगाइए। श्रोताओं चारों वीर बंगाली शहर के लिए दौड़ गए।
1:14:53
बंगाल शहर में खोज रहे हैं। और कुछ समय बाद एक वीर ने देखा
कि मनसुख तो धोबियों
1:15:01
के घर गधा बना हुआ बैठा है। और एक वीर ने दूसरे ने देखा कि
जो लाखा
1:15:09
दादा है वो बकरियों के बाड़े में बंद है और आराम से बैठा
हुआ है। और राजा नल
1:15:18
एक पिंजरे में तोता के रूप में बंद है। और उसमें टाई पुकार
रहा है। पिंजरे को काटने
1:15:27
का प्रयास कर रहा है। परंतु कुछ नहीं कर सकता। चारों वीर
कुछ समय में ही तीनों का
1:15:34
पता लगा करके गजमोतनी के सामने उपस्थित हो गए। और गजमोतनी
से कहने लगे कि देखिए रानी
1:15:43
मनसुख तो गधा बना हुआ बैठा है धोबियों के घर। और लाखा दादा
लाखा दादा बकरा बन गए
1:15:53
हैं और रहे महाराज नल वो एक तोता बने हुए एक पिंजरे में बंद
हैं।
1:16:00
तो गजमोतनी उन वीरों से कहने लगी कि देखो वीरों मैं आपको
मेरी सेना की सुरक्षा के
1:16:06
लिए छोड़ कर जा रही हूं। मुझे जाना होगा। क्योंकि आप तो
उन्हें छुड़ा के नहीं ला
1:16:11
सकते। मैं स्वयं जाऊंगी। और मैं उन तीनों को छुड़ा करके
लाऊंगी। तुम मेरी सेना की
1:16:19
सुरक्षा करना। सेना पर कोई आक्रमण ना कर दे। तो आठों वीर
मंज
1:16:26
रानी गजमोतनी से कहने लगे कि देखिए रानी तुम निश्चिंत हो के
जाओ तुम्हारी सेना की
1:16:32
सुरक्षा व्यवस्था हम संभालेंगे। श्रोताओं गजमोतनी उन वीरों
के हवाले अपनी सेना की
1:16:40
व्यवस्था छोड़कर के श्रोताओं गजमोतनी ने वीरों को वहां
1:16:46
तैनात कर दिया। सेना की सुरक्षा में तैनात कर दिया और स्वयं
ने एक लिलहारी का रूप
1:16:53
धारण किया। लिलहारी जानते हैं जो लीला गोदती है। लीला गोदने
वाली का रूप धारण कर
1:16:59
लिया। लिलहारी का रूप बना लिया। रानी का भेष उतार दिया। और
चल देती है उस शहर में लीला गोदने के
1:17:08
लिए चली जा रही है तो सबसे पहले गजमोतनी
1:17:13
उस पान वाली लड़की के दुकान पर पहुंचती है तमोलिन की दुकान
पर पहुंचती है और उस
1:17:19
तमोलिन के वहां राजा नल को देखा पिंजरे में बंद तो राजा नल
ने गजमोतनी को पहचान
1:17:26
लिया कि गजमोतनी आ गई क्या ये मुझे बचाएगी जब राजा नल टी टी
करने लगा तो गजमोतनी नल
1:17:36
से कहने लगी थोड़ा आराम कर छुड़ाती हूं अभी गजमोतनी ने
मंत्र अभंत्रित किया और दो
1:17:44
वीरों को याद किया और जो उस लड़की की दुकान थी पान वाली
लड़की की उस पर जादू
1:17:51
चला दिया और लड़की की दुकान को वीरों ने उखाड़ दिया और उस
दुकान को ऊपर लेकर चलने
1:17:59
लगे तो लड़की घबरा गई लड़की गजमोतनी से कहने लगी कि बहन मैं
पहचान गई। यह
1:18:06
तुम्हारा पति है। मैं इसे छोड़ती हूं। आप मुझे प्राणदान दे
दीजिए। तो गजमोतनी कहने
1:18:14
लगी ठीक है।
गजमोतनी ने अपने वीरों को रोका और उस दुकान को वापस उसी स्थान पर
1:18:20
जमा दिया। और उस तमोली की लड़की ने गजमोतनी को वो पिंजरा दे
दिया कि इसकी नार
1:18:28
में एक धागा बंधा हुआ है। जब तुम इस धागे को खोल दोगी तो यह
वापस पूर्व रूप में आ
1:18:34
जाएगा। अपने मनुष्य रूप में आ जाएगा। पिंजरे को लेकर के
लीला गोदने वाली आगे चल
1:18:40
देती है। कुछ आगे जहां तेलियों के पास
1:18:46
लाखा दादा बकरा बने हुए थे वहां पहुंच जाती है। और आवाज
लगाई कि मैं लीला गोद
1:18:52
रही हूं। कोई आ जाइए। तो वही लड़की जो महा जादूगरनी थी। मंज
रानी गजमोतनी की आवाज
1:19:00
सुनकर के बाहर आई। और उस गजमोतनी से कहने लगी कि बहन मेरे
लीला गोदिए। गजमोतनी समझ
1:19:08
गई कि ठीक है तेने ही ऐसा काम किया है। तो गजमोतनी उसके
शरीर पर लीला गोदती है। लीला
1:19:17
गोदी और वो भी बहुत जो उसने कहा उसी के अनुसार तो वो लड़की
प्रसन्न हो गई। तेली
1:19:25
की लड़की कहने लगी कि बहन आज तू जो मांगेगी मैं तुझे वही
दूंगी। मैं तुझ पर
1:19:30
प्रसन्न हूं। तू कुछ भी मांग सकती है। मैंने तुझ जैसी लीला
गोदने वाली नहीं
1:19:36
देखी। तो रानी गजमोतनी कहने लगी कि मुझे तीन वचन दे
1:19:41
दी। पहले तीन वचन दे तब मांगूंगी। तो वो तेली की लड़की तीन
वचन दे देती है। तो
1:19:49
गजमोतनी कहने लगी मुझे कुछ नहीं चाहिए जो ये बकरा है इसको
दे दीजिए।
1:19:56
तो तेली की लड़की कहने लगी क्यों इसका क्या करेगी? कि नहीं यह मेरा सेनापति है।
1:20:01
तू मुझे नहीं जानती। मैं रानी हूं। गजमोतनी तेली की लड़की
समझ जाती है और उस
1:20:08
बकरे को दे देती है उस लीला गोदने वाली रानी गजमोतनी को।
आगे चल देती है और मन
1:20:15
में सोच रही है कि अभी से मुझे मनसुख को छुड़ाना है। चल
देती है आगे और पहुंच जाती
1:20:22
है धोबियों के घर। धोबियों के घर पहुंची और वही आवाज लगाई
कि कोई लीला गोदवा
1:20:30
लीजिए। मैं लीला गोद रही हूं। तो जिस लड़की ने मनसुख को गधा
बनाया था वही लड़की
1:20:37
बाहर आ जाती है। और कहने लगी कि बहन मेरे लीला गोद दीजिए।
तो रानी गजमोतनी ने उसके
1:20:46
भी जैसा उसने चाहा उसी प्रकार की लीला गोदी दी। लीला गोदने
के बाद वह लड़की कहने
1:20:54
लगी कि बहन मैंने बहुत ललिहारी देखी लेकिन
1:20:59
तुम जैसी नहीं देखी। तुम मुझसे मांगना चाहो वो मांग लीजिए।
तो गजमोतनी कहने लगी
1:21:06
कि बहन तीन वचन दे दीजिए। तो उस धोबी की लड़की ने तीन वचन
दे दिए और गजमोतनी ने
1:21:14
उससे उस गधे को मांग लिया कि देखिए बहन मेरे पास ज्यादा
सामान है और इसे ढोने के
1:21:21
लिए लादने के लिए इस गधे को दे दीजिए। तो वह एक लड़की धोबी
की उस गधे को गजमोतनी को
1:21:30
दे देती है। श्रोताओं गजमोतनी उस गधे को लेकर के बकरा को और
तोता को
1:21:37
लेकर के चल देती है। ले आती है तीनों को आ जाती है बंगाले
के उसी मेड़े पर जहां उसकी
1:21:44
फौज पड़ी हुई है। उससे कुछ दूर तीनों को खड़ा किया। पिंजरा
रख दिया। गधे को खड़ा
1:21:53
कर दिया और मनसुख लाखा दादा जो बकरा बने हुए थे उसको खड़ा
1:21:59
कर दिया। रानी ने अभंत्रित किया मंत्र से मंत्र को और
अभमंत्रित करके जल के छींटे
1:22:07
तीनों पर मारे तो तीनों की तीनों अपने पूर्व रूप में आ गई
और तीनों की तीनों जब
1:22:14
पूर्व रूप में आए तो गजमोतनी से हाथ जोड़कर निवेदन करने लगी
कि रानी आज तैने
1:22:21
हमको बचा लिया अन्यथा इस बंगाले में तो हमारा कोई पता ही
नहीं चलता तो रानी कहने
1:22:27
लगी कि यही बात तो मैं कह रही थी तुमसे से कि तुमने केवल
तलवार चलाई है। तुम जादू
1:22:33
नहीं जानते। तुम तो केवल मारकाट जानते हो। इसलिए मैं
तुम्हारे साथ चलने की कह रही
1:22:39
थी। परंतु अब मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊंगी। मैं वापस
नरवरगढ़ जा रही हूं। तो
1:22:45
तीनों की तीनों गजमतनी से कहते हैं कि यदि तुम हमारे साथ
नहीं चली तो हम माता-पिता
1:22:52
की जेल नहीं छुड़ा पाएंगे। श्रोताओं गजमोतनी से तीनों चलने
का आग्रह करते हैं।
1:22:59
मनाते हैं गजमोतनी को। गजमोतनी तैयार हो जाती है कि ठीक है
मैं तो तुम्हारी
1:23:05
परीक्षा ले रही थी। तुम तो मुझे ले जाना नहीं चाहते थे। अब
देखिए श्रोताओं गजमोतनी
1:23:12
तीनों को वापस अपने मूल रूप में ले आई। और वहीं बंगाल के
बॉर्डर पर उनकी सेना पड़ी
1:23:18
हुई है।
14.
समस्त श्रोताओं का, भक्तों का और
सब्सक्राइबर बंधुओं का एक बार फिर से
0:06
स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है। श्रोताओं, जैसा कि आप जानते हैं हमारी कहानी चल रही
0:13
थी नल पुराण इतिहास से। मैंने आपको बताया था कि राजा नल ने
जब नल पुराण की कथा
0:22
महाराज प्रथम के दरबार में नरवरगढ़ नरेश के दरबार में
सुनाई। तो वहां उस कथा को
0:29
सुनने के बाद संपूर्ण परिवार का मिलन हो जाता है। महारानी
मंझा को दक्षिणपुर के
0:36
लक्ष्मी सेठ के यहां से सम्मान सहित बुलवा लिया जाता है और
राजा प्रथम ने अपने पुत्र
0:44
नल को राज्या अभिषेक कर दिया। उसे राजा घोषित कर दिया कि अब
यहां से आगे का राज्य
0:51
का संचालन मेरे पुत्र नल करेंगे और महाराज प्रथम
0:56
आराम से महल में रहने लग जाते हैं। श्रोताओं जब कुछ समय
व्यतीत हो गया तो एक दिन की
1:06
बात है कि महाराज प्रथम महाराज वीरसेन अपनी रानी मंझा से
कहने लगे कि हे प्रिय
1:14
तुम मुझे आज अपने हाथों से भोजन कराओ। मुझे तुम्हारे हाथों
से भोजन किए हुए 20
1:20
वर्ष का समय व्यतीत हो गया है। 20 वर्ष बीत चुके हैं। जब महाराज प्रथम ने यह बात
1:27
मंझ रानी से कही तो मंझ रानी कहने लगी कि नहीं महाराज मैं आपको
भोजन नहीं करा सकती।
1:34
तो राजा प्रथम कहने लगे कि क्यों रानी ऐसी क्या बात हो गई? अब भी तुम्हारे मन में
1:40
कुछ नाराजगी है कि नहीं महाराज? मेरे मन में नाराजगी तो तब भी नहीं थी जब आपने
1:46
मुझे जल्लादों को सौंप दिया था। मैं तब भी बड़ी प्रसन्न थी।
परंतु मैं आपको एक वजह
1:53
बताना चाहती हूं कि मैं पतिव्रता हूं और मैं मेरा यह शरीर
आपने जब मुझे जल्लादों
2:00
के हाथ सौंप दिया था तो उन जल्लादों से छिम गया था। मेरा
शरीर जल्लादों से टच हो
2:06
गया। स्पर्श कर गया जल्लादों को। इसलिए मेरे पतिव्रत धर्म
में कुछ मुझे यह आशंका
2:14
है कि पतिव्रता स्त्रियों का शरीर यदि पराए पुरुष से स्पर्श
करता है तो उसका पतिव्रत धर्म नष्ट हो जाता है। तो इसलिए
2:22
महाराज मैं अपवित्र हो गई। जल्लादों ने मेरे शरीर को छू
लिया। मुझे पकड़ कर के ले
2:27
गए थे। इसलिए मैं आपको भोजन नहीं करा सकती। तो जब यह बात
महाराज वीरसेन ने सुनी
2:36
तो महाराज वीरसेन कहने लगे कि नहीं रानी ऐसी कोई बात नहीं
है कि तो रानी कहती है
2:42
कि नहीं महाराज यह मेरा धर्म है। मैं एक पतिव्रताओं में
सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता
2:47
स्त्री हूं और मैं आपको भोजन नहीं करा सकती। आप मुझसे केवल
दूर से बैठकर के बात
2:54
कर सकते हैं। श्रोताओं महाराज वीरसेन ने जब अपनी रानी की यह
बात सुनी तो महाराज
3:01
वीरसेन व्याकुल हो उठे। तो यह बात सुनकर के महाराज प्रथम
रानी मंझा को बहुत समझाने
3:08
की कोशिश करते हैं कि नहीं रानी ऐसा कुछ भी नहीं है। मेरे
मन में कोई विचार नहीं
3:13
है। तो मंझा रानी नहीं कहती है कि महाराज ऐसा कुछ नहीं है।
आप सोच रहे हैं वो
3:20
बिल्कुल अनुचित है। पतिव्रताओं के लिए अपने शरीर का स्पर्श
भी किसी पुरुष से हो
3:26
जाने पर उनका पवित्रता उनकी जो पवित्रता है वो भंग हो जाती
है। इसलिए महाराज यदि
3:33
आप मेरे हाथों से भोजन करना चाहते हैं तो आपको एक काम करना
होगा। तो राजा प्रथम
3:39
कहने लगे कहो रानी जो आप कहेंगी आपकी इच्छा अनुसार मैं वही
काम करने को तैयार
3:45
हूं। तो रानी मंझा कहने लगी कि महाराज यदि आप मेरे हाथों से
भोजन करना चाहते हैं तो
3:52
आप मुझे गंगा स्नान कराइए। और जब मैं गंगा में स्नान करूंगी
तो मेरा यह शरीर पवित्र
3:58
हो जाएगा। जो जल्लादों ने मेरे शरीर को स्पर्श किया था वो
स्पर्श उनका समाप्त हो
4:04
जाएगा। गंगा में पवित्रता है और गंगा से मैं भी पवित्र हो
जाऊंगी। पापियों के
4:10
पापों को तारने वाली उस गंगा में मुझे आप स्नान कराएं।
श्रोताओं जब महाराज प्रथम ने
4:18
ये बात सुनी अपनी महारानी मंझा की तो राजा प्रथम ने आदेश दे
दिया अपने सेनापति को कि
4:25
60 हजार की सेना तैयार की जाए। हम कल धोसा बजाते हुए
अपनी महारानी मंझा को गंगा
4:33
स्नान कराएंगे। कल गंगा स्नान के लिए रवाना होंगे। कुछ
4:39
करना है हमें गंगा स्नान करने के लिए। देखिए श्रोताओं
4:44
महाराज के आदेश सेनापति ने अपनी समस्त सेना को आदेश दिया कि
आप तैयार हो जाएं।
4:52
महाराज प्रथम के आदेशानुसार 60 हजार की सेना
महाराज प्रथम ने तैयार की। 60 हजार
5:00
की सेना के साथ महाराज प्रथम और रानी मंझा गंगा स्नान करने
के लिए चल देते हैं। राजा
5:09
नल अपने राज्य का संचालन कर रहे हैं और महाराज प्रथम धूमधाम
से अपनी महारानी मंझा
5:17
को साथ लेकर के गंगा स्नान करने चले जा रहे हैं। अब देखिए
श्रोताओं महाराज स्नान
5:24
महाराज प्रथम गंगा स्नान के लिए गढ़ गंगा पर पहुंच गए।
5:30
और वहां पर्व चल रहा था गंगा स्नान का। गंगा स्नान का समय आ
रहा था। एक सोम
5:39
सोमवती कहते हैं या सोमवती अमावस्या पड़ने वाली थी। उसका
पर्व नजदीक था।
5:46
तो उस सोमवती अमावस्या के कारण वहां गढ़ गंगा पर देश के
महाराज बामनगढ़ के राजा
5:56
अपने अपने तंबू डेरा डाल के पड़े हुए थे। अपनेप शिविर लगा
के गंगा स्नान के लिए
6:03
वहां ठहरे हुए थे। और जब महाराज प्रथम 60 हजार की सेना लेकर के पहुंचे तो वो
6:10
उन्होंने भी अपना तंबू गंगा के पूर्व दिशा में डाल दिया। और
महाराज प्रथम उस पवित्र
6:19
गंगा में स्नान करने के लिए उस शुभ समय का इंतजार करने लगे
कि जब पर्व आएगा तो सबसे
6:27
पहले मैं मेरी महारानी को स्नान कराऊंगा। श्रोताओं दूसरे
दिन जब सोमवती अमावस्या का पर्व आया
6:35
तो महाराज प्रथम ने सर्वप्रथम अपनी रानी को स्नान कराया
गंगा में और महारानी मंझा
6:42
को एक सोने की नाव लेकर के कह दिया कि आप गंगा में भ्रमण
कीजिए। जल क्रीड़ा का आनंद
6:50
लीजिए। माता गंगा में आप सैर कीजिए। तो मंझ रानी वहां उस
गंगा में एक सोने की नाव
6:59
में विचरण कर रही थी। सैर कर रही थी पानी में। अब देखिए
श्रोताओं होनी बड़ी बलवान
7:07
होती है। वही उसी गंगा में स्नान करने के लिए एक फूल सिंह
पंजाबी कंपिलगढ़ का राजा
7:16
था और वह महापराक्रमी देवी उसके साथ लड़ती थी। 14 विद्याधान उसकी एक लड़की थी जिसका
7:24
नाम था सरती। वह उस महाराज फूल सिंह की पुत्री भी गंगा
7:31
स्नान करने के लिए अपने पिता के साथ गणगंगा पर आई हुई थी।
और जब वो गणगंगा पर
7:37
आई तो वह भी गंगा स्नान करने करते हुए एक नाव में बैठकर के
गंगा में सैर करने चली
7:44
जाती है। उधर से नरवरगढ़ की महारानी
7:50
मंझा की नाव आ रही थी और इधर से फूल सिंह पंजाबी की पुत्री
सरवती की नाव आ रही थी।
7:58
होनी बड़ी बलवान होती है। श्रोताओं पानी का कोई ऐसा भंवर
पड़ा कोई ऐसा चक्कर
8:07
फंसा उस चक्कर में दोनों नाव फंस गई और दोनों नावों में
टक्कर हो जाती है। जब
8:13
दोनों नावों में टक्कर हुई तो मल्ल्हाों ने नाव को तो संभाल
लिया डूबने नहीं दिया
8:20
परंतु मंझ रानी और वो लड़की आमने-सामने आ गई। तो वो लड़की
एकदम देख के मंझ रानी से
8:28
कहने लगी कि तू कौन है? कहां की रहने
वाली है? और किसकी नारी है? तुझे होश
नहीं किने
8:37
मेरी नाव में टक्कर मार दी है। तो मंजा कहने लगी कि नहीं
बेटी ये मैंने टक्कर
8:43
नहीं मारी। मेरे मल्ल्हा ने टक्कर नहीं मारी। ये पानी का
ऐसा ही जाल था। और इस
8:49
जाल में हमारी दोनों नाव फंस गई। भंवर पड़ रहा था। उस भंवर
में नाव फंस गई और नाव
8:55
टकरा गई। तो सरती कहने लगी कि तुम कौन हो ये बताओ।
9:01
और तुम किस राजा की रानी हो? तुम यहां
अकेली भ्रमण कर रही हो। और तुम्हें तुम तो
9:09
इतनी सुंदरी हो। यदि तुम अकेली भ्रमण कर रही हो तो तुम्हें
तो मेरे पिता के साथ
9:15
चलना चाहिए। तुम मेरे पिता की महारानी बनके कंपिलगढ़ चलो।
तुम्हें अकेले स्नान
9:22
करने के लिए नहीं भेजा जाएगा। मंझ रानी ने जब ये बात सुनी
तो मंझ रानी कहने लगी कि
9:28
बेटी सुन ध्यान से। मैं वामनगढ़ में एक श्रेष्ठ गढ़ है
नरवरगढ़ और वहां के महाराज
9:37
वीरसेन की महारानी हूं। मेरा नाम मंजा है और मैं गंगा स्नान
के लिए आई हूं। परंतु
9:44
मैं तो बेटी विवाहित हूं। मेरे पति है। परंतु तू यह बता कि
तेरा विवाह हो गया या
9:51
नहीं हुआ। तो मंझा से वह लड़की कहने लगी कि नहीं मेरा विवाह
नहीं हुआ है। तो मंझा
9:57
कहती है कि देख बेटी तेने बात तो मुझसे बहुत बड़ी कही है कि
मैं तेरे पिता के साथ
10:02
चलूं। परंतु मैं तो जा नहीं सकती क्योंकि मेरा विवाह हो
चुका है। मेरी संतान है।
10:09
मैं महारानी हूं। परंतु मैं तुझसे कहती हूं यदि आज मेरे साथ
मेरा पुत्र होता। मैं
10:15
उसे गंगा स्नान के लिए लाती तो तुझे अवश्य मेरी पुत्रवधू
बना करके नरवरगढ़ ले जाती।
10:22
और जब यह बात मंझा रानी ने उस सरवती से कही तो सरवती
क्रोधित हो गई। तमतमा गई और
10:30
कहने लगी कि मंझा तेने मेरा अपमान किया है। तू नहीं जानती
मेरे पिता के साथ
10:37
महाकाली युद्ध करती है। मेरे पिता के पास चार वीर हैं जो
अदृश्य होकर के युद्ध करते
10:45
हैं। इन वामन गढ़ों में मेरे पिता फूल सिंह का मुकाबला करने
वाला कोई राजा नहीं
10:50
है। तो मंजा कहने लगी कि ठीक है बेटी परंतु अब मैं कुछ
ज्यादा नहीं कह सकती। तू
10:57
यहां से चली जा। अच्छा रहेगा क्योंकि मेरा पुत्र यहां नहीं
है। नहीं बलपूक मैं तेरा
11:02
विवाह करवा ले जाती। श्रोताओं दोनों में विवाद हो गया।
लड़ाई की जड़ जम गई और
11:10
क्रोधित होकर के सरवती मल्ल्हा से कहती है कि मेरी नाव को
मेरे तंबू की तरफ लौटा दो।
11:17
मेरे शिविर की तरफ मेरी नाव को लौटाइए। और महारानी मंझा का
मल्ला भी महारानी मंझा की
11:23
नाव को लेकर के महाराज प्रथम के शिविर की तरफ चल देता है।
11:28
दोनों अपनेप शिविरों में आ जाती हैं। महारानी मंझा तो
समझदार थी तो राजा से कुछ
11:34
नहीं कहा लेकिन वो नौजवान लड़की एक 18 वर्षीय युवती अपने क्रोध को नहीं रोक सकी
11:42
और अपने पिता फूल सिंह के सामने जाकर के रोने लगी। तो फूल
सिंह कहने लगा कि बेटी
11:49
तेरे रोने का कारण क्या है? क्यों रो रही
है? मुझे यह बता। यदि किसी ने तेरी तरफ
11:55
हाथ किया है तो उसका हाथ कटवा दूंगा। आंख निकाली है तो
आंखें निकलवा दूंगा। और यदि
12:01
किसी ने जबान चलाई है तो उसकी जीभ कटवा दूंगा। मुझे बताइए
तू क्यों रो रही है?
12:09
परंतु देखिए श्रोताओं जिस तरीके से रावण के पास सुपण खा गई
थी। त्रिया जाल रच दिया
12:17
उस लड़की ने। रोने लगी। रुधन करने लगी कि मेरे पिता इतने
बड़े बलवान हैं। काली के
12:26
भक्त हैं। काली साक्षात साथ में लड़ती हैं। और उनकी पुत्री
से किसी एक छोटे-मोटे
12:33
राजा की रानी यह कह जाए कि मेरी पुत्रवधू बना लूं? तो क्या यह शोभा देता है महाराज?
12:39
जब यह बात फूल सिंह ने सुनी तो कहने लगा कि बेटी मुझे बताइए
वो कौन थी जिसने तेरा
12:46
अपमान किया है। जो अपने पुत्र की पत्नी तुझे बनाना चाहता
है। मैं उसे जीवित नहीं
12:52
छोडूंगा। इस गणगंगा में मेरी मां भवानी की सौगंध खाकर कहता
हूं इस गणगंगा में काट
12:58
काट करके बहा दूंगा। देखिए श्रोताओं सरवती अपने पिता फूल
सिंह
13:03
से कहने लगी कि पिताजी एक छोटा सा राज्य नरवरगढ़ और उसका
कोई राजा प्रथम बताया और
13:11
उसकी महारानी मंजा ने मेरी नाव में टक्कर मरवा दी अपने
मल्हा से और मुझसे कहने लगी
13:18
कि मेरा पुत्र यहां होता तो मैं तुझे बलपूर्वक अपनी
पुत्रवधू बनाकर ले जाती। जब
13:25
अपनी पुत्री की यह बात महाराज फूल सिंह ने सुनी, फूल सिंह पंजाबी ने सुनी, कंपिलगढ़
13:32
के राजा ने सुनी तो राजा का क्रोध सातवें आसमान पर छा गया।
फूल सिंह क्रोधित हो उठा
13:39
और कहने लगा कि बेटी किसकी मौत आ गई? मैं नरवरगढ़ के एक-एक नर बच्चा को भवानी मां
13:48
की सौगंध खाकर कहता हूं काट काट करके गढ़ गंगा में बहा
दूंगा। जीवित नहीं छोडूंगा।
13:54
एक को भी जिंदा नहीं जाने दूंगा। मैं अभी उसको जाकर के
देखता हूं। अपनी पुत्री को
14:02
समझाने के बाद फूल सिंह ने अपनी सेना को आदेश दिया। तैयार
हो जाओ योद्धाओं। हमारी
14:10
पुत्री का अपमान एक छोटे से राज्य नरवरगढ़ की महारानी ने किया है। हम बलपूर्वक उस
14:17
महारानी को लेकर के चलेंगे और उस राजा को पराजित करेंगे।
श्रोताओं महाराज फूल सिंह
14:24
पंजाबी ने अपनी सेना को आदेश दे दिया। सेना सुसज्जित हो गई।
रण के बाजे बजने लगे
14:31
और कासिद को बुला लिया। उसी समय कासिद कहते हैं जो खत लेकर
के जाता है जो दूत
14:37
होता है। एक दूत को बुलाया और दूत से कहा कि दूत मैं तुझे
एक खत लिख के दे रहा हूं।
14:44
और इसे नरवरगढ़ के महाराज प्रथम को उसका शिविर पूर्व दिशा
में लगा हुआ है। उसको
14:51
सौंप देना। तो फूल सिंह पंजाबी ने एक खत लिखा और खत में लिखता
है कि दुष्ट नरेश
15:00
तेरी महारानी ने मेरी पुत्री का अपमान किया है। यदि तू
जीवित रहना चाहता है तो
15:06
अब भी समय है तू यहां से गंगा का घाट छोड़ के नरवरगढ़ लौट
जा। और यदि गंगा में स्नान
15:13
किया गंगा के घाट पर रहा तो मेरे हाथों से वीरगति को प्राप्त
हो जाएगा। मुझसे युद्ध
15:20
करने के लिए तैयार रहे। नीचे अपनी मोहर लगा दी। कंपिलगढ़ की
मोहर लगा के फूल सिंह
15:26
ने अपने हस्ताक्षर कर दिए और वह परवाना वो खत दे दिया एक
दूत को। दूत उस खत को लेकर
15:35
के चला जाता है और पहुंच जाता है महाराज वीरसेन के दरबार
में क्योंकि ये राजा थे
15:44
वहां शिविर लगाते थे वहां इनका दरबार भी लगता था महाराज
वीरसेन के दरबार में
15:50
उपस्थित हो गया और खत महाराज के सामने प्रस्तुत कर दिया जब
महाराज ने वो खत पढ़ा
15:57
तो महाराज वीरसेन क्रोध में तमता गए कहने लगे कि किसी का
इतना दुस्साहस कि हमें गढ़
16:05
गंगा से स्नान करने से वंचित कर दे। हम नरवरगढ़ के नरेश
हैं। और कहा उससे कि दूत
16:14
ध्यान से सुन लखियावन के से हाथी नहीं मिलते हैं। नरवर के
से नरच्चा नहीं मिलते
16:20
हैं। और संकलदीप की सी पद्मनी रानी नहीं मिलती है और महवे
के से क्षत्रिय नहीं
16:26
मिलते हैं। जाकर के अपने महाराज से बोल देना कह दो अपने
महाराज से कि राजा प्रथम
16:33
युद्ध करने के लिए तैयार हैं। युद्ध की तैयारी करवाओ।
महाराज प्रथम कभी भी गंगा
16:39
का घाट नहीं छोड़ेंगे। हमको वह कमजोर समझता है और हमें डरा
करके
16:46
यहां से भगाना चाहता है। जबकि अपनी पुत्री का दोष नहीं देख
रहा है। श्रोताओं
16:53
उस दूत को महाराज प्रथम ने वापस भेज दिया और दूत महाराज फूल
सिंह के दरबार में आ
17:00
जाता है। कंपिलिगढ़ नरेश के दरबार में आ जाता है। और
कंपिलगढ़ नरेश को समस्त
17:06
दास्तान आ करके सुनाई कि महाराज वह अहंकारी नरेश वीरसेन
लड़ने को तैयार है।
17:14
उसके साथ 60 हजार की फौज
है। 60 हजार की फौज को उसने सुसज्जित होने का आदेश दे
17:21
दिया है। वो गणगंगा का घाट छोड़ना नहीं चाहता है। महाराज वो
हमसे युद्ध करेगा। तो
17:27
फूल सिंह पंजाबी भी क्रोधित हो उठते हैं। श्रोताओं सुसज्जित
सेना दोनों पक्षों की
17:34
महाराज प्रथम के साथ 60 हजार की सेना
है और फूल सिंह पंजाबी के साथ भी 1 लाख की
17:42
सेना है। दोनों पक्षों के योद्धा मैदान में आमने-सामने हैं
और युद्ध की तैयारी
17:49
में आदेश की पालना में खड़े हुए हैं कि कब अपने-अपने नरेशों
का आदेश मिले। जब फूल
17:56
सिंह पंजाबी ने अपनी सेना को आदेश दिया कि बंदी बना लो इन
दोनों को। इस राजा की सेना
18:04
सहित इसका नाश कर दो। सबको काट काट के गढ़ गंगा में बहा दो।
श्रोताओं अब तो दोनों
18:11
तरफ की सेनाओं में युद्ध आरंभ हो गया। उन्हीं की भाषा में
मैं आपको बयान करता
18:17
हूं। दोनों अनि बराबर मिल गई। मची परस्पर मारा मार। गुर परग
और गदा चल रही कोता
18:25
खानी चले कतार खटखट खटखट तेगा चल चल रही छपक छपक तलवार डेढ़
पहर तक बजो दोधार और
18:32
बहने लगी रक्त की धार देखिए श्रोताओं उनमें बड़ा भयानक
युद्ध हुआ बड़ा कठिन ये
18:40
संग्राम चल रहा है गढ़ गंगा पर इधर तो नरवर के नरच्चा
18:46
और उधर पंजाबी फूल से कंपिलगढ़ का महाराज
18:51
दोनों की सेनाएं आमने सामने युद्ध के मैदान में डटी हुई है।
श्रोताओं
18:57
बड़ा घोर संग्राम चल रहा है। काट काट के गंगा की धारा में
लाशों को बहाया जा रहा
19:04
है। दोनों पक्षों के वीर जवान अपने अपने राजाओं के नाम की
जय जयकार करके युद्ध कर
19:11
रहे हैं। दोनों में महासंग्राम चल रहा है। अब देखिए,
19:17
जब फूल सिंह पंजाबी की नरवर नरेश से कोई भी पेश नहीं पड़ी।
फूल सिंह पंजाबी को पता
19:25
था कि नरवर नरेश कोई छोटे-मोटे राजा नहीं है। महान राजा
हैं। अतुलित पराक्रमी हैं।
19:34
और इस राजा को युद्ध में हराना आसान काम नहीं है। तो, फूल सिंह पंजाबी अपनी पुत्री
19:42
सरवती के पास वापस अपने शिविर में जाता है और कहने लगा, "पुत्री, मेरे पास 1 लाख की
19:49
सेना है। और महाराज प्रथम के पास 60,000 सैनिक हैं। और हमें युद्ध करते-करते तीन
19:56
पहर का समय व्यतीत हो चुका है। परंतु कोई हारजीत किसी पक्ष
की नहीं हुई है। तो सरती
20:03
कहने लगी कि पिताजी मेरे पास जादू है। मैं 14 विद्या निधान हूं। मैं आपको एक जादू की
20:11
पोथी देती हूं। एक जादू का डिब्बा देती हूं। मंत्र देती
हूं। और इस डिब्बा में एक
20:18
भस्मी है। एक भस्म है। और उस भस्म को आप
20:24
जितने बीच में बिखेर दोगे, उतने बीच के
जवान पत्थर के हो जाएंगे। वो युद्ध करने
20:31
में सक्षम नहीं रहेंगे, बेहोश हो
जाएंगे और उन्हें आप आसानी से काट सकते हैं।
20:37
श्रोताओं अब देखिए सरवती अपने पिता फूल सिंह को उस जादू के
डिब्बे
20:44
को दे देती है। क्योंकि सरवती भी मां काली की भक्त थी और उस
जमाने में जादू प्रचलित
20:52
था। कुछ शास्त्रों में और पुराणों में ऐसा बताया जाता है कि
कुछ राजाओं के साथ तो
20:59
मां भवानी स्वयं युद्ध किया करती थी। जैसे कंपिलगढ़ नरेश
फूल सिंह के साथ स्वयं मां
21:06
काली युद्ध करती थी। अब देखिए श्रोताओं फूल सिंह उस जादू के
डिब्बे को लेकर के चल
21:14
देता है रणभूमि में। रणभूमि में फूल सिंह ने जाकर देखा तो
उसकी सेना में भगदड़ मची
21:21
हुई है। नरवर के जवानों ने उसकी सेना को पछाड़ रखा है। सेना
भाग रही है और नरवर के
21:30
वीर योद्धा उनके पीछे पड़ रहे हैं। जब अपनी सेना को पीछे
हटते हुए देखा तो फूल
21:37
सिंह कंपिलगढ़ नरेश जादू के डिब्बा को लेकर के आगे बढ़ जाता
है। और सामने महाराज
21:44
प्रथम को देखा तो कहने लगा नरेश क्यों इन सेनाओं का अंत
करवा रहे हो? आओ दोद हाथ
21:51
आमने सामने हम करेंगे। देखिए श्रोताओं महाराज प्रथम कोई
छोटे-मोटे बलवान नहीं
21:59
थे। महाराज प्रथम में और फूल सिंह पंजाबी में दोनों में
तलवार का युद्ध चल रहा है।
22:06
परंतु फूल सिंह पंजाबी महाराज प्रथम को आसानी से नहीं पकड़
सकती थी। आसानी से
22:12
नहीं हरा सकते थे और ना महाराज प्रथम ही फूल सिंह को आसानी
से हरा सकते थे। जब
22:19
महाराज प्रथम ने अपनी तलवार का प्रहार किया और फूल सिंह
पंजाबी अचेत अवस्था में
22:25
पृथ्वी पर गिरा तो मां भवानी उसी समय अपना खड़क आगे लगा
देती है और फूल सिंह की
22:31
रक्षा कर देती है। इस तरीके से कई बार महाराज प्रथम ने फूल
सिंह पंजाबी को धरनी
22:37
पर पछाड़ दिया। लेकिन मां भवानी स्वयं अपना तेगा फूल सिंह
की सुरक्षा में आगे
22:43
बढ़ा देती और फूल सिंह पंजाबी महाराज प्रथम के बारों से
सुरक्षित बच जाता। ये
22:50
सोच कर के फूल सिंह पंजाबी ने मन में विचार किया कि अब मेरे
पास कोई दूसरा
22:55
विकल्प नहीं रहा। अब मैं युद्ध नहीं जीत सकता। यदि कुछ समय
तक और युद्ध हुआ तो
23:02
महाराज प्रथम के जवानों ने नरवरगढ़ के महायोद्धाओं ने मेरी
सेना को छिन्नभिन्न
23:08
कर दिया है। मेरी सेना भाग रही है। मेरे सेनापति मारे जा
चुके हैं। इसलिए अब मुझे
23:16
जादू का प्रहार करना होगा। श्रोताओं उस दुष्ट उस धोखेबाज
नरेश ने
23:24
जादू का डिब्बा लेकर के उसमें जो अवमंत्रित भस्मी थी जिसको
सम्मोहक भस्मी
23:29
भी कहा गया है वेद पुराणों में वो सम्मोहक भस्मी महाराज
प्रथम की सेना पर छोड़ दी और
23:37
जहां जहां जैसे-जैसे वो भस्म उड़कर पहुंची तो महाराज प्रथम
की सेना बेहोश होने लगी
23:44
महाराज प्रथम की सेना जैसे ही बेहोश होती और कंपिलगढ़ के
जवान उनका शीश धड़ से अलग
23:51
कर देते। काट काट करके महाराज प्रथम के 60 हजार जवानों को गढ़ गंगा में बहा दिया
23:58
गया। महान रक्तपात हुआ श्रोताओं महाराज प्रथम
24:03
की सेना में से केवल दो व्यक्ति शेष बच गए। महाराज प्रथम की
पराजय हो गई। महाराज
24:10
प्रथम ने देखा कि उसकी समस्त सेना का संहार हो चुका है और
कंपिलगढ़ नरेश फूलसेन
24:18
और उसके कुछ सेनापति महाराज प्रथम को बंदी बनाने के लिए आगे
बढ़ रहे हैं। रानी मंझा
24:25
और महाराज प्रथम दोनों खड़े हुए ये देख रहे हैं। रानी मंझा
को भी
24:32
पता चल गया कि मेरे समस्त सैनिक योद्धा मारे जा चुके हैं।
और अब महाराज की हार
24:37
निश्चित है। श्रोताओं फूल सिंह ने कुछ ही समय में महाराज
प्रथम को चारों तरफ से
24:44
घिरवा लिया और बंदी बना लिया। महाराज प्रथम की के हाथों में
हथकड़ी डाल दी गई।
24:52
पैरों में बेड़ियां डाल दी गई। महाराज प्रथम को जंजीरों से
जकड़ दिया गया। और
24:58
रानी मंझा को भी जंजीरों से जकड़ दिया गया। और डोंसा बजाते
हुए ले गए अपने शिविर
25:05
को। अब देखिए श्रोताओं जो राजा
25:11
सात हाथ के सिंहासन पर बैठता था। वही महाराज
25:17
नरवरगढ़ नरेश आज फूल सिंह पंजाबी की कैद में कैदी हो गए।
फूल सिंह ने अपने सैनिकों
25:25
को आदेश दिया कि सेना का कच कंपिलगढ़ की तरफ कराया जाए।
गंगा का स्नान पूर्ण हुआ
25:32
और मेरी बामनगढ़ नरेशों को बंदी बनाने की अभिलाषा थी। मैं
बामनगढ़ बामनगढ़ के
25:38
राजाओं को बंदी बना चुका हूं। समस्त राजा मेरे यहां टैक्स
देते हैं। कर देते हैं
25:44
कर। इसलिए चलो कंपिलगढ़ की तरफ पयान किया जाए। श्रोताओं
25:51
अपने महाराज फूल सिंह का आदेश सुनकर के सैनिकों ने उत्साह
पूर्वक विजय का धोसा
25:57
बजवाया और कंपिलगढ़ के लिए सेना ने कूच कर दिया। कई दिनों
का सफर करने के बाद फूल
26:05
सिंह की सेना कंपिलगढ़ पहुंच जाती है। कंपिलगढ़ में महाराज
प्रथम ने अपना दरबार
26:13
सजाया। अपने दरबार में समस्त सामंत बड़े-बड़े धवल, योद्धा और सेनापतियों को
26:21
बुलाया। अपने सलाहकारों को बुलाया और कहा कि दो बंदी युद्ध
भूमि से लेकर के आए हैं
26:29
जो स्वयं महाराज प्रथम नरवरगढ़ के महाराज और उनकी पटरानी मन
जाए दोनों को मेरे
26:36
सामने दरबार में पेश किया जाए। देखिए श्रोताओं समय-समय की
बात समय को परखे ज्ञानी एक समय
26:44
पे धूप एक पे बरसे पानी। समय बहुत बड़ा बलवान होता है। समय
की बात होती है। जिस
26:52
राजा के आदेश में इतनी दम थी कि संपूर्ण नरवर पर शासन चलता
था जो स्वयं एक सिंहासन
27:01
पर बैठकर के न्याय किया करते थे। वही राजा बंदी बन के
कंपिलगढ़ नरेश महाराज फूल सिंह
27:09
के दरबार में खड़े हुए हैं। उनका शरीर जंजीरों से जकड़ा हुआ
है और चार सैनिक उन
27:16
पर भाला ताने हुए हैं। और यही हाल नरवर की महारानी
27:22
मंझा का है। महाराज फूल सिंह दरबार में उपस्थित हो गए और
नरवर नरेश से कहने लगे
27:30
कहो नरवर के महाराज आप बड़ा युद्ध करना चाहते थे। हमने आपको
27:36
आदेश दिया था कि आप वापस लौट जाए तो बहुत अच्छे रहेंगे।
परंतु आपने नहीं माना। आप
27:42
बोलिए आपको क्या सजा दी जाए। नरवर नरेश महाराज प्रथम बिना
घबराए हुए उस राजा से
27:49
कहने लगे कि दुष्ट नरेश जो राजा एक राजा के साथ व्यवहार
करता है वो व्यवहार किया
27:55
जाए। मैं भी एक राजा हूं। तो फूल सिंह पंजाबी
28:00
हंसा कहने लगा कि नहीं तुम राजा जैसे व्यवहार करने के योग्य
नहीं है। तुम्हारी
28:07
इस पत्नी ने मेरी पुत्री का अपमान किया था। अपने पुत्र के
साथ विवाह करने की बात
28:13
कही थी। तुमने अपने आप को नरवर के नर बच्चा कहा
28:21
था। अब तुम्हें मैं सजा देता हूं। श्रोताओं
28:26
महाराज प्रथम को फूल सिंह पंजाबी क्या सजा सुना रहा है कि
देखिए तुम्हें मेरे बंदी
28:33
गृह में रहना होगा। आपके हाथ में एक चाकी दे दी जाएगी। और
28:40
5 किलो अनाज आपको रोजाना पीसना होगा। आपको
28:46
चाकी चलानी होगी। और खाने के लिए सूखी दो रोटी दी जाएंगी।
28:52
सब्जी भी नहीं होगी। जाइए इनको ले जाया जाए और जहां जिस
बंदी
28:59
गृह में चाकी पीसी जाती है उस बंदी गृह में इस महाराज प्रथम
को कैद कर दिया जाए।
29:06
श्रोताओं राजा प्रथम देखिए समय का प्रभाव। फूल सिंह पंजाबी
ने कैद में डलवा दिया। और
29:15
एक चाखी रख दी गई और उसके सामने अनाज रख दिया गया। कि इसको
पीस ले। महाराज प्रथम
29:24
की यह हालत हो गई। हाथ हथेला छूटे और बांस पीठ पर टूटे। जब
महाराज प्रथम के हाथ से
29:31
वो चाकी का हथेला बोलते हैं उसको वो छूटता है और वैसे ही जो
प्रहरी होते हैं वो
29:36
महाराज प्रथम की पीठ पर बांसों की मार लगाते हैं। महाराज
प्रथम बंदी गृह में
29:43
चक्की पीस रहे हैं। चाकी चला रहे हैं। हाथों में छाले पड़
गए महाराज प्रथम की।
29:50
अब देखिए मंझ रानी को क्या सजा दी जाती है। श्रोताओं मंझ
रानी से महाराज फूल सिंह
29:57
नरवरगढ़ की राजा की पटरानी से क्या कहने लगे? देखिए श्रोताओं ये भी समय का ही
30:03
प्रभाव है कि रानी वह बहुत उछल रही थी। मेरी पुत्री ने
तुझसे क्या गलत कहा था कि
30:10
तू अकेली गंगा में विहार कर रही है। तू मेरे पिता के साथ
चल। जबकि तेने मेरी बात
30:18
को नहीं मेरी पुत्री की बात को नहीं माना और मेरी पुत्री का
अपमान किया। अब बताइए
30:25
तू मेरी कैद में है और मेरी घरवाली बनेगी।
30:30
अब बोल क्या क्या किया जाए तेरा? तो यह बात सुनकर के मंजा रानी कहने लगी
30:39
दुष्ट कायर राजा तू ध्यान रख मैं तेरे इस कंपिलगढ़ को धूल
30:46
में मिलवा दूंगी जब मेरा शेर इस कंपिलगढ़ पर आक्रमण करेगा
30:52
मंझ रानी की बात सुनकर के फूल सिंह पंजाबी हंसा कि तेरा शेर
क्याने कोई शेर पैदा
30:59
किया था कि हां मैंने शेर पैदा कि शेर तो बनी में पैदा होते
हैं। हां,
31:06
मैंने बनी में ही पैदा किया। कि शेर तो हिंस के बेड़े में
पैदा होते हैं। तो मंजा
31:12
कहने लगी हां हिंस के बेड़े में ही पैदा किया था। फूल सिंह
कहने लगा शेरनी का दूध
31:18
कि हां मेरे पुत्र ने शेरनी का दूध पिया है। और जब वो आएगा
तो तेरा एक कंपिलगढ़
31:24
धूल में मिल जाएगा। कंपिलगढ़ में कोई रोने वाला नहीं रहेगा।
यह स्थिति तेरे इस
31:30
कंपिलगढ़ की हो जाएगी। फूल सिंह पंजाबी क्रोधित हो उठा कि
रानी जबान को संभाल और
31:38
अब मेरी पटरानी बनने के लिए तैयार हो जा। तो मंजा ने जब यह
बात सुनी तो मंजा कहने
31:44
लगी कायर तू मुझे स्पर्श भी नहीं कर सकता। यदि स्पर्श करने
का भी दुस्सा किया तो मैं
31:52
तेरा सर धड़ से अलग कर दूंगी। तू मुझे कौन जानता है?
31:57
श्रोताओं फूल सिंह पंजाबी ने मंझ रानी को बहुत परेशान किया।
परंतु मंझ रानी एक भी
32:06
बात नहीं मानती है उसकी। तो फूल सिंह पंजाबी मन में विचार
करता है
32:11
कि इसको बैलाया जाए और बहला के पटरानी बनाया जाए। फूल सिंह
पंजाबी ने मंजा से
32:17
कहा तो बता तेरा पुत्र यदि तुझे छुड़ाने नहीं आया तो क्या
करेगी? कि तब मैं तेरी
32:24
पटरानी बन जाऊंगी। तो फूल सिंह कहने लगा कितना समय लगेगा कि
32:30
छ महीने का छ महीने तक तू मेरा धर्म का पिता है और मैं तेरी
धर्म की पुत्री हूं।
32:37
फूल सिंह पंजाबी कहने लगा ठीक है। मैंने बामनगढ़ के राजाओं
को कैद कर लिया। कोई
32:44
ऐसा नरेश नहीं है। कोई ऐसा पैदा नहीं हुआ है जो मुझे पराजित
करे। मां भवानी मेरे
32:50
साथ युद्ध करती हैं। तो मुझे तो कोई हराने वाला है ही नहीं।
कि ठीक है मंजा हम तुझे
32:56
छ महीने का आश्वासन देते हैं। परंतु याद रहे छ महीने के बाद
तुझे हमारी पटरानी
33:04
बनना पड़ेगा। मंजा कहती है ठीक है मैं वायदा करती हूं।
श्रोताओं फूल सिंह पंजाबी
33:11
कहने लगा कि मैं आपको इस तरीके से पुत्री के महल में तो भेज
नहीं सकता। आपको भी मैं
33:17
यह सजा देता हूं। छ महीने तक आपको मेरे महल पर एक बहुत लंबा
बांस लेकर के
33:25
काग उड़ाने पड़ेंगे। मेरे महल पर जो कौवा आते हैं उनको
उड़ाना पड़ेगा। काग उड़ानी
33:32
कर दी रानी कि जाइए एक लंबा बांस दे दीजिए इसके हाथ में और
भेज दीजिए इसको महल पर।
33:39
महल के पक्षियों की सुरक्षा यह करेगी। महल पर कोई पक्षी
नहीं आ जाए। कोई कौवा नहीं आ
33:46
जाए। जा श्रोताओं महारानी मंझा को जो नरवर
33:51
गढ़ की रानी थी उसको फूल सिंह पंजाबी ने एक लंबा बांस देकर
के अपने महल पर काग
34:00
उड़ाने के लिए भेज दिया और कह दिया कि भोजन में दो रोटियां
सुबह और दो रोटी शाम
34:05
को दी जाएंगी। अब देखिए श्रोताओं यही तो समय होता है।
34:13
श्रोताओं समय की बात होती है। समयसमय का फेर है समय बड़ा
बलवान। भीलन लूटी गोपिका
34:21
जब बुई अर्जुन बेईमान श्रोताओं आपको ज्ञात होगा कि एक बार
उस अर्जुन की टंकार को
34:28
सुनकर के संसार दहल जाता था। उसी अर्जुन से जब द्वारका
समुद्र में डूब रही उस समय
34:36
भगवान श्री कृष्ण अपने धाम को चले गए थे तो भीलों ने पकड़
लिया था अर्जुन को।
34:41
अर्जुन से गोपिकाओं को लूट लिया। अर्जुन गांडीव को नहीं उठा
सके। तो यही समय होता
34:46
है। इस संसार में सबसे बड़ा बलवान समय है। जो समय करता है
वह कोई नहीं कर सकता। बड़े
34:54
से बड़ा दुश्मन नहीं कर सकता। समय की मार से कोई नहीं बच
सकता। देखिए श्रोता वही
35:00
मंज रानी उस महल पर कौवा उड़ा रही है। काग
35:06
उड़ानी होकर के बांस से चारों तरफ देख रही है। महल की
सुरक्षा में है। और महाराज
35:13
प्रथम बंदी गृह में चक्की चला रहे हैं। हाथों से पीसते हैं 5 किलो अन्न प्रतिदिन
35:22
और खाने के लिए दो रोटी मिलती है। अब देखिए उधर क्या होता
है कि काफ़ी समय गण
35:30
गंगा पर हो गया। 60 हज़ार की
सेना महाराज की गण गंगा पर समाप्त हो गई। और इधर राजा
35:40
नल और गजमोतनी अपने राजमहल में बड़े आराम से रह रहे हैं।
35:47
तो उसी रात्रि को गजमतनी ने एक स्वप्न देखा। स्वप्न देखा और
स्वप्न बड़ा बुरा था। अपने
35:56
पति महाराज नल को महल में बुला लिया और राजा नल से कहने लगी
कि हे महाराज मैंने
36:04
आज बड़ा भयानक सपना देखा है। राजा नल कहने लगा कहो रानी
क्या स्वप्न देखा कि महाराज
36:11
स्वप्न नहीं यह सत्य है। मैंने ऐसा स्वप्न कभी नहीं देखा।
मेरा स्वप्न यह झूठा नहीं
36:18
है। राजा नल कहने लगे कहो रानी कौन सा स्वप्न
36:23
है कि महाराज गढ़ गंगा पर महासंग्राम करते हुए मैंने हमारे
सुसर
36:31
साहब महाराज प्रथम को देखा है। बड़ा भयंकर युद्ध हो रहा है
भगवन गण गंगा पर। वहां
36:39
दोनों दोनों पक्षों की सेनाएं आमने सामने युद्ध के मैदान
में डटी हुई है और उस
36:45
युद्ध में नरवरगढ़ की हार हो गई। राजा नल कहने लगे
36:51
रानी क्या तेरा दिमाग सही है? कहीं पागल तो
नहीं हो गई? महाराज प्रथम को हराने वाला इस दुनिया में
36:59
कोई नहीं है। महाराज प्रथम कोई अट्टे पट्टे राजा नहीं है।
महाराज प्रथम महा
37:04
बलवान है। महा पराक्रमी नरेश हैं। कि नहीं महाराज आप कह रहे
हैं वो सत्य नहीं है। मैं कह
37:11
रही हूं वो सत्य है। और यहीं तक सीमित नहीं रहा। आपके
माता-पिता बंदी बन चुके
37:19
हैं। दोनों को जंजीरों में जकड़ करके एक कंपिलगढ़ का राजा
बंदी बना करके ले गया
37:26
है। और राजन यहीं तक सीमित नहीं रहा। मेरे स्वप्न में तो
मैंने यह भी देखा कि
37:32
तुम्हारी माता उस राजा के महल पर काग उड़ा रही है और
तुम्हारे पिता को बंदी गृह में
37:40
बंद कर कर दिया है और वहां वो चाकी चला रहे हैं। फटे हुए
वस्त्र उसके बदन पर धारण करा दिए
37:48
गए हैं। और महाराज प्रथम उस राजा की जेल में बंद है और 5 किलो अन्न
37:55
पीसते हैं रोजाना। खाने के लिए दो सूखी रोटी दी जाती है।
38:00
तो राजा नल सोचने लगे कि रानी तुझे कुछ भ्रम हुआ है। ऐसा
सत्य नहीं हो सकता। मैं
38:07
अभी सूचना भिजवाता हूं और माता-पिता की खुशखबरी गणगंगा से
मंगाता हूं। वो तो 60
38:14
हजार की फौज लेकर के बड़े-बड़े योद्धाओं को साथ लेकर के गढ़
गंगा पर स्नान करने गए
38:20
थे और मेरे पिताजी को हराना इतना आसान नहीं है। कोई भी उन्हें
आसानी से नहीं हरा
38:26
सकता। जब तक उनके हाथ में तलवार रहेगी तब तक उन्हें पराजित
नहीं किया जा सकता। कि
38:33
नहीं महाराज मैं जो कह रही हूं वो सत्य है। कहते हैं कि
मेरे पिता को कोई बंदी
38:39
नहीं बना सकता। रानी यह सब झूठ है। तुझे भ्रम हुआ है। तो गजमोतनी
रानी नल से कहने
38:46
लगी कि नहीं नाथ मुझे भ्रम नहीं हुआ। मैं जो कह रही हूं वो
सत्य प्रतीत होता है। तो
38:53
राजा नल कहने लगे कि कुछ सूचना तो आनी चाहिए। कोई सैनिक 60 हजार की सेना है। लाख
39:00
ब्राह्मण साथ में है। और कोई ना कोई सैनिक गुप्तचर कुछ सूचना
तो लेकर के आता।
39:08
श्रोताओं अब देखिए उधर क्या होता है। गढ़ गंगा पर जब युद्ध
चल रहा था तो वहां
39:17
राजा प्रथम के ब्राह्मण थे। राजपरोहित थे लाखा ब्राह्मण
क्योंकि पंडित गंगाधर को
39:23
उन्होंने अपदस्त कर दिया था। हटा दिया था राजपरो के पद से।
और लाखा दादा को ही
39:31
उन्होंने अपना राजपुरोहित घोषित कर दिया था। तो लाखा दादा
या लाखा ब्राह्मण
39:38
वहां गंगा के घाट पर छिप जाते हैं कुछ पत्थरों की ओठ में
सेना की ओठ में और जब
39:45
वो जादू से पत्थर के नहीं बने तो वहां उन पत्थरों में से
निकल कर के चल देते हैं
39:53
नरवरगढ़ के लिए। राजा नल का दरबार लगा हुआ है। राजा नल
दरबार में विराजमान है और उसी
40:03
समय लाखा दादा का हड़बड़ाते हुए प्रवेश। लाखा दादा हड़बड़ा
रहे हैं। लाखा दादा के
40:11
जो पत्रा पोथी हैं वो भी उनके साथ नहीं है। लाखा दादा सीधे
महाराज नल के पास
40:18
पहुंच जाते हैं। राजा नल ने जब लाखा ब्राह्मण को देखा तो
कहने लगे कि दादा
40:24
क्या हुआ? मुझे यह
बताएं। साफ-साफ बताएं तुम अकेले क्यों आए हैं? मेरे
माता-पिता
40:32
मेरी 60 हजार की फौज
कहां चली गई? क्या हुआ उनके साथ और वो अब तक क्यों नहीं आए?
40:39
तो लाखा ब्राह्मण कहने लगा कि बेटे नल क्या बताऊं तुझे? कुछ बताने के लिए मेरे
40:46
पास शब्द नहीं है। तो राजा नल कहने लगे दादा आप बताएं कि
क्या बात है।
40:54
तो लाखा दादा ने जो गढ़ गंगा पर युद्ध हुआ था उस युद्ध का
वृतांत सुना दिया और लाखा
41:02
दादा राजा नल से कहने लगे कि बेटे नरवर के
41:08
नरेशों ने कभी हार नहीं मानी। अपने प्राण दे दिए लेकिन
दूसरे राजा से पराजय स्वीकार
41:15
नहीं की। वही काम आपके पिता श्री महाराज प्रथम ने किया। गढ़
गंगा पर महान युद्ध
41:21
हुआ। बड़ा भयंकर संग्राम हुआ और उस संग्राम में जब कंपिलगढ़
नरेश की कोई पेस
41:29
नहीं चली तो जादू के बल पर उसने हमारे सैनिकों को पत्थर का
बना दिया और तेरे
41:36
माता-पिता को कैद करके कंपिलगढ़ ले गया। अब तो राजा नल अपनी
रानी गजमोतनी की बात
41:43
को समझ जाते हैं कि यह बिल्कुल सही कहा मेरी रानी ने कि
मेरे माता-पिताओं की जेल
41:50
हो गई है। श्रोताओं राजा नल ने आपातकालीन सभा बुलाई और
आपातकालीन सभा में विचार
41:58
विमर्श करने लगे। आपातकालीन सभा एक विशेष सभा होती है
जिसमें 10 से 20 चुनिंदा
42:06
विश्वास पात्र सैनिक सेनापति और पुरोहित
42:11
और अपने परिवारिक के सदस्य होते हैं। तो आपातकालीन सभा में
विचार होने लगा कि किस
42:19
तरीके से माता-पिता की जेल को छुड़ाया जाए। अब श्रोताओं
लाखा दादा जो कि विद्वान
42:26
ब्राह्मण थे। लाखा दादा कहने लगे राजन सेना सजाइए और आक्रमण
कीजिए कंपिल गढ़ पर।
42:34
राजा नल कहने लगे कि कितनी फौज से काम चल जाएगा। मेरे पास 1 लाख की फौज है। लाखा
42:42
ब्राह्मण कहने लगे बेटा 1 लाख की फौज
से काम चलने वाला नहीं है। क्योंकि 1 लाख की
42:49
फौज कंपिलगढ़ पर आक्रमण करके विजय नहीं हो सकती। हमारी 60 हजार की फौज थी और मैंने
42:57
स्वयं अपने नेत्रों से देखा कि 60 हजार की फौज देखते ही देखते काट के गढ़ गंगा में
43:03
बहा दी गई। अब तो श्रोताओं राजा नल सोच में पड़ गए कि
43:09
मेरे पास 1 लाख फौज है
और 1 लाख से कुछ होने वाला नहीं है। तो पास में खड़ी
43:16
गजमोतनी कहने लगी कि महाराज यदि
43:23
आप अनुमति दें तो मैं आपसे एक बात कहूं तो राजा नल कहने लगे
कहो रानी क्या बात है तो
43:29
रानी कह रही है कि धीरज धर्म मित्र और नारी आप तत्काल परखिए
चारी कि हे महाराज
43:38
अपने धैर्य को धर्म को और नारी
43:44
नारी कहते पत्नी को और अपने मित्र को जब आपत्ति आए, आपातकाल हो, कोई विपत्ति
आ
43:52
जाए, उस समय उसकी परीक्षा लेनी चाहिए। महाराज आपने कुछ समय
पहले
44:00
एक श्याम नगर के राजा के पुत्र मनसुख को
44:05
अपना मित्र बनाया था। पगड़ी पलटा यार बनाया था। और आज समय
है अपने मित्र की
44:12
पहचान करने की। अपने मित्र की परख करने की और उस मनसुख
गुर्जर ने अपने पिता मैनपाल
44:19
सहित यह वायदा किया था कि नल जहां तेरा काम पड़ेगा जहां
तेरा पसीना बहेगा वहां
44:25
हमारा खून बहा देंगे तेरे साथ मर मिटेंगे तो हे महाराज आप
अपने मित्र मनसुख को परचा
44:34
लीजिए उसकी परीक्षा ले लीजिए यदि वो लड़ने के लिए तैयार है
तो उसके पास 1 लाख की फौज
44:41
है और 1 लाख की फौज
लेकर के वो हमारा साथ दे। हमारे माता-पिता की जेल छुड़ाने में
44:48
हमारी मदद करें। अब श्रोताओं राजा नल को याद आ गई अपने
मित्र की। देखिए ये कथा मैं
44:55
अलग से सुना दूंगा कि मनसुख गुर्जर से राजा नल की मित्रता
कैसे हुई थी। वो एक अलग वीडियो में बता दूंगा। तो राजा नल ने
45:05
आपातकालीन सभा में एक पत्र वाहक को बुलाया। पत्र ले जाने
वाले को बुलाया और
45:12
एक कागज मंगाया। उस कागज पर राजा नल ने
45:18
महाराज मैनपाल के पुत्र मनसुख को देखिए महाभारत में भी
मनसुख
45:25
गुर्जर का वर्णन किया गया है। ऋतुपर्ण के नाम से। वही मनसुख
गुर्जर को महाराज नल एक
45:35
पत्र लिख रहे हैं और पत्र में पूरा वृतांत लिख दिया कि
कंपिलगढ़ के फूल सिंह पंजाबी
45:41
ने हमारे माता-पिता को कैद कर लिया है। हे मित्र यदि तुम
सच्चे मित्र हो तो 1 लाख की
45:49
फौज को लेकर के चार दिन बाद बंगाल के बॉर्डर पर मिल जाइए।
जहां बंगाल देश है
45:58
उसके बॉर्डर पर मिल जाइए। वहां से हम आगे जब आप आ जाएंगे
तभी ही कूच
46:03
करेंगे कंपिलगढ़ की तरफ। श्रोताओं यह पत्र लिख दिया। नीचे
अपने मोहर और हस्ताक्षर
46:10
लगा के राजा नल ने उसे पत्रवाहक को दे दिया और पत्रवाहक को
भेज दिया श्याम नगर
46:18
के लिए। अब श्रोताओं पत्रवाहक तो श्याम नगर को चला जाता है
पत्र देने के लिए। इधर
46:25
राजा नल ने लाखा दादा को आदेश दे दिया कि दादा 1 लाख की फौज को सजाइए।
46:31
लाखा दादा ने फौज को आदेश दे दिया और देखिए श्रोताओं राजा
नल की फौज तैयार
46:40
हो रही है। सज जाओ सज जाओ मेरे शहजादे अब क्यों राखी देर
लगाए। ये आला में वर्णित
46:46
होता है इस तरीके से। और देखिए श्रोताओं जो जितनी भी फौज थी
46:54
राजा नलकी वो सज जाती है। युद्ध के लिए तैयार हो जाती है।
झिलम टोप बख्तर पहन पहन
47:00
कर के योद्धा युद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं। इधर राजा नल
और गजमोतनी रानी दोनों
47:09
विचार विमर्श कर रहे हैं। गजमोतनी रानी बड़ी विद्वान थी।
श्रोताओं घूमासुर दाने
47:15
की पुत्री थी। 14 विद्या निधान
थी। राजा नल से कहने लगी कि महाराज माता-पिता की
47:23
जेल छुड़ाने में मैं भी आपके साथ चलूंगी। राजा नल कहने लगा
रानी क्या तेरा दिमाग
47:29
सही है कि महाराज मेरा दिमाग सही है यदि मैं आपके साथ चली
गई तो आप निश्चित ही
47:36
अपने माता-पिता की जेल छुड़ाने में समर्थ हो जाओगे। और यदि
मैं आपके साथ नहीं गई तो
47:42
महाराज आप 2 लाख की फौज
तो क्या 50 लाख की
47:47
फौज से भी माता-पिता की जेल नहीं छुड़ा सकती। राजा नल कहने
लगा रानी क्यों कि
47:53
महाराज रास्ते में बंगाल देश पड़ेगा। पूर्ण रूप से जादू से
भरा हुआ क्षेत्र है।
48:01
वहां पर एक से एक बड़ा जादू है। वहां के राजाओं के साथ वहां
की जो खेरे की देवियां
48:10
होती हैं जिनको चंडी कहते हैं वो युद्ध करती हैं। राजाओं के
साथ लड़ती हैं। और
48:17
उनकी जो स्त्रियां हैं, उनकी पुत्री
हैं, वो जादुओं में पारंगत हैं। किसी भी समय
48:24
युद्ध का पासा पलट सकती हैं। इसलिए राजन मुझे आप अपने साथ
ले चलिए। परंतु राजा नल
48:31
कहने लगे नहीं रानी जब मेरा मित्र मनसुख आएगा और उसे पता चल
गया कि मैं रानी
48:38
गजमोतनी को युद्ध भूमि में साथ लेकर आया हूं तो वो रिस हो
के नाराज होकर के वापस
48:44
लौट जाएगा। मेरा साथ नहीं देगा। बंगाल के बॉर्डर से अपनी
सेना को वापस ले आएगा। तो
48:51
नल की बात सुनकर के गजमोतनी राजा नल से कहने लगी कि महाराज
मैं यह
48:58
मर्दाना भष धारण करूंगी ये जनाना बाना उतार दूंगी जनाना भष
धारण नहीं करूंगी और
49:05
तुम्हारा मित्र मुझे पहचान नहीं पाएगा श्रोताओं नल कहने लगा
रानी देखिए औरत और
49:12
आदमी इन दोनों में ईश्वर ने बड़ा अंतर बनाया है तू पहचान
अवश्य पड़ जाएगी कि
49:18
नहीं महाराज कि रानी तेरे केशों को कहां छिपाएगी? महाराज रानी कहने लगी कि मैं ऐसा
49:27
छत्र धारण करूंगी कि मेरे केश दिखाई नहीं देंगे। रानी तेरे
नेत्र इनको कहां ले
49:34
जाएगी कि नहीं महाराज मैं नेत्रों में काजल नहीं लगाऊंगी कि
हे रानी तुम्हारा ये
49:41
जो छाती है ये ऊंची उठी हुई है इस छाती को कहां छुपाओगी कि
महाराज मैं ऐसा बख्तर
49:48
धारण करूंगी जो मेरी छाती दिखाई नहीं देगी। देखिए महाराज
मैं पूर्णत मर्दाना
49:53
भेष धारण करूंगी। कोई भी मुझे पहचान नहीं सकता कि मैं
गजमतनी हूं। और मैं यदि आपके
50:00
साथ युद्ध भूमि में चली गई तो राजन आप जानते हैं कि इस
संसार में इस वक्त मेरे
50:07
समान विद्या में कोई भी परिपूर्ण नहीं है। मैं 14 विद्या जानती हूं। संपूर्ण जादू
50:14
मेरे साथ रहता है। श्रोताओं राजा नल और गजमोतनी दोनों आपस
में विचार विमर्श करके
50:21
राजा नल अनुमति दे देते हैं गजमोतनी को कि गजमोतनी जाइए
पुरुषों का बाना धारण कीजिए।
50:28
देखिए श्रोताओं भारत में यह भारत ऐसी भूमि है जहां
वीरांगनाओं की कमी नहीं रही। एक
50:35
से एक बढ़कर के वीरांगनाएं प्राचीन काल से ही होती चली आई।
वही गजमोतनी
50:42
पुरुषों का बाना धारण कर लेती है। बन जाती है एक पुरुष
50:48
दिखाई देती है एक महान योद्धा की तरह। और इधर महाराज नल
अपनी सेना का निरीक्षण कर
50:55
रहे हैं। लाखा दादा ने सेना को तैयार कर दिया है और राजा नल
देख रहे हैं अपने
51:01
सैनिकों को अपनी व्यवस्थाओं को और लाखा दादा से कहने लगे कि
दादा यदि आपकी अनुमति
51:08
हो तो सेना को कूच का आदेश दे दिया जाए। लाखा दादा कहने लगे
कि देखिए बेटे नल
51:17
कच का आदेश तो मैं दे रहा हूं पर अभी एक घड़ी इंतजार कीजिए
शुभ समय की प्रतीक्षा
51:24
कीजिए क्योंकि मार्ग में बंगाल का बॉर्डर पड़ेगा कंपिलगढ़
के लिए जो मार्ग जाता है
51:31
वो बंगाल से निकलता है और जब हम बंगाल में प्रवेश करेंगे तो
वहां आप जानते हैं राजन
51:38
वहां जादू का क्षेत्र है और उस जादू साधु के क्षेत्र में
हमारा विजय होना संभव नहीं
51:44
है। इसलिए शुभ समय पर हम यहां से पयान करेंगे। श्रोताओं
राजा नल लाखा दादा के
51:52
कथन अनुसार एक घड़ी इंतजार करते हैं और अपनी सेना का पूरा
जायजा लेते हैं। अपनी 1
52:00
लाख की फौज के साथ राजा नल और गजमोतनी घोड़ों पर सवार होकर
के कच कर देते हैं
52:08
बंगाल के बॉर्डर की तरफ। सेना राजा नल की चली जा रही है
अपने माता-पिता की कैद को
52:14
छुड़ाने के लिए। अब देखिए श्रोताओं इधर क्या होता है। जब वो
पत्रवाहक
52:23
महाराज मनसुख गुर्जर के दरबार में पहुंचा। श्याम नगर में
पहुंचा और उसने अपना पत्र
52:31
मनसुख गुर्जर को दे दिया। तो मनसुख गुर्जर ने जब पत्र को
पढ़ा तो श्रोताओं मनसुख
52:39
गुर्जर के नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। सैनिक और
सेनापति राजपुरोहित पूछने
52:46
लगे कि महाराज क्या हुआ? तो मनसुख
गुर्जर कहने लगा कि आज मेरे
52:53
मित्र पर बहुत बड़ा संकट है। मेरे मित्र के माता-पिताओं की
कैद हो गई है और मैं
53:02
युद्ध भूमि में मित्र की सहायता के लिए जाना चाहता हूं। कुछ
राजपुरोहित और कुछ
53:07
सेनापतियों ने इस बात का विरोध किया कि महाराज आप इतना बड़ा
खतरा उठा रहे हैं कि
53:15
अपने मित्र के लिए अपना समस्त न्योछावर करने जा रहे हैं।
युद्ध भूमि में अपनी
53:21
संपूर्ण सेना को झोंक रहे हैं। तो मनसुख गुर्जर क्या कहने
लगा? मनसुख गुर्जर ने
53:27
कहा कि जो ना मित्र दुख होए दुखारी ते विलोकत पातक भारी।
53:33
अर्थात इस दुनिया में मित्रों का कई तरीका होता है। चार
तरीके के मित्र होते हैं।
53:40
श्रोताओं आपको बताना चाहूंगा। एक मित्र तो ऐसा होता है जो
पैसे के लिए दोस्ती करता
53:46
है। कोई पैसे वाला है और दूसरा आदमी सोच
53:52
रहा है कि इससे पैसे लेकर के काम चलाऊं तो वो उससे दोस्ती
करेगा।
53:57
दूसरे तरीके का मित्र होता है। किसी के घर कोई सुंदर पत्नी
लड़की या कोई औरत है तो
54:07
उसके चक्कर में दोस्ती करता है। और तीसरे तरीके का मित्र
ऐसा होता है जो कि एक
54:16
सामाजिक तरीके से मित्रता करता है। और चौथे तरीके का मित्र
ऐसा होता है जो मित्र
54:23
के लिए अपने प्राण दे सकता है। तो मनसुख गुर्जर कहने लगा कि
मैं चौथे नंबर वाला
54:31
मित्र हूं। मैं मेरे मित्र के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर
दूंगा। परंतु मित्र के
54:37
माता-पिताओं को कैद से मुक्त कराऊंगा। अपने सेनापति को आदेश
दिया कि सेना को
54:43
सुसज्जित किया जाए। युद्ध के बाजे बजवाए जाए और कुछ किया
जाए बंगाले की तरफ। मेरे
54:51
मित्र को चार दिन बाद बंगाले के बॉर्डर पर मुझे मिलना है।
सेना सहित शीघ्रता से सेना
54:58
को तैयार किया जाए। श्रोताओं मनसुख का आदेश सुनकर के
55:06
गुर्जरों की सेना सुसज्जित हो रही है। समस्त योद्धा झिलम
टोप बख्तर पहन पहन करके
55:14
अपने आप को युद्ध के लिए सुसज्जित कर रहे हैं। हाथी, घोड़ा फौज, पलटन सब कुछ
तैयार
55:22
कर रहे हैं। श्रोताओं, जब सेना
संपूर्ण रूप से तैयार हो गई। 1 लाख सैनिक
तैयार हो
55:30
गए तो राजा मनसुख श्यामनगर का नरेश अपनी 1 लाख की फौज को
55:38
आदेश दे देते हैं कि कोच किया जाए बंगाल की बॉर्डर की तरफ
बंगाल के बॉर्डर पर मेरा
55:44
मित्र मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। अब देखिए श्रोताओं इधर
राजा नलकी सेना बंगाले के
55:52
बॉर्डर पर आ गई। गजमोतनी ने आदेश दे दिया सैनिकों को कि कोई
भी यदि बंगाल के बॉर्डर
55:58
के भीतर चला जाएगा तो वो वापस नहीं आ सकता। ध्यान रखें बिना
मेरी अनुमति के
56:04
क्योंकि ये जादुई क्षेत्र है। श्रोताओं गजमोतनी
56:10
राजा नल दोनों विचार कर रहे हैं। गजमोतनी कह रही है कि
महाराज तुम्हारा कोई मित्र
56:17
नहीं है। तुम तो केवल एक झूठे मित्र के फंदे में फंस गए थे।
तुम्हारा मित्र नहीं
56:23
आ सकता। कौन मरवाएगा अपनी सेना को? ऐसा कौन है जो
56:29
स्वयं अपनी जान को जोखिम में डालेगा? हे राजन हमें 1 लाख की फौज
से ही कंपिलगढ़ को
56:36
विजय करना है। कंपिलगढ़ को जीतना है। तो
56:41
श्रोताओं इधर श्याम नगर के नरेश महाराज मनसुख गुर्जर भी
अपनी 1 लाख की फौज को
56:50
लेकर के सुसज्जित होकर के रण के बाजे बजवाते हुए चल देते
हैं बंगाले की बॉर्डर
56:56
की तरफ। जहां राजा नर अपनी सेना के साथ पड़े हुए
57:02
थे। तीन दिन का लगातार सफर करके चौथे दिन
57:07
मनसुख गुर्जर बंगाले के बॉर्डर पर पहुंच जाते हैं। जहां
राजा नल अपनी सेना के साथ
57:14
पड़े हुए हैं। इंतजार कर रहे थे अपने मित्र मनसुख गुर्जर के
आने का। जब राजा
57:23
नल्ल मनसुख गुर्जर को आते हुए देखा तो अपनी रानी गजमोतनी से
कहने लगी कि गजमोतनी
57:30
देखिए मेरा मित्र मनसुख आ गया है। 1 लाख
57:35
गुर्जर योद्धाओं के साथ युद्ध भूमि में बलिदान होने के लिए
तैयार है। मेरे साथ
57:42
मरने के लिए तैयार है। मित्र हो तो मनसुख जैसा। मित्रता की
एक परम मिसाल है मेरा
57:49
मित्र। श्रोताओं दोनों मित्रों आकर के बहा फैला के भुजा
पसार करके मिले।
57:57
एक दूसरे से मिलने के बाद कुशलक्षेम पूछने के बाद दोनों
मित्र आपस में विचार विमर्श
58:05
करने लगे। गजमोतनी भी दूर से देख रही है
58:10
कि यह क्या बातें कर रहे हैं। श्रोताओं मनसुख गुर्जर मन में
विचार करके कहने लगा
58:17
कि मित्र मेरी सेना 1 लाख की है
परंतु मुझे तेरा कुछ विश्वास नहीं है क्योंकि
58:23
तेरे 60 हजार योद्धा
तो गढ़ गंगा पर मारे जा चुके हैं। मैं तेरी सेना का जायजा लेना
58:29
चाहता हूं। तेरी सेना का निरीक्षण करना चाहता हूं कि तेरे
पास कैसे-कैसे योद्धाएं। तो नल कहने लगा ठीक है। मनसुख
58:38
कीजिए मेरी सेना का निरीक्षण। तो मनसुख गुर्जर राजा नल की
सेना का
58:44
निरीक्षण कर रहा है। देख रहा है सैनिकों को कि कौन कैसा
योद्धा है और सैनिकों का
58:51
निरीक्षण करतेकरते श्रोताओं उसका ध्यान गजमोतनी पर ठहर जाता
है। जब गजमोतनी पर
59:00
ध्यान ठहरा तो राजा नल से मनसुख कहने लगा कि इस
59:05
योद्धा को कहां से लाए हो आप? वास्तव में
वाकई में बहुत बड़ा योद्धा दिखाई पड़ता
59:11
है। गोरा शरीर है। बिल्कुल मोटाजा बदन है इसका। इस योद्धा
को
59:18
आप कहां से लेकर आए? तो नल कहने
लगा कि इस योद्धा को मैंने अभी कुछ दिन पहले ही
59:25
भर्ती किया था। बड़ा वफादार सैनिक है और यह मेरे सेनापतियों
के पद पर है। मैंने
59:32
इसे धीरे-धीरे सेनापति का पद दे दिया है। यह एक टुकड़ी की
कमान संभालता है। तो
59:38
मनसुख गुर्जर कहने लगा कि मित्र युद्ध करने तो हम चल रहे
हैं। परंतु तुम्हें इस
59:46
सिपाही को मुझे देना होगा। नल सोचने लगा कि यह तो मेरी
पत्नी को मांग रहा है। तो
59:52
नल बोला कि नहीं भाई इस सिपाही को तो मैं नहीं दे सकता।
मनसुख कहने लगा इसके बदले
59:59
मैं तुझे 1000 सैनिक दूंगा।
पर यह सिपाही मेरे साथ रहना चाहिए। इसे मैं मेरा
1:00:06
बॉडीगार्ड नियुक्त करना चाहता हूं। अंगरक्षक बनाना चाहता
हूं। नल कहने लगा कि
1:00:11
नहीं मैं 1000 में भी नहीं
दूंगा। मनसुख गुर्जर ने कहा 10,000 सैनिक दूंगा
लेकिन
1:00:18
इस सैनिक को मुझे दे दीजिए। तो नल ने फिर भी मना कर दिया और
जब नल ने मना किया तो
1:00:25
मनसुख ने विचार किया कि मैं तो तेरे लिए लड़ने को और मर
मिटने को तैयार हूं। तू एक
1:00:31
जवान के लिए नाट गया मुझसे। मना कर दिया। इसलिए तेरी मेरी
यारी खत्म होती है। मैं
1:00:37
मेरी सेना लेकर के वापस जा रहा हूं श्याम नगर को। अब राजा
नल के पास कोई जवाब नहीं
1:00:43
था। राजा नल कहने लगा कि मित्र ऐसा मत कीजिए कि नहीं मुझे
यह सैनिक चाहिए। मैं
1:00:51
यह सैनिक मेरे अंगरक्षक के लिए नियुक्त करता हूं। श्रोताओं
1:00:57
मनसुख गुर्जर नाराज होकर के अपने सैनिकों को लौटने का आदेश
दे देता है। तभी नल कहने
1:01:04
लगा मोतनी से कि तू नहीं मानी। तेने मेरा मित्र भी नाराज कर
दिया। अब क्या करूं? तो
1:01:12
गजमोतनी कहने लगी कि तेरे मित्र को मैं मनाऊंगी। श्रोताओं
1:01:17
गजमोतनी मनसुख गुर्जर को पीछे से आवाज लगा रही है। और घोड़ा
पर दौड़ के मनसुख गुर्जर
1:01:25
को आगे से घेर लीजिए। जब मनसुख गुर्जर ने गजमोतनी की आवाज
सुनी तो पहचान गया। कहने
1:01:34
लगा कि भाभी इस भष में तुम कि हां
1:01:39
तो मनसुख कहने लगा कि अब तो मैं बिल्कुल नहीं जाऊंगा कि
क्यों कि मैं स्त्रियों को
1:01:45
साथ लेकर के युद्ध भूमि में जाऊं ये मुझे शोभा नहीं देता।
क्षत्रियों का बाना धारण
1:01:51
किया है हमने। हम स्त्रियों को युद्ध भूमि में साथ नहीं ले
जाते। मित्र नल तुमने ये
1:01:56
क्या किया? तुम भाभी को
युद्ध के मैदान में ले आए। तो गजमोतनी कहने लगी देखिए
1:02:02
देवर तुम नहीं जानते कि यहां से आगे बंगाल देश आरंभ हो रहा
है। बंगाल की सीमा पर
1:02:10
हमारे फौजी डेरा लगे हुए हैं। यहां से आगे का क्षेत्र जादू
का है और इस
1:02:17
क्षेत्र में आप मेरे बिना कभी भी विजय प्राप्त नहीं कर
सकते। आप कहीं बकरा
1:02:24
मुर्गा या तोता बन के पिंजों में कहीं बाड़ों में मिलेंगे।
आप युद्ध भूमि तक
1:02:31
पहुंच ही नहीं सकते। कंपिलगढ़ तक जा नहीं सकते। अब तो मनसुख
गुर्जर के दिमाग में
1:02:37
बात बैठी। मनसुख गुर्जर भी जानता था कि गजमोतनी 14 विद्या निधान है। श्रोताओं
1:02:43
गजमोतनी के समझाने पर मनसुख गुर्जर गजमोतनी को साथ लाने की
अनुमति स्वीकार कर
1:02:51
लेते हैं और वहीं अपनी सेना को वापस बुलाने बुला लेते हैं।
अब श्रोताओं उन
1:02:58
चारों में क्योंकि चारों बड़े अधिकारी थे। राजा नल, गजमोतनी,
1:03:03
लाखा ब्राह्मण और मनसुख गुर्जर चारों एक तंबू में बैठे हुए
हैं। एक शिविर में बैठे
1:03:10
हुए हैं और चारों में मंत्रणा चल रही है कि किस तरीके से
कंपिलगढ़ को जीता जाए। अब
1:03:18
देखिए गजमोतनी मन में विचार करने लगी कि ये तीनों ये नहीं
चाहते थे कि मैं इनके
1:03:25
साथ आऊं। तो मुझे अब इनकी परीक्षा लेनी चाहिए। दूसरा दिन
हुआ तो गजमोतनी ने लाखा
1:03:33
ब्राह्मण से कहा कि पंडित जी तुम यह नजदीक
1:03:38
शहर है इस बंगाले में। इस बंगाल के इस शहर को चले जाइए।
बंगाले को जाइए आप और यहां
1:03:46
से मेरे बालों के लिए आप चमेली का तेल लेकर के आओ। यहां कोई
तेली का घर मिल
1:03:53
जाएगा और उस तेली के घर से मुझे चमेली का तेल लेकर के आना।
1:03:59
यहां बंगाल के इस शहर का तेल प्रसिद्ध है, नामी है। श्रोताओं लाखा दादा मन में विचार
1:04:06
करने लगे कि ठीक है बेटी मैं इस बहाने से इस शहर को भी देख
आऊंगा। यहां के हालचाल
1:04:13
भी जान लूंगा। यहां की जनता को देख आऊंगा कि यहां कैसी जनता
है। चलो और तेरे लिए
1:04:19
मैं चमेली का तेल ले आऊंगा। लाखा ब्राह्मण और राजा नल मनसुख
और गजमोतनी से अनुमति
1:04:28
लेकर के बंगाल के लिए चल देते हैं। बंगाल में जब लाखा
ब्राह्मण ने प्रवेश किया
1:04:37
तो चला जा रहा है। कई मार्गों से गुजरते हुए उसने देखा कि
तेली का घर नहीं मिल रहा
1:04:45
है। श्रोताओं पहले तेल की बिक्री तेली के यहां ही होती थी।
खोजते खोजते पूछते पूछते
1:04:53
लाखा ब्राह्मण तेली के घर पहुंच जाता है। तेली के घर पहुंचा
तो वह देखा कि आदमी कोई
1:05:00
नहीं था। व्यक्ति कोई नहीं था। कुछ औरतें बैठी हुई एक कमरे
में बात कर रही थी। चौ
1:05:08
पर औरतें बैठी थी और वह आपस में बात कर रही थी। तो लाखा
दादा उन औरतों के पास
1:05:14
पहुंच जाता है और उनसे कहने लगा कि मैं ब्राह्मण हूं। तो वे
औरत कहने लगी कि हे
1:05:22
पंडित जी आप हमारी हस्तरेखा देखिए। लाखा पंडित जी उन तेलनों
के यहां हस्तरेखा देख
1:05:30
रहे हैं और उनको बैला रहे हैं। अपने पांडित्य का प्रभाव जमा
रहे हैं। परंतु
1:05:37
देखिए श्रोताओं तभी एक तेली की लड़की जो 14 विद्या निधान थी। जादू महा जादूगरनी
1:05:44
थी। वो महा जादूगरनी तेली की लड़की बाहर निकल के आई और उसने
जब लाखा ब्राह्मण को
1:05:51
देखा तो मन में विचार करने लगी कि ये आदमी बंगाल देश का
नहीं है। हमारे देश में ऐसे
1:05:58
व्यक्ति नहीं होते। यह तो अलग ही व्यक्ति है। इसका पहनावा
अलग है। इसकी बोली भाषा
1:06:04
अलग है। ये तो कहीं दूसरे देश का है। और मुझे एक बकरे की
आवश्यकता है। मैं इसको
1:06:13
बकरा बना देती हूं। अब देखो श्रोताओं उस लड़की ने अपने जादू
का झोला निकाला।
1:06:22
मंत्र को अभिमंत्रित किया और उड़द पढ़ करके फेंक दिए लाखा
ब्राह्मण पर। और लाखा
1:06:29
ब्राह्मण बकरा बन गया। बकरा बना के लाखा ब्राह्मण को मूंद
दिया बकरियों में। लाखा
1:06:36
ब्राह्मण बकरियों में मुंद गए। अब देखिए श्रोताओं लाखा
ब्राह्मण तो वहां बकरियों
1:06:42
के खिरक में मुदे हुए हैं। और इधर जब दो चार घंटे का समय
निकल गया तो गजमतनी मनसुख
1:06:51
गुर्जर से कहने लगी कि देवर ब्राह्मण को गए काफी समय हो गया
और न जाने वो क्यों
1:06:57
नहीं लौटे। लाखा दादा तो बातचीतों में बहुत निपुण हैं। कहीं
बात करने लग गए
1:07:03
होंगे और हमें तो बहुत आगे चलना है। कंपिलगढ़ तक जाना है।
तुम जाओ और शीघ्रता
1:07:09
से लाखा दादा को लेकर के आओ। श्रोताओं गजमोतनी की बात सुनकर
के मनसुख कहने लगा
1:07:16
ठीक है भाभी मैं जा रहा हूं। तो मनसुख गुर्जर अपने भाई नल
से कह के कि मैं अभी
1:07:23
दो घंटे में वापस लौटता हूं। श्रोता वो चल देता है। चला जा
रहा है। खोज रहा है अपने
1:07:30
ब्राह्मण लाखा दादा को। परंतु उस बंगाली शहर में लाखा दादा
का कोई अता पता नहीं
1:07:37
है। लाखा दादा का कहीं कोई ठिकाना नहीं मिल रहा है। खोजते
खोजते चला जा रहा है।
1:07:43
और तभी वो निकल रहा था धोबियों के घर के सामने से। एक
धोबियों का घर था और वहां से
1:07:52
निकल रहा था। तो वहां कुछ धोबी की धोबियों की स्त्रियां
बैठी हुई थी। बंगाले की
1:07:57
स्त्री बड़ी जादूगरनी होती थी। तो उनमें से एक स्त्री ने
देखा कि कितना सजीला युवक
1:08:04
है। कोई राजकुमार प्रतीत होता है। और मेरे पास एक गधे की
कमी है। तो क्यों ना इसको
1:08:12
गधा बना लिया जाए और रात को इसे आदमी बना लूंगी। ये सोच कर
के धोबी की लड़की ने
1:08:19
अपने जादू का झोला निकाला। मंत्र को आमंत्रित किया महाकाली
का नाम लेकर के
1:08:26
मंत्र को छोड़ दिया मनसुख गुर्जर पर श्रोताओं मंत्र जैसे ही
मनसुख गुर्जर पर
1:08:32
चला आकर के टकराया और मनसुख गुर्जर का शरीर बदल कर के गधा
बन गया और धोबिनों ने
1:08:41
पकड़ करके उसको बांध दिया। अब श्रोताओं मनसुख गुर्जर भी गधा
बने हुए
1:08:48
धोबियों के घर बंध रहे हैं। अब सुनिए ध्यान से जब दो से तीन
घंटा मनसुख गुर्जर
1:08:55
को हो गए तो गजमोतनी तो जान रही थी सब चीज कि लाखा दादा तो
वहां बकरा बन गए हैं। और
1:09:04
मनसुख गधा बन गया है। इसको ज्यादा सजा मिलनी चाहिए क्योंकि
यह बहुत भाग रहा था
1:09:11
कि मैं मंझा को कि मैं गजमोतनी को साथ नहीं ले जाऊंगा।
1:09:16
इसलिए इन दोनों को सजा मिलना जरूरी था। परंतु अब महाराज
1:09:21
नल का नंबर है। मेरे पति का नंबर है। क्योंकि ये भी मुझे
लाना नहीं चाहते थे।
1:09:27
तो गजमोतनी नल से कहने लगी कि देखिए महाराज
1:09:32
माता-पिता हमारे जेल में मुदे हैं। लाखा ब्राह्मण और मनसुख
गुर्जर को क्या पता उन
1:09:39
वो क्या जाने दूसरे का कष्ट। वो तो हमारे साथ सेना लेकर के
आ गए शर्मा शर्मी। नहीं
1:09:46
तो वो तो निश्चिंत है। सुबह के गए हैं और साझ होने को आ गई
लेकिन अभी से कहीं लौटने
1:09:53
का नाम तक नहीं है। कोई अता पता नहीं है उनका। तो महाराज हे
पतिदेव आप जाइए और
1:10:01
लाखा ब्राह्मण को और मनसुख गुर्जर को दोनों को आप लेकर के
आइए। नल कहने लगा
1:10:07
रानी देख मैं जा रहा हूं। ठीक है। पर तू इस सेना का
निरीक्षण करते रहना। सेना की
1:10:14
हेयर कमांडर इस समय तू है। तुझे ध्यान रखना है सेना को
युद्ध के लिए हाई अलर्ट
1:10:21
मोड़ पर रखना है। तैयार रखना है। कोई किसी भी तरीके की
स्थिति हो तो युद्ध के लिए
1:10:28
तैयार रहना है। गजबतनी कहने लगी महाराज आप चिंता ना करें।
मैं एक दाने की पुत्री हूं
1:10:35
और मैं समस्त विद्याओं की ज्ञाता हूं। युद्ध कला में भी
निपुण हूं। तलवारबाजी
1:10:40
में भी निपुण हूं और जादू में मेरा मुकाबला नहीं। श्रोताओं
गजमोतनी और नल से
1:10:45
और कहने लगी कि देखिए महाराज आज मेरे पान समाप्त हो गए तो
आप मुझे दो पान ले आना।
1:10:53
तो नल कहने लगा ठीक है मैं जा रहा हूं मनसुख को खोजूंगा और
लाखा दादा को खोजना
1:10:59
है और तुझे दो पान ले आऊंगा। नल भी बंगाल शहर को चला जाता
है। चला जा रहा है शहर
1:11:07
में। खोज रहा है लाखा दादा को और मनसुख गुर्जर को। परंतु
दोनों का उस शहर में कोई
1:11:14
ठिकाना नहीं मिल रहा है। कोई अता पता नहीं है। खोजते-खोजते
चला जा रहा है। तो एक चौराहे पर एक लड़की
1:11:24
पान की दुकान पर बैठी हुई थी। बड़ी सुंदर लड़की थी। राजा नल
मन में विचार करने लगा
1:11:31
कि चलो पहले पान खरीद लेता हूं। गजमोतनी ने पान मंगाया है।
उसको पान खरीद लूं और
1:11:39
एक पान मैं खा लेता हूं। तो यह सोच कर के राजा नल पान
खरीदने के लिए उस लड़की के
1:11:47
पास दुकान पर आ जाता है और उस लड़की से कहने लगा कि दो पान
तो मुझे एक कागज की
1:11:55
पुड़िया में बंद कर दीजिए, पैक कर दीजिए
और एक पान मुझे खिला दीजिए। तो लड़की कहने
1:12:01
लगी ठीक है लड़की पहचान जाती है कि कितना सुंदर ऐसा सुंदर
राजकुमार है किसी देश के
1:12:09
राजा का लड़का है और यदि यह मुझे मिल जाए इसके साथ मेरा
विवाह हो जाए तो मेरा जीवन
1:12:16
धन्य हो जाए श्रोताओं वो लड़की ये विचार करके उसे पान बना
रही है। पान को पान के
1:12:24
पत्ते निकाले तंबाकू डाली, सुपारी डाली, शहद लगाया और
1:12:30
पान बना करके पान पर अभिमंत्रित करके उड़द
1:12:35
डाल दिए। मंत्र चला दिया। और राजा नल से कहा कि लो पहले आप
पान खाइए और बाद में आप
1:12:43
पान ले जाना। तो राजा नल समझ नहीं पाया। राजा नल ने उस पान
को मुंह में दबाया और
1:12:50
जैसे ही पान की पीक मुंह के अंदर गई श्रोता वो राजा नल तोता
बन गई और राजा नल
1:12:59
तोता बना उस लड़की ने पकड़ा और एक पिंजरे में बंद कर दिया
राजा नल चिचर रही चिचचिर
1:13:07
उस पिंजरे में कभी ऊपर चढ़ता है कभी नीचे गिरता है टिटा रहा
है राजा नल राजा नल
1:13:14
कहने लगा मन में सोच रहा है कि यही हाल लाखा दादा का और
मनसुख का होगा। यही तो
1:13:22
कारण है कि वह इतने समय से नहीं लौटे। पर अब माता-पिता की
जेल का क्या होगा?
1:13:29
माता-पिता की जेल तो क्या हमको ही बंगाले से अब कौन
छुड़ाएगा?
1:13:34
अब क्या किया जाए? मैं तो यहां
इस लड़की ने तोता बना दिया। श्रोताओं राजा नल उस
1:13:42
पिंजरे में कभी तो पिंजरे की डंडियों को पकड़ता है। कभी
फड़फड़ाता है, कभी बाहर
1:13:48
निकलने की कोशिश करता है। परंतु वह लड़की
1:13:53
टस से मस नहीं हुई। अब तोता उसमें बैठा हुआ है। हैरान हो
गया और उस पिंजरे में
1:13:59
आराम से बैठा है। अब देखिए श्रोताओं जब काफी समय हो गया तो
गजमोतनी ने मन में
1:14:07
विचार किया कि अब मेरे वीरों को बुलाया जाए। गजमोतनी महा
जादूगरनी थी। तो गजमोतनी
1:14:14
ने अपने वीरों का स्मरण किया। गजमोतनी के पास आठ वीर बताते
हैं। हीरे राजे के पास
1:14:22
72 वीर बताते हैं। तो गजमोतनी ने अपने वीरों को याद किया
और चार वीर हाजिर हो
1:14:29
गए। गजमोतनी से कहने लगे कहो रानी आपने हमें किस लिए बुलाया
कि वीरों आप ये देख
1:14:36
के आओ कि मनसुख लाखा दादा और हमारे पति महाराज राजा नल
1:14:44
कहां पर है? उनका कुछ पता
लगाइए। श्रोताओं चारों वीर बंगाली शहर के लिए दौड़ गए।
1:14:53
बंगाल शहर में खोज रहे हैं। और कुछ समय बाद एक वीर ने देखा
कि मनसुख तो धोबियों
1:15:01
के घर गधा बना हुआ बैठा है। और एक वीर ने दूसरे ने देखा कि
जो लाखा
1:15:09
दादा है वो बकरियों के बाड़े में बंद है और आराम से बैठा
हुआ है। और राजा नल
1:15:18
एक पिंजरे में तोता के रूप में बंद है। और उसमें टाई पुकार
रहा है। पिंजरे को काटने
1:15:27
का प्रयास कर रहा है। परंतु कुछ नहीं कर सकता। चारों वीर
कुछ समय में ही तीनों का
1:15:34
पता लगा करके गजमोतनी के सामने उपस्थित हो गए। और गजमोतनी
से कहने लगे कि देखिए रानी
1:15:43
मनसुख तो गधा बना हुआ बैठा है धोबियों के घर। और लाखा दादा
लाखा दादा बकरा बन गए
1:15:53
हैं और रहे महाराज नल वो एक तोता बने हुए एक पिंजरे में बंद
हैं।
1:16:00
तो गजमोतनी उन वीरों से कहने लगी कि देखो वीरों मैं आपको
मेरी सेना की सुरक्षा के
1:16:06
लिए छोड़ कर जा रही हूं। मुझे जाना होगा। क्योंकि आप तो
उन्हें छुड़ा के नहीं ला
1:16:11
सकते। मैं स्वयं जाऊंगी। और मैं उन तीनों को छुड़ा करके
लाऊंगी। तुम मेरी सेना की
1:16:19
सुरक्षा करना। सेना पर कोई आक्रमण ना कर दे। तो आठों वीर
मंज
1:16:26
रानी गजमोतनी से कहने लगे कि देखिए रानी तुम निश्चिंत हो के
जाओ तुम्हारी सेना की
1:16:32
सुरक्षा व्यवस्था हम संभालेंगे। श्रोताओं गजमोतनी उन वीरों
के हवाले अपनी सेना की
1:16:40
व्यवस्था छोड़कर के श्रोताओं गजमोतनी ने वीरों को वहां
1:16:46
तैनात कर दिया। सेना की सुरक्षा में तैनात कर दिया और स्वयं
ने एक लिलहारी का रूप
1:16:53
धारण किया। लिलहारी जानते हैं जो लीला गोदती है। लीला गोदने
वाली का रूप धारण कर
1:16:59
लिया। लिलहारी का रूप बना लिया। रानी का भेष उतार दिया। और
चल देती है उस शहर में लीला गोदने के
1:17:08
लिए चली जा रही है तो सबसे पहले गजमोतनी
1:17:13
उस पान वाली लड़की के दुकान पर पहुंचती है तमोलिन की दुकान
पर पहुंचती है और उस
1:17:19
तमोलिन के वहां राजा नल को देखा पिंजरे में बंद तो राजा नल
ने गजमोतनी को पहचान
1:17:26
लिया कि गजमोतनी आ गई क्या ये मुझे बचाएगी जब राजा नल टी टी
करने लगा तो गजमोतनी नल
1:17:36
से कहने लगी थोड़ा आराम कर छुड़ाती हूं अभी गजमोतनी ने
मंत्र अभंत्रित किया और दो
1:17:44
वीरों को याद किया और जो उस लड़की की दुकान थी पान वाली
लड़की की उस पर जादू
1:17:51
चला दिया और लड़की की दुकान को वीरों ने उखाड़ दिया और उस
दुकान को ऊपर लेकर चलने
1:17:59
लगे तो लड़की घबरा गई लड़की गजमोतनी से कहने लगी कि बहन मैं
पहचान गई। यह
1:18:06
तुम्हारा पति है। मैं इसे छोड़ती हूं। आप मुझे प्राणदान दे
दीजिए। तो गजमोतनी कहने
1:18:14
लगी ठीक है। गजमोतनी ने अपने वीरों को रोका और उस दुकान को
वापस उसी स्थान पर
1:18:20
जमा दिया। और उस तमोली की लड़की ने गजमोतनी को वो पिंजरा दे
दिया कि इसकी नार
1:18:28
में एक धागा बंधा हुआ है। जब तुम इस धागे को खोल दोगी तो यह
वापस पूर्व रूप में आ
1:18:34
जाएगा। अपने मनुष्य रूप में आ जाएगा। पिंजरे को लेकर के
लीला गोदने वाली आगे चल
1:18:40
देती है। कुछ आगे जहां तेलियों के पास
1:18:46
लाखा दादा बकरा बने हुए थे वहां पहुंच जाती है। और आवाज लगाई
कि मैं लीला गोद
1:18:52
रही हूं। कोई आ जाइए। तो वही लड़की जो महा जादूगरनी थी। मंज
रानी गजमोतनी की आवाज
1:19:00
सुनकर के बाहर आई। और उस गजमोतनी से कहने लगी कि बहन मेरे
लीला गोदिए। गजमोतनी समझ
1:19:08
गई कि ठीक है तेने ही ऐसा काम किया है। तो गजमोतनी उसके शरीर
पर लीला गोदती है। लीला
1:19:17
गोदी और वो भी बहुत जो उसने कहा उसी के अनुसार तो वो लड़की
प्रसन्न हो गई। तेली
1:19:25
की लड़की कहने लगी कि बहन आज तू जो मांगेगी मैं तुझे वही
दूंगी। मैं तुझ पर
1:19:30
प्रसन्न हूं। तू कुछ भी मांग सकती है। मैंने तुझ जैसी लीला
गोदने वाली नहीं
1:19:36
देखी। तो रानी गजमोतनी कहने लगी कि मुझे तीन वचन दे
1:19:41
दी। पहले तीन वचन दे तब मांगूंगी। तो वो तेली की लड़की तीन
वचन दे देती है। तो
1:19:49
गजमोतनी कहने लगी मुझे कुछ नहीं चाहिए जो ये बकरा है इसको
दे दीजिए।
1:19:56
तो तेली की लड़की कहने लगी क्यों इसका क्या करेगी? कि नहीं यह मेरा सेनापति है।
1:20:01
तू मुझे नहीं जानती। मैं रानी हूं। गजमोतनी तेली की लड़की
समझ जाती है और उस
1:20:08
बकरे को दे देती है उस लीला गोदने वाली रानी गजमोतनी को।
आगे चल देती है और मन
1:20:15
में सोच रही है कि अभी से मुझे मनसुख को छुड़ाना है। चल
देती है आगे और पहुंच जाती
1:20:22
है धोबियों के घर। धोबियों के घर पहुंची और वही आवाज लगाई
कि कोई लीला गोदवा
1:20:30
लीजिए। मैं लीला गोद रही हूं। तो जिस लड़की ने मनसुख को गधा
बनाया था वही लड़की
1:20:37
बाहर आ जाती है। और कहने लगी कि बहन मेरे लीला गोद दीजिए।
तो रानी गजमोतनी ने उसके
1:20:46
भी जैसा उसने चाहा उसी प्रकार की लीला गोदी दी। लीला गोदने
के बाद वह लड़की कहने
1:20:54
लगी कि बहन मैंने बहुत ललिहारी देखी लेकिन
1:20:59
तुम जैसी नहीं देखी। तुम मुझसे मांगना चाहो वो मांग लीजिए।
तो गजमोतनी कहने लगी
1:21:06
कि बहन तीन वचन दे दीजिए। तो उस धोबी की लड़की ने तीन वचन
दे दिए और गजमोतनी ने
1:21:14
उससे उस गधे को मांग लिया कि देखिए बहन मेरे पास ज्यादा
सामान है और इसे ढोने के
1:21:21
लिए लादने के लिए इस गधे को दे दीजिए। तो वह एक लड़की धोबी
की उस गधे को गजमोतनी को
1:21:30
दे देती है। श्रोताओं गजमोतनी उस गधे को लेकर के बकरा को और
तोता को
1:21:37
लेकर के चल देती है। ले आती है तीनों को आ जाती है बंगाले
के उसी मेड़े पर जहां उसकी
1:21:44
फौज पड़ी हुई है। उससे कुछ दूर तीनों को खड़ा किया। पिंजरा
रख दिया। गधे को खड़ा
1:21:53
कर दिया और मनसुख लाखा दादा जो बकरा बने हुए थे उसको खड़ा
1:21:59
कर दिया। रानी ने अभंत्रित किया मंत्र से मंत्र को और
अभमंत्रित करके जल के छींटे
1:22:07
तीनों पर मारे तो तीनों की तीनों अपने पूर्व रूप में आ गई
और तीनों की तीनों जब
1:22:14
पूर्व रूप में आए तो गजमोतनी से हाथ जोड़कर निवेदन करने लगी
कि रानी आज तैने
1:22:21
हमको बचा लिया अन्यथा इस बंगाले में तो हमारा कोई पता ही
नहीं चलता तो रानी कहने
1:22:27
लगी कि यही बात तो मैं कह रही थी तुमसे से कि तुमने केवल
तलवार चलाई है। तुम जादू
1:22:33
नहीं जानते। तुम तो केवल मारकाट जानते हो। इसलिए मैं
तुम्हारे साथ चलने की कह रही
1:22:39
थी। परंतु अब मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊंगी। मैं वापस
नरवरगढ़ जा रही हूं। तो
1:22:45
तीनों की तीनों गजमतनी से कहते हैं कि यदि तुम हमारे साथ
नहीं चली तो हम माता-पिता
1:22:52
की जेल नहीं छुड़ा पाएंगे। श्रोताओं गजमोतनी से तीनों चलने
का आग्रह करते हैं।
1:22:59
मनाते हैं गजमोतनी को। गजमोतनी तैयार हो जाती है कि ठीक है
मैं तो तुम्हारी
1:23:05
परीक्षा ले रही थी। तुम तो मुझे ले जाना नहीं चाहते थे। अब
देखिए श्रोताओं गजमोतनी
1:23:12
तीनों को वापस अपने मूल रूप में ले आई। और वहीं बंगाल के
बॉर्डर पर उनकी सेना पड़ी
1:23:18
हुई है।
15.
गजमोतनी उन चारों से कह तीनों से कहने लगी कि देखिए अब
बंगाले
0:08
का बॉर्डर यहां से आरंभ हो रहा है। बंगाला देश प्रारंभ हो
रहा है और मैं आपके साथ
0:14
यदि नहीं चली तो आप कभी भी कंपिलगढ़ को नहीं जीत सकते। तो
मनसुख कहने लगा यार नल
0:21
भाभी बात तो सही कह रही है। यदि हम भाभी को साथ ना ले चलें
तो बताइए हम जादू में
0:28
तो कुछ जानते ही नहीं है। हमने तो केवल तलवार चलाई है। हम
तो लठ चला सकते हैं
0:34
लेकिन जादू नहीं चला सकते। तो लाखा दादा मंसू गुर्जर और नल
बेमन से गजमोतनी को
0:42
चलने के लिए बोल देते हैं कि गजमोतनी चलिए कोई बात नहीं है
तू भी हमारे साथ चल तो
0:49
गजमोतनी उनसे कहने लगी कि मैं साथ तो चल रही हूं परंतु तब
चलूंगी जब आप मेरा आदेश
0:56
मानेंगे इस सेना की सुप्रीम कमांडर मैं हूंगी मेरे नेतृत्व
में सेना चलेगी तो
1:03
राजा न और मंसुख गुर्जर कहने लगे कि फिर हमारे दोबारा क्या
होगा कि आप मेरे
1:09
निर्देशन में ही चलेंगे और यदि आपने जहां अपनी बात चलाई तो
वहीं आपकी पराजय निश्चित
1:15
है। देखिए श्रोताओं राजा नल और मंसुख गुर्जर दोनों गजमोतनी
को सुप्रीम कमांडर
1:23
अपनी फौज का घोषित कर देते हैं। और गजमोतनी अपनी फौज को कम
पिलगढ़ की तरफ कूच
1:31
करने का आदेश दे देती है। श्रोताओं गजमोतनी के आदेश अनुसार
नरवरगढ़ के वीर
1:39
सैनिक नरवरगढ़ के नर बच्चा चल देते हैं कंपिलगढ़ पर आक्रमण
करने के लिए। एक से एक
1:46
बलवान, एक से एक
पराक्रमी और एक से एक बढ़कर योद्धा कंपिलगढ़ की तरफ आक्रमण करने
1:54
के लिए बढ़े जा रहे हैं। श्रोताओं लगातार सेना ने अपना
प्रस्थान जारी रखा। चलना
2:03
जारी रखा और 10 दिन का सफर
करके सेना कंपिलगढ़ के मेड़ों पर पहुंच जाती है। जब
2:10
कंपिलगढ़ की सीमा आ गई तो गजमोतनी ने आदेश दिया कि सेना को
यहीं रोक दिया जाए।
2:17
सेनापतियों ने गजमोतनी के आदेशानुसार अपनी-अपनी सैनिक
टुकड़ियों को वहीं रोक
2:24
दिया। उनके लिए शिविर लगा दिए गए। रहने की व्यवस्था कर दी
गई। अब देखिए चारों
2:31
सुप्रीम कमांडर गजमोतनी राजानल मनसुख और
2:36
लाखा ब्राह्मण एक शिविर में बैठकर के विचार विमर्श कर रहे
हैं कि पहले हमें आगे
2:44
की रणनीति तय करनी है और कंपिलगढ़ की सीमा कंपिलगढ़ शहर तक
जाकर के देखनी है तो ये
2:51
सोच कर के तीनों चारों की चारों चल देते हैं कंपिलगढ़ की
सीमा की तरफ श्रो
2:59
श्रोताओं जब कंपिलगढ़ की सीमा पर आए तो वहां पर गजमोतनी को
एक बोर्ड पर लिखा हुआ
3:06
दिखाई दिया। कंपिलगढ़ के राजा ने जो कंपिलगढ़ शहर की सीमा
थी उसको माता काली
3:14
की आन लगा के अभिमंत्रित कर दिया था कि जो भी कोई नरवर से
आएगा और इस सीमा में पैर
3:21
रखेगा पैर रखते ही अंधा हो जाएगा। अब देखिए जब उस शिलालेख
को उस बोर्ड को मनसुख
3:31
ने और नल ने पढ़ा तो नल हंसने लगा कि ये कंपलगढ़ का राजा
हमें मूर्ख समझ रहा है कि
3:37
हम डर से भाग जाएंगे। क्या लिख रखा है कि सीमा में प्रवेश
करते ही अंधे हो जाएंगे।
3:43
तो गजमतनी बोली ठहरिए महाराज यह सही बात है।
3:48
यह उसकी आन लगी हुई है। वो महाकाली का भक्त है और महाकाली
उसके साथ 24ों घंटे
3:55
रहती है। उसके आदेश में चलती है। उसके साथ युद्ध करती है।
तो राजा नल कहने लगा कि
4:02
गजमोतनी तू जितनी हिम्मत वाली है उतनी डरपोक भी है। नारी
हमेशा डरपोक होती है। हम
4:10
क्षत्रिय हैं। और इस तरीके से यदि डरे तो हम माता-पिता की
जेल कैसे छुड़ा पाएंगे?
4:16
हम देखते हैं क्या है इस सीमा में। गजमोतनी रोकने का प्रयास
करती है श्रोताओं
4:22
जब तक तीनों मनसुख, लाखा दादा और
नल राजा उस सीमा में प्रवेश कर जाते हैं।
4:29
मैं अन्नी हो गई। मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। मैं भी
अंधा हो गया हूं। कोई मायावी शक्ति
4:35
है तो सबको अंधा कर रही है। और जैसे ही सीमा में प्रवेश
किया तो तो
4:40
तीनों के तीनों अंधे हो गए। नेत्र विहीन हो गए। दिखना बंद
हो गया और गजमोतनी मन
4:47
में विचार करने लगी कि चलो अब इनको थोड़ी सजा देती हूं।
इनको इस बात का दंड मिलना
4:53
चाहिए। तो गजमतनी वहां से कुछ दूरी पर जाकर के खड़ी हो जाती
है। और उनका हालचाल
4:59
देख रही है कि अब ये क्या करेंगे। श्रोताओं तीनों की तीनों
एक दूसरे को
5:06
पुकारते हैं कि गजमोतनी कहां है? गजमतनी ही हमें बचा सकती है। परंतु गजमोतनी नहीं
5:14
बोल रही है। नल ने गजमोतनी को पुकारा लेकिन गजमोतनी नहीं
बोली। लाखा दादा ने
5:21
आवाज लगाई लेकिन गजमोतनी नहीं बोली। मनसु गुर्जूर ने आवाज
लगाई लेकिन गजमोतनी नहीं
5:26
बोली। तब राजा नल ने गजमोतनी को आन दिलाई कि तुझे तेरे पति
की सौगंध है यदि तू नहीं
5:34
बोले तो तो गजमोतनी कहने लगी कि राजन महाराज मैंने आपसे
पहले ही मना किया था कि
5:41
यदि आप इस सीमा में प्रवेश करेंगे तो अंधे हो जाएंगे। ये
फूल सिंह पंजाबी कोई
5:48
छोटा-मोटा नरेश नहीं है। यह महापराक्रमी राजा है। इसकी
तलवार का लोहा बामन गढ़ों
5:55
के राजा मान चुके हैं। और तुमने इस राजा को छोटा राजा समझ
लिया।
6:01
मैं देखती हूं इस सीमा से बाहर निकलिए। तीनों को गजमोतनी ने
आवाज देकर के अपनी
6:07
तरफ बुलाया। आवाज की तरफ तीनों चलने लगे। और जब उस सीमा से
बाहर आए तो गजमोत्नी ने
6:14
तीनों को एक स्थान पर बैठाया और एक लोटे में जल लिया। जल को
लेकर के माता काली का
6:24
नेत्र दो नेत्र ज्योति वाला मंत्र पढ़ा और नेत्र ज्योति का
मंत्र पढ़कर के जल के
6:31
छींटे तीनों में मारे और जैसे ही जल के छींटे दिए तो तीनों
को दिखने लग गया।
6:37
तीनों के नेत्र खुल गए। अब तो तीनों की तीनों घबरा गए।
गजमतनी से कहने लगे कि
6:44
गजमतनी तो ये कंपेलगढ़ कैसे जीता जाएगा? गजमोतनी बोली कि ऐसे आप कंपिलगढ़ को नहीं जीत
6:51
सकते। कंपिलगढ़ को तब जीत सकते हैं जब आप मेरे आदेश में
चलेंगे। और यदि आपने मेरे
6:58
आदेश को जहां ठुकराया उसी स्थान पर आपकी हार निश्चित है।
मनसुक कहने लगा देख भाई
7:05
नल जादू से हमारी पेश नहीं पड़ती है। अब तो हमें भाभी का
आदेश मानना ही पड़ेगा। नल
7:13
कहने लगा ठीक है कोई बात नहीं है हम अब इसी को सुप्रीम
कमांडर घोषित करते हैं और
7:20
इसी का आदेश मानेंगे। श्रोताओं तीनों मनसुख लाखा दादा और नल
को गजमोतनी
7:27
वहीं छोड़ देती है और उस सीमा पर जाती है जहां वो सीमा
अभिमंत्रित थी। सीमा पर जाकर
7:34
के ध्यान लगाया। अपने वीरों को बुलाया और वीरों से कहने लगी
कि देखो यह सीमा किस
7:42
तरीके से किस देवता की आन से बंधी हुई है मुझे बताइए। वीरों
ने ध्यान लगा के देखा।
7:49
उसकी खोज की तो देखा पूर्व दिशा में माता चंडी का मंदिर बना
हुआ है। माता काली का
7:57
मंदिर है और उस मंदिर में माता काली जो कि फूल सिंह पंजाबी
के साथ युद्ध करती है। उस
8:06
मंदिर में विराजमान है। यक्षों ने जो वीर थे, उन्होंने गजमतनी से कहा कि देखिए
8:14
गजमोतनी तुम्हें यहां से पश्चिम पूर्व दिशा की तरफ चलना है
और माता काली का मंदिर है। उस
8:21
काली को प्रसन्न कीजिए और तब यह आन हटेगी। श्रोताओं गजमोतनी
8:27
राजा नल और मनसुख को साथ में लेकर के उस काली के मंदिर में
चली जाती है। काली के
8:35
मंदिर में गजमोतनी ने आसन लगा लिया। और ध्यान लगा के बैठ
जाती है। तभी जब काफी
8:42
समय हो गया तो महाकाली गजमोतनी पर प्रसन्न हुई। कहने लगी
पुत्री
8:49
वर मांगो क्या मांगना चाहती हो कि माता मैंने जन्म से तेरी
पूजा की है। मैं तेरी
8:56
भक्त हूं और मेरे पति ने भी तेरी पूजा की है। मेरे पति का
तो जन्म ही कराया था। फिर
9:04
इस कंपिलगढ़ में भी इस तरीके से पराजय तो चंडिका कहने लगी
कि बेटी मैं तुझे
9:11
अभिमंत्रित करके जल देती हूं इसे ले जा और ले जाकर के कम
पिलगढ़ की सीमा पर छिड़क
9:17
देना और जो राजा ने आन लगा रखी है वह आन उसी समय समाप्त हो
जाएगी श्रोताओं माता
9:24
देवी ने एक लोटे में जल अभंत्रित करके गजमोतनी को दे दिया
और गजमोतनी ने उस जल
9:32
के छींटे कंपिलगढ़ की सीमा पर डलवा दिए। चारों तरफ
9:38
छींटे मरवा दिए और यक्षों को वो जल दे दिया कि इसे कंपिलगढ़
पर छिड़क दिया जाए।
9:44
श्रोताओं संपूर्ण कंपिलगढ़ की सीमा पर उस जल के छींटे दे
दिए और वह जो आन थी वो आन
9:50
टूट गई। अब देखिए शाम का वक्त हो गया। सब के सब राजा नल
मनसुख और लाखा दादा एक
10:00
तंबू में बैठकर के विचार कर रहे हैं। गजमोतनी कहने लगी कि
देखिए अब मैं रात्रि का समय
10:09
है। मैं मेरे शरीर को छोड़ना जानती हूं। मैं योग विद्या
जानती हूं। और योग विद्या
10:16
से मेरा जो हंस है, मेरा जो जीव
है, मैं उसे इस शरीर से निकालती हूं। और इस शरीर
10:23
से निकाल करके कंपिलिगढ़ जा रही है। और कंपिलगढ़ की स्थिति
का जायजा लेकर के आती
10:29
हूं। वहां की सैनिक व्यवस्था क्या है? राजा की कमजोरियां क्या है? और मेरा आपको
10:35
तीन पहर इंतजार करना होगा। नल कहने लगा कि देख यदि तीन पहर
में नहीं आई तो कि फिर
10:42
तुम समझ लेना कि मैं मर चुकी हूं। परंतु तीन पहर तक मेरे
शरीर पर कोई भी मक्खी
10:47
नहीं बैठ जानी चाहिए। यह मेरे शरीर की आपको हवा करनी है।
मेरे
10:53
शरीर पर पंखा झोलना है। श्रोताओं गजमोतनी राजा नल और मनसुख
गुर्जर को अपने शरीर की
11:01
सुरक्षा में लगा के योग विद्या से अपने प्राणों को निकाल
देती है शरीर से और एक
11:09
चेल का रूप धारण करती है और चेल का रूप धारण करके कंपेलगढ़
में घूम रही है। देख
11:15
रही है कंपिलगढ़ की सैनिक व्यवस्था को। चप्पे-चप्पे पर
सैनिक। किले की जो
11:21
व्यवस्था है बड़ी दुरुस्त है। किले पर केवल एक साइड में
दरवाजा है, स्थल है।
11:29
तीनों तरफ किले के गहरी खाई है। खाई में जल है और अंधकार
है। किले को जीतना आसान
11:38
नहीं है। और एक दरवाजे पर सुसज्जित सेना लगी हुई है।
गजमुखतनी ने सोचा कि चलो किले
11:46
को तो मैंने देख लिया। पर मेरी सास को देखती हूं कहां है।
गजमोतनी ने
11:52
आभासी रूप धारण किया। आभासी रूप जानते हैं छद्म रूप धारण
किया गजमोतनी का और जहां
11:58
उसकी सांस छत पर काग उड़ा रही थी उसके पास पहुंच जाती है।
गजमोतनी ने मंजा को देखकर
12:07
के उसके चरण स्पर्श किए। मंजा ने गजमोतनी को पहचान लिया और
मंजा रोने लगी कि बेटी
12:14
मेरा बुढ़ापा इसकी कैद में कट रहा है। मैंने तो ही के बरे
में एक शेर को जन्म
12:20
दिया था। मैं तो सोच रही थी कि मेरा पुत्र आएगा और मेरा ये
जो कैद है मेरी ये जेल है
12:27
इसे छुड़ाएगा। तो गजमोतनी कहने लगी कि माता आप चिंता ना
करें। हमारी सेनाओं ने
12:34
कंपिलगढ़ को घेर रखा है। कंपिलगढ़ की सीमाओं पर डेरा डाले
हुए हैं हमारी सेना
12:39
और बहुत जल्दी ही हम कंपिलगढ़ पर आक्रमण करने वाले हैं।
श्रोताओं
12:46
मंझा को समझाने के बाद गजमोतनी अपने ससुर को देखने जाती है
और देखती है कि राजा
12:53
प्रथम ने एक कंबल का वस्त्र पहन रखा है। और राजा के
13:00
हाथ में चाकी का हथेला लगा हुआ है और दो पहरेदार खड़े हुए
हैं। राजा से जब चाखी का
13:06
हथेला छूटता है तो राजा के पीठ पर बांसों की मार लगाते हैं।
राजा व्याकुल हो रहा
13:13
है। गजमुखतनी देख के रोने लग जाती है। परंतु व्यवस्था है कि
वो उनसे मिल नहीं
13:20
पाती है। क्योंकि वो पहरेदार राजा प्रथम का पहरा दे रहे
हैं। श्रोताओं
13:26
इधर तीन घंटे का जो तीन घड़ी का समय था, तीन पहर का समय था वो समाप्त हो गया। अब
13:33
तो नल और मनसुख रोने लगे कि ये क्या हुआ? ये तो गजमोतनी भी समाप्त हो गई। ये कैसी
13:40
लड़ाई जीती हमने? हम इस
कंपेलगढ़ को कभी भी फतेह नहीं कर सकते। रो रहे हैं दोनों
13:47
भाई और लाखा ब्राह्मण। तो गजमोतनी ने तब तक उस शहर की
स्थिति का
13:53
संपूर्ण जायजा ले लिया। उसके जो गुप्त स्थान थे, कमजोरियां थी, सैनिक
चौकियां
13:59
थी, सबका विश्लेषण कर लिया और विश्लेषण करने के बाद
गजमोतनी आ जाती है अपने शरीर
14:06
में। और जैसे ही शरीर में गजमतनी ने प्रवेश किया, तो नल और मनसुख की आंखों से
14:12
आंसुओं की झड़ी लग गई। नल कहने लगा, हम तो समझ गए थे कि मोतनी भी मर चुकी है। तो
14:19
मोतनी कहने लगी कि ऐसे नहीं मरने वाली मैं। तुम चिंता मत
कीजिए। अब हम अवश्य ही
14:25
कंपिलगढ़ को जीत कर चलेंगे। माता-पिता की जेल छुड़ानी है।
परंतु ऐसे माता-पिता की
14:33
जेल नहीं छुड़ा सकते। नल बोले नल कहने लगा तो कैसे छूटेगी? कि अब तुम्हें मेरे
14:38
आदेशानुसार काम करना होगा। क्योंकि इस राजा की जो लड़की है
उस पर
14:45
जादू का पिटारा है सरवती पर और उस जादू के पिटारे को उससे
हमें लेकर के आना है। जब
14:53
तक वो जादू का पिटारा सरवती के पास है हम कभी भी कंपिलगढ़
को फतेह नहीं कर सकते।
14:59
तलवार से तो हम जीत लेंगे लेकिन जादू उसके पास बहुत बड़ा
है। तो नल कहने लगा जादू का
15:06
क्या उपाय है? कि बस जो मैं
कहती जाऊं वो तुम करते जाओ। तो मेरे साथ चलो नट का वेश
15:13
धारण करो और राजा फूल सिंह के दरबार में खेल का आयोजन
करेंगे। नल कहने लगा कि मैं
15:20
कोई नट नहीं बनना चाहता। तो गजमोतनी कहने लगी नट नहीं बनना
चाहते तो ठीक है।
15:28
माता-पिताओं की जेल भी नहीं छूटेगी। मनसुख कहने लगा भाई नल
नट बनने में कोई दिक्कत
15:35
नहीं है। इसकी बात माननी पड़ेगी। जैसे यह कहेगी वैसे ही
करना पड़ेगा। तभी माता-पिता
15:41
की जेल छूटेगी। तो श्रोताओं नर और मनसुख दोनों को गजमोतनी
ने सिर मुड़वा के नट बना
15:49
दिया। नट का बाना बना दिया और स्वयं नटनी बन गई।
15:54
नल को और मनसुख को लेकर के मनसुख ढोल बजाता हुआ जा रहा है
और गजमोतनी उनके पीछे
16:02
पीछे नाच गायन करती हुई चली जा रही है और कंपिलगढ़ शहर में
प्रवेश कर जाते हैं।
16:09
कंपिलगढ़ का एक चौराहा देखा और उस चौराहे पर उन्होंने खेल
करना आरंभ कर दिया। जब
16:15
भीड़भाड़ इकट्ठी हुई तो वहां नजदीक ही राजमहल था। राजा का
एक सेनापति वहां से
16:22
निकल रहा था। सेनापति ने नट और नटनी को देखा तो महाराज फूल
सिंह के दरबार में
16:30
पहुंच गया और कहने लगा कि राजन मैंने इतने सुंदर नट और नटनी
देखे हैं कि जिनका वर्णन
16:38
मैं नहीं कर सकता। और जो नटनी को यदि आप देख लेंगे तो आपके
महल में भी कोई रानी
16:44
उसके समान सुंदर नहीं है। महाराज उन नटों को तो पीट दीजिए
और नटनी को छीन लीजिए और
16:52
अपनी रानी बना लीजिए। फूल सिंह पंजाबी कामासक्त और कामी
नरेश तो था ही। कहने लगा
16:59
जाओ और उन्हें दरबार में बुला के लाओ। अब देखिए श्रोताओं
फूल सिंह पंजाबी ने अपने
17:06
एक सैनिक को नट और नटनी को बुलाने के लिए भेज दिया। राजा नल
और मंसुख को बुलाने के
17:13
लिए भेज दिया। उस राजा के सैनिक ने उनसे कहा कि नटो तुम्हें
महाराज फूल सिंह ने
17:20
याद किया है। महाराज के दरबार में खेल का आयोजन करो। महाराज
ने आपको बुलाया है। नल
17:27
कहने लगा ठीक है भाई हमें तो खेल करना है महाराज के दरबार
में कर देंगे। महाराज की
17:33
जैसी आज्ञा तीनों की तीनों चल देते हैं महाराज के दरबार
में। फूलसेन के दरबार में
17:40
तीनों पहुंच गए और जाकर के राजा को प्रणाम किया। तो राजा
कहने लगा नटो कहां के रहने
17:48
वाले हो? कि महाराज हम
बुलंद शहर के रहने वाले हैं।
17:54
हम कला में प्रवीण हैं और हम आपके दरबार में यदि आपकी
अनुमति हो तो खेल का आयोजन
18:01
कर दें। राजा कहने लगा कि ये तो मैं ही चाह रहा था। मैंने
तुम्हें इसीलिए तो
18:06
बुलवाया है कि तुम मेरे दरबार में खेल करो। तुम कैसा खेल
करते हैं कि महाराज आप
18:14
देखिए हम बहुत शानदार खेल आपके दरबार में करेंगे।
18:20
श्रोताओं नल की बात सुनकर के फूल सिंह पंजाबी
18:25
उन्हें अनुमति दे देते हैं कि खेल आरंभ किया जाए। मनसुख ने
ढोल ले लिया। ढोल को
18:32
बजा रहा है। और गजमोतनी नीचे खड़ी हुई है। और गजमोतनी ने
18:40
एक बांस गढ़वाया। बांस को गढ़वा करके एक कच्चा धागा लिया।
कच्चा सूत लिया और कच्चे
18:46
सूत को अंतरिक्ष में फेंक दिया। कच्चासूत अंतरिक्ष में खड़ा
हो गया
18:52
क्योंकि गजमतनी के पास तो आठ वीर थे। उन वीरों को दे दिया
था कि इसको ले जाओ
18:58
अंतरिक्ष में। अंतरिक्ष में उस धागे को वीरों ने पकड़ लिया।
राजा नल से गजमतनी
19:05
कहने लगी कि हे महाराज नट आप चढ़ जाइए इस धागे पर।
19:10
फूल सिंह पंजाबी देखने लगा कि ये कच्चा धागा है और इस पर ये
नट चढ़ जाएगा क्या?
19:16
श्रोताओं नल देवी माता का भक्त था। देवी 24ों घंटे राजा नल के साथ रहती थी। नल ने
19:24
माता देवी का स्मरण किया और उस कच्चे सूत को पकड़ कर के ऊपर
चढ़ गया। उसको तो माता
19:31
भवानी ले जा रही थी ऊपर। माता देवी नल को ऊपर ले गई। और
अंतरिक्ष में पहुंच गया नल।
19:39
और नीचे से मनसुक आवाज लगा रहा है कि नट आप कहां है? कुछ देर तक तो आवाज आई लेकिन
19:47
आवाज का आना भी बंद हो गया। अब देखिए गजमोतनी का जादू था और
नल देवी का भक्त
19:56
था। तो नल ने माता देवी का अंतरिक्ष में स्मरण किया और देवी
प्रकट हो गई और देवी
20:02
से कहा कि माता आप मेरा मायावी शरीर बनाओ। तो देवी ने नल का
मायावी शरीर बनाया और
20:10
ऊपर अंतरिक्ष से जहां से दिखाई ना दे उतनी ऊंचाई से नल का
एक पैर काट करके नीचे डाल
20:16
दिया। कुछ देर बाद नल का दूसरा पैर नीचे डाल दिया। कुछ देर
बाद नल का तीस एक हाथ
20:24
डाल दिया। और नल तो माता देवी की गोद में बैठा हुआ है।
20:30
राजा फूल सिंह मन में विचार करने लगा कि ये क्या हो रहा है? और गजमतनी रोने लगी कि
20:37
मेरा पति अंतरिक्ष में मर गया। किसी ने मेरे मंत्र को काट
दिया। किसी ने मेरा
20:43
जादू नष्ट कर दिया। अब तो फूल सिंह पंजाबी और उसकी पुत्री
भी देखने लगे कि ये कैसा
20:50
जादू है? ये कैसे नट
हैं? ऐसे नट तो हमने पहली बार ही देखे हैं। गजबतनी विलाप
कर
20:57
रही है और नल की भुजा, धड़ और शीश
कट कट करके जमीन पर आ रहे हैं। कुछ देर में ही
21:04
नल का पूरा शरीर कट करके जमीन पर आ गया। अब तो गजमतनी रोने
लगी और मनसुख से कहने
21:11
लगी कि मुझे यहीं इसी सभा में एक चिता बनाओ और मुझे सती करा
दीजिए। श्रोताओं फूल
21:18
सिंह पंजाबी ने आननफानन में लकड़ियों का प्रबंध किया। और
गजमोतनी को वही चिता बना के सती करा
21:27
दिया। और जब गजमोतनी सती हो गई तो उसके एक
21:32
घंटे बाद स्वयं नल उस धागे से उतर कर के नीचे आ रहा
21:37
है। और नल धागे से उतर कर के नीचे आ गया। और जब नीचे आया तो
फूल सिंह उसकी से उसकी
21:46
सेना उसका दरबार अचंभित हो गया कि हमने तो इस नट के हाथ पैर
शीश मुंह सब जला दिए। ये
21:55
कैसे जीवित हो गया? नल ने मनसुख
से पूछा कि भाई हमारी नटनी कहां है? तो मनसुख
कहने
22:03
लगा कि इस फूल सिंह ने अपने महल में छिपा दिया है बलपूर्वक।
नल कहने लगा कि महाराज आप तो राजा हैं और
22:11
हम नट हैं। हमारी नटनी को आपने महल में क्यों छिपा लिया? तो फूल सिंह कहने लगा कि
22:17
देखिए नट झूठ क्यों बोल रहे हो? तुमने तुम्हारे हाथों से उस नटनी को शक्ति करा
22:25
दिया था। जबकि श्रोताओं शक्ति कराते समय भी गजमोतनी के पास
वीर थे आठ। और जैसे ही
22:33
उसने अग्नि लगाई थी तो गजमोतनी को उठाकर ले गए और फूल सिंह
के महल में आराम से
22:39
छोड़ दिया। तो नल कहने लगा कि महाराज फूल सिंह मेरी
22:46
नटनी आपके महल में है। फूल सिंह कहने लगा कि भाई ऐसा नहीं
है। मैंने सती करा दिया।
22:52
मनसुख कहने लगा कि नहीं भाई इन्होंने बलपूर्वक नटनी को महल
में दबका लिया है।
22:57
नल कहने लगा मैं आवाज लगाता हूं। तो फूल सिंह कहने लगा आवाज
लगाइए। तो राजा नल्ले
23:04
जैसे ही नटनी को आवाज लगाई जब आवाज लगी तो नटनी उस महल से
निकल कर के
23:11
आ रही थी और जब ये फूल सिंह ने देखा तो फूल सिंह हड़बहड़ा
गया। फूल सिंह कहने लगा
23:18
कि ये कैसे नट हैं? इन्होंने ये क्या खेल किया? और तीनों के
तीनों वहां इकट्ठे हो
23:24
जाते हैं। अब तो फूल सिंह घबरा जाता है। फूल सिंह
23:29
कहने लगा कि नटो ये क्या विद्या थी कि महाराज बस यही तो
हमारा खेल था। फूल सिंह
23:36
पंजाबी उन नटों पर प्रसन्न हो जाता है और उनसे कहने लगा कि
जो तुम मांगना चाहो यदि
23:42
आज मेरा राज्य भी मांगोगे तो मैं राज्य भी दे दूंगा। तो नल
कहने लगा कि महाराज आप तीन वचन दे
23:51
दीजिए। तो फूल सिंह पंजाबी नल और मनसुख को नहीं पहचान पाता
है और तीन
23:58
वचन दे देता है। तो नल कहने लगा कि महाराज जो जादू का
पिटारा आपकी पुत्री सरवती के
24:06
पास है उसे दे दिया जाए। महाराज हम नट हैं और खेल करते
डोलते हैं। बस उससे और कुछ
24:13
बड़ा खेल करेंगे ताकि हमें कुछ मिल जाए। तो राजा फूल सिंह
कहने लगा चलो तुमने बहुत
24:20
बड़ी चीज मांगी है। परंतु मैं वचनबद्ध हूं। मैं आपको वचन दे
चुका हूं। मैं आपको
24:25
एक जादू का पिटारा प्रदान करता हूं। श्रोता उस सरबति से वह
जादू का पिटारा
24:31
लेकर के फूल सिंह ने राजा नलकोर गजमोतनी को सौंप दिया। और
वो तीनों मनसुख, नल और
24:41
गजमोतनी नट भेष में उसकी सीमा से कंपिलगढ़ की सीमा
24:46
से बाहर निकल जाते हैं। चले जाते हैं महाराज फूल सिंह को
प्रणाम करके और आ जाते
24:52
कंपिलगढ़ की सीमा पर और जब कंपिलगढ़ की सीमा पर आ गए तो
राजा नल ने अपना एक पत्र
25:00
वाहक बुलाया एक दूत बुलाया और दूत को बुला के एक चिट्ठी
लिखी और चिट्ठी लिख के उसमें
25:08
लिख दिया कि मूर्ख फूल सिंह सावधान हो जा तुझे मारने के लिए
मंझ रानी और राजा प्रथम
25:17
शेर तेरी सीमाओं पर सेना के साथ खड़ा हुआ है और कल प्रातः
काल और कल प्रातः काल
25:26
युद्ध आरंभ कर दिया जाएगा। श्रोताओं जब वो पत्रवाहक उस पत्र
को लेकर के फूल
25:35
सिंह के दरबार में पहुंचा और पत्र को फूल सिंह के सामने
प्रस्तुत किया तो फूल सिंह
25:42
ने उस पत्र को पढ़कर के कहा कि मेरा दुश्मन आ चुका है।
मुझसे युद्ध करने के
25:49
लिए उसकी मृत्यु नजदीक आ गई है। परंतु देखिए श्रोताओं फूल
सिंह यह भूल गया था कि
25:56
उसके पास जो जादू का पिटारा था उसे तो पहले ही गजमतनी और
राजा नल ले गए थे उनसे
26:04
यह बात वो नहीं जानता था। फूल सिंह ने अपने पुत्र विजय सिंह
को बुलाया और विजय
26:10
सिंह से कहा बेटे कल युद्ध के लिए सेना को सुसज्जित करवाओ।
कल प्रातः काल ही हमें
26:18
हमारी सीमाओं पर पड़े हुए शत्रुओं पर आक्रमण करना है। एक
नरवर से चलकर के कोई
26:25
नल नामक राजा है। राजा प्रथम का पुत्र है। उसके माता-पिता
तो हमारी जेल में बंद हैं
26:31
लेकिन वो युद्ध करने के लिए आया है। उनकी कैद छुड़ाने के
लिए आया है। और कल के
26:37
युद्ध में ही उनको हम बड़ा भारी नुकसान पहुंचाएंगे। उनको
बंदी बना लेंगे।
26:44
श्रोताओं जब फूल सिंह की बात उसके पुत्र विजय सिंह ने सुनी
तो क्रोधित हो उठा।
26:51
नेत्रों को लाल कर लिया और अपने सेनापति और सैनिकों को
सुसज्जित होने का आदेश दे
26:56
दिया। सेना ने युद्ध की तैयारी कर ली और जब प्रातः काल हुआ
तो कंपिलगढ़ का जो
27:05
दुर्ग था उसका परकोटा बना हुआ था। उस परकोटे के बाहर
संपूर्ण सेनाओं के साथ फूल
27:14
सिंह, उसका पुत्र
विजय सिंह, उसके सेनापति और अन्य जो योद्धा थे वो समस्त वीर
योद्धा
27:22
युद्ध के मैदान में आ गए। उधर नरवर वाले भी युद्ध के मैदान
में पहले से ही
27:27
सुसज्जित खड़े हुए थे और इंतजार कर रहे थे कि फूल सिंह के
किले पर आक्रमण करें या फूल सिंह
27:35
किले के बाहर युद्ध करने आता है। श्रोताओं दोनों सेना
सेनाएं आमने-सामने अड़ गई।
27:41
दोनों सेनाओं में युद्ध आरंभ हो गया। तो देखिए श्रोताओं
उन्हीं की भाषा में आला की
27:48
भाषा में मैं आपको उस युद्ध का वर्णन सुना रहा हूं। और विजन
बोल दिया फूल सिंह ने
27:54
हुए नरवर के जब होशियार सुमर शारदा निज खेरी की ले सब रे
हथियार दोनों अन बराबर
28:05
मिल गई मची परस पे मारामार गुर परग और गदा
28:11
चल रही है कोता खानी चले कटार खटखट खटखट
28:16
तेगा चल रहो चल रही छपक छपक तलवार और कट कट सुर गिरे धरनी
पे बड़बड़ करे छतरी
28:26
बार डेढ़ पहर तक बजोए दुधारो भवे लगी है रक्त की धार ये गत
देखी फूल सिंह ने
28:34
नरवरिया माने हार सुमिरन करके जगदंबा को हाथी दीनो बढ़ाया गार
जहां परमंस को और नल
28:44
राजा और सेनापति वीर बलवान बाई मोर्चे पे
28:50
फके ठाड़ो कीन महा कठिन केपान ना कोई लो
28:55
उम्र को पट्टो ना जीवे कोई बरस हजार 12 बरस को पूरा जीवे और तेरे जिए सियार बरस
29:04
18 क्षत्रिय जीवे ज्यादा जीवन को धिक्कार
29:10
कबहु भागे नरवर गढ़बारे भागे कबहु पंजापी जान भजवल थक गए दो
दलन के सबके बिग गए
29:20
ओसान परी पापड़ी है होटन पे और चेहरे पे छाए गयो
29:26
रेत साझ भ ना समर भूमि को जीत गयो है किसी पे खेत बढ़त भान
फिरे दोनों दल सबने मान कर
29:37
तलवार फूल सिंह पहुंचो कम्पिलगढ़ और यो मन में करत विचार
देखिए श्रोताओं युद्ध इस
29:45
तरीके से हुआ कि दोनों पक्ष बराबर के टक्कर में आ गई। कोई
किसी को नहीं हरा
29:52
सका। फूल सिंह के साथ मां काली स्वयं युद्ध करती थी। राजा
नल फूल सिंह को
29:58
पृथ्वी पर तो डाल लेते थे, पटक लेते थे
लेकिन जैसे ही तलवार का वार करते मां
30:04
भवानी अपना खड़क अड़ा देती थी और फूल सिंह उनके वार से बच
जाता था। श्रोताओं दोनों
30:10
पक्षों का युद्ध करते-करते बुरा हाल हो गया और सूर्यास्त हो
गया। जब सूर्यास्त
30:16
हुआ तो दोनों दल अपने अपने शिविरों में चले गए। उधर फूल
सिंह अपने किले में जाकर
30:23
के विचार करने लगा कि शत्रु बड़ा प्रबल है और इसे ऐसे हरा
पाना संभव नहीं है। मुझे
30:31
मां भवानी की आराधना करनी होगी और आराधना करके कल के युद्ध
में मैं राजा नल को बंदी
30:38
बना के लाऊंगा। श्रोताओं इधर फूल सिंह मां भवानी के मंदिर
में चला जाता है और मां
30:44
भवानी की आराधना कर रहा है। मां काली की आराधना कर रहा है।
काली पर उन्होंने पुष्प
30:51
धूप दीप नैवेद्य चढ़ा के माता काली को मंत्रो उच्चारण से
प्रसन्न कर लिया। काली
30:58
प्रकट हो गई। कहने लगी बोल बेटे कैसे बुलाई कि माता तुम
जानती हो मेरी सीमाओं
31:04
पर प्रबल शत्रु खड़ा हुआ है। शत्रु बड़ा बलशाली दिखाई देता
है। दो लाख की फौज के
31:10
साथ उसने आक्रमण किया है। तो माता कल के युद्ध में मैं
शत्रु को बंदी बना लाऊं। तो
31:17
मां काली प्रसन्न होकर कहने लगी बेटे तथास्तु जाओ कल के
युद्ध का जो सेनापति
31:23
होगा वो तुम्हारा बंधक होगा। अब देखिए श्रोताओं फूल सिंह
पंजाबी तो
31:28
अपनी माता काली से वरदान लेकर के लौट जाता है अपने महल को।
इधर राजा नल गजमतनी लाखा
31:38
दादा और मनसुख गुर्जर चारों के चारों मन में विचार कर रहे
हैं कि कल का युद्ध इस
31:44
तरीके से नहीं लड़ेंगे। क्योंकि हमारी सेना एक साथ जब युद्ध
में झोंकी जाती है,
31:51
युद्ध में लड़ाई जाती है तो सैनिक परेशान हो जाते हैं। सेना
को चार टुकड़ियों में विभाजित किया जाए। 50-50 हजार की चार
31:59
टुकड़ियां निर्धारित कर ली गई और दो टुकड़ी आराम करेंगी और
दो टुकड़ी युद्ध
32:04
करेंगी और कल का सेनापति वह होगा जो फूल सिंह को बंदी बना
के लाएगा। देखिए
32:11
श्रोताओं बीड़ा डलवा दिया महाराज नल ने और गजमोतनी ने। अब
बीड़ा को खाने के लिए नल के
32:20
दरबार में जवानों की कमी नहीं थी। परंतु फूल सिंह से सब
डरते थे। फूल सिंह के साथ
32:27
मां भवानी लड़ती थी। तो मनसुख ने विचार किया। मनसुख कहने
लगा मित्र मैं निभाऊंगा
32:34
मित्रता। और मैं कल फूल सिंह को बंदी बना के लाऊंगा। कल्कि
सेना का प्रधान सेनापति
32:40
मैं होना चाहिए। मनसुक ने बीड़ा चबा लिया। पान को उठा के खा
गई। गजमतनी कहने लगी
32:49
देवर जी आपके साथ युद्ध भूमि में मुझे भी चलना होगा। तो
मनसुख कहने लगा नहीं भाभी
32:56
मैं तुम्हें युद्ध भूमि में नहीं ले जाऊंगा कि नहीं तुम
नहीं जानते। फूल सिंह
33:02
के साथ मां काली लड़ती है। उसके साथ हमने उसका जादू का
पिटारा ही तो लिया है। उसके
33:08
पास चार वीर हैं। उनको रोकना आसान नहीं है। इसलिए कल मैं
आपके साथ मर्दाने भेष
33:14
में चलूंगी। श्रोताओं दूसरा दिन हुआ तो इधर तो सेना का
प्रधान सेनापति
33:22
मनसुख गुर्जर को बना दिया गया। और उधर स्वयं फूल सिंह
पंजाबी अपने हाथी के ओदे
33:31
पर सवार होकर के युद्ध भूमि के लिए निकल पड़ा। श्रोताओं
मनसुख गुर्जर और रानी
33:38
गजमोतनी भी दोनों एक साथ युद्ध भूमि में चले जाते हैं।
युद्ध आरंभ हो गया। दोनों
33:45
सेनाएं आमने सामने आ गई। फूल सिंह का पुत्र विजय सिंह युद्ध
भूमि
33:50
में आगे बढ़ा और आगे जैसे ही वह पुत्र आगे बढ़ा तो देखिए
श्रोताओं मनसुख कोई
33:56
छोटा-मोटा योद्धा नहीं था। मनसुख महापराक्रमी था। मनसुख ने
आगे बढ़कर के
34:03
विजय सिंह पर वार किया। और विजय सिंह भी बड़ा रणब था। वार
को बचा लिया और तेगा
34:11
धरणी पर गिरा। दोनों में मल युद्ध आरंभ हो गया। अब देखिए
श्रोताओं जब गजमतनी ने देखा
34:18
कि यह बहुत उचित अवसर है तो उन्होंने अपने चार वीरों का
आक्रमण विजय सिंह पर करा
34:25
दिया और जैसे ही चार वीरों ने आक्रमण किया विजय सिंह पर तो
विजय सिंह धरनी पर गिर
34:30
गया और मौका मिलते ही मनसुख ने उसका सर धड़ से अलग कर दिया
फूल सिंह पंजाबी का
34:36
पुत्र दूसरे दिन के युद्ध में मारा गया अब देखो श्रोताओं से
में भगदड़ मच गई कम पिल
34:44
गढ़ की सेना युद्ध भूमि छोड़कर भागने लगी। तभी फूल सिंह को
पता चला कि मेरा पुत्र
34:50
वीरगति को प्राप्त हो गया है। तो फूल सिंह क्रोधित हो उठा।
क्रोधित होकर के आगे बढ़ा
34:56
युद्ध भूमि में। सामने लाकर के अपना हाथी मनसुख के सामने
खड़ा कर दिया और कहने लगा
35:03
अरे नरवर के बच्चे तू युद्ध भूमि में मरने आ गया। आज मैं
35:09
तुझे जीता नहीं छोडूंगा। कसम है मुझे मेरी मां भवानी की।
मैं आज तुझे बंदी बना के
35:14
कंपिलगढ़ को घसीटता हुआ ले जाऊंगा। श्रोताओं जब इतनी बात
मनसुख ने सुनी तो
35:21
मनसुख ने अपना तेगा खींच लिया। तेगा खींच के प्रहार किया और
जैसे ही हाथी के ओदे पर
35:29
प्रहार किया तो हाथी के हौदे के जो रस्सा थे वो काट दिए और
वो राजा पृथ्वी पर पटक
35:35
लिया। राजा को जब पृथ्वी पर पटका तो राजा मन में विचार करने
लगा कि यह बड़ा लड़वैया
35:42
है, बड़ा योद्धा है। उसने अपने चार वीरों को याद किया।
चारों वीर एकदम से युद्ध के
35:48
मैदान में आ गए। और जब मनसुख ने देखा कि चार वीर युद्ध करने
आ रहे हैं। तो मनसुख
35:55
घबरा गया। क्योंकि मनसुख जादू नहीं जानता था। मनसुख तो
तेगाधारी था। श्रोताओं
36:01
गजमोतनी वही युद्ध के मैदान में मंसुख का साथ दे रही थी तो
गजमोतनी ने आठ वीरों को
36:07
याद किया और आठों वीरों ने उन चारों वीरों को कुछ समय में
ही कैद कर लिया और कैद
36:14
करके गजमतनी के सामने प्रस्तुत कर दिया और इधर मनसुख ने उस
महिपथ को जो भूपाल था
36:22
उसको पटक लिया पथरी पर फूल सिंह को धरनी पर डाल दिया और फूल
सिंह बेहोश हो जाता है
36:29
इधर सेना भाग जाती है कंपिलगढ़ की तो मनसुख
36:34
कहने लगा गजमोतनी से भाभी अब आप जाइए हम जीत चुके हैं मैंने
इसको बंदी बना लिया है
36:41
आप शिविर में चलिए श्रोताओं गजमोतनी शिविर में आ जाती है और
उधर जब फूल सिंह की
36:49
मूर्छा जागी तो फूल सिंह ने पुनः अपने और चार वीरों को याद
किया और मां भवानी को
36:55
याद किया मां भवानी से कहने लगा माता आपने मुझे वचन दिया था
कि कल के युद्ध में कल
37:01
का सेनापति आपका बंदी होगा। श्रोताओं मां भवानी टेगा लेकर
के मनसुख गुर्जर पर
37:09
आक्रमण कर देती है। मनसुख गुर्जर पर अदृश्य वार होने लगी।
मनसुख गुर्जर हड़बड़ा गया और फूल सिंह उसके चंगुल से
37:16
छूट गया। मां भवानी और फूल सिंह के बारों से मनसुख बेहोश हो
जाता है। मूर्छित हो
37:24
जाता है और युद्ध भूमि में गिर पड़ा। फूल सिंह ने रास्ता
निकाला और मनसुख
37:30
गुर्जर की मसक चढ़ा ली। मसक चढ़ा के हाथी के ओदे पर रखा।
बांध लिया हाथी के ओदा में
37:36
और सेना सहित विजय का धोसा बजवाते हुए कंपेलगढ़ को चला गया।
और दूसरा दिन हुआ तो
37:45
फूल सिंह ने मनसुख को दरबार में खड़ा किया और दरबार में
खड़ा करके आदेश दिया कि इसको
37:51
भासी में डाल दिया जाए। अब श्रोताओं इधर की कहानी सुनिए। जब
नल को
37:58
यह पता चला कि उसका मित्र उसका पगड़ी पलटा यार फूल सिंह
पंजाबी ने कैद करा लिया है।
38:05
तो मंझा के पास आ जाता है। तो रानी गजमोतनी के पास आ जाता
है नल। लाखा दादा
38:13
गजमोतनी और राजा नंद आपस में विचार कर रहे हैं कि
38:19
इस आता ताई की कैद से मेरे मित्र मंसुख को छुड़ाना संभव
नहीं है। यह महापराक्रमी है।
38:26
मां भवानी इसके साथ लड़ती है। इससे कैसे विजय प्राप्त की
जाए? तो गजमतनी कहने लगी
38:34
कि महाराज आप घबरा क्यों रहे हैं? आपके पास भी तो मां भवानी लड़ती है। याद
38:41
करो माता भवानी को। आसन लगा के बैठ जाइए। श्रोताओं राजान
रात्रि के समय माता भवानी
38:49
की पूजा करते हैं। मां देवी की आराधना करने लगी और आसन मार
के बैठ गया और कहने
38:56
लगा कि मातेश्वरी आप युद्ध के मैदान में आइए। मेरी रक्षा
39:02
करो। हे माता इस कंपिलगढ़ में मेरी बेइज्जती हो रही है।
मेरी पराजय हो रही
39:09
है। श्रोताओं जब राजा नल ने मां भवानी की आराधना की तो मां
भवानी प्रकट हुई। मां
39:16
भवानी कहने लगी कि नल तू बड़ा धोखेबाज है।
39:22
तुझे जहां मेरी आवश्यकता पड़ी वहां मैं तेरे सामने आई।
मैंने मुझे कहा कि माता घूमासुर दाने का
39:31
वध करा दीजिए और मैं तुझे प्रसाद चढ़ाऊंगा तुझ पर सोने का
छत्र
39:37
चढ़ाऊंगा और तुझे दो बकराओं की बलि चढ़ाऊंगा कहा था नल बोला
हां माता उसके बाद तू
39:46
पाताल लोक पहुंच गया वहां तेने मुझे स्मरण किया था कि माता
आज मेरे प्राणों की रक्षा
39:52
कर मैं तुझे दो बकराओं की बलि चढ़ाऊंगा परंतु नल तू बड़ा
बेकौली है। तेरे आज तक
40:00
मुझे मूसरी भी नहीं चढ़ाई, चूहे की बलि
भी नहीं चढ़ाई और तू मुझसे ये चाहता है कि
40:07
मैं फूल सिंह को पराजित करा दूं। नहीं नल ये संभव नहीं है।
तो नल कहने लगा माता
40:13
बोलिए तुझे क्या चाहिए? मैं वही
चढ़ाऊंगा। माता देवी को मनाने लग गया। तो देवी कहने
40:20
लगी नल देखिए मैं तो देवी हूं। मैं तेरा
40:25
साथ दे रही हूं। परंतु इस नगर की कंपिलगढ़ की जो चंडी है
40:32
उसका जो मंदिर है वह पूरब दिशा में है और वहां पर फूल सिंह
पंजाबी पाठ पूजा करके
40:38
गया था। आप उस देवी को मनाइए। उस देवी के मंदिर में जाओ और
जो देवी आपसे मांगे वो
40:45
देवी को चढ़ाइए। मां चंडी को चढ़ाइए। मैं उसे नहीं रोक
सकती।
40:50
हे श्रोताओं माता देवी के अनुसार राजा नल चल देते हैं फूल
सिंह जो पंजापी का मंदिर
40:57
था माता चंडी के मंदिर में माता चंडी के मंदिर में आया नल
ने ध्यान लगाया माता
41:04
चंडी प्रकट हुई और माता चंडी से नल कहने लगा कि माता आप
मेरी पराजय क्यों कर रही
41:11
है इस दुष्ट के हाथों मेरी पराजय हो रही है तो चंडी कहने
लगी वीर नल क्यों घबरा
41:18
रहा है फूल सिंह ने मुझ पर 1000 मंत्रों का
जाप किया है। तू मेरे ऊपर
41:26
2000 मंत्रों का जाप कर और मुझे मध्यपान करा और मुझ पर एक
भैंसा की बलि चढ़ा और कल
41:35
के युद्ध में तू फूल सिंह को किले सहित धराशाई कर देगा। मैं
डेढ़ पहर के लिए तुझे
41:41
वचन देती हूं। सो जाऊंगी। और डेढ़ पहर में फूल सिंह को तुझे
बंदी बनाना होगा। नल
41:48
कहने लगा ठीक है माता श्रोताओं तीसरे दिन का युद्ध श्रोताओं
मां भवानी मां चंडी से
41:57
वरदान लेकर के नल लौट आता है अपने शिविर को और दूसरे दिन
युद्ध की संपूर्ण
42:03
तैयारियां की नल ने अपनी संपूर्ण सेना को सुसज्जित होने का
आदेश दे दिया कि कल के
42:09
दिन कंपिलगढ़ के किले को ध्वस्त कर देना है। तोड़ दो कि
कंपिलगढ़ के किले के
42:15
किवाड़ घुस जाओ अंदर मारकाट मचा दो बंदी बना लो फूल सिंह को
श्रोताओं जब तीसरे दिन
42:24
का युद्ध आरंभ हुआ तो फूल सिंह पंजाबी भी युद्ध के मैदान
में हाथी के ओदे पर चढ़कर
42:30
आया और मनसुख वही बंदी गृह में बंदी बना पड़ा है। मनसुख
विचार कर रहा है कि अब
42:38
मुझे कोई नहीं छुड़ाएगा। मेरा भाई नलवी बंदी बन गया तो भगवन
क्या होगा? परंतु
42:44
देखिए श्रोताओं जब दूसरे दिन का युद्ध आरंभ हुआ तो राजा नल
ने मां भवानी को याद
42:51
किया कि माता आपने मुझे वचन दिया था कि डेढ़ पहर तक मैं सो
जाऊंगी तो तुम डेढ़
42:57
पहर तक उस मंदिर में जाकर के सो जाओ। गजमोतनी राजा नल
43:04
दोनों की दोनों युद्ध के मैदान में डटे हुए हैं। गजमोतनी ने
फूल सिंह पर जादू
43:10
चलाया और फूल सिंह पर जादू चलाया तो फूल सिंह मूर्छित होकर
के जमीन पर गिर पड़ा और
43:16
जैसे ही मूर्छित होकर के जमीन पर गिरा तो नल के पास जल
दरियाई घोड़ा था। वीरवरण
43:22
घोड़ा था। सात धार की तलवार थी। नल ने कुछ ही समय में फूल
सिंह को बंदी बना लिया।
43:28
मस्के कस ली और घोड़ा पर रख के चल दिया अपने शिविर को।
कंपिलगढ़ की सेना भाग गई
43:37
और नरवरगढ़ की सेना ने किले में प्रवेश कर लिया। किले को
जीत लिया, विजित कर लिया और
43:44
फूल सिंह की सेना ने हथियार डाल दिए। अब देखिए श्रोताओं इधर
फूल सिंह बंदी बना हुआ शिविर में पड़ा
43:53
हुआ है और राजा नल स्वयं फूल सिंह के किले में
43:59
प्रवेश कर जाते हैं। बंदी जितने बने हुए थे उन सबको छुड़ा
दिया। अपनी माता को महल
44:06
से उतार लिया। अपने पिता की जेल को छुड़ा लिया। जितने भी
जेल में बंदी राजा थे सबको
44:13
मुक्त करा दिया। नरवर नरेश राजा नल्ले श्रोताओं
44:19
इधर क्या होता है मनसुख नहीं मिला क्योंकि मनसुख तो 60 हाथ नीचे एक भक्खी में पड़ा
44:26
हुआ था अब देखो राजा नल अपने माता-पिता को साथ
44:33
लेकर के अपने शिविर में आ जाता है और बंदी फूल सिंह को अपने
सामने खड़ा कर लिया फूल
44:38
सिंह से कहने लगा तेगा निकाल के कि फूल सिंह अब तू मरने के
लिए तैयार तैयार हो
44:44
जाओ। तो फूल सिंह गिड़गिड़ा जाता है। राजा नल के चरणों को
पकड़ लेता है और कहने लगा
44:51
कि हे वीर श्रेष्ठ हे नरवर नरेश मेरी पुत्री सरवती का विवाह
मैं आपके साथ किए
44:58
देता हूं। श्रोताओं फूल सिंह ने मनसुख को बंदी ग्रह से
मुक्त
45:05
कर दिया और अपनी पुत्री सरवती का विवाह राजा नल के साथ कर
दिया। देखिए राजा नल के
45:14
दो से तीन रानियों का उल्लेख मिलता है क्योंकि पहली रानी तो
गजमूतनी थी। फिर
45:22
दमयंती और ये बीच में एक सरवती भी आ गई। नगमंती से उसका
विवाह नहीं हुआ था। तो
45:28
सरवती का विवाह भी राजा नल के साथ कर दिया था। श्रोताओं
मंजा के कथना अनुसार सरती
45:37
राजा नल की बहू बन गई। रानी मंजा की पुत्रवधू बन गई। और
बड़े धूमधाम से राजा
45:46
नल ने विवाह किया। विवाह करने के बाद राजा नल अपने
माता-पिता की जेल को छुड़ाने के
45:53
पश्चात चल देता है नरवरगढ़ के लिए। परंतु देखिए श्रोताओं
मैं आपको एक रहस्य की बात
46:00
बताना चाहता हूं कि सरती नल के साथ रहना नहीं चाहती थी। उसे
पता था
46:07
कि मंजा मुझे रोजाना तहाने मारेगी। इसलिए जब मार्ग में सेना
जा रही थी तो उसने हाथी
46:14
के हौदे से कूद करके आत्महत्या कर ली थी और उसका प्राणांत
वहीं हो गया था। मनसुख
46:21
गुर्जर राजा नल और राजा प्रथम सम्मान सहित
46:26
अपने गढ़ नरवर में आ जाते हैं। अपने माता-पिता की जेल को
छुड़ाने के पश्चात।
46:32
तो देखिए श्रोताओं राजा नल ने अपने माता-पिता की कैद को
छुड़ा लिया है और
46:37
नरवर में आ गए
16.
महाराज अब हमारी पुत्री सयानी हो चुकी है। समय अपनी गति से
आगे बढ़ रहा है और कन्या
0:05
अब विवाह योग्य आयु में प्रवेश कर चुकी है। मेरी पुत्री अब
विवाह योग्य हो गई है।
0:11
मेरी पुत्री के विवाह के लिए मैं कुछ शर्त रखता हूं। मेरी
कुछ शर्तें हैं। पहली शर्त लड़के की
0:18
आयु 20 वर्ष होनी
चाहिए। दूसरी शर्त कासिमगढ़ महल के पीछे एक जंगल है। उस जंगल में से भूतों को
भागना
0:24
पड़ेगा। तीसरी शर्त मेरे तीन पुत्र हैं। तीनों ही बहुत
बलवान है। तीनों पुत्रों को मुझे सहित हराना पड़ेगा। चौथी शर्त ऊपर
0:32
तोरण लटकाया जाएगा। और पांचवी शर्त
0:39
मेरे राज्य के मंदिर में भगवान शंकर की वरदानी एक शेरनी
विचरण करती है। उस शेरनी
0:45
को भगाना पड़ेगा। इन पांचों शर्तों का दान जो राजा पूरी
0:50
करेगा वही मेरी पुत्री से विवाह करेगा। समस्त श्रोताओं का, भक्तों का और
0:58
सब्सक्राइबर बंधुओं का एक बार फिर से स्वागत और हार्दिक
अभिनंदन है। श्रोताओं
1:05
जैसा कि आप जानते हैं हमारी कहानी चल रही थी नल पुराण
इतिहास से।
1:12
एक राजा हुए थे कासिम सिंह। एक कासिम गढ़
1:18
नामक शहर था। कासिमपुर कह सकते हैं, कासिम गढ़ कह सकते हैं। दोनों लिखित में हैं। कासिमपुर नामक
1:26
एक राज्य था और उस राज्य में एक कासिम सिंह नामक राजा राज्य
किया करता था। राजा
1:34
बड़ा प्रतापी था। उस राजा के तीन पुत्र थे। जो एक से एक
बढ़कर के बलवान था। उन
1:42
पुत्रों को रणभूमि में हराना इतना आसान नहीं था।
1:48
जो बड़ा पुत्र था उसका नाम था भयंकर सिंह। जो छोटा पुत्र था
उसका नाम था बूंदा। और
1:57
एक तीसरे नंबर वाला पुत्र था उसका नाम था विश्वजीत।
श्रोताओं तीनों पुत्र एक से एक
2:05
बढ़कर के योद्धा थे। उस राजा के एक पुत्री पैदा हुई और उस
पुत्री का नाम था कश्मीरा।
2:14
कश्मीरा बड़ी सुंदर थी। मानो चंद्रमा में से चीर करके
निकाली हो। चंद्रमा की कलाएं
2:21
उसके रूप के सामने लज्जित हो जाती थी। श्रोताओं धीरे-धीरे
कासिम सिंह का समय
2:28
निकलता गया। और जब कश्मीरा 16 वर्ष की हो
गई। देखो श्रोताओं मैं बताना चाहूंगा कि
2:35
हमारे प्राचीन भारत की मर्यादा थी कि लड़की जब 16 वर्ष की हो जाती है तो उसका
2:42
विवाह कर देना चाहिए। और यह माता-पिता के लिए भी हितकर रहता
था। जो वर्तमान समय में
2:50
यह विसंगतियां चल रही हैं। आप देख रहे हैं लड़कियों की आयु
को खींचना और उसके
2:56
दुष्परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं। जो कि लव मैरिज के रूप
में आते हैं। वो उस जमाने
3:02
में नहीं होती थी। तो जब कश्मीरा 16 वर्ष की युवती हो गई तो उसकी माता
3:11
कश्मीरा की माता ने मन में विचार किया कि मेरी पुत्री विवाह
योग्य हो गई है और एक
3:18
दिन उसने महाराज कासिम सिंह को अपने महल में बुलाया। उस
रानी का नाम था तारावती।
3:25
रानी तारावती ने अपने पति महाराज कासिम सिंह को महल में
आमंत्रित किया।
3:33
बांदी को भेजा और बांदी से कहा बांदी महाराज को बुला करके
लाइए। श्रोताओं बांदी
3:39
दरबार में पहुंच जाती है और महाराज कासिम सिंह को जो रानी
ने कुछ कहा था बुलवाने के
3:47
लिए भेजा था। महाराज कासिम सिंह से कहा कि महाराज आपको रानी
साहब याद कर रही हैं।
3:54
श्रोताओं राजा बीच में ही अपनी राज्यसभा को स्थगित करके चल
देता है अपने रजवासों
4:01
के लिए। राजा कासिम सिंह अपने महल में चला जा रहा है। जब
रानी कश्मीर रानी तारावती ने देखा
4:10
कि महाराज आ रहे हैं तो एक सोने का पलंग बिछा दिया गया और
महाराज की अगवानी में
4:19
खड़ी हो गई। श्रोताओं राजा कासिम सिंह आकर के उस स्वर्ण
पलिंग पर विराजमान हो जाता
4:26
है। सोने के पलंग पर बैठ जाता है। तब रानी तारावती अपने पति
से क्या कहने लगी? हाथ
4:34
जोड़ के कहे भूपते नार तारावत रानी और जल्दी ते ब्याह करो
भूपती रह गई सुता
4:41
सयानी कि हे महाराज तुम्हारी पुत्री विवाह योग्य हो गई है।
और तारावती क्या कहने लगी
4:48
कि राजा ध्यान लगा सुन वाणी मैं समझाऊं तोए और सानी सुता
फिरे घर में वो पत्थर ते
4:56
भारी होए हे महाराज जब घर में सानी सुता
5:01
हो जाती है सानी सानी का मतलब है यहां बड़ी से जबान से
विवाह योग्य हो जाती है
5:07
पुत्री तो माता-पिता को नींद नहीं आती। माता-पिता उसकी
चिंता में मग्न हो जाते
5:13
हैं कि उसको सुंदर सा एक वर देखना है। उसका विवाह करना है।
बड़े-बड़े स्वप्न,
5:18
बड़े-बड़े ख्वाब उनके मन में आते रहते हैं। तो हे राजन
हमारी पुत्री कश्मीरावी
5:25
विवाह के योग्य हो गई है। तो क्यों ना कोई अच्छा सा
राजकुमार खोजा है और कन्या एक
5:32
सुंदर सा लड़का ढूंढ करके इसका विवाह कर दिया जाए। हमारी
पुत्री सयानी होती तो यह बात जब अपनी गति से राजा कासिम सिंह
5:38
ने सुनी और कासिम सिंह कहने लगा प्रवेश कर देखिए रानी
तारावती हम राजा हैं और हमारे
5:45
विवाह कुछ शर्तों के अधीन होते हैं तो आपने हमसे कहा है हम
अभी नाई और ब्राह्मण
5:51
को बुलाते हैं अपने दरबार का आयोजन करते हैं और जो हमारी
कुछ शर्तें हैं उन शर्तों
5:58
को हम एक पत्रिका में लिख देंगे और ना ही ब्राह्मण को टीका
देकर के लड़की की सगाई
6:06
करने के लिए भेज देते हैं। देखिए श्रोताओं देखिए श्रोताओं
तारावती रानी ने जब महाराज
6:14
कासिम सिंह को समझाया तो कासिम सिंह रानी से कहने लगा रानी
बहुत जल्दी ही हमारी
6:20
पुत्री का विवाह करेंगे। तुम निश्चिंत हो जाइए कि नहीं
महाराज निश्चिंत मैं तब हो
6:26
सकती हूं जब मेरी पुत्री का विवाह हो जाएगा। मुझे तब तक चैन
से नींद नहीं आएगी
6:32
क्योंकि अब मेरी पुत्री विवाह के योग्य हो गई है। श्रोताओं
वर्तमान समय तो ऐसा चल
6:37
रहा है कि 16 तो क्या 30 वर्ष की पुत्रियां हो जाती है तो भी माता-पिता को
6:44
नींद आना तो क्या उनके कान पर जू तक नहीं रेंगती है। उन्हें
कोई होश नहीं रहता है।
6:49
और उसी के मैं पहले बता चुका हूं दुष्परिणाम सामने आ रहे
हैं। तो देखिए श्रोताओं महाराज कासिम सिंह आ जाते हैं
6:57
अपने राज दरबार में। राज दरबार को आमंत्रित कर लिया।
बड़े-बड़े सामंत धवलों
7:04
को बुलाया। अपने तीनों पुत्रों को बुलाया। और महाराज कासिम
सिंह ने अपना जो ब्राह्मण
7:12
था राजपुरोहित था पंडित बंसीधर उसको
7:18
बुलाया और पंडित जी से कहने लगा कि पंडित जी हमारी पुत्री
विवाह योग्य हो गई है और
7:25
हमें आप उन राजाओं का परिचय दीजिए जो हमारे समान बलधारी हो।
हमारे विवाह के
7:33
नियमों का पालन करें। हमारी शर्तों को पूरा करें। हम उसके
साथ हमारी पुत्री का
7:38
विवाह कर देंगे। तो दरबार कहने लगा कि महाराज आप अपनी
शर्तों को बताइए और इस
7:46
पत्रिका में लिखिए। तो महाराज ने पहली शर्त बताई कि मेरी
लड़की 16 वर्ष की है।
7:53
लड़के की आयु 20 वर्ष होनी
चाहिए। दूसरी शर्त महाराज कासिम सिंह लिखाते हैं
8:01
कि मेरा जो यह क्षेत्र है कासिमपुर इसके चारों तरफ वन है और
वन में बड़े-बड़े
8:08
विकराल दानव रहते हैं। उन दानवों को युद्ध करके वन क्षेत्र
से भगाना होगा। मेरी
8:15
दूसरी शर्त है। मेरी तीसरी शर्त है तीन मेरे पुत्र हैं और
एक से एक बढ़कर के
8:23
योद्धा है। तीनों पुत्रों का सामना उन तीनों पुत्रों को
हराना किसी के बस का काम
8:30
नहीं है। उन तीनों पुत्रों को मुझ सहित युद्ध भूमि में
पराजित करना पड़ेगा। और
8:37
मेरी चौथी शर्त है और मेरी चौथी शर्त है कि 80 हाथ ऊपर तोरण लटकाया जाएगा। तोरण
8:46
कहते हैं जो विवाह पर दूल्हा उस पर तोरण मारता है। वो तोरण
लटकाते हैं बर्फ कन्या
8:52
पक्ष वाले और दूल्हा उस तोरण को एक छड़ी से प्रहार करता है।
उसको तोरण मारना कहते
8:58
हैं। तो तोरण मारेगा। वह तोरण 80 गज ऊपर
9:04
होगा। यह मेरी चौथी शर्त है और मेरी पांचवी शर्त है कि मेरे
राज्य में एक
9:12
सिंनी विचरती है जो मां भवानी के मंदिर में निवास करती है।
भगवान शंकर की वरदानी
9:19
है वो सिंनी से मैंने समझौता कर रखा है कि उस सिंघिनी को
मुझे प्रतिदिन एक जानवर
9:27
भेजना पड़ता है उसे भोजन के लिए जो मेरे राज्य से जाता है।
उस सिंघिनी को इस
9:34
क्षेत्र से भगा दे। यदि मेरी इन पांचों शर्तों का कोई पालन
करे तो वह नरेश
9:42
सहज ही मेरी पुत्री के साथ विवाह कर सकता है। मैं उसके साथ
मेरी पुत्री का विवाह कर
9:47
दूंगा। श्रोताओं यह बात जब उसके ब्राह्मण बंसीधर ने सुनी
9:53
तो बंसीधर कहने लगे कि महाराज आप बड़े-बड़े राजाओं के यहां
सिक्का को भिजवाइए। शर्तों की एक पत्रिका बना दीजिए
10:01
और मेरे साथ आपका नाई भेज दीजिए। प्राचीन समय में नाई और
ब्राह्मण ही विवाह
10:10
तय करते थे। जबकि वर्तमान समय में तो खुद बेटी वाले ही करते
हैं। तो देखिए श्रोताओं
10:16
महाराज कासिम सिंह ने और पत्रिका में लिख रहे हैं राम राम
आदाब वंचना सब राजाओं को
10:25
लिखा जोहार। कासिमपुर है देश हमारा यहां पर विकट चले
10:30
तलवार। और अपनी शर्तें लिखी। पहली शर्त लिख दी।
10:37
दूसरी शर्त लिख दी। तीसरी, चौथी और
पांचों शर्तों को उस पत्रिका में लिख दिया। और
10:43
नीचे कासिमपुर शहर की मोहर लगा दी गई। और अपने हस्ताक्षर कर
दिए महाराज ने और
10:51
पत्रिका को सिक्का देकर के नाई और ब्राह्मण को उस पत्रिका
को दे दिया और कह
10:57
दिया कि जो नरेश इस पत्रिका को लेगा उसे हमसे युद्ध करना
पड़ेगा। हमारी शर्तों को
11:04
निभाना पड़ेगा और उसी के साथ हमारी पुत्री का विवाह होगा।
अब देखिए श्रोताओं नाई और
11:12
ब्राह्मण को कासिमपुर नरेश ने महाराज कासिम सिंह ने पत्रिका
थमा दी और नाई और
11:20
ब्राह्मण घोड़ों पर असवार होकर के पत्रिका को लेकर के चल
देते हैं। तो सबसे पहले नाई
11:28
और ब्राह्मण शहर आगरे पहुंचते हैं। वहां देखा तो वहां
उन्हें
11:36
जो वहां का नरेश था उसने पत्रिका को पढ़ करके मना कर दिया।
11:42
श्रोताओं श्रावस्ती उज्जैन
11:47
अवंतिका जितने भी उस समय जनपद थे जांगल प्रदेश
11:54
इत्यादि सभी नरेशों के पास राजा कासिम सिंह के नाई और
ब्राह्मण उस
12:01
सिक्का को लेकर के जाते हैं। परंतु जो राजा उस सिक्का की
शर्तों को पढ़ता है तो
12:07
वही राजा विवाह करने से मना कर देता है।
12:12
अब देखिए श्रोताओं उस सिक्का को नाई और ब्राह्मण ने समस्त
राजाओं के पास वामन गढ़
12:21
थे उस समय वामन गढ़ों पर उस सिक्के को घुमा दिया। सिक्के को
लेकर वामन नरेशों के
12:28
पास पहुंच गए जो महत्वपूर्ण राजा थे। परंतु कोई नरेश ने उस
सिक्के को नहीं
12:34
लिया। अब तो नाई और ब्राह्मण बड़े परेशान हो गए।
घूमते-घूमते
12:40
दो माह का समय निकल गया। परंतु कोई नरेश उस सिक्के को नहीं
लेता है। कह देता है कि
12:46
हमारे यहां मरने के लिए कोई फालतू नहीं है। हम ऐसा विवाह
नहीं करना चाहते। जिसकी
12:53
मृत्यु आ गई होगी वह इस सिक्के को धारण करवाएगा। सिक्के को
अपने बेटे पर चढ़ाएगा।
13:01
श्रोताओं घूमतेघूमते नाई और ब्राह्मण पहुंच जाते हैं श्याम
नगर में। जहां
13:07
महाराज मैनपाल गुर्जर राज्य किया करते थे और उसका पुत्र था
मनसुख। मनसुख की आयु 20
13:15
वर्ष की थी। मनसुख कुछ समय पहले ही
13:20
नरवरगढ़ नरेश नल के माता-पिताओं की कैद को छुड़वा के लाए
थे। बड़े विकट योद्धा थे
13:28
महाराज मनसुख। महाराज मैनपाल के पुत्र। तो जब महाराज मैनपाल
का दरबार लग रहा था
13:36
उसी दरबार में नाई और ब्राह्मण प्रवेश करते हैं। नाई और
ब्राह्मण को देखकर के
13:42
महाराज मैनपाल ने उन्हें बैठने के लिए उचित आसन का प्रबंध
किया। सम्मान सहित आसन
13:50
पर बैठाया। जब नाई और ब्राह्मण बैठ गए तो महाराज मैनपाल
पूछने लगे कि कहो ब्राह्मण
13:57
देव किस वजह से आपका आना हुआ कि महाराज हम
14:02
कासिमपुर के महाराज कासिम सिंह के नाई और ब्राह्मण हैं।
14:07
महाराज उनकी पुत्री कश्मीरा बड़ी सुंदर है। बड़ी रूपवती है।
चंद्रमा भी उसके
14:15
सामने लज्जित हो जाता है। उस पुत्री का विवाह उसका सिक्का
हम किसी राजा के पुत्र
14:22
पर चढ़ाने आए थे। परंतु हे महाराज हम समस्त राजाओं के पास
गए। किसी राजा ने
14:29
सिक्के को नहीं लिया। मैनपाल कहने लगा कि क्यों? क्या कारण था कि महाराज
14:37
उस सिक्के की कुछ शर्तें हैं। देखिए श्रोताओं मैनपाल उस
सिक्के को पढ़ रहा है।
14:44
सिक्के को जब मैनपाल ने पढ़ा तो मैनपाल मन में विचार करने
लगा कि मैं इस सिक्के को
14:51
कभी नहीं ले सकता। क्योंकि यह सिक्का तो मेरे इस सेना सहित
राज्य का नाश कर सकता
14:57
है। इसलिए नाई ब्राह्मण से कहने लगा कि देखो ब्राह्मण देव
तुम्हारे महाराज की
15:03
शर्तें बहुत बड़ी हैं और इन शर्तों का पालन होना संभव नहीं
है। देखिए श्रोताओं
15:09
जहां होनी बलवान होती है। भाग्य का लिखा कभी नहीं मिट सकता।
तो नरवर नरेश महाराज
15:17
नल अपने मित्र मनसुख से मिलने के लिए उसी समय श्याम नगर को
आ रही थी। जब मनसुख ने
15:26
नल को आता हुआ देखा तो मनसुख मन में विचार करने लगा कि मेरा
पगड़ी पलटा यार आ गया।
15:32
मेरा परम मित्र आ गया और अब इस सिक्के की देखी जाएगी।
महाराज नल महाराज मैनपाल के
15:39
दरबार में पहुंच जाते हैं। महाराज मैनपाल ने नरवर नरेश का
बड़ा स्वागत किया और
15:46
उन्हें उचित आसन पर बैठाया। श्रोताओं राजा नल महाराज मैनपाल
के दरबार
15:53
में बैठ जाते हैं और जब महाराज मैनपाल के चेहरे की तरफ देखा
तो महाराज का चेहरा
16:01
उदास था। नल पूछने लगा कि हे महाराज हे श्यामनगर नरेश मुझे
यह बताएं कि आपकी
16:08
चिंता का कारण क्या है? आपका चेहरा
मुझे उदास दिखाई दे रहा है। क्या बात है
16:15
महाराज? तो महाराज
मैनपाल कहने लगे बेटे नल क्या बताऊं तुझे? राजा कासिम
सिंह का
16:23
एक खत मेरे पास आया है। उसने सिक्का भिजवाया है मेरे पुत्र
मनसुख का विवाह
16:30
करने के लिए। परंतु बेटे उसकी शर्तें ऐसी हैं कि मैं उन
शर्तों का पालन नहीं कर
16:36
सकता। उन शर्तों को पूरा नहीं कर सकता। नल कहने लगा महाराज
आप सिक्का को मुझे
16:44
पढ़वाइए तो सही। उस सिक्के की शर्त क्या है? वो पत्रिका दीजिए। श्रोताओं नल ने जब
16:51
उन पत्रिकाओं को पढ़ा। जो सिक सिक्का के साथ पत्रिका आई थी।
उस पत्रिका को महाराज
16:58
नल ने पढ़ा। तो पहली शर्त थी लड़का 20 वर्ष का होना चाहिए। तो नल कहने लगा
17:04
मैनपाल सिंह महाराज हमारा मित्र 20 वर्ष का हो चुका है। पहली शर्त को हम बखूबी
17:11
निभाते हैं। दूसरी शर्त थी कि
17:17
दानवों को मारना होगा। कासिमपुर क्षेत्र है उसके चारों तरफ
वन है और उस वन में
17:23
दाने रहते हैं। उन दानों को मारना होगा। नल कहने लगा कि महाराज
मैंने अब तक कितने
17:30
ही दानों को मार दिया। मुझे किसी दाने से डर नहीं लगता। इस
शर्त का पालन भी हो
17:36
जाएगा। यह भी पूरी हो जाएगी। महाराज तीसरी शर्त पढ़िए कि
तीसरी शर्त यह है जो तोरण
17:44
है वो 80 गज ऊपर
लटकाया जाएगा। नल कहने लगा कि महाराज 200 गज ऊपर लटकवा
दो। तोरण
17:51
मार दिया जाएगा। मेरे पास वीरवरन नामक घोड़ा है। जल थल गगन
तीनों में समान गति
17:58
से चलता है। तो मैं तीसरी शर्त का पालन भी कर सकता हूं। ये
भी हो जाएगी पूरी महाराज
18:05
चौथी शर्त पढ़िए। तो चौथी शर्त लिखी थी कि मेरे तीन पुत्र
भयंकर सिंह विश्व विश्व
18:15
विश्वजीत और बूंदा इन तीनों से युद्ध करना पड़ेगा।
18:20
साथ में मैं भी हराना पडूंगा। जब मुझे और मेरे पुत्रों को
हरा दोगे। यह मेरी अगली
18:26
शर्त होगी। राजा नल कहने लगे महाराज ये भी कोई बड़ी शर्त
नहीं है। ये भी हो जाएगा
18:33
काम। परंतु अगली शर्त क्या है? उसे पढ़िए कि मेरे देवी के मंदिर में एक शेरनी रहती है।
18:42
उस शेरनी से मेरा समझौता है। मुझे प्रतिदिन उसको एक जीव
भेजना पड़ता है। एक
18:49
कोई उसको भोजन के लिए कोई जानवर भेजना पड़ता है और वह उसे
खाती है। मेरे राज्य
18:55
में पशुओं की कमी आ चुकी है। उसको मंदिर से भगाना होगा।
राजा नल कहने लगा कोई बात
19:02
नहीं है। यह भी माता भवानी के प्रताप से हो जाएगा। महाराज
आप सिक्का को मेरे मित्र
19:09
पर चढ़वाइए। श्रोताओं नल ने मैनपाल तो मना कर रहा था परंतु
नल ने जबरदस्ती से नाई और
19:17
ब्राह्मण से सिक्का को मनसुख पर चढ़वा दिया। और मनसुख से कह
दिया मित्रों विवाह
19:25
की तैयारी की जाए और नाई और ब्राह्मण को सहर्ष सम्मान सहित
19:32
विदा कर दिया। नाई ब्राह्मण कहने लगे यह बहुत अच्छा हुआ।
हमारा क्लेश मिट गया।
19:39
फांस कट गई। हम तो बड़े परेशान थे क्योंकि कोई सिक्का को ले
नहीं रहा था। परंतु यह
19:46
बहुत अच्छा हुआ। सिक्का को चढ़ाकर के नाई ब्राह्मण पहुंच
जाते महाराज कासिम सिंह के
19:53
दरबार में। महाराज कासिम सिंह से कहने लगे कि महाराज सिक्का
को श्याम नगर के महाराज
20:01
मैनपाल के पुत्र मनसुख पर चढ़ा दिया है और वह आपके समस्त
शर्तों का पालन करने के लिए
20:07
तैयार है तो इधर कासिम सेन भी अपनी तैयारी
20:12
आरंभ कर देता है। प्रसन्न हो जाता है। कासिम सेन कहने लगा
कि चलो कोई महाराज तो
20:19
ऐसा हुआ। कोई नरेश तो ऐसा हुआ जिसने मेरी पुत्री का सिक्का
अपने पुत्र पर चढ़ा
20:24
लिया। अब हमें हमारी तैयारियां करनी चाहिए। देखिए श्रोताओं
उधर कासिम सिंह
20:31
अपनी तैयारियां आरंभ कर देता है। सेना को सुसज्जित कर रहा
है। और इधर राजा नल ने भी
20:38
मनसुख से कह दिया मित्र 1 लाख की फौज
तुम्हारी है और 1 लाख फौज मेरे पास है। हम
20:45
दोनों मित्र चलेंगे और बलपूक उस राजा की समस्त शर्तों का
पालन करते हुए तुम्हारा
20:52
विवाह करके लाऊंगा। आदेश दे दिया अपनीप सेनाओं को कि
सुसज्जित
21:00
हो जाओ और आदेश दे दिया अपनीपनी फौजों को कि
21:05
समस्त सेनाएं कासिमगढ़ की तरफ कच करें। तो देखिए श्रोताओं 2 लाख की फौज 1 लाख की
21:13
सेना नल के पास थी और 1 लाख की सेना
मनसुख गुर्जर के पास थी। दो लाख की फौज तैयार हो
21:20
गई सज के। हाथी, घोड़ा, पैदल समस्त प्रकार की सेनाएं, चतुरंगिणी
सेनाएं तैयार हो गई।
21:30
रण के बाजे बजने लगे और मनसुख को बरना बना दिया गया। दूल्हा
बनाया जा रहा है। उसके
21:37
माथे पर मोहर बांध दी गई। शरीर पर हदी लगा दी गई। हाथ में
कंगन बांध दिया गया। जिसको
21:44
कखना कहा जाता है। और राजा
21:49
नल ने अपने मित्र मनसुख को तैयार करके एक रथ 10 पहिया का एक रथ सजवा करके तैयार कर
21:57
दिया और उस रथ में बैठाने के लिए अपने मित्र को ले जा रहा
है। और जैसे ही
22:03
श्रोताओं रथ के जो पेंद बोलते हैं उसको जैसे फुट रेस्ट होता
है ऐसा होता है। उस
22:10
पर पैर रखा और वैसे ही सामने से छींक हुई और जब सामने से
छींक हुई तो मनसुख गुर्जर
22:19
के ब्राह्मण बंसीधर कहने लगे कि बेटे मनसुख सामने से छींक
हो गई है। अभी थोड़े
22:26
समय के लिए आप नीचे आ जाए तो देखिए श्रोताओं कुछ काशुन और
अपशकुन भी होते
22:32
हैं। यानी सामने की छींक होती है वो बहुत बेकार होती है।
22:38
कुछ अशुभ समय होता है उसे टालने के लिए सामने से छींक होती
है कि आप इस समय थोड़ा
22:44
रुक जाएं। कहीं-कहीं जैसे कहते हैं कि मार्ग को बिल्ली काट
गई तो वो भी एक अपशकुन माना
22:51
जाता है। ये अपशकुन होते हैं और अच्छे समय तक रुकने के लिए
ये इंतजार करने की कहते
22:59
हैं। यदि हम इन समयों पर रुक जाते हैं तो हमारे साथ कोई
अनहोनी होने से हमारा बचाव
23:06
हो जाता है। ऐसा वेद शास्त्रों का मानना है। जब सामने से
छींक हुई तो बंसीधर
23:12
ब्राह्मण ने रोकना चाहा कि आप रथ से नीचे
23:19
उतर जाएं। तो नल कहने लगे कि पंडित जी हम भारतीय हैं।
23:26
हे ब्राह्मण देव चाहे पश्चिम दिशा में सूर्य क्यों ना हो
लेकिन भारत के शूरवीर
23:33
कभी भी अपनी आन से नहीं हटते। कहते हैं कि जो सुर शूरवीर
होते हैं जो
23:41
रणवं होते हैं वो कभी भी पीछे कदम नहीं रखते। मित्र बैठ
जाइए अपने रथ पर विराजमान
23:48
हो जाइए। श्रोताओं पंडित बंसीधर की बात को इंकार करते हुए
नकारते हुए राजा नल और
23:57
मनसुख गुर्जर दोनों मित्र अपने रथ पर विराजमान हो जाते हैं।
सेना को आदेश दे
24:02
दिया कि कच किया जाए। दो लाख की फौज पलटन के साथ
24:09
मनसुख गुर्जर श्रोताओं 2 लाख की फौज
मनसुख गुर्जर और राजा नल की
24:16
कासिमपुर के लिए प्रस्थान कर देती है। कोच कर देती है और रण
के बाजे बजवा दिए जाते
24:23
हैं। दोनों मित्र पगड़ी पलटाया नल और मनसुख एक ही रथ में
विराजमान है और साथ
24:30
में महाराज मैनपाल सेना का संचालन करते हुए चल रहे हैं। अब
देखिए श्रोताओं,
24:38
पहले दिन का पड़ाव क्योंकि नरवरगढ़ के कुछ
24:43
आगे ही श्यामनगर था। और श्यामनगर और नरवरगढ़ से
24:50
जब कासिमपुर के लिए जाना था, तो वहां
बंगाला देश पड़ता था। ये बंगाला प्राचीन
24:57
समय में बहुत बड़ा क्षेत्र था और जहां जादू का गढ़ था। मां
कामा देवी के क्षेत्र से
25:04
लेकर के वर्तमान बंगाल विहार का कुछ हिस्सा उस बंगाले में
आता था। प्राचीन काल के बंगाले में। तो
25:13
पहले दिन का सफर करने के बाद सेनाओं ने एक बंकिमगढ़ नामक
स्थान है।
25:21
वहां पर अपना पड़ाव डाला। और उससे अगले
25:26
दिन का जो उनका कूच था। प्रस्थान किया। सेनाएं चली तो और किसी
शहर में ठहर गई और
25:35
उससे अगले दिन तीसरे दिन सेनाओं ने बंगाल के बॉर्डर पर अपना
पड़ाव डाल दिया। बंगाल
25:42
की सेम पर सेनाएं आ गई। दो लाख की फौज पलटन और महाराज
25:48
मैनपाल उसके दोनों पुत्र नल और मनसुख नल को भी वो
25:55
पुत्र के समान मानते थे। दोनों पगड़ी पलटा यार अपनी सेना के
साथ
26:00
हैं। श्रोता वो पड़ाव डल गया है और शिविर लगा दिए गए हैं।
शिविरों के बीच में एक
26:07
बहुत बड़ा सुसज्जित तंबू तैयार किया गया और उस तंबू में जो
दूल्हा होता था मनसुख
26:15
गुर्जर। उस मनसुख को उस तंबू में बहुत बड़ी सुरक्षा के बीच
में सुलाया जाता था।
26:23
वहां सोता था मनसुख और उसके साथ में उसका पगड़ी पलटा यार।
चार कला से अवतार स्वयं
26:31
राजा नल उनके साथ रहते थे। अब देखिए श्रोताओं यहां से आगे
बड़ा रोचक प्रसंग
26:37
आरंभ होता है। बंगाल के बॉर्डर पर सेना रुक जाती है और रात्रि
का समय होने को है।
26:45
दोनों मित्र भोजन करने के पश्चात अपने शिविर में चले जाते
हैं। सेनाओं के
26:51
सेनापति जो कुछ हैं वो गस्त कर रहे हैं। दो लाख की फौज पड़ी
हुई है शिविर लगा के।
26:58
हाथी, घोड़ा और
पैदल समस्त प्रकार की सेनाएं पड़ी हुई है और आराम कर रही है।
27:06
सेनाओं का पड़ाव बहुत दूर तक दिखाई दे रहा है। जैसे मानो
27:12
कोई सेना का समंदर उमड़ रहा हो। इसी बीच
27:17
बंगाले से एक लड़की धोबी की लड़की और उस लड़की का नाम था
चंद्रवती।
27:25
चंद्रवती नाम की एक परम सुंदरी कन्या। जादू में निधान थी। 14 विद्याएं जानती थी।
27:33
आपको एक बात और बताना चाहूंगा कि प्राचीन बंगाल में जितना
जादू होता था वो औरतों के
27:39
पास होता था। तो चंद्रकला 20 वर्ष की उम्र
और चंद्रमा के समान सुंदर
27:47
लड़की विहार करने के लिए चल देती है। रात्रि का समय था। जब
उस चंद्रकला ने उस
27:54
बंगाले के बॉर्डर पर आई तो वहां देखा कि सेना का एक समुद्र
पड़ा हुआ है। विशाल
28:01
सेना पड़ी हुई है। तो चंद्रकला मन में सोचने लगी कि इतने
लोग कहां से आए? इतने
28:07
हाथी, इतने घोड़ा, इतनी फौज पलटन है। यह
28:13
कोई राजा है और या तो किसी राजा पर चढ़ाई करने जा रहा है या
फिर कहीं निकल कर के जा
28:20
रहा है। क्या कारण है मुझे इसकी जांच करनी चाहिए। तो
चंद्रकला ने अपना जादू का
28:27
पिटारा निकाला। और उस सेना पर जादू चला दिया। जितने भी
पहरेदार थे, सब सो गए।
28:34
जितने शूर सिपाही थे सब सो गए और सबको सोने के बाद चंद्रकला
उस शिविर में घूम
28:41
रही है। सेनाओं के उस विशाल समुद्र में घूम रही है।
चंद्रकला ने देखा कि चारों
28:47
तरफ सैनिकी सैनिक पड़े हुए हैं। परंतु ये बहुत बड़ा
सुसज्जित तंबू लगा हुआ है। इस
28:53
तंबू में क्या है? मुझे इसको
चलकर देखना चाहिए। चंद्रकला ने उस तंबू में प्रवेश
28:59
किया तो देखा दो सुंदर राजकुमार सो रहे हैं। दोनों की छवि
देखते ही बनती थी। चंद्रमा
29:08
के समान सुंदर उन्हें देखकर के चंद्रकला
29:14
मन में प्रसन्न हो जाती है और कहने लगी कि हे मां भवानी
29:19
आज मेरी सुन ली। मुझे तो ऐसे ही पतियों की आवश्यकता थी। मैं
इसीलिए तो अब तक कुमारी
29:27
थी। मैंने विवाह नहीं करवाया। और आज मैं इन दोनों का अपहरण
करके ले जाऊंगी। देखिए
29:33
श्रोताओं तंबू में बैठी बैठी विचार कर रही है कि किसको ले
चलना चाहिए नल को या मनसुख
29:42
को क्योंकि मनसुख तो दूले बन रहा था और नल की जो शोभा थी
सुंदरपन था वो मनसुख से
29:50
कहीं 10 गुना अधिक था
दोनों की उम्र लगभग बराबर थी दोनों समान आयु के
29:58
मित्र थे अब श्रोताओं चंद्रकला ने विचार विमर्श किया और
विचार करके मन में आया कि
30:05
मेरी छोटी बहन वीरवती और है। हम दोनों बहनों को ये दोनों
राजकुमार बड़ी उपयुक्त
30:12
रहेंगे। क्यों ना इन दोनों राजकुमारों का अपहरण कर लेती
हूं। देखिए श्रोताओं जादू
30:19
में प्रवीण उस धोरी की पुत्री चंद्रकला ने अपना जादू चलाया।
30:25
जादू चलाने के पश्चात पलंग सहित तंबू में से दोनों
राजकुमारों को उठा लिया और दोनों
30:32
को आकाश मार्ग से लेकर के चल देती है। चली जा रही है और कुछ
ही समय में अपने शहर
30:40
बंगाल में आ जाती है। बंगाले में आ गई। अपने घर ले आई और घर
ला के मंत्र फूंका और
30:49
नल को तोता बना दिया और मनसुख को बैल बना दिया। नल को तोता
बनाकर के पिंजरे में बंद
30:57
कर दिया और मनसुख को बैल बना के खूंटे से बांध दिया। अब
देखिए श्रोताओं बड़ा
31:04
विचित्र काम हो गया। इधर मनसुख विचार कर रहा है कि मैं
विवाह करने जा रहा था और
31:10
यहां ये कैसा विवाह हुआ। जब प्रातः काल हुआ तो महाराज
मैनपाल जगे।
31:18
समस्त शूर सिपाही सेना सेनापति धवल सामंत सब जाग गए। चलने
की तैयारी करने
31:26
लगे। परंतु महाराज मैनपाल को तभी एक सैनिक ने सूचना दी कि
महाराज जिस शिविर में
31:32
दोनों राजकुमार थे उनमें से एक भी राजकुमार शिविर में नहीं
है। यह बात महाराज मैनपाल ने सुनी तो महाराज
31:39
मैनपाल कहने लगे कि दोनों मित्र हैं कहीं घूमने निकल गए
होंगे। थोड़ी बहुत देर में
31:44
आते होंगे। परंतु श्रोताओं घंटे दो घंटे इंतजार किया। कोई
सूचना नहीं मिली। ना
31:51
मनसुख आया और ना नल आया। अब तो बड़े सोच में पड़ गए कि जब
तक दूल्हे नहीं होगा तो
32:00
बारात कैसे जाएगी? बिना दूल्हे
के बारात कैसी होती है? यह विचार कर रहे हैं और
32:06
बंगाल के बॉर्डर पर उन्हें विचार करते करते 12:00 बज जाते हैं। परंतु ना तो राजा
32:13
नल आया कहीं से और ना मनसुक आया। होश उड़ गए महाराज के।
महाराज मैनपाल घबरा
32:20
गए कि हे भगवन ये क्या हुआ? मेरे दोनों
पुत्र कहां गए? उनका कोई अता पता नहीं। आज
32:27
से यह बेल तेरा पति है। दिन में इसे कोलू के बैल की तरह
जोतना और रात में इंसान बना
32:33
देना। उस चंद्रकला नामक लड़की ने अपनी बहन वीरमती को बुलाया
और उससे कह दिया कि जो
32:39
बैल बना हुआ है ये तेरा पति है और जो तोता बना हुआ है ये
मेरा पति है। इसके साथ
32:45
विवाह मैं करूंगी और इसके साथ विवाह तू कर लेना। दिन को
इसको बैल बना के कोलू में
32:51
जोतना है और रात्रि को आदमी बनाने बना लेना है। तो श्रोताओं
वीरमती ने उस बैल की
32:58
सेवा करना आरंभ कर दिया। दिन को तो मनसुख को कोलू में जोता
जाता था और रात्रि को
33:04
मनुष्य बना लिया जाता था। बड़ी विचित्र घटना हो रही है
मनसुख के और नल के साथ। नल
33:10
को रात्रि में मनुष्य और दिन में तोता। नल कहने लगा उस
लड़की से कि देखिए लड़की तू
33:16
ध्यान से सुन मैं मेरे मित्र का विवाह करने जा रहा था परंतु
तेने हमारे साथ बड़ा
33:23
धोखा किया है। हम विवाह के लिए कासिमपुर जा रहे थे। परंतु
तेने मार्ग में ही हमारा
33:28
अपहरण कर लिया। इसका परिणाम बहुत बुरा होगा और तुझे भुगतना
पड़ेगा। वो लड़की
33:35
कहने लगी चंद्रकला कि चुपचाप तोता बने बैठे रहो। आप कुछ
नहीं कर सकते। यहां ये
33:43
जादू का क्षेत्र है और हमारा गढ़ है। यहां हमें कोई जादू
में पराजित नहीं कर सकता।
33:49
श्रोताओं नल राजा और मनसुख चिंता मग्न है। इधर देखिए महाराज
मैनपाल ने चारों तरफ दूत
33:58
भेजे। परंतु नल का और मनसुख का कोई अता-पता नहीं लगा। अब
देखिए मैनपाल ने
34:06
सोचा कि दोनों राजकुमार कहीं हो सकता है नरवरगढ़ या
श्यामनगर चले गए हो किसी कारण
34:12
से तो उन्होंने दो विशेष प्रकार के दूत बुलाए जो चलने में
बड़े सफल थे। हर काम को
34:20
बड़ी कुशलता से कर लेते थे। दोनों सैनिकों को आदेश दिया कि
तुम श्यामनगर जाओ और तुम
34:27
नरवरगढ़ जाओ और देख के आओ कहीं राजा नल और मनसुख श्यामनगर
या नरवरगढ़ तो नहीं चले
34:33
गए। श्रोताओं सेना पड़ी हुई है। तीन दिन सेनाओं को पड़े
पड़े हो गए। तीन दिन का
34:39
सफर करने के बाद दोनों सैनिक एक श्याम नगर पहुंचता है और एक
34:47
नरवरगढ़ पहुंचता है। श्याम नगर में नलका और मनसुख का कोई
पता नहीं है। नरवरगढ़ में
34:54
भी नलका और मनसुख का कोई पता नहीं है। तभी महारानी गजमोतनी
34:59
राजा नल की पत्नी उसने देखा। रानी मंझा ने देखा और महाराज
प्रथम ने देखा तो सैनिक से
35:07
कहने लगे कि सैनिक तुम यहां कैसे आए कि महाराज बंगाल की सेम
पर सेनाएं पड़ी हुई
35:14
है और ना जाने नल और मनसुख का अपहरण किसी
35:19
ने कर लिया है। उनका कोई पता नहीं है। तो गजमोतनी सोचने लगी
कि यह काम अवश्य किसी
35:26
जादूगरनी का है। और बंगाला मैं जानती हूं वहां जादू का कोई
ठिकाना नहीं है। संपूर्ण
35:33
देश जादू से भरा हुआ है। अब उनको छुड़ाने के लिए मुझे कुछ
करना होगा। श्रोताओं उस
35:41
सैनिक से रानी गजमतनी कहने लगी कि देख सैनिक
35:47
मैं तेरे साथ चलती हूं और इसकी अनुमति मैं महारानी मंझा से
लेकर के आती हूं। महाराज
35:54
प्रथम से लेकर के आती हूं। श्रोताओं गजमोतनी महाराज प्रथम
और मंजा के कक्ष में
36:00
पहुंच जाती है और महाराज प्रथम से और मंझा से कहने लगी कि
हे महाराज हे मातेश्वरी
36:09
मुझे आप बंगाल के बॉर्डर तक जाने की अनुमति दीजिए कि क्यों
पुत्री कि मैं
36:15
जानती हूं बंगाला जादू का देश है। मैंने आपको जहां से कैद
छुड़ाई थी उस समय बंगाले
36:22
को देख लिया था। बंगाल में चारों तरफ जादू है। वहां की हर
स्त्री जादूगरनी है। और
36:30
निश्चित ही मेरे पति और मनसुख देवर का किसी ने अपहरण किया है।
किसी नारी ने हो
36:36
सकता है उन्हें तोता या बकरा बना रखा हो या बैल बना रखा हो।
मुझे जाने की अनुमति
36:42
दीजिए। श्रोताओं मंझ रानी कहने लगी कि पुत्री तुम यदि इस
वेश में जाओगी तो मार्ग
36:49
में कोई खतरा हो सकता है कि नहीं मैं आज ही सैनिक वेशभूषा
तैयार करती हूं और मैं
36:55
सैनिक भष में जाऊंगी। अब देखिए श्रोताओं इधर गजमोतनी ने
सैनिक का भष बनाया। जनाना
37:03
भष उतार के फेंक दिया। और मर्दाना भष धारण कर लिया और एक
घोड़े
37:09
पर सवार होकर के उस सैनिक के साथ चल देती है बंगाले के
बॉर्डर की तरफ। तीन दिन का
37:16
सफर करने के बाद गजमोतनी और वह सैनिक दोनों पहुंच जाते हैं
बंगाल के बॉर्डर पर
37:23
जहां महाराज मैनपाल अपनी सेना के साथ पड़े हुए हैं। महाराज
मैनपाल बड़े व्याकुल हैं।
37:29
कुछ कर नहीं सकते विवश हैं। इधर पहले श्यामनगर से जो सैनिक
भेजा था उसने आकर के
37:36
सूचना दी कि महाराज मनसुख और राजा नल श्यामनगर तो नहीं
37:41
पहुंचे। कुछ देर के बाद गजमोतनी और वह सैनिक दोनों आ जाते
हैं। उस सैनिक को देख
37:49
के गजमोतनी को देख के मैनपाल कहने लगा कि इस सैनिक को कहां
से लाए आप? तो वह सैनिक
37:55
कहने लगा महाराज ये एक विशेष प्रकार का सैनिक है। विशेष
सुसज्जित सैनिक है और ये
38:02
गुप्तचर जानता है। इसलिए इस सैनिक को मैं आपकी सेवा में
लेकर के आया हूं। मैनपाल
38:09
कहने लगा तब तो चलिए हमें इस समय इसकी आवश्यकता भी है। अब
श्रोताओं गजमोतनी ने
38:17
उस सैनिक से कह दिया था कि तुम्हें मेरा भेद नहीं बताना है।
नहीं महाराज मैनपाल क्रोधित हो जाएंगे। श्रोताओं गजमोतनी ने
38:26
दूसरा दिन हुआ। महाराज मैनपाल रो रहे हैं। विलाप कर रहे
हैं। विलाप चल रहा है। उनका
38:32
रुदन चल रहा है कि मेरे पुत्रों को कौन ले गया। खोज चल रही
है लेकिन कोई भी बंगाल के
38:39
भीतर घुसने का दुस्सा नहीं कर सकता था। अब गजमोतनी ने मन
में विचार किया कि मुझे
38:46
कुछ करना होगा। मेरे पति और मनसुख देवर को सात दिन हो गए।
38:53
वहां वो बैल और तोता बने पड़े हैं। और वो भी आंसुओं से
अश्रुधारा से रो रहे हैं।
39:00
उनकी आंखों से भी अश्रुधारा और वे दोनों
39:06
भी बड़े दुखी हैं। वो भी रो रहे हैं। यह सोच कर के गजमोतनी
ने एक नटनी का भष धारण
39:14
किया। एक नटनी का बाना धारण किया और नटनी का बाना धारण करके
चल देती है उस शहर के लिए।
39:25
जहां नल और मनसुख तोता और बैल बने हुए दो
39:31
लड़कियों की कैद में है। अब देखो श्रोताओं गजमोतनी चली जा
रही है और उधर से वो
39:41
चंद्रवती और वीरवती दोनों बहन अपने अपने पतियों को लेकर के
राजा नल और मनसुख को
39:48
लेकर के चल देती है कि आज इनके साथ हमें जंगल में विहार
करना है।
39:54
श्रोताओं दोनों उन्हें ले आती है और ला के दोनों खड़े कर
दिए। तो वीरमती कहने लगी
40:03
चंद्रकला से कि बहन पहले तुम्हारे जो पति है तोता है इसको
आदमी बनाओ।
40:10
तो चंद्रकला ने मंत्र फूंका और नल को आदमी बना दिया। और
जैसे ही नल अपने भष में आया
40:18
तो नल ने अपना तेरा खींच लिया कि तुझे काट देता हूं। तो
वीरवती कहने लगी जल्दी से
40:25
मंत्र पढ़ इसे तोता बना और फिर मंत्र पढ़ के वापस नल को
तोता बना दिया। हाथ में
40:31
पिंजरा लग रहा है और एक जो छोटी थी वीरवती उसने बैल को पकड़
रखा है। दोनों भ्रमण कर
40:38
रही है और तभी वहां गजमोतनी आ जाती है। नटनी का भेष था।
गजमोतनी ने देखा तो
40:46
पहचानने में देर नहीं लगी। गजमोतनी समझ गई कि इन दोनों
बहनों ने ही इनको परेशान कर
40:54
रखा है। इनका अपहरण किया है। मुझे अभी इनको मुक्त कराना
होगा। श्रोताओं गजमोतनी
41:00
के बारे में मैं आपको पहले ही बता चुका हूं कि उस समय यानी
मैं आपको बताऊंगा
41:06
गजमोतनी और नल का कार्यकाल है। उनका जो उत्पन्न होने का समय
है, उनका राज्य काल
41:13
है। यानी त्रेता युग के बाद में। त्रेता युग और द्वापर युग
के पहले अर्थात दोनों
41:20
का संधि काल कह सकते हैं हम क्योंकि भगवान राम के वंश में
ही पैदा हुआ था नल एक दिन
41:26
इस पर मैं अलग से वीडियो बना दूंगा कि किस काल में पैदा हुए
थे नल राजा और मंसुक
41:31
गुर्जर। अब देखो श्रोताओं उस जमाने में गजमतनी के समान
दूसरा जादूगर
41:38
कोई नहीं था। तो गजमोतनी ने देखा कि दोनों लड़कियों के साथ
हमारे पति और देवर हैं।
41:45
तो क्यों ना इस मौके का फायदा उठाया जाए। गजमतनी ने अपने
वीरों का स्मरण किया। अपने
41:51
शरीर को कीलित किया। सुरक्षा चक्र बनाया और सुरक्षा चक्र
बनाकर के उस लड़की
41:56
चंद्रकला से कहने लगी कि हे लड़की तुम्हारा यह तोता बड़ा
सुंदर है। इस तोते
42:03
को मुझे दे दीजिए। तो वह चंद्रकला कहने लगी कि जा तू कौन
होती है नटनी इस तोता को
42:10
इससे तो मैं विवाह करूंगी। यह तो मेरा पति है। गजमतनी ने
उसे समझाया कि तुम्हारी
42:16
मृत्यु को निमंत्रण दे रही हो। तो चंद्रकला कहने लगी कि आप
नहीं जानती शायद
42:22
ये बंगाला है। यहां पर विद्याओं की कमी नहीं है। एक से एक
बढ़कर के विद्या है।
42:28
तुझे भी यदि कोई कुतिया बनना है या कोई
42:34
चिड़िया बनना है। तुझे भी यदि चिड़िया बन करके मेरे इस
पिंजड़े में बंद रहना है। तो
42:40
आइए श्रोताओं जब ऐसे चंद्रकला ने कहा तो गजमतनी ने मंत्र को
आमंत्रित किया। और
42:48
चंद्रकला पर छोड़ दिया। और चंद्रकला पर जैसे ही मंत्र छोड़ा
तो चंद्रकला की उसने
42:56
एक चिड़िया बना दी। और चिड़िया बना करके पकड़ लिया अपने हाथ
में। जब वीरमती ने
43:01
देखा कि मेरी बहन को इसने चिड़िया बना लिया है। तो वीरमती
सामने आई और तभी
43:07
गजमतनी ने फिर मंत्र का प्रहार किया। और उसने अपने मंत्र से
उस वीरमती को भी
43:13
चिड़िया बना दिया। दोनों बहनों को चिड़िया बना के पिंजरे
में कैद कर लिया और नल और
43:19
मनसुख को लेकर के गजमोतनी चली आती है अपने शिविरों की तरफ।
43:25
जब शिविर से कुछ दूर रह गई तो गजमतनी ने नल को और मनसुख को
खड़ा किया और खड़ा करने
43:34
के बाद एक पात्र में जल लिया। जल को अभिमंत्रित किया और नल
पर और मनसुख पर
43:40
छींटे मारे और जैसे ही छींटे मारे तो नल और मनसुख पूर्ववत
हो गए। और जब दोनों
43:47
पूर्ववत हुए तो गजमोतनी एक वृक्ष की ओठ ले जाती है। नल कहने
लगा मनसुख से कि मनसुख
43:54
सिवाय गजमोतनी के कोई दूसरा ऐसा नहीं हो सकता जो हमारी कैद
छुड़ा ले। अवश्य ही
44:00
गजबतनी आई है। मनसुख कहने लगा कि हां भाई नल भाभी ही
एकमात्र ऐसी है जो हमें छुड़ा
44:07
सकती है। बंगाले की विद्या का तोड़ उसके पास है। देखा जाए
कहां है उसको? तो
44:14
उन्होंने खोज की तो गजमोतनी एक वृक्ष की ओठ में खड़ी हुई
है। नल उसे पहचान जाता
44:19
है। नल कहने लगा कि गजमोतनी अब तू हमसे छिपे मत। और हम
जानते हैं कि तेरे बिना हम
44:26
कासिमपुर को विजय नहीं कर सकते। तुझे हमारे साथ चलना होगा।
बंगाले का यह बॉर्डर
44:33
यह सीम हमें पार करानी होगी। श्रोताओं नल
44:38
मनसुक और गजमोतनी तीनों अपने शिविर में अपनी सेना के पास आ
जाते हैं। और जब
44:44
महाराज मैनपाल ने देखा कि उसका पुत्र राजा नल और उसकी नल की
पत्नी गजमोतनी तीनों एक
44:52
साथ आ रहे हैं तो मैनपाल की खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
मैनपाल कहने लगा कि नल
44:59
तू क्या ससुराल चला गया था? तो मनसुख
कहने लगा नहीं महाराज हमें इस बंगाले की ये दो
45:07
लड़कियां जो देखिए इस तोते में चिड़िया बनकर बंद हैं।
इन्होंने हमारा अपहरण कर
45:13
लिया था। मेनपाल कहने लगा इन चिड़ियाओं को मुझे दिया जाए।
इन्हें कैद कर लिया जाए और
45:20
समय आने पर छोड़ा जाएगा। श्रोताओं उन दोनों चिड़ियाओं को
45:25
गजमोतनी ने अपने पास कैद कर लिया है चिड़िया के रूप में
क्योंकि वह चंद्रकला
45:31
और वीरमती दोनों बहन थी। एक धोबी की पुत्री थी। अब देखिए
श्रोताओं पहले दिन
45:37
राजा नल और मनसुख अपने तंबू में आ जाते हैं और सेना को कच
का आदेश दे दिया जाता
45:44
है। सेना पहले दिन का सफर करती है और बीच बंगाल में जाकर के
अपना अगले दिन का पड़ाव
45:51
लगा देती है। देखिए श्रोताओं से को आदेश दे देते हैं कि
यहां से प्रस्थान किया जाए
45:57
कासिमपुर की तरफ। श्रोताओं संपूर्ण सेना बंगाली शहर को पार
करती हुई निकल जाती है
46:05
और जैसे ही बंगाल को पार किया तो वो कासिमपुर की सीमा में
पहुंच गए। परंतु
46:13
मैंने आपको बताया था पहले ही कि उनके विवाह की एक शर्त थी
कि कासिमपुर में
46:18
प्रवेश करने से पहले आपको एक वन से गुजरना होगा। एक जंगल से
निकलना होगा और उस जंगल
46:26
में कुछ दैत्यों ने, कुछ दानवों
ने अवैध कब्जा कर लिया है। वो उस क्षेत्र को हमारे
46:33
राज्य से हथियाना चाहते हैं तो आपको पहले उस वन क्षेत्र को
मुक्त कराना होगा। अब
46:39
देखिए श्रोताओं जैसे ही कासिमपुर की सीम में प्रवेश किया तो
वन क्षेत्र जब दिखाई
46:46
दिया तो राजा नल ने आदेश दे दिया अपने सेवकों को कि यहीं
सेना का पड़ाव डलवा
46:52
दिया जाए। सेनापतियों को आदेश दिया कि सेना को यहीं रोक
दिया जाए और पहले इस वन
46:59
को विजित करना होगा। अब देखो श्रोताओं शाम का वक्त था। सेना
वहीं रोक दी गई। संपूर्ण
47:06
सेना पड़ी हुई है। दो लाख की फौज के साथ राजा नल, मनसुख गुर्जर और महाराज मैनपाल
47:14
वहां रुके हुए हैं। दूसरे दिन प्रातः काल का वक्त हुआ तो
राजा नल महाराज मैनपाल से
47:21
कहने लगे कि महाराज इस वन में दाने हैं और उन दानों को
हराना है। तो मैनपाल कहने लगा
47:29
बेटे नल तुम ही एक महापराक्रमी योद्धा हो जो इन दानों को
हरा सकते हैं। तो नल कहने
47:36
लगा महाराज आप चिंता ना करें। मेरे साथ आप केवल एक सैनिक
टुकड़ी भेजें। मैं 20,000
47:43
की सेना लेकर के दानों से युद्ध करने के लिए जा रहा हूं।
श्रोताओं राजा नल
47:50
सुसज्जित हो जाते हैं युद्ध के लिए। और 20,000 की सेना लेकर के उस वन क्षेत्र में
47:57
प्रवेश कर जाते हैं। जब वन में प्रवेश किया तो दानवों ने
देखा कि कोई मानव हमारे
48:03
क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है। तो दानव सेना ने उन पर
आक्रमण कर दिया। अब देखो
48:11
राजा नल तो अवतार थे। चार कला से पैदा थे। मां भवानी के
भक्त थे। परंतु जो सेना थी
48:19
दानवों ने कुछ समय में ही नष्ट कर डाली। 20,000 जवानों को ध्वस्त कर दिया दैत्यों
48:25
ने। खा गए उन सैनिकों को। हाथी, घोड़ा, पैदल जो भी
थे उन सबको खा गए। राजा नल
48:33
देखते रह गए और 20,000 की सेना
समाप्त हो गई। पहले दिन राजा नल ने बहुत से दानों का
48:39
संघार किया। बहुत से दानों को मार गिराया। परंतु श्रोताओं
दाने अतुलित बलशाली थे।
48:47
राजा नल उनका कुछ ना बिगाड़ सके। और तब तक शाम का वक्त हो
गया। राजा नल वापस अपने
48:54
शिविर को सेना की संपूर्ण सेना को बलिदान करने के पश्चात
49:00
लौट आते हैं। महाराज मैनपाल ने जब यह देखा तो राजा नल से
कहने लगे बेटे नल मैंने
49:07
तुम्हारे साथ 20,000 सैनिक भेजे
थे। क्या हुआ उनका? तो राजा नल के पास कोई जवाब
49:12
नहीं था कि महाराज 20,000 सैनिक रणभूमि
में मारे जा चुके हैं। दानवों ने खा लिया
49:20
20,000 की सेना को तो मैनपाल घबरा जाते हैं कि जब 20,000 सैनिक मात्र 4 घंटे के
49:27
युद्ध में समाप्त हो गए। दाने खा गए तो हमारी 2 लाख की सेना 4 दिन में
समाप्त हो
49:34
जाएगी। राजा नल, मनसुख गुर्जर, गजमोतनी
49:39
चारों की चारों एक शिविर में एकत्र हो जाते हैं और विचार
विमर्श चल रहा है कि
49:46
किस तरीके से इस दुर्ज क्षेत्र को विजित किया जाए। दानों को
हराया जाए। तो गजमतनी
49:53
कहने लगी महाराज आप क्यों चिंता करते हैं? आप कोई भी सेना ना ले जाकर के अकेले युद्ध
50:00
भूमि में जाएं। आप में ना जाने कितने दानों को मारने की क्षमता
है। आप ही युद्ध
50:07
करेंगे। श्रोताओं मैनपाल कहने लगे कि नहीं पुत्री यदि नल
समाप्त हो गए वीरगति को
50:15
प्राप्त हो गए तो फिर हमारी सेना कभी भी कासिमपुर नहीं
पहुंच सकती। परंतु नल कहने
50:21
लगे कि महाराज आप चिंता ना करें। मुझ पर भरोसा रखें। आज के युद्ध
में मैं दानों का
50:28
सफाया कर दूंगा। और जो दानों का प्रधान है जो महाराज है
उसको मैं बंदी बना लाऊंगा।
50:36
श्रोताओं दूसरे दिन महाराज नल वीरवरन घोड़ा पर सवार हो गया।
जल दरियाई घोड़ा था
50:43
राजा नल के पास जो जल थल गगन तीनों में समान गति से चलता
था। राजा नल अपने घोड़े
50:50
पर सवार हो गया। सात धार का जो खाड़ा था उसके पास घुमा सुर
दाने का वो खाड़ा निकाल
50:58
लिया और उस खाने को लेकर के राजा नल चल देता है उस वन को
विजित करने के लिए
51:05
श्रोताओं सुबह से शाम तक राजा नल ने युद्ध किया परंतु
दानवों की कोई कमी नहीं आई।
51:14
दानवों की सेना बहुत विशाल थी। दूसरे दिन के युद्ध में भी
राजा नल वापस आ
51:21
गए। इसी तरीके से युद्ध करते करते 15 दिन
51:26
का समय व्यतीत हो जाता है। परंतु श्रोताओं राजा नल उन दानों
को पराजित नहीं कर सके।
51:34
जब दाने प्रतिदिन मरने लगे तो इधर दानों के सरदारों ने चार
दाने उनके सरदार थे। उस
51:43
क्षेत्र पर आधिपत्य किए हुए थे। तो वो चारों मन में विचार
करने लगे कि हमारे
51:48
दाने प्रतिदिन घट रहे हैं और वो कैसा मानव है जो अकेला ही
रणभूमि में आता है। सेना
51:55
नहीं लाता। आज हम चारों को चलना होगा और आज ही हम उसको
समाप्त कर देंगे। श्रोताओं
52:02
अगले दिन के युद्ध में वो चारों के चारों दाने जो मुखिया
थे। उस वन के कहना चाहूंगा
52:10
एक तरीके से राजा थे। चारों दाने अपनी चार सैनिक टुकड़ियों
के साथ चल देते हैं राजा
52:17
नल को पराजित करने के लिए। जब राजा नल अपने वीरवरण घोड़ा पर
सात धार
52:25
की तलवार को लेकर के आए तो उन दानों ने राजा नल को पहचान
लिया। श्रोताओं आपको याद
52:32
दिलाना चाहूंगा कि राजा नल ने जब गजमोतनी से विवाह किया था
तो चार दाने घुमासुर
52:40
दाने की जेल में थे कैद में थे। राजा नल ने उन चारों दानों
को मुक्त करा दिया था
52:47
और वो चारों दाने राजा नल से वचन देकर के गए थे कि जब आपको
हमारी आवश्यकता हो हम
52:54
आपको सहारा देंगे। आपकी मदद करेंगे। श्रोताओं उन चारों
दानों ने वहां से निकल
53:01
कर के कासिम के वन क्षेत्र पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया
था। तो वो चारों
53:08
दाने राजा नल को देखकर के हतप्रब रह गए।
53:14
चारों आपस में बात करने लगे। सेना को रोक दिया गया कि रुक
जाओ। चारों कहने लगे ये
53:20
वही राजकुमार है। इस राजकुमार ने ही तो हमें घुमासु दैत्य
की कैद से मुक्त कराया
53:27
था। और ना जाने हमने इसकी कितनी सेना को क्षतिग्रस्त कर
दिया है। कितने सैनिक मारे
53:33
जा चुके हैं। चारों दैत्य जो चारों दाने थे अपने हथियार डाल
देते हैं। सेना भी
53:40
हथियार डाल देती है। राजा नल ने उन दानों को देखा तो राजा
नल को भी पहचानने में देर
53:46
ना लगी। चारों दाने और राजा नल एक दूसरे की तरफ
53:51
देख रहे हैं। दाने कहने लगे कि राजकुमार आप इस क्षेत्र में
आए और हमने आपका अनादर
53:59
किया। इसके लिए हम शर्मिंदा हैं। आप बताइए हमसे क्या चाहते
हैं? राजा नल कहने लगे
54:06
वीर श्रेष्ठ दानवों तुमने कोई गलत काम नहीं किया। रणभूमि
में युद्ध करना एक वीर
54:13
का काम होता है। तुमने वही काम किया जो एक वीर को करना
चाहिए। तो दाने कहने लगे कि
54:20
राजा नल अब मुझे यह बताओ कि हमें क्या आज्ञा है? राजा नल कहने लगे देखिए दानवों
54:26
तुम जानते हैं कि मैं मेरे मित्र मनसुख को लेकर के राजा
कासिम सिंह के यहां विवाह
54:34
करने जा रहा हूं। मेरी बारात इस वंश से निकलेगी। तो दाने
कहने लगे कि राजा नल
54:42
आपका स्वागत है। आपकी बारात को भोजन व्यवस्था हमारी तरफ से
होगी। तो राजा नल
54:47
बोले कि नहीं तुमको एक काम करना होगा। तुम्हें यह क्षेत्र
छोड़ना होगा। और आज के
54:54
बाद तुम बबरी वन में चले जाइए। अपना साम्राज्य वहां स्थापित
कीजिए और जब मुझे
55:00
तुम्हारी आवश्यकता होगी तो मैं तुम्हें याद कर लिया करूंगा।
श्रोताओं चारों दाने
55:07
नल से गले मिले और गले मिलने के बाद नल से अनुमति लेकर के
चारों के चारों अपनी सेना
55:15
सहित उस वन प्रदेश को खाली कर देते हैं और चारों दाने चले
जाते हैं बबरी वन में। अब
55:24
देखिए श्रोताओं राजा नल ने जब उस क्षेत्र को विजित कर लिया
तो महाराज मैनपाल से कहा
55:30
कि राजन ध्यान से सुनिए मैंने इस संपूर्ण क्षेत्र के दानों
को भगा दिया है। यहां
55:37
कोई भी दाना आपको नजर नहीं आएगा। हमारी सेना को सम्मान सहित
आगे बढ़ने का आदेश
55:44
दिया जाएगा। श्रोताओं महाराज मैनपाल ने अपने सेनापतियों को
कूच का आदेश दे दिया
55:51
और कुछ ही समय में महाराज मैनपाल की सेना उस वन क्षेत्र को
55:58
पार कर गई और पार करने के बाद आ जाती है सेना कासिमपुर में।
कासिमपुर के मैनों पर
56:06
सेना ने अपना पड़ाव डाल दिया और महाराज मैनपाल ने अपना
दरबार सजाया। दरबार सजाने
56:14
के बाद एक खतवाहक को बुलाया। एक पत्रवाहक को बुलाया और
पत्रवाहक को एक पत्र देकर के
56:22
महाराज कासिम सिंह के दरबार में भेजा और लिख दिया कि हम
56:30
महाराज मैनपाल श्याम नगर नरेश अपने पुत्र
56:35
मनसुख का विवाह करने आपके राज्य में आ चुके हैं। श्रोताओं
वह खत पत्रवाहक को
56:42
दिया और पत्रवाहक उस खत को लेकर महाराज कासिम सिंह के दरबार
में पहुंच जाता है।
56:49
महाराज कासिम सिंह को वो खत दिया तो महाराज कासिम सिंह
सोचने लगे कि मैनपाल
56:57
वास्तविकता में एक पराक्रमी राजा दिखाई देता है। क्योंकि उस
वन क्षेत्र को विजित
57:03
करना आसान नहीं था। मेरे पास इस संसार के सर्वश्रेष्ठ
योद्धा हैं। मेरा पुत्र भयंकर
57:10
सिंह, बूंदा और
विश्वजीत तीनों इतने सक्षम है कि संसार के समस्त
57:17
राजाओं को जीत सकते हैं। परंतु इस वन क्षेत्र को नहीं जीत
पाए। तो महाराज
57:24
मैनपाल ने इस क्षेत्र को कैसे विजित कर लिया? तो उधर से वो पत्रवाहक वापस आ जाता
57:32
है और महाराज कासिम सिंह एक खत लिखते हैं और उस खत में
उन्होंने लिख दिया कि आपका
57:40
कासिमगढ़ की सीमा में स्वागत है। परंतु महाराज मैनपाल आपको
हमारे नगर के प्रवेश
57:48
द्वार पर एक भगवान शंकर का मंदिर है। जो हमारे इस नगर का
पूर्व दिशा का दरवाजा है।
57:57
उस दरवाजे पर भगवान शंकर का मंदिर है। उसका दरवाजा हमेशा
लगा रहता है और उस
58:05
मंदिर में एक शेरनी रहती है। हमारा उस शेरनी से समझौता है।
हम प्रतिदिन उसके
58:13
भोजन की व्यवस्था करते हैं। हे राजन सबसे पहले आप उस शेरनी
को इस क्षेत्र से दूर
58:20
भगाइए। अब देखिए श्रोताओं वो खत लेकर के पत्रवाहक महाराज
मैनपाल के दरबार में आ
58:28
जाता है। महाराज मेनपाल ने उस पत्र को पढ़ा तो पत्र पढ़ने
के बाद जो दूत था,
58:35
पत्रवाहक था, उसे तो
सम्मान सहित भेज दिया और अपने दरबार में सातपान का बीड़ा लगा
58:42
करके डलवाया कि कोई भी योद्धा इस शहर कासिमपुर के पूरब
दरवाजे पर बने भगवान शिव
58:51
के मंदिर में से उस शेरनी को यहां से भगा देगा। उसे मुंह
मांगा इनाम दिया जाएगा। अब
58:58
देखिए श्रोताओं महाराज मैनपाल के दरबार में एक से एक बड़ा
59:03
योद्धा था। बड़े-बड़े गुर्जर योद्धा, बड़े-बड़े महाराज, नलके, सेनापति,
59:10
बड़े-बड़े योद्धा परंतु किसी की हिम्मत नहीं हुई। हर कोई
जानता था कि वो भगवान
59:16
शंकर की वरदानी शेरनी है। तो किसी ने भी उस पान के बीड़े को
नहीं खाया। तो मैनपाल
59:23
कहने लगे कि बेटे नल इस कासिमगढ़ में इस कासिमपुर शहर में
मेरी बेइज्जती हो रही
59:31
है। मेरी इज्जत धूमिल हो रही है। मेरे यहां कोई भी योद्धा
इस वीणा को खाने वाला
59:38
नहीं है। जब तक शेरनी नहीं मरेगी तो महाराज मैनपाल
59:44
से हम विवाह का प्रस्ताव नहीं रख सकते। उनकी शर्त है कि
शेरनी को भगाना होगा या
59:50
मारना होगा। अब देखो श्रोताओं जब राजा नल ने यह सुना
59:56
तो राजा नल ने माता भवानी का स्मरण किया। भवानी का स्मरण
करने के बाद वो बीड़ा
1:00:03
उठाया और बीड़ा खा लिया कि महाराज मैं जाऊंगा उस शेरनी से
युद्ध करने के लिए।
1:00:10
महाराज मैनपाल को मैनपाल ने एक खत लिख के सूचना भिजवा दी
महाराज
1:00:18
कासिम सिंह को कि मेरा शेर तुम्हारी शेरनी को भगाने जा रहा
है। श्रोताओं राजा नल
1:00:25
अपने जल दरियाई घोड़ा पर सवार हो गए। अपने वीरवरण घोड़ा पर
सवार हो गए। सात धार का
1:00:32
खाड़ा हाथ में ले लिया और चल देते हैं उस जो किला था उसके
पूर्वी दरवाजे की तरफ
1:00:40
जहां भगवान शंकर का मंदिर बना हुआ था। भगवान शंकर के मंदिर
पर जब राजा नल चलने
1:00:48
लगे तो उस शहर के लोग उस शहर के नर नारी
1:00:53
अपनी छतों से देख रहे थे कि किस तरीके से महाराज मैनपाल उस
शेरनी को भगाते हैं।
1:01:00
अब देखो श्रोताओं ध्यान से सुनने की बातें। राजा नल जब उस
मंदिर पर पहुंचे तो
1:01:08
देखा कि मंदिर में एक शेरनी बैठी हुई है। राजा नल उस शेरनी
की तरफ देखने लगे और
1:01:15
शेरनी राजा नल की तरफ देखने लगी। राजा नल ने शेरनी को पहचान
लिया और शेरनी ने राजा
1:01:22
नल को पहचान लिया। राजा नल ने अपने हाथ से खाड़ा पृथ्वी में
डाल दिया। जो सात धार की
1:01:28
तलवार नल के हाथ में थी वो महाराज नल ने पृथ्वी पर रख दी।
महाराज नल अपने घोड़े से
1:01:35
उतर जाते हैं और उधर से शेरनी भी चलती चली आ रही है।
श्रोताओं दोनों एक दूसरे के गले
1:01:43
मिलने लगे। आपको याद दिलाना चाहूंगा श्रोताओं कि जब राजा नल
का जन्म हुआ था तो
1:01:49
राजा नल को एक शेरनी ने दूध पिलाया था। वही भगवान शंकर की
वरदानी शेरनी थी। उसी
1:01:57
को भगवान शंकर ने राजा नल को दूध पिलाने के लिए भेजा था। तो
वही शेरनी उस मंदिर
1:02:03
में रहा करती थी। वहां से उस वन को छोड़कर के और कासिमपुर
के मंदिर में आराधना के
1:02:10
लिए आ गई थी। तो नल ने उस शेरनी को पहचाना। शेरनी ने नल को
पहचाना और दोनों
1:02:16
एक दूसरे से लिपट करके मिलने लगे। शेरनी बड़ी प्रसन्न हुई।
कहने लगी बेटे नल मैं
1:02:24
तुझे देखकर के बहुत प्रसन्न हूं। तुझ जैसा पुत्र मुझे
प्राप्त हुआ। बेटे तुम यहां
1:02:29
कैसे आई? तो शेरनी से
नल कहने लगा माता मैं मेरे मित्र का विवाह करने के लिए इस
1:02:37
कासिमपुर में आया हूं। और यहां के महाराज की शर्त है कि जो
मंदिर पर शेरनी रहती है
1:02:45
उस शेरनी को इस मंदिर से भगाना होगा। हे मातेश्वरी मैं
तुमसे निवेदन करता हूं कि
1:02:53
आप नरवरगढ़ चली जाए। शेरनी कहने लगी बेटे नल मैं हमेशा तेरे
साथ रहना चाहती हूं।
1:03:00
मैं तेरी आज्ञा से तू मेरा पुत्र है। मैंने मेरे पुत्र को
दूध पिलाया और तुझे
1:03:05
दूध पिलाया। मैं तुझसे ये अपेक्षा करती हूं कि तू मेरे
1:03:11
दूध को नहीं लजाएगा। नल जा इस किले को विजित कर और मैं अभी
तेरी आज्ञा से
1:03:18
नरवरगढ़ जा रही हूं। श्रोताओं व शेरनी राजा नल से इस तरीके
से बात कर रही थी और
1:03:26
वहां पर वो कासिम सिंह और उसके कुछ गुप्तचर्य देख रही थी कि
इसका ये योद्धा
1:03:32
तो शेरनी से बात कर रहा है। शेरनी से गले मिल रहा है। ये
कितना पराक्रमी राजा है।
1:03:39
शेरनी वहां से छोड़ कर के चल देती है नरवरगढ़ की तरफ और वो
मंदिर खाली हो जाता
1:03:44
है। महाराज नल शेरनी को भेज करके वापस
1:03:50
अपने शिविर में आ जाते हैं। और महाराज मैनपाल से कह दिया कि
महाराज वो शेरनी
1:03:55
यहां से चली गई है। आप एक खत भिजवाइए महाराज कासिम सिंह के
लिए। देखिए श्रोताओं
1:04:03
राजा नल के कहने से महाराज मैनपाल ने एक पत्र लिखा और पत्र
को
1:04:10
लिख के भिजवा दिया महाराज कासिम सिंह के यहां। कासिम सिंह
ने वह खत पढ़ा। पूर्वी
1:04:18
द्वार खोला गया किले का। पूर्वी द्वार के मंदिर पर महाराज
कासिम सिंह पूजा करने आए
1:04:26
हैं। और जब यह पता चल गया कि शेरनी इस क्षेत्र को छोड़कर जा
चुकी है तो महाराज
1:04:32
कासिम सिंह वापस अपने किले में आ जाते हैं। अपने दरबार को
आमंत्रित किया और
1:04:38
दरबार को आमंत्रित करने के पश्चात एक पान का बीड़ा डलवाया
और अपने बड़े
1:04:45
पुत्र भयंकर सिंह को बुलाया और कहने लगा कि बेटे भयंकर सिंह
विश्वजीत और बूंदा
1:04:53
तीनों पुत्रों में से आज कोई योद्धा इस दो लाख की सेना को
हमारी सीम से दूर भगा
1:05:00
देगा। कोई यदि ऐसा योद्धा मेरे यहां है तो वो आए। और इस
बीड़ा को खाए।
1:05:08
जब वो बीड़ा पड़ा हुआ देखा तो महाराज कासिम सिंह का बड़ा
पुत्र भयंकर सिंह चलता है।
1:05:15
भयंकर सिंह ने उस पान के बीड़े को खा लिया और राजा कासिम
सिंह से कहने लगा पिताजी आप
1:05:22
मेरी चिंता ना करें। मैं आज के युद्ध में ही जो श्यामनगर की
और नरवरगढ़ की सेना है
1:05:29
उसे नरवरगढ़ तक और श्यामनगर तक नहीं छोडूंगा।
1:05:35
श्रोताओं 60 हजार की फौज
लेकर के भयंकर सिंह युद्ध के मैदान में चल देता
1:05:42
है। सूचना भिजवा दी महाराज कासिम सिंह ने महाराज मैनपाल को
कि मेरा बड़ा पुत्र
1:05:49
युद्ध के लिए आ रहा है। आप इसे बंदी बनाए या पराजित करें।
1:05:54
अब देखो श्रोताओं राजा नल ने जब यह सुना महाराज मैनपाल से
1:06:01
कि 60 हजार की फौज लेकर के उसका पुत्र भयंकर सिंह युद्ध
भूमि में आ रहा है तो
1:06:07
महाराज नल ने भी महाराज मैनपाल से अनुमति ली और 60 हजार की फौज लेकर के राजा नल भी
1:06:14
उसका सामना करने के लिए कासिमपुर के युद्ध के मैदान में आ
गए।
1:06:20
देखो श्रोताओं राजा नल चार कला से अवतार सात धार का खाड़ा
मां भवानी का वरदानी और
1:06:29
वीर वरण जैसा घोड़ा जो मनुष्य खाता था। अब
1:06:34
देखिए दोनों योद्धा आमने-सामने आ गए। भयंकर सिंह ने नल से
कहा कि योद्धा तुम ये
1:06:43
मैदान छोड़कर भाग जाओ। क्यों मेरे हाथों से मरना चाहते हैं? नल कहने लगा वीरभ
1:06:48
युद्ध तो करो। वीरों को यह शोभा नहीं देता कि बिना युद्ध
किए पराजय स्वीकार कर ले। यदि आप मुझे
1:06:56
विजित कर लेते हैं तो बंदी बना ले जाना। अब श्रोताओं दोनों
पक्षों में युद्ध आरंभ
1:07:04
हो जाता है। भयंकर सिंह भी महायोद्धा थे। उनके साथ भैरव
युद्ध किया करता था।
1:07:12
देखिए श्रोताओं प्राचीन समय के जो राजा थे उनके साथ देवियां
काली चंडी और भैरव जैसे
1:07:21
देवता गण युद्ध किया करते थे। अब भैरव
1:07:26
भयंकर सिंह का साथ दे रहा था। राजा नल और भयंकर सिंह में
बहुत बड़ा युद्ध चल रहा
1:07:33
था। दोनों में बार पर बार हो रही थी। परंतु कोई भी योद्धा
हार नहीं मान रहा था।
1:07:40
युद्ध करते करते तीन पहर का समय व्यतीत हो गया। परंतु ना
1:07:45
राजा नल की जीत हुई और ना भयंकर सिंह की जीत हुई। गजमोतनी
ने मन में विचार किया कि
1:07:52
मेरे स्वामी रणभूमि में अकेले ही गए हैं। और भयंकर सिंह के
पास हो सकता है कुछ जादू
1:07:59
हो तो मुझे भी रणभूमि में चलना चाहिए। रानी गजमोतनी ने
जनाना भेष उतारा फेंक
1:08:06
दिया उतार कर के। और मर्दाना भष धारण किया। एक सैनिक की
भेशभूषा धारण की और
1:08:13
अपने अस्प पर सवार होकर के पहुंच जाती है रणभूमि में।
महाराज नल ने देखा कि गजमोतनी
1:08:20
उसके पास आ गई है। तो राजा नल गजमोतनी से कहने लगे कि देखिए
रानी मुझे युद्ध
1:08:27
करते-करते तीन पहर का समय बीत गया है। परंतु मैं इसे बंदी
नहीं बना सका। यह
1:08:32
भयंकर सिंह महाभट योद्धा है और इसके साथ दैय शक्ति युद्ध कर
रही है। स्वयं भैरव
1:08:40
इसके साथ युद्ध भूमि में इसकी सुरक्षा कर रहा है। यह बात जब
गजमोत्नी ने सुनी तो
1:08:46
गजमोतनी कहने लगी मत घबराओ मैं अभी इसको बंदी बनवा देती
हूं। राजा नल कहने लगे कि
1:08:54
तुम क्या करोगी कि मेरे पास वीर हैं और अभी मैं मेरे वीरों
का स्मरण करती हूं और
1:09:00
इसे बंदी बनवाती हूं। श्रोताओं इधर गजमोतनी ने अपने चार
वीरों को याद
1:09:06
किया और चारों वीरों ने इकट्ठा होकर के भयंकर सिंह पर
आक्रमण किया। इधर राजा नल
1:09:13
ने तलवार से जो हाथी के ओदा पर विराजमान था। उस भयंकर सिंह के
रस्सा काट दिए और
1:09:21
रस्सा कटते ही भयंकर सिंह जमीन पर गिर पड़ा। बड़ा अघोर
युद्ध हुआ। मल युद्ध चलने
1:09:28
लगा राजा नल में और भयंकर सिंह में। दोनों का युद्ध एक घड़ी
तक चला और एक घड़ी के
1:09:35
युद्ध के बाद राजा नल ने भयंकर सिंह को भूमि पर डाल लिया और
उसी का जो सेरा था
1:09:42
जिसको फेंटा कहते हैं उसी का फेंटा उतार लिया और उसकी
मस्कें चढ़ा ली उसको बांध
1:09:49
लिया बांध करके महाराज नल ने भयंकर सिंह को खींचना आरंभ कर
दिया और खींचते हुए
1:09:57
भयंकर सिंह को अपने शिविर की तरफ ले जाने लगे जब
1:10:02
कासिम सिंह की सेना ने यह देखा कि हमारा प्रधान सेनापति
बंदी बन चुका है तो देखिए
1:10:09
श्रोता उस सैनिकों में दम नहीं होती। सेना हमेशा कमांडर के
पीछे युद्ध करती है।
1:10:15
सेनापति के पीछे युद्ध करती है। जब सेनापति बंदी बन गया तो सेना का धैर्य छूट
1:10:21
गया। और जब सेना का धैर्य छूट गया तो सेना कासिमगढ़ की तरफ
भाग गई।
1:10:28
और नल उस भयंकर सिंह को बंदी बना करके अपने शिविर में ले
आए। डरवा दिया उसको
1:10:35
कैदखाने में कि इसको कैदखाने में बंद कर दिया जाए। जेल में
बंद कर दिया जाए।
1:10:41
श्रोताओं भयंकर सिंह सलाखों के पीछे पड़ा हुआ है और महाराज
नल भी अपनी सेना को लेकर
1:10:49
के वापस अपने शिविरों में आ जाते हैं। इधर राजा नल और
महाराज मैनपाल मनसुख गुर्जर और
1:10:56
गजमोतनी विचार कर रहे हैं और उधर कासिम सिंह राजा विचार
विमर्श में है कि
1:11:05
क्या ये सभी शर्तों को जीत पाएंगे? अब देखिए श्रोताओं पहले दिन का युद्ध बूंदा
1:11:12
से समाप्त हो गया है। यह वीडियो अब काफी लंबा हो चुका है।
अब मैं यह वीडियो समाप्त
1:11:18
करने की आप सभी श्रोताओं से अनुमति लेता हूं और कल के
वीडियो में आपको बताऊंगा कि
1:11:24
राजा नल किस तरीके से बूंदा को हराते हैं और अपने मित्र का
विवाह करते हैं। तो
1:11:31
देखिए श्रोताओं आप सभी से अनुमति लेने के पश्चात अब यह
वीडियो मैं समाप्त कर रहा
1:11:37
हूं।
17.
0:00
मेरे समस्त सब्सक्राइबर बंधुओं, श्रोताओं
0:04
और भक्तों आप सभी का हमारे YouTube चैनल
0:07
पर एक बार स्वागत और अभिनंदन है। श्रोताओं
0:11
जैसा कि आप जानते हैं हमारी कहानी चल रही
0:14
थी नल पुराण इतिहास में से और उसके 21
0:18
एपिसोड आपकी सेवा में प्रसारित कर चुका था
0:21
और 22वां एपिसोड आपकी सेवा में लेकर के
0:24
उपस्थित हूं। परंतु श्रोताओं मैं आपसे एक
0:28
निवेदन करना चाहूंगा कि हमारे वीडियोस पर
0:32
लाइक बहुत कम आते हैं। अब यह मैं नहीं
0:35
जानता कि आपको वीडियो पसंद आता है या नहीं
0:38
आता। तो श्रोताओं वीडियो को लाइक करना ना
0:41
भूलें जिससे हमें उत्साह मिले। आइए
0:44
श्रोताओं आपकी सेवा में मैं 22वां एपिसोड
0:47
लेकर के उपस्थित हूं और आपका ध्यान 21वें
0:50
एपिसोड से जोड़ता हूं। 21वें एपिसोड
में
0:53
मैंने आपको बताया था कि महाराज मैनपाल
0:57
अपनी बारात को लेकर के दानवों के क्षेत्र
1:01
को विजित करते हुए पहुंच जाते हैं
1:05
कासिमपुर और कासिमपुर के राजा को सूचना
1:09
भिजवा देते हैं। वहां राजा नल जिस शेरनी
1:13
ने दूध पिलाया था उस शेरनी को देवी के
1:16
मंदिर से नरवरगढ़ भेज देते हैं। और जब
1:20
राजा कासिम सिंह को इसकी सूचना मिलती है,
1:23
तो अपने बड़े पुत्र भयंकर सिंह को युद्ध
1:26
के लिए भेजता है जिसे राजा नरबंदी बना
1:30
लेते हैं। अब देखिए श्रोताओं यहां से
1:33
हमारा आज का एपिसोड आरंभ होता है। जब
1:37
कासिमपुर की सेना भाग करके महाराज कासिम
1:41
सिंह के पास पहुंची। तो कासिम सिंह कहने
1:44
लगा क्या हुआ सैनिकों कि महाराज हमारे
1:47
प्रधान सेनापति
1:49
भयंकर सिंह बंदी बन चुके हैं तो महाराज
1:54
कासिम सिंह आग बबूला हो गई और अपने
1:57
महापराक्रमी पुत्र बूंदा को बुलाया। बूंदा
2:01
की एक विशेषता थी श्रोताओं यदि बूंदा के
2:04
शरीर से रक्त की एक बूंद भी पृथ्वी पर
2:08
गिरी तो 100 बूंदा बनकर
तैयार हो जाती थी।
2:12
उसे हराना संभव नहीं था और फिर भगवान शंकर
2:16
का वरदानी था। अब देखो श्रोताओं
2:21
बूंदा को बुलाया महाराज कासिम सिंह ने और
2:24
बूंदा से कहा बेटे फौज तैयार करो और जो
2:28
हमारे सीमा पर हमारे मेड़ों पर जो फौज
2:32
पड़ी हुई है उस फौज को नरवरगढ़ तक मार मार
2:35
करके भगा दीजिए। उसमें कोई राजा नर बताया।
2:39
बड़ा भारी विकराल योद्धा है। उसने हमारे
2:42
पुत्र भयंकर को कैद कर लिया है। श्रोताओं
2:46
जब बूंदा ने यह बात सुनी तो क्रोधित हो
2:49
गया। लाल नेत्र हो गए। अपनी फौज को आदेश
2:53
दे दिया और सेना को तैयार करके आननफानन
2:58
में ही चढ़ाई कर दी। धावा बोल दिया महाराज
3:04
मैनपाल की सेना पर और वो जब तक संभलने
3:07
नहीं पाए सेना तैयार नहीं हो पाई। उससे
3:11
पहले बूंदा ने आक्रमण कर दिया। अब देखो
3:15
उधर से पता चला हड़बड़ी मची सेना में तो
3:18
महाराज नल स्वयं युद्ध करने के लिए आए।
3:21
उधर से मनसुख भी युद्ध भूमि में उतर गए और
3:23
महाराज मैनपाल भी युद्ध भूमि में उतर गए।
3:26
क्यों? क्योंकि
बूंदा ने किसी को अवसर
3:28
नहीं दिया युद्ध के मैदान में आने का।
3:31
उनके शिविरों पर आक्रमण कर दिया गया।
3:34
बूंदा महापराक्रमी योद्धा था।
3:37
युद्ध करता जा रहा है और उसके सामने कोई
3:40
भी योद्धा नहीं टिक पा रहा है। अब देखिए
3:43
श्रोताओं राजा नल को जब इस बात का पता चला
3:46
कि बूंदा महापराक्रमी है तो स्वयं महाराज
3:50
नल और मनसुख दोनों मिलकर के उसका सामना
3:53
करने के लिए चले। श्रोताओं दो योद्धाओं ने
3:57
घेर लिया। महापराक्रमी थे दोनों योद्धा और
4:00
उन्होंने घेर लिया है बूंदा को। बूंदा
4:03
युद्ध भूमि में आग उबल रहा है। उसकी तेग
4:07
के सामने जो कोई आ जाता है वो जीता नहीं
4:10
जाता। उसे यमलोक की सैर करनी पड़ती है। तो
4:14
महाराज नल और मनसुख दोनों दोस्त आपस में
4:18
बतलाए कि मित्र इसको हम रोकेंगे।
4:21
राजा नल और मनसुख दोनों आक्रमण कर देते
4:24
हैं। और जब दोनों ने उस पर तेक के वार
4:27
किए। राजा नल ने अपनी सात धार की तलवार
4:31
चढ़ाई और उसका सर धड़ से अलग कर दिया काट
4:35
करके और जैसे ही सर को धड़ से अलग किया तो
4:39
100 बूंदा तैयार हो गई। जब एक बूंदा था अब
4:43
100 बूंदा हो गई और 100 बूंदाओं ने
4:47
सुसज्जित होकर के आक्रमण किया। एक-एक नल
4:51
पर नल अकेले थे। मनसुक अकेला था। उन उन पर
4:56
50-50 योद्धा हो गए। 50-50 बूंदाओं ने
घेर
4:59
लिया चारों ओर से। महाराज नल और मनसुख
5:04
आश्चर्य में पड़ गए कि अब क्या होने वाला
5:06
है। श्रोताओं महाराज नल देवी के प्रताप से
5:12
उनको पराजित करने में लगे हुए हैं। पछाड़
5:15
रहे हैं उन बूंदाओं को। परंतु
5:19
देखिए मनसुख कमजोर पड़ जाते हैं और युद्ध
5:23
भूमि से पीछे हटने लगे और जिस जेल में
5:26
भयंकर सिंह कैद था उस जेल पर बूंदाओं ने
5:30
आक्रमण कर दिया क्योंकि बूंदा 100 हो गए
5:34
थे और अब डर की वजह से नल उसका सर धड़ से
5:38
अलग नहीं कर रहे हैं। जितने बूंदाओं को
5:40
काटा उससे कहीं 100 गुने बूंदा
तैयार हो
5:44
जाती।
6:00
युद्ध भूमि की स्थिति बड़ी विकराल हो गई।
6:04
महाराज मैनपाल के शिविर पर आक्रमण कर दिया
6:07
है वृंदाओं ने। और जो जेल थी जिसमें भयंकर
6:11
सिंह कैद था उस भयंकर सिंह को छुड़ा लिया
6:14
है मुक्त करा लिया बूंदा ने और युद्ध करते
6:17
करते शाम का वक्त हो गया परंतु किसी भी
6:20
तरफ की ना हार हुई और ना जीत हुई बूंदा
6:25
युद्ध में से भयंकर सिंह को छुड़ा करके
6:27
वापस लौट जाता है कासिमपुर और इधर जब राजा
6:32
नल अपनी सेना को संभालने लगा तो सेना वापस
6:36
शिविरों में बुलाई तो तो देखा कि सेना को
6:39
बड़ी भारी क्षति पहुंचाई है। सेना के 60
6:42
हजार जवान एक ही दिन में तहस-नहस हो गए।
6:45
मारे गए रणभूमि में। श्रोताओं महाराज
6:48
मैनपाल
6:50
राजा नल और मनसुख बैठकर के विचार करने
6:53
लगे। यदि इसने कल इसी तरीके से युद्ध किया
6:56
तो हमारी सेना को दो दिन में साफ कर देगा।
7:00
क्योंकि इसने 60 हजार फौज एक
दिन में
7:03
समाप्त कर दी। राजा नल कहने लगे कि इसका
7:07
कोई ना कोई हमें तोड़ ढूंढना होगा और अब
7:10
तो भयंकर सिंह भी मुक्त हो गए हैं। कल
7:13
दोनों भाई एक साथ आक्रमण करेंगे और उनका
7:16
सामना करना पड़ेगा। महाराज मैनपाल कहने
7:19
लगे कि बेटे नल इसका यदि हमने कोई उपाय
7:23
नहीं खोजा तो हमें कल ही यहां से भागना
7:27
पड़ेगा। यह सीमा छोड़नी पड़ेगी। तुम तो कह
7:30
रहे थे कि मैं विवाह करके लाऊंगा। परंतु
7:34
हम तो यहां हो सकता है प्राणों से हाथ धो
7:36
बैठे। राजा नल कहने लगे कभी क्षत्रिय पीछे
7:40
नहीं हटते। रणभूमि में बलिदान हो जाते
7:43
हैं। वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। पर
7:46
सच्चा क्षत्रिय रणभूमि से पीछे नहीं हटता
7:49
महाराज। हमें उसकी चुनौती स्वीकार है।
7:53
बैठे हुए विचार कर रहे हैं। तभी गजमोतनी
7:56
का प्रवेश गजमोतनी आकर के बैठ जाती है।
8:00
महाराज नल से कहने लगी कि महाराज आप चिंता
8:04
मत कीजिए। मैंने बूंदा का तोड़ खोज लिया
8:08
है। कि बताओ क्या तोड़ है? कहने लगी कि
8:12
सात धातु की जो धातु बहुत मजबूत हो। सात
8:18
धातुओं से मिक्सर
8:21
चार मोगरी बनवाइए। मोंगरी कहते हैं सोटे।
8:25
चार मोगरी बनवाओ और जब बूंदा रणभूमि में
8:29
आए तो ध्यान रखना बूंदा के शरीर से रक्त
8:33
की एक भी बूंद नहीं निकल जाए। और मेरे
8:37
आठों वीरों को मैं बूंदा पर आक्रमण
8:39
करवाऊंगी। और जब बूंदा पृथ्वी पर गिर जाए
8:43
तो महाराज नल को और महाराज मनसुख को दोनों
8:47
को एक साथ बूंदा पर आक्रमण करना है और
8:50
मोग्रियों से उसकी कुटाई करनी है। ध्यान
8:53
रहे उसका शरीर कहीं से फटना नहीं चाहिए।
8:57
यदि शरीर फट गया और रक्त निकल गया तो 100
9:00
बूंदा तैयार हो जाएंगे और हम उन्हें
9:03
पराजित नहीं कर पाएंगे। श्रोताओं
9:06
गजमोत्नी ने ऐसा ही करवाया।
9:10
चार शानदार असल धात की मोरी बनवाई और
9:14
दूसरे दिन युद्ध भूमि में पहले से ही
9:17
सुसज्जित हो गई कि बूंदा हमें अवसर नहीं
9:19
देगा वो आक्रमण करेगा श्रोताओं 500 की फौज
9:25
लेकर के राजा नल स्वयं मनसुख महारानी
9:30
गजमोतनी
9:32
तीनों की तीनों रणभूमि के लिए चल देते
9:35
हैं। उधर बूंदा अपने पिता से कहने लगा
9:39
पिताजी आज मैंने 60 हजार नरवर की
फौज को
9:43
काट डाला है। कल के युद्ध में जो राजकुमार
9:47
है विवाह करने आया है। उस राजकुमार को और
9:50
उसका साथी राजकुमार नल है उसको बंदी बना
9:53
लाऊंगा। अब देखिए श्रोताओं बूंदा और भयंकर
9:58
सेन और तीसरा विश्वजीत तीनों भाइयों ने एक
10:02
साथ मिलकर के आक्रमण किया।
10:05
और आक्रमण की रफ्तार इतनी तेज थी कि उसका
10:10
मुकाबला करना संभव नहीं था। विश्वजीत बामन
10:14
गढ़ों को जीत चुका था। केवल नरवरगढ़ शेष
10:18
रहा था उससे। उसका सामना कोई नहीं कर सकता
10:21
था। इसलिए विश्वजीत नाम था उसका। बड़ा
10:24
सुभट हाथियों को फेंकने वाला।
10:28
देखिए श्रोताओं इसमें संदेह ना करें कि
10:31
राजा नल का जो समय है वह भगवान श्री राम
10:34
से पांच पीढ़ी बाद है। उसी वंश में मैं
10:37
आपको किसी दिन इस पर अलग से वीडियो बना
10:40
दूंगा। द्वापर युग का प्रारंभिक समय मान
10:44
लीजिए और त्रेता युग का अंतिम समय मान
10:48
लीजिए। दोनों का जो मिलन काल है, संधि काल
10:51
है। उस समय पर राजा नल पैदा हुए थे। तो उस
10:56
समय ऐसे ही विकराल भट्ट योद्धा होती थी तो
11:01
आक्रमण की रफ्तार बहुत तेज थी। उसका
11:04
प्रभाव रोकना संभव नहीं था। श्रोताऊ
11:07
गजमोत्नी ने देखा कि ये तीनों भाई बड़े
11:11
वेग से चले आ रहे हैं और तीनों के साथ मां
11:15
भवानी, किसी के साथ
भैरव और किसी के साथ
11:18
चंडी युद्ध भूमि में खड़कग लेकर के खड़ी
11:22
है। तो राजा नल
11:26
गजमोतनी से कहने लगे रानी इन पर वीरों से
11:29
आक्रमण कराया जाए। गजमोतनी ने अपने वीरों
11:33
का स्मरण किया और जैसे ही बूंदा पर वीर
11:37
टूटे तो बूंदा मूर्छित होकर के जमीन पर
11:41
गिर पड़ा। और जैसे ही जमीन पर गिरा तो
11:44
महाराज नल और मनसुख पहले से ही तैयार थे।
11:49
दोनों उसे दबोच लेते हैं और दबोच करके जो
11:52
मोंगरी होती है उनसे कुटाई आरंभ कर दी।
11:57
कुटाई आरंभ की तो बूंदा फड़फड़ाने लगा।
12:00
बूंदा को बैठा होने का अवसर ही नहीं दिया।
12:03
खड़ा ही नहीं होने दिया। देखिए श्रोताओं
12:06
महाराज नल और मनसुख बूंदा की कुटाई कर रहे
12:10
हैं और इधर नरवरगढ़ का प्रधान सेनापति
12:15
सामने चलता है। जो सेनाओं की कमान संभाले
12:18
हुए थे सेनापति कमांडर वो आगे बढ़ते हैं
12:21
और विश्वजीत और भयंकर सिंह को रोक लेते
12:25
हैं। दोनों में दोनों सेनाओं में भयंकर
12:29
युद्ध चल रहा है। जिसका वर्णन करना संभव
12:32
नहीं है। श्रोताओं नल ने और मनसुख ने कुछ
12:36
समय में ही बूंदा को बेहोश कर दिया। और
12:39
बूंदा बेहोश हुए और बूंदा को रस्सियों से
12:42
कस लिया गया। जंजीरों से कस करके महाराज
12:46
नल ने उसे तुरंत भिजवा दिया अपने शिविर
12:49
में। और जो जेल बनी हुई थी, उस जेल में
12:53
डलवा दिया कैदखाने में। और जो विश्वूप
12:56
विश्वजीत और भयंकर सिंह थे। उन पर दोबारा
12:59
से आक्रमण किया।
13:01
आक्रमण किया तो अब तो वह प्रबल हो गई
13:04
क्योंकि बूंदाबंदी बन चुका था। परंतु
13:08
विश्वजीत को रोकना आसान काम नहीं था और
13:12
पहले दिन तीसरे दिन का युद्ध समाप्त हो
13:16
गया। युद्ध समाप्त होने के बाद दोनों दल
13:19
अपनेप डेरों में आ गए। अपनेप शिविरों में
13:23
आ गए और अपनेपने योद्धाओं की गिनती करने
13:26
लगे। तो जब विश्वजीत और भयंकर सिंह को पता
13:30
चला कि बूंदा नहीं है। कुछ सैनिकों ने कहा
13:33
कि महाराज उनको बंदी बना लिया गया है। तब
13:37
तो महाराज कासिम सिंह के पैरों तले से
13:41
जमीन निकल गई। कहने लगा पुत्रों ये राजा
13:45
बड़ा पराक्रमी है। महा बलवान है। और हमें
13:49
हमारी पुत्री का विवाह इसके साथ करना ही
13:52
होगा। क्योंकि क्योंकि हम स्वयं सिक्का
13:55
चढ़ा करके आए हैं। परंतु हम इनके पराक्रम
13:58
को देख रहे थे। परंतु कल के युद्ध में मैं
14:01
स्वयं चलूंगा रणभूमि में और देखूंगा उसका
14:04
पराक्रम। वो बताऊंगा कल के वीडियो में। आज
14:07
का वीडियो मैं अब यहीं समाप्त करता हूं।
14:10
श्रोताओं आप सभी से क्षमा चाहूंगा कि मेरे
14:13
पास समय बहुत कम है और इसलिए मैं आपको
14:16
बड़े एपिसोड आपकी सेवा में प्रसारित नहीं
14:19
कर पा रहा हूं। इसके लिए मुझे खेद है और
14:22
आपसे क्षमा प्रार्थी हूं। श्रोताओं कल
14:25
आपके सामने फिर नया वीडियो लेकर के
14:28
उपस्थित हो जाऊंगा। तब तक के लिए आप सभी
14:31
से अनुमति चाहता हूं। श्रोताओं जय
0:03
इतिहास के पन्नों में यह कहानी साफ-साफ
0:06
लिखी हुई है। समस्त श्रोताओं का, भक्तों
0:10
का और सब्सक्राइबर बंधुओं का एक बार फिर
0:13
से स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है।
0:16
श्रोताओं जैसा कि आप जानते हैं हमारी
0:19
कहानी चल रही थी नरपुराण इतिहास में से।
0:23
श्रोताओं समय के अभाव में मैं आपको बहुत
0:26
छोटे एपिसोड आपकी सेवा में प्रसारित कर पा
0:29
रहा हूं। इसके लिए मैं आपसे क्षमा
0:31
प्रार्थी हूं। देखिए श्रोताओं मैं आपका
0:34
ध्यान 22वें एपिसोड
से जोड़ता हूं। 22वें
0:38
एपिसोड में मैंने आपको बताया था कि जब
0:42
युद्ध हुआ तो उस युद्ध में बूंदा ने अपने
0:46
बड़े भाई भयंकर सिंह को तो छुड़ा लिया
0:49
लेकिन दूसरे दिन के युद्ध में बूंदा स्वयं
0:51
बंदी बन जाता है। और जो सेना थी कासिम गढ़
0:57
की भाग करके महाराज कासिम सिंह के पास
1:00
पहुंचती है। श्रोताओं इधर देखिए क्या होता
1:03
है। महाराज नल
1:06
मनसुख और जो उनके प्रधान सेनापति थे स्वयं
1:11
राजा मैनपाल मनसुख के पिताजी और रानी
1:14
गजमोतनी एक टेंट में एक शिविर में एक कक्ष
1:19
में बैठकर के आपस में बातचीत कर रहे थे।
1:22
रण पर रणनीति बना रहे थे कि कल के युद्ध
1:26
में हम इस तरीके से युद्ध नहीं करेंगे।
1:29
हमें यह युद्ध यथाशीघ्र समाप्त करना है।
1:32
जितना जल्दी हो सके युद्ध समाप्त करना है।
1:35
हमारी सेना की बहुत बड़ी बहुत बड़ी क्षति
1:38
हो चुकी है। इसलिए कल हमें तीनों योद्धाओं
1:42
को युद्ध भूमि में उतरना होगा। अब देखो
1:45
श्रोताओं उधर जब सेना भाग करके महाराज
1:50
कासिम सिंह के पास पहुंची तो कासिम सिंह
1:54
तिलमिला उठे कि उनका पुत्र महापराक्रमी
1:58
योद्धा बूंदाबंदी बन चुका है। तो यह बात
2:02
सुनकर के कासिम सिंह अपने पुत्र विश्वजीत
2:06
को बुलाते हैं और विश्वजीत से कहने लगे
2:10
अरे राजा
2:12
ऐसे बोल
2:15
ऐसे परे ना लाला पार
2:20
कल देखो रणभूमि में
2:25
धारण करंगो खुद हथियार
2:29
राजा
2:31
कासिम सिंह कहने लगे अपने पुत्र से कि
2:34
बेटे ऐसे पार नहीं पड़ेगी। मैं कल की
2:37
रणभूमि में स्वयं अस्त्र धारण करूंगा।
2:41
मुझे हथियार उठाना पड़ेगा। मैं देखूंगा कि
2:44
कितने पराक्रमी नरेश हैं। उनको मैं कल की
2:47
रणभूमि में पराजित कर दूंगा। श्रोताओं
2:51
अपने दोनों पुत्रों को आदेश दे दिया कि
2:55
सेना को सुसज्जित करो और कल एक साथ हम
2:59
तीनों के तीनों पिता पुत्र आक्रमण करके
3:02
अपने पुत्र बूंदा की कैद छुड़ाएंगे और हो
3:06
सके तो उनमें से राजा नल और महाराज मैनपाल
3:10
को बंदी बनाना होगा। तो देखिए श्रोताओं
3:14
महाराज कासिम सिंह ने अपने दोनों पुत्रों
3:18
को आदेश दे दिया कि सेना को सुसज्जित करो
3:21
और कल हम स्वयं रणभूमि में उतरेंगे।
3:24
श्रोताओं तीनों पिता पुत्र रणभूमि के लिए
3:28
साजो सामान तैयार कर लेते हैं। झिलम टोप
3:31
बख्तर पहन करके पांचों हथियार धारण कर
3:34
लेते हैं और अपनेपने हाथियों के हौदाओं पर
3:38
सवार हो जाते हैं और सेना को आदेश दे दिया
3:41
आक्रमण का कि चलिए मैदान की तरफ। अब उधर
3:46
देखिए राजा नल स्वयं जो दूल्हे बने हुए थे
3:51
मनसुख और उनके पिता श्री महाराज मैनपाल
3:55
उन्होंने देखा कि स्वयं महाराज कासिम सिंह
3:57
रणभूमि में आए हैं। तो महाराज मैनपाल ने
4:00
भी अपने अस्त्र सजा लिए कि मेरी तलवार की
4:04
धार भी अभी पहनी है। मेरी तलवार की धार
4:08
कुंद नहीं हुई है। मैं देखता हूं कैसा
4:10
योद्धा है कासिम सिंह।
4:13
तीनों योद्धा एक-एक बट जाते हैं। विश्वजीत
4:16
को महाराज नल कासिम सिंह के जो सामना कर
4:22
रहे हैं स्वयं नरेश मैनपाल और जो भयंकर
4:26
सिंह है उसके सामने उनका जो दूल्हा बना
4:30
हुआ मनसुख गुर्जर है। स्वयं महाराज मनसुख
4:33
गुर्जर बड़ा भारी घोर संग्राम हुआ। परंतु
4:38
श्रोताओं आपको बताना चाहूंगा कि जो राजा
4:43
कासिम सिंह था उसके साथ भी मां काली स्वयं
4:46
लड़ती थी। जो नगर की चंडी थी वो स्वयं
4:50
युद्ध करती थी और उसके पास चार वीर थे। तो
4:54
कासिम सिंह ने अपने चारों वीरों का स्मरण
4:57
किया और चारों वीरों का स्मरण किया तो
5:01
महाराज मैनपाल समझ गए कि अब मेरी पराजय
5:04
होना निश्चित है। चारों वीर महाराज मैनपाल
5:08
पर झपटे और महाराज मैनपाल को घोड़े से
5:11
नीचे गिरा दिया और जैसे ही महाराज मैनपाल
5:14
घोड़े से नीचे गिरे कासिम सिंह हाथी के
5:17
हौदे से उतरता है और मैनपाल को रस्साओं से
5:22
जकड़ लेता है बंदी बना लिया महाराज मैनपाल
5:24
को हाथी के हौदे में रख लिया और चला जाता
5:28
है अपनी सेना को साथ लेकर के
5:31
कासिमगढ़ के लिए श्रोताओं शाम तक युद्ध
5:35
चला सूर्य स्त तो अपने अपने सैनिकों को
5:39
संभालने लगे और जब भगती हुई सेना ने
5:43
महाराज नल और मनसुख से कहा कि आज के युद्ध
5:46
में हमारे महाराज मैनपाल बंदी बन चुके
5:50
हैं। श्रोताओं अब तो नल और मनसुख घबरा
5:55
जाते हैं कि अब महाराज को छुड़ाना संभव
5:58
नहीं है। क्योंकि विश्वजीत बहुत भारी
6:01
योद्धा है और कासिम सिंह भी बहुत भारी
6:04
योद्धा है। परंतु देखा जाएगा कल युद्ध
6:08
करना होगा। दोनों रह जाते हैं मनसुख और
6:12
उसका पगड़ी पलटा मित्र नल। दोनों मित्र
6:16
अपने कक्ष में जो मंत्रणा कक्ष है उसमें
6:19
बैठकर के विचार कर रहे हैं। क्या किया
6:22
जाए? तो गजमतनी ने देखा कि महाराज नल और
6:26
मनसुख दोनों व्याकुल हैं और महाराज कासिम
6:29
सिंह के डर से हथियार डालना चाहते हैं
6:33
क्योंकि कासिम सिंह कोई छोटे-मोटे राजा
6:35
नहीं थे। कासिम सिंह भवानी के वरदानी बड़े
6:40
महापराक्रमी उनकी तलवार से संसार दहलता
6:44
था। श्रोताओं गजमोत्नी कहने लगी कि महाराज
6:48
कल के युद्ध में मैं आपके साथ चलूंगी। और
6:52
कल मैं पूरा युद्ध समाप्त कर दूंगी। राजा
6:55
नल कहने लगे गजबतनी
6:57
तुम युद्ध कैसे समाप्त करोगी कि महाराज
7:01
मैं कासिम सिंह को भैंसा बना दूंगी।
7:04
और जब कासिम सिंह भैंसा बन जाए तो आपको
7:08
उसे बंदी बना लेना है। और जो विश्वजीत है
7:12
मैं उस पर भी जादू चलाऊंगी और उसे भी
7:15
भैंसा बना दूंगी। मैं कल के युद्ध में
7:18
जितनी भी कासिमगढ़ की सेना होगी समस्त
7:21
सेना को अपने सम्मोहक मंत्र के द्वारा
7:24
मूर्छित कर दूंगी। देखिए श्रोताओं एक
7:28
विद्या होती है सम्मोहक और वो विद्या ऐसी
7:30
होती है यदि उस अस्त्र का संधान कोई भी
7:33
योद्धा जानता है तो सामने वाले योद्धा की
7:37
समस्त सेना सहित उसे बेहोश किया जा सकता
7:40
है। तो श्रोताओं गजमोतनी की बात सुनकर के
7:44
राजा नल और मनसुख दोनों बातें करने लगे कि
7:49
मित्र हम तेगा में आसानी से नहीं हार
7:52
सकते। हमें कल के युद्ध में ये युद्ध
7:54
समाप्त करना होगा और महाराज मैनपाल को हर
7:58
हालत में छुड़ाना होगा। श्रोताओं जब
8:02
प्रातः काल हुआ तो नल और मनसुख ने अपनी
8:06
सेना को आदेश दे दिया कि आज का युद्ध
8:09
अंतिम युद्ध होना चाहिए। युद्ध निर्णायक
8:12
स्थिति का होना चाहिए। या तो वीरगति को
8:16
प्राप्त होंगे और या आज हम उस राजा को
8:19
वीरगति दिला देंगे। उसे पराजित करेंगे। हे
8:22
श्रोताओं
8:25
समस्त सेना को सजा करके रण के बाजे बजवा
8:28
दिए। सेनाएं मैदान में आ गई और उधर से भी
8:32
महाराज कासिम सिंह क्योंकि महाराज मैनपाल
8:36
को बंदी बना लिया था। उसके दोनों पुत्र
8:39
उधर से भी बूंदाबंदी बना हुआ पड़ा है।
8:42
दोनों पुत्र भी रणभूमि के लिए तैयार हो
8:45
जाते हैं और वह भी यह सोच रहे हैं कि आज
8:48
बूंदा की कैद छुड़ानी है और नल और मनसुख
8:52
दोनों को बंदी बनाना है। श्रोताओं
8:55
आमनेसामने की टक्कर हो जाती है दोनों
8:57
सेनाओं में। बड़ा भयंकर घनघोर युद्ध हो
9:01
रहा है।
9:03
हाथी के ओदा वाले से हाथी का ओहदा।
9:06
घुड़सवार से घुड़सवार पैदल से पैदल
9:09
तलवारबाज से तलवारबाज युद्ध कर रहा है।
9:13
अपने अपने महाराजाओं की जय जयकार करके
9:15
युद्ध कर रहे हैं। तभी रानी गजमोतनी जिधर
9:20
अपना घोड़ा चला देती है उधर
9:24
काट काट करके योद्धाओं को ढेर का ढेर
9:27
मचाती चली जाती है। सेना को काट रही है
9:31
महारानी गजमोतनी और युद्ध करते-करते जहां
9:35
राजा नल भयंकर सिंह और महाराज कासिम सिंह
9:39
से युद्ध कर रही थी। उस मोर्चा पर पहुंच
9:42
जाती है और देखा कि कासिम सिंह इस तरीके
9:47
से हारने वाला नहीं है। महारानी गजमोतनी
9:50
ने देखा कि कासिम सिंह
9:53
आग उबल रहा है। उसकी तलवार थमने का नाम
9:57
नहीं ले रही है और भयंकर सिंह भी महावट
10:01
योद्धा है। और महाराज नल दोनों से लोहा ले
10:04
रहे हैं। तो गजमोतनी ने सम्मोहक मंत्र का
10:08
संधान किया और दोनों योद्धाओं पर वो
10:11
सम्मोहक मंत्र चला दिया। दोनों योद्धा उसी
10:15
समय मूर्छित हो जाते हैं। जैसे ही दोनों
10:18
योद्धा मूर्छित हुए तो महाराज नल्ले
10:21
उन्हें तुरंत रस्सियों से बंधवा लिया।
10:24
बंदी बना लिया और बंदी बना करके दोनों को
10:27
भिजवा दिया अपने कारागृह में। डलवा दिया
10:30
कारागार में। श्रोताओं विश्वजीत रह जाता
10:34
है। विश्वजीत बड़ा बलवान था। विश्वजीत को
10:38
पता चल गया कि महाराज कासिम सिंह और उनके
10:42
बड़े भाई भयंकर सिंह बंदी बन चुके हैं। अब
10:45
मैं अकेला रह गया हूं रणभूमि में। परंतु
10:48
विश्वजीत को हराना आसान काम नहीं था। जैसा
10:53
उसका नाम था वैसा ही उसका काम था। वो
10:56
दोनों हाथों से तलवार चलाना जानता था।
11:00
उसकी तलवार थमने का नाम नहीं लेती थी। 60
11:04
हजार हाथियों की ताकत थी विश्वजीत में।
11:08
उसका नाम विश्वजीत ऐसे ही नहीं था। कोई भी
11:12
राजा उसका मुकाबला करने में सक्षम नहीं
11:14
थे। जब महाराज मनसुख आगे बढ़े तो विश्वजीत
11:20
ने मनसुख को पटक लिया। मनसुख को जमीन पर
11:24
डाल लिया है और जैसे ही काटने के लिए
11:27
तलवार चलाई तो नल अपना तेगा सामने अड़ा
11:30
देते हैं। रोक लिया विश्वजीत को और महाराज
11:34
नल में और विश्वजीत में युद्ध होने लगा।
11:38
महाराज नल ने कुछ समय में ही क्योंकि नल
11:41
देवी के वरदानी थे। नल भी कोई मामूली
11:43
शक्ति नहीं थे। चार कला से अवतार था नल।
11:47
विश्वजीत को जमीन पर डाल दिया। मसके बांध
11:51
ली। बंदी बना लिया। बंदी बना करके अपने
11:56
शिविर को भिजवा दिया। और सेना जब सेनापति
11:59
नहीं रहा। राजा राजा के तीनों पुत्र बंदी
12:03
बन गए तो सेना भाग जाती है कासिमगढ़ के
12:06
लिए। और महाराज नल और मनसुख भी अपनी विजय
12:11
का डंका बजाते हुए आ जाते हैं अपने
12:14
शिविरों में।
12:16
श्रोताओं महाराज मैनपाल तो बंदी बने हुए
12:19
हैं। पड़े हुए हैं कासिमगढ़ के कारागार
12:23
में। परंतु इधर राजा नल अपना दरबार लगाते
12:26
हैं। राजा नल दरबार में बैठते हैं और
12:30
महाराज कासिम सिंह को दरबार में पेश कराया
12:33
जाता है कि उस मुलजिम को पेश किया जाए।
12:37
और कासिम सिंह से पूछा जाता है कि महाराज
12:41
कासिम सिंह आपके सिक्का की जो शर्तें थी
12:45
हमने समस्त शर्तों का पालन कर दिया है।
12:48
क्या आप विवाह करने के लिए राजी हैं?
12:52
कासिम सिंह कहने लगे बेटे नल मैं मान गया
12:56
तू वाकई में योद्धा है। और मुझे ऐसे ही
13:00
योद्धाओं को अपनी पुत्री का विवाह करना
13:02
था।
13:03
तो राजा नल कहने लगे को भेजिए। पहले अपने
13:07
एक सेवक को भेजिए और महाराज मैनपाल को
13:11
बंदी गृह से छुड़वाइए।
फिर हम आपको सम्मान
13:14
सहित यहां से रिहा कर देंगे। महाराज
13:17
मैनपाल कहने लगे कि राजा नल हम क्षत्रिय
13:21
हैं। वचन से मुकरना नहीं जानते। मर जाते
13:24
हैं लेकिन वचन से नहीं चलते।
13:28
हम तुम्हारे पिताजी को इसी समय आदेश पारित
13:32
करते हैं। तुम्हारा एक सैनिक बुलाइए। तो
13:35
महाराज
13:37
कासिम सिंह ने वहीं से एक खत लिखा और एक
13:40
सैनिक को खत देकर के भेज दिया कासिमगढ़।
13:44
श्रोताओं कासिमगढ़ में सेनापति को क्योंकि
13:48
राजा राजा के पुत्र तो बंदी थे। वो खत दे
13:51
दिया और जब सेनापति ने खत पढ़ा महाराज के
13:55
दस्तखत हस्ताक्षर पढ़े तो महाराज मैनपाल
13:59
को सम्मान सहित हाथी के ओदा पर बैठा करके
14:03
विदा कर दिया। महाराज मैनपाल आ जाते हैं
14:07
बंदी गृह से छूट करके अपने शिविर में और
14:11
वहां देखा तो महाराज कासिम सिंह बंदी बने
14:14
खड़े हुए हैं। महाराज मैनपाल ने आते ही
14:19
पहले कासिम सिंह को कैद से मुक्त कराया कि
14:21
कासिम सिंह को छोड़ दिया जाए। उसके तीनों
14:24
पुत्रों को बुलाया जाए। श्रोताओं कासिम
14:27
सिंह के तीनों पुत्र विश्वजीत, भयंकर सिंह
14:30
और बूंदा तीनों को कारागार से मुक्त कर
14:33
दिया गया।
14:34
और महाराज कासिम सिंह महाराज मैनपाल से
14:38
कहने लगे राजन हम तुमसे प्रसन्न हैं और
14:41
हमारी पुत्री का विवाह करने के लिए तैयार
14:43
हैं। तुम चढ़ाई बारात की तैयारी कीजिए।
14:48
बारटी बारटी होती है। बारटी के लिए बारात
14:51
को ले आओ। परंतु ध्यान रहे महाराज हमारा
14:55
जो तोरण है 80 गज ऊपर है। 80 गज ऊपर तोरण
15:00
मारना पड़ेगा आपके पुत्र को। तो राजा नल
15:03
कहने लगे महाराज कासिम सिंह हमने आपकी सभी
15:06
शर्तों को पूरा कर दिया है। एक शर्त बाकी
15:10
रह रही है कि आपका तोरण 80 गज ऊपर है और
15:14
हमारा जो लड़का है वो वहां तक नहीं
15:16
पहुंचेगा। परंतु परंतु मां भवानी के
15:19
प्रताप सिंह जाइए हम यह शर्त भी आपकी पूरी
15:23
करेंगे। राजा कासिम सिंह कहने लगे महाराज
15:25
हम आपसे पराजित हो गए हैं। इसका मतलब यह
15:28
नहीं है कि आप तोरण को नहीं मारें। हम
15:32
विवाह नहीं करेंगे। तो राजा नल कहने लगे
15:35
ठीक है महाराज आप सम्मान सहित अपने नगर को
15:38
लौट जाए। श्रोताओं कासिम सिंह और उसके
15:42
तीनों पुत्र सम्मान सहित आ जाते हैं कासिम
15:45
गढ़ और हंसी-खुशी विवाह की तैयारी करने
15:49
लगे। क्योंकि उसकी समस्त शर्तों का पालन
15:53
महाराज मैनपाल कर चुके थे। विवाह की
15:56
तैयारी की गई। 80 गज ऊंचा
दरवाजा बनाया
16:00
गया और उस दरवाजे पर तोरण लगा दिया गया।
16:04
तोरण जानते हैं विवाह के टाइम पर जो
16:06
दूल्हा होता है उसको छड़ी से उसमें छड़ी
16:09
मारता है। वो तोरण मारना कहलाता है।
16:13
श्रोताओं इधर महाराज नल ने
16:17
अपनी माता भवानी का स्मरण किया और बारात
16:20
को चढ़ाई के लिए भेज दिया। बड़े धूमधाम से
16:24
ढोल नगाड़े बजते हुए बारात बारटी के लिए
16:27
चली जा रही है। श्रोताओं जब बारात दरवाजे
16:32
पर आई तो देखा राजा नल सोचने लगे कि 80 गज
16:38
ऊपर तोरण है। मेरे पास उड़ना घोड़ा तो है
16:42
लेकिन नियमानुसार घोड़े पर बैठकर तोरण
16:45
नहीं मारा जाता। यह तो स्वयं मेरे मित्र
16:48
को ही तोरण मारना होगा।
16:50
रानी गजमोतनी कहने लगी जब रानी गजमोतनी ने
16:54
नल का चेहरा पढ़ा तो चेहरा उदास हो गया तो
16:58
गजमोतनी कहने लगी महाराज आप घबराइए मत
17:02
मेरे पास आठ वीर हैं। मैं तुम्हारे मित्र
17:05
को 80 गज तो क्या 8000 गज ऊपर
पहुंचा
17:10
दूंगी। चिंता मत कीजिए। श्रोताओं गजमोतनी
17:15
ने जब दूल्हा उस पारोठी पर दरवाजे पर आया
17:20
तो अपने वीरों का स्मरण किया और वीरों से
17:22
कहा कि जो दूल्हा है इसे 80 गज ऊपर जो
17:27
तोरण है वहां तक पहुंचाइए।
17:30
आठों वीर अदृश्य हो गए। अदृश्य होकर के
17:33
मनसुख को उठा लिया। समस्त नगर देख रहा है
17:38
कि ये कैसा योद्धा है जो गगन रामनी विद्या
17:41
जानता है। ये तो अंतरिक्ष में उड़ रहा है।
17:44
और मनसुख ने तोरण भी मार दिया।
17:48
देखिए श्रोताओं जय जयकार के स्वरों से
17:53
संपूर्ण नगर गूंज उठा। महाराज नल और
17:57
महाराज मैनपाल और महाराज मनसुख की जय
17:59
जयकार हो रही है। श्रोताओं राजा हंसीखुशी
18:04
बारात को अंदर लेवा ले जाता है। अपने किले
18:08
में ले गया और बारात के लिए पकवान बनवाना
18:11
आरंभ कर दिया। बारात की भोजन व्यवस्था
18:13
आरंभ कर दी गई और एक विद्वान ब्राह्मण
18:17
बुलाया गया। शुभ समय, शुभ घड़ी और
शुभ
18:22
मुहूर्त देखकर के ब्राह्मण ने जो फेरा
18:26
होते हैं, भामर डलती है
उनका समय
18:28
निर्धारित किया।
18:30
कश्मीरा को दुल्हन बनाया गया। कश्मीरा को
18:34
सजाया गया। कश्मीरा चंद्रमा के समान सुंदर
18:37
थी। चंद्रमा के समान कांत थी कश्मीरा की।
18:42
दुल्हन बनी ऐसी शोभा दे रही है मानो स्वयं
18:46
चंद्रमा की चांदनी ने रूप धारण कर लिया
18:49
हो। श्रोताओं विवाह का मंडप तैयार हो गया
18:54
और राजा मैनपाल ने मनसुख के साथ महाराज नल
18:58
को भेज दिया कि आप फेरा डलवाइए। श्रोताओं
19:03
विधि विधान के अनुसार नियमानुसार मनसुख के
19:06
और कश्मीरा के फेरा डल गई। भामरे डल गई और
19:10
अब वो दोनों पति पत्नी बन गई। महाराज
19:13
मैनपाल कासिम सिंह के समधी बन गए और राजा
19:18
मनसुख उनके दामाद बन गए। राजा नल उनके
19:21
मित्र थे मनसुख के इसलिए वो भी दामाद बन
19:24
गए। महाराज कासिम सिंह ने 60 हजार हाथी 60
19:30
हजार घोड़ा
19:32
और 60 हजार की सेना दहेज में राजा मेनपाल
19:37
को दी। राजा मैनपाल
19:40
हंसीखुशी अपने पुत्र का विवाह कर लेते
19:43
हैं। श्रोताओं और सम्मान सहित
19:48
अपने पुत्रवधू को लेकर के हंसीखुशी अपने
19:51
नगर को प्रस्थान कर देते हैं और अपने नगर
19:55
के लिए आ जाते हैं। श्रोताओं
19:59
श्रोताओं आज का यह जो मैदान था हमारा
20:02
राजा मनसुख गुर्जर का विवाह वो संपूर्ण हो
20:06
गया है। कश्मीरा
20:09
आ जाती है श्यामनगर में। अब आगे का मैदान
20:13
मैं आपको 24वें एपिसोड
में सुनाऊंगा
20:16
श्रोताओं वो कल से आरंभ करूंगा। इसी के
20:20
साथ अब यह वीडियो समाप्त होता है। जय हिंद
20:23
जय भारत।
18.
0:03
इतिहास के पन्नों में यह कहानी साफसाफ
0:06
लिखी हुई है। नव पुराण इतिहास का नया
0:11
एपिसोड आपकी सेवा में प्रसारित है।
0:14
श्रोताओं परंतु मैं आपका ध्यान
0:18
23वें एपिसोड से जोड़ता हूं। 23वें एपिसोड
0:21
में मैंने आपको बताया था कि मनसुख गुर्जर
0:25
का विवाह हो जाता है। विवाह संपन्न कराने
0:28
के बाद महाराज मैनपाल, मंसू गुर्जर
और
0:32
रानी कश्मीरा
0:34
तथा राजा नल सभी प्रसन्नता पूर्वक अपने
0:39
अपने नगरों को आ जाते हैं। महाराज नल चले
0:43
जाते हैं अपने
0:45
नगर को नरवरगढ़ को। अब देखिए श्रोताओं
0:51
ये सभी काम जब संपूर्ण हो गए तो एक दिन
0:55
फिर महारानी मंजा
0:59
बैठी हुई थी सोच अवस्था में। जब राजा नल
1:04
ने अपनी माता को सोच अवस्था में बैठे हुए
1:07
देखा तो कारण पूछा
1:11
तो बंजा रानी कहने लगी बेटे नल
1:14
क्या बताऊं तुझे? मैं
प्रसन्नता पूर्वक
1:18
गंगा स्नान करना चाहती थी। परंतु दुष्ट
1:22
कंपिलगढ़ नरेश फूल सिंह ने मुझे स्नान
1:25
नहीं करने दिया।
1:27
और गंगा के घाट से मुझे बंदी बना लिया
1:32
गया।
1:34
मैं काग उड़ाते उड़ाते परेशान हो गई और
1:38
तेरे पिता महाराज प्रथम चक्की पीसते पीसते
1:42
उनके हाथों में छाले पड़ गए। इतनी चाकी
1:45
चलाई उन्होंने।
1:47
तो हे पुत्र नल अब मुझे आशा है इस बात की
1:52
कि तुम दोनों पति पत्नी
1:55
हम दोनों तुम्हारे पिता और मुझे गंगा
1:58
स्नान करा के लाएंगे।
2:01
श्रोताओं
2:03
देखिए राजा लोग थे
2:06
तो राजा नल ने मन में विचार किया कि जब
2:09
इनकी इच्छा गंगा स्नान की है तो मैं अवश्य
2:12
ही इनको गंगा स्नान कराऊंगा। श्रोताओं
2:17
गजमोतनी भी वही आ जाती है और गजमोतनी
2:21
महाराज नल से कहने लगी कि हे राजन जब आप
2:25
जैसा बलधारी इनका पुत्र हो और आप स्वयं
2:31
एक राज्य का संचालन करने वाले हो
2:35
जादू में मेरे समान जादूगर इस दुनिया में
2:38
नहीं है तो क्यों ना माता-पिता को गंगा
2:42
स्नान कराएं और हम भी गंगा स्नान करें।
2:46
श्रोताओं
2:47
राजा नल ने जब गजमोतनी की और मंजा की बात
2:52
सुनी तो आदेश दे दिया अपनी फौज को
2:57
कि तैयार किया जाए सेना को 500 योद्धा
3:01
तैयार किए जाए। देखिए राजा लोग थे तो वो
3:04
इसी तरीके से स्नान करते थे। सैनिक साजो
3:07
सामान के साथ धोसा के साथ स्नान करते थे।
3:13
यह नहीं कि चुपचाप स्नान करें।
3:16
देखो श्रोताओं
3:18
चारों प्राणी राजा नल, गजमतनी, महाराज
3:22
प्रथम और रानी बंजा गंगा स्नान करने के
3:26
लिए तैयार हो रहे हैं। और इधर लाखा दादा
3:29
को बुला लिया गया है। लाखा दादा ब्राह्मण
3:33
थे। तो लाखा दादा से कहा कि लाखा दादा अब
3:38
हम गंगा स्नान करने की तैयारी कर रहे हैं।
3:41
तो लाखा ब्राह्मण कहने लगे ठीक है बेटे नल
3:44
गण गंगा पर ही स्नान करेंगे क्योंकि हमने
3:47
कंपिलगढ़ नरेश को तो पराजित कर दिया
3:51
और अब वो हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता और
3:54
फिर कोई दूसरा राजा ऐसा है नहीं जो हमसे
3:58
कुछ युद्ध करे या कोई और हमारे साथ उत्पात
4:01
करने की कोशिश करे
4:04
श्रोताओं
4:06
राजा नलदे 5000 योद्धाओं को
सजा लिया।
4:11
हाथी, घोड़ा फौज
पलटन सज जाती है। समस्त
4:15
योद्धा तैयार हो गए और दो सुंदर पालकियां
4:19
जिसमें एक में मंझा बैठ जाती है। एक में
4:23
गजमतनी रानी बैठ जाती है। दो दिव्य रथ
4:27
सजाए गए। जिसमें महाराज प्रथम और उनके
4:31
पुत्र राजा नल विराजमान हो गए। श्रोताओं
4:36
सेना के साथ हंसीखुशी धोसा बजाते हुए गढ़
4:41
गंगा पर स्नान करने के लिए जा रहे हैं।
4:45
गजमोतनी रानी
4:47
बड़ी प्रसन्न है कि चलो हम अपना गंगा
4:51
स्नान पूर्ण करते हैं। पहले जो गंगा स्नान
4:54
अधूरा रह गया था। हमारे सास ससुर को
4:57
कंपिलगढ़ नरेश फूल सिंह ने बंदी बना लिया
5:00
था। अब हम उन्हें गंगा स्नान करा के
5:04
लाएंगे।
5:05
श्रोताओं तीन दिन का सफर करने के बाद
5:09
श्रोताओं तीन दिन का सफर करने के बाद राजा
5:14
नल महाराज प्रथम मंज रानी और गजमोतनी गढ़
5:18
गंगा पर पहुंच जाते हैं। गढ़ गंगा पर
5:23
राजाओं की भीड़ रहती थी। वह स्थान था गढ़
5:28
गंगा जहां पर राजा लोग स्नान किया करते
5:32
थे। श्रोताओं राजा नल ने अपनी सेना को
5:36
आदेश दे दिया कि यही तंबू डेरा लगा दिए
5:39
जाए, शिविर लगा दिए जाए और सुरक्षा
5:43
व्यवस्था चौकस रहे। अब देखिए श्रोताओं उधर
5:47
क्या होता है जब कंपिलगढ़ नरेश फूल सिंह
5:52
को यह सूचना मिलती है कि राजा नल ने मेरी
5:56
पुत्री से विवाह किया और रास्ते में मार्ग
6:00
में मेरी पुत्री को मार दिया। सरबती का
6:03
अंत कर दिया तो फूल सिंहंग
6:07
आग बबूला हो जाता है।
6:10
अंदर ही अंदर जलने लगा उसका जहर
6:15
बाहर आने लगा। श्रोताओं आप समझ रहे होंगे
6:19
कि जो पराजित शत्रु होता है। मैं आपको एक
6:22
बात बताना चाहूंगा। जीवन का सत्य है ये।
6:25
विजेता शत्रु कभी भी खतरा नहीं पहुंचाएगा
6:29
आपको। क्योंकि विजेता शत्रु तो अपने अहम
6:32
में हो जाता है। अहंकार में आ जाता है कि
6:35
मैं जीत गया और दोबारा इसे पराजित करूंगा।
6:38
परंतु भारतीय नरेशों की ये सबसे बड़ी भूल
6:41
होती थी कि वो विजय के बाद अहंकार में
6:46
उत्साह में खो जाते थे और पराजित शत्रु
6:50
हमेशा उस मौके का फायदा उठाता था।
6:53
तो हमेशा जिस दुश्मन को आपने हरा दिया है
6:57
उस दुश्मन से सावधान रहो। उसका को कभी भी
7:00
विश्वास मत करो। श्रोताओं
7:04
वही राजा फूल सिंह
7:07
आग की तरह जलने लगा और मन में विचार करने
7:10
लगा कि मेरे गुरुदेव हैं जलंधर जोगी। उनका
7:14
गुरु था जलंधर जोगी जो बहुत बड़ा जादूगर
7:19
था।
7:21
14 विद्या निधान था। कि अब मुझे मेरी
7:24
इज्जत बचानी है। और दो साल का समय जब तक
7:28
निकल गया था क्योंकि युद्ध को दो साल हो
7:32
गए कंपिलगढ़ से महाराज प्रथम की कैद
7:35
छुड़ाई तो सेना भी सुदृढ़ करने लगा
7:39
और श्रोताओं मन में विचार करके कि मुझे
7:42
अपनी इज्जत बचानी है।
7:45
चल देता है अपने गुरु जोगी जालंधर के पास।
7:50
जालंधर जोगी के पास चला जा रहा है। खोजता
7:54
खोजता पहुंच जाता है अपने गुरु के पास।
7:59
श्रोताओं
8:01
गुरु का आश्रम खोजा।
8:04
आश्रम खोजने के बाद गुरु के पास पहुंचा और
8:08
गुरु को प्रणाम किया। तो गुरु ने जब राजा
8:12
फूल सिंह को देखा
8:14
तो आशीर्वाद दिया और उसका चेहरा देखकर के
8:20
जोगी जालिंदर कहने लगा कि हे राजन हे मेरे
8:25
प्रिय शिष्य मुझे यह बताओ कि तुम्हारा
8:27
चेहरा उदास क्यों है? तुम्हारी
उदासी का
8:30
कारण क्या है?
8:32
किसी ने कुछ कहा हो तो मुझे बताइए। मैं
8:37
समस्त भारतवर्ष के नरेशों को पत्थर की
8:40
शिला बना सकता हूं। यह बात सुनकर के
8:44
कंपिलगढ़ के राजा फूल सिंह पंजाबी कहने
8:48
लगे कि बाबा गुरु जी मैं आपको कुछ बता
8:52
नहीं सकता। मेरे कंपिलगढ़ में आग लगा दी
8:56
गई। मेरा कंपिलगढ़ जला दिया गया। मुझे
9:00
बंदी बना लिया। मेरे दोनों हाथ बांध दिए
9:03
गए। मेरी मसके चढ़ा ली गई। मेरी समस्त
9:07
सेना पराजित हो गई।
9:09
यह बात जब जालिंदर जोगी ने सुनी तो
9:13
जालिंदर जोगी कहने लगा बेटे ऐसा कौन पैदा
9:16
हो गया बामनगढ़ के बीच में? जिसने
9:20
तो जो जैसे देवी के वरदानी
9:24
राजा को हरा दिया। कौन है वो नरेश कि
9:28
महाराज
9:30
मैं गढ़ गंगा पर स्नान करने गया था।
9:33
वह एक नरवरगढ़ का राजा था प्रथम
9:37
और उससे उसकी पत्नी मंजा ने मेरी पुत्री
9:40
सरती का अपमान किया था।
9:43
इस वजह से हम दोनों में वहां गढ़ गंगा पर
9:46
युद्ध हुआ और मैं
9:49
राजा प्रथम को मंजा सहित बंदी बना के
9:52
कंपिलगढ़ ले गया। मैंने प्रथम को कैद में
9:55
डाल दिया। पीसने को एक चाखी दे दी और मंजा
9:58
को महल पर खड़ा कर दिया। एक लंबा बांस
10:01
देकर के काग उड़ाने के लिए। तो जालिंदर
10:05
नाथ जोगी कहने लगे फिर बेटे क्या हुआ कि
10:08
बाबा
10:10
कुछ समय बाद उसका एक पुत्र था नल।
10:15
उस नल्ले अपने मित्र श्याम नगर के राजा
10:20
मनसु गुर्जर को साथ लेकर के आक्रमण किया
10:25
और उस आक्रमण में उसने हमारे कंपिलिगढ़ को
10:29
जला के रख दिया। कंपिलगढ़ के हर घर में आग
10:32
लगा दी गई। कंपिलगढ़ की लूट की गई।
10:35
कंपिलगढ़ में हत्याएं की गई।
10:38
हे गुरुदेव
10:40
यहीं तक सीमित नहीं रहा। तुम्हारे इस
10:42
शिष्य फूल सिंह को बंदी बना लिया गया।
10:46
इसकी भुजाएं बांधी गई
10:49
और गुरु जी मेरी पुत्री सरती का विवाह
10:53
बलपूक कर लिया और यहीं तक नहीं छोड़ा।
10:57
विवाह करने के बाद मेरी पुत्री का अंत कर
11:00
दिया। मैं जल रहा हूं आग में। हे गुरुदेव
11:05
आप यदि मुझे जीवित देखना चाहते हैं तो
11:08
मेरी इच्छा की पूर्ति की जाए। जब अपने
11:11
शिष्य को इस तरीके से रोते हुए
11:15
जालिंदर जोगी ने देखा तो जालिंदर जोगी
11:17
खड़ा हो गया। आंखें तरेरा खा गई। कहने लगी
11:22
बेटे
11:23
खड़े हो जाओ और मुझे ये बताओ कि अब तुम
11:27
क्या चाहते हो? कि बाबा
11:30
ध्यान से सुना जाए। वही नल अपने माता-पिता
11:35
को गढ़ गंगा पर स्नान कराने आया है
11:38
और साथ में उसकी पत्नी गजमोतनी भी है और
11:43
मेरी हार राजा नल के बस का काम नहीं था कि
11:47
राजा नल से मेरी हार हुई है। मैं
11:50
तलवारबाजी में नहीं हार सकता था बाबा।
11:53
मेरी हार गजमोतनी ने कराई है कि कैसे कि
11:57
वह बहुत बड़ी जादूगर है।
12:00
उसने अपने वीरों की मदद से
12:04
और अनेकों जादू चला के मेरी सेना को
12:08
पराजित किया। मुझे बंदी बनवाया और मेरी
12:11
पुत्री का अंत भी उसी ने कराया। क्योंकि
12:14
मेरी पुत्री यदि नल के साथ महलों में जाती
12:17
तो रानी बनती। उससे अधिकार मांगती। इसलिए
12:21
उस गजमतनी ने मेरी पुत्री का भी अंत करा
12:24
दिया। बाबा मैं तुम्हारा शिष्य हूं और यदि
12:30
तुम मुझे चाहते हैं तो मुझे गजमतनी का हरण
12:34
करके आना चाहिए। गजमतनी को चोरी करके लाओ।
12:38
तुम कैसे लाओगे यह मैं नहीं मैं नहीं
12:40
जानता।
12:42
जालिंदर जोगी कहने लगा बस बेटे थोड़ी सी
12:44
बात है मैं आज ही जा रहा हूं गणगंगा पर और
12:49
मैं गजमतनी का हरण करके लाऊंगा गजमोतनी को
12:53
तेरी सेवा में उपस्थित कर दूंगा तू चिंता
12:57
मत करे हे श्रोताओं
13:00
राजा फूल सिंह वही चंदागढ़ के किले में
13:05
रुक जाते हैं
13:08
और इंतजार कर रहे हैं अपने गुरु गुरु जोगी
13:12
जालंदर नाथ के आने का। इधर जालिंदर नाथ
13:15
अपने शिष्य को साथ लेते हैं और दोनों गुरु
13:18
शिष्य
13:20
कंधाओं पर झोली लटका करके चल देते हैं
13:23
गणगंगा के लिए। श्रोता वो अपने जादू के बल
13:28
से जो कि जलंधर नाथ ने एक चादर निकाली। उस
13:32
चादर को बिछाया और दोनों गुरु शिष्य उस
13:36
चादर पर बैठ गए। चादर पर बैठने के बाद
13:39
चादर से कहा कि चलिए गढ़ गंगा पर लेकर
13:42
चलिए। तो देखो श्रोताओं चादर जादुई थी।
13:47
दोनों गुरु शिष्य चादर पर बैठकर के
13:50
अंतरिक्ष मार्ग से कुछ ही क्षणों में गढ़
13:53
गंगा पर पहुंच गए।
13:56
उधर ध्यान से सुनने की बात है। जलंधर जोगी
13:59
तो आ जाते हैं गढ़ गंगा पर। उधर राजा नल
14:03
और गजमोतनी सबसे पहले अपने माता-पिता को
14:07
स्नान कराते हैं और स्नान कराने के बाद
14:11
अपने माता-पिता को नरवरगढ़ भेज दिया जाता
14:14
है। 10,000 सैनिक उनके
साथ भेज दिए और नल
14:19
ने और गजमत ने कह दिया कि हम दो से चार
14:23
दिन में वापस लौटेंगे। हम यहां कई दिन
14:26
गंगा में स्नान करेंगे। यहां पर्व लेंगे
14:30
और यहां पर कुछ समय रहना चाहेंगे।
14:33
श्रोताओं
14:35
राजा प्रथम कहने लगे ठीक है पुत्र परंतु
14:38
सावधानी रखना क्योंकि ये राजा हैं ये कभी
14:42
भी बैर नहीं छोड़ते अपना मौका निकाल सकते
14:44
हैं। तो नल कहने लगा पिताजी आप चिंता मत
14:48
करो। रणभूमि में मैं किसी को नहीं जीतने
14:51
दूंगा। मेरे पास अक्षय ते है घुमासुर दाने
14:55
की। और जो दाने की पुत्री गजमोतनी है वो
14:59
जादू में बड़ी प्रवीण है। बड़ी पारंगत है।
15:03
उसके समान कोई जादूगर इस संसार में है
15:05
नहीं। तो इसलिए हमें डरने की आवश्यकता
15:08
नहीं है।
15:10
श्रोताओं महाराज और रानी मंझा तो आ जाते
15:14
हैं नरवरगढ़ और राज्य का संचालन संभालने
15:18
लग गए। उधर देखिए राजा नल से मोतनी कहने
15:23
लगी कि महाराज
15:25
मैं आज अकेली गंगा स्नान के लिए जाना
15:28
चाहती हूं। मैं गंगा में विहार करूंगी और
15:31
गंगा स्नान करूंगी। नल कहने लगा ठीक है
15:34
गजबतनी तुम यहीं तुम्हारे तंबू लगे हुए
15:38
हैं। घाट पर चली जाओ। आराम से स्नान करके
15:42
आओ। राजा लोग भी स्नान करके जा चुके हैं।
15:45
श्रोताओं जब पर्व होता था उसी समय राजा
15:49
रहते थे और जब पर्व समाप्त हुआ तो राजा भी
15:52
अपने तंबू डेराओं को उखाड़ करके चले जाते
15:55
थे अपने राज्यों के लिए। वहां कोई राजा
15:58
नहीं रहा। केवल राजा नल का टेंट शिविर लगा
16:02
हुआ है। और गजमतनी
16:07
गंगा में स्नान करने के लिए महाराज नल से
16:10
कह के चली जाती है।
16:12
गजमतनी गंगा में घुस जाती है। प्रवेश कर
16:15
गई गंगा में। छातीछाती पानी में गजमतनी
16:18
घुस जाती है। इधर श्रोताओं
16:22
जालिंदर जोगी वही बाट लगाए बैठा हुआ है।
16:27
घात लगा के बैठा है कि कब मैं गजमतनी का
16:31
अपहरण करूं। कब गजमोतनी की चोरी करके ले
16:34
जाऊं। तो जब झिलमिला
16:37
जब जालिंदर जोगी ने देखा कि ये जो लड़की
16:42
है। गंगा की धार में स्नान कर रही है। कोई
16:45
राजकुमारी दिखाई पड़ती है। यही मुझे राजा
16:49
नल की पत्नी गजमोतनी जान पड़ती है। तो
16:54
जालिंदर जोगी ने दिमाग से काम लिया और
16:58
आवाज लगाई हे पुत्री गजमोतनी हमें दक्षिणा
17:02
दीजिए। जब गजमोतनी ने पीछे मुड़ के देखा
17:06
तो कहने लगी बाबा मैं अभी स्नान कर रही
17:10
हूं। मैं गंगा के अंदर हूं। मेरा आधा बदन
17:15
उघारा है। नंगा है मेरा आधा बदन। मैंने
17:18
कुछ वस्त्र उतार करके बाहर रखे रख रखे
17:21
हैं। इसलिए हे बाबा मुझे स्नान करने
17:24
दीजिए। और स्नान करने के बाद आप मेरे पति
17:28
महाराज नल के पास जाइए। आपको मुंह मांगा
17:31
दान मिलेगा।
17:33
तो जालिंदर जोगी कहने लगा कि पुत्री मुझे
17:37
तो किसी राजा की पुत्री दिखाई नहीं पड़ती।
17:41
मैं जानता हूं तू दाने की लड़की है। मैं
17:44
यह भी जानता हूं तू जादू में निधान है।
17:47
इसीलिए तू मेरा अनादर कर रही है।
17:50
तो यह बात सुनकर के गजमूतनी कहने लगी कि
17:53
नहीं संत महाराज मैं संतों का अपमान करना
17:56
नहीं चाहती। तो जालिंदर जोगी कहने लगे कि
18:00
यदि तू संतों का अपमान नहीं करती तो तू
18:02
मेरे बारे में नहीं जानती। पुत्री मैं कभी
18:05
किसी नर के हाथ से दान नहीं लेता। मैं
18:09
केवल नारियों से ही दक्षिणा लेता हूं और
18:12
यदि तू दक्षिणा देना चाहती है तो इस गंगा
18:15
से बाहर निकल।
18:17
श्रोताओं गंगा की धारा में गजमोतनी पर
18:20
जादू नहीं चल रहा था उसका। जादू चलाने का
18:23
प्रयास कर रहा था जोगी परंतु जैसे ही जादू
18:27
चलाता वो जादू कट जाता था। इसलिए वो
18:30
गजमतनी को अर्धनग्न अवस्था में क्योंकि
18:34
कुछ वस्त्र उतार रखे थे बाहर निकालना
18:36
चाहता था। गजमोतनी कहने लगी कि बाबा मैं
18:41
अभी बाहर नहीं निकलूूंगी। मेरे नहाने का
18:43
समय निकला जा रहा है। तो जालंधर जोगी कहने
18:47
लगा पुत्री यदि तुम्हें दान नहीं देना है
18:50
तो मैं जा रहा हूं। ठीक है।
18:53
गजमूतनी मन में विचार करने लगी कि यदि ये
18:56
संत
18:58
बिना दान लिए हुए यहां से चला गया तो मुझे
19:02
इसका बहुत बड़ा पाप लगेगा। इसलिए मुझे इसे
19:06
गंगा से निकल कर के स्नान को मध्य में
19:09
छोड़ के गंगा से बाहर निकलना चाहिए और
19:12
इसको दान देना चाहिए। हे श्रोताओं गजमोतनी
19:17
कहने लगी बाबा ठीक है मेरे पास यहां कुछ
19:20
है नहीं लेकिन मेरे गले में नौखा हार पड़ा
19:24
हुआ है। आप ठहरिए मैं निकलती हूं। यदि
19:28
श्रोताओं गजमोतनी गंगा से बाहर नहीं
19:31
निकलती तो जादू नहीं चलता। गजमोतनी को पता
19:35
होता तो जादू नहीं चलता।
19:38
गजमोतनी
19:41
जालिंदर जोगी से कहने लगी बाबा तुम उधर
19:44
छिप जाइए मैं बाहर निकलती हूं क्योंकि
19:48
मेरा कुछ शरीर अर्ध नग्न है। इसलिए मैं
19:52
वस्त्र धारण कर लेती हूं और तुम्हें जो
19:55
दान होगा श्रद्धा अनुसार प्रदान करूंगी।
19:59
तो देखिए श्रोताओं
20:01
अब यह वीडियो यहां से आगे कैसे गजमोतनी की
20:04
चोरी करता है जालिंदर जोगी यह मैं आपको कल
20:08
के वीडियो में सुनाऊंगा। आज का वीडियो ये
20:11
काफी लंबा हो गया है और किस तरीके से
20:14
महाराज नल गजमोतनी को छुड़ा के लाएंगे
20:18
चंदागढ़ से। तो यह आपकी सेवा में मैं कल
20:22
लेकर के उपस्थित हो जाऊंगा श्रोताओं। तब
20:25
तक के लिए यह वीडियो मैं यहीं समाप्त करता
20:27
हूं। इसी के साथ आप सभी श्रोताओं से
20:30
अनुमति लेता हूं। जय हिंद जय भारत।
19.
0:03
इतिहास के पन्नों में यह कहानी साफ-साफ
0:06
लिखी हुई है। आप सभी श्रोताओं का इस चैनल
0:10
पर स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है।
0:13
श्रोताओं जैसा कि आप जानते हैं हमारी
0:16
कहानी चल रही थी नल पुराण इतिहास में से
0:19
और उसके 24 एपिसोड मैं
आपकी सेवा में
0:24
प्रसारित कर चुका था और 25वां एपिसोड
आपकी
0:28
सेवा में लेकर के उपस्थित हूं। आपका ध्यान
0:31
मैं 24वें एपिसोड
से जोड़ता हूं। मैंने
0:34
24वें एपिसोड में बताया था कि जब राजा नल
0:40
महाराज प्रथम समस्त मनसुख गुर्जर का विवाह
0:44
करके नरवरगढ़ में आ जाते हैं तो उसके बाद
0:48
गंगा स्नान करने के लिए जाते हैं क्योंकि
0:51
गंगा स्नान अधूरा रह गया था और उस समय फूल
0:54
सिंह ने महाराज प्रथम को और रानी मंजा को
0:57
कैद कर लिया था। उस स्नान को पूरा करने के
1:01
लिए राजा नल
1:03
स्वयं अपने साथी मनसु गुर्जर को साथ लेकर
1:06
के गंगा स्नान के लिए जाते हैं और गंगा
1:09
स्नान के बाद महाराज प्रथम को रानी मंजा
1:13
को स्नान करा के भेज दिया जाता है नरवरगढ़
1:16
वहां राजा नल मनसुख गुर्जर और गजमोतनी रुक
1:20
जाते हैं। इधर फूल सिंह पंजाबी अपने गुरु
1:25
जोगी जालिंदर के पास जाता है और जालिंदर
1:29
जोगी वहां से चलता है और गजमोतनी जहां
1:33
स्नान कर रही थी गंगा के जिस घाट पर उस
1:38
घाट पर आ जाता है और गजमतनी
1:42
को गंगा से बाहर निकाल लिया है श्रोताओं
1:45
अब यहां से आज का एपिसोड आरंभ हो रहा है।
1:48
रानी गजमोतनी
1:50
जब अर्धनग्न अवस्था में क्योंकि जल में
1:53
स्नान कर रही थी। कुछ वस्त्र उतार के बाहर
1:56
रखे हुए थे। बाहर आई तो जालिंदर जोगी से
2:01
कहने लगी बाबा मैं मेरे वस्त्र धारण कर
2:04
लेती हूं। मेरा स्नान पूर्ण नहीं हुआ।
2:07
परंतु फिर भी मैं आपको दान देना चाहती
2:10
हूं। क्योंकि मैं एक रानी हूं और आपको
2:13
मेरे दरवाजे से आपने मुझसे कुछ मांगा
2:17
इसलिए मैं आपको निराश होकर के नहीं लौटने
2:21
देना चाहती हूं। श्रोताओं
2:24
जब झिलमिला जोगी ने श्रोताओं जब जालिंदर
2:29
जोगी ने यह बात सुनी तो जालिंदर जोगी और
2:33
उसका शिष्य
2:35
मंत्र को अभिमंत्रित करने लगे। श्रोताओं
2:39
जालिंदर जोगी ने मंत्र पढ़ा। सबसे प्रचंड
2:43
मंत्र का उपयोग किया क्योंकि जालिंदर जोगी
2:46
यह जानता था कि गजमोतनी महा जादूगरनी है
2:50
और उसे बस में करना कोई आसान बात नहीं है।
2:53
इसलिए मुझे अपने सबसे प्रचंड और शक्तिशाली
2:57
मंत्र का उपयोग करना होगा। हे श्रोताओं उस
3:01
जालंधर जोगी ने माता कालिका का दिया हुआ
3:05
महामंत्र जो कभी इसका बार खाली नहीं जाता
3:09
अमोग शक्ति थी उस शक्ति का प्रहार गजमोतनी
3:14
पर कर दिया और जैसे ही उस शक्ति का प्रहार
3:17
हुआ तो गजमतनी
3:19
मूर्छित हो जाती है कुछ समय के लिए आपको
3:22
यह भी बताना चाहूंगा कि जालिंदर जोगी
3:25
गजमोतनी का शरीर परिवर्तित नहीं कर सकता
3:28
था
3:29
उसे किसी दूसरे शरीर में जैसे कोई जानवर
3:33
में या कोई पक्षी में तब्दील नहीं कर सकता
3:36
था क्योंकि उसके शरीर के रक्षक जो वीर थे
3:40
उसके साथ रहते थे और जैसे ही गजमोतनी
3:43
मूर्छित अवस्था में आई तो झिलमिला तो
3:47
जालिंदर जोगी ने अपने वीरों का स्मरण किया
3:50
और वीरों से गजमोतनी के शरीर को ऊपर उठा
3:54
लिया और अंतरिक्ष मार्ग से गजमोतनी को
3:58
लेकर के चल चल दिए श्रोताओं
4:01
गजमोतनी चली जा रही है और अपनी चादर को
4:04
बिछा के झिलमिला जोगी
या जालिंदर जोगी भी
4:07
बैठ जाता है। उस चादर पर जालिंदर जोगी बैठ
4:11
गया और वो भी पीछे से चला जा रहा है।
4:14
वीरों ने
4:16
कुछ ही पल में समय नहीं लगाया ज्यादा और
4:19
कुछ ही पल में गजमोतनी को चंदागढ़ के किले
4:24
में ले जाकर के कैद कर दिया। श्रोताओं
4:27
गजमोतनी उस किले में कैद हो जाती है। बंदी
4:31
बन जाती है। गजमोतनी को जब होश आया उसकी
4:35
मूर्छा हटी मंत्र का प्रभाव कम हुआ तो
4:38
गजमोतनी ने अपनी आंखें खोली और आंखें
4:41
खोलने के बाद देखने लगी
4:44
और सोचने लगी हे भगवान क्या मैं कोई
4:47
स्वप्न देख रही हूं। मैं तो गंगा में
4:50
स्नान कर रही थी। माता गंगा की जलधारा में
4:56
स्नान कर रही थी। मैं कहां आ गई? याद करने
4:59
लगी गजमोतनी कि मेरे साथ यह क्या हुआ? मैं
5:02
तो किसी के किले में कैद हूं। यह तो किसी
5:05
राजा का कारागार है। मुझे यहां कौन लाया
5:08
और कैसे आया? गजमोतनी ने
अपना ध्यान
5:11
लगाया। स्मरण शक्ति वापस प्राप्त करने की
5:15
कोशिश की। तो गजमोत्नी सोचने लगी कि मेरे
5:18
पास एक जोगी आया था। एक ऋषि आया था और
5:22
उसने मुझसे दान मांगा था। और मैं उसे अपना
5:26
नौ लखाहार दान में दे रही थी। लेकिन उसके
5:29
बाद मुझे पता नहीं है कि मेरे साथ क्या
5:31
हुआ। मैं यहां कैसे आई और यह निश्चित ही
5:35
उस जोगी का काम है। हे श्रोताओं
5:39
गजमोतनी उस कमरे में कैद है और उधर सुनिए
5:43
अब जब गजमोतनी को काफी समय हो गया। वापस
5:49
अपने शिविर में नहीं लौटी तो राजा नल
5:52
मनसुख से कहने लगा मनसुख तेरी भाभी को
5:55
बहुत समय हो गया है और वह गंगा स्नान करके
5:58
नहीं लौटी है। मित्र वैसे यहां कोई राजा
6:01
लोग तो है नहीं पर फिर भी कोई ना कोई खतरा
6:04
हो सकता है। गंगा की धारा में बह सकती है।
6:07
गंगा का बहाव कम नहीं है। इसलिए जाकर के
6:11
देखिए।
6:13
जब मनसुख गुर्जर गंगा के घाट पर आया तो
6:17
देखने लगा कि वहां कोई भी स्नान नहीं कर
6:21
रहा था। सोना पड़ा हुआ था घाट।
6:24
यह देखकर के मनसुख वापस चला जाता है तंबू
6:28
में और महाराज नल से कहने लगा मित्र प्रलय
6:32
हो गई। राजा नल कहने लगा क्या हुआ कि कुछ
6:36
कहा नहीं जा सकता कि क्यों कि जिस घाट पर
6:40
भाभी गजमोतनी स्नान कर रही थी। हमारी फौज
6:44
हमारी सेना स्नान करती थी। हम स्नान करते
6:47
थे। उस घाट के कोसों दूर तक कोई भी
6:50
व्यक्ति दिखाई नहीं देता। यह बात जब राजा
6:53
नल ने सुनी तो अपने कुछ सैनिकों को कुछ
6:56
योद्धाओं को साथ लेकर के गंगा के घाट पर
6:58
आया और वहां देखा तो कहीं गजमतनी दिखाई
7:02
नहीं दी। राजा नल बड़े परेशान हुए। बड़े
7:07
विचलित हो गए। मन में सोचने लगे कि हे
7:10
भगवन ये क्या हुआ? चारों तरफ
सैनिक दौड़ाए
7:15
लेकिन कई कोसों तक गजमोतनी का पता नहीं
7:18
था। कोई बताने वाला नहीं था कि गजमोतनी
7:21
कहां गई। राजा नल गंगा में खड़े हैं। गंगा
7:26
के जल में खड़े होकर के माता गंगा को याद
7:30
कर रहे हैं कि क्या मेरी पत्नी गजमतनी
7:34
माता गंगा तुझ में समाहित हो गई?
7:37
यदि ऐसा हुआ तो आपने अच्छा नहीं किया।
7:41
क्योंकि गजमोत ने भी नल के ही पूर्वज लेकर
7:45
के आए थे। महाराज भागीरथ
7:48
उसी कुल में इवाकु वंश में ही नल उत्पन्न
7:52
हुए थे। क्या आपने मेरे परिवार को समाप्त
7:57
कर दिया? परंतु माता
गंगा का कोई जवाब
8:00
नहीं आया। श्रोताओं राजा नल मन में विचार
8:04
करने लगी कि इस गंगा में ही मेरी पत्नी
8:08
चली गई है और माता गंगा मुझे कुछ बता नहीं
8:11
रही है इसलिए मुझे भी गंगा में डूब कर के
8:16
आत्महत्या करनी चाहिए ये विचार राजा नल के
8:19
मन में आ रहा है श्रोताओं राजा नल गंगा के
8:23
जल में छाती छाती जल में घुस जाते हैं और
8:27
गंगा का ध्यान लगाया तलवार हाथ में लगी
8:30
हुई
8:31
और माता गंगा का स्मरण करके अपने पूर्वज
8:35
भागीरथ का स्मरण करके कहने लगे कि हे
8:37
मातेश्वरी
8:39
यदि मैंने मेरी पत्नी को इस जल में
8:42
प्रभावित किया है तो मुझे भी इस जल में
8:44
प्रवाहित कीजिए
8:47
नहीं तो मैं नरवरगढ़ कैसे जाऊंगा? नरवरगढ़
8:51
जाने में मुझे बहुत बड़ी शर्म आएगी।
8:54
नरवरगढ़ के लोग यह कहेंगे कि गंगा के घाट
8:57
से गजमोतनी को कोई हरण करके ले गया। कोई
9:01
बलपूक गजमतनी को ले गया। राजा नल की तलवार
9:05
जंग खा गई। राजा नल में वो शक्ति नहीं
9:08
रही। इसलिए मैं तेरे इस जल में ही प्राण
9:12
त्याग कर रहा हूं। हे श्रोताओं माता गंगा
9:15
ने जब यह देखा कि भागीरथ का एक वंशज मेरे
9:20
जल में प्राण त्यागने के लिए तैयार है तो
9:23
माता गंगा ने श्वेत वस्त्र धारण किए।
9:26
श्वेत वस्त्र धारण करके जल की धारा पर
9:29
प्रकट हो गई और कहने लगी राजा नल ध्यान से
9:33
सुन
9:35
तेरी पत्नी को मेरी जलधारा में प्रवाहित
9:38
नहीं किया है तो राजा नल ने माता गंगा को
9:42
प्रणाम किया और गंगा से निवेदन करके कहने
9:46
लगा तो मातेश्वरी जब आपने जल में प्रवाहित
9:49
नहीं किया तो फिर कहां गई आपके जल में
9:53
स्नान करने भेजा था मैंने उसे और जब आपके
9:57
सरहदी क्षेत्र में से
9:59
कोई चला जाए, कोई गायब हो
जाए या खो जाए
10:02
तो उसकी जिम्मेदारी कौन की होगी? गंगा
10:05
कहने लगी पुत्र मैं सब कुछ देख रही थी।
10:09
तुम्हारे महा दुश्मन फूल सिंह पंजाबी
10:12
जिसको तुमने जीवित छोड़ दिया था। और उसी
10:16
ने अपने गुरु जालिंदरनाथ जोगी को भेजा था।
10:21
वो एक साधु के भष में यहां आया और उसने
10:25
तुम्हारी पत्नी का अपहरण कर लिया है।
10:29
तुम्हारी पत्नी का हरण करके ले गया। जादू
10:32
चला दिया उस पर और जादू से वह मूर्छित हो
10:34
गई और जालिंदर जोगी अपने वीरों की सहायता
10:38
से आकाश मार्ग से ले गया है। तो राजा नल
10:42
कहने लगे मातेश्वरी मुझे यह बताइए जब तुम
10:45
इतना ही बता रही हो कि कहां ले गया है कि
10:48
राजा नल ये मेरी गारंटी नहीं है। यह मैं
10:51
नहीं बता सकती। यह काम तुम्हारा है। हे
10:55
श्रोताओं, अब तो राजा
नल गंगा की धार से
10:58
बाहर आ जाते हैं। बाहर आ गए। मनसुख के साथ
11:02
खड़े हुए हैं। और मनसुख और नल अपनी फौज के
11:06
कमांडर से कहने लगे कि हम जब तक तुम्हें
11:11
कोई आदेश ना दे दे तब तक तुम तैयार रहना।
11:14
यदि रणभूमि में स्वयं यमराज भी तुम्हारे
11:17
सामने युद्ध करने आ जाए तो तुम्हें तैयार
11:20
रहना है, सजग रहना है।
और मैं और मनसुख और
11:24
लाखा दादा क्योंकि उनके कुल पुरोहित थे,
11:27
ब्राह्मण थे। हम तीनों गजमतनी की खोज में
11:31
जा रहे हैं। हे श्रोताओं राजा नल मंसो
11:36
पूजर और लाखा ब्राह्मण तीनों अपनी-अपनी
11:39
तेगा हाथ में लेकर के गजमोतनी को खोजने के
11:43
लिए चल देते हैं। सेना गंगा के घाट पर
11:46
पड़ी हुई है। पड़ाव डला हुआ है। खोजते
11:50
खोजते नल को मनसुख को और लाखा दादा को सात
11:55
दिवस का समय व्यतीत हो गया। लेकिन गजमोतनी
11:58
का कोई अता पता नहीं लग रहा है। खोज रहे
12:02
हैं और उधर सुनिए श्रोताओं जब चंदागढ़ के
12:06
किले में गजमोतनी कैद हो गई तो जोगी
12:11
जालिंदर नाथ ने अपने शिष्य महाराज फूल
12:15
सिंह को बुलाया और फूल सिंह से कहा कि फूल
12:18
सिंह जिस रानी ने तेरी बेइज्जती की थी
12:21
मंत्र चला करके तेरी सेना को पराजित किया
12:24
था वही रानी मेरी कैद में आज बंदी है। तू
12:27
जो चाहे वो इसके साथ कर सकता है। हे
12:30
श्रोताओं अब तो फूल सिंह मन में प्रसन्न
12:34
हो गया। कहने लगा कि महाराज आपने मेरे साथ
12:39
बहुत अच्छा किया। वाह गुरुदेव आपने मेरी
12:44
मेरा जो कष्ट था उस कष्ट को कम कर दिया।
12:47
मेरा प्रतिशोध पूरा हो गया। गजमोतनी को अब
12:50
मैं किसी भी कीमत पर राजा नल को नहीं दे
12:52
सकता। चाहे मुझे दोबारा युद्ध क्यों ना
12:55
करना पड़े। हे श्रोताओं
12:58
अब तो फूल सिंह पंजाबी अपने गुरु जालिंदर
13:03
नाथ को लेकर के उस कक्ष में जिसमें गजमतनी
13:06
कैद थी उस कक्ष में पहुंच जाता है। चार
13:10
सैनिक साथ में लिए और सैनिकों को आदेश
13:14
दिया कि इसे बंदी बना लिया जाए। जंजीरों
13:16
से जकड़ लिया जाए और बाहर निकाला जाए।
13:20
श्रोताओं
13:21
गजमोतनी को जंजीरों से जकड़ करके बाहर
13:25
निकाल दिया गया। किले में जहां फूल सिंह
13:29
पंजाबी चंदागढ़ के किले में बैठा हुआ था।
13:32
उस सभा में पेश कर दिया गया। गजमोतनी को
13:35
जंजीरों से बंधी हुई है। और रानी गजमोतनी
13:40
से फूल सिंह पंजाबी कहने लगा कि रानी बहुत
13:44
जादूगरनी बनती थी। बड़ा युद्ध किया था।
13:48
बड़ी भीड़ थी। तलवार चलाने में भी निपुण
13:51
थी। अब चला तेरा बल। अब चला तेरा जादू। अब
13:55
चला तेरी तलवार। कहां है वो तेरा पति? अब
13:58
बुला उसे। अब मैं तुझे अपनी पत्नी बना के
14:02
रखूंगा। तो गजमतनी बंधे हुए जंजीरों से एक
14:06
शेरनी की तरह दहाड़ करके
14:09
राजा फूल सिंह से कहने लगी अरे कायर अरे
14:13
नीच अरे दुष्ट राजा तेरा अंत बिल्कुल
14:16
नजदीक है। तुझे बचाने वाला कोई नहीं है।
14:21
मैं जानती हूं कि इस तेरे जो गुरु ने मुझ
14:25
पर जादू चलाया है। उस जादू को मैं नहीं
14:29
तोड़ पाई। तब मेरा यह हाल हुआ। परंतु
14:32
ध्यान रखना कि बहुत जल्दी ही तुम दोनों
14:36
मेरी कैद में होंगे। तुम्हें तुम्हारे
14:39
प्राण बचाने के लिए मुझसे भीख मांगनी
14:42
पड़ेगी। श्रोताओं
14:45
यह बात जब राजा फूल सिंह ने सुनी तो
14:48
क्रोधित हो उठा और कहने लगा गुरुदेव अभी
14:52
इसको उसी कारागृह में बंद कर दो और आदेश
14:56
दे दिया चार सैनिकों को कि इसमें कोड़ों
14:58
की मार लगाई जाए। इसमें 10 कोड़े रोज
लगाए
15:01
जाएं और बंदी गृह में बंद रखा जाए। इसको
15:05
जेलियों की तरह इससे बर्ताव किया जाए।
15:08
खाने के लिए इसे सूखी रोटी दी जाए।
15:11
श्रोताओं गजमोतनी उधर यातना भोग रही है।
15:15
जकड़ी पड़ी हुई है अपनी जंजीरों में। और
15:19
इधर खोजते खोजते राजा नल मनसुख और लाखा
15:24
ब्राह्मण चले जा रहे हैं। जब नल की कोई
15:28
पेस नहीं पड़ी तो मार्ग में माता भवानी का
15:32
एक मंदिर मिल गया। और उस मंदिर में राजा
15:37
नल प्रवेश कर जाते हैं। आसन मार के बैठ
15:40
गया और अपनी माता देवी का ध्यान धरने लगा।
15:45
आपको मैं बताना चाहूंगा कि नल जैसा देवी
15:47
का भक्त कोई नहीं हुआ था। चाहे किसी के
15:51
साथ में देवी लड़ी हो लेकिन अंतिम समय में
15:54
उसने नल का साथ दिया था। राजा नल ने जब
15:57
देवी के मंदिर में अपनी देवी मैया का
16:00
स्मरण किया और
16:03
ध्यान धरते धरते तीन दिवस का समय व्यतीत
16:07
हो गया परंतु देवी माता प्रकट नहीं हुई तो
16:10
राजा नल ने अपना तेगा निकाला और तेगा
16:13
निकाल कर के अपनी गर्दन पर चलाने का
16:17
प्रयास किया तो माता देवी प्रकट हो गई
16:20
राजा नल का खड़क पकड़ लिया कहने लगी पुत्र
16:23
बस छोटी सी बात पर ही हिम्मत हार गए वीर
16:28
योद्धा कभी मरते नहीं है कष्टों से घबराते
16:31
नहीं है वो और क्या बात है कैसे बुलवाई
16:35
क्यों याद किया क्या कारण है नल कहने लगा
16:40
सब जानते हुए मातेश्वरी और मुझे ये पूछ
16:42
रही हो कि क्या कारण है तो देवी कहने लगी
16:47
अरे नल तू भूल गया तू मुझसे वायदा कर देता
16:51
है कि मैं तुझ पर भेंट चढ़ाऊंगा तेरी पूजा
16:54
करूंगा तुझ पर पुष्प अर्पित अर्पित करूंगा
16:57
परंतु आज तक तू मुझे कुछ नहीं चढ़ाता है
17:01
तू केवल केवल जब तुझ पर कष्ट आता है तो
17:05
मेरे मंदिर में आकर के मेरा ध्यान धर के
17:08
मरने के लिए बैठ जाता है। परंतु जा मैं
17:13
तुझे बताती हूं कि जो तेरी पत्नी गजमोतनी
17:16
है चंदागढ़ के किले में कैद है। फूल सिंह
17:20
पंजाबी का सख्त पहरा लग रहा है। वो दुर्ग
17:24
कंपिलगढ़ के अधीन है। कंपिलगढ़ के राजा का
17:28
अधिकार क्षेत्र है। उसी के द्वारा निर्मित
17:31
दुर्ग है। और उस दुर्ग में
17:35
फूल सिंह की कैद में तेरी पत्नी बंद है।
17:39
राजा नल कहने लगा कि मातेश्वरी उसे अपहरण
17:42
करने वाला कौन था कि पुत्र यह मत पूछे
17:46
जोगी जालिंदरनाथ
17:48
जो कि 14 विद्या निधान
है। तेरी पत्नी
17:51
गजमोतनी के समान ही विद्या में निपुण है।
17:54
उसे जादू से जीत पाना संभव नहीं है। उसी
17:58
ने अपनी जादू की चादर के द्वारा
18:01
तेरी पत्नी का हरण किया। अपने वीरों को ले
18:05
आया। वीरों से गजमूतनी को किले में कैद
18:08
करवा दिया। इसलिए हे नल तुझे मैं एक उपाय
18:13
बताती हूं। तुम तीनों जोगी का रूप धारण
18:16
करो। और चंदागढ़ के किले के बाहर
18:20
दक्षिण दिशा में जोगी जालिंदर नाथ का
18:24
मंदिर है।
18:25
साधु का रूप धारण करो और जोगी जालंधर नाथ
18:29
के शिष्य बन जाओ और उसकी जो विद्या है
18:33
उसका जादू है उस जादू को चुरा लीजिए। उससे
18:37
विद्या सीख लीजिए
18:40
और जब तुम अपनी पत्नी को छुड़ा सकते हो।
18:43
अन्यथा रणभूमि में सीधे युद्ध करके नहीं
18:47
तो तुम भी बकरे या कुत्ते बनके फूल सिंह
18:50
की कैद में होंगे और फूल सिंह आपको जीवित
18:53
नहीं छोड़ेगा। आपके सर को धड़ से अलग कर
18:56
सकता है। हे श्रोताओं माता देवी ने यह कहा
19:00
तो मनसुख लाखा दादा
19:04
तीनों की तीनों कहने लगे कि सेना को आदेश
19:07
दे दिया जाए
19:09
कि आप गंगा के घाट पर ही तीन महीने तक की
19:13
व्यवस्था खानेपीने और रहने की रखें।
19:18
यदि आवश्यकता होगी तो हमें सैनिक कार्रवाई
19:20
करनी पड़ेगी।
19:22
हे श्रोताओं राजा नल
19:25
अपनी सेना को एक आदेश भिजवा देता है लाखा
19:28
ब्राह्मण पे और लाखा ब्राह्मण उस आदेश को
19:31
सेना को सुना करके यथाशीघ्र वापस लौट आते
19:35
हैं और तीनों चल देते हैं। चलते-चलते
19:39
पहुंच जाते हैं चंदागढ़ की सीम में।
19:42
चंदागढ़ में पहुंचने के बाद
19:45
उन्होंने पूछते पूछते
19:49
जो जोगी जालिंदर नाथ था उस जोगी जालिंदर
19:53
नाथ का आश्रम खोजा। आश्रम की भव्यता देखते
19:57
ही बनती थी। जादू का बना हुआ आश्रम था।
20:01
आश्रम में अद्भुत चमत्कारिक शक्तियां थी।
20:06
स्वयं माता काली वहां विराजमान थी। जो
20:09
जोगी जाल जालिंदरनाथ कह देता था माता काली
20:13
से वही करती थी। हे श्रोताओं भैरव 56 कलुआ
20:19
वामन भैरव और 64 जोगिनी उस
मंदिर में उसकी
20:23
सुरक्षा व्यवस्था में थी। जोगी जालिंदर
20:26
नाथ बहुत बड़ा सिद्ध था। राजा नल अपने
20:31
ब्राह्मण लाखा ब्राह्मण से कहने लगा कि
20:34
पंडित जी तुम ऐसा कीजिए सबसे पहले मैं
20:38
जाता हूं और मैं देखूंगा इसको और यदि मेरा
20:41
मौका लगा तो मैं इसे समाप्त ही कर दूंगा।
20:45
हे श्रोताओं राजा नल ने जटाजूट धारण किए
20:50
और एक साधु का रूप बना लिया। देखो
20:53
परिस्थिति क्या करवा देती है। जो राजा था
20:56
तेग चलाता था जिसके आदेश में दम थी। अपनी
21:00
पत्नी को छुड़ाने के लिए एक बाबा जी का
21:03
रूप धारण करता है। हाथ में कमंडल ले लिया।
21:07
वक्कल वस्त्र धारण कर लिए जटाजूट और भस्म
21:10
रमाली और अलख निरंजन कहता हुआ पहुंच जाता
21:14
है जालिंदर जोगी के आश्रम में। जालिंदर
21:18
जोगी ने जब जब देखा तो कहने लगा कोई बहुत
21:22
अच्छा साधु है। बड़ा सुंदर साधु है। इसको
21:26
सम्मान सहित अंदर ले आइए। श्रोताओं उसके
21:30
शिष्य राजा नल को सम्मान सहित किले के
21:33
अंदर ले गए। हे श्रोताओं राजा नल को पहचान
21:38
नहीं पाया जोगी जालंधर नाथ क्योंकि देखा
21:42
ही नहीं था नल को। और अब नल उस मंदिर में
21:47
पहुंच गए हैं। उसमें बड़े आराम से रहने लग
21:49
जाते हैं। कुछ समय बाद मंसु गुर्जर भी
21:53
साधु का रूप धारण करता है। और इसी तरीके
21:56
से वो भी उस मंदिर में प्रवेश कर जाता है।
21:59
और कुछ समय बाद लाखा ब्राह्मण भी साधु का
22:02
रूप धारण करके उस मंदिर में प्रवेश कर
22:05
जाते हैं। तीनों अलग-अलग समय पर उस मंदिर
22:08
में प्रवेश कर गए और लाखा
22:12
दादा
22:13
राजा नल और मंसु गुर्जर तीनों अलग-अलग
22:16
कक्षों में अलग-अलग भाषाओं में बातें करने
22:20
लगे। अलग-अलग कक्षों में रहते अलग-अलग देश
22:23
के रहने वाले साधु बन गए। ताकि इस जोगी
22:26
जालिंदर नाथ को कोई भ्रम ना हो जाए। एक
22:30
दिन जोगी जालिंदर नाथ की सेवा कर रहे थे।
22:33
राजा नल और मंसुख गुर्जर। तो मनसुख गुर्जर
22:37
कहने लगा कि बाबा इसको सेवा करने का
22:40
अधिकार नहीं है क्योंकि मैं आपकी अधिक
22:43
सेवा करता हूं। नल कहने लगा बाबा पहले
22:46
आपकी शरण में मैं आया था इसलिए शिष्य बनने
22:48
का अधिकार मुझे है क्योंकि वो जोगी
22:51
जालिंदर नाथ को भ्रम में डालना चाहते थे।
22:54
जोगी जालिंदरनाथ
22:56
उनके माया जाल में फंस जाता है और कहने
23:00
लगा तुम दोनों मेरे शिष्य हैं। कोई बात
23:04
नहीं है। दोनों को शिष्य बना लिया जोगी
23:06
जालिंदर नाथ ने और तीसरे लाखा ब्राह्मण वो
23:10
भी आ जाते हैं। लाखा दादा कहने लगे कि
23:14
बाबा जब इनको शिष्य बना लिया तो मुझे
23:17
क्यों नहीं बनाया? मुझे भी
शिष्य बनाइए।
23:20
लाखा ब्राह्मण को भी शिष्य बना लिया। और
23:23
अब तीनों उसके मंदिर में जो जादू का
23:26
पिटारा था उसे खोजते हैं कि कैसे इसका
23:30
जादू का पिटारा मिलेगा। कैसे वो शक्ति
23:33
मिलेगी। श्रोताओं नल और मनसुक तो तेगा
23:36
चलाना जानते थे। परंतु लाखा ब्राह्मण बड़ी
23:40
चालाक थे।
23:42
उनको देवी की जहां प्रतिमा थी, माता काली
23:46
की प्रतिमा थी, वहां उसका
जादू का पिटारा
23:49
मिल जाता है। संपूर्ण जादू का पिटारा
23:54
देखा लाखा ब्राह्मण ने तो लाखा ब्राह्मण
23:58
प्रसन्न हो गए और राजा नल से कहने लगे कि
24:02
महाराज हमारा काम बन चुका है। हमें इसका
24:05
जादू मिल चुका है और हम इसका जादू यहां से
24:09
निकाल करके ले जाएंगे। और इससे कुछ जादू
24:13
मैंने सीख लिया है कि यह क्या जानता है और
24:16
तब हमें गजमोतनी के पास प्रवेश करना है।
24:20
हे श्रोताओं
24:22
इस तरीके से वो उस किले में रह रहे हैं।
24:26
कुछ समय और निकल गया धीरे-धीरे।
24:29
एक दिन नल कहने लगे बाबा मुझे इस चंदागढ़
24:34
के दुर्ग में लेकर के चलिए। और मैं इस
24:39
दुर्ग को घूम के देख के आना चाहता हूं। यह
24:42
बात जब
24:44
जोगी ने सुनी तो जोगी कहने लगा बेटे कोई
24:46
बात नहीं है। चलिए मैं आज तुम्हें चंदागढ़
24:49
का दुर्ग दिखाता हूं।
24:51
राजा नल जोगी के भष में बड़ी-बड़ी जटाएं
24:54
भस्मी रमी हुई है। चेहरा
24:58
भस्मी से अलग ही दिखाई दे रहा है। और राजा
25:02
नल को लेकर के
25:04
जोगी जालिंदर नाथ पहुंच जाता है चंदागढ़
25:07
के किले में। जब चंदागढ़ के किले में
25:10
पहुंचा तो फूल सिंह ने जोगी जालिंदर नाथ
25:13
का बड़ा स्वागत किया। बड़ा सम्मान किया।
25:17
इधर
25:20
फूल सिंह कहने लगा बाबा महीने का समय
25:23
व्यतीत हो गया है परंतु गजमोतनी मेरी एक
25:26
बात भी मानना पसंद नहीं करती वो मेरी तरफ
25:29
देखती भी नहीं है कारागृह में बंद है।
25:33
मैंने उसे जंजीरों से जकड़े रखा है।
25:37
जोगी जालिंदर नाथ तुम जाओ और उसे कुछ समझा
25:40
के आओ। हे श्रोताओं देखिए
25:44
राजा नल को साथ में लेकर के जोगी जालंधर
25:47
नाथ उस जेल तक पहुंच जाते हैं जहां
25:50
गजमोतनी कैद है। गजमोतनी को राजा नल ने
25:54
देखा और राजा नल को गजमोतनी ने देखा तो
25:58
गजमोतनी के नेत्रों से आंसुओं की धार बहने
26:01
लगी। राजा नल गजमोतनी से कहने लगा कि केवल
26:06
आज की रात्रि ही तुझे इस जेल में रहने
26:08
दूंगा। कल तो मैं इस झिलमिला जोगी को और
26:12
दुष्ट फूल सिंह को
26:14
इनका सर तुम्हारे चरणों में होगा। दोनों
26:18
के मस्तक धड़ से अलग कर दूंगा।
26:20
देखकर के झिलमिला जोगी या जोगी जालंदर नाथ
26:24
गजमोतनी को समझाता है। परंतु गजमोतनी उसकी
26:28
एक बात भी नहीं मानती है। हे श्रोताओं
26:31
राजा नल को साथ में लेकर के जोगी
26:34
जालिंदरनाथ
26:36
महाराज फूल सिंह से कहने लगे कि राजन एक
26:39
महीने का वक्त और दीजिए। गजमोतनी को
26:42
तुम्हारी पटरानी बनवा दूंगा मैं। मैं आज
26:45
भी उस पर अपना जादू चला के आया हूं। नल
26:48
कहने लगा बेटे आज रात्रि का समय है। कल तो
26:52
मैं तुम्हारे सरों को धड़ से अलग कर दूंगा।
26:55
हे श्रोताओं नल को लेकर के नल उसके साथ
27:00
क्योंकि नल की भी कुछ मजबूरी थी। आ जाता
27:03
है जोगी जालिंदर नाथ के मंदिर में और वहां
27:07
आकर के नल अपने दोनों साथी मनसुख गुर्जर
27:11
और लाखा दादा से मंत्रणा कर रहा है। विचार
27:14
कर रहा है। देखिए श्रोताओं कल के वीडियो
27:18
में मैं आपको बताऊंगा कि राजा नल किस
27:21
तरीके से गजमोतनी को उस दुष्ट की कैद से
27:24
मुक्त कराते हैं और किस तरीके से फूल सिंह
27:27
का अंत करते हैं। अब ये वीडियो मैं यहीं
27:30
समाप्त करता हूं। इसी के साथ जय हिंद जय
20.
इतिहास के पन्नों में यह कहानी साफसाफ
0:06
लिखी हुई है। समस्त श्रोताओं का, भक्तों
0:09
का और सब्सक्राइबर बंधुओं का एक बार फिर
0:13
से स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है।
0:16
श्रोताओं जैसा कि आप जानते हैं हमारी
0:18
कहानी चल रही थी नल पुराण इतिहास में से
0:22
और उसके 25 एपिसोड मैं
आपकी सेवा में
0:26
प्रसारित कर चुका था और आज 26वां एपिसोड
0:30
आपकी सेवा में लेकर के उपस्थित हूं। परंतु
0:32
मेरे श्रोताओं की कुछ शिकायतें हैं और मैं
0:36
उनसे उन शिकायतों के लिए क्षमा प्रार्थी
0:39
हूं। क्योंकि श्रोताओं मेरी कुछ समस्याएं
0:43
हैं। मैं आपको बता चुका हूं और उनका
0:45
समाधान अभी होने वाला नहीं है। इसलिए मैं
0:51
आपको प्रतिदिन वीडियो डालने में असमर्थ
0:54
हूं। फिर भी कोशिश करता हूं आपको प्रतिदिन
0:58
वीडियो प्रसारित किया जाए। आपकी सेवा में
1:00
वीडियो डाला जाए। तो आइए श्रोताओं मैं
1:04
आपका ध्यान वापस 25वें एपिसोड
से जोड़ता
1:07
हूं। 25वें एपिसोड
में मैंने आपको बताया
1:10
था कि राजा नल मनसुख और लाखा ब्राह्मण
1:17
तीनों की तीनों जालिंदर जोगी के यहां उसके
1:19
शिष्य बन जाते हैं और धीरे-धीरे उसके जादू
1:23
को सीखने लगते हैं और उसके जादू के पिटारे
1:26
को ले लेते हैं। श्रोताओं, एक दिन राजा
नर
1:31
जालिंदर जोगी के साथ महाराज फूल सिंह के
1:35
चंदागढ़ में प्रवेश कर जाता है। क्योंकि
1:37
वह फूलसिंह के ही आधिपत्य में आता था वो
1:39
दुर्ग। और
1:42
उसमें प्रवेश करके गजमोतनी से जहां जिस
1:46
जेल में कैद थी, उसमें मिल करके आए थे।
1:49
श्रोताओं मिलने के बाद
1:52
राजा नल वापस आ जाते हैं और जहां जालिंदर
1:56
जोगी का आश्रम था उस आश्रम में तीनों
2:00
मंत्रणा करने लगे। नल कहने लगा मित्रों आज
2:03
रात्रि के समय ही मुझे गजमोतनी को उसकी
2:07
कैद से छुड़ाना है। मनसुख कहने लगा
2:10
मित्रों युद्ध विद्या में तो हम पारंगत
2:14
हैं। परंतु जादू में हम कुछ नहीं जानते।
2:17
और यह चंदागढ़ जादू का गढ़ है। फूल सिंह
2:21
पंजाबी हमसे युद्ध में नहीं जीत सकता। हम
2:25
उसका वध कर सकते हैं। परंतु यह जालिंदर
2:28
जोगी है। ये बहुत बड़ा जादूगर है। इसने
2:32
गजमोतनी जैसी जादूगर रानी को अपने कब्जे
2:36
में ले लिया। उसका अपहरण कर लिया। तो नल
2:39
कहने लगा वीर कभी डरते नहीं है। वीरों को
2:43
डरना शोभा भी नहीं देता। मैं आज रात्रि
2:46
में ही मेरी रानी को कैद से मुक्त करा
2:48
लूंगा। हे श्रोताओं राजा नल
2:53
इंतजार कर रहे हैं रात्रि होने का। रात्रि
2:56
के ठीक 12:00 बजे।
2:59
12:00 बजते ही राजा नल ने अपना तेगा
3:02
निकाला। मां भवानी का स्मरण किया।
3:05
और नल
3:07
अपने साथी मनसुख और लाखा ब्राह्मण को सजग
3:11
करने के बाद उनको प्लानिंग के अनुसार पहले
3:13
बता दिया था कि मैं जा रहा हूं। नल चल
3:16
देता है चंदागढ़ के दुर्ग की तरफ। मध्य
3:21
रात्रि का समय है। महा बलवान महा पराक्रमी
3:24
योद्धा अपनी रानी की कैद को छुड़ाने के
3:27
लिए चंदागढ़ के दुर्ग में प्रवेश करने के
3:31
लिए प्रवेश द्वार पर पहुंच जाता है।
3:34
प्रवेश द्वार पर देखा दो पहरेदार लगे हुए
3:37
हैं। राजा नल ने
3:40
भष बदला। भष बदल के जालिंदर जोगी का रूप
3:45
बनाया और जालिंदर जोगी का रूप बना के
3:49
दोनों पहरेदारों से कहने लगा कि मुझे अभी
3:51
इसी समय महाराज फूल सिंह से मिलना है।
3:55
मुझे कुछ अनिष्ट की आशंका हुई और इसलिए
3:57
मैं राजा के पास चला आया हूं। जब ये बात
4:01
पहरेदारों ने सुनी तो सोचा महात्मा है।
4:05
जालिंदर जो भी है हमारे महाराज का गुरु
4:07
है। इसे अंदर जाने दिया जाए।
4:10
श्रोताओं जालिंदर जोगी के वेश में राजा नल
4:13
अंदर चले गए। किले में प्रवेश कर गए और
4:18
कुछ द्वारों तक आगे निकल गए। देखा सामने
4:22
से फूल सिंह पंजाबी आ रहे हैं क्योंकि फूल
4:27
सिंह भी रात्रि में सोता नहीं था। पराजय
4:31
शत्रु को हमेशा नींद नहीं आती।
4:34
पराजय शत्रु तो इस तरीके से तड़फड़ाता
4:38
रहता है कि कब मेरे शत्रु से बदला लिया
4:40
जाए। बदले की आग में जल रहा था। इसलिए वो
4:44
चाहता था कि गजमतनी बहुत जल्दी ही मेरी
4:47
पत्नी बने। हे श्रोताओं जब
4:52
जालिंदर जोगी के भष में महाराज नल ने यह
4:55
देखा तो फूल सिंह पंजाबी के सामने पहुंच
4:59
जाता है। कहने लगा राजन आज रात्रि को मुझे
5:02
एक धार्मिक अनुष्ठान करना है और मुझे
5:05
गजबतनी के कक्ष में अभी प्रवेश करना है।
5:08
फूल सिंह कहने लगे कि गुरुदेव आपकी जैसी
5:11
इच्छा आप जाइए और आवश्यकता पड़े तो मुझे
5:15
भी बुलवा लेना। हे श्रोताओं
5:18
राजा नल संपूर्ण सेना को और राजा फूल सिंह
5:22
को चकमा देकर के प्रवेश कर जाते हैं उस
5:27
जेल के अंदर। जेल में पहुंचने के बाद
5:30
गजमतनी को देखा तो गजमोतनी की जो जंजीरें
5:34
जकड़ी हुई थी उन्हें खोल दिया। खोल के
5:37
गजमोतनी से कहने लगा गजमोतनी अब हमें इस
5:41
दुर्ग से बाहर निकलना होगा। गजमोतनी कहने
5:44
लगी कि देखो तुम साधु के भष में है और इस
5:50
तरीके से मैं तुम्हारे साथ बाहर निकलूूंगी
5:54
तो फूल सिंह हो सकता है हमें अपने दरबार
5:58
में बुला ले तो नल कहने लगा गजमतनी फिर
6:00
दूसरा कोई उपाय नहीं है कि नहीं महाराज
6:03
आपने मेरी कैद को मुक्त कर दिया है और
6:06
मेरे पास 14 विद्या जादू
है मैं जादू में
6:11
कम नहीं हूं
6:13
परंतु इस क्षेत्र में यहां की जो नगर की
6:16
देवी है उसका आधिपत्य स्थापित है। वो मेरे
6:21
जादू को चलने नहीं देती। जालिंदर जोगी ने
6:25
अखंड सिद्धियां प्राप्त की हैं। इसलिए वो
6:28
मेरे जादू को काट देता है। परंतु महाराज
6:32
आप जालिंदर जोगी के भष में बाहर आइए और
6:35
मैं यहां से मेरे वीरों की सहायता से
6:37
निकलती हूं। हे श्रोताओं नल और गजमोतनी
6:42
दोनों विचार करके एक दूसरे से आगे पीछे उस
6:46
जेल से उस कैद से कैदखाने से निकल कर के
6:51
भागते हैं। नल और गजमतनी चंदागढ़ के मेड़े
6:56
पर आकर के मिल जाते हैं। और जैसे ही मेड़े
6:59
पर नल और गजमोतनी मिले नल ने अपना राजसी
7:02
बाना धारण किया जोगी का भष उतार के फेंक
7:04
दिया। श्रोताओं जालिंदर जोगी को पता चल
7:08
जाता है। जालिंदर जोगी को पता चला कि मेरे
7:12
साथ धोखा हुआ है। और ये तीनों जो जोगी के
7:15
भष में मेरे यहां विद्या ग्रहण कर रहे थे।
7:19
मेरे शिष्य बने हुए थे। ये कोई और नहीं।
7:22
ये तो स्वयं राजा नल और उसके साथी हैं। हे
7:25
श्रोताओं अब तो जालिंदर जोगी ने क्रोध
7:28
करके मनसुख पर मंत्र का प्रहार किया। और
7:32
मनसुख को वही के वही पत्थर का बना दिया।
7:36
लाखा ब्राह्मण को भी वही पत्थर का बना
7:38
दिया। उसी अपने आश्रम में और दोनों को
7:41
पत्थर का बना करके अपनी मंत्र शक्ति से
7:45
सुसज्जित उस जादुई चादर को निकाला। और
7:48
जादुई चादर पर अपने शिष्य के साथ बैठ जाता
7:53
है। और उस चादर को अंतरिक्ष मार्ग से
7:58
उड़ाया और कुछ ही समय में जहां नल और
8:01
गजमतनी दोनों जा रही थी। भागने की कोशिश
8:05
में थे वहां पहुंच जाता है। यदि श्रोताओं
8:09
नल और गजमोतनी चंदागढ़ की सीएम को पार कर
8:12
जाती तो उसका जादू नहीं चलता। परंतु
8:16
दुर्भाग्यवश गजमोतनी तो चंदागढ़ की सेम को
8:20
पार कर गई परंतु महाराज नल चंदागढ़ की सीम
8:23
को पार नहीं कर पाए और उसके अभिमंत्रित
8:28
मंत्र
8:30
मंत्रों से प्रेरित जो उड़द होते हैं वो
8:32
फेंके और वो राजा नल को जाकर के लगे और
8:35
राजा नल हाथ में तलवार थामे हुए वहीं
8:39
पत्थर के बन जाते हैं। जब नल पत्थर के हो
8:43
गए तो जालिंदर जोगी अब कहने लगा गजमोतनी
8:48
अब मैं तुझे जीवित नहीं छोडूंगा तुझे मेरे
8:50
महाराज की पटरानी बलपूक बनवा दूंगा
8:53
क्योंकि ये मैंने तेरे तीनों साथी
8:55
तुम्हारा पति मनसुख और तुम्हारे कुल
8:58
पुरोहित लाखा ब्राह्मण को मैंने पत्थर का
9:01
बना दिया है। जब गजमोत्नी को यह पता चला
9:04
कि जालिंदर जोगी पीछा कर रहा है। तो
9:07
गजमतनी ने अपने वीरों का स्मरण किया और
9:10
अंतरिक्ष मार्ग से चलने लगी। श्रोताओं
9:15
जालिंदर जोगी ने अपनी जादुई चादर को
9:19
अंतरिक्ष में उड़ाया और दोनों गुरु शिष्य
9:23
पीछा कर रहे हैं गजमोतनी का। आगे-आगे
9:25
गजमतनी चली जा रही है और पीछे-पीछे जोगी
9:28
जालिंदरनाथ चला जा रहा है। हे श्रोताओं
9:33
रानी गजमोतनी ने देखा कि एक रतनगढ़ नामक
9:37
राज्य है और वहां का राजा रतनसेन है। उसकी
9:41
पुत्री रत्नावली बड़ी
9:44
जादूगरनी है। वो भी जादू जानती थी और अपनी
9:48
महल की छत पर केस सुखा रही थी। गजमोतनी ने
9:53
उस रत्नावली को देखा तो एक तोते का रूप
9:57
धारण किया और रत्नावली की गोदी में जाकर
9:59
के बैठ जाती है। कांपते हुए बदन से
10:03
गजमोतनी रत्नावली की गोदी में गिरी।
10:06
रत्नावली ने देखा कि ये तोता
10:10
मादा तोता यानी तोती नहीं कह सकते हैं।
10:12
मैना कहते हैं मादा तोता को कि ये मैना
10:16
मेरी गोदी में कैसे आ गई? यह कहां से
आई?
10:20
कौन है तू? रत्नावली
कहने लगी जब रत्नावली
10:25
ने इतना पूछा तो गजमतनी अपने वास्तविक रूप
10:28
में आ गई और रत्नावली के हाथ जोड़कर के
10:32
चरणों को पकड़ लिया। रत्नावली बोली बहन तू
10:35
कौन है और किसने तुझे सताया है? ऐसा
10:38
दुशा्वास किसका है जो तुझे परेशान किया
10:41
है? गजमोतनी कहने लगी देखिए बहन मैं
10:47
राजा नल की महारानी गजमोतनी हूं घूमासुर
10:51
दाने की पुत्री हूं बहन मुझे जालिंदर नाथ
10:56
जोगी ने चोर लिया था चुरा लिया था मैं
11:00
उसके चंगुल से मुक्त होकर के छूट के भागी
11:03
हूं परंतु जोगी जालिंदरनाथ आकाश मार्ग से
11:06
जादुई चादर से मेरा पीछा कर रहा है यदि तू
11:10
मेरी सुरक्षा रक्षा कर सके तो मुझे बता
11:13
नहीं तो मैं यहां से यह तेरा दुर्ग छोड़
11:16
के कहीं दूसरी जगह शरण लेती हूं। श्रोताओं
11:21
क्षत्रियों का धर्म होता है कि जो शरण में
11:24
आ जाता है उसे नहीं त्यागते।
11:27
भगवान श्री राम ने भी विभीषण जब शरण में
11:30
आया था तो हनुमान जी से यही कहा था कि जो
11:33
मेरी शरण में आया है चाहे उसने करोड़ों
11:36
अपराध क्यों ना किए हो मैं उसको कभी नहीं
11:39
भगा सकता। तो देखिए श्रोताओं गजमोतनी
11:42
रत्नावली की शरण में आई थी। रत्नावली कहने
11:45
लगी महारानी मैं तुझे वचन देती हूं कि मैं
11:50
तेरी मेरे प्राणों की बाजी लगाकर भी रक्षा
11:53
करूंगी। गजमोतनी कहने लगी देखिए बहन मैं
11:58
तुझे बता रही हूं कि वो जोगी किसी ना किसी
12:01
भेष में आएगा और वो मुझे तुझसे मांगेगा।
12:04
पर तू ध्यान रखना कि मुझे दे मत देना। तो
12:09
रत्नावली कहने लगी कि मैं वायदा करती हूं
12:11
तुझे यह तीन वचन देती हूं कि मैं तुझे
12:14
नहीं दूंगी और यदि तू मुझे दे व्यवस्था बस
12:17
तुझे देना पड़ जाए तो मुझे तू जोर से फेंक
12:21
देना मैं अंतरिक्ष में उड़ जाऊंगी
12:24
तो रत्नावली कहती है ठीक है बहन मैं तेरी
12:27
बात स्वीकार करती हूं और यदि मुझे तुझे
12:31
देना भी पड़ गया तो मैं किसी के हाथ में
12:34
नहीं दूंगी तुझे आकाश में मुक्त कर दूंगी
12:37
हे श्रोताओं
12:39
जोगी जालिंदर नाथ को पता चला कि महाराज
12:42
रतन सिंह की पुत्री ने मेरी जो शत्रु की
12:46
पत्नी है उसे अपने महल में शरण दे दी है
12:50
तो जोगी जालिंदरनाथ
12:52
अलख निरंजन कहता हुआ अपने शिष्य के साथ
12:55
पहुंच जाता है राजा रतन सेन के दरबार में
12:58
और कहने लगा महाराज रतन सेन तुम मुझे
13:01
जानते हैं रतन सेन कहने लगा आइए गुरुदेव
13:05
आपको एक बात और बताना चाहूंगा कि रतन सेन
13:08
भी जालिंदर नाथ जोगी का ही शिष्य था
13:12
और फूल सिंह भी जालिंदर नाथ जोगी का ही
13:15
शिष्य था। इसलिए जोगी जालिंदर नाथ का
13:19
महाराजा रतन सेन ने बड़ा सम्मान किया।
13:22
अपने आसन पर बैठाया और कहने लगा कि
13:25
गुरुदेव आपका आना कैसे हुआ कि राजन
13:29
तुम्हारे महल में मेरा चोर है। और उसे
13:33
मुझे दिलवाइए। राजा कहने लगा बाबा आपका
13:36
चोर और मेरे महल में ऐसा संभव नहीं है कि
13:39
हां बेटे तुम्हारी पुत्री रत्नावली के पास
13:44
मेरे शत्रु की पत्नी गजमोतनी है जो
13:48
घूमासुर दाने की पुत्री है और उसने और
13:51
उसके पति राजा नल ने तुम्हारे गुरु भाई
13:54
महाराज फूल सिंह के कंपिलगढ़ को ध्वस्त कर
13:57
दिया है। फूल सिंह को हरा दिया है। उसकी
14:01
पुत्री
14:03
का विवाह अपने साथ नहीं किया। सरवती को
14:05
अपमानित करके मौत के घाट उतार दिया है।
14:08
उसे बदला ले लेने के लिए मैंने उसका अपहरण
14:11
किया था। और वह भाग करके मुझसे छूट गई
14:15
मेरे चंगुल से और तुम्हारे किले में
14:18
तुम्हारी पुत्री रत्नावली के महल में है।
14:21
राजा कहने लगे ठीक है महाराज। गुरुदेव आप
14:25
चिंता ना करें। मैं अभी मेरी पुत्री को
14:27
बुलाता हूं। भरे हुए दरबार में से महाराज
14:31
रतन सेन ने एक सेवक को रत्नावली के पास
14:35
भेजा कि रत्नावली
14:37
तुझे महाराज ने बुलाया है हे श्रोताओं जब
14:41
सेवक ने रत्नावली से ऐसे कहा तो रानी
14:43
गजमूतनी बोली कि देखिए बहन तेने मुझे वचन
14:48
दिया है क्या तुम अपना वचन निभा पाओगी तो
14:52
वो छतरानी कहने लगी रानी राजकुमारी
14:56
रत्नावली कहने लगी कि हम क्षत्रिय हैं।
14:59
वचन के पक्के हैं। यदि मेरे पिता ने भी
15:02
तुम्हें मांगा तो मैं मेरे गुरु की सौगंध
15:05
खा के कहती हूं तो मैं प्रदान नहीं
15:07
करूंगी। दूंगी नहीं मेरे प्राण दे दूंगी।
15:10
और यदि देना पड़ गया तो तुम्हें मैं
15:12
अंतरिक्ष में छोड़ दूंगी। देखिए श्रोताओं
15:16
रत्नावली अपने पिता के यहां पहुंच जाती
15:18
है। और पिता
15:21
से कहने लगी कहो पिताजी मुझे कैसे
15:24
बुलवाया? कि बेटी
तुमने एक स्त्री को
15:29
कबूतरी के वेश में
15:32
मैना के वेश में तुम्हारे महल में रखा हुआ
15:34
है। वो तुम्हारे पास रह रही है। उस मैना
15:38
को ये मेरे गुरु हैं। जब मुझे आवश्यकता
15:41
पड़ती है तो मेरे साथ रणभूमि में जहां मैं
15:44
चाहता हूं वहां मुझे ये सुरक्षा प्रदान
15:47
करते हैं। आज मेरे गुरु का एक काम पड़ा
15:50
है। मुझे उस काम को करना होगा। बेटी
15:54
रत्नावली मैं तुझे आदेश देता हूं कि मुझे
15:58
वो मैना ला के सौंपी जाए।
16:02
तो रत्नावली कहने लगी कि ठीक है पिताजी
16:05
मैं जा रही हूं। हे श्रोताओं रत्नावली
16:09
अपने पिता के आदेश को सुनकर के महल पर आई
16:12
और रानी गजमोतनी से कहने लगी कि देखिए बहन
16:16
मेरे पिता का आदेश है कि मुझे तुमको
16:20
जालिंदरनाथ जोगी को सौंपना है। परंतु मैं
16:23
छत्राणी हूं। मैं तुमसे यह वायदा कर चुकी
16:27
हूं कि मैं तुम्हें कभी भी ना अपने पिता
16:29
को सौपूंगी, ना जोगी
जालिंदर नाथ को। मैं
16:32
तुम्हें मुक्त कर देती हूं। तुम जाइए। और
16:37
मैं आमंत्रित करके मेरे पास मां भवानी का
16:40
एक जादुई चक्र है। इस जादुई चक्र को तुम
16:43
पर छोड़ देती हूं तुम्हारी सुरक्षा के
16:46
लिए। जाओ बहन हे श्रोताओं रत्नावली ने
16:50
अपना जादुई चक्र गजमोत्नी के चारों ओर
16:53
अभिमंत्रित करके छोड़ दिया और अंतरिक्ष
16:56
में उड़ा दिया गजबतनी को। इधर जब जोगी
17:00
जालिंदर नाथ को पता चला तो कहने लगा कि
17:03
देखिए राजन तुम्हारी पुत्री ने मेरे साथ
17:05
विश्वासघात किया है। मेरे शत्रु की पत्नी
17:08
को अंतरिक्ष में छोड़ दिया है। परंतु मैं
17:10
इसे ऐसे नहीं छोडूंगा। ये कबूतर का भेष
17:13
धारण करके चल रही है। मैं देखता हूं उसे।
17:15
हे श्रोताओं
17:17
अब तो जालिंदर जोगी बाज का रूप धारण कर
17:21
लेता है। बाज का रूप धारण किया और गजमतनी
17:24
का पीछा किया। गजमतनी चली जा रही है और
17:28
पीछे पीछे जोगी जालिलंदरनाथ चला जा रहा
17:31
है। देखिए श्रोताओं जिसको ईश्वर बचाता है
17:35
उसे कोई मार नहीं सकता। उसे कोई पराजित
17:38
नहीं कर सकता।
17:40
तो गजमोतनी मन में विचार करने लगी कि
17:43
ईश्वर अब मैं इससे कैसे बचूं? तो गजमोतनी
17:48
ने देखा कि मार्ग में कुछ सरसों का ढेर
17:52
लगा हुआ है। सरसों के दाने पड़े हुए हैं।
17:57
गजमोतनी मन में विचार करने लगी कि मुझे
18:00
इसकी नजर चुका करके इस सरसों के ढेर में
18:03
मिल जाना चाहिए।
18:05
श्रोताओं गजमोतनी उस सरसों के ढेर में
18:10
किसी का घर था किसी गांव में उस सरसों के
18:13
ढेर में प्रवेश कर जाती है और जब जोगी
18:17
जालिंदर नाथ ने यह देखा कि गजमोतनी इस
18:20
सरसों के ढेर में प्रवेश कर गई और मुझे
18:23
इसे मारना है तो उसने तुरंत चूहे का रूप
18:26
धारण किया और चूहे का रूप धारण किया और
18:30
अपनी माया से
18:33
लाखों चूहे उत्पन्न कर दिए।
18:35
और उस सरसों को खाने लगे। श्रोताओं मायावी
18:38
चूहे थे। कुछ ही समय में सरसों का ढेर
18:41
समाप्त कर दिया। परंतु गजमोतनी ने देखा
18:44
मौके का फायदा उठाया और बिल्ली का रूप
18:47
धारण किया। बिल्ली का रूप धारण करके बैठ
18:51
जाती है छुप करके और देख रही है कि
18:55
जालिंदर जोगी किस चूहे में है। उसके प्राण
18:59
कौन से चूहे में बसे हुए हैं। यदि मैं एक
19:02
चूहे को मारूंगी तो हो सकता है जोगी
19:05
जालिंदर मुझ पर आक्रमण करें। देख रही है
19:09
जब समस्त ढेर समाप्त हो गया तो जोगी
19:11
जालिंदर नाथ ने जो अपने मायावी चूहे थे
19:14
उनको समाप्त कर लिया और मन में सोचने लगा
19:18
कि गजमोतनी कहां गई? मैंने इसी
ढेर में
19:20
उसे प्रवेश करते हुए देखा था। इधरउधर उस
19:24
दाने को देखने लगा जिसमें गजमोतनी के
19:26
प्राण थे। श्रोता वो गजमोतनी तो यह चाह
19:30
रही थी। मौका मिला। मौका मिलते ही जालिंदर
19:34
जोगी पर झपट्टा मारा और उसकी गर्दन धड़ से
19:37
अलग चूहे को मरोड़ दिया और जैसे ही उसको
19:42
मारा तो उसकी डेड बॉडी मृत शरीर जालिंदर
19:46
जोगी में परिवर्तित हो गया। श्रोताओं उसे
19:49
मारने के बाद गजमोतनी अपने वास्तविक रूप
19:52
में आ गई। वास्तविक रूप में आकर के जिस
19:57
स्थान पर मारा था वहां उन गांव वालों को
20:00
एकत्र किया और कहा कि यह महा जादूगर महा
20:03
दुष्ट और नीच आदमी है। इसका दाह संस्कार
20:06
ना करने के बजाय इसकी लाश को कुत्तों को
20:09
फेंक दिया जाए। हे श्रोताओं
20:12
रानी गजमोतनी ने उस नीच जोगी जालिंदर नाथ
20:17
का शरीर कुत्तों के हवाले करवा दिया और
20:22
स्वयं राजा नल को खोजने के लिए चल देती
20:25
है। श्रोताओं चल श्रोताओं गजमोतनी ने जोगी
20:30
जालिंदर नाथ का अंत कर दिया है। और
20:34
गजमोतनी अब महाराज नल को खोजेगी और यह कल
20:39
के वीडियो में मैं आपकी सेवा में लेकर के
20:42
यह वीडियो उपस्थित हो जाऊंगा। श्रोताओं अब
20:45
आप सभी श्रोता बंधुओं से सज्जनों से
20:48
अनुमति चाहता हूं इस वीडियो को समाप्त
20:51
करने की। इसी के साथ यह वीडियो समाप्त
20:54
होता है। जय हिंद जय भारत।
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