Raja Nal ki Sampoorm katha Part 02

 11.

0:03

इतिहास के पन्नों में यह कहानी साफ-साफ

0:06

लिखी हुई है। नमस्कार दोस्तों, इस पर

0:09

उपस्थित समस्त श्रोताओं का, भक्तों का और

0:11

सब्सक्राइब बंधुओं का एक बार फिर से

0:13

स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है। श्रोताओं,

0:16

जैसा कि आप जानते हैं हमारी कहानी चल रही

0:18

थी नल पुराण इतिहास से और उसके 10 भाग 10

0:22

एपिसोड में आपकी सेवा में प्रसारित कर

0:24

चुका था। आइए श्रोताओं आपका ध्यान मैं

0:26

वापस 10वें एपिसोड से छोड़ता हूं। 10वें

0:29

एपिसोड में मैंने आपको बताया था कि राजा

0:31

नल नागोक में जीवित हो जाते हैं और वहां

0:35

से नागराज वासुकी उन्हें एक कायापलट

0:39

अंगूठी देते हैं और उस अंगूठी की विशेषता

0:42

थी कि जिसको धारण करने से बाएं हाथ की

0:44

उंगली में धारण कर लिया तो उसकी आयु बदल

0:46

करके 80 वर्ष की हो जाती थी। उस अंगूठी को

0:50

लेकर के राजा नल चले देते हैं और आ जाते

0:52

हैं दक्षिणपुर को। दक्षिणपुर में अपनी

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माता मंझा से मिलने के बाद पहले माता मंझा

0:57

से मिलते हैं और माता मंझा को आश्वासन

0:59

देकर के कि मैं नरवरगढ़ जा रहा हूं।

1:02

नरवरगढ़ को चले जाते हैं और नरवरगढ़ में

1:04

80 वर्ष के ब्राह्मण का रूप धारण करते हैं

1:07

और पहुंच जाते हैं महाराज प्रथम के दरबार

1:09

में और महाराज प्रथम के दरबार में वह नल

1:12

पुराण की कथा सुना रहे हैं और नल पुराण की

1:14

कथा सुनने के लिए वहां समस्त स्थल नरवरगढ़

1:18

की जो प्रजा थी बैठी हुई है और उसी प्रजा

1:21

में चिंतामणि जल्लाद और गंगाधर ब्राह्मण

1:23

भी बैठे हुए हैं। स्वामी महाराज प्रथम

1:26

विराजमान है और रानी जो गज मोतिन थी गज

1:29

मोतिनी भी उस सभा में विराजमान है। तो

1:32

राजा नल नल पुराण की कथा सुना रहे हैं और

1:34

राजा नल ने बताया कि मंझा रानी को किस

1:37

तरीके से गंगाधर ब्राह्मण ने धन लेकर के

1:40

मरवाने की साजिश की और चिंतामणि जल्लाद

1:42

मंझ रानी को लेकर के चल देता है। श्रोताओं

1:45

राजा नल दूसरे दिन की कथा जब आरंभ करते

1:48

हैं तो समस्त प्रजा और जो सुनने वाले थे

1:50

महाराज प्रथम बड़े ध्यान मग्न सुन रहे हैं

1:53

कि क्या मेरी रानी आज भी जीवित है? राजा

1:56

का मन उस रानी गजमोतनी से हट गया और राजा

1:58

का ध्यान वहां चला गया। क्या मेरी

2:00

पतिव्रता रानी मंझा आज भी जीवित है।

2:03

श्रोताओं यह बात सुनकर के फिर राजा नल

2:05

ब्राह्मण मेषधारी कहने लगे कि महाराज

2:07

प्रथम आपके आदेशानुसार रानी मंझा वन में

2:10

ले जाया गया। विकट वन में ले गए जल्लाद और

2:13

आपका यह चिंतामणि जल्लाद बैठा है महाराज

2:15

इस जल्लाद को ही पूछा जाए कि रानी को मार

2:18

दिया छोड़ दिया चिंतामणि जल्लाद अपने मन

2:20

में सोचने लग रहे थे सभी लोग चुपचाप बैठे

2:22

हुए सुन रहे हैं और राजा नल कह रहे हैं कि

2:25

चिंतामणि जल्लाद बड़ा वफादार जल्लाद था

2:27

बड़ा राजभक्त जल्लाद था और उसने मन में

2:30

विचार किया कि यदि मैं रानी मंझा को मार

2:32

देता हूं तो इसके गर्भ में पल रही संतान

2:34

भी मर जाएगी और हमारे राजा का विनाश हो

2:36

जाएगा इसलिए हे राजन उस चिंतामणि जल्लाद

2:39

ने महारानी मंझा को जीवित छोड़ दिया है कि

2:41

महारानी मंझा एक शीश के वृक्ष में घुस

2:44

जाती है और चिंतामणि जल्लाद एक मृग को मार

2:46

करके रानी के वस्त्रों को उसके रक्त में

2:49

रंग लेते हैं और उसके नेत्रों को निकाल

2:51

करके महाराज वीरसेन को लाकर के देते हैं

2:53

और राजा प्रथम उन नेत्रों को फोड़ देते

2:55

हैं और वस्त्रों को जलवा देते हैं। अब

2:57

देखिए महाराज उधर क्या होता है। राजा नल

3:00

सुना रहे हैं कि रानी मंझा कुछ भी करके उस

3:02

शीश के वृक्ष में अपना समय गुजार रही है।

3:04

वह पत्ता खाती है। पत्ता ही पहनती है और

3:06

पत्तों पर ही सोती है और 9 महीने का उसके

3:09

पेट में गर्व है। इधर जब समय निकल गया तो

3:11

उसके गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ। पुत्र

3:14

बड़ा प्रभावशाली, बड़ा कांत परंतु वन में

3:16

उसका जो प्रसव किया था रानी मंझा का

3:19

ब्रह्मलोक की स्वयं देवी माता आई और देवी

3:21

माता ने रानी मंझा का प्रसव किया। परंतु

3:24

प्रसव के बाद महारानी मंझा के स्तनों में

3:26

दूध नहीं आया। तो राजा का पुत्र रानी मंझा

3:28

का पुत्र रोने लगा और जब रोने लगा तो रानी

3:30

मंझा बड़ी दुखी हुई। इसलिए हे राजन वहीं

3:33

समीप एक शेरनी ने भी दो बच्चों को जन्म

3:35

दिया था। जब उसने उस बच्चे की आवाज सुनी

3:38

तो शेरनी रानी मंझा के पास आई और उससे

3:41

कहने लगी कि बहन तेरा पुत्र भी रो रहा है

3:43

और मेरे पुत्र हंस रहे यह क्या कारण है?

3:45

तो मंझा रानी ने शेरनी को अपनी व्यथा बताई

3:47

और शेरनी ने राजा नल को दूध पिलाया। बड़ा

3:50

पराक्रमी पुत्र राजा नल क्योंकि उसका नार

3:53

पेट से कटा हुआ आया था। इसीलिए उसका नाम

3:56

नल था। और हे महाराज यहीं से नल पुराण का

3:59

और नया इतिहास आरंभ हो रहा है। रानी मंझा

4:01

का धीरे-धीरे कुछ समय निकल गया है उस हस

4:04

के वृक्ष में। वहां एक दक्षिणपुर एक

4:06

लक्ष्य सेठ कला आता है कि महाराज प्रथम के

4:09

राज्य में एक दक्षिणपुर नामक शहर था और

4:11

उसमें कुलक्षेत्रत्रा रहा करती थी। लक्ष्य

4:13

सेठ एक दिन वन में निकल कर जा रहे थे। रथ

4:16

में विराजमान थे और जब उन्होंने देखा कि

4:18

इस वृक्ष से किसी बच्चे के रोने की आवाज आ

4:20

रही है। जो हीस इसका वृक्ष था उसमें से

4:22

किसी बच्चे के रोने की आवाज आ रही है। तो

4:25

लक्ष्य सेठ रथ से नीचे उतरते देखा और कहने

4:27

लगे कि तू कौन है? तो श्रोताओं रानी मंझा

4:30

लक्ष सेठ को यह बता देती है कि मैं एक

4:32

दुखिया हूं। धरती ने आसमान से गिरी हूं।

4:34

पृथ्वी ने छीन लिया है। तो लक्ष्य सेठ

4:37

बड़े सज्जन सेठ थे। हे महाराज राजा नल कह

4:40

रहे हैं ब्राह्मण वेशधारी हे महाराज लक्ष

4:42

सेठ उस मंझा को धर्म की पुत्री बनाकर के

4:45

अपने शहर दक्षिणपुर ले जाते हैं और मंझा

4:48

रानी वहां बड़े आराम से रह रही है। कुछ

4:50

समय बाद लक्ष सेठ के दोनों पुत्र पन्नालाल

4:52

और फूलचंद जाते हैं और जब पन्नालाल और

4:55

फूलचंद को पता चला कि उनकी धर्म की बहन है

4:57

मंझा तो उन्होंने उसके पुत्र का उद्घाटन

4:59

किया दास्तान किया और उस दास्तान में

5:02

स्वयं महाराज वीरसेन गए थे और महाराज

5:04

वीरसेन ने उस पुत्र को गोदी में खिलाया

5:06

था। अब तो राजा के पैरों से जमीन खिसकने

5:08

लगी। श्रोताओं और राजा प्रथम सोचने लगे कि

5:11

हे भगवान यह क्या हुआ? यह इस दुष्ट गंगाधर

5:13

ब्राह्मण ने क्या करवा दिया? अब राजा

5:15

प्रथम कहने लगे कि हे महाराज आप आगे की

5:18

कथा सुनाइए। अब आगे की कथा बड़ी रोचक है।

5:20

बड़ी दुख भरी कहानी है। एक दिन का समय है

5:23

कि दोनों बड़े पुत्र सेठ के दोनों पुत्र

5:25

की पन्नालाल और फूलचंद व्यापार करने के

5:27

लिए विदेश के लिए चले जाते हैं। हे राजन

5:29

जब विदेश को गए तो उन्होंने उनको समुद्र

5:31

के तट पर समुद्र के तीर पर एक गोट और एक

5:34

मोचरी मिली थी और उस गोट और मोचरी को लेकर

5:36

के पन्नालाल और फूलचंद आ जाते हैं

5:38

दक्षिणपुर और दक्षिणपुर में आकर के

5:40

उन्होंने विचार किया कि इस गोट को और

5:42

मोचरी को महाराज प्रथम के दरबार में भेंट

5:44

कर दिया जाए तो महाराज ना जाने हमें कितना

5:46

इनाम देंगे। श्रोताओं यह सोचकर के

5:49

पन्नालाल और फूलचंद महाराज प्रथम के दरबार

5:51

में आ जाते हैं और राजा प्रथम के दरबार

5:53

में वे गोट और मोहरी भेंट कर दी। राजा

5:55

प्रथम सोचने लगे कि यह तो बिल्कुल सही कह

5:57

रहा है। यहां तक तो सत्य बात है और हे

5:59

राजन राजा नल कह रहे हैं आपने ही राजा

6:02

प्रथम ने आदेश दिया उनको कि इसके साथ की

6:04

15 गोट और लाओ और इसके जोड़ा की मोचरी

6:07

लेकर के आओ और हो सके तो इसके पहनने वाली

6:09

भी लाओ नहीं तो आपको परिवार सहित फांसी की

6:11

सजा दी जाएगी। यह सुनकर के बनिया डर गए।

6:14

पन्नालाल और फूलचंद दोनों डर गए और दोनों

6:16

अपने घर आकर के विचार कर रहे हैं। विचार

6:18

बदलने के सेठों के घर शोक मनाया जा रहा है

6:20

कि हमने जानबूझकर के मृत्यु को आमंत्रण दे

6:23

दिया। हे राजन अब ध्यान से सुनो। उसी समय

6:25

वह राजा का पुत्र नल जो बनियों के पास रह

6:27

रहा था वह चला आता है और कहने लगा मामाओं

6:30

क्या कारण है? आप क्यों रो रहे हैं? तो

6:32

उन्होंने संपूर्ण व्यथा अपने भांजे राजा

6:34

नल को समझा दी। तो राजा नल कहने लगे कि बस

6:36

छोटी सी बात है। मैं चलूंगा तुम्हारे साथ

6:38

और मैं लाऊंगा उनको गोटों को और मैं

6:40

लाऊंगा मोचरी। आप चिंता मत करो। मुझे अपने

6:43

साथ ले चलिए। बड़े पुत्र पन्नालाल और

6:45

फूलचंद राजा नल को अपने साथ ले जाते हैं।

6:47

बाहरबन अपने साथ ले जाते हैं उस समुद्र की

6:50

यात्रा पर और समुद्र के कई दिन की यात्रा

6:52

करने के बाद उस तट पर पहुंच जाते हैं जहां

6:54

गोट है और मोचरी मिली थी। राजा नल को कह

6:57

दिया कि देख बेटे इस स्थान पर हमें गोट और

6:59

मोचरी मिली थी। तो राजा नल ने कहा और अपने

7:02

मामाओं से कि मामा आप इस समुद्र के तट पर

7:04

बैठे रहो। मैं तीन दिन में आपको गोट और

7:06

मोचरी दोनों लेकर के लौट आऊंगा। मैं इस वन

7:08

में जा रहा है। महाराज दोनों बड़े पुत्र

7:10

तो उस समुद्र के तट पर बैठ गए और उस राजा

7:13

प्रथम का पुत्र नल उस विकट वन में चला गया

7:15

है। महाराज अब यहां से आगे की कथा मैं

7:17

नहीं जानता ना जाने क्या हुआ उसके साथ।

7:20

मुझे पता नहीं है उस विकट वन में वह पुत्र

7:22

मारा गया या जीवित रहा। राजा प्रथम का

7:24

शरीर कंपायमान हो गया। राजा नल कहने लगे

7:27

कि हे ब्राह्मण फिर ब्राह्मण देव आप मुझे

7:29

संपूर्ण कथा सुनाएं। मैं सुनने को लालायित

7:32

हूं। आपको मुंह मांगा इनाम दूंगा। मेरा यह

7:34

संपूर्ण राज्य तुम्हें दे दूंगा। पर आपके

7:36

संपूर्ण यह कथा सुनाएंगे। राजा प्रथम तो

7:38

सोच रहा था क्या मेरा पुत्र जीवित है या

7:40

मर गया। जब संपूर्ण सभासदों ने प्रजा ने

7:42

उस वहमर से बलपूक कहा कि ब्राह्मण आप कथा

7:45

सुनाएं तो फिर राजा नल कथा सुनाने लगे कि

7:48

हे राजन ध्यान से सुनो। उस विकट वन में

7:50

राजा नल चला जा रहा है। बहुत आगे जाने पर

7:53

उसे एक बुढ़िया मिली जो शांति ब्रह्मा थी

7:55

और विधि पर अम्मा के पास राजा नल पहुंच

7:57

गए। राजा नल ने ब्रह्मा से कहा कि आप कौन

8:00

है? तो विधि ब्रह्मा ने राजा नल को

8:03

संपूर्ण जीवनी बता दी और कहा कि इस वन में

8:06

तीन दिन में तेरा विवाह हो जाएगा। चला जा

8:09

यहां से काम ले। आगे एक दानव है घूमासुर

8:13

नामक। उसकी परम सुंदरी कन्या है कि गजमतिन

8:16

और उसके साथ तेरा विवाह होगा।

8:19

अब तू गजमुतिन मी मन में विचार करने लगी

8:22

कि यही ब्राह्मण वेशधारी ही राजा नल है।

8:24

परंतु हे भगवान यह तो 70 80 वर्ष का वृढ़

8:27

है। जबकि मेरे पति तो एक 18 वर्षीय युवक

8:30

थे। यह क्या हो गया? तो जो राजा नल से

8:34

संपूर्ण राजा प्रथम की प्रजा कहने लगी कि

8:37

हे ब्राह्मण आगे की कथा सुनाओ आगे क्या

8:40

हुआ? और राजा नल कहने लगे कि भाई माता के

8:43

कहने से राजा नल आगे चले जाते हैं और

8:46

वियावान वन में घुमासुर नामक दानव का किला

8:49

मिला। उस किले पर राजा नल पहुंच जाते हैं

8:52

और उस किले में हीरो तारो राजा नल कह रहे

8:55

हैं कि उस किले में भय भगवान शंकर का

8:58

वरदानी दैत्य रहा करता था और उस दैत्य की

9:01

एक पुत्री की जिसका नाम गजमतिन रहा है।

9:04

परंतु गजमतिन ने किसी मनुष्य को देखा ही

9:06

नहीं था। वह आराम से उस किले में रहती थी।

9:09

बड़ी सुंदर कन्या थी और वहीं राजा नल

9:12

पहुंच जाते हैं। उस किले के चारों ओर देख

9:14

रहे हैं जिसका दरवाजा कहां है। जब दरवाजा

9:17

नहीं मिला दरवाजे पर 108 मन की शिला लगी

9:21

हुई थी। उस शिला को ब्रह्मा ने हटा दिया।

9:24

स्वयं देवी माता उसकी रक्षा कर देंगी और

9:26

राजा नल उस किले में प्रवेश कर गया। और हे

9:30

महाराज अब यहां से आगे की कथा अब मैं नहीं

9:32

जानता। हो सकता है उस किले में उस दानव ने

9:35

उस पत्थर को मार दिया। तो राजा मन में

9:38

विचार करने लगे कि अभी यहां तक मेरा पुत्र

9:41

जीवित है और गजमुतिन मन में विचार करने

9:43

लगी कि यहां तक की बात तो सही है लेकिन

9:46

किले में तो मेरा पति जीवित था नहीं मरा

9:48

था किंतु संपूर्ण सभासदों ने फिर कहा कि

9:51

ब्राह्मण आप आगे की कथा सुनाएं। आगे क्या

9:54

हुआ यह तो बताओ। आगे की कथा यदि तुम जिद

9:57

करते हो तो चलो मैं सुना रहा हूं। उस किले

10:00

में उस राजा नल ने उस भगवान शंकर के

10:03

वरदानी दैत्य को मार दिया। दैत्य की

10:05

मृत्यु कर दी और दैत्य को मारने के बाद

10:08

उसकी परम सुंदरी कन्या गजमोतिन के साथ

10:10

विवाह कर लिया और वह घोट और वह मोर्चरी

10:13

उसी कन्या की थी जो पन्नालाल और फूलचंद

10:16

लेकर के आए थे और उस पुत्री का विवाह करने

10:19

के बाद राजा नल उसे लेकर के चल देता है और

10:23

उसके साथ जो राजा नल को वहां से दहेज मिला

10:26

था एक वीरवरन नामक घोड़ा एक सात धार की

10:29

तलवार सात मणियों की माला और कि नागराज

10:32

वासुकी से उसकी दोस्ती मित्रता हो गई।

10:35

इतनी संपत्ति उसको मिली और उन वजह से उसे

10:38

नारद पुराण नारद जी ने नल पुराण सुनाया और

10:42

नल पुराण इस संसार में केवल दो ही व्यक्ति

10:44

जानते हैं। या तो स्वयं राजा नल और या

10:47

उसकी पत्नी गजमतिन बाकी के कोई भी नल

10:50

पुराण नहीं जानता। तो यह बात उस ओर राजा

10:54

ने सुनी प्रथम ने। तो राजा नल से प्रथम

10:56

कहने लगे कि ब्राह्मण देव आप भी तो सुना

10:59

रहे हैं नल पुराण की कथा कि राजन मैंने

11:02

कुछ थोड़ी सी कथा सुनी थी कि यहां तक की

11:04

और वह कथा मैंने आपको सुनाई। अब यहां से

11:07

आगे राजा नल गजमूतिन को लेकर के समुद्र के

11:10

तट पर आ गए हैं। समुद्र के तट पर राजा नल

11:13

आ जाते हैं। वहीं पन्नालाल और फूलचंद बैठे

11:16

हुए थे। फिर बताओ जब दूसरे दिन की कथा

11:19

आरंभ की तो पन्नालाल और फूलचंद को भी

11:21

महाराज के दरबार में बुलवा लिया था। वह

11:24

पन्नालाल और फूलचंद कहने लगे कि यह

11:26

ब्राह्मण अब हमारी पोल खुलने वाले हैं। यह

11:29

हमें मृत्यु के घाट उतरवाएंगे। और राजा नल

11:32

कह रहे हैं कि उन सेठों ने अपने भांजे से

11:34

पूछा कि यह लड़की कौन है? तो राजा नल ने

11:37

उनको बताया कि मैंने भगवान शंकर के वरदानी

11:41

घूमासुर नामक दानव का वध कर दिया है। उसको

11:44

मार दिया है और यह उसी की पुत्री है। इसने

11:46

मेरे गले में वरमाला डाल दी है और मेरे

11:49

साथ विवाह कर लिया है। मैं उसको लेकर के

11:51

आया हूं। उसी का यह घोड़ा है और उसी की

11:54

तलवार लेकर के आया हूं। अब तो पन्नालाल और

11:56

फूलचंद ने विचार किया। वहीं सभा में बैठे

11:59

हुए थे। राजा नल की कथा सुन रहे हैं और

12:01

राजा प्रथम बड़े गौर से सुन रहे हैं कि हे

12:04

महाराज वो पन्नालाल और फूलचंद मन में

12:07

विचार करने लगे कि यह ना जाने कौन है। यह

12:10

भगवान शंकर के वरदानी दैत्य को मार सकता

12:12

है और यह लड़का हमारे पास रहता है। यदि

12:15

इसकी किसी दिन हमसे कोई बात हो गई, कोई

12:17

विवाद हो गया तो यह हमको नहीं छोड़ेगा।

12:20

हमको भी मृत्यु के घाट उतार देगा। इसलिए

12:22

इसको समुद्र में फेंक देना चाहिए। तो

12:24

बनियों ने उस लड़के को उस नल को बहला करके

12:28

पुचकार करके जहाज में बैठा लिया और जहाज

12:30

में अपने पास बैठा लिया। गजमोतिन और उसका

12:33

वीरवरण घोड़ा तो सो जाते हैं और राजा नल

12:36

सो जाते हैं। जब राजा नल सेठों ने जगाया

12:39

आखिरी के समय तो राजा नल अर्धन्याद्रिक

12:42

अवस्था में जगे और जग करके जैसे मुख धोने

12:45

के लिए जहाज से पानी लेने लपके वैसे ही

12:48

सेठों ने धक्का मार दिया। राजा नल समुद्र

12:50

में गिर गए और हे महाराज वहां के आगे का

12:53

अब मैं कुछ नहीं जानता। राजा नल की समुद्र

12:56

में मृत्यु हो गई या नहीं हुई यह मुझे पता

12:59

नहीं है महाराज। तो राजा प्रथम कहने लगे

13:02

ब्राह्मण देव यहां से आगे की कथा बताओ कि

13:06

नहीं महाराज मैं यहां से आगे की कथा नहीं

13:08

जानता कल याद करूंगा सुनी है मैंने जरूर

13:11

लेकिन याद करके आपको सुनाने की कोशिश

13:13

करूंगा गज मोतिन मन में विचार कर रही है

13:16

कि यह 100% राजा नल है परंतु यह तो 80

13:20

वर्ष की आयु में है और राजा प्रथम भी रो

13:22

रहे हैं और वह पन्नालाल और फूलचंद मन में

13:25

विचार कर रहे हैं कि अब तो हमें अवश्य सजा

13:28

देंगे। गंगाधर ब्राह्मण विचलित हैं और

13:31

चिंतामणि जंगलात बड़े प्रसन्न है कि उनका

13:34

जो बलिदान था उन्होंने रानी मंझा को जीवित

13:37

रखा उनकी वफादारी से तो आज वफादारी ही फली

13:40

फूली परंतु हे भगवान क्या राजा नल का अंत

13:43

हो गया यह सोच रहे हैं और ऐसा कहने के बाद

13:47

महाराज प्रथम से राजा नल की अब यह कथा

13:49

समाप्त करता हूं कल की कथा मैं आपकी सेवा

13:52

में लेकर के सिर्फ उपस्थित हो जाऊंगा।

13:54

राजा नल कह रहे हैं और याद करके आपको कथा

13:57

सुनाऊंगा। तो देखिए यह बताओ मैं भी आपसे

14:00

यह अनुरोध कर रहा हूं कि आज की यह कथा मैं

14:03

यहीं समाप्त कर रहा हूं। देखिए श्रोताओं

14:06

आज की वीडियो यहीं समाप्त होती है। यदि

14:08

वीडियो पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक करें

14:10

और चैनल को सब्सक्राइब करें। इसी के साथ

14:13

वीडियो समाप्त होती है। जब तक के लिए जय

14:16

हिंद जय भारत।

12.

 

0:03

इतिहास के पन्नों में यह कहानी साफ-साफ

0:06

लिखी हुई है।

0:09

YouTube चैनल उपस्थित समस्त श्रोताओं का,

0:12

भक्तों का और सब्सक्राइबर बंधुओं का एक

0:15

बार फिर से स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है।

0:18

श्रोताओं, जैसा कि आप जानते हैं, हमारी

0:21

कहानी चल रही थी नल पुराण इतिहास से, और

0:25

उसके 11 एपिसोड मैं आपकी सेवा में

0:28

प्रसारित कर चुका था। और 12वां एपिसोड आज

0:31

आपकी सेवा में लेकर के उपस्थित हूं।

0:34

श्रोताओं, ध्यान से सुनिए। कहानी बड़े

0:37

रोचक मोड़ पर आ चुकी है कि राजा नल एक

0:41

ब्राह्मण का रूप धारण करके अपने पिता

0:44

वीरसेन को नल पुराण इतिहास सुना रहे हैं।

0:48

और नल पुराण इतिहास सुनाते सुनाते राजा नल

0:53

ने बताया कि राजा नल को उसके मामा

0:57

पन्नालाल और फूलचंद ने समुद्र में धकेल

1:00

दिया और जब समुद्र में धक्का दिया तो नल

1:03

समुद्र में गिर गया और समुद्र में गिर कर

1:07

के मर गया परंतु गजमोतनी ये जानती थी कि

1:11

मेरे पिता के पास सात मणियों की माला थी

1:14

और वह माला मेरे पति के गले में थी इसलिए

1:17

इसलिए समुद्र में तो मर नहीं सकते। तो

1:20

गजमोतनी कहने लगी कि ब्राह्मण देव आप यहां

1:23

से आगे की जो कथा सुना रहे हैं वो सत्य

1:26

नहीं है। आप सही कथा सुनाएं। तो राजा नल

1:29

कहने लगे कि सुनो ध्यान से। अब राजा प्रथम

1:33

भी उस कथा को बड़े गौर से सुन रहे हैं और

1:37

राजा प्रथम के नेत्रों से आंसुओं की झड़ी

1:40

लग रही है क्योंकि उसी का पुत्र राजा नल

1:43

समुद्र में गिर गया। अब राजा वीरसेन तो यह

1:48

जानते नहीं थे कि राजा नल के पास मणियों

1:50

की माला है। वो तो यही सोच रहे थे कि मेरे

1:53

पुत्र का इन मणिक पुत्रों ने कितनी

1:56

निर्ममता से अंत कर दिया। श्रोताओं

1:59

गजमोतनी राजा नल से कहने लगी कि हे

2:03

ब्राह्मण देव आप यहां से आगे की कथा सही

2:05

नहीं सुना रहे हैं क्योंकि मेरे पति के

2:08

पास तो दिव्य मणियों की माला थी। वो

2:10

समुद्र में नहीं मर सकती। तो यह बात सुनकर

2:14

के ब्राह्मण रूप धारी राजा नल कहने लगे कि

2:18

देखिए राजा नल के पास मणियों का प्रभाव

2:21

था। इस वजह से राजा नल के प्रभाव से राजा

2:25

नल के मणियों के प्रभाव से समुद्र का पानी

2:28

हटता चला गया और राजा नल नागोक में पहुंच

2:32

गए। राजा नल नागोक में पहुंचे तो वहां

2:36

राजा नल का सामना नागों से होने लगा।

2:39

नागों ने राजा नल पर आक्रमण किया। परंतु

2:42

राजा नल से वह डर कर सब भाग गए। और

2:45

उन्होंने अपने प्रधान सेनापति तक्षक से

2:49

कहा तो तक्षक ने कहा उनसे कि चलिए मैं

2:53

देखता हूं कौन है। और तक्षक ने धोखे से

2:57

राजा नल को काट लिया। नाग लोक में राजा नल

3:01

की मृत्यु हो जाती है। श्रोताओं जब

3:04

ब्राह्मण देव ने यह कहा कि तक्षक के काटने

3:07

से राजा नल की मृत्यु हो गई तो महाराज

3:10

वीरसेन सिंहासन से पछाड़ खाकर धरनी पर गिर

3:14

पड़े और उसकी पत्नी गजमोतनी भी पछाड़ खाकर

3:17

रोने लगी। जब वीरसेन ने यह हाल देखा तो

3:20

पूछने लगे कि तुम क्यों रो रही हो? तो

3:23

गजमतनी कहने लगी कि वो मेरे पति थे। अब तो

3:27

श्रोताओं दोनों सुसुर बहुओं का मिलन हो

3:30

जाता है। अब तो वीरसेन महाराज प्रथम गज

3:35

मोतनी को गले से लगा के विलाप कर रहे हैं।

3:38

करुण क्रंदन कर रहे हैं कि वह हत्यारा

3:41

पिता मैं ही हूं। मैंने ही मेरे पुत्र और

3:44

पत्नी को इतना कष्ट दिया। मेरी पत्नी को

3:47

वन को भेजा। मेरे पुत्र की मृत्यु समुद्र

3:50

में किस तरीके से हुई। मेरा वंश समाप्त हो

3:53

गया।

3:54

यह सोच कर के महाराज वीरसेन बार-बार धरनी

3:59

पर गिर रहे हैं। श्रोताओं

4:02

फिर रानी श्रोताओं फिर रानी गजमोतनी होश

4:07

संभाल कर कहने लगी कि ब्राह्मण देव ऐसा

4:10

नहीं हो सकता कि मेरे पति की मृत्यु हो

4:13

जाए क्योंकि मुझे स्वयं नारद ने बताया था

4:16

कि तुम्हारे पति का दूसरा विवाह होगा तो

4:18

वो मृत्यु के बाद तो हो नहीं सकता। आप

4:21

सत्य कथा कहिए कि नहीं देवी मैं यहां से

4:24

आगे की कथा नहीं जानता कि नहीं ब्राह्मण

4:27

देव आप असत्य कथा सुना रहे हैं आप जानते

4:30

हैं फिर भी मुझे गुमराह कर रहे हैं तो

4:33

राजा नल गजमोत्नी की बात सुनकर के कहने

4:36

लगा कि कुछ समय बाद जब महाराज नल को

4:40

समुद्र में पड़े हुए सात दिन हो जाते हैं

4:43

तो उनका परम मित्र वासुकी आ जाता है

4:47

वासुकी को उन्होंने घूमासुर दैत्य की कैद

4:49

से छुड़ाया था

4:51

और जब वासुकी ने यह देखा कि उसका मित्र

4:54

मरा पड़ा है। राजा नल मर गया है। तो

4:57

उन्होंने तक्षक को बुलाया और तक्षक से कहा

5:00

कि दुष्ट ये मेरा मित्र है। इन्होंने ही

5:03

मुझे घूमासुर दानव की कैद से मुक्त कराया

5:06

था और तने इसको मार दिया।

5:10

तो हे सभासदो राजा नल कह रहे हैं कि

5:13

वासुकी ने तक्षक को बुलाकर के राजा नल को

5:16

जीवित करा लिया। राजा नल जीवित हो गए और

5:20

नाग लोक में आराम से रहने लगे तो महाराज

5:24

प्रथम और रानी गजमोतनी के थोड़ी तसल्ली

5:27

हुई कि ठीक है हमारा पुत्र जीवित है

5:30

श्रोताओं अब ध्यान से सुनने की बात है

5:33

राजा नल कहने लगे ब्राह्मण भषधारी कि देखो

5:36

अब यहां से आगे की कथा मैं नहीं जानता तो

5:39

समस्त सभासद और महाराज वीरसेन कि नहीं

5:43

ब्राह्मण देव मैं आपको मेरा संपूर्ण राज्य

5:45

दे सकता हूं लेकिन आज इस संपूर्ण कथा को

5:48

सुनाएं। तो यह बात सुनकर के ब्राह्मण देव

5:53

राजा नल क्योंकि ब्राह्मण भषधारी थे। कहने

5:56

लगे कि महाराज ध्यान से सुनिए। राजा नल

6:00

नागोक में कुछ समय तक रहे और कुछ समय रहने

6:04

के बाद राजा नल ने महाराज वासुकी से कहा

6:08

कि हे नागेश्वर हे नागराज अब मुझे अपने घर

6:11

जाना है क्योंकि मेरी पत्नी गजमतनी और

6:14

मेरी माता मंझा मुझे याद कर करके विलाप कर

6:18

रही होंगी करण क्रंदन कर रही होंगी इसलिए

6:20

मुझे अब अवश्य ही अपने घर जाना होगा। यह

6:24

बात जब वासुकी ने सुनी तो बासुकी ने शहर

6:29

राजा नल को समुद्र के तट पर बाहर छोड़

6:32

दिया और राजा नल वह समुद्र के तट से ना

6:36

जाने कहां चले गए। अब यहां से आगे की कथा

6:39

मैं नहीं जानता हूं। श्रोताओं समस्त सभासद

6:44

कहने लगे कि हे ब्राह्मण देव अब यहां से

6:47

आगे की कथा तो आप कहिए कि नहीं सभासदों

6:50

मैं कुछ नहीं जानता। श्रोताओं जब गजमोतनी

6:54

ने यह स्थिति देखी कि ये ब्राह्मण देव आगे

6:57

कथा सुनाना नहीं चाहते तो गजमोतनी मन में

7:00

विचार करने लगी कि मेरे और महाराज नल के

7:04

अलावा दूसरा व्यक्ति इस संसार में नहीं है

7:06

कि जो नल पुराण कथा को जानता है और तीसरे

7:10

स्वयं देव ऋषि नारद है तो ये ब्राह्मण देव

7:12

देव ऋषि नारद तो हो नहीं सकते और मैं

7:15

स्वयं खड़ी हुई हूं तो ये अवश्य ही मेरे

7:18

पति राजा नल हैं। गजमतनी ने उस ब्राह्मण

7:21

का हाथ पकड़ लिया कि ब्राह्मण देव सच सच

7:24

बताओ आप कौन हो? राजा नल कहने लगे अरे एक

7:27

तो मैंने कथा सुनाई है और आप मुझे ये क्या

7:31

कर रही हो? मेरा हाथ भी पकड़ रही हो कि

7:33

नहीं आप सत्य बताएं कौन है? गजमतनी ने

7:37

बड़ा निवेदन किया। बड़ी अननय विनय की।

7:41

महाराज वीरसेन भी उस ब्राह्मण को देख के

7:44

कहने लगे कि हे ब्राह्मण देव मैं मेरे किए

7:47

हुए पर पश्चाताप कर रहा हूं। समस्त 100

7:50

रानियां भी कहने लगी कि हे ब्राह्मण देव

7:53

आप हमारे एकमात्र इकलौते पुत्र की कथा

7:56

सुनाइए और गंगाधर ब्राह्मण भी कहने लगे कि

8:00

हे महाराज हे ब्राह्मण देव आप बताएं कि

8:03

हमारे इस राजकुल के दीपक का क्या हुआ क्या

8:07

वो जीवित बचने के बाद समुद्र के तट पर आने

8:10

के बाद कहां है उनका कुछ पता है क्या तो

8:14

गजमोतनी ने राजा नल का हाथ नहीं छोड़ा

8:16

राजा नल से कहने लगी गजमोतनी कि नहीं

8:19

ब्राह्मण देव इस संसार में राजा नल के

8:22

अलावा कोई भी नल पुराण इतिहास की कथा नहीं

8:24

सुना सकता और यहां तक की कथा तो केवल

8:27

महाराज नल ही जानते हैं। आप बताएं आप कौन

8:30

हैं? श्रोताओं समस्त सभासदों और उन सबके

8:36

गजमोतनी महाराज वीरसेन और ब्राह्मण गंगाधर

8:41

के आग्रह पर राजा नल उस मंच से नीचे उतर

8:44

आते हैं। श्रोताओं गजमोतनी के सामने खड़े

8:48

हो जाते हैं और अपनी जो बाएं हाथ में

8:51

अंगूठी धारण कर रखी थी नागराज वासुकी की

8:54

दी हुई है। उस अंगूठी को अपनी उंगली से

8:58

उतार देते हैं। और जैसे ही उंगली से वह

9:01

अंगूठी उतारी तो एक बड़ा सुंदर सजीला

9:07

18 वर्षीय युवक वीर नल सामने खड़ा है।

9:11

गजमतनी अपने पति को पहचान जाती है। उनके

9:14

चरणों में गिर जाती है। श्रोताओं महाराज

9:18

वीरसेन अपने पुत्र और पुत्रवधू को सामने

9:21

खड़ा देख के अश्रुधारा से रोने लगे।

9:26

और जो भी वहां सभासद थे जितनी प्रजा थी

9:30

समस्त प्रजा के नेत्रों से अश्रुधारा बह

9:33

रही है। स्वयं ब्राह्मण गंगाधर जो कि इस

9:37

संपूर्ण साजिश का मास्टरमाइंड था। कहना

9:41

चाहूंगा ये संपूर्ण साजिश रचने वाला था वो

9:44

ब्राह्मण देव भी रोने लगे। राजा अनल के

9:47

चरणों में गिरने की कोशिश की तो राजा अनल

9:51

कहने लगे नहीं ब्राह्मण देव आप ब्राह्मण

9:53

हैं मुझे पाप लगेगा मैं क्षत्रिय हूं

9:56

इसलिए आप मेरे चरणों में गिरने की कोशिश

9:59

ना करें ब्राह्मण गंगाधर समझ गए कि अब

10:02

मेरी मृत्यु नजदीक है अब मुझे महाराज

10:04

अवश्य मृत्युदंड देंगे संपूर्ण दरबार में

10:08

गंगाधर ब्राह्मण कहने लगे कि इस संपूर्ण

10:10

साजिश का जिम्मेदार मैं हूं मुझे इसके लिए

10:13

मृत्युदंड मिलना चाहिए 100 रानियां भी

10:16

महाराज वीरसेन से यही कहने लगी कि महाराज

10:19

इस संपूर्ण साजिश के जिम्मेदार हम हैं।

10:22

हमने ही हमारी बहन मंझा को भगवाया था।

10:26

मरवाने की कोशिश की थी। इसलिए हमें

10:28

मृत्युदंड मिलना चाहिए। और स्वयं महाराज

10:31

वीरसेन कहने लगे कि नहीं रानियों और

10:34

ब्राह्मण देव आप भी नहीं। ये मेरी बुद्धि

10:38

राज्य करने योग्य नहीं रही। मैंने एक

10:40

ब्राह्मण के बहकावे में आकर के बिना विचार

10:43

किए ही अपनी पतिव्रता रानी को मारने का

10:46

आदेश दे दिया। इसलिए मृत्युदंड मुझे मिलना

10:50

चाहिए। तभी श्रोता राजा नल कहने लगे कि

10:53

देखिए पिता श्री आपसे मैंने पहले ही वचन

10:55

लिया था कि आपको किसी को भी परेशान नहीं

10:58

करना है। मैं नल पुराण कथा तो सुना सकता

11:01

हूं लेकिन आपको किसी को परेशान नहीं करना

11:04

है। तो आप मेरे वचन का पालन कीजिए। इन 100

11:08

माताओं को और ब्राह्मण गंगाधर को आप

11:11

बिल्कुल परेशान मत कीजिए। इन्होंने अपना

11:14

काम किया और हमने अपना काम किया। श्रोताओं

11:18

जो बड़ित पुत्र थे पन्नालाल और फूलचंद

11:22

गिड़गिड़ाने लगे कि महाराज प्रथम ना जाने

11:24

हमें कितना दंड देंगे। तो राजा नल कहने

11:27

लगे कि नहीं मामाओं मैं आपको कोई दंड नहीं

11:30

दिलाऊंगा क्योंकि आपने भी मेरे डर की वजह

11:33

से आपने सोचा था कि

11:37

मैं कहीं आपको ना मार दूं। इस डर की वजह

11:40

से आपने मुझ में समुद्र में धक्का दिया

11:42

था। जबकि आपने तो हमें पाला है, बड़ा किया

11:46

है। हमारी माता को शरण दी है। आपको भी इस

11:49

दरबार में सम्मानित पद दिया जाएगा।

11:52

श्रोताओं राजा नल सम्मान सहित दक्षिणपुर

11:56

जाते हैं और अपनी माता मंझा को सादर

12:02

सुसज्जित रथ में राजकीय सम्मान के साथ

12:06

लेवा करके नरवरगढ़ लाते हैं। रानी मंजा को

12:10

देखकर के संपूर्ण प्रजा अश्रुधारा से रोने

12:14

लगी। संपूर्ण प्रजा के नेत्रों से आंसू

12:17

बहने लगे कि हमारी रानी आज हमसे 20 वर्ष

12:21

के बाद मिली है। हमारी राजमाता जो इतनी

12:24

पवित्र है जिसने इस राज्य कुल को आगे

12:26

बढ़ाया। पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ है।

12:29

वही राजमाता इतने कष्ट पा के इस राजकुल को

12:33

आगे बढ़ाने के लिए प्रयत्नरत रही। हे

12:36

श्रोताओं महाराज वीरसेन ने भी महारानी

12:38

मंजा से क्षमा मांगी। परंतु महारानी मंजा

12:41

कहने लगी कि नहीं महाराज मैं पतिव्रता हूं

12:44

और आप मुझसे क्षमा मांगेंगे तो मेरा धर्म

12:46

नष्ट होगा। इसलिए आप मुझसे क्षमा नहीं

12:49

मांगे। आप राजा हैं और आपने जो उस समय

12:52

किया वो उचित किया था। अनुचित नहीं।

12:55

क्योंकि राज आज्ञा सर्वोपरि होती है।

12:58

श्रोताओं उस संपूर्ण परिवार का वहां एक

13:01

भव्य मिलन होता है। अब तो महाराज वीरसेन

13:06

कहने लगे अपने सभासदों से कि सभासदों और

13:09

मेरे सभा में उपस्थित विद्वानों मैं अब

13:12

राज्य संचालन करने के योग्य नहीं रहा। मैं

13:15

इस राज्य का त्याग मेरे पुत्र के लिए करना

13:17

चाहता हूं। मैं आज ही मेरे पुत्र नल को इस

13:22

नरवरगढ़ का राजा घोषित करता हूं। श्रोताओं

13:26

महाराज वीरसेन ने और गंगाधर ब्राह्मण ने

13:28

महाराज नल को राज्य सिंहासन पर बैठा दिया।

13:33

राज्य सिंहासन पर बैठा के उसका राज्य तिलक

13:36

कर दिया और महारानी मंझा को जो उसकी 100

13:40

सौत थी जिन्होंने मरवाया था वो अपने साथ

13:44

ले जाती है। उनके चरणों में गिर रही है।

13:46

उनसे क्षमा मांग रही है। इस तरीके से इस

13:49

संपूर्ण नल परिवार का एक मधुर मिलन हुआ और

13:53

अब नरवरगढ़ के राजा स्वयं महाराज नल हो

13:56

गए। राजा वीरसेन ने नल को राजा बना दिया।

14:01

और देखिए श्रोताओं यहां से आगे की कथाएं

14:04

बड़ी रोचक हैं। अभी तो महाराज नल राजा बने

14:07

हैं। और यहां से अगली कथा मैं आपको

14:09

सुनाऊंगा। बड़ी शानदार और बड़ी सुंदर कथा

14:13

है। लगभग इसके 100 से 150 एपिसोड आपकी

14:16

सेवा में प्रसारित करूंगा। परंतु हो सकता

14:19

है कि मेरी कुछ परिस्थितियों के कारण कुछ

14:22

व्यवधान हो। इसके लिए मैं आप सभी से क्षमा

14:25

प्रार्थी हूं। श्रोताओं अब ये वीडियो मैं

14:28

यहीं समाप्त करता हूं। राजा नल नरवरगढ़ के

14:31

राजा बन जाते हैं और बड़े आराम से अपने

14:35

राज्य का संचालन कर रहे हैं और जो सेठ थे

14:39

पन्नालाल और फूलचंद वो भी महाराज नल ने

14:41

अपने दरबार में उचित पदों पर रख लिए

14:45

मंत्री पदों पर रख लिए। श्रोताओं इस तरीके

14:48

से संपूर्ण नल परिवार का मिलन हुआ। अब मैं

14:52

यह कथा यहीं समाप्त कर रहा हूं। इसी के

14:54

साथ जय हिंद जय भारत।

 

13.

0:00

समस्त श्रोताओं का, भक्तों का और सब्सक्राइबर बंधुओं का एक बार फिर से

0:06

स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है। श्रोताओं, जैसा कि आप जानते हैं हमारी कहानी चल रही

0:13

थी नल पुराण इतिहास से। मैंने आपको बताया था कि राजा नल ने जब नल पुराण की कथा

0:22

महाराज प्रथम के दरबार में नरवरगढ़ नरेश के दरबार में सुनाई। तो वहां उस कथा को

0:29

सुनने के बाद संपूर्ण परिवार का मिलन हो जाता है। महारानी मंझा को दक्षिणपुर के

0:36

लक्ष्मी सेठ के यहां से सम्मान सहित बुलवा लिया जाता है और राजा प्रथम ने अपने पुत्र

0:44

नल को राज्या अभिषेक कर दिया। उसे राजा घोषित कर दिया कि अब यहां से आगे का राज्य

0:51

का संचालन मेरे पुत्र नल करेंगे और महाराज प्रथम

0:56

आराम से महल में रहने लग जाते हैं। श्रोताओं जब कुछ समय व्यतीत हो गया तो एक दिन की

1:06

बात है कि महाराज प्रथम महाराज वीरसेन अपनी रानी मंझा से कहने लगे कि हे प्रिय

1:14

तुम मुझे आज अपने हाथों से भोजन कराओ। मुझे तुम्हारे हाथों से भोजन किए हुए 20

1:20

वर्ष का समय व्यतीत हो गया है। 20 वर्ष बीत चुके हैं। जब महाराज प्रथम ने यह बात

1:27

मंझ रानी से कही तो मंझ रानी कहने लगी कि नहीं महाराज मैं आपको भोजन नहीं करा सकती।

1:34

तो राजा प्रथम कहने लगे कि क्यों रानी ऐसी क्या बात हो गई? अब भी तुम्हारे मन में

1:40

कुछ नाराजगी है कि नहीं महाराज? मेरे मन में नाराजगी तो तब भी नहीं थी जब आपने

1:46

मुझे जल्लादों को सौंप दिया था। मैं तब भी बड़ी प्रसन्न थी। परंतु मैं आपको एक वजह

1:53

बताना चाहती हूं कि मैं पतिव्रता हूं और मैं मेरा यह शरीर आपने जब मुझे जल्लादों

2:00

के हाथ सौंप दिया था तो उन जल्लादों से छिम गया था। मेरा शरीर जल्लादों से टच हो

2:06

गया। स्पर्श कर गया जल्लादों को। इसलिए मेरे पतिव्रत धर्म में कुछ मुझे यह आशंका

2:14

है कि पतिव्रता स्त्रियों का शरीर यदि पराए पुरुष से स्पर्श करता है तो उसका पतिव्रत धर्म नष्ट हो जाता है। तो इसलिए

2:22

महाराज मैं अपवित्र हो गई। जल्लादों ने मेरे शरीर को छू लिया। मुझे पकड़ कर के ले

2:27

गए थे। इसलिए मैं आपको भोजन नहीं करा सकती। तो जब यह बात महाराज वीरसेन ने सुनी

2:36

तो महाराज वीरसेन कहने लगे कि नहीं रानी ऐसी कोई बात नहीं है कि तो रानी कहती है

2:42

कि नहीं महाराज यह मेरा धर्म है। मैं एक पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता

2:47

स्त्री हूं और मैं आपको भोजन नहीं करा सकती। आप मुझसे केवल दूर से बैठकर के बात

2:54

कर सकते हैं। श्रोताओं महाराज वीरसेन ने जब अपनी रानी की यह बात सुनी तो महाराज

3:01

वीरसेन व्याकुल हो उठे। तो यह बात सुनकर के महाराज प्रथम रानी मंझा को बहुत समझाने

3:08

की कोशिश करते हैं कि नहीं रानी ऐसा कुछ भी नहीं है। मेरे मन में कोई विचार नहीं

3:13

है। तो मंझा रानी नहीं कहती है कि महाराज ऐसा कुछ नहीं है। आप सोच रहे हैं वो

3:20

बिल्कुल अनुचित है। पतिव्रताओं के लिए अपने शरीर का स्पर्श भी किसी पुरुष से हो

3:26

जाने पर उनका पवित्रता उनकी जो पवित्रता है वो भंग हो जाती है। इसलिए महाराज यदि

3:33

आप मेरे हाथों से भोजन करना चाहते हैं तो आपको एक काम करना होगा। तो राजा प्रथम

3:39

कहने लगे कहो रानी जो आप कहेंगी आपकी इच्छा अनुसार मैं वही काम करने को तैयार

3:45

हूं। तो रानी मंझा कहने लगी कि महाराज यदि आप मेरे हाथों से भोजन करना चाहते हैं तो

3:52

आप मुझे गंगा स्नान कराइए। और जब मैं गंगा में स्नान करूंगी तो मेरा यह शरीर पवित्र

3:58

हो जाएगा। जो जल्लादों ने मेरे शरीर को स्पर्श किया था वो स्पर्श उनका समाप्त हो

4:04

जाएगा। गंगा में पवित्रता है और गंगा से मैं भी पवित्र हो जाऊंगी। पापियों के

4:10

पापों को तारने वाली उस गंगा में मुझे आप स्नान कराएं। श्रोताओं जब महाराज प्रथम ने

4:18

ये बात सुनी अपनी महारानी मंझा की तो राजा प्रथम ने आदेश दे दिया अपने सेनापति को कि

4:25

60 हजार की सेना तैयार की जाए। हम कल धोसा बजाते हुए अपनी महारानी मंझा को गंगा

4:33

स्नान कराएंगे। कल गंगा स्नान के लिए रवाना होंगे। कुछ

4:39

करना है हमें गंगा स्नान करने के लिए। देखिए श्रोताओं

4:44

महाराज के आदेश सेनापति ने अपनी समस्त सेना को आदेश दिया कि आप तैयार हो जाएं।

4:52

महाराज प्रथम के आदेशानुसार 60 हजार की सेना महाराज प्रथम ने तैयार की। 60 हजार

5:00

की सेना के साथ महाराज प्रथम और रानी मंझा गंगा स्नान करने के लिए चल देते हैं। राजा

5:09

नल अपने राज्य का संचालन कर रहे हैं और महाराज प्रथम धूमधाम से अपनी महारानी मंझा

5:17

को साथ लेकर के गंगा स्नान करने चले जा रहे हैं। अब देखिए श्रोताओं महाराज स्नान

5:24

महाराज प्रथम गंगा स्नान के लिए गढ़ गंगा पर पहुंच गए।

5:30

और वहां पर्व चल रहा था गंगा स्नान का। गंगा स्नान का समय आ रहा था। एक सोम

5:39

सोमवती कहते हैं या सोमवती अमावस्या पड़ने वाली थी। उसका पर्व नजदीक था।

5:46

तो उस सोमवती अमावस्या के कारण वहां गढ़ गंगा पर देश के महाराज बामनगढ़ के राजा

5:56

अपने अपने तंबू डेरा डाल के पड़े हुए थे। अपनेप शिविर लगा के गंगा स्नान के लिए

6:03

वहां ठहरे हुए थे। और जब महाराज प्रथम 60 हजार की सेना लेकर के पहुंचे तो वो

6:10

उन्होंने भी अपना तंबू गंगा के पूर्व दिशा में डाल दिया। और महाराज प्रथम उस पवित्र

6:19

गंगा में स्नान करने के लिए उस शुभ समय का इंतजार करने लगे कि जब पर्व आएगा तो सबसे

6:27

पहले मैं मेरी महारानी को स्नान कराऊंगा। श्रोताओं दूसरे दिन जब सोमवती अमावस्या का पर्व आया

6:35

तो महाराज प्रथम ने सर्वप्रथम अपनी रानी को स्नान कराया गंगा में और महारानी मंझा

6:42

को एक सोने की नाव लेकर के कह दिया कि आप गंगा में भ्रमण कीजिए। जल क्रीड़ा का आनंद

6:50

लीजिए। माता गंगा में आप सैर कीजिए। तो मंझ रानी वहां उस गंगा में एक सोने की नाव

6:59

में विचरण कर रही थी। सैर कर रही थी पानी में। अब देखिए श्रोताओं होनी बड़ी बलवान

7:07

होती है। वही उसी गंगा में स्नान करने के लिए एक फूल सिंह पंजाबी कंपिलगढ़ का राजा

7:16

था और वह महापराक्रमी देवी उसके साथ लड़ती थी। 14 विद्याधान उसकी एक लड़की थी जिसका

7:24

नाम था सरती। वह उस महाराज फूल सिंह की पुत्री भी गंगा

7:31

स्नान करने के लिए अपने पिता के साथ गणगंगा पर आई हुई थी। और जब वो गणगंगा पर

7:37

आई तो वह भी गंगा स्नान करने करते हुए एक नाव में बैठकर के गंगा में सैर करने चली

7:44

जाती है। उधर से नरवरगढ़ की महारानी

7:50

मंझा की नाव आ रही थी और इधर से फूल सिंह पंजाबी की पुत्री सरवती की नाव आ रही थी।

7:58

होनी बड़ी बलवान होती है। श्रोताओं पानी का कोई ऐसा भंवर पड़ा कोई ऐसा चक्कर

8:07

फंसा उस चक्कर में दोनों नाव फंस गई और दोनों नावों में टक्कर हो जाती है। जब

8:13

दोनों नावों में टक्कर हुई तो मल्ल्हाों ने नाव को तो संभाल लिया डूबने नहीं दिया

8:20

परंतु मंझ रानी और वो लड़की आमने-सामने आ गई। तो वो लड़की एकदम देख के मंझ रानी से

8:28

कहने लगी कि तू कौन है? कहां की रहने वाली है? और किसकी नारी है? तुझे होश नहीं किने

8:37

मेरी नाव में टक्कर मार दी है। तो मंजा कहने लगी कि नहीं बेटी ये मैंने टक्कर

8:43

नहीं मारी। मेरे मल्ल्हा ने टक्कर नहीं मारी। ये पानी का ऐसा ही जाल था। और इस

8:49

जाल में हमारी दोनों नाव फंस गई। भंवर पड़ रहा था। उस भंवर में नाव फंस गई और नाव

8:55

टकरा गई। तो सरती कहने लगी कि तुम कौन हो ये बताओ।

9:01

और तुम किस राजा की रानी हो? तुम यहां अकेली भ्रमण कर रही हो। और तुम्हें तुम तो

9:09

इतनी सुंदरी हो। यदि तुम अकेली भ्रमण कर रही हो तो तुम्हें तो मेरे पिता के साथ

9:15

चलना चाहिए। तुम मेरे पिता की महारानी बनके कंपिलगढ़ चलो। तुम्हें अकेले स्नान

9:22

करने के लिए नहीं भेजा जाएगा। मंझ रानी ने जब ये बात सुनी तो मंझ रानी कहने लगी कि

9:28

बेटी सुन ध्यान से। मैं वामनगढ़ में एक श्रेष्ठ गढ़ है नरवरगढ़ और वहां के महाराज

9:37

वीरसेन की महारानी हूं। मेरा नाम मंजा है और मैं गंगा स्नान के लिए आई हूं। परंतु

9:44

मैं तो बेटी विवाहित हूं। मेरे पति है। परंतु तू यह बता कि तेरा विवाह हो गया या

9:51

नहीं हुआ। तो मंझा से वह लड़की कहने लगी कि नहीं मेरा विवाह नहीं हुआ है। तो मंझा

9:57

कहती है कि देख बेटी तेने बात तो मुझसे बहुत बड़ी कही है कि मैं तेरे पिता के साथ

10:02

चलूं। परंतु मैं तो जा नहीं सकती क्योंकि मेरा विवाह हो चुका है। मेरी संतान है।

10:09

मैं महारानी हूं। परंतु मैं तुझसे कहती हूं यदि आज मेरे साथ मेरा पुत्र होता। मैं

10:15

उसे गंगा स्नान के लिए लाती तो तुझे अवश्य मेरी पुत्रवधू बना करके नरवरगढ़ ले जाती।

10:22

और जब यह बात मंझा रानी ने उस सरवती से कही तो सरवती क्रोधित हो गई। तमतमा गई और

10:30

कहने लगी कि मंझा तेने मेरा अपमान किया है। तू नहीं जानती मेरे पिता के साथ

10:37

महाकाली युद्ध करती है। मेरे पिता के पास चार वीर हैं जो अदृश्य होकर के युद्ध करते

10:45

हैं। इन वामन गढ़ों में मेरे पिता फूल सिंह का मुकाबला करने वाला कोई राजा नहीं

10:50

है। तो मंजा कहने लगी कि ठीक है बेटी परंतु अब मैं कुछ ज्यादा नहीं कह सकती। तू

10:57

यहां से चली जा। अच्छा रहेगा क्योंकि मेरा पुत्र यहां नहीं है। नहीं बलपूक मैं तेरा

11:02

विवाह करवा ले जाती। श्रोताओं दोनों में विवाद हो गया। लड़ाई की जड़ जम गई और

11:10

क्रोधित होकर के सरवती मल्ल्हा से कहती है कि मेरी नाव को मेरे तंबू की तरफ लौटा दो।

11:17

मेरे शिविर की तरफ मेरी नाव को लौटाइए। और महारानी मंझा का मल्ला भी महारानी मंझा की

11:23

नाव को लेकर के महाराज प्रथम के शिविर की तरफ चल देता है।

11:28

दोनों अपनेप शिविरों में आ जाती हैं। महारानी मंझा तो समझदार थी तो राजा से कुछ

11:34

नहीं कहा लेकिन वो नौजवान लड़की एक 18 वर्षीय युवती अपने क्रोध को नहीं रोक सकी

11:42

और अपने पिता फूल सिंह के सामने जाकर के रोने लगी। तो फूल सिंह कहने लगा कि बेटी

11:49

तेरे रोने का कारण क्या है? क्यों रो रही है? मुझे यह बता। यदि किसी ने तेरी तरफ

11:55

हाथ किया है तो उसका हाथ कटवा दूंगा। आंख निकाली है तो आंखें निकलवा दूंगा। और यदि

12:01

किसी ने जबान चलाई है तो उसकी जीभ कटवा दूंगा। मुझे बताइए तू क्यों रो रही है?

12:09

परंतु देखिए श्रोताओं जिस तरीके से रावण के पास सुपण खा गई थी। त्रिया जाल रच दिया

12:17

उस लड़की ने। रोने लगी। रुधन करने लगी कि मेरे पिता इतने बड़े बलवान हैं। काली के

12:26

भक्त हैं। काली साक्षात साथ में लड़ती हैं। और उनकी पुत्री से किसी एक छोटे-मोटे

12:33

राजा की रानी यह कह जाए कि मेरी पुत्रवधू बना लूं? तो क्या यह शोभा देता है महाराज?

12:39

जब यह बात फूल सिंह ने सुनी तो कहने लगा कि बेटी मुझे बताइए वो कौन थी जिसने तेरा

12:46

अपमान किया है। जो अपने पुत्र की पत्नी तुझे बनाना चाहता है। मैं उसे जीवित नहीं

12:52

छोडूंगा। इस गणगंगा में मेरी मां भवानी की सौगंध खाकर कहता हूं इस गणगंगा में काट

12:58

काट करके बहा दूंगा। देखिए श्रोताओं सरवती अपने पिता फूल सिंह

13:03

से कहने लगी कि पिताजी एक छोटा सा राज्य नरवरगढ़ और उसका कोई राजा प्रथम बताया और

13:11

उसकी महारानी मंजा ने मेरी नाव में टक्कर मरवा दी अपने मल्हा से और मुझसे कहने लगी

13:18

कि मेरा पुत्र यहां होता तो मैं तुझे बलपूर्वक अपनी पुत्रवधू बनाकर ले जाती। जब

13:25

अपनी पुत्री की यह बात महाराज फूल सिंह ने सुनी, फूल सिंह पंजाबी ने सुनी, कंपिलगढ़

13:32

के राजा ने सुनी तो राजा का क्रोध सातवें आसमान पर छा गया। फूल सिंह क्रोधित हो उठा

13:39

और कहने लगा कि बेटी किसकी मौत आ गई? मैं नरवरगढ़ के एक-एक नर बच्चा को भवानी मां

13:48

की सौगंध खाकर कहता हूं काट काट करके गढ़ गंगा में बहा दूंगा। जीवित नहीं छोडूंगा।

13:54

एक को भी जिंदा नहीं जाने दूंगा। मैं अभी उसको जाकर के देखता हूं। अपनी पुत्री को

14:02

समझाने के बाद फूल सिंह ने अपनी सेना को आदेश दिया। तैयार हो जाओ योद्धाओं। हमारी

14:10

पुत्री का अपमान एक छोटे से राज्य नरवरगढ़ की महारानी ने किया है। हम बलपूर्वक उस

14:17

महारानी को लेकर के चलेंगे और उस राजा को पराजित करेंगे। श्रोताओं महाराज फूल सिंह

14:24

पंजाबी ने अपनी सेना को आदेश दे दिया। सेना सुसज्जित हो गई। रण के बाजे बजने लगे

14:31

और कासिद को बुला लिया। उसी समय कासिद कहते हैं जो खत लेकर के जाता है जो दूत

14:37

होता है। एक दूत को बुलाया और दूत से कहा कि दूत मैं तुझे एक खत लिख के दे रहा हूं।

14:44

और इसे नरवरगढ़ के महाराज प्रथम को उसका शिविर पूर्व दिशा में लगा हुआ है। उसको

14:51

सौंप देना। तो फूल सिंह पंजाबी ने एक खत लिखा और खत में लिखता है कि दुष्ट नरेश

15:00

तेरी महारानी ने मेरी पुत्री का अपमान किया है। यदि तू जीवित रहना चाहता है तो

15:06

अब भी समय है तू यहां से गंगा का घाट छोड़ के नरवरगढ़ लौट जा। और यदि गंगा में स्नान

15:13

किया गंगा के घाट पर रहा तो मेरे हाथों से वीरगति को प्राप्त हो जाएगा। मुझसे युद्ध

15:20

करने के लिए तैयार रहे। नीचे अपनी मोहर लगा दी। कंपिलगढ़ की मोहर लगा के फूल सिंह

15:26

ने अपने हस्ताक्षर कर दिए और वह परवाना वो खत दे दिया एक दूत को। दूत उस खत को लेकर

15:35

के चला जाता है और पहुंच जाता है महाराज वीरसेन के दरबार में क्योंकि ये राजा थे

15:44

वहां शिविर लगाते थे वहां इनका दरबार भी लगता था महाराज वीरसेन के दरबार में

15:50

उपस्थित हो गया और खत महाराज के सामने प्रस्तुत कर दिया जब महाराज ने वो खत पढ़ा

15:57

तो महाराज वीरसेन क्रोध में तमता गए कहने लगे कि किसी का इतना दुस्साहस कि हमें गढ़

16:05

गंगा से स्नान करने से वंचित कर दे। हम नरवरगढ़ के नरेश हैं। और कहा उससे कि दूत

16:14

ध्यान से सुन लखियावन के से हाथी नहीं मिलते हैं। नरवर के से नरच्चा नहीं मिलते

16:20

हैं। और संकलदीप की सी पद्मनी रानी नहीं मिलती है और महवे के से क्षत्रिय नहीं

16:26

मिलते हैं। जाकर के अपने महाराज से बोल देना कह दो अपने महाराज से कि राजा प्रथम

16:33

युद्ध करने के लिए तैयार हैं। युद्ध की तैयारी करवाओ। महाराज प्रथम कभी भी गंगा

16:39

का घाट नहीं छोड़ेंगे। हमको वह कमजोर समझता है और हमें डरा करके

16:46

यहां से भगाना चाहता है। जबकि अपनी पुत्री का दोष नहीं देख रहा है। श्रोताओं

16:53

उस दूत को महाराज प्रथम ने वापस भेज दिया और दूत महाराज फूल सिंह के दरबार में आ

17:00

जाता है। कंपिलिगढ़ नरेश के दरबार में आ जाता है। और कंपिलगढ़ नरेश को समस्त

17:06

दास्तान आ करके सुनाई कि महाराज वह अहंकारी नरेश वीरसेन लड़ने को तैयार है।

17:14

उसके साथ 60 हजार की फौज है। 60 हजार की फौज को उसने सुसज्जित होने का आदेश दे

17:21

दिया है। वो गणगंगा का घाट छोड़ना नहीं चाहता है। महाराज वो हमसे युद्ध करेगा। तो

17:27

फूल सिंह पंजाबी भी क्रोधित हो उठते हैं। श्रोताओं सुसज्जित सेना दोनों पक्षों की

17:34

महाराज प्रथम के साथ 60 हजार की सेना है और फूल सिंह पंजाबी के साथ भी 1 लाख की

17:42

सेना है। दोनों पक्षों के योद्धा मैदान में आमने-सामने हैं और युद्ध की तैयारी

17:49

में आदेश की पालना में खड़े हुए हैं कि कब अपने-अपने नरेशों का आदेश मिले। जब फूल

17:56

सिंह पंजाबी ने अपनी सेना को आदेश दिया कि बंदी बना लो इन दोनों को। इस राजा की सेना

18:04

सहित इसका नाश कर दो। सबको काट काट के गढ़ गंगा में बहा दो। श्रोताओं अब तो दोनों

18:11

तरफ की सेनाओं में युद्ध आरंभ हो गया। उन्हीं की भाषा में मैं आपको बयान करता

18:17

हूं। दोनों अनि बराबर मिल गई। मची परस्पर मारा मार। गुर परग और गदा चल रही कोता

18:25

खानी चले कतार खटखट खटखट तेगा चल चल रही छपक छपक तलवार डेढ़ पहर तक बजो दोधार और

18:32

बहने लगी रक्त की धार देखिए श्रोताओं उनमें बड़ा भयानक युद्ध हुआ बड़ा कठिन ये

18:40

संग्राम चल रहा है गढ़ गंगा पर इधर तो नरवर के नरच्चा

18:46

और उधर पंजाबी फूल से कंपिलगढ़ का महाराज

18:51

दोनों की सेनाएं आमने सामने युद्ध के मैदान में डटी हुई है। श्रोताओं

18:57

बड़ा घोर संग्राम चल रहा है। काट काट के गंगा की धारा में लाशों को बहाया जा रहा

19:04

है। दोनों पक्षों के वीर जवान अपने अपने राजाओं के नाम की जय जयकार करके युद्ध कर

19:11

रहे हैं। दोनों में महासंग्राम चल रहा है। अब देखिए,

19:17

जब फूल सिंह पंजाबी की नरवर नरेश से कोई भी पेश नहीं पड़ी। फूल सिंह पंजाबी को पता

19:25

था कि नरवर नरेश कोई छोटे-मोटे राजा नहीं है। महान राजा हैं। अतुलित पराक्रमी हैं।

19:34

और इस राजा को युद्ध में हराना आसान काम नहीं है। तो, फूल सिंह पंजाबी अपनी पुत्री

19:42

सरवती के पास वापस अपने शिविर में जाता है और कहने लगा, "पुत्री, मेरे पास 1 लाख की

19:49

सेना है। और महाराज प्रथम के पास 60,000 सैनिक हैं। और हमें युद्ध करते-करते तीन

19:56

पहर का समय व्यतीत हो चुका है। परंतु कोई हारजीत किसी पक्ष की नहीं हुई है। तो सरती

20:03

कहने लगी कि पिताजी मेरे पास जादू है। मैं 14 विद्या निधान हूं। मैं आपको एक जादू की

20:11

पोथी देती हूं। एक जादू का डिब्बा देती हूं। मंत्र देती हूं। और इस डिब्बा में एक

20:18

भस्मी है। एक भस्म है। और उस भस्म को आप

20:24

जितने बीच में बिखेर दोगे, उतने बीच के जवान पत्थर के हो जाएंगे। वो युद्ध करने

20:31

में सक्षम नहीं रहेंगे, बेहोश हो जाएंगे और उन्हें आप आसानी से काट सकते हैं।

20:37

श्रोताओं अब देखिए सरवती अपने पिता फूल सिंह को उस जादू के डिब्बे

20:44

को दे देती है। क्योंकि सरवती भी मां काली की भक्त थी और उस जमाने में जादू प्रचलित

20:52

था। कुछ शास्त्रों में और पुराणों में ऐसा बताया जाता है कि कुछ राजाओं के साथ तो

20:59

मां भवानी स्वयं युद्ध किया करती थी। जैसे कंपिलगढ़ नरेश फूल सिंह के साथ स्वयं मां

21:06

काली युद्ध करती थी। अब देखिए श्रोताओं फूल सिंह उस जादू के डिब्बे को लेकर के चल

21:14

देता है रणभूमि में। रणभूमि में फूल सिंह ने जाकर देखा तो उसकी सेना में भगदड़ मची

21:21

हुई है। नरवर के जवानों ने उसकी सेना को पछाड़ रखा है। सेना भाग रही है और नरवर के

21:30

वीर योद्धा उनके पीछे पड़ रहे हैं। जब अपनी सेना को पीछे हटते हुए देखा तो फूल

21:37

सिंह कंपिलगढ़ नरेश जादू के डिब्बा को लेकर के आगे बढ़ जाता है। और सामने महाराज

21:44

प्रथम को देखा तो कहने लगा नरेश क्यों इन सेनाओं का अंत करवा रहे हो? आओ दोद हाथ

21:51

आमने सामने हम करेंगे। देखिए श्रोताओं महाराज प्रथम कोई छोटे-मोटे बलवान नहीं

21:59

थे। महाराज प्रथम में और फूल सिंह पंजाबी में दोनों में तलवार का युद्ध चल रहा है।

22:06

परंतु फूल सिंह पंजाबी महाराज प्रथम को आसानी से नहीं पकड़ सकती थी। आसानी से

22:12

नहीं हरा सकते थे और ना महाराज प्रथम ही फूल सिंह को आसानी से हरा सकते थे। जब

22:19

महाराज प्रथम ने अपनी तलवार का प्रहार किया और फूल सिंह पंजाबी अचेत अवस्था में

22:25

पृथ्वी पर गिरा तो मां भवानी उसी समय अपना खड़क आगे लगा देती है और फूल सिंह की

22:31

रक्षा कर देती है। इस तरीके से कई बार महाराज प्रथम ने फूल सिंह पंजाबी को धरनी

22:37

पर पछाड़ दिया। लेकिन मां भवानी स्वयं अपना तेगा फूल सिंह की सुरक्षा में आगे

22:43

बढ़ा देती और फूल सिंह पंजाबी महाराज प्रथम के बारों से सुरक्षित बच जाता। ये

22:50

सोच कर के फूल सिंह पंजाबी ने मन में विचार किया कि अब मेरे पास कोई दूसरा

22:55

विकल्प नहीं रहा। अब मैं युद्ध नहीं जीत सकता। यदि कुछ समय तक और युद्ध हुआ तो

23:02

महाराज प्रथम के जवानों ने नरवरगढ़ के महायोद्धाओं ने मेरी सेना को छिन्नभिन्न

23:08

कर दिया है। मेरी सेना भाग रही है। मेरे सेनापति मारे जा चुके हैं। इसलिए अब मुझे

23:16

जादू का प्रहार करना होगा। श्रोताओं उस दुष्ट उस धोखेबाज नरेश ने

23:24

जादू का डिब्बा लेकर के उसमें जो अवमंत्रित भस्मी थी जिसको सम्मोहक भस्मी

23:29

भी कहा गया है वेद पुराणों में वो सम्मोहक भस्मी महाराज प्रथम की सेना पर छोड़ दी और

23:37

जहां जहां जैसे-जैसे वो भस्म उड़कर पहुंची तो महाराज प्रथम की सेना बेहोश होने लगी

23:44

महाराज प्रथम की सेना जैसे ही बेहोश होती और कंपिलगढ़ के जवान उनका शीश धड़ से अलग

23:51

कर देते। काट काट करके महाराज प्रथम के 60 हजार जवानों को गढ़ गंगा में बहा दिया

23:58

गया। महान रक्तपात हुआ श्रोताओं महाराज प्रथम

24:03

की सेना में से केवल दो व्यक्ति शेष बच गए। महाराज प्रथम की पराजय हो गई। महाराज

24:10

प्रथम ने देखा कि उसकी समस्त सेना का संहार हो चुका है और कंपिलगढ़ नरेश फूलसेन

24:18

और उसके कुछ सेनापति महाराज प्रथम को बंदी बनाने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। रानी मंझा

24:25

और महाराज प्रथम दोनों खड़े हुए ये देख रहे हैं। रानी मंझा को भी

24:32

पता चल गया कि मेरे समस्त सैनिक योद्धा मारे जा चुके हैं। और अब महाराज की हार

24:37

निश्चित है। श्रोताओं फूल सिंह ने कुछ ही समय में महाराज प्रथम को चारों तरफ से

24:44

घिरवा लिया और बंदी बना लिया। महाराज प्रथम की के हाथों में हथकड़ी डाल दी गई।

24:52

पैरों में बेड़ियां डाल दी गई। महाराज प्रथम को जंजीरों से जकड़ दिया गया। और

24:58

रानी मंझा को भी जंजीरों से जकड़ दिया गया। और डोंसा बजाते हुए ले गए अपने शिविर

25:05

को। अब देखिए श्रोताओं जो राजा

25:11

सात हाथ के सिंहासन पर बैठता था। वही महाराज

25:17

नरवरगढ़ नरेश आज फूल सिंह पंजाबी की कैद में कैदी हो गए। फूल सिंह ने अपने सैनिकों

25:25

को आदेश दिया कि सेना का कच कंपिलगढ़ की तरफ कराया जाए। गंगा का स्नान पूर्ण हुआ

25:32

और मेरी बामनगढ़ नरेशों को बंदी बनाने की अभिलाषा थी। मैं बामनगढ़ बामनगढ़ के

25:38

राजाओं को बंदी बना चुका हूं। समस्त राजा मेरे यहां टैक्स देते हैं। कर देते हैं

25:44

कर। इसलिए चलो कंपिलगढ़ की तरफ पयान किया जाए। श्रोताओं

25:51

अपने महाराज फूल सिंह का आदेश सुनकर के सैनिकों ने उत्साह पूर्वक विजय का धोसा

25:57

बजवाया और कंपिलगढ़ के लिए सेना ने कूच कर दिया। कई दिनों का सफर करने के बाद फूल

26:05

सिंह की सेना कंपिलगढ़ पहुंच जाती है। कंपिलगढ़ में महाराज प्रथम ने अपना दरबार

26:13

सजाया। अपने दरबार में समस्त सामंत बड़े-बड़े धवल, योद्धा और सेनापतियों को

26:21

बुलाया। अपने सलाहकारों को बुलाया और कहा कि दो बंदी युद्ध भूमि से लेकर के आए हैं

26:29

जो स्वयं महाराज प्रथम नरवरगढ़ के महाराज और उनकी पटरानी मन जाए दोनों को मेरे

26:36

सामने दरबार में पेश किया जाए। देखिए श्रोताओं समय-समय की बात समय को परखे ज्ञानी एक समय

26:44

पे धूप एक पे बरसे पानी। समय बहुत बड़ा बलवान होता है। समय की बात होती है। जिस

26:52

राजा के आदेश में इतनी दम थी कि संपूर्ण नरवर पर शासन चलता था जो स्वयं एक सिंहासन

27:01

पर बैठकर के न्याय किया करते थे। वही राजा बंदी बन के कंपिलगढ़ नरेश महाराज फूल सिंह

27:09

के दरबार में खड़े हुए हैं। उनका शरीर जंजीरों से जकड़ा हुआ है और चार सैनिक उन

27:16

पर भाला ताने हुए हैं। और यही हाल नरवर की महारानी

27:22

मंझा का है। महाराज फूल सिंह दरबार में उपस्थित हो गए और नरवर नरेश से कहने लगे

27:30

कहो नरवर के महाराज आप बड़ा युद्ध करना चाहते थे। हमने आपको

27:36

आदेश दिया था कि आप वापस लौट जाए तो बहुत अच्छे रहेंगे। परंतु आपने नहीं माना। आप

27:42

बोलिए आपको क्या सजा दी जाए। नरवर नरेश महाराज प्रथम बिना घबराए हुए उस राजा से

27:49

कहने लगे कि दुष्ट नरेश जो राजा एक राजा के साथ व्यवहार करता है वो व्यवहार किया

27:55

जाए। मैं भी एक राजा हूं। तो फूल सिंह पंजाबी

28:00

हंसा कहने लगा कि नहीं तुम राजा जैसे व्यवहार करने के योग्य नहीं है। तुम्हारी

28:07

इस पत्नी ने मेरी पुत्री का अपमान किया था। अपने पुत्र के साथ विवाह करने की बात

28:13

कही थी। तुमने अपने आप को नरवर के नर बच्चा कहा

28:21

था। अब तुम्हें मैं सजा देता हूं। श्रोताओं

28:26

महाराज प्रथम को फूल सिंह पंजाबी क्या सजा सुना रहा है कि देखिए तुम्हें मेरे बंदी

28:33

गृह में रहना होगा। आपके हाथ में एक चाकी दे दी जाएगी। और

28:40

5 किलो अनाज आपको रोजाना पीसना होगा। आपको

28:46

चाकी चलानी होगी। और खाने के लिए सूखी दो रोटी दी जाएंगी।

28:52

सब्जी भी नहीं होगी। जाइए इनको ले जाया जाए और जहां जिस बंदी

28:59

गृह में चाकी पीसी जाती है उस बंदी गृह में इस महाराज प्रथम को कैद कर दिया जाए।

29:06

श्रोताओं राजा प्रथम देखिए समय का प्रभाव। फूल सिंह पंजाबी ने कैद में डलवा दिया। और

29:15

एक चाखी रख दी गई और उसके सामने अनाज रख दिया गया। कि इसको पीस ले। महाराज प्रथम

29:24

की यह हालत हो गई। हाथ हथेला छूटे और बांस पीठ पर टूटे। जब महाराज प्रथम के हाथ से

29:31

वो चाकी का हथेला बोलते हैं उसको वो छूटता है और वैसे ही जो प्रहरी होते हैं वो

29:36

महाराज प्रथम की पीठ पर बांसों की मार लगाते हैं। महाराज प्रथम बंदी गृह में

29:43

चक्की पीस रहे हैं। चाकी चला रहे हैं। हाथों में छाले पड़ गए महाराज प्रथम की।

29:50

अब देखिए मंझ रानी को क्या सजा दी जाती है। श्रोताओं मंझ रानी से महाराज फूल सिंह

29:57

नरवरगढ़ की राजा की पटरानी से क्या कहने लगे? देखिए श्रोताओं ये भी समय का ही

30:03

प्रभाव है कि रानी वह बहुत उछल रही थी। मेरी पुत्री ने तुझसे क्या गलत कहा था कि

30:10

तू अकेली गंगा में विहार कर रही है। तू मेरे पिता के साथ चल। जबकि तेने मेरी बात

30:18

को नहीं मेरी पुत्री की बात को नहीं माना और मेरी पुत्री का अपमान किया। अब बताइए

30:25

तू मेरी कैद में है और मेरी घरवाली बनेगी।

30:30

अब बोल क्या क्या किया जाए तेरा? तो यह बात सुनकर के मंजा रानी कहने लगी

30:39

दुष्ट कायर राजा तू ध्यान रख मैं तेरे इस कंपिलगढ़ को धूल

30:46

में मिलवा दूंगी जब मेरा शेर इस कंपिलगढ़ पर आक्रमण करेगा

30:52

मंझ रानी की बात सुनकर के फूल सिंह पंजाबी हंसा कि तेरा शेर क्याने कोई शेर पैदा

30:59

किया था कि हां मैंने शेर पैदा कि शेर तो बनी में पैदा होते हैं। हां,

31:06

मैंने बनी में ही पैदा किया। कि शेर तो हिंस के बेड़े में पैदा होते हैं। तो मंजा

31:12

कहने लगी हां हिंस के बेड़े में ही पैदा किया था। फूल सिंह कहने लगा शेरनी का दूध

31:18

कि हां मेरे पुत्र ने शेरनी का दूध पिया है। और जब वो आएगा तो तेरा एक कंपिलगढ़

31:24

धूल में मिल जाएगा। कंपिलगढ़ में कोई रोने वाला नहीं रहेगा। यह स्थिति तेरे इस

31:30

कंपिलगढ़ की हो जाएगी। फूल सिंह पंजाबी क्रोधित हो उठा कि रानी जबान को संभाल और

31:38

अब मेरी पटरानी बनने के लिए तैयार हो जा। तो मंजा ने जब यह बात सुनी तो मंजा कहने

31:44

लगी कायर तू मुझे स्पर्श भी नहीं कर सकता। यदि स्पर्श करने का भी दुस्सा किया तो मैं

31:52

तेरा सर धड़ से अलग कर दूंगी। तू मुझे कौन जानता है?

31:57

श्रोताओं फूल सिंह पंजाबी ने मंझ रानी को बहुत परेशान किया। परंतु मंझ रानी एक भी

32:06

बात नहीं मानती है उसकी। तो फूल सिंह पंजाबी मन में विचार करता है

32:11

कि इसको बैलाया जाए और बहला के पटरानी बनाया जाए। फूल सिंह पंजाबी ने मंजा से

32:17

कहा तो बता तेरा पुत्र यदि तुझे छुड़ाने नहीं आया तो क्या करेगी? कि तब मैं तेरी

32:24

पटरानी बन जाऊंगी। तो फूल सिंह कहने लगा कितना समय लगेगा कि

32:30

छ महीने का छ महीने तक तू मेरा धर्म का पिता है और मैं तेरी धर्म की पुत्री हूं।

32:37

फूल सिंह पंजाबी कहने लगा ठीक है। मैंने बामनगढ़ के राजाओं को कैद कर लिया। कोई

32:44

ऐसा नरेश नहीं है। कोई ऐसा पैदा नहीं हुआ है जो मुझे पराजित करे। मां भवानी मेरे

32:50

साथ युद्ध करती हैं। तो मुझे तो कोई हराने वाला है ही नहीं। कि ठीक है मंजा हम तुझे

32:56

छ महीने का आश्वासन देते हैं। परंतु याद रहे छ महीने के बाद तुझे हमारी पटरानी

33:04

बनना पड़ेगा। मंजा कहती है ठीक है मैं वायदा करती हूं। श्रोताओं फूल सिंह पंजाबी

33:11

कहने लगा कि मैं आपको इस तरीके से पुत्री के महल में तो भेज नहीं सकता। आपको भी मैं

33:17

यह सजा देता हूं। छ महीने तक आपको मेरे महल पर एक बहुत लंबा बांस लेकर के

33:25

काग उड़ाने पड़ेंगे। मेरे महल पर जो कौवा आते हैं उनको उड़ाना पड़ेगा। काग उड़ानी

33:32

कर दी रानी कि जाइए एक लंबा बांस दे दीजिए इसके हाथ में और भेज दीजिए इसको महल पर।

33:39

महल के पक्षियों की सुरक्षा यह करेगी। महल पर कोई पक्षी नहीं आ जाए। कोई कौवा नहीं आ

33:46

जाए। जा श्रोताओं महारानी मंझा को जो नरवर

33:51

गढ़ की रानी थी उसको फूल सिंह पंजाबी ने एक लंबा बांस देकर के अपने महल पर काग

34:00

उड़ाने के लिए भेज दिया और कह दिया कि भोजन में दो रोटियां सुबह और दो रोटी शाम

34:05

को दी जाएंगी। अब देखिए श्रोताओं यही तो समय होता है।

34:13

श्रोताओं समय की बात होती है। समयसमय का फेर है समय बड़ा बलवान। भीलन लूटी गोपिका

34:21

जब बुई अर्जुन बेईमान श्रोताओं आपको ज्ञात होगा कि एक बार उस अर्जुन की टंकार को

34:28

सुनकर के संसार दहल जाता था। उसी अर्जुन से जब द्वारका समुद्र में डूब रही उस समय

34:36

भगवान श्री कृष्ण अपने धाम को चले गए थे तो भीलों ने पकड़ लिया था अर्जुन को।

34:41

अर्जुन से गोपिकाओं को लूट लिया। अर्जुन गांडीव को नहीं उठा सके। तो यही समय होता

34:46

है। इस संसार में सबसे बड़ा बलवान समय है। जो समय करता है वह कोई नहीं कर सकता। बड़े

34:54

से बड़ा दुश्मन नहीं कर सकता। समय की मार से कोई नहीं बच सकता। देखिए श्रोता वही

35:00

मंज रानी उस महल पर कौवा उड़ा रही है। काग

35:06

उड़ानी होकर के बांस से चारों तरफ देख रही है। महल की सुरक्षा में है। और महाराज

35:13

प्रथम बंदी गृह में चक्की चला रहे हैं। हाथों से पीसते हैं 5 किलो अन्न प्रतिदिन

35:22

और खाने के लिए दो रोटी मिलती है। अब देखिए उधर क्या होता है कि काफ़ी समय गण

35:30

गंगा पर हो गया। 60 हज़ार की सेना महाराज की गण गंगा पर समाप्त हो गई। और इधर राजा

35:40

नल और गजमोतनी अपने राजमहल में बड़े आराम से रह रहे हैं।

35:47

तो उसी रात्रि को गजमतनी ने एक स्वप्न देखा। स्वप्न देखा और स्वप्न बड़ा बुरा था। अपने

35:56

पति महाराज नल को महल में बुला लिया और राजा नल से कहने लगी कि हे महाराज मैंने

36:04

आज बड़ा भयानक सपना देखा है। राजा नल कहने लगा कहो रानी क्या स्वप्न देखा कि महाराज

36:11

स्वप्न नहीं यह सत्य है। मैंने ऐसा स्वप्न कभी नहीं देखा। मेरा स्वप्न यह झूठा नहीं

36:18

है। राजा नल कहने लगे कहो रानी कौन सा स्वप्न

36:23

है कि महाराज गढ़ गंगा पर महासंग्राम करते हुए मैंने हमारे सुसर

36:31

साहब महाराज प्रथम को देखा है। बड़ा भयंकर युद्ध हो रहा है भगवन गण गंगा पर। वहां

36:39

दोनों दोनों पक्षों की सेनाएं आमने सामने युद्ध के मैदान में डटी हुई है और उस

36:45

युद्ध में नरवरगढ़ की हार हो गई। राजा नल कहने लगे

36:51

रानी क्या तेरा दिमाग सही है? कहीं पागल तो नहीं हो गई? महाराज प्रथम को हराने वाला इस दुनिया में

36:59

कोई नहीं है। महाराज प्रथम कोई अट्टे पट्टे राजा नहीं है। महाराज प्रथम महा

37:04

बलवान है। महा पराक्रमी नरेश हैं। कि नहीं महाराज आप कह रहे हैं वो सत्य नहीं है। मैं कह

37:11

रही हूं वो सत्य है। और यहीं तक सीमित नहीं रहा। आपके माता-पिता बंदी बन चुके

37:19

हैं। दोनों को जंजीरों में जकड़ करके एक कंपिलगढ़ का राजा बंदी बना करके ले गया

37:26

है। और राजन यहीं तक सीमित नहीं रहा। मेरे स्वप्न में तो मैंने यह भी देखा कि

37:32

तुम्हारी माता उस राजा के महल पर काग उड़ा रही है और तुम्हारे पिता को बंदी गृह में

37:40

बंद कर कर दिया है और वहां वो चाकी चला रहे हैं। फटे हुए वस्त्र उसके बदन पर धारण करा दिए

37:48

गए हैं। और महाराज प्रथम उस राजा की जेल में बंद है और 5 किलो अन्न

37:55

पीसते हैं रोजाना। खाने के लिए दो सूखी रोटी दी जाती है।

38:00

तो राजा नल सोचने लगे कि रानी तुझे कुछ भ्रम हुआ है। ऐसा सत्य नहीं हो सकता। मैं

38:07

अभी सूचना भिजवाता हूं और माता-पिता की खुशखबरी गणगंगा से मंगाता हूं। वो तो 60

38:14

हजार की फौज लेकर के बड़े-बड़े योद्धाओं को साथ लेकर के गढ़ गंगा पर स्नान करने गए

38:20

थे और मेरे पिताजी को हराना इतना आसान नहीं है। कोई भी उन्हें आसानी से नहीं हरा

38:26

सकता। जब तक उनके हाथ में तलवार रहेगी तब तक उन्हें पराजित नहीं किया जा सकता। कि

38:33

नहीं महाराज मैं जो कह रही हूं वो सत्य है। कहते हैं कि मेरे पिता को कोई बंदी

38:39

नहीं बना सकता। रानी यह सब झूठ है। तुझे भ्रम हुआ है। तो गजमोतनी रानी नल से कहने

38:46

लगी कि नहीं नाथ मुझे भ्रम नहीं हुआ। मैं जो कह रही हूं वो सत्य प्रतीत होता है। तो

38:53

राजा नल कहने लगे कि कुछ सूचना तो आनी चाहिए। कोई सैनिक 60 हजार की सेना है। लाख

39:00

ब्राह्मण साथ में है। और कोई ना कोई सैनिक गुप्तचर कुछ सूचना तो लेकर के आता।

39:08

श्रोताओं अब देखिए उधर क्या होता है। गढ़ गंगा पर जब युद्ध चल रहा था तो वहां

39:17

राजा प्रथम के ब्राह्मण थे। राजपरोहित थे लाखा ब्राह्मण क्योंकि पंडित गंगाधर को

39:23

उन्होंने अपदस्त कर दिया था। हटा दिया था राजपरो के पद से। और लाखा दादा को ही

39:31

उन्होंने अपना राजपुरोहित घोषित कर दिया था। तो लाखा दादा या लाखा ब्राह्मण

39:38

वहां गंगा के घाट पर छिप जाते हैं कुछ पत्थरों की ओठ में सेना की ओठ में और जब

39:45

वो जादू से पत्थर के नहीं बने तो वहां उन पत्थरों में से निकल कर के चल देते हैं

39:53

नरवरगढ़ के लिए। राजा नल का दरबार लगा हुआ है। राजा नल दरबार में विराजमान है और उसी

40:03

समय लाखा दादा का हड़बड़ाते हुए प्रवेश। लाखा दादा हड़बड़ा रहे हैं। लाखा दादा के

40:11

जो पत्रा पोथी हैं वो भी उनके साथ नहीं है। लाखा दादा सीधे महाराज नल के पास

40:18

पहुंच जाते हैं। राजा नल ने जब लाखा ब्राह्मण को देखा तो कहने लगे कि दादा

40:24

क्या हुआ? मुझे यह बताएं। साफ-साफ बताएं तुम अकेले क्यों आए हैं? मेरे माता-पिता

40:32

मेरी 60 हजार की फौज कहां चली गई? क्या हुआ उनके साथ और वो अब तक क्यों नहीं आए?

40:39

तो लाखा ब्राह्मण कहने लगा कि बेटे नल क्या बताऊं तुझे? कुछ बताने के लिए मेरे

40:46

पास शब्द नहीं है। तो राजा नल कहने लगे दादा आप बताएं कि क्या बात है।

40:54

तो लाखा दादा ने जो गढ़ गंगा पर युद्ध हुआ था उस युद्ध का वृतांत सुना दिया और लाखा

41:02

दादा राजा नल से कहने लगे कि बेटे नरवर के

41:08

नरेशों ने कभी हार नहीं मानी। अपने प्राण दे दिए लेकिन दूसरे राजा से पराजय स्वीकार

41:15

नहीं की। वही काम आपके पिता श्री महाराज प्रथम ने किया। गढ़ गंगा पर महान युद्ध

41:21

हुआ। बड़ा भयंकर संग्राम हुआ और उस संग्राम में जब कंपिलगढ़ नरेश की कोई पेस

41:29

नहीं चली तो जादू के बल पर उसने हमारे सैनिकों को पत्थर का बना दिया और तेरे

41:36

माता-पिता को कैद करके कंपिलगढ़ ले गया। अब तो राजा नल अपनी रानी गजमोतनी की बात

41:43

को समझ जाते हैं कि यह बिल्कुल सही कहा मेरी रानी ने कि मेरे माता-पिताओं की जेल

41:50

हो गई है। श्रोताओं राजा नल ने आपातकालीन सभा बुलाई और आपातकालीन सभा में विचार

41:58

विमर्श करने लगे। आपातकालीन सभा एक विशेष सभा होती है जिसमें 10 से 20 चुनिंदा

42:06

विश्वास पात्र सैनिक सेनापति और पुरोहित

42:11

और अपने परिवारिक के सदस्य होते हैं। तो आपातकालीन सभा में विचार होने लगा कि किस

42:19

तरीके से माता-पिता की जेल को छुड़ाया जाए। अब श्रोताओं लाखा दादा जो कि विद्वान

42:26

ब्राह्मण थे। लाखा दादा कहने लगे राजन सेना सजाइए और आक्रमण कीजिए कंपिल गढ़ पर।

42:34

राजा नल कहने लगे कि कितनी फौज से काम चल जाएगा। मेरे पास 1 लाख की फौज है। लाखा

42:42

ब्राह्मण कहने लगे बेटा 1 लाख की फौज से काम चलने वाला नहीं है। क्योंकि 1 लाख की

42:49

फौज कंपिलगढ़ पर आक्रमण करके विजय नहीं हो सकती। हमारी 60 हजार की फौज थी और मैंने

42:57

स्वयं अपने नेत्रों से देखा कि 60 हजार की फौज देखते ही देखते काट के गढ़ गंगा में

43:03

बहा दी गई। अब तो श्रोताओं राजा नल सोच में पड़ गए कि

43:09

मेरे पास 1 लाख फौज है और 1 लाख से कुछ होने वाला नहीं है। तो पास में खड़ी

43:16

गजमोतनी कहने लगी कि महाराज यदि

43:23

आप अनुमति दें तो मैं आपसे एक बात कहूं तो राजा नल कहने लगे कहो रानी क्या बात है तो

43:29

रानी कह रही है कि धीरज धर्म मित्र और नारी आप तत्काल परखिए चारी कि हे महाराज

43:38

अपने धैर्य को धर्म को और नारी

43:44

नारी कहते पत्नी को और अपने मित्र को जब आपत्ति आए, आपातकाल हो, कोई विपत्ति आ

43:52

जाए, उस समय उसकी परीक्षा लेनी चाहिए। महाराज आपने कुछ समय पहले

44:00

एक श्याम नगर के राजा के पुत्र मनसुख को

44:05

अपना मित्र बनाया था। पगड़ी पलटा यार बनाया था। और आज समय है अपने मित्र की

44:12

पहचान करने की। अपने मित्र की परख करने की और उस मनसुख गुर्जर ने अपने पिता मैनपाल

44:19

सहित यह वायदा किया था कि नल जहां तेरा काम पड़ेगा जहां तेरा पसीना बहेगा वहां

44:25

हमारा खून बहा देंगे तेरे साथ मर मिटेंगे तो हे महाराज आप अपने मित्र मनसुख को परचा

44:34

लीजिए उसकी परीक्षा ले लीजिए यदि वो लड़ने के लिए तैयार है तो उसके पास 1 लाख की फौज

44:41

है और 1 लाख की फौज लेकर के वो हमारा साथ दे। हमारे माता-पिता की जेल छुड़ाने में

44:48

हमारी मदद करें। अब श्रोताओं राजा नल को याद आ गई अपने मित्र की। देखिए ये कथा मैं

44:55

अलग से सुना दूंगा कि मनसुख गुर्जर से राजा नल की मित्रता कैसे हुई थी। वो एक अलग वीडियो में बता दूंगा। तो राजा नल ने

45:05

आपातकालीन सभा में एक पत्र वाहक को बुलाया। पत्र ले जाने वाले को बुलाया और

45:12

एक कागज मंगाया। उस कागज पर राजा नल ने

45:18

महाराज मैनपाल के पुत्र मनसुख को देखिए महाभारत में भी मनसुख

45:25

गुर्जर का वर्णन किया गया है। ऋतुपर्ण के नाम से। वही मनसुख गुर्जर को महाराज नल एक

45:35

पत्र लिख रहे हैं और पत्र में पूरा वृतांत लिख दिया कि कंपिलगढ़ के फूल सिंह पंजाबी

45:41

ने हमारे माता-पिता को कैद कर लिया है। हे मित्र यदि तुम सच्चे मित्र हो तो 1 लाख की

45:49

फौज को लेकर के चार दिन बाद बंगाल के बॉर्डर पर मिल जाइए। जहां बंगाल देश है

45:58

उसके बॉर्डर पर मिल जाइए। वहां से हम आगे जब आप आ जाएंगे तभी ही कूच

46:03

करेंगे कंपिलगढ़ की तरफ। श्रोताओं यह पत्र लिख दिया। नीचे अपने मोहर और हस्ताक्षर

46:10

लगा के राजा नल ने उसे पत्रवाहक को दे दिया और पत्रवाहक को भेज दिया श्याम नगर

46:18

के लिए। अब श्रोताओं पत्रवाहक तो श्याम नगर को चला जाता है पत्र देने के लिए। इधर

46:25

राजा नल ने लाखा दादा को आदेश दे दिया कि दादा 1 लाख की फौज को सजाइए।

46:31

लाखा दादा ने फौज को आदेश दे दिया और देखिए श्रोताओं राजा नल की फौज तैयार

46:40

हो रही है। सज जाओ सज जाओ मेरे शहजादे अब क्यों राखी देर लगाए। ये आला में वर्णित

46:46

होता है इस तरीके से। और देखिए श्रोताओं जो जितनी भी फौज थी

46:54

राजा नलकी वो सज जाती है। युद्ध के लिए तैयार हो जाती है। झिलम टोप बख्तर पहन पहन

47:00

कर के योद्धा युद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं। इधर राजा नल और गजमोतनी रानी दोनों

47:09

विचार विमर्श कर रहे हैं। गजमोतनी रानी बड़ी विद्वान थी। श्रोताओं घूमासुर दाने

47:15

की पुत्री थी। 14 विद्या निधान थी। राजा नल से कहने लगी कि महाराज माता-पिता की

47:23

जेल छुड़ाने में मैं भी आपके साथ चलूंगी। राजा नल कहने लगा रानी क्या तेरा दिमाग

47:29

सही है कि महाराज मेरा दिमाग सही है यदि मैं आपके साथ चली गई तो आप निश्चित ही

47:36

अपने माता-पिता की जेल छुड़ाने में समर्थ हो जाओगे। और यदि मैं आपके साथ नहीं गई तो

47:42

महाराज आप 2 लाख की फौज तो क्या 50 लाख की

47:47

फौज से भी माता-पिता की जेल नहीं छुड़ा सकती। राजा नल कहने लगा रानी क्यों कि

47:53

महाराज रास्ते में बंगाल देश पड़ेगा। पूर्ण रूप से जादू से भरा हुआ क्षेत्र है।

48:01

वहां पर एक से एक बड़ा जादू है। वहां के राजाओं के साथ वहां की जो खेरे की देवियां

48:10

होती हैं जिनको चंडी कहते हैं वो युद्ध करती हैं। राजाओं के साथ लड़ती हैं। और

48:17

उनकी जो स्त्रियां हैं, उनकी पुत्री हैं, वो जादुओं में पारंगत हैं। किसी भी समय

48:24

युद्ध का पासा पलट सकती हैं। इसलिए राजन मुझे आप अपने साथ ले चलिए। परंतु राजा नल

48:31

कहने लगे नहीं रानी जब मेरा मित्र मनसुख आएगा और उसे पता चल गया कि मैं रानी

48:38

गजमोतनी को युद्ध भूमि में साथ लेकर आया हूं तो वो रिस हो के नाराज होकर के वापस

48:44

लौट जाएगा। मेरा साथ नहीं देगा। बंगाल के बॉर्डर से अपनी सेना को वापस ले आएगा। तो

48:51

नल की बात सुनकर के गजमोतनी राजा नल से कहने लगी कि महाराज मैं यह

48:58

मर्दाना भष धारण करूंगी ये जनाना बाना उतार दूंगी जनाना भष धारण नहीं करूंगी और

49:05

तुम्हारा मित्र मुझे पहचान नहीं पाएगा श्रोताओं नल कहने लगा रानी देखिए औरत और

49:12

आदमी इन दोनों में ईश्वर ने बड़ा अंतर बनाया है तू पहचान अवश्य पड़ जाएगी कि

49:18

नहीं महाराज कि रानी तेरे केशों को कहां छिपाएगी? महाराज रानी कहने लगी कि मैं ऐसा

49:27

छत्र धारण करूंगी कि मेरे केश दिखाई नहीं देंगे। रानी तेरे नेत्र इनको कहां ले

49:34

जाएगी कि नहीं महाराज मैं नेत्रों में काजल नहीं लगाऊंगी कि हे रानी तुम्हारा ये

49:41

जो छाती है ये ऊंची उठी हुई है इस छाती को कहां छुपाओगी कि महाराज मैं ऐसा बख्तर

49:48

धारण करूंगी जो मेरी छाती दिखाई नहीं देगी। देखिए महाराज मैं पूर्णत मर्दाना

49:53

भेष धारण करूंगी। कोई भी मुझे पहचान नहीं सकता कि मैं गजमतनी हूं। और मैं यदि आपके

50:00

साथ युद्ध भूमि में चली गई तो राजन आप जानते हैं कि इस संसार में इस वक्त मेरे

50:07

समान विद्या में कोई भी परिपूर्ण नहीं है। मैं 14 विद्या जानती हूं। संपूर्ण जादू

50:14

मेरे साथ रहता है। श्रोताओं राजा नल और गजमोतनी दोनों आपस में विचार विमर्श करके

50:21

राजा नल अनुमति दे देते हैं गजमोतनी को कि गजमोतनी जाइए पुरुषों का बाना धारण कीजिए।

50:28

देखिए श्रोताओं भारत में यह भारत ऐसी भूमि है जहां वीरांगनाओं की कमी नहीं रही। एक

50:35

से एक बढ़कर के वीरांगनाएं प्राचीन काल से ही होती चली आई। वही गजमोतनी

50:42

पुरुषों का बाना धारण कर लेती है। बन जाती है एक पुरुष

50:48

दिखाई देती है एक महान योद्धा की तरह। और इधर महाराज नल अपनी सेना का निरीक्षण कर

50:55

रहे हैं। लाखा दादा ने सेना को तैयार कर दिया है और राजा नल देख रहे हैं अपने

51:01

सैनिकों को अपनी व्यवस्थाओं को और लाखा दादा से कहने लगे कि दादा यदि आपकी अनुमति

51:08

हो तो सेना को कूच का आदेश दे दिया जाए। लाखा दादा कहने लगे कि देखिए बेटे नल

51:17

कच का आदेश तो मैं दे रहा हूं पर अभी एक घड़ी इंतजार कीजिए शुभ समय की प्रतीक्षा

51:24

कीजिए क्योंकि मार्ग में बंगाल का बॉर्डर पड़ेगा कंपिलगढ़ के लिए जो मार्ग जाता है

51:31

वो बंगाल से निकलता है और जब हम बंगाल में प्रवेश करेंगे तो वहां आप जानते हैं राजन

51:38

वहां जादू का क्षेत्र है और उस जादू साधु के क्षेत्र में हमारा विजय होना संभव नहीं

51:44

है। इसलिए शुभ समय पर हम यहां से पयान करेंगे। श्रोताओं राजा नल लाखा दादा के

51:52

कथन अनुसार एक घड़ी इंतजार करते हैं और अपनी सेना का पूरा जायजा लेते हैं। अपनी 1

52:00

लाख की फौज के साथ राजा नल और गजमोतनी घोड़ों पर सवार होकर के कच कर देते हैं

52:08

बंगाल के बॉर्डर की तरफ। सेना राजा नल की चली जा रही है अपने माता-पिता की कैद को

52:14

छुड़ाने के लिए। अब देखिए श्रोताओं इधर क्या होता है। जब वो पत्रवाहक

52:23

महाराज मनसुख गुर्जर के दरबार में पहुंचा। श्याम नगर में पहुंचा और उसने अपना पत्र

52:31

मनसुख गुर्जर को दे दिया। तो मनसुख गुर्जर ने जब पत्र को पढ़ा तो श्रोताओं मनसुख

52:39

गुर्जर के नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। सैनिक और सेनापति राजपुरोहित पूछने

52:46

लगे कि महाराज क्या हुआ? तो मनसुख गुर्जर कहने लगा कि आज मेरे

52:53

मित्र पर बहुत बड़ा संकट है। मेरे मित्र के माता-पिताओं की कैद हो गई है और मैं

53:02

युद्ध भूमि में मित्र की सहायता के लिए जाना चाहता हूं। कुछ राजपुरोहित और कुछ

53:07

सेनापतियों ने इस बात का विरोध किया कि महाराज आप इतना बड़ा खतरा उठा रहे हैं कि

53:15

अपने मित्र के लिए अपना समस्त न्योछावर करने जा रहे हैं। युद्ध भूमि में अपनी

53:21

संपूर्ण सेना को झोंक रहे हैं। तो मनसुख गुर्जर क्या कहने लगा? मनसुख गुर्जर ने

53:27

कहा कि जो ना मित्र दुख होए दुखारी ते विलोकत पातक भारी।

53:33

अर्थात इस दुनिया में मित्रों का कई तरीका होता है। चार तरीके के मित्र होते हैं।

53:40

श्रोताओं आपको बताना चाहूंगा। एक मित्र तो ऐसा होता है जो पैसे के लिए दोस्ती करता

53:46

है। कोई पैसे वाला है और दूसरा आदमी सोच

53:52

रहा है कि इससे पैसे लेकर के काम चलाऊं तो वो उससे दोस्ती करेगा।

53:57

दूसरे तरीके का मित्र होता है। किसी के घर कोई सुंदर पत्नी लड़की या कोई औरत है तो

54:07

उसके चक्कर में दोस्ती करता है। और तीसरे तरीके का मित्र ऐसा होता है जो कि एक

54:16

सामाजिक तरीके से मित्रता करता है। और चौथे तरीके का मित्र ऐसा होता है जो मित्र

54:23

के लिए अपने प्राण दे सकता है। तो मनसुख गुर्जर कहने लगा कि मैं चौथे नंबर वाला

54:31

मित्र हूं। मैं मेरे मित्र के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दूंगा। परंतु मित्र के

54:37

माता-पिताओं को कैद से मुक्त कराऊंगा। अपने सेनापति को आदेश दिया कि सेना को

54:43

सुसज्जित किया जाए। युद्ध के बाजे बजवाए जाए और कुछ किया जाए बंगाले की तरफ। मेरे

54:51

मित्र को चार दिन बाद बंगाले के बॉर्डर पर मुझे मिलना है। सेना सहित शीघ्रता से सेना

54:58

को तैयार किया जाए। श्रोताओं मनसुख का आदेश सुनकर के

55:06

गुर्जरों की सेना सुसज्जित हो रही है। समस्त योद्धा झिलम टोप बख्तर पहन पहन करके

55:14

अपने आप को युद्ध के लिए सुसज्जित कर रहे हैं। हाथी, घोड़ा फौज, पलटन सब कुछ तैयार

55:22

कर रहे हैं। श्रोताओं, जब सेना संपूर्ण रूप से तैयार हो गई। 1 लाख सैनिक तैयार हो

55:30

गए तो राजा मनसुख श्यामनगर का नरेश अपनी 1 लाख की फौज को

55:38

आदेश दे देते हैं कि कोच किया जाए बंगाल की बॉर्डर की तरफ बंगाल के बॉर्डर पर मेरा

55:44

मित्र मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। अब देखिए श्रोताओं इधर राजा नलकी सेना बंगाले के

55:52

बॉर्डर पर आ गई। गजमोतनी ने आदेश दे दिया सैनिकों को कि कोई भी यदि बंगाल के बॉर्डर

55:58

के भीतर चला जाएगा तो वो वापस नहीं आ सकता। ध्यान रखें बिना मेरी अनुमति के

56:04

क्योंकि ये जादुई क्षेत्र है। श्रोताओं गजमोतनी

56:10

राजा नल दोनों विचार कर रहे हैं। गजमोतनी कह रही है कि महाराज तुम्हारा कोई मित्र

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नहीं है। तुम तो केवल एक झूठे मित्र के फंदे में फंस गए थे। तुम्हारा मित्र नहीं

56:23

आ सकता। कौन मरवाएगा अपनी सेना को? ऐसा कौन है जो

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स्वयं अपनी जान को जोखिम में डालेगा? हे राजन हमें 1 लाख की फौज से ही कंपिलगढ़ को

56:36

विजय करना है। कंपिलगढ़ को जीतना है। तो

56:41

श्रोताओं इधर श्याम नगर के नरेश महाराज मनसुख गुर्जर भी अपनी 1 लाख की फौज को

56:50

लेकर के सुसज्जित होकर के रण के बाजे बजवाते हुए चल देते हैं बंगाले की बॉर्डर

56:56

की तरफ। जहां राजा नर अपनी सेना के साथ पड़े हुए

57:02

थे। तीन दिन का लगातार सफर करके चौथे दिन

57:07

मनसुख गुर्जर बंगाले के बॉर्डर पर पहुंच जाते हैं। जहां राजा नल अपनी सेना के साथ

57:14

पड़े हुए हैं। इंतजार कर रहे थे अपने मित्र मनसुख गुर्जर के आने का। जब राजा

57:23

नल्ल मनसुख गुर्जर को आते हुए देखा तो अपनी रानी गजमोतनी से कहने लगी कि गजमोतनी

57:30

देखिए मेरा मित्र मनसुख आ गया है। 1 लाख

57:35

गुर्जर योद्धाओं के साथ युद्ध भूमि में बलिदान होने के लिए तैयार है। मेरे साथ

57:42

मरने के लिए तैयार है। मित्र हो तो मनसुख जैसा। मित्रता की एक परम मिसाल है मेरा

57:49

मित्र। श्रोताओं दोनों मित्रों आकर के बहा फैला के भुजा पसार करके मिले।

57:57

एक दूसरे से मिलने के बाद कुशलक्षेम पूछने के बाद दोनों मित्र आपस में विचार विमर्श

58:05

करने लगे। गजमोतनी भी दूर से देख रही है

58:10

कि यह क्या बातें कर रहे हैं। श्रोताओं मनसुख गुर्जर मन में विचार करके कहने लगा

58:17

कि मित्र मेरी सेना 1 लाख की है परंतु मुझे तेरा कुछ विश्वास नहीं है क्योंकि

58:23

तेरे 60 हजार योद्धा तो गढ़ गंगा पर मारे जा चुके हैं। मैं तेरी सेना का जायजा लेना

58:29

चाहता हूं। तेरी सेना का निरीक्षण करना चाहता हूं कि तेरे पास कैसे-कैसे योद्धाएं। तो नल कहने लगा ठीक है। मनसुख

58:38

कीजिए मेरी सेना का निरीक्षण। तो मनसुख गुर्जर राजा नल की सेना का

58:44

निरीक्षण कर रहा है। देख रहा है सैनिकों को कि कौन कैसा योद्धा है और सैनिकों का

58:51

निरीक्षण करतेकरते श्रोताओं उसका ध्यान गजमोतनी पर ठहर जाता है। जब गजमोतनी पर

59:00

ध्यान ठहरा तो राजा नल से मनसुख कहने लगा कि इस

59:05

योद्धा को कहां से लाए हो आप? वास्तव में वाकई में बहुत बड़ा योद्धा दिखाई पड़ता

59:11

है। गोरा शरीर है। बिल्कुल मोटाजा बदन है इसका। इस योद्धा को

59:18

आप कहां से लेकर आए? तो नल कहने लगा कि इस योद्धा को मैंने अभी कुछ दिन पहले ही

59:25

भर्ती किया था। बड़ा वफादार सैनिक है और यह मेरे सेनापतियों के पद पर है। मैंने

59:32

इसे धीरे-धीरे सेनापति का पद दे दिया है। यह एक टुकड़ी की कमान संभालता है। तो

59:38

मनसुख गुर्जर कहने लगा कि मित्र युद्ध करने तो हम चल रहे हैं। परंतु तुम्हें इस

59:46

सिपाही को मुझे देना होगा। नल सोचने लगा कि यह तो मेरी पत्नी को मांग रहा है। तो

59:52

नल बोला कि नहीं भाई इस सिपाही को तो मैं नहीं दे सकता। मनसुख कहने लगा इसके बदले

59:59

मैं तुझे 1000 सैनिक दूंगा। पर यह सिपाही मेरे साथ रहना चाहिए। इसे मैं मेरा

1:00:06

बॉडीगार्ड नियुक्त करना चाहता हूं। अंगरक्षक बनाना चाहता हूं। नल कहने लगा कि

1:00:11

नहीं मैं 1000 में भी नहीं दूंगा। मनसुख गुर्जर ने कहा 10,000 सैनिक दूंगा लेकिन

1:00:18

इस सैनिक को मुझे दे दीजिए। तो नल ने फिर भी मना कर दिया और जब नल ने मना किया तो

1:00:25

मनसुख ने विचार किया कि मैं तो तेरे लिए लड़ने को और मर मिटने को तैयार हूं। तू एक

1:00:31

जवान के लिए नाट गया मुझसे। मना कर दिया। इसलिए तेरी मेरी यारी खत्म होती है। मैं

1:00:37

मेरी सेना लेकर के वापस जा रहा हूं श्याम नगर को। अब राजा नल के पास कोई जवाब नहीं

1:00:43

था। राजा नल कहने लगा कि मित्र ऐसा मत कीजिए कि नहीं मुझे यह सैनिक चाहिए। मैं

1:00:51

यह सैनिक मेरे अंगरक्षक के लिए नियुक्त करता हूं। श्रोताओं

1:00:57

मनसुख गुर्जर नाराज होकर के अपने सैनिकों को लौटने का आदेश दे देता है। तभी नल कहने

1:01:04

लगा मोतनी से कि तू नहीं मानी। तेने मेरा मित्र भी नाराज कर दिया। अब क्या करूं? तो

1:01:12

गजमोतनी कहने लगी कि तेरे मित्र को मैं मनाऊंगी। श्रोताओं

1:01:17

गजमोतनी मनसुख गुर्जर को पीछे से आवाज लगा रही है। और घोड़ा पर दौड़ के मनसुख गुर्जर

1:01:25

को आगे से घेर लीजिए। जब मनसुख गुर्जर ने गजमोतनी की आवाज सुनी तो पहचान गया। कहने

1:01:34

लगा कि भाभी इस भष में तुम कि हां

1:01:39

तो मनसुख कहने लगा कि अब तो मैं बिल्कुल नहीं जाऊंगा कि क्यों कि मैं स्त्रियों को

1:01:45

साथ लेकर के युद्ध भूमि में जाऊं ये मुझे शोभा नहीं देता। क्षत्रियों का बाना धारण

1:01:51

किया है हमने। हम स्त्रियों को युद्ध भूमि में साथ नहीं ले जाते। मित्र नल तुमने ये

1:01:56

क्या किया? तुम भाभी को युद्ध के मैदान में ले आए। तो गजमोतनी कहने लगी देखिए

1:02:02

देवर तुम नहीं जानते कि यहां से आगे बंगाल देश आरंभ हो रहा है। बंगाल की सीमा पर

1:02:10

हमारे फौजी डेरा लगे हुए हैं। यहां से आगे का क्षेत्र जादू का है और इस

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क्षेत्र में आप मेरे बिना कभी भी विजय प्राप्त नहीं कर सकते। आप कहीं बकरा

1:02:24

मुर्गा या तोता बन के पिंजों में कहीं बाड़ों में मिलेंगे। आप युद्ध भूमि तक

1:02:31

पहुंच ही नहीं सकते। कंपिलगढ़ तक जा नहीं सकते। अब तो मनसुख गुर्जर के दिमाग में

1:02:37

बात बैठी। मनसुख गुर्जर भी जानता था कि गजमोतनी 14 विद्या निधान है। श्रोताओं

1:02:43

गजमोतनी के समझाने पर मनसुख गुर्जर गजमोतनी को साथ लाने की अनुमति स्वीकार कर

1:02:51

लेते हैं और वहीं अपनी सेना को वापस बुलाने बुला लेते हैं। अब श्रोताओं उन

1:02:58

चारों में क्योंकि चारों बड़े अधिकारी थे। राजा नल, गजमोतनी,

1:03:03

लाखा ब्राह्मण और मनसुख गुर्जर चारों एक तंबू में बैठे हुए हैं। एक शिविर में बैठे

1:03:10

हुए हैं और चारों में मंत्रणा चल रही है कि किस तरीके से कंपिलगढ़ को जीता जाए। अब

1:03:18

देखिए गजमोतनी मन में विचार करने लगी कि ये तीनों ये नहीं चाहते थे कि मैं इनके

1:03:25

साथ आऊं। तो मुझे अब इनकी परीक्षा लेनी चाहिए। दूसरा दिन हुआ तो गजमोतनी ने लाखा

1:03:33

ब्राह्मण से कहा कि पंडित जी तुम यह नजदीक

1:03:38

शहर है इस बंगाले में। इस बंगाल के इस शहर को चले जाइए। बंगाले को जाइए आप और यहां

1:03:46

से मेरे बालों के लिए आप चमेली का तेल लेकर के आओ। यहां कोई तेली का घर मिल

1:03:53

जाएगा और उस तेली के घर से मुझे चमेली का तेल लेकर के आना।

1:03:59

यहां बंगाल के इस शहर का तेल प्रसिद्ध है, नामी है। श्रोताओं लाखा दादा मन में विचार

1:04:06

करने लगे कि ठीक है बेटी मैं इस बहाने से इस शहर को भी देख आऊंगा। यहां के हालचाल

1:04:13

भी जान लूंगा। यहां की जनता को देख आऊंगा कि यहां कैसी जनता है। चलो और तेरे लिए

1:04:19

मैं चमेली का तेल ले आऊंगा। लाखा ब्राह्मण और राजा नल मनसुख और गजमोतनी से अनुमति

1:04:28

लेकर के बंगाल के लिए चल देते हैं। बंगाल में जब लाखा ब्राह्मण ने प्रवेश किया

1:04:37

तो चला जा रहा है। कई मार्गों से गुजरते हुए उसने देखा कि तेली का घर नहीं मिल रहा

1:04:45

है। श्रोताओं पहले तेल की बिक्री तेली के यहां ही होती थी। खोजते खोजते पूछते पूछते

1:04:53

लाखा ब्राह्मण तेली के घर पहुंच जाता है। तेली के घर पहुंचा तो वह देखा कि आदमी कोई

1:05:00

नहीं था। व्यक्ति कोई नहीं था। कुछ औरतें बैठी हुई एक कमरे में बात कर रही थी। चौ

1:05:08

पर औरतें बैठी थी और वह आपस में बात कर रही थी। तो लाखा दादा उन औरतों के पास

1:05:14

पहुंच जाता है और उनसे कहने लगा कि मैं ब्राह्मण हूं। तो वे औरत कहने लगी कि हे

1:05:22

पंडित जी आप हमारी हस्तरेखा देखिए। लाखा पंडित जी उन तेलनों के यहां हस्तरेखा देख

1:05:30

रहे हैं और उनको बैला रहे हैं। अपने पांडित्य का प्रभाव जमा रहे हैं। परंतु

1:05:37

देखिए श्रोताओं तभी एक तेली की लड़की जो 14 विद्या निधान थी। जादू महा जादूगरनी

1:05:44

थी। वो महा जादूगरनी तेली की लड़की बाहर निकल के आई और उसने जब लाखा ब्राह्मण को

1:05:51

देखा तो मन में विचार करने लगी कि ये आदमी बंगाल देश का नहीं है। हमारे देश में ऐसे

1:05:58

व्यक्ति नहीं होते। यह तो अलग ही व्यक्ति है। इसका पहनावा अलग है। इसकी बोली भाषा

1:06:04

अलग है। ये तो कहीं दूसरे देश का है। और मुझे एक बकरे की आवश्यकता है। मैं इसको

1:06:13

बकरा बना देती हूं। अब देखो श्रोताओं उस लड़की ने अपने जादू का झोला निकाला।

1:06:22

मंत्र को अभिमंत्रित किया और उड़द पढ़ करके फेंक दिए लाखा ब्राह्मण पर। और लाखा

1:06:29

ब्राह्मण बकरा बन गया। बकरा बना के लाखा ब्राह्मण को मूंद दिया बकरियों में। लाखा

1:06:36

ब्राह्मण बकरियों में मुंद गए। अब देखिए श्रोताओं लाखा ब्राह्मण तो वहां बकरियों

1:06:42

के खिरक में मुदे हुए हैं। और इधर जब दो चार घंटे का समय निकल गया तो गजमतनी मनसुख

1:06:51

गुर्जर से कहने लगी कि देवर ब्राह्मण को गए काफी समय हो गया और न जाने वो क्यों

1:06:57

नहीं लौटे। लाखा दादा तो बातचीतों में बहुत निपुण हैं। कहीं बात करने लग गए

1:07:03

होंगे और हमें तो बहुत आगे चलना है। कंपिलगढ़ तक जाना है। तुम जाओ और शीघ्रता

1:07:09

से लाखा दादा को लेकर के आओ। श्रोताओं गजमोतनी की बात सुनकर के मनसुख कहने लगा

1:07:16

ठीक है भाभी मैं जा रहा हूं। तो मनसुख गुर्जर अपने भाई नल से कह के कि मैं अभी

1:07:23

दो घंटे में वापस लौटता हूं। श्रोता वो चल देता है। चला जा रहा है। खोज रहा है अपने

1:07:30

ब्राह्मण लाखा दादा को। परंतु उस बंगाली शहर में लाखा दादा का कोई अता पता नहीं

1:07:37

है। लाखा दादा का कहीं कोई ठिकाना नहीं मिल रहा है। खोजते खोजते चला जा रहा है।

1:07:43

और तभी वो निकल रहा था धोबियों के घर के सामने से। एक धोबियों का घर था और वहां से

1:07:52

निकल रहा था। तो वहां कुछ धोबी की धोबियों की स्त्रियां बैठी हुई थी। बंगाले की

1:07:57

स्त्री बड़ी जादूगरनी होती थी। तो उनमें से एक स्त्री ने देखा कि कितना सजीला युवक

1:08:04

है। कोई राजकुमार प्रतीत होता है। और मेरे पास एक गधे की कमी है। तो क्यों ना इसको

1:08:12

गधा बना लिया जाए और रात को इसे आदमी बना लूंगी। ये सोच कर के धोबी की लड़की ने

1:08:19

अपने जादू का झोला निकाला। मंत्र को आमंत्रित किया महाकाली का नाम लेकर के

1:08:26

मंत्र को छोड़ दिया मनसुख गुर्जर पर श्रोताओं मंत्र जैसे ही मनसुख गुर्जर पर

1:08:32

चला आकर के टकराया और मनसुख गुर्जर का शरीर बदल कर के गधा बन गया और धोबिनों ने

1:08:41

पकड़ करके उसको बांध दिया। अब श्रोताओं मनसुख गुर्जर भी गधा बने हुए

1:08:48

धोबियों के घर बंध रहे हैं। अब सुनिए ध्यान से जब दो से तीन घंटा मनसुख गुर्जर

1:08:55

को हो गए तो गजमोतनी तो जान रही थी सब चीज कि लाखा दादा तो वहां बकरा बन गए हैं। और

1:09:04

मनसुख गधा बन गया है। इसको ज्यादा सजा मिलनी चाहिए क्योंकि यह बहुत भाग रहा था

1:09:11

कि मैं मंझा को कि मैं गजमोतनी को साथ नहीं ले जाऊंगा।

1:09:16

इसलिए इन दोनों को सजा मिलना जरूरी था। परंतु अब महाराज

1:09:21

नल का नंबर है। मेरे पति का नंबर है। क्योंकि ये भी मुझे लाना नहीं चाहते थे।

1:09:27

तो गजमोतनी नल से कहने लगी कि देखिए महाराज

1:09:32

माता-पिता हमारे जेल में मुदे हैं। लाखा ब्राह्मण और मनसुख गुर्जर को क्या पता उन

1:09:39

वो क्या जाने दूसरे का कष्ट। वो तो हमारे साथ सेना लेकर के आ गए शर्मा शर्मी। नहीं

1:09:46

तो वो तो निश्चिंत है। सुबह के गए हैं और साझ होने को आ गई लेकिन अभी से कहीं लौटने

1:09:53

का नाम तक नहीं है। कोई अता पता नहीं है उनका। तो महाराज हे पतिदेव आप जाइए और

1:10:01

लाखा ब्राह्मण को और मनसुख गुर्जर को दोनों को आप लेकर के आइए। नल कहने लगा

1:10:07

रानी देख मैं जा रहा हूं। ठीक है। पर तू इस सेना का निरीक्षण करते रहना। सेना की

1:10:14

हेयर कमांडर इस समय तू है। तुझे ध्यान रखना है सेना को युद्ध के लिए हाई अलर्ट

1:10:21

मोड़ पर रखना है। तैयार रखना है। कोई किसी भी तरीके की स्थिति हो तो युद्ध के लिए

1:10:28

तैयार रहना है। गजबतनी कहने लगी महाराज आप चिंता ना करें। मैं एक दाने की पुत्री हूं

1:10:35

और मैं समस्त विद्याओं की ज्ञाता हूं। युद्ध कला में भी निपुण हूं। तलवारबाजी

1:10:40

में भी निपुण हूं और जादू में मेरा मुकाबला नहीं। श्रोताओं गजमोतनी और नल से

1:10:45

और कहने लगी कि देखिए महाराज आज मेरे पान समाप्त हो गए तो आप मुझे दो पान ले आना।

1:10:53

तो नल कहने लगा ठीक है मैं जा रहा हूं मनसुख को खोजूंगा और लाखा दादा को खोजना

1:10:59

है और तुझे दो पान ले आऊंगा। नल भी बंगाल शहर को चला जाता है। चला जा रहा है शहर

1:11:07

में। खोज रहा है लाखा दादा को और मनसुख गुर्जर को। परंतु दोनों का उस शहर में कोई

1:11:14

ठिकाना नहीं मिल रहा है। कोई अता पता नहीं है। खोजते-खोजते चला जा रहा है। तो एक चौराहे पर एक लड़की

1:11:24

पान की दुकान पर बैठी हुई थी। बड़ी सुंदर लड़की थी। राजा नल मन में विचार करने लगा

1:11:31

कि चलो पहले पान खरीद लेता हूं। गजमोतनी ने पान मंगाया है। उसको पान खरीद लूं और

1:11:39

एक पान मैं खा लेता हूं। तो यह सोच कर के राजा नल पान खरीदने के लिए उस लड़की के

1:11:47

पास दुकान पर आ जाता है और उस लड़की से कहने लगा कि दो पान तो मुझे एक कागज की

1:11:55

पुड़िया में बंद कर दीजिए, पैक कर दीजिए और एक पान मुझे खिला दीजिए। तो लड़की कहने

1:12:01

लगी ठीक है लड़की पहचान जाती है कि कितना सुंदर ऐसा सुंदर राजकुमार है किसी देश के

1:12:09

राजा का लड़का है और यदि यह मुझे मिल जाए इसके साथ मेरा विवाह हो जाए तो मेरा जीवन

1:12:16

धन्य हो जाए श्रोताओं वो लड़की ये विचार करके उसे पान बना रही है। पान को पान के

1:12:24

पत्ते निकाले तंबाकू डाली, सुपारी डाली, शहद लगाया और

1:12:30

पान बना करके पान पर अभिमंत्रित करके उड़द

1:12:35

डाल दिए। मंत्र चला दिया। और राजा नल से कहा कि लो पहले आप पान खाइए और बाद में आप

1:12:43

पान ले जाना। तो राजा नल समझ नहीं पाया। राजा नल ने उस पान को मुंह में दबाया और

1:12:50

जैसे ही पान की पीक मुंह के अंदर गई श्रोता वो राजा नल तोता बन गई और राजा नल

1:12:59

तोता बना उस लड़की ने पकड़ा और एक पिंजरे में बंद कर दिया राजा नल चिचर रही चिचचिर

1:13:07

उस पिंजरे में कभी ऊपर चढ़ता है कभी नीचे गिरता है टिटा रहा है राजा नल राजा नल

1:13:14

कहने लगा मन में सोच रहा है कि यही हाल लाखा दादा का और मनसुख का होगा। यही तो

1:13:22

कारण है कि वह इतने समय से नहीं लौटे। पर अब माता-पिता की जेल का क्या होगा?

1:13:29

माता-पिता की जेल तो क्या हमको ही बंगाले से अब कौन छुड़ाएगा?

1:13:34

अब क्या किया जाए? मैं तो यहां इस लड़की ने तोता बना दिया। श्रोताओं राजा नल उस

1:13:42

पिंजरे में कभी तो पिंजरे की डंडियों को पकड़ता है। कभी फड़फड़ाता है, कभी बाहर

1:13:48

निकलने की कोशिश करता है। परंतु वह लड़की

1:13:53

टस से मस नहीं हुई। अब तोता उसमें बैठा हुआ है। हैरान हो गया और उस पिंजरे में

1:13:59

आराम से बैठा है। अब देखिए श्रोताओं जब काफी समय हो गया तो गजमोतनी ने मन में

1:14:07

विचार किया कि अब मेरे वीरों को बुलाया जाए। गजमोतनी महा जादूगरनी थी। तो गजमोतनी

1:14:14

ने अपने वीरों का स्मरण किया। गजमोतनी के पास आठ वीर बताते हैं। हीरे राजे के पास

1:14:22

72 वीर बताते हैं। तो गजमोतनी ने अपने वीरों को याद किया और चार वीर हाजिर हो

1:14:29

गए। गजमोतनी से कहने लगे कहो रानी आपने हमें किस लिए बुलाया कि वीरों आप ये देख

1:14:36

के आओ कि मनसुख लाखा दादा और हमारे पति महाराज राजा नल

1:14:44

कहां पर है? उनका कुछ पता लगाइए। श्रोताओं चारों वीर बंगाली शहर के लिए दौड़ गए।

1:14:53

बंगाल शहर में खोज रहे हैं। और कुछ समय बाद एक वीर ने देखा कि मनसुख तो धोबियों

1:15:01

के घर गधा बना हुआ बैठा है। और एक वीर ने दूसरे ने देखा कि जो लाखा

1:15:09

दादा है वो बकरियों के बाड़े में बंद है और आराम से बैठा हुआ है। और राजा नल

1:15:18

एक पिंजरे में तोता के रूप में बंद है। और उसमें टाई पुकार रहा है। पिंजरे को काटने

1:15:27

का प्रयास कर रहा है। परंतु कुछ नहीं कर सकता। चारों वीर कुछ समय में ही तीनों का

1:15:34

पता लगा करके गजमोतनी के सामने उपस्थित हो गए। और गजमोतनी से कहने लगे कि देखिए रानी

1:15:43

मनसुख तो गधा बना हुआ बैठा है धोबियों के घर। और लाखा दादा लाखा दादा बकरा बन गए

1:15:53

हैं और रहे महाराज नल वो एक तोता बने हुए एक पिंजरे में बंद हैं।

1:16:00

तो गजमोतनी उन वीरों से कहने लगी कि देखो वीरों मैं आपको मेरी सेना की सुरक्षा के

1:16:06

लिए छोड़ कर जा रही हूं। मुझे जाना होगा। क्योंकि आप तो उन्हें छुड़ा के नहीं ला

1:16:11

सकते। मैं स्वयं जाऊंगी। और मैं उन तीनों को छुड़ा करके लाऊंगी। तुम मेरी सेना की

1:16:19

सुरक्षा करना। सेना पर कोई आक्रमण ना कर दे। तो आठों वीर मंज

1:16:26

रानी गजमोतनी से कहने लगे कि देखिए रानी तुम निश्चिंत हो के जाओ तुम्हारी सेना की

1:16:32

सुरक्षा व्यवस्था हम संभालेंगे। श्रोताओं गजमोतनी उन वीरों के हवाले अपनी सेना की

1:16:40

व्यवस्था छोड़कर के श्रोताओं गजमोतनी ने वीरों को वहां

1:16:46

तैनात कर दिया। सेना की सुरक्षा में तैनात कर दिया और स्वयं ने एक लिलहारी का रूप

1:16:53

धारण किया। लिलहारी जानते हैं जो लीला गोदती है। लीला गोदने वाली का रूप धारण कर

1:16:59

लिया। लिलहारी का रूप बना लिया। रानी का भेष उतार दिया। और चल देती है उस शहर में लीला गोदने के

1:17:08

लिए चली जा रही है तो सबसे पहले गजमोतनी

1:17:13

उस पान वाली लड़की के दुकान पर पहुंचती है तमोलिन की दुकान पर पहुंचती है और उस

1:17:19

तमोलिन के वहां राजा नल को देखा पिंजरे में बंद तो राजा नल ने गजमोतनी को पहचान

1:17:26

लिया कि गजमोतनी आ गई क्या ये मुझे बचाएगी जब राजा नल टी टी करने लगा तो गजमोतनी नल

1:17:36

से कहने लगी थोड़ा आराम कर छुड़ाती हूं अभी गजमोतनी ने मंत्र अभंत्रित किया और दो

1:17:44

वीरों को याद किया और जो उस लड़की की दुकान थी पान वाली लड़की की उस पर जादू

1:17:51

चला दिया और लड़की की दुकान को वीरों ने उखाड़ दिया और उस दुकान को ऊपर लेकर चलने

1:17:59

लगे तो लड़की घबरा गई लड़की गजमोतनी से कहने लगी कि बहन मैं पहचान गई। यह

1:18:06

तुम्हारा पति है। मैं इसे छोड़ती हूं। आप मुझे प्राणदान दे दीजिए। तो गजमोतनी कहने

1:18:14

लगी ठीक है। गजमोतनी ने अपने वीरों को रोका और उस दुकान को वापस उसी स्थान पर

1:18:20

जमा दिया। और उस तमोली की लड़की ने गजमोतनी को वो पिंजरा दे दिया कि इसकी नार

1:18:28

में एक धागा बंधा हुआ है। जब तुम इस धागे को खोल दोगी तो यह वापस पूर्व रूप में आ

1:18:34

जाएगा। अपने मनुष्य रूप में आ जाएगा। पिंजरे को लेकर के लीला गोदने वाली आगे चल

1:18:40

देती है। कुछ आगे जहां तेलियों के पास

1:18:46

लाखा दादा बकरा बने हुए थे वहां पहुंच जाती है। और आवाज लगाई कि मैं लीला गोद

1:18:52

रही हूं। कोई आ जाइए। तो वही लड़की जो महा जादूगरनी थी। मंज रानी गजमोतनी की आवाज

1:19:00

सुनकर के बाहर आई। और उस गजमोतनी से कहने लगी कि बहन मेरे लीला गोदिए। गजमोतनी समझ

1:19:08

गई कि ठीक है तेने ही ऐसा काम किया है। तो गजमोतनी उसके शरीर पर लीला गोदती है। लीला

1:19:17

गोदी और वो भी बहुत जो उसने कहा उसी के अनुसार तो वो लड़की प्रसन्न हो गई। तेली

1:19:25

की लड़की कहने लगी कि बहन आज तू जो मांगेगी मैं तुझे वही दूंगी। मैं तुझ पर

1:19:30

प्रसन्न हूं। तू कुछ भी मांग सकती है। मैंने तुझ जैसी लीला गोदने वाली नहीं

1:19:36

देखी। तो रानी गजमोतनी कहने लगी कि मुझे तीन वचन दे

1:19:41

दी। पहले तीन वचन दे तब मांगूंगी। तो वो तेली की लड़की तीन वचन दे देती है। तो

1:19:49

गजमोतनी कहने लगी मुझे कुछ नहीं चाहिए जो ये बकरा है इसको दे दीजिए।

1:19:56

तो तेली की लड़की कहने लगी क्यों इसका क्या करेगी? कि नहीं यह मेरा सेनापति है।

1:20:01

तू मुझे नहीं जानती। मैं रानी हूं। गजमोतनी तेली की लड़की समझ जाती है और उस

1:20:08

बकरे को दे देती है उस लीला गोदने वाली रानी गजमोतनी को। आगे चल देती है और मन

1:20:15

में सोच रही है कि अभी से मुझे मनसुख को छुड़ाना है। चल देती है आगे और पहुंच जाती

1:20:22

है धोबियों के घर। धोबियों के घर पहुंची और वही आवाज लगाई कि कोई लीला गोदवा

1:20:30

लीजिए। मैं लीला गोद रही हूं। तो जिस लड़की ने मनसुख को गधा बनाया था वही लड़की

1:20:37

बाहर आ जाती है। और कहने लगी कि बहन मेरे लीला गोद दीजिए। तो रानी गजमोतनी ने उसके

1:20:46

भी जैसा उसने चाहा उसी प्रकार की लीला गोदी दी। लीला गोदने के बाद वह लड़की कहने

1:20:54

लगी कि बहन मैंने बहुत ललिहारी देखी लेकिन

1:20:59

तुम जैसी नहीं देखी। तुम मुझसे मांगना चाहो वो मांग लीजिए। तो गजमोतनी कहने लगी

1:21:06

कि बहन तीन वचन दे दीजिए। तो उस धोबी की लड़की ने तीन वचन दे दिए और गजमोतनी ने

1:21:14

उससे उस गधे को मांग लिया कि देखिए बहन मेरे पास ज्यादा सामान है और इसे ढोने के

1:21:21

लिए लादने के लिए इस गधे को दे दीजिए। तो वह एक लड़की धोबी की उस गधे को गजमोतनी को

1:21:30

दे देती है। श्रोताओं गजमोतनी उस गधे को लेकर के बकरा को और तोता को

1:21:37

लेकर के चल देती है। ले आती है तीनों को आ जाती है बंगाले के उसी मेड़े पर जहां उसकी

1:21:44

फौज पड़ी हुई है। उससे कुछ दूर तीनों को खड़ा किया। पिंजरा रख दिया। गधे को खड़ा

1:21:53

कर दिया और मनसुख लाखा दादा जो बकरा बने हुए थे उसको खड़ा

1:21:59

कर दिया। रानी ने अभंत्रित किया मंत्र से मंत्र को और अभमंत्रित करके जल के छींटे

1:22:07

तीनों पर मारे तो तीनों की तीनों अपने पूर्व रूप में आ गई और तीनों की तीनों जब

1:22:14

पूर्व रूप में आए तो गजमोतनी से हाथ जोड़कर निवेदन करने लगी कि रानी आज तैने

1:22:21

हमको बचा लिया अन्यथा इस बंगाले में तो हमारा कोई पता ही नहीं चलता तो रानी कहने

1:22:27

लगी कि यही बात तो मैं कह रही थी तुमसे से कि तुमने केवल तलवार चलाई है। तुम जादू

1:22:33

नहीं जानते। तुम तो केवल मारकाट जानते हो। इसलिए मैं तुम्हारे साथ चलने की कह रही

1:22:39

थी। परंतु अब मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊंगी। मैं वापस नरवरगढ़ जा रही हूं। तो

1:22:45

तीनों की तीनों गजमतनी से कहते हैं कि यदि तुम हमारे साथ नहीं चली तो हम माता-पिता

1:22:52

की जेल नहीं छुड़ा पाएंगे। श्रोताओं गजमोतनी से तीनों चलने का आग्रह करते हैं।

1:22:59

मनाते हैं गजमोतनी को। गजमोतनी तैयार हो जाती है कि ठीक है मैं तो तुम्हारी

1:23:05

परीक्षा ले रही थी। तुम तो मुझे ले जाना नहीं चाहते थे। अब देखिए श्रोताओं गजमोतनी

1:23:12

तीनों को वापस अपने मूल रूप में ले आई। और वहीं बंगाल के बॉर्डर पर उनकी सेना पड़ी

1:23:18

हुई है।

14.

समस्त श्रोताओं का, भक्तों का और सब्सक्राइबर बंधुओं का एक बार फिर से

0:06

स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है। श्रोताओं, जैसा कि आप जानते हैं हमारी कहानी चल रही

0:13

थी नल पुराण इतिहास से। मैंने आपको बताया था कि राजा नल ने जब नल पुराण की कथा

0:22

महाराज प्रथम के दरबार में नरवरगढ़ नरेश के दरबार में सुनाई। तो वहां उस कथा को

0:29

सुनने के बाद संपूर्ण परिवार का मिलन हो जाता है। महारानी मंझा को दक्षिणपुर के

0:36

लक्ष्मी सेठ के यहां से सम्मान सहित बुलवा लिया जाता है और राजा प्रथम ने अपने पुत्र

0:44

नल को राज्या अभिषेक कर दिया। उसे राजा घोषित कर दिया कि अब यहां से आगे का राज्य

0:51

का संचालन मेरे पुत्र नल करेंगे और महाराज प्रथम

0:56

आराम से महल में रहने लग जाते हैं। श्रोताओं जब कुछ समय व्यतीत हो गया तो एक दिन की

1:06

बात है कि महाराज प्रथम महाराज वीरसेन अपनी रानी मंझा से कहने लगे कि हे प्रिय

1:14

तुम मुझे आज अपने हाथों से भोजन कराओ। मुझे तुम्हारे हाथों से भोजन किए हुए 20

1:20

वर्ष का समय व्यतीत हो गया है। 20 वर्ष बीत चुके हैं। जब महाराज प्रथम ने यह बात

1:27

मंझ रानी से कही तो मंझ रानी कहने लगी कि नहीं महाराज मैं आपको भोजन नहीं करा सकती।

1:34

तो राजा प्रथम कहने लगे कि क्यों रानी ऐसी क्या बात हो गई? अब भी तुम्हारे मन में

1:40

कुछ नाराजगी है कि नहीं महाराज? मेरे मन में नाराजगी तो तब भी नहीं थी जब आपने

1:46

मुझे जल्लादों को सौंप दिया था। मैं तब भी बड़ी प्रसन्न थी। परंतु मैं आपको एक वजह

1:53

बताना चाहती हूं कि मैं पतिव्रता हूं और मैं मेरा यह शरीर आपने जब मुझे जल्लादों

2:00

के हाथ सौंप दिया था तो उन जल्लादों से छिम गया था। मेरा शरीर जल्लादों से टच हो

2:06

गया। स्पर्श कर गया जल्लादों को। इसलिए मेरे पतिव्रत धर्म में कुछ मुझे यह आशंका

2:14

है कि पतिव्रता स्त्रियों का शरीर यदि पराए पुरुष से स्पर्श करता है तो उसका पतिव्रत धर्म नष्ट हो जाता है। तो इसलिए

2:22

महाराज मैं अपवित्र हो गई। जल्लादों ने मेरे शरीर को छू लिया। मुझे पकड़ कर के ले

2:27

गए थे। इसलिए मैं आपको भोजन नहीं करा सकती। तो जब यह बात महाराज वीरसेन ने सुनी

2:36

तो महाराज वीरसेन कहने लगे कि नहीं रानी ऐसी कोई बात नहीं है कि तो रानी कहती है

2:42

कि नहीं महाराज यह मेरा धर्म है। मैं एक पतिव्रताओं में सर्वश्रेष्ठ पतिव्रता

2:47

स्त्री हूं और मैं आपको भोजन नहीं करा सकती। आप मुझसे केवल दूर से बैठकर के बात

2:54

कर सकते हैं। श्रोताओं महाराज वीरसेन ने जब अपनी रानी की यह बात सुनी तो महाराज

3:01

वीरसेन व्याकुल हो उठे। तो यह बात सुनकर के महाराज प्रथम रानी मंझा को बहुत समझाने

3:08

की कोशिश करते हैं कि नहीं रानी ऐसा कुछ भी नहीं है। मेरे मन में कोई विचार नहीं

3:13

है। तो मंझा रानी नहीं कहती है कि महाराज ऐसा कुछ नहीं है। आप सोच रहे हैं वो

3:20

बिल्कुल अनुचित है। पतिव्रताओं के लिए अपने शरीर का स्पर्श भी किसी पुरुष से हो

3:26

जाने पर उनका पवित्रता उनकी जो पवित्रता है वो भंग हो जाती है। इसलिए महाराज यदि

3:33

आप मेरे हाथों से भोजन करना चाहते हैं तो आपको एक काम करना होगा। तो राजा प्रथम

3:39

कहने लगे कहो रानी जो आप कहेंगी आपकी इच्छा अनुसार मैं वही काम करने को तैयार

3:45

हूं। तो रानी मंझा कहने लगी कि महाराज यदि आप मेरे हाथों से भोजन करना चाहते हैं तो

3:52

आप मुझे गंगा स्नान कराइए। और जब मैं गंगा में स्नान करूंगी तो मेरा यह शरीर पवित्र

3:58

हो जाएगा। जो जल्लादों ने मेरे शरीर को स्पर्श किया था वो स्पर्श उनका समाप्त हो

4:04

जाएगा। गंगा में पवित्रता है और गंगा से मैं भी पवित्र हो जाऊंगी। पापियों के

4:10

पापों को तारने वाली उस गंगा में मुझे आप स्नान कराएं। श्रोताओं जब महाराज प्रथम ने

4:18

ये बात सुनी अपनी महारानी मंझा की तो राजा प्रथम ने आदेश दे दिया अपने सेनापति को कि

4:25

60 हजार की सेना तैयार की जाए। हम कल धोसा बजाते हुए अपनी महारानी मंझा को गंगा

4:33

स्नान कराएंगे। कल गंगा स्नान के लिए रवाना होंगे। कुछ

4:39

करना है हमें गंगा स्नान करने के लिए। देखिए श्रोताओं

4:44

महाराज के आदेश सेनापति ने अपनी समस्त सेना को आदेश दिया कि आप तैयार हो जाएं।

4:52

महाराज प्रथम के आदेशानुसार 60 हजार की सेना महाराज प्रथम ने तैयार की। 60 हजार

5:00

की सेना के साथ महाराज प्रथम और रानी मंझा गंगा स्नान करने के लिए चल देते हैं। राजा

5:09

नल अपने राज्य का संचालन कर रहे हैं और महाराज प्रथम धूमधाम से अपनी महारानी मंझा

5:17

को साथ लेकर के गंगा स्नान करने चले जा रहे हैं। अब देखिए श्रोताओं महाराज स्नान

5:24

महाराज प्रथम गंगा स्नान के लिए गढ़ गंगा पर पहुंच गए।

5:30

और वहां पर्व चल रहा था गंगा स्नान का। गंगा स्नान का समय आ रहा था। एक सोम

5:39

सोमवती कहते हैं या सोमवती अमावस्या पड़ने वाली थी। उसका पर्व नजदीक था।

5:46

तो उस सोमवती अमावस्या के कारण वहां गढ़ गंगा पर देश के महाराज बामनगढ़ के राजा

5:56

अपने अपने तंबू डेरा डाल के पड़े हुए थे। अपनेप शिविर लगा के गंगा स्नान के लिए

6:03

वहां ठहरे हुए थे। और जब महाराज प्रथम 60 हजार की सेना लेकर के पहुंचे तो वो

6:10

उन्होंने भी अपना तंबू गंगा के पूर्व दिशा में डाल दिया। और महाराज प्रथम उस पवित्र

6:19

गंगा में स्नान करने के लिए उस शुभ समय का इंतजार करने लगे कि जब पर्व आएगा तो सबसे

6:27

पहले मैं मेरी महारानी को स्नान कराऊंगा। श्रोताओं दूसरे दिन जब सोमवती अमावस्या का पर्व आया

6:35

तो महाराज प्रथम ने सर्वप्रथम अपनी रानी को स्नान कराया गंगा में और महारानी मंझा

6:42

को एक सोने की नाव लेकर के कह दिया कि आप गंगा में भ्रमण कीजिए। जल क्रीड़ा का आनंद

6:50

लीजिए। माता गंगा में आप सैर कीजिए। तो मंझ रानी वहां उस गंगा में एक सोने की नाव

6:59

में विचरण कर रही थी। सैर कर रही थी पानी में। अब देखिए श्रोताओं होनी बड़ी बलवान

7:07

होती है। वही उसी गंगा में स्नान करने के लिए एक फूल सिंह पंजाबी कंपिलगढ़ का राजा

7:16

था और वह महापराक्रमी देवी उसके साथ लड़ती थी। 14 विद्याधान उसकी एक लड़की थी जिसका

7:24

नाम था सरती। वह उस महाराज फूल सिंह की पुत्री भी गंगा

7:31

स्नान करने के लिए अपने पिता के साथ गणगंगा पर आई हुई थी। और जब वो गणगंगा पर

7:37

आई तो वह भी गंगा स्नान करने करते हुए एक नाव में बैठकर के गंगा में सैर करने चली

7:44

जाती है। उधर से नरवरगढ़ की महारानी

7:50

मंझा की नाव आ रही थी और इधर से फूल सिंह पंजाबी की पुत्री सरवती की नाव आ रही थी।

7:58

होनी बड़ी बलवान होती है। श्रोताओं पानी का कोई ऐसा भंवर पड़ा कोई ऐसा चक्कर

8:07

फंसा उस चक्कर में दोनों नाव फंस गई और दोनों नावों में टक्कर हो जाती है। जब

8:13

दोनों नावों में टक्कर हुई तो मल्ल्हाों ने नाव को तो संभाल लिया डूबने नहीं दिया

8:20

परंतु मंझ रानी और वो लड़की आमने-सामने आ गई। तो वो लड़की एकदम देख के मंझ रानी से

8:28

कहने लगी कि तू कौन है? कहां की रहने वाली है? और किसकी नारी है? तुझे होश नहीं किने

8:37

मेरी नाव में टक्कर मार दी है। तो मंजा कहने लगी कि नहीं बेटी ये मैंने टक्कर

8:43

नहीं मारी। मेरे मल्ल्हा ने टक्कर नहीं मारी। ये पानी का ऐसा ही जाल था। और इस

8:49

जाल में हमारी दोनों नाव फंस गई। भंवर पड़ रहा था। उस भंवर में नाव फंस गई और नाव

8:55

टकरा गई। तो सरती कहने लगी कि तुम कौन हो ये बताओ।

9:01

और तुम किस राजा की रानी हो? तुम यहां अकेली भ्रमण कर रही हो। और तुम्हें तुम तो

9:09

इतनी सुंदरी हो। यदि तुम अकेली भ्रमण कर रही हो तो तुम्हें तो मेरे पिता के साथ

9:15

चलना चाहिए। तुम मेरे पिता की महारानी बनके कंपिलगढ़ चलो। तुम्हें अकेले स्नान

9:22

करने के लिए नहीं भेजा जाएगा। मंझ रानी ने जब ये बात सुनी तो मंझ रानी कहने लगी कि

9:28

बेटी सुन ध्यान से। मैं वामनगढ़ में एक श्रेष्ठ गढ़ है नरवरगढ़ और वहां के महाराज

9:37

वीरसेन की महारानी हूं। मेरा नाम मंजा है और मैं गंगा स्नान के लिए आई हूं। परंतु

9:44

मैं तो बेटी विवाहित हूं। मेरे पति है। परंतु तू यह बता कि तेरा विवाह हो गया या

9:51

नहीं हुआ। तो मंझा से वह लड़की कहने लगी कि नहीं मेरा विवाह नहीं हुआ है। तो मंझा

9:57

कहती है कि देख बेटी तेने बात तो मुझसे बहुत बड़ी कही है कि मैं तेरे पिता के साथ

10:02

चलूं। परंतु मैं तो जा नहीं सकती क्योंकि मेरा विवाह हो चुका है। मेरी संतान है।

10:09

मैं महारानी हूं। परंतु मैं तुझसे कहती हूं यदि आज मेरे साथ मेरा पुत्र होता। मैं

10:15

उसे गंगा स्नान के लिए लाती तो तुझे अवश्य मेरी पुत्रवधू बना करके नरवरगढ़ ले जाती।

10:22

और जब यह बात मंझा रानी ने उस सरवती से कही तो सरवती क्रोधित हो गई। तमतमा गई और

10:30

कहने लगी कि मंझा तेने मेरा अपमान किया है। तू नहीं जानती मेरे पिता के साथ

10:37

महाकाली युद्ध करती है। मेरे पिता के पास चार वीर हैं जो अदृश्य होकर के युद्ध करते

10:45

हैं। इन वामन गढ़ों में मेरे पिता फूल सिंह का मुकाबला करने वाला कोई राजा नहीं

10:50

है। तो मंजा कहने लगी कि ठीक है बेटी परंतु अब मैं कुछ ज्यादा नहीं कह सकती। तू

10:57

यहां से चली जा। अच्छा रहेगा क्योंकि मेरा पुत्र यहां नहीं है। नहीं बलपूक मैं तेरा

11:02

विवाह करवा ले जाती। श्रोताओं दोनों में विवाद हो गया। लड़ाई की जड़ जम गई और

11:10

क्रोधित होकर के सरवती मल्ल्हा से कहती है कि मेरी नाव को मेरे तंबू की तरफ लौटा दो।

11:17

मेरे शिविर की तरफ मेरी नाव को लौटाइए। और महारानी मंझा का मल्ला भी महारानी मंझा की

11:23

नाव को लेकर के महाराज प्रथम के शिविर की तरफ चल देता है।

11:28

दोनों अपनेप शिविरों में आ जाती हैं। महारानी मंझा तो समझदार थी तो राजा से कुछ

11:34

नहीं कहा लेकिन वो नौजवान लड़की एक 18 वर्षीय युवती अपने क्रोध को नहीं रोक सकी

11:42

और अपने पिता फूल सिंह के सामने जाकर के रोने लगी। तो फूल सिंह कहने लगा कि बेटी

11:49

तेरे रोने का कारण क्या है? क्यों रो रही है? मुझे यह बता। यदि किसी ने तेरी तरफ

11:55

हाथ किया है तो उसका हाथ कटवा दूंगा। आंख निकाली है तो आंखें निकलवा दूंगा। और यदि

12:01

किसी ने जबान चलाई है तो उसकी जीभ कटवा दूंगा। मुझे बताइए तू क्यों रो रही है?

12:09

परंतु देखिए श्रोताओं जिस तरीके से रावण के पास सुपण खा गई थी। त्रिया जाल रच दिया

12:17

उस लड़की ने। रोने लगी। रुधन करने लगी कि मेरे पिता इतने बड़े बलवान हैं। काली के

12:26

भक्त हैं। काली साक्षात साथ में लड़ती हैं। और उनकी पुत्री से किसी एक छोटे-मोटे

12:33

राजा की रानी यह कह जाए कि मेरी पुत्रवधू बना लूं? तो क्या यह शोभा देता है महाराज?

12:39

जब यह बात फूल सिंह ने सुनी तो कहने लगा कि बेटी मुझे बताइए वो कौन थी जिसने तेरा

12:46

अपमान किया है। जो अपने पुत्र की पत्नी तुझे बनाना चाहता है। मैं उसे जीवित नहीं

12:52

छोडूंगा। इस गणगंगा में मेरी मां भवानी की सौगंध खाकर कहता हूं इस गणगंगा में काट

12:58

काट करके बहा दूंगा। देखिए श्रोताओं सरवती अपने पिता फूल सिंह

13:03

से कहने लगी कि पिताजी एक छोटा सा राज्य नरवरगढ़ और उसका कोई राजा प्रथम बताया और

13:11

उसकी महारानी मंजा ने मेरी नाव में टक्कर मरवा दी अपने मल्हा से और मुझसे कहने लगी

13:18

कि मेरा पुत्र यहां होता तो मैं तुझे बलपूर्वक अपनी पुत्रवधू बनाकर ले जाती। जब

13:25

अपनी पुत्री की यह बात महाराज फूल सिंह ने सुनी, फूल सिंह पंजाबी ने सुनी, कंपिलगढ़

13:32

के राजा ने सुनी तो राजा का क्रोध सातवें आसमान पर छा गया। फूल सिंह क्रोधित हो उठा

13:39

और कहने लगा कि बेटी किसकी मौत आ गई? मैं नरवरगढ़ के एक-एक नर बच्चा को भवानी मां

13:48

की सौगंध खाकर कहता हूं काट काट करके गढ़ गंगा में बहा दूंगा। जीवित नहीं छोडूंगा।

13:54

एक को भी जिंदा नहीं जाने दूंगा। मैं अभी उसको जाकर के देखता हूं। अपनी पुत्री को

14:02

समझाने के बाद फूल सिंह ने अपनी सेना को आदेश दिया। तैयार हो जाओ योद्धाओं। हमारी

14:10

पुत्री का अपमान एक छोटे से राज्य नरवरगढ़ की महारानी ने किया है। हम बलपूर्वक उस

14:17

महारानी को लेकर के चलेंगे और उस राजा को पराजित करेंगे। श्रोताओं महाराज फूल सिंह

14:24

पंजाबी ने अपनी सेना को आदेश दे दिया। सेना सुसज्जित हो गई। रण के बाजे बजने लगे

14:31

और कासिद को बुला लिया। उसी समय कासिद कहते हैं जो खत लेकर के जाता है जो दूत

14:37

होता है। एक दूत को बुलाया और दूत से कहा कि दूत मैं तुझे एक खत लिख के दे रहा हूं।

14:44

और इसे नरवरगढ़ के महाराज प्रथम को उसका शिविर पूर्व दिशा में लगा हुआ है। उसको

14:51

सौंप देना। तो फूल सिंह पंजाबी ने एक खत लिखा और खत में लिखता है कि दुष्ट नरेश

15:00

तेरी महारानी ने मेरी पुत्री का अपमान किया है। यदि तू जीवित रहना चाहता है तो

15:06

अब भी समय है तू यहां से गंगा का घाट छोड़ के नरवरगढ़ लौट जा। और यदि गंगा में स्नान

15:13

किया गंगा के घाट पर रहा तो मेरे हाथों से वीरगति को प्राप्त हो जाएगा। मुझसे युद्ध

15:20

करने के लिए तैयार रहे। नीचे अपनी मोहर लगा दी। कंपिलगढ़ की मोहर लगा के फूल सिंह

15:26

ने अपने हस्ताक्षर कर दिए और वह परवाना वो खत दे दिया एक दूत को। दूत उस खत को लेकर

15:35

के चला जाता है और पहुंच जाता है महाराज वीरसेन के दरबार में क्योंकि ये राजा थे

15:44

वहां शिविर लगाते थे वहां इनका दरबार भी लगता था महाराज वीरसेन के दरबार में

15:50

उपस्थित हो गया और खत महाराज के सामने प्रस्तुत कर दिया जब महाराज ने वो खत पढ़ा

15:57

तो महाराज वीरसेन क्रोध में तमता गए कहने लगे कि किसी का इतना दुस्साहस कि हमें गढ़

16:05

गंगा से स्नान करने से वंचित कर दे। हम नरवरगढ़ के नरेश हैं। और कहा उससे कि दूत

16:14

ध्यान से सुन लखियावन के से हाथी नहीं मिलते हैं। नरवर के से नरच्चा नहीं मिलते

16:20

हैं। और संकलदीप की सी पद्मनी रानी नहीं मिलती है और महवे के से क्षत्रिय नहीं

16:26

मिलते हैं। जाकर के अपने महाराज से बोल देना कह दो अपने महाराज से कि राजा प्रथम

16:33

युद्ध करने के लिए तैयार हैं। युद्ध की तैयारी करवाओ। महाराज प्रथम कभी भी गंगा

16:39

का घाट नहीं छोड़ेंगे। हमको वह कमजोर समझता है और हमें डरा करके

16:46

यहां से भगाना चाहता है। जबकि अपनी पुत्री का दोष नहीं देख रहा है। श्रोताओं

16:53

उस दूत को महाराज प्रथम ने वापस भेज दिया और दूत महाराज फूल सिंह के दरबार में आ

17:00

जाता है। कंपिलिगढ़ नरेश के दरबार में आ जाता है। और कंपिलगढ़ नरेश को समस्त

17:06

दास्तान आ करके सुनाई कि महाराज वह अहंकारी नरेश वीरसेन लड़ने को तैयार है।

17:14

उसके साथ 60 हजार की फौज है। 60 हजार की फौज को उसने सुसज्जित होने का आदेश दे

17:21

दिया है। वो गणगंगा का घाट छोड़ना नहीं चाहता है। महाराज वो हमसे युद्ध करेगा। तो

17:27

फूल सिंह पंजाबी भी क्रोधित हो उठते हैं। श्रोताओं सुसज्जित सेना दोनों पक्षों की

17:34

महाराज प्रथम के साथ 60 हजार की सेना है और फूल सिंह पंजाबी के साथ भी 1 लाख की

17:42

सेना है। दोनों पक्षों के योद्धा मैदान में आमने-सामने हैं और युद्ध की तैयारी

17:49

में आदेश की पालना में खड़े हुए हैं कि कब अपने-अपने नरेशों का आदेश मिले। जब फूल

17:56

सिंह पंजाबी ने अपनी सेना को आदेश दिया कि बंदी बना लो इन दोनों को। इस राजा की सेना

18:04

सहित इसका नाश कर दो। सबको काट काट के गढ़ गंगा में बहा दो। श्रोताओं अब तो दोनों

18:11

तरफ की सेनाओं में युद्ध आरंभ हो गया। उन्हीं की भाषा में मैं आपको बयान करता

18:17

हूं। दोनों अनि बराबर मिल गई। मची परस्पर मारा मार। गुर परग और गदा चल रही कोता

18:25

खानी चले कतार खटखट खटखट तेगा चल चल रही छपक छपक तलवार डेढ़ पहर तक बजो दोधार और

18:32

बहने लगी रक्त की धार देखिए श्रोताओं उनमें बड़ा भयानक युद्ध हुआ बड़ा कठिन ये

18:40

संग्राम चल रहा है गढ़ गंगा पर इधर तो नरवर के नरच्चा

18:46

और उधर पंजाबी फूल से कंपिलगढ़ का महाराज

18:51

दोनों की सेनाएं आमने सामने युद्ध के मैदान में डटी हुई है। श्रोताओं

18:57

बड़ा घोर संग्राम चल रहा है। काट काट के गंगा की धारा में लाशों को बहाया जा रहा

19:04

है। दोनों पक्षों के वीर जवान अपने अपने राजाओं के नाम की जय जयकार करके युद्ध कर

19:11

रहे हैं। दोनों में महासंग्राम चल रहा है। अब देखिए,

19:17

जब फूल सिंह पंजाबी की नरवर नरेश से कोई भी पेश नहीं पड़ी। फूल सिंह पंजाबी को पता

19:25

था कि नरवर नरेश कोई छोटे-मोटे राजा नहीं है। महान राजा हैं। अतुलित पराक्रमी हैं।

19:34

और इस राजा को युद्ध में हराना आसान काम नहीं है। तो, फूल सिंह पंजाबी अपनी पुत्री

19:42

सरवती के पास वापस अपने शिविर में जाता है और कहने लगा, "पुत्री, मेरे पास 1 लाख की

19:49

सेना है। और महाराज प्रथम के पास 60,000 सैनिक हैं। और हमें युद्ध करते-करते तीन

19:56

पहर का समय व्यतीत हो चुका है। परंतु कोई हारजीत किसी पक्ष की नहीं हुई है। तो सरती

20:03

कहने लगी कि पिताजी मेरे पास जादू है। मैं 14 विद्या निधान हूं। मैं आपको एक जादू की

20:11

पोथी देती हूं। एक जादू का डिब्बा देती हूं। मंत्र देती हूं। और इस डिब्बा में एक

20:18

भस्मी है। एक भस्म है। और उस भस्म को आप

20:24

जितने बीच में बिखेर दोगे, उतने बीच के जवान पत्थर के हो जाएंगे। वो युद्ध करने

20:31

में सक्षम नहीं रहेंगे, बेहोश हो जाएंगे और उन्हें आप आसानी से काट सकते हैं।

20:37

श्रोताओं अब देखिए सरवती अपने पिता फूल सिंह को उस जादू के डिब्बे

20:44

को दे देती है। क्योंकि सरवती भी मां काली की भक्त थी और उस जमाने में जादू प्रचलित

20:52

था। कुछ शास्त्रों में और पुराणों में ऐसा बताया जाता है कि कुछ राजाओं के साथ तो

20:59

मां भवानी स्वयं युद्ध किया करती थी। जैसे कंपिलगढ़ नरेश फूल सिंह के साथ स्वयं मां

21:06

काली युद्ध करती थी। अब देखिए श्रोताओं फूल सिंह उस जादू के डिब्बे को लेकर के चल

21:14

देता है रणभूमि में। रणभूमि में फूल सिंह ने जाकर देखा तो उसकी सेना में भगदड़ मची

21:21

हुई है। नरवर के जवानों ने उसकी सेना को पछाड़ रखा है। सेना भाग रही है और नरवर के

21:30

वीर योद्धा उनके पीछे पड़ रहे हैं। जब अपनी सेना को पीछे हटते हुए देखा तो फूल

21:37

सिंह कंपिलगढ़ नरेश जादू के डिब्बा को लेकर के आगे बढ़ जाता है। और सामने महाराज

21:44

प्रथम को देखा तो कहने लगा नरेश क्यों इन सेनाओं का अंत करवा रहे हो? आओ दोद हाथ

21:51

आमने सामने हम करेंगे। देखिए श्रोताओं महाराज प्रथम कोई छोटे-मोटे बलवान नहीं

21:59

थे। महाराज प्रथम में और फूल सिंह पंजाबी में दोनों में तलवार का युद्ध चल रहा है।

22:06

परंतु फूल सिंह पंजाबी महाराज प्रथम को आसानी से नहीं पकड़ सकती थी। आसानी से

22:12

नहीं हरा सकते थे और ना महाराज प्रथम ही फूल सिंह को आसानी से हरा सकते थे। जब

22:19

महाराज प्रथम ने अपनी तलवार का प्रहार किया और फूल सिंह पंजाबी अचेत अवस्था में

22:25

पृथ्वी पर गिरा तो मां भवानी उसी समय अपना खड़क आगे लगा देती है और फूल सिंह की

22:31

रक्षा कर देती है। इस तरीके से कई बार महाराज प्रथम ने फूल सिंह पंजाबी को धरनी

22:37

पर पछाड़ दिया। लेकिन मां भवानी स्वयं अपना तेगा फूल सिंह की सुरक्षा में आगे

22:43

बढ़ा देती और फूल सिंह पंजाबी महाराज प्रथम के बारों से सुरक्षित बच जाता। ये

22:50

सोच कर के फूल सिंह पंजाबी ने मन में विचार किया कि अब मेरे पास कोई दूसरा

22:55

विकल्प नहीं रहा। अब मैं युद्ध नहीं जीत सकता। यदि कुछ समय तक और युद्ध हुआ तो

23:02

महाराज प्रथम के जवानों ने नरवरगढ़ के महायोद्धाओं ने मेरी सेना को छिन्नभिन्न

23:08

कर दिया है। मेरी सेना भाग रही है। मेरे सेनापति मारे जा चुके हैं। इसलिए अब मुझे

23:16

जादू का प्रहार करना होगा। श्रोताओं उस दुष्ट उस धोखेबाज नरेश ने

23:24

जादू का डिब्बा लेकर के उसमें जो अवमंत्रित भस्मी थी जिसको सम्मोहक भस्मी

23:29

भी कहा गया है वेद पुराणों में वो सम्मोहक भस्मी महाराज प्रथम की सेना पर छोड़ दी और

23:37

जहां जहां जैसे-जैसे वो भस्म उड़कर पहुंची तो महाराज प्रथम की सेना बेहोश होने लगी

23:44

महाराज प्रथम की सेना जैसे ही बेहोश होती और कंपिलगढ़ के जवान उनका शीश धड़ से अलग

23:51

कर देते। काट काट करके महाराज प्रथम के 60 हजार जवानों को गढ़ गंगा में बहा दिया

23:58

गया। महान रक्तपात हुआ श्रोताओं महाराज प्रथम

24:03

की सेना में से केवल दो व्यक्ति शेष बच गए। महाराज प्रथम की पराजय हो गई। महाराज

24:10

प्रथम ने देखा कि उसकी समस्त सेना का संहार हो चुका है और कंपिलगढ़ नरेश फूलसेन

24:18

और उसके कुछ सेनापति महाराज प्रथम को बंदी बनाने के लिए आगे बढ़ रहे हैं। रानी मंझा

24:25

और महाराज प्रथम दोनों खड़े हुए ये देख रहे हैं। रानी मंझा को भी

24:32

पता चल गया कि मेरे समस्त सैनिक योद्धा मारे जा चुके हैं। और अब महाराज की हार

24:37

निश्चित है। श्रोताओं फूल सिंह ने कुछ ही समय में महाराज प्रथम को चारों तरफ से

24:44

घिरवा लिया और बंदी बना लिया। महाराज प्रथम की के हाथों में हथकड़ी डाल दी गई।

24:52

पैरों में बेड़ियां डाल दी गई। महाराज प्रथम को जंजीरों से जकड़ दिया गया। और

24:58

रानी मंझा को भी जंजीरों से जकड़ दिया गया। और डोंसा बजाते हुए ले गए अपने शिविर

25:05

को। अब देखिए श्रोताओं जो राजा

25:11

सात हाथ के सिंहासन पर बैठता था। वही महाराज

25:17

नरवरगढ़ नरेश आज फूल सिंह पंजाबी की कैद में कैदी हो गए। फूल सिंह ने अपने सैनिकों

25:25

को आदेश दिया कि सेना का कच कंपिलगढ़ की तरफ कराया जाए। गंगा का स्नान पूर्ण हुआ

25:32

और मेरी बामनगढ़ नरेशों को बंदी बनाने की अभिलाषा थी। मैं बामनगढ़ बामनगढ़ के

25:38

राजाओं को बंदी बना चुका हूं। समस्त राजा मेरे यहां टैक्स देते हैं। कर देते हैं

25:44

कर। इसलिए चलो कंपिलगढ़ की तरफ पयान किया जाए। श्रोताओं

25:51

अपने महाराज फूल सिंह का आदेश सुनकर के सैनिकों ने उत्साह पूर्वक विजय का धोसा

25:57

बजवाया और कंपिलगढ़ के लिए सेना ने कूच कर दिया। कई दिनों का सफर करने के बाद फूल

26:05

सिंह की सेना कंपिलगढ़ पहुंच जाती है। कंपिलगढ़ में महाराज प्रथम ने अपना दरबार

26:13

सजाया। अपने दरबार में समस्त सामंत बड़े-बड़े धवल, योद्धा और सेनापतियों को

26:21

बुलाया। अपने सलाहकारों को बुलाया और कहा कि दो बंदी युद्ध भूमि से लेकर के आए हैं

26:29

जो स्वयं महाराज प्रथम नरवरगढ़ के महाराज और उनकी पटरानी मन जाए दोनों को मेरे

26:36

सामने दरबार में पेश किया जाए। देखिए श्रोताओं समय-समय की बात समय को परखे ज्ञानी एक समय

26:44

पे धूप एक पे बरसे पानी। समय बहुत बड़ा बलवान होता है। समय की बात होती है। जिस

26:52

राजा के आदेश में इतनी दम थी कि संपूर्ण नरवर पर शासन चलता था जो स्वयं एक सिंहासन

27:01

पर बैठकर के न्याय किया करते थे। वही राजा बंदी बन के कंपिलगढ़ नरेश महाराज फूल सिंह

27:09

के दरबार में खड़े हुए हैं। उनका शरीर जंजीरों से जकड़ा हुआ है और चार सैनिक उन

27:16

पर भाला ताने हुए हैं। और यही हाल नरवर की महारानी

27:22

मंझा का है। महाराज फूल सिंह दरबार में उपस्थित हो गए और नरवर नरेश से कहने लगे

27:30

कहो नरवर के महाराज आप बड़ा युद्ध करना चाहते थे। हमने आपको

27:36

आदेश दिया था कि आप वापस लौट जाए तो बहुत अच्छे रहेंगे। परंतु आपने नहीं माना। आप

27:42

बोलिए आपको क्या सजा दी जाए। नरवर नरेश महाराज प्रथम बिना घबराए हुए उस राजा से

27:49

कहने लगे कि दुष्ट नरेश जो राजा एक राजा के साथ व्यवहार करता है वो व्यवहार किया

27:55

जाए। मैं भी एक राजा हूं। तो फूल सिंह पंजाबी

28:00

हंसा कहने लगा कि नहीं तुम राजा जैसे व्यवहार करने के योग्य नहीं है। तुम्हारी

28:07

इस पत्नी ने मेरी पुत्री का अपमान किया था। अपने पुत्र के साथ विवाह करने की बात

28:13

कही थी। तुमने अपने आप को नरवर के नर बच्चा कहा

28:21

था। अब तुम्हें मैं सजा देता हूं। श्रोताओं

28:26

महाराज प्रथम को फूल सिंह पंजाबी क्या सजा सुना रहा है कि देखिए तुम्हें मेरे बंदी

28:33

गृह में रहना होगा। आपके हाथ में एक चाकी दे दी जाएगी। और

28:40

5 किलो अनाज आपको रोजाना पीसना होगा। आपको

28:46

चाकी चलानी होगी। और खाने के लिए सूखी दो रोटी दी जाएंगी।

28:52

सब्जी भी नहीं होगी। जाइए इनको ले जाया जाए और जहां जिस बंदी

28:59

गृह में चाकी पीसी जाती है उस बंदी गृह में इस महाराज प्रथम को कैद कर दिया जाए।

29:06

श्रोताओं राजा प्रथम देखिए समय का प्रभाव। फूल सिंह पंजाबी ने कैद में डलवा दिया। और

29:15

एक चाखी रख दी गई और उसके सामने अनाज रख दिया गया। कि इसको पीस ले। महाराज प्रथम

29:24

की यह हालत हो गई। हाथ हथेला छूटे और बांस पीठ पर टूटे। जब महाराज प्रथम के हाथ से

29:31

वो चाकी का हथेला बोलते हैं उसको वो छूटता है और वैसे ही जो प्रहरी होते हैं वो

29:36

महाराज प्रथम की पीठ पर बांसों की मार लगाते हैं। महाराज प्रथम बंदी गृह में

29:43

चक्की पीस रहे हैं। चाकी चला रहे हैं। हाथों में छाले पड़ गए महाराज प्रथम की।

29:50

अब देखिए मंझ रानी को क्या सजा दी जाती है। श्रोताओं मंझ रानी से महाराज फूल सिंह

29:57

नरवरगढ़ की राजा की पटरानी से क्या कहने लगे? देखिए श्रोताओं ये भी समय का ही

30:03

प्रभाव है कि रानी वह बहुत उछल रही थी। मेरी पुत्री ने तुझसे क्या गलत कहा था कि

30:10

तू अकेली गंगा में विहार कर रही है। तू मेरे पिता के साथ चल। जबकि तेने मेरी बात

30:18

को नहीं मेरी पुत्री की बात को नहीं माना और मेरी पुत्री का अपमान किया। अब बताइए

30:25

तू मेरी कैद में है और मेरी घरवाली बनेगी।

30:30

अब बोल क्या क्या किया जाए तेरा? तो यह बात सुनकर के मंजा रानी कहने लगी

30:39

दुष्ट कायर राजा तू ध्यान रख मैं तेरे इस कंपिलगढ़ को धूल

30:46

में मिलवा दूंगी जब मेरा शेर इस कंपिलगढ़ पर आक्रमण करेगा

30:52

मंझ रानी की बात सुनकर के फूल सिंह पंजाबी हंसा कि तेरा शेर क्याने कोई शेर पैदा

30:59

किया था कि हां मैंने शेर पैदा कि शेर तो बनी में पैदा होते हैं। हां,

31:06

मैंने बनी में ही पैदा किया। कि शेर तो हिंस के बेड़े में पैदा होते हैं। तो मंजा

31:12

कहने लगी हां हिंस के बेड़े में ही पैदा किया था। फूल सिंह कहने लगा शेरनी का दूध

31:18

कि हां मेरे पुत्र ने शेरनी का दूध पिया है। और जब वो आएगा तो तेरा एक कंपिलगढ़

31:24

धूल में मिल जाएगा। कंपिलगढ़ में कोई रोने वाला नहीं रहेगा। यह स्थिति तेरे इस

31:30

कंपिलगढ़ की हो जाएगी। फूल सिंह पंजाबी क्रोधित हो उठा कि रानी जबान को संभाल और

31:38

अब मेरी पटरानी बनने के लिए तैयार हो जा। तो मंजा ने जब यह बात सुनी तो मंजा कहने

31:44

लगी कायर तू मुझे स्पर्श भी नहीं कर सकता। यदि स्पर्श करने का भी दुस्सा किया तो मैं

31:52

तेरा सर धड़ से अलग कर दूंगी। तू मुझे कौन जानता है?

31:57

श्रोताओं फूल सिंह पंजाबी ने मंझ रानी को बहुत परेशान किया। परंतु मंझ रानी एक भी

32:06

बात नहीं मानती है उसकी। तो फूल सिंह पंजाबी मन में विचार करता है

32:11

कि इसको बैलाया जाए और बहला के पटरानी बनाया जाए। फूल सिंह पंजाबी ने मंजा से

32:17

कहा तो बता तेरा पुत्र यदि तुझे छुड़ाने नहीं आया तो क्या करेगी? कि तब मैं तेरी

32:24

पटरानी बन जाऊंगी। तो फूल सिंह कहने लगा कितना समय लगेगा कि

32:30

छ महीने का छ महीने तक तू मेरा धर्म का पिता है और मैं तेरी धर्म की पुत्री हूं।

32:37

फूल सिंह पंजाबी कहने लगा ठीक है। मैंने बामनगढ़ के राजाओं को कैद कर लिया। कोई

32:44

ऐसा नरेश नहीं है। कोई ऐसा पैदा नहीं हुआ है जो मुझे पराजित करे। मां भवानी मेरे

32:50

साथ युद्ध करती हैं। तो मुझे तो कोई हराने वाला है ही नहीं। कि ठीक है मंजा हम तुझे

32:56

छ महीने का आश्वासन देते हैं। परंतु याद रहे छ महीने के बाद तुझे हमारी पटरानी

33:04

बनना पड़ेगा। मंजा कहती है ठीक है मैं वायदा करती हूं। श्रोताओं फूल सिंह पंजाबी

33:11

कहने लगा कि मैं आपको इस तरीके से पुत्री के महल में तो भेज नहीं सकता। आपको भी मैं

33:17

यह सजा देता हूं। छ महीने तक आपको मेरे महल पर एक बहुत लंबा बांस लेकर के

33:25

काग उड़ाने पड़ेंगे। मेरे महल पर जो कौवा आते हैं उनको उड़ाना पड़ेगा। काग उड़ानी

33:32

कर दी रानी कि जाइए एक लंबा बांस दे दीजिए इसके हाथ में और भेज दीजिए इसको महल पर।

33:39

महल के पक्षियों की सुरक्षा यह करेगी। महल पर कोई पक्षी नहीं आ जाए। कोई कौवा नहीं आ

33:46

जाए। जा श्रोताओं महारानी मंझा को जो नरवर

33:51

गढ़ की रानी थी उसको फूल सिंह पंजाबी ने एक लंबा बांस देकर के अपने महल पर काग

34:00

उड़ाने के लिए भेज दिया और कह दिया कि भोजन में दो रोटियां सुबह और दो रोटी शाम

34:05

को दी जाएंगी। अब देखिए श्रोताओं यही तो समय होता है।

34:13

श्रोताओं समय की बात होती है। समयसमय का फेर है समय बड़ा बलवान। भीलन लूटी गोपिका

34:21

जब बुई अर्जुन बेईमान श्रोताओं आपको ज्ञात होगा कि एक बार उस अर्जुन की टंकार को

34:28

सुनकर के संसार दहल जाता था। उसी अर्जुन से जब द्वारका समुद्र में डूब रही उस समय

34:36

भगवान श्री कृष्ण अपने धाम को चले गए थे तो भीलों ने पकड़ लिया था अर्जुन को।

34:41

अर्जुन से गोपिकाओं को लूट लिया। अर्जुन गांडीव को नहीं उठा सके। तो यही समय होता

34:46

है। इस संसार में सबसे बड़ा बलवान समय है। जो समय करता है वह कोई नहीं कर सकता। बड़े

34:54

से बड़ा दुश्मन नहीं कर सकता। समय की मार से कोई नहीं बच सकता। देखिए श्रोता वही

35:00

मंज रानी उस महल पर कौवा उड़ा रही है। काग

35:06

उड़ानी होकर के बांस से चारों तरफ देख रही है। महल की सुरक्षा में है। और महाराज

35:13

प्रथम बंदी गृह में चक्की चला रहे हैं। हाथों से पीसते हैं 5 किलो अन्न प्रतिदिन

35:22

और खाने के लिए दो रोटी मिलती है। अब देखिए उधर क्या होता है कि काफ़ी समय गण

35:30

गंगा पर हो गया। 60 हज़ार की सेना महाराज की गण गंगा पर समाप्त हो गई। और इधर राजा

35:40

नल और गजमोतनी अपने राजमहल में बड़े आराम से रह रहे हैं।

35:47

तो उसी रात्रि को गजमतनी ने एक स्वप्न देखा। स्वप्न देखा और स्वप्न बड़ा बुरा था। अपने

35:56

पति महाराज नल को महल में बुला लिया और राजा नल से कहने लगी कि हे महाराज मैंने

36:04

आज बड़ा भयानक सपना देखा है। राजा नल कहने लगा कहो रानी क्या स्वप्न देखा कि महाराज

36:11

स्वप्न नहीं यह सत्य है। मैंने ऐसा स्वप्न कभी नहीं देखा। मेरा स्वप्न यह झूठा नहीं

36:18

है। राजा नल कहने लगे कहो रानी कौन सा स्वप्न

36:23

है कि महाराज गढ़ गंगा पर महासंग्राम करते हुए मैंने हमारे सुसर

36:31

साहब महाराज प्रथम को देखा है। बड़ा भयंकर युद्ध हो रहा है भगवन गण गंगा पर। वहां

36:39

दोनों दोनों पक्षों की सेनाएं आमने सामने युद्ध के मैदान में डटी हुई है और उस

36:45

युद्ध में नरवरगढ़ की हार हो गई। राजा नल कहने लगे

36:51

रानी क्या तेरा दिमाग सही है? कहीं पागल तो नहीं हो गई? महाराज प्रथम को हराने वाला इस दुनिया में

36:59

कोई नहीं है। महाराज प्रथम कोई अट्टे पट्टे राजा नहीं है। महाराज प्रथम महा

37:04

बलवान है। महा पराक्रमी नरेश हैं। कि नहीं महाराज आप कह रहे हैं वो सत्य नहीं है। मैं कह

37:11

रही हूं वो सत्य है। और यहीं तक सीमित नहीं रहा। आपके माता-पिता बंदी बन चुके

37:19

हैं। दोनों को जंजीरों में जकड़ करके एक कंपिलगढ़ का राजा बंदी बना करके ले गया

37:26

है। और राजन यहीं तक सीमित नहीं रहा। मेरे स्वप्न में तो मैंने यह भी देखा कि

37:32

तुम्हारी माता उस राजा के महल पर काग उड़ा रही है और तुम्हारे पिता को बंदी गृह में

37:40

बंद कर कर दिया है और वहां वो चाकी चला रहे हैं। फटे हुए वस्त्र उसके बदन पर धारण करा दिए

37:48

गए हैं। और महाराज प्रथम उस राजा की जेल में बंद है और 5 किलो अन्न

37:55

पीसते हैं रोजाना। खाने के लिए दो सूखी रोटी दी जाती है।

38:00

तो राजा नल सोचने लगे कि रानी तुझे कुछ भ्रम हुआ है। ऐसा सत्य नहीं हो सकता। मैं

38:07

अभी सूचना भिजवाता हूं और माता-पिता की खुशखबरी गणगंगा से मंगाता हूं। वो तो 60

38:14

हजार की फौज लेकर के बड़े-बड़े योद्धाओं को साथ लेकर के गढ़ गंगा पर स्नान करने गए

38:20

थे और मेरे पिताजी को हराना इतना आसान नहीं है। कोई भी उन्हें आसानी से नहीं हरा

38:26

सकता। जब तक उनके हाथ में तलवार रहेगी तब तक उन्हें पराजित नहीं किया जा सकता। कि

38:33

नहीं महाराज मैं जो कह रही हूं वो सत्य है। कहते हैं कि मेरे पिता को कोई बंदी

38:39

नहीं बना सकता। रानी यह सब झूठ है। तुझे भ्रम हुआ है। तो गजमोतनी रानी नल से कहने

38:46

लगी कि नहीं नाथ मुझे भ्रम नहीं हुआ। मैं जो कह रही हूं वो सत्य प्रतीत होता है। तो

38:53

राजा नल कहने लगे कि कुछ सूचना तो आनी चाहिए। कोई सैनिक 60 हजार की सेना है। लाख

39:00

ब्राह्मण साथ में है। और कोई ना कोई सैनिक गुप्तचर कुछ सूचना तो लेकर के आता।

39:08

श्रोताओं अब देखिए उधर क्या होता है। गढ़ गंगा पर जब युद्ध चल रहा था तो वहां

39:17

राजा प्रथम के ब्राह्मण थे। राजपरोहित थे लाखा ब्राह्मण क्योंकि पंडित गंगाधर को

39:23

उन्होंने अपदस्त कर दिया था। हटा दिया था राजपरो के पद से। और लाखा दादा को ही

39:31

उन्होंने अपना राजपुरोहित घोषित कर दिया था। तो लाखा दादा या लाखा ब्राह्मण

39:38

वहां गंगा के घाट पर छिप जाते हैं कुछ पत्थरों की ओठ में सेना की ओठ में और जब

39:45

वो जादू से पत्थर के नहीं बने तो वहां उन पत्थरों में से निकल कर के चल देते हैं

39:53

नरवरगढ़ के लिए। राजा नल का दरबार लगा हुआ है। राजा नल दरबार में विराजमान है और उसी

40:03

समय लाखा दादा का हड़बड़ाते हुए प्रवेश। लाखा दादा हड़बड़ा रहे हैं। लाखा दादा के

40:11

जो पत्रा पोथी हैं वो भी उनके साथ नहीं है। लाखा दादा सीधे महाराज नल के पास

40:18

पहुंच जाते हैं। राजा नल ने जब लाखा ब्राह्मण को देखा तो कहने लगे कि दादा

40:24

क्या हुआ? मुझे यह बताएं। साफ-साफ बताएं तुम अकेले क्यों आए हैं? मेरे माता-पिता

40:32

मेरी 60 हजार की फौज कहां चली गई? क्या हुआ उनके साथ और वो अब तक क्यों नहीं आए?

40:39

तो लाखा ब्राह्मण कहने लगा कि बेटे नल क्या बताऊं तुझे? कुछ बताने के लिए मेरे

40:46

पास शब्द नहीं है। तो राजा नल कहने लगे दादा आप बताएं कि क्या बात है।

40:54

तो लाखा दादा ने जो गढ़ गंगा पर युद्ध हुआ था उस युद्ध का वृतांत सुना दिया और लाखा

41:02

दादा राजा नल से कहने लगे कि बेटे नरवर के

41:08

नरेशों ने कभी हार नहीं मानी। अपने प्राण दे दिए लेकिन दूसरे राजा से पराजय स्वीकार

41:15

नहीं की। वही काम आपके पिता श्री महाराज प्रथम ने किया। गढ़ गंगा पर महान युद्ध

41:21

हुआ। बड़ा भयंकर संग्राम हुआ और उस संग्राम में जब कंपिलगढ़ नरेश की कोई पेस

41:29

नहीं चली तो जादू के बल पर उसने हमारे सैनिकों को पत्थर का बना दिया और तेरे

41:36

माता-पिता को कैद करके कंपिलगढ़ ले गया। अब तो राजा नल अपनी रानी गजमोतनी की बात

41:43

को समझ जाते हैं कि यह बिल्कुल सही कहा मेरी रानी ने कि मेरे माता-पिताओं की जेल

41:50

हो गई है। श्रोताओं राजा नल ने आपातकालीन सभा बुलाई और आपातकालीन सभा में विचार

41:58

विमर्श करने लगे। आपातकालीन सभा एक विशेष सभा होती है जिसमें 10 से 20 चुनिंदा

42:06

विश्वास पात्र सैनिक सेनापति और पुरोहित

42:11

और अपने परिवारिक के सदस्य होते हैं। तो आपातकालीन सभा में विचार होने लगा कि किस

42:19

तरीके से माता-पिता की जेल को छुड़ाया जाए। अब श्रोताओं लाखा दादा जो कि विद्वान

42:26

ब्राह्मण थे। लाखा दादा कहने लगे राजन सेना सजाइए और आक्रमण कीजिए कंपिल गढ़ पर।

42:34

राजा नल कहने लगे कि कितनी फौज से काम चल जाएगा। मेरे पास 1 लाख की फौज है। लाखा

42:42

ब्राह्मण कहने लगे बेटा 1 लाख की फौज से काम चलने वाला नहीं है। क्योंकि 1 लाख की

42:49

फौज कंपिलगढ़ पर आक्रमण करके विजय नहीं हो सकती। हमारी 60 हजार की फौज थी और मैंने

42:57

स्वयं अपने नेत्रों से देखा कि 60 हजार की फौज देखते ही देखते काट के गढ़ गंगा में

43:03

बहा दी गई। अब तो श्रोताओं राजा नल सोच में पड़ गए कि

43:09

मेरे पास 1 लाख फौज है और 1 लाख से कुछ होने वाला नहीं है। तो पास में खड़ी

43:16

गजमोतनी कहने लगी कि महाराज यदि

43:23

आप अनुमति दें तो मैं आपसे एक बात कहूं तो राजा नल कहने लगे कहो रानी क्या बात है तो

43:29

रानी कह रही है कि धीरज धर्म मित्र और नारी आप तत्काल परखिए चारी कि हे महाराज

43:38

अपने धैर्य को धर्म को और नारी

43:44

नारी कहते पत्नी को और अपने मित्र को जब आपत्ति आए, आपातकाल हो, कोई विपत्ति आ

43:52

जाए, उस समय उसकी परीक्षा लेनी चाहिए। महाराज आपने कुछ समय पहले

44:00

एक श्याम नगर के राजा के पुत्र मनसुख को

44:05

अपना मित्र बनाया था। पगड़ी पलटा यार बनाया था। और आज समय है अपने मित्र की

44:12

पहचान करने की। अपने मित्र की परख करने की और उस मनसुख गुर्जर ने अपने पिता मैनपाल

44:19

सहित यह वायदा किया था कि नल जहां तेरा काम पड़ेगा जहां तेरा पसीना बहेगा वहां

44:25

हमारा खून बहा देंगे तेरे साथ मर मिटेंगे तो हे महाराज आप अपने मित्र मनसुख को परचा

44:34

लीजिए उसकी परीक्षा ले लीजिए यदि वो लड़ने के लिए तैयार है तो उसके पास 1 लाख की फौज

44:41

है और 1 लाख की फौज लेकर के वो हमारा साथ दे। हमारे माता-पिता की जेल छुड़ाने में

44:48

हमारी मदद करें। अब श्रोताओं राजा नल को याद आ गई अपने मित्र की। देखिए ये कथा मैं

44:55

अलग से सुना दूंगा कि मनसुख गुर्जर से राजा नल की मित्रता कैसे हुई थी। वो एक अलग वीडियो में बता दूंगा। तो राजा नल ने

45:05

आपातकालीन सभा में एक पत्र वाहक को बुलाया। पत्र ले जाने वाले को बुलाया और

45:12

एक कागज मंगाया। उस कागज पर राजा नल ने

45:18

महाराज मैनपाल के पुत्र मनसुख को देखिए महाभारत में भी मनसुख

45:25

गुर्जर का वर्णन किया गया है। ऋतुपर्ण के नाम से। वही मनसुख गुर्जर को महाराज नल एक

45:35

पत्र लिख रहे हैं और पत्र में पूरा वृतांत लिख दिया कि कंपिलगढ़ के फूल सिंह पंजाबी

45:41

ने हमारे माता-पिता को कैद कर लिया है। हे मित्र यदि तुम सच्चे मित्र हो तो 1 लाख की

45:49

फौज को लेकर के चार दिन बाद बंगाल के बॉर्डर पर मिल जाइए। जहां बंगाल देश है

45:58

उसके बॉर्डर पर मिल जाइए। वहां से हम आगे जब आप आ जाएंगे तभी ही कूच

46:03

करेंगे कंपिलगढ़ की तरफ। श्रोताओं यह पत्र लिख दिया। नीचे अपने मोहर और हस्ताक्षर

46:10

लगा के राजा नल ने उसे पत्रवाहक को दे दिया और पत्रवाहक को भेज दिया श्याम नगर

46:18

के लिए। अब श्रोताओं पत्रवाहक तो श्याम नगर को चला जाता है पत्र देने के लिए। इधर

46:25

राजा नल ने लाखा दादा को आदेश दे दिया कि दादा 1 लाख की फौज को सजाइए।

46:31

लाखा दादा ने फौज को आदेश दे दिया और देखिए श्रोताओं राजा नल की फौज तैयार

46:40

हो रही है। सज जाओ सज जाओ मेरे शहजादे अब क्यों राखी देर लगाए। ये आला में वर्णित

46:46

होता है इस तरीके से। और देखिए श्रोताओं जो जितनी भी फौज थी

46:54

राजा नलकी वो सज जाती है। युद्ध के लिए तैयार हो जाती है। झिलम टोप बख्तर पहन पहन

47:00

कर के योद्धा युद्ध के लिए तैयार हो रहे हैं। इधर राजा नल और गजमोतनी रानी दोनों

47:09

विचार विमर्श कर रहे हैं। गजमोतनी रानी बड़ी विद्वान थी। श्रोताओं घूमासुर दाने

47:15

की पुत्री थी। 14 विद्या निधान थी। राजा नल से कहने लगी कि महाराज माता-पिता की

47:23

जेल छुड़ाने में मैं भी आपके साथ चलूंगी। राजा नल कहने लगा रानी क्या तेरा दिमाग

47:29

सही है कि महाराज मेरा दिमाग सही है यदि मैं आपके साथ चली गई तो आप निश्चित ही

47:36

अपने माता-पिता की जेल छुड़ाने में समर्थ हो जाओगे। और यदि मैं आपके साथ नहीं गई तो

47:42

महाराज आप 2 लाख की फौज तो क्या 50 लाख की

47:47

फौज से भी माता-पिता की जेल नहीं छुड़ा सकती। राजा नल कहने लगा रानी क्यों कि

47:53

महाराज रास्ते में बंगाल देश पड़ेगा। पूर्ण रूप से जादू से भरा हुआ क्षेत्र है।

48:01

वहां पर एक से एक बड़ा जादू है। वहां के राजाओं के साथ वहां की जो खेरे की देवियां

48:10

होती हैं जिनको चंडी कहते हैं वो युद्ध करती हैं। राजाओं के साथ लड़ती हैं। और

48:17

उनकी जो स्त्रियां हैं, उनकी पुत्री हैं, वो जादुओं में पारंगत हैं। किसी भी समय

48:24

युद्ध का पासा पलट सकती हैं। इसलिए राजन मुझे आप अपने साथ ले चलिए। परंतु राजा नल

48:31

कहने लगे नहीं रानी जब मेरा मित्र मनसुख आएगा और उसे पता चल गया कि मैं रानी

48:38

गजमोतनी को युद्ध भूमि में साथ लेकर आया हूं तो वो रिस हो के नाराज होकर के वापस

48:44

लौट जाएगा। मेरा साथ नहीं देगा। बंगाल के बॉर्डर से अपनी सेना को वापस ले आएगा। तो

48:51

नल की बात सुनकर के गजमोतनी राजा नल से कहने लगी कि महाराज मैं यह

48:58

मर्दाना भष धारण करूंगी ये जनाना बाना उतार दूंगी जनाना भष धारण नहीं करूंगी और

49:05

तुम्हारा मित्र मुझे पहचान नहीं पाएगा श्रोताओं नल कहने लगा रानी देखिए औरत और

49:12

आदमी इन दोनों में ईश्वर ने बड़ा अंतर बनाया है तू पहचान अवश्य पड़ जाएगी कि

49:18

नहीं महाराज कि रानी तेरे केशों को कहां छिपाएगी? महाराज रानी कहने लगी कि मैं ऐसा

49:27

छत्र धारण करूंगी कि मेरे केश दिखाई नहीं देंगे। रानी तेरे नेत्र इनको कहां ले

49:34

जाएगी कि नहीं महाराज मैं नेत्रों में काजल नहीं लगाऊंगी कि हे रानी तुम्हारा ये

49:41

जो छाती है ये ऊंची उठी हुई है इस छाती को कहां छुपाओगी कि महाराज मैं ऐसा बख्तर

49:48

धारण करूंगी जो मेरी छाती दिखाई नहीं देगी। देखिए महाराज मैं पूर्णत मर्दाना

49:53

भेष धारण करूंगी। कोई भी मुझे पहचान नहीं सकता कि मैं गजमतनी हूं। और मैं यदि आपके

50:00

साथ युद्ध भूमि में चली गई तो राजन आप जानते हैं कि इस संसार में इस वक्त मेरे

50:07

समान विद्या में कोई भी परिपूर्ण नहीं है। मैं 14 विद्या जानती हूं। संपूर्ण जादू

50:14

मेरे साथ रहता है। श्रोताओं राजा नल और गजमोतनी दोनों आपस में विचार विमर्श करके

50:21

राजा नल अनुमति दे देते हैं गजमोतनी को कि गजमोतनी जाइए पुरुषों का बाना धारण कीजिए।

50:28

देखिए श्रोताओं भारत में यह भारत ऐसी भूमि है जहां वीरांगनाओं की कमी नहीं रही। एक

50:35

से एक बढ़कर के वीरांगनाएं प्राचीन काल से ही होती चली आई। वही गजमोतनी

50:42

पुरुषों का बाना धारण कर लेती है। बन जाती है एक पुरुष

50:48

दिखाई देती है एक महान योद्धा की तरह। और इधर महाराज नल अपनी सेना का निरीक्षण कर

50:55

रहे हैं। लाखा दादा ने सेना को तैयार कर दिया है और राजा नल देख रहे हैं अपने

51:01

सैनिकों को अपनी व्यवस्थाओं को और लाखा दादा से कहने लगे कि दादा यदि आपकी अनुमति

51:08

हो तो सेना को कूच का आदेश दे दिया जाए। लाखा दादा कहने लगे कि देखिए बेटे नल

51:17

कच का आदेश तो मैं दे रहा हूं पर अभी एक घड़ी इंतजार कीजिए शुभ समय की प्रतीक्षा

51:24

कीजिए क्योंकि मार्ग में बंगाल का बॉर्डर पड़ेगा कंपिलगढ़ के लिए जो मार्ग जाता है

51:31

वो बंगाल से निकलता है और जब हम बंगाल में प्रवेश करेंगे तो वहां आप जानते हैं राजन

51:38

वहां जादू का क्षेत्र है और उस जादू साधु के क्षेत्र में हमारा विजय होना संभव नहीं

51:44

है। इसलिए शुभ समय पर हम यहां से पयान करेंगे। श्रोताओं राजा नल लाखा दादा के

51:52

कथन अनुसार एक घड़ी इंतजार करते हैं और अपनी सेना का पूरा जायजा लेते हैं। अपनी 1

52:00

लाख की फौज के साथ राजा नल और गजमोतनी घोड़ों पर सवार होकर के कच कर देते हैं

52:08

बंगाल के बॉर्डर की तरफ। सेना राजा नल की चली जा रही है अपने माता-पिता की कैद को

52:14

छुड़ाने के लिए। अब देखिए श्रोताओं इधर क्या होता है। जब वो पत्रवाहक

52:23

महाराज मनसुख गुर्जर के दरबार में पहुंचा। श्याम नगर में पहुंचा और उसने अपना पत्र

52:31

मनसुख गुर्जर को दे दिया। तो मनसुख गुर्जर ने जब पत्र को पढ़ा तो श्रोताओं मनसुख

52:39

गुर्जर के नेत्रों से आंसुओं की झड़ी लग गई। सैनिक और सेनापति राजपुरोहित पूछने

52:46

लगे कि महाराज क्या हुआ? तो मनसुख गुर्जर कहने लगा कि आज मेरे

52:53

मित्र पर बहुत बड़ा संकट है। मेरे मित्र के माता-पिताओं की कैद हो गई है और मैं

53:02

युद्ध भूमि में मित्र की सहायता के लिए जाना चाहता हूं। कुछ राजपुरोहित और कुछ

53:07

सेनापतियों ने इस बात का विरोध किया कि महाराज आप इतना बड़ा खतरा उठा रहे हैं कि

53:15

अपने मित्र के लिए अपना समस्त न्योछावर करने जा रहे हैं। युद्ध भूमि में अपनी

53:21

संपूर्ण सेना को झोंक रहे हैं। तो मनसुख गुर्जर क्या कहने लगा? मनसुख गुर्जर ने

53:27

कहा कि जो ना मित्र दुख होए दुखारी ते विलोकत पातक भारी।

53:33

अर्थात इस दुनिया में मित्रों का कई तरीका होता है। चार तरीके के मित्र होते हैं।

53:40

श्रोताओं आपको बताना चाहूंगा। एक मित्र तो ऐसा होता है जो पैसे के लिए दोस्ती करता

53:46

है। कोई पैसे वाला है और दूसरा आदमी सोच

53:52

रहा है कि इससे पैसे लेकर के काम चलाऊं तो वो उससे दोस्ती करेगा।

53:57

दूसरे तरीके का मित्र होता है। किसी के घर कोई सुंदर पत्नी लड़की या कोई औरत है तो

54:07

उसके चक्कर में दोस्ती करता है। और तीसरे तरीके का मित्र ऐसा होता है जो कि एक

54:16

सामाजिक तरीके से मित्रता करता है। और चौथे तरीके का मित्र ऐसा होता है जो मित्र

54:23

के लिए अपने प्राण दे सकता है। तो मनसुख गुर्जर कहने लगा कि मैं चौथे नंबर वाला

54:31

मित्र हूं। मैं मेरे मित्र के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दूंगा। परंतु मित्र के

54:37

माता-पिताओं को कैद से मुक्त कराऊंगा। अपने सेनापति को आदेश दिया कि सेना को

54:43

सुसज्जित किया जाए। युद्ध के बाजे बजवाए जाए और कुछ किया जाए बंगाले की तरफ। मेरे

54:51

मित्र को चार दिन बाद बंगाले के बॉर्डर पर मुझे मिलना है। सेना सहित शीघ्रता से सेना

54:58

को तैयार किया जाए। श्रोताओं मनसुख का आदेश सुनकर के

55:06

गुर्जरों की सेना सुसज्जित हो रही है। समस्त योद्धा झिलम टोप बख्तर पहन पहन करके

55:14

अपने आप को युद्ध के लिए सुसज्जित कर रहे हैं। हाथी, घोड़ा फौज, पलटन सब कुछ तैयार

55:22

कर रहे हैं। श्रोताओं, जब सेना संपूर्ण रूप से तैयार हो गई। 1 लाख सैनिक तैयार हो

55:30

गए तो राजा मनसुख श्यामनगर का नरेश अपनी 1 लाख की फौज को

55:38

आदेश दे देते हैं कि कोच किया जाए बंगाल की बॉर्डर की तरफ बंगाल के बॉर्डर पर मेरा

55:44

मित्र मेरी प्रतीक्षा कर रहा है। अब देखिए श्रोताओं इधर राजा नलकी सेना बंगाले के

55:52

बॉर्डर पर आ गई। गजमोतनी ने आदेश दे दिया सैनिकों को कि कोई भी यदि बंगाल के बॉर्डर

55:58

के भीतर चला जाएगा तो वो वापस नहीं आ सकता। ध्यान रखें बिना मेरी अनुमति के

56:04

क्योंकि ये जादुई क्षेत्र है। श्रोताओं गजमोतनी

56:10

राजा नल दोनों विचार कर रहे हैं। गजमोतनी कह रही है कि महाराज तुम्हारा कोई मित्र

56:17

नहीं है। तुम तो केवल एक झूठे मित्र के फंदे में फंस गए थे। तुम्हारा मित्र नहीं

56:23

आ सकता। कौन मरवाएगा अपनी सेना को? ऐसा कौन है जो

56:29

स्वयं अपनी जान को जोखिम में डालेगा? हे राजन हमें 1 लाख की फौज से ही कंपिलगढ़ को

56:36

विजय करना है। कंपिलगढ़ को जीतना है। तो

56:41

श्रोताओं इधर श्याम नगर के नरेश महाराज मनसुख गुर्जर भी अपनी 1 लाख की फौज को

56:50

लेकर के सुसज्जित होकर के रण के बाजे बजवाते हुए चल देते हैं बंगाले की बॉर्डर

56:56

की तरफ। जहां राजा नर अपनी सेना के साथ पड़े हुए

57:02

थे। तीन दिन का लगातार सफर करके चौथे दिन

57:07

मनसुख गुर्जर बंगाले के बॉर्डर पर पहुंच जाते हैं। जहां राजा नल अपनी सेना के साथ

57:14

पड़े हुए हैं। इंतजार कर रहे थे अपने मित्र मनसुख गुर्जर के आने का। जब राजा

57:23

नल्ल मनसुख गुर्जर को आते हुए देखा तो अपनी रानी गजमोतनी से कहने लगी कि गजमोतनी

57:30

देखिए मेरा मित्र मनसुख आ गया है। 1 लाख

57:35

गुर्जर योद्धाओं के साथ युद्ध भूमि में बलिदान होने के लिए तैयार है। मेरे साथ

57:42

मरने के लिए तैयार है। मित्र हो तो मनसुख जैसा। मित्रता की एक परम मिसाल है मेरा

57:49

मित्र। श्रोताओं दोनों मित्रों आकर के बहा फैला के भुजा पसार करके मिले।

57:57

एक दूसरे से मिलने के बाद कुशलक्षेम पूछने के बाद दोनों मित्र आपस में विचार विमर्श

58:05

करने लगे। गजमोतनी भी दूर से देख रही है

58:10

कि यह क्या बातें कर रहे हैं। श्रोताओं मनसुख गुर्जर मन में विचार करके कहने लगा

58:17

कि मित्र मेरी सेना 1 लाख की है परंतु मुझे तेरा कुछ विश्वास नहीं है क्योंकि

58:23

तेरे 60 हजार योद्धा तो गढ़ गंगा पर मारे जा चुके हैं। मैं तेरी सेना का जायजा लेना

58:29

चाहता हूं। तेरी सेना का निरीक्षण करना चाहता हूं कि तेरे पास कैसे-कैसे योद्धाएं। तो नल कहने लगा ठीक है। मनसुख

58:38

कीजिए मेरी सेना का निरीक्षण। तो मनसुख गुर्जर राजा नल की सेना का

58:44

निरीक्षण कर रहा है। देख रहा है सैनिकों को कि कौन कैसा योद्धा है और सैनिकों का

58:51

निरीक्षण करतेकरते श्रोताओं उसका ध्यान गजमोतनी पर ठहर जाता है। जब गजमोतनी पर

59:00

ध्यान ठहरा तो राजा नल से मनसुख कहने लगा कि इस

59:05

योद्धा को कहां से लाए हो आप? वास्तव में वाकई में बहुत बड़ा योद्धा दिखाई पड़ता

59:11

है। गोरा शरीर है। बिल्कुल मोटाजा बदन है इसका। इस योद्धा को

59:18

आप कहां से लेकर आए? तो नल कहने लगा कि इस योद्धा को मैंने अभी कुछ दिन पहले ही

59:25

भर्ती किया था। बड़ा वफादार सैनिक है और यह मेरे सेनापतियों के पद पर है। मैंने

59:32

इसे धीरे-धीरे सेनापति का पद दे दिया है। यह एक टुकड़ी की कमान संभालता है। तो

59:38

मनसुख गुर्जर कहने लगा कि मित्र युद्ध करने तो हम चल रहे हैं। परंतु तुम्हें इस

59:46

सिपाही को मुझे देना होगा। नल सोचने लगा कि यह तो मेरी पत्नी को मांग रहा है। तो

59:52

नल बोला कि नहीं भाई इस सिपाही को तो मैं नहीं दे सकता। मनसुख कहने लगा इसके बदले

59:59

मैं तुझे 1000 सैनिक दूंगा। पर यह सिपाही मेरे साथ रहना चाहिए। इसे मैं मेरा

1:00:06

बॉडीगार्ड नियुक्त करना चाहता हूं। अंगरक्षक बनाना चाहता हूं। नल कहने लगा कि

1:00:11

नहीं मैं 1000 में भी नहीं दूंगा। मनसुख गुर्जर ने कहा 10,000 सैनिक दूंगा लेकिन

1:00:18

इस सैनिक को मुझे दे दीजिए। तो नल ने फिर भी मना कर दिया और जब नल ने मना किया तो

1:00:25

मनसुख ने विचार किया कि मैं तो तेरे लिए लड़ने को और मर मिटने को तैयार हूं। तू एक

1:00:31

जवान के लिए नाट गया मुझसे। मना कर दिया। इसलिए तेरी मेरी यारी खत्म होती है। मैं

1:00:37

मेरी सेना लेकर के वापस जा रहा हूं श्याम नगर को। अब राजा नल के पास कोई जवाब नहीं

1:00:43

था। राजा नल कहने लगा कि मित्र ऐसा मत कीजिए कि नहीं मुझे यह सैनिक चाहिए। मैं

1:00:51

यह सैनिक मेरे अंगरक्षक के लिए नियुक्त करता हूं। श्रोताओं

1:00:57

मनसुख गुर्जर नाराज होकर के अपने सैनिकों को लौटने का आदेश दे देता है। तभी नल कहने

1:01:04

लगा मोतनी से कि तू नहीं मानी। तेने मेरा मित्र भी नाराज कर दिया। अब क्या करूं? तो

1:01:12

गजमोतनी कहने लगी कि तेरे मित्र को मैं मनाऊंगी। श्रोताओं

1:01:17

गजमोतनी मनसुख गुर्जर को पीछे से आवाज लगा रही है। और घोड़ा पर दौड़ के मनसुख गुर्जर

1:01:25

को आगे से घेर लीजिए। जब मनसुख गुर्जर ने गजमोतनी की आवाज सुनी तो पहचान गया। कहने

1:01:34

लगा कि भाभी इस भष में तुम कि हां

1:01:39

तो मनसुख कहने लगा कि अब तो मैं बिल्कुल नहीं जाऊंगा कि क्यों कि मैं स्त्रियों को

1:01:45

साथ लेकर के युद्ध भूमि में जाऊं ये मुझे शोभा नहीं देता। क्षत्रियों का बाना धारण

1:01:51

किया है हमने। हम स्त्रियों को युद्ध भूमि में साथ नहीं ले जाते। मित्र नल तुमने ये

1:01:56

क्या किया? तुम भाभी को युद्ध के मैदान में ले आए। तो गजमोतनी कहने लगी देखिए

1:02:02

देवर तुम नहीं जानते कि यहां से आगे बंगाल देश आरंभ हो रहा है। बंगाल की सीमा पर

1:02:10

हमारे फौजी डेरा लगे हुए हैं। यहां से आगे का क्षेत्र जादू का है और इस

1:02:17

क्षेत्र में आप मेरे बिना कभी भी विजय प्राप्त नहीं कर सकते। आप कहीं बकरा

1:02:24

मुर्गा या तोता बन के पिंजों में कहीं बाड़ों में मिलेंगे। आप युद्ध भूमि तक

1:02:31

पहुंच ही नहीं सकते। कंपिलगढ़ तक जा नहीं सकते। अब तो मनसुख गुर्जर के दिमाग में

1:02:37

बात बैठी। मनसुख गुर्जर भी जानता था कि गजमोतनी 14 विद्या निधान है। श्रोताओं

1:02:43

गजमोतनी के समझाने पर मनसुख गुर्जर गजमोतनी को साथ लाने की अनुमति स्वीकार कर

1:02:51

लेते हैं और वहीं अपनी सेना को वापस बुलाने बुला लेते हैं। अब श्रोताओं उन

1:02:58

चारों में क्योंकि चारों बड़े अधिकारी थे। राजा नल, गजमोतनी,

1:03:03

लाखा ब्राह्मण और मनसुख गुर्जर चारों एक तंबू में बैठे हुए हैं। एक शिविर में बैठे

1:03:10

हुए हैं और चारों में मंत्रणा चल रही है कि किस तरीके से कंपिलगढ़ को जीता जाए। अब

1:03:18

देखिए गजमोतनी मन में विचार करने लगी कि ये तीनों ये नहीं चाहते थे कि मैं इनके

1:03:25

साथ आऊं। तो मुझे अब इनकी परीक्षा लेनी चाहिए। दूसरा दिन हुआ तो गजमोतनी ने लाखा

1:03:33

ब्राह्मण से कहा कि पंडित जी तुम यह नजदीक

1:03:38

शहर है इस बंगाले में। इस बंगाल के इस शहर को चले जाइए। बंगाले को जाइए आप और यहां

1:03:46

से मेरे बालों के लिए आप चमेली का तेल लेकर के आओ। यहां कोई तेली का घर मिल

1:03:53

जाएगा और उस तेली के घर से मुझे चमेली का तेल लेकर के आना।

1:03:59

यहां बंगाल के इस शहर का तेल प्रसिद्ध है, नामी है। श्रोताओं लाखा दादा मन में विचार

1:04:06

करने लगे कि ठीक है बेटी मैं इस बहाने से इस शहर को भी देख आऊंगा। यहां के हालचाल

1:04:13

भी जान लूंगा। यहां की जनता को देख आऊंगा कि यहां कैसी जनता है। चलो और तेरे लिए

1:04:19

मैं चमेली का तेल ले आऊंगा। लाखा ब्राह्मण और राजा नल मनसुख और गजमोतनी से अनुमति

1:04:28

लेकर के बंगाल के लिए चल देते हैं। बंगाल में जब लाखा ब्राह्मण ने प्रवेश किया

1:04:37

तो चला जा रहा है। कई मार्गों से गुजरते हुए उसने देखा कि तेली का घर नहीं मिल रहा

1:04:45

है। श्रोताओं पहले तेल की बिक्री तेली के यहां ही होती थी। खोजते खोजते पूछते पूछते

1:04:53

लाखा ब्राह्मण तेली के घर पहुंच जाता है। तेली के घर पहुंचा तो वह देखा कि आदमी कोई

1:05:00

नहीं था। व्यक्ति कोई नहीं था। कुछ औरतें बैठी हुई एक कमरे में बात कर रही थी। चौ

1:05:08

पर औरतें बैठी थी और वह आपस में बात कर रही थी। तो लाखा दादा उन औरतों के पास

1:05:14

पहुंच जाता है और उनसे कहने लगा कि मैं ब्राह्मण हूं। तो वे औरत कहने लगी कि हे

1:05:22

पंडित जी आप हमारी हस्तरेखा देखिए। लाखा पंडित जी उन तेलनों के यहां हस्तरेखा देख

1:05:30

रहे हैं और उनको बैला रहे हैं। अपने पांडित्य का प्रभाव जमा रहे हैं। परंतु

1:05:37

देखिए श्रोताओं तभी एक तेली की लड़की जो 14 विद्या निधान थी। जादू महा जादूगरनी

1:05:44

थी। वो महा जादूगरनी तेली की लड़की बाहर निकल के आई और उसने जब लाखा ब्राह्मण को

1:05:51

देखा तो मन में विचार करने लगी कि ये आदमी बंगाल देश का नहीं है। हमारे देश में ऐसे

1:05:58

व्यक्ति नहीं होते। यह तो अलग ही व्यक्ति है। इसका पहनावा अलग है। इसकी बोली भाषा

1:06:04

अलग है। ये तो कहीं दूसरे देश का है। और मुझे एक बकरे की आवश्यकता है। मैं इसको

1:06:13

बकरा बना देती हूं। अब देखो श्रोताओं उस लड़की ने अपने जादू का झोला निकाला।

1:06:22

मंत्र को अभिमंत्रित किया और उड़द पढ़ करके फेंक दिए लाखा ब्राह्मण पर। और लाखा

1:06:29

ब्राह्मण बकरा बन गया। बकरा बना के लाखा ब्राह्मण को मूंद दिया बकरियों में। लाखा

1:06:36

ब्राह्मण बकरियों में मुंद गए। अब देखिए श्रोताओं लाखा ब्राह्मण तो वहां बकरियों

1:06:42

के खिरक में मुदे हुए हैं। और इधर जब दो चार घंटे का समय निकल गया तो गजमतनी मनसुख

1:06:51

गुर्जर से कहने लगी कि देवर ब्राह्मण को गए काफी समय हो गया और न जाने वो क्यों

1:06:57

नहीं लौटे। लाखा दादा तो बातचीतों में बहुत निपुण हैं। कहीं बात करने लग गए

1:07:03

होंगे और हमें तो बहुत आगे चलना है। कंपिलगढ़ तक जाना है। तुम जाओ और शीघ्रता

1:07:09

से लाखा दादा को लेकर के आओ। श्रोताओं गजमोतनी की बात सुनकर के मनसुख कहने लगा

1:07:16

ठीक है भाभी मैं जा रहा हूं। तो मनसुख गुर्जर अपने भाई नल से कह के कि मैं अभी

1:07:23

दो घंटे में वापस लौटता हूं। श्रोता वो चल देता है। चला जा रहा है। खोज रहा है अपने

1:07:30

ब्राह्मण लाखा दादा को। परंतु उस बंगाली शहर में लाखा दादा का कोई अता पता नहीं

1:07:37

है। लाखा दादा का कहीं कोई ठिकाना नहीं मिल रहा है। खोजते खोजते चला जा रहा है।

1:07:43

और तभी वो निकल रहा था धोबियों के घर के सामने से। एक धोबियों का घर था और वहां से

1:07:52

निकल रहा था। तो वहां कुछ धोबी की धोबियों की स्त्रियां बैठी हुई थी। बंगाले की

1:07:57

स्त्री बड़ी जादूगरनी होती थी। तो उनमें से एक स्त्री ने देखा कि कितना सजीला युवक

1:08:04

है। कोई राजकुमार प्रतीत होता है। और मेरे पास एक गधे की कमी है। तो क्यों ना इसको

1:08:12

गधा बना लिया जाए और रात को इसे आदमी बना लूंगी। ये सोच कर के धोबी की लड़की ने

1:08:19

अपने जादू का झोला निकाला। मंत्र को आमंत्रित किया महाकाली का नाम लेकर के

1:08:26

मंत्र को छोड़ दिया मनसुख गुर्जर पर श्रोताओं मंत्र जैसे ही मनसुख गुर्जर पर

1:08:32

चला आकर के टकराया और मनसुख गुर्जर का शरीर बदल कर के गधा बन गया और धोबिनों ने

1:08:41

पकड़ करके उसको बांध दिया। अब श्रोताओं मनसुख गुर्जर भी गधा बने हुए

1:08:48

धोबियों के घर बंध रहे हैं। अब सुनिए ध्यान से जब दो से तीन घंटा मनसुख गुर्जर

1:08:55

को हो गए तो गजमोतनी तो जान रही थी सब चीज कि लाखा दादा तो वहां बकरा बन गए हैं। और

1:09:04

मनसुख गधा बन गया है। इसको ज्यादा सजा मिलनी चाहिए क्योंकि यह बहुत भाग रहा था

1:09:11

कि मैं मंझा को कि मैं गजमोतनी को साथ नहीं ले जाऊंगा।

1:09:16

इसलिए इन दोनों को सजा मिलना जरूरी था। परंतु अब महाराज

1:09:21

नल का नंबर है। मेरे पति का नंबर है। क्योंकि ये भी मुझे लाना नहीं चाहते थे।

1:09:27

तो गजमोतनी नल से कहने लगी कि देखिए महाराज

1:09:32

माता-पिता हमारे जेल में मुदे हैं। लाखा ब्राह्मण और मनसुख गुर्जर को क्या पता उन

1:09:39

वो क्या जाने दूसरे का कष्ट। वो तो हमारे साथ सेना लेकर के आ गए शर्मा शर्मी। नहीं

1:09:46

तो वो तो निश्चिंत है। सुबह के गए हैं और साझ होने को आ गई लेकिन अभी से कहीं लौटने

1:09:53

का नाम तक नहीं है। कोई अता पता नहीं है उनका। तो महाराज हे पतिदेव आप जाइए और

1:10:01

लाखा ब्राह्मण को और मनसुख गुर्जर को दोनों को आप लेकर के आइए। नल कहने लगा

1:10:07

रानी देख मैं जा रहा हूं। ठीक है। पर तू इस सेना का निरीक्षण करते रहना। सेना की

1:10:14

हेयर कमांडर इस समय तू है। तुझे ध्यान रखना है सेना को युद्ध के लिए हाई अलर्ट

1:10:21

मोड़ पर रखना है। तैयार रखना है। कोई किसी भी तरीके की स्थिति हो तो युद्ध के लिए

1:10:28

तैयार रहना है। गजबतनी कहने लगी महाराज आप चिंता ना करें। मैं एक दाने की पुत्री हूं

1:10:35

और मैं समस्त विद्याओं की ज्ञाता हूं। युद्ध कला में भी निपुण हूं। तलवारबाजी

1:10:40

में भी निपुण हूं और जादू में मेरा मुकाबला नहीं। श्रोताओं गजमोतनी और नल से

1:10:45

और कहने लगी कि देखिए महाराज आज मेरे पान समाप्त हो गए तो आप मुझे दो पान ले आना।

1:10:53

तो नल कहने लगा ठीक है मैं जा रहा हूं मनसुख को खोजूंगा और लाखा दादा को खोजना

1:10:59

है और तुझे दो पान ले आऊंगा। नल भी बंगाल शहर को चला जाता है। चला जा रहा है शहर

1:11:07

में। खोज रहा है लाखा दादा को और मनसुख गुर्जर को। परंतु दोनों का उस शहर में कोई

1:11:14

ठिकाना नहीं मिल रहा है। कोई अता पता नहीं है। खोजते-खोजते चला जा रहा है। तो एक चौराहे पर एक लड़की

1:11:24

पान की दुकान पर बैठी हुई थी। बड़ी सुंदर लड़की थी। राजा नल मन में विचार करने लगा

1:11:31

कि चलो पहले पान खरीद लेता हूं। गजमोतनी ने पान मंगाया है। उसको पान खरीद लूं और

1:11:39

एक पान मैं खा लेता हूं। तो यह सोच कर के राजा नल पान खरीदने के लिए उस लड़की के

1:11:47

पास दुकान पर आ जाता है और उस लड़की से कहने लगा कि दो पान तो मुझे एक कागज की

1:11:55

पुड़िया में बंद कर दीजिए, पैक कर दीजिए और एक पान मुझे खिला दीजिए। तो लड़की कहने

1:12:01

लगी ठीक है लड़की पहचान जाती है कि कितना सुंदर ऐसा सुंदर राजकुमार है किसी देश के

1:12:09

राजा का लड़का है और यदि यह मुझे मिल जाए इसके साथ मेरा विवाह हो जाए तो मेरा जीवन

1:12:16

धन्य हो जाए श्रोताओं वो लड़की ये विचार करके उसे पान बना रही है। पान को पान के

1:12:24

पत्ते निकाले तंबाकू डाली, सुपारी डाली, शहद लगाया और

1:12:30

पान बना करके पान पर अभिमंत्रित करके उड़द

1:12:35

डाल दिए। मंत्र चला दिया। और राजा नल से कहा कि लो पहले आप पान खाइए और बाद में आप

1:12:43

पान ले जाना। तो राजा नल समझ नहीं पाया। राजा नल ने उस पान को मुंह में दबाया और

1:12:50

जैसे ही पान की पीक मुंह के अंदर गई श्रोता वो राजा नल तोता बन गई और राजा नल

1:12:59

तोता बना उस लड़की ने पकड़ा और एक पिंजरे में बंद कर दिया राजा नल चिचर रही चिचचिर

1:13:07

उस पिंजरे में कभी ऊपर चढ़ता है कभी नीचे गिरता है टिटा रहा है राजा नल राजा नल

1:13:14

कहने लगा मन में सोच रहा है कि यही हाल लाखा दादा का और मनसुख का होगा। यही तो

1:13:22

कारण है कि वह इतने समय से नहीं लौटे। पर अब माता-पिता की जेल का क्या होगा?

1:13:29

माता-पिता की जेल तो क्या हमको ही बंगाले से अब कौन छुड़ाएगा?

1:13:34

अब क्या किया जाए? मैं तो यहां इस लड़की ने तोता बना दिया। श्रोताओं राजा नल उस

1:13:42

पिंजरे में कभी तो पिंजरे की डंडियों को पकड़ता है। कभी फड़फड़ाता है, कभी बाहर

1:13:48

निकलने की कोशिश करता है। परंतु वह लड़की

1:13:53

टस से मस नहीं हुई। अब तोता उसमें बैठा हुआ है। हैरान हो गया और उस पिंजरे में

1:13:59

आराम से बैठा है। अब देखिए श्रोताओं जब काफी समय हो गया तो गजमोतनी ने मन में

1:14:07

विचार किया कि अब मेरे वीरों को बुलाया जाए। गजमोतनी महा जादूगरनी थी। तो गजमोतनी

1:14:14

ने अपने वीरों का स्मरण किया। गजमोतनी के पास आठ वीर बताते हैं। हीरे राजे के पास

1:14:22

72 वीर बताते हैं। तो गजमोतनी ने अपने वीरों को याद किया और चार वीर हाजिर हो

1:14:29

गए। गजमोतनी से कहने लगे कहो रानी आपने हमें किस लिए बुलाया कि वीरों आप ये देख

1:14:36

के आओ कि मनसुख लाखा दादा और हमारे पति महाराज राजा नल

1:14:44

कहां पर है? उनका कुछ पता लगाइए। श्रोताओं चारों वीर बंगाली शहर के लिए दौड़ गए।

1:14:53

बंगाल शहर में खोज रहे हैं। और कुछ समय बाद एक वीर ने देखा कि मनसुख तो धोबियों

1:15:01

के घर गधा बना हुआ बैठा है। और एक वीर ने दूसरे ने देखा कि जो लाखा

1:15:09

दादा है वो बकरियों के बाड़े में बंद है और आराम से बैठा हुआ है। और राजा नल

1:15:18

एक पिंजरे में तोता के रूप में बंद है। और उसमें टाई पुकार रहा है। पिंजरे को काटने

1:15:27

का प्रयास कर रहा है। परंतु कुछ नहीं कर सकता। चारों वीर कुछ समय में ही तीनों का

1:15:34

पता लगा करके गजमोतनी के सामने उपस्थित हो गए। और गजमोतनी से कहने लगे कि देखिए रानी

1:15:43

मनसुख तो गधा बना हुआ बैठा है धोबियों के घर। और लाखा दादा लाखा दादा बकरा बन गए

1:15:53

हैं और रहे महाराज नल वो एक तोता बने हुए एक पिंजरे में बंद हैं।

1:16:00

तो गजमोतनी उन वीरों से कहने लगी कि देखो वीरों मैं आपको मेरी सेना की सुरक्षा के

1:16:06

लिए छोड़ कर जा रही हूं। मुझे जाना होगा। क्योंकि आप तो उन्हें छुड़ा के नहीं ला

1:16:11

सकते। मैं स्वयं जाऊंगी। और मैं उन तीनों को छुड़ा करके लाऊंगी। तुम मेरी सेना की

1:16:19

सुरक्षा करना। सेना पर कोई आक्रमण ना कर दे। तो आठों वीर मंज

1:16:26

रानी गजमोतनी से कहने लगे कि देखिए रानी तुम निश्चिंत हो के जाओ तुम्हारी सेना की

1:16:32

सुरक्षा व्यवस्था हम संभालेंगे। श्रोताओं गजमोतनी उन वीरों के हवाले अपनी सेना की

1:16:40

व्यवस्था छोड़कर के श्रोताओं गजमोतनी ने वीरों को वहां

1:16:46

तैनात कर दिया। सेना की सुरक्षा में तैनात कर दिया और स्वयं ने एक लिलहारी का रूप

1:16:53

धारण किया। लिलहारी जानते हैं जो लीला गोदती है। लीला गोदने वाली का रूप धारण कर

1:16:59

लिया। लिलहारी का रूप बना लिया। रानी का भेष उतार दिया। और चल देती है उस शहर में लीला गोदने के

1:17:08

लिए चली जा रही है तो सबसे पहले गजमोतनी

1:17:13

उस पान वाली लड़की के दुकान पर पहुंचती है तमोलिन की दुकान पर पहुंचती है और उस

1:17:19

तमोलिन के वहां राजा नल को देखा पिंजरे में बंद तो राजा नल ने गजमोतनी को पहचान

1:17:26

लिया कि गजमोतनी आ गई क्या ये मुझे बचाएगी जब राजा नल टी टी करने लगा तो गजमोतनी नल

1:17:36

से कहने लगी थोड़ा आराम कर छुड़ाती हूं अभी गजमोतनी ने मंत्र अभंत्रित किया और दो

1:17:44

वीरों को याद किया और जो उस लड़की की दुकान थी पान वाली लड़की की उस पर जादू

1:17:51

चला दिया और लड़की की दुकान को वीरों ने उखाड़ दिया और उस दुकान को ऊपर लेकर चलने

1:17:59

लगे तो लड़की घबरा गई लड़की गजमोतनी से कहने लगी कि बहन मैं पहचान गई। यह

1:18:06

तुम्हारा पति है। मैं इसे छोड़ती हूं। आप मुझे प्राणदान दे दीजिए। तो गजमोतनी कहने

1:18:14

लगी ठीक है। गजमोतनी ने अपने वीरों को रोका और उस दुकान को वापस उसी स्थान पर

1:18:20

जमा दिया। और उस तमोली की लड़की ने गजमोतनी को वो पिंजरा दे दिया कि इसकी नार

1:18:28

में एक धागा बंधा हुआ है। जब तुम इस धागे को खोल दोगी तो यह वापस पूर्व रूप में आ

1:18:34

जाएगा। अपने मनुष्य रूप में आ जाएगा। पिंजरे को लेकर के लीला गोदने वाली आगे चल

1:18:40

देती है। कुछ आगे जहां तेलियों के पास

1:18:46

लाखा दादा बकरा बने हुए थे वहां पहुंच जाती है। और आवाज लगाई कि मैं लीला गोद

1:18:52

रही हूं। कोई आ जाइए। तो वही लड़की जो महा जादूगरनी थी। मंज रानी गजमोतनी की आवाज

1:19:00

सुनकर के बाहर आई। और उस गजमोतनी से कहने लगी कि बहन मेरे लीला गोदिए। गजमोतनी समझ

1:19:08

गई कि ठीक है तेने ही ऐसा काम किया है। तो गजमोतनी उसके शरीर पर लीला गोदती है। लीला

1:19:17

गोदी और वो भी बहुत जो उसने कहा उसी के अनुसार तो वो लड़की प्रसन्न हो गई। तेली

1:19:25

की लड़की कहने लगी कि बहन आज तू जो मांगेगी मैं तुझे वही दूंगी। मैं तुझ पर

1:19:30

प्रसन्न हूं। तू कुछ भी मांग सकती है। मैंने तुझ जैसी लीला गोदने वाली नहीं

1:19:36

देखी। तो रानी गजमोतनी कहने लगी कि मुझे तीन वचन दे

1:19:41

दी। पहले तीन वचन दे तब मांगूंगी। तो वो तेली की लड़की तीन वचन दे देती है। तो

1:19:49

गजमोतनी कहने लगी मुझे कुछ नहीं चाहिए जो ये बकरा है इसको दे दीजिए।

1:19:56

तो तेली की लड़की कहने लगी क्यों इसका क्या करेगी? कि नहीं यह मेरा सेनापति है।

1:20:01

तू मुझे नहीं जानती। मैं रानी हूं। गजमोतनी तेली की लड़की समझ जाती है और उस

1:20:08

बकरे को दे देती है उस लीला गोदने वाली रानी गजमोतनी को। आगे चल देती है और मन

1:20:15

में सोच रही है कि अभी से मुझे मनसुख को छुड़ाना है। चल देती है आगे और पहुंच जाती

1:20:22

है धोबियों के घर। धोबियों के घर पहुंची और वही आवाज लगाई कि कोई लीला गोदवा

1:20:30

लीजिए। मैं लीला गोद रही हूं। तो जिस लड़की ने मनसुख को गधा बनाया था वही लड़की

1:20:37

बाहर आ जाती है। और कहने लगी कि बहन मेरे लीला गोद दीजिए। तो रानी गजमोतनी ने उसके

1:20:46

भी जैसा उसने चाहा उसी प्रकार की लीला गोदी दी। लीला गोदने के बाद वह लड़की कहने

1:20:54

लगी कि बहन मैंने बहुत ललिहारी देखी लेकिन

1:20:59

तुम जैसी नहीं देखी। तुम मुझसे मांगना चाहो वो मांग लीजिए। तो गजमोतनी कहने लगी

1:21:06

कि बहन तीन वचन दे दीजिए। तो उस धोबी की लड़की ने तीन वचन दे दिए और गजमोतनी ने

1:21:14

उससे उस गधे को मांग लिया कि देखिए बहन मेरे पास ज्यादा सामान है और इसे ढोने के

1:21:21

लिए लादने के लिए इस गधे को दे दीजिए। तो वह एक लड़की धोबी की उस गधे को गजमोतनी को

1:21:30

दे देती है। श्रोताओं गजमोतनी उस गधे को लेकर के बकरा को और तोता को

1:21:37

लेकर के चल देती है। ले आती है तीनों को आ जाती है बंगाले के उसी मेड़े पर जहां उसकी

1:21:44

फौज पड़ी हुई है। उससे कुछ दूर तीनों को खड़ा किया। पिंजरा रख दिया। गधे को खड़ा

1:21:53

कर दिया और मनसुख लाखा दादा जो बकरा बने हुए थे उसको खड़ा

1:21:59

कर दिया। रानी ने अभंत्रित किया मंत्र से मंत्र को और अभमंत्रित करके जल के छींटे

1:22:07

तीनों पर मारे तो तीनों की तीनों अपने पूर्व रूप में आ गई और तीनों की तीनों जब

1:22:14

पूर्व रूप में आए तो गजमोतनी से हाथ जोड़कर निवेदन करने लगी कि रानी आज तैने

1:22:21

हमको बचा लिया अन्यथा इस बंगाले में तो हमारा कोई पता ही नहीं चलता तो रानी कहने

1:22:27

लगी कि यही बात तो मैं कह रही थी तुमसे से कि तुमने केवल तलवार चलाई है। तुम जादू

1:22:33

नहीं जानते। तुम तो केवल मारकाट जानते हो। इसलिए मैं तुम्हारे साथ चलने की कह रही

1:22:39

थी। परंतु अब मैं तुम्हारे साथ नहीं जाऊंगी। मैं वापस नरवरगढ़ जा रही हूं। तो

1:22:45

तीनों की तीनों गजमतनी से कहते हैं कि यदि तुम हमारे साथ नहीं चली तो हम माता-पिता

1:22:52

की जेल नहीं छुड़ा पाएंगे। श्रोताओं गजमोतनी से तीनों चलने का आग्रह करते हैं।

1:22:59

मनाते हैं गजमोतनी को। गजमोतनी तैयार हो जाती है कि ठीक है मैं तो तुम्हारी

1:23:05

परीक्षा ले रही थी। तुम तो मुझे ले जाना नहीं चाहते थे। अब देखिए श्रोताओं गजमोतनी

1:23:12

तीनों को वापस अपने मूल रूप में ले आई। और वहीं बंगाल के बॉर्डर पर उनकी सेना पड़ी

1:23:18

हुई है।

15.

गजमोतनी उन चारों से कह तीनों से कहने लगी कि देखिए अब बंगाले

0:08

का बॉर्डर यहां से आरंभ हो रहा है। बंगाला देश प्रारंभ हो रहा है और मैं आपके साथ

0:14

यदि नहीं चली तो आप कभी भी कंपिलगढ़ को नहीं जीत सकते। तो मनसुख कहने लगा यार नल

0:21

भाभी बात तो सही कह रही है। यदि हम भाभी को साथ ना ले चलें तो बताइए हम जादू में

0:28

तो कुछ जानते ही नहीं है। हमने तो केवल तलवार चलाई है। हम तो लठ चला सकते हैं

0:34

लेकिन जादू नहीं चला सकते। तो लाखा दादा मंसू गुर्जर और नल बेमन से गजमोतनी को

0:42

चलने के लिए बोल देते हैं कि गजमोतनी चलिए कोई बात नहीं है तू भी हमारे साथ चल तो

0:49

गजमोतनी उनसे कहने लगी कि मैं साथ तो चल रही हूं परंतु तब चलूंगी जब आप मेरा आदेश

0:56

मानेंगे इस सेना की सुप्रीम कमांडर मैं हूंगी मेरे नेतृत्व में सेना चलेगी तो

1:03

राजा न और मंसुख गुर्जर कहने लगे कि फिर हमारे दोबारा क्या होगा कि आप मेरे

1:09

निर्देशन में ही चलेंगे और यदि आपने जहां अपनी बात चलाई तो वहीं आपकी पराजय निश्चित

1:15

है। देखिए श्रोताओं राजा नल और मंसुख गुर्जर दोनों गजमोतनी को सुप्रीम कमांडर

1:23

अपनी फौज का घोषित कर देते हैं। और गजमोतनी अपनी फौज को कम पिलगढ़ की तरफ कूच

1:31

करने का आदेश दे देती है। श्रोताओं गजमोतनी के आदेश अनुसार नरवरगढ़ के वीर

1:39

सैनिक नरवरगढ़ के नर बच्चा चल देते हैं कंपिलगढ़ पर आक्रमण करने के लिए। एक से एक

1:46

बलवान, एक से एक पराक्रमी और एक से एक बढ़कर योद्धा कंपिलगढ़ की तरफ आक्रमण करने

1:54

के लिए बढ़े जा रहे हैं। श्रोताओं लगातार सेना ने अपना प्रस्थान जारी रखा। चलना

2:03

जारी रखा और 10 दिन का सफर करके सेना कंपिलगढ़ के मेड़ों पर पहुंच जाती है। जब

2:10

कंपिलगढ़ की सीमा आ गई तो गजमोतनी ने आदेश दिया कि सेना को यहीं रोक दिया जाए।

2:17

सेनापतियों ने गजमोतनी के आदेशानुसार अपनी-अपनी सैनिक टुकड़ियों को वहीं रोक

2:24

दिया। उनके लिए शिविर लगा दिए गए। रहने की व्यवस्था कर दी गई। अब देखिए चारों

2:31

सुप्रीम कमांडर गजमोतनी राजानल मनसुख और

2:36

लाखा ब्राह्मण एक शिविर में बैठकर के विचार विमर्श कर रहे हैं कि पहले हमें आगे

2:44

की रणनीति तय करनी है और कंपिलगढ़ की सीमा कंपिलगढ़ शहर तक जाकर के देखनी है तो ये

2:51

सोच कर के तीनों चारों की चारों चल देते हैं कंपिलगढ़ की सीमा की तरफ श्रो

2:59

श्रोताओं जब कंपिलगढ़ की सीमा पर आए तो वहां पर गजमोतनी को एक बोर्ड पर लिखा हुआ

3:06

दिखाई दिया। कंपिलगढ़ के राजा ने जो कंपिलगढ़ शहर की सीमा थी उसको माता काली

3:14

की आन लगा के अभिमंत्रित कर दिया था कि जो भी कोई नरवर से आएगा और इस सीमा में पैर

3:21

रखेगा पैर रखते ही अंधा हो जाएगा। अब देखिए जब उस शिलालेख को उस बोर्ड को मनसुख

3:31

ने और नल ने पढ़ा तो नल हंसने लगा कि ये कंपलगढ़ का राजा हमें मूर्ख समझ रहा है कि

3:37

हम डर से भाग जाएंगे। क्या लिख रखा है कि सीमा में प्रवेश करते ही अंधे हो जाएंगे।

3:43

तो गजमतनी बोली ठहरिए महाराज यह सही बात है।

3:48

यह उसकी आन लगी हुई है। वो महाकाली का भक्त है और महाकाली उसके साथ 24ों घंटे

3:55

रहती है। उसके आदेश में चलती है। उसके साथ युद्ध करती है। तो राजा नल कहने लगा कि

4:02

गजमोतनी तू जितनी हिम्मत वाली है उतनी डरपोक भी है। नारी हमेशा डरपोक होती है। हम

4:10

क्षत्रिय हैं। और इस तरीके से यदि डरे तो हम माता-पिता की जेल कैसे छुड़ा पाएंगे?

4:16

हम देखते हैं क्या है इस सीमा में। गजमोतनी रोकने का प्रयास करती है श्रोताओं

4:22

जब तक तीनों मनसुख, लाखा दादा और नल राजा उस सीमा में प्रवेश कर जाते हैं।

4:29

मैं अन्नी हो गई। मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा है। मैं भी अंधा हो गया हूं। कोई मायावी शक्ति

4:35

है तो सबको अंधा कर रही है। और जैसे ही सीमा में प्रवेश किया तो तो

4:40

तीनों के तीनों अंधे हो गए। नेत्र विहीन हो गए। दिखना बंद हो गया और गजमोतनी मन

4:47

में विचार करने लगी कि चलो अब इनको थोड़ी सजा देती हूं। इनको इस बात का दंड मिलना

4:53

चाहिए। तो गजमतनी वहां से कुछ दूरी पर जाकर के खड़ी हो जाती है। और उनका हालचाल

4:59

देख रही है कि अब ये क्या करेंगे। श्रोताओं तीनों की तीनों एक दूसरे को

5:06

पुकारते हैं कि गजमोतनी कहां है? गजमतनी ही हमें बचा सकती है। परंतु गजमोतनी नहीं

5:14

बोल रही है। नल ने गजमोतनी को पुकारा लेकिन गजमोतनी नहीं बोली। लाखा दादा ने

5:21

आवाज लगाई लेकिन गजमोतनी नहीं बोली। मनसु गुर्जूर ने आवाज लगाई लेकिन गजमोतनी नहीं

5:26

बोली। तब राजा नल ने गजमोतनी को आन दिलाई कि तुझे तेरे पति की सौगंध है यदि तू नहीं

5:34

बोले तो तो गजमोतनी कहने लगी कि राजन महाराज मैंने आपसे पहले ही मना किया था कि

5:41

यदि आप इस सीमा में प्रवेश करेंगे तो अंधे हो जाएंगे। ये फूल सिंह पंजाबी कोई

5:48

छोटा-मोटा नरेश नहीं है। यह महापराक्रमी राजा है। इसकी तलवार का लोहा बामन गढ़ों

5:55

के राजा मान चुके हैं। और तुमने इस राजा को छोटा राजा समझ लिया।

6:01

मैं देखती हूं इस सीमा से बाहर निकलिए। तीनों को गजमोतनी ने आवाज देकर के अपनी

6:07

तरफ बुलाया। आवाज की तरफ तीनों चलने लगे। और जब उस सीमा से बाहर आए तो गजमोत्नी ने

6:14

तीनों को एक स्थान पर बैठाया और एक लोटे में जल लिया। जल को लेकर के माता काली का

6:24

नेत्र दो नेत्र ज्योति वाला मंत्र पढ़ा और नेत्र ज्योति का मंत्र पढ़कर के जल के

6:31

छींटे तीनों में मारे और जैसे ही जल के छींटे दिए तो तीनों को दिखने लग गया।

6:37

तीनों के नेत्र खुल गए। अब तो तीनों की तीनों घबरा गए। गजमतनी से कहने लगे कि

6:44

गजमतनी तो ये कंपेलगढ़ कैसे जीता जाएगा? गजमोतनी बोली कि ऐसे आप कंपिलगढ़ को नहीं जीत

6:51

सकते। कंपिलगढ़ को तब जीत सकते हैं जब आप मेरे आदेश में चलेंगे। और यदि आपने मेरे

6:58

आदेश को जहां ठुकराया उसी स्थान पर आपकी हार निश्चित है। मनसुक कहने लगा देख भाई

7:05

नल जादू से हमारी पेश नहीं पड़ती है। अब तो हमें भाभी का आदेश मानना ही पड़ेगा। नल

7:13

कहने लगा ठीक है कोई बात नहीं है हम अब इसी को सुप्रीम कमांडर घोषित करते हैं और

7:20

इसी का आदेश मानेंगे। श्रोताओं तीनों मनसुख लाखा दादा और नल को गजमोतनी

7:27

वहीं छोड़ देती है और उस सीमा पर जाती है जहां वो सीमा अभिमंत्रित थी। सीमा पर जाकर

7:34

के ध्यान लगाया। अपने वीरों को बुलाया और वीरों से कहने लगी कि देखो यह सीमा किस

7:42

तरीके से किस देवता की आन से बंधी हुई है मुझे बताइए। वीरों ने ध्यान लगा के देखा।

7:49

उसकी खोज की तो देखा पूर्व दिशा में माता चंडी का मंदिर बना हुआ है। माता काली का

7:57

मंदिर है और उस मंदिर में माता काली जो कि फूल सिंह पंजाबी के साथ युद्ध करती है। उस

8:06

मंदिर में विराजमान है। यक्षों ने जो वीर थे, उन्होंने गजमतनी से कहा कि देखिए

8:14

गजमोतनी तुम्हें यहां से पश्चिम पूर्व दिशा की तरफ चलना है और माता काली का मंदिर है। उस

8:21

काली को प्रसन्न कीजिए और तब यह आन हटेगी। श्रोताओं गजमोतनी

8:27

राजा नल और मनसुख को साथ में लेकर के उस काली के मंदिर में चली जाती है। काली के

8:35

मंदिर में गजमोतनी ने आसन लगा लिया। और ध्यान लगा के बैठ जाती है। तभी जब काफी

8:42

समय हो गया तो महाकाली गजमोतनी पर प्रसन्न हुई। कहने लगी पुत्री

8:49

वर मांगो क्या मांगना चाहती हो कि माता मैंने जन्म से तेरी पूजा की है। मैं तेरी

8:56

भक्त हूं और मेरे पति ने भी तेरी पूजा की है। मेरे पति का तो जन्म ही कराया था। फिर

9:04

इस कंपिलगढ़ में भी इस तरीके से पराजय तो चंडिका कहने लगी कि बेटी मैं तुझे

9:11

अभिमंत्रित करके जल देती हूं इसे ले जा और ले जाकर के कम पिलगढ़ की सीमा पर छिड़क

9:17

देना और जो राजा ने आन लगा रखी है वह आन उसी समय समाप्त हो जाएगी श्रोताओं माता

9:24

देवी ने एक लोटे में जल अभंत्रित करके गजमोतनी को दे दिया और गजमोतनी ने उस जल

9:32

के छींटे कंपिलगढ़ की सीमा पर डलवा दिए। चारों तरफ

9:38

छींटे मरवा दिए और यक्षों को वो जल दे दिया कि इसे कंपिलगढ़ पर छिड़क दिया जाए।

9:44

श्रोताओं संपूर्ण कंपिलगढ़ की सीमा पर उस जल के छींटे दे दिए और वह जो आन थी वो आन

9:50

टूट गई। अब देखिए शाम का वक्त हो गया। सब के सब राजा नल मनसुख और लाखा दादा एक

10:00

तंबू में बैठकर के विचार कर रहे हैं। गजमोतनी कहने लगी कि देखिए अब मैं रात्रि का समय

10:09

है। मैं मेरे शरीर को छोड़ना जानती हूं। मैं योग विद्या जानती हूं। और योग विद्या

10:16

से मेरा जो हंस है, मेरा जो जीव है, मैं उसे इस शरीर से निकालती हूं। और इस शरीर

10:23

से निकाल करके कंपिलिगढ़ जा रही है। और कंपिलगढ़ की स्थिति का जायजा लेकर के आती

10:29

हूं। वहां की सैनिक व्यवस्था क्या है? राजा की कमजोरियां क्या है? और मेरा आपको

10:35

तीन पहर इंतजार करना होगा। नल कहने लगा कि देख यदि तीन पहर में नहीं आई तो कि फिर

10:42

तुम समझ लेना कि मैं मर चुकी हूं। परंतु तीन पहर तक मेरे शरीर पर कोई भी मक्खी

10:47

नहीं बैठ जानी चाहिए। यह मेरे शरीर की आपको हवा करनी है। मेरे

10:53

शरीर पर पंखा झोलना है। श्रोताओं गजमोतनी राजा नल और मनसुख गुर्जर को अपने शरीर की

11:01

सुरक्षा में लगा के योग विद्या से अपने प्राणों को निकाल देती है शरीर से और एक

11:09

चेल का रूप धारण करती है और चेल का रूप धारण करके कंपेलगढ़ में घूम रही है। देख

11:15

रही है कंपिलगढ़ की सैनिक व्यवस्था को। चप्पे-चप्पे पर सैनिक। किले की जो

11:21

व्यवस्था है बड़ी दुरुस्त है। किले पर केवल एक साइड में दरवाजा है, स्थल है।

11:29

तीनों तरफ किले के गहरी खाई है। खाई में जल है और अंधकार है। किले को जीतना आसान

11:38

नहीं है। और एक दरवाजे पर सुसज्जित सेना लगी हुई है। गजमुखतनी ने सोचा कि चलो किले

11:46

को तो मैंने देख लिया। पर मेरी सास को देखती हूं कहां है। गजमोतनी ने

11:52

आभासी रूप धारण किया। आभासी रूप जानते हैं छद्म रूप धारण किया गजमोतनी का और जहां

11:58

उसकी सांस छत पर काग उड़ा रही थी उसके पास पहुंच जाती है। गजमोतनी ने मंजा को देखकर

12:07

के उसके चरण स्पर्श किए। मंजा ने गजमोतनी को पहचान लिया और मंजा रोने लगी कि बेटी

12:14

मेरा बुढ़ापा इसकी कैद में कट रहा है। मैंने तो ही के बरे में एक शेर को जन्म

12:20

दिया था। मैं तो सोच रही थी कि मेरा पुत्र आएगा और मेरा ये जो कैद है मेरी ये जेल है

12:27

इसे छुड़ाएगा। तो गजमोतनी कहने लगी कि माता आप चिंता ना करें। हमारी सेनाओं ने

12:34

कंपिलगढ़ को घेर रखा है। कंपिलगढ़ की सीमाओं पर डेरा डाले हुए हैं हमारी सेना

12:39

और बहुत जल्दी ही हम कंपिलगढ़ पर आक्रमण करने वाले हैं। श्रोताओं

12:46

मंझा को समझाने के बाद गजमोतनी अपने ससुर को देखने जाती है और देखती है कि राजा

12:53

प्रथम ने एक कंबल का वस्त्र पहन रखा है। और राजा के

13:00

हाथ में चाकी का हथेला लगा हुआ है और दो पहरेदार खड़े हुए हैं। राजा से जब चाखी का

13:06

हथेला छूटता है तो राजा के पीठ पर बांसों की मार लगाते हैं। राजा व्याकुल हो रहा

13:13

है। गजमुखतनी देख के रोने लग जाती है। परंतु व्यवस्था है कि वो उनसे मिल नहीं

13:20

पाती है। क्योंकि वो पहरेदार राजा प्रथम का पहरा दे रहे हैं। श्रोताओं

13:26

इधर तीन घंटे का जो तीन घड़ी का समय था, तीन पहर का समय था वो समाप्त हो गया। अब

13:33

तो नल और मनसुख रोने लगे कि ये क्या हुआ? ये तो गजमोतनी भी समाप्त हो गई। ये कैसी

13:40

लड़ाई जीती हमने? हम इस कंपेलगढ़ को कभी भी फतेह नहीं कर सकते। रो रहे हैं दोनों

13:47

भाई और लाखा ब्राह्मण। तो गजमोतनी ने तब तक उस शहर की स्थिति का

13:53

संपूर्ण जायजा ले लिया। उसके जो गुप्त स्थान थे, कमजोरियां थी, सैनिक चौकियां

13:59

थी, सबका विश्लेषण कर लिया और विश्लेषण करने के बाद गजमोतनी आ जाती है अपने शरीर

14:06

में। और जैसे ही शरीर में गजमतनी ने प्रवेश किया, तो नल और मनसुख की आंखों से

14:12

आंसुओं की झड़ी लग गई। नल कहने लगा, हम तो समझ गए थे कि मोतनी भी मर चुकी है। तो

14:19

मोतनी कहने लगी कि ऐसे नहीं मरने वाली मैं। तुम चिंता मत कीजिए। अब हम अवश्य ही

14:25

कंपिलगढ़ को जीत कर चलेंगे। माता-पिता की जेल छुड़ानी है। परंतु ऐसे माता-पिता की

14:33

जेल नहीं छुड़ा सकते। नल बोले नल कहने लगा तो कैसे छूटेगी? कि अब तुम्हें मेरे

14:38

आदेशानुसार काम करना होगा। क्योंकि इस राजा की जो लड़की है उस पर

14:45

जादू का पिटारा है सरवती पर और उस जादू के पिटारे को उससे हमें लेकर के आना है। जब

14:53

तक वो जादू का पिटारा सरवती के पास है हम कभी भी कंपिलगढ़ को फतेह नहीं कर सकते।

14:59

तलवार से तो हम जीत लेंगे लेकिन जादू उसके पास बहुत बड़ा है। तो नल कहने लगा जादू का

15:06

क्या उपाय है? कि बस जो मैं कहती जाऊं वो तुम करते जाओ। तो मेरे साथ चलो नट का वेश

15:13

धारण करो और राजा फूल सिंह के दरबार में खेल का आयोजन करेंगे। नल कहने लगा कि मैं

15:20

कोई नट नहीं बनना चाहता। तो गजमोतनी कहने लगी नट नहीं बनना चाहते तो ठीक है।

15:28

माता-पिताओं की जेल भी नहीं छूटेगी। मनसुख कहने लगा भाई नल नट बनने में कोई दिक्कत

15:35

नहीं है। इसकी बात माननी पड़ेगी। जैसे यह कहेगी वैसे ही करना पड़ेगा। तभी माता-पिता

15:41

की जेल छूटेगी। तो श्रोताओं नर और मनसुख दोनों को गजमोतनी ने सिर मुड़वा के नट बना

15:49

दिया। नट का बाना बना दिया और स्वयं नटनी बन गई।

15:54

नल को और मनसुख को लेकर के मनसुख ढोल बजाता हुआ जा रहा है और गजमोतनी उनके पीछे

16:02

पीछे नाच गायन करती हुई चली जा रही है और कंपिलगढ़ शहर में प्रवेश कर जाते हैं।

16:09

कंपिलगढ़ का एक चौराहा देखा और उस चौराहे पर उन्होंने खेल करना आरंभ कर दिया। जब

16:15

भीड़भाड़ इकट्ठी हुई तो वहां नजदीक ही राजमहल था। राजा का एक सेनापति वहां से

16:22

निकल रहा था। सेनापति ने नट और नटनी को देखा तो महाराज फूल सिंह के दरबार में

16:30

पहुंच गया और कहने लगा कि राजन मैंने इतने सुंदर नट और नटनी देखे हैं कि जिनका वर्णन

16:38

मैं नहीं कर सकता। और जो नटनी को यदि आप देख लेंगे तो आपके महल में भी कोई रानी

16:44

उसके समान सुंदर नहीं है। महाराज उन नटों को तो पीट दीजिए और नटनी को छीन लीजिए और

16:52

अपनी रानी बना लीजिए। फूल सिंह पंजाबी कामासक्त और कामी नरेश तो था ही। कहने लगा

16:59

जाओ और उन्हें दरबार में बुला के लाओ। अब देखिए श्रोताओं फूल सिंह पंजाबी ने अपने

17:06

एक सैनिक को नट और नटनी को बुलाने के लिए भेज दिया। राजा नल और मंसुख को बुलाने के

17:13

लिए भेज दिया। उस राजा के सैनिक ने उनसे कहा कि नटो तुम्हें महाराज फूल सिंह ने

17:20

याद किया है। महाराज के दरबार में खेल का आयोजन करो। महाराज ने आपको बुलाया है। नल

17:27

कहने लगा ठीक है भाई हमें तो खेल करना है महाराज के दरबार में कर देंगे। महाराज की

17:33

जैसी आज्ञा तीनों की तीनों चल देते हैं महाराज के दरबार में। फूलसेन के दरबार में

17:40

तीनों पहुंच गए और जाकर के राजा को प्रणाम किया। तो राजा कहने लगा नटो कहां के रहने

17:48

वाले हो? कि महाराज हम बुलंद शहर के रहने वाले हैं।

17:54

हम कला में प्रवीण हैं और हम आपके दरबार में यदि आपकी अनुमति हो तो खेल का आयोजन

18:01

कर दें। राजा कहने लगा कि ये तो मैं ही चाह रहा था। मैंने तुम्हें इसीलिए तो

18:06

बुलवाया है कि तुम मेरे दरबार में खेल करो। तुम कैसा खेल करते हैं कि महाराज आप

18:14

देखिए हम बहुत शानदार खेल आपके दरबार में करेंगे।

18:20

श्रोताओं नल की बात सुनकर के फूल सिंह पंजाबी

18:25

उन्हें अनुमति दे देते हैं कि खेल आरंभ किया जाए। मनसुख ने ढोल ले लिया। ढोल को

18:32

बजा रहा है। और गजमोतनी नीचे खड़ी हुई है। और गजमोतनी ने

18:40

एक बांस गढ़वाया। बांस को गढ़वा करके एक कच्चा धागा लिया। कच्चा सूत लिया और कच्चे

18:46

सूत को अंतरिक्ष में फेंक दिया। कच्चासूत अंतरिक्ष में खड़ा हो गया

18:52

क्योंकि गजमतनी के पास तो आठ वीर थे। उन वीरों को दे दिया था कि इसको ले जाओ

18:58

अंतरिक्ष में। अंतरिक्ष में उस धागे को वीरों ने पकड़ लिया। राजा नल से गजमतनी

19:05

कहने लगी कि हे महाराज नट आप चढ़ जाइए इस धागे पर।

19:10

फूल सिंह पंजाबी देखने लगा कि ये कच्चा धागा है और इस पर ये नट चढ़ जाएगा क्या?

19:16

श्रोताओं नल देवी माता का भक्त था। देवी 24ों घंटे राजा नल के साथ रहती थी। नल ने

19:24

माता देवी का स्मरण किया और उस कच्चे सूत को पकड़ कर के ऊपर चढ़ गया। उसको तो माता

19:31

भवानी ले जा रही थी ऊपर। माता देवी नल को ऊपर ले गई। और अंतरिक्ष में पहुंच गया नल।

19:39

और नीचे से मनसुक आवाज लगा रहा है कि नट आप कहां है? कुछ देर तक तो आवाज आई लेकिन

19:47

आवाज का आना भी बंद हो गया। अब देखिए गजमोतनी का जादू था और नल देवी का भक्त

19:56

था। तो नल ने माता देवी का अंतरिक्ष में स्मरण किया और देवी प्रकट हो गई और देवी

20:02

से कहा कि माता आप मेरा मायावी शरीर बनाओ। तो देवी ने नल का मायावी शरीर बनाया और

20:10

ऊपर अंतरिक्ष से जहां से दिखाई ना दे उतनी ऊंचाई से नल का एक पैर काट करके नीचे डाल

20:16

दिया। कुछ देर बाद नल का दूसरा पैर नीचे डाल दिया। कुछ देर बाद नल का तीस एक हाथ

20:24

डाल दिया। और नल तो माता देवी की गोद में बैठा हुआ है।

20:30

राजा फूल सिंह मन में विचार करने लगा कि ये क्या हो रहा है? और गजमतनी रोने लगी कि

20:37

मेरा पति अंतरिक्ष में मर गया। किसी ने मेरे मंत्र को काट दिया। किसी ने मेरा

20:43

जादू नष्ट कर दिया। अब तो फूल सिंह पंजाबी और उसकी पुत्री भी देखने लगे कि ये कैसा

20:50

जादू है? ये कैसे नट हैं? ऐसे नट तो हमने पहली बार ही देखे हैं। गजबतनी विलाप कर

20:57

रही है और नल की भुजा, धड़ और शीश कट कट करके जमीन पर आ रहे हैं। कुछ देर में ही

21:04

नल का पूरा शरीर कट करके जमीन पर आ गया। अब तो गजमतनी रोने लगी और मनसुख से कहने

21:11

लगी कि मुझे यहीं इसी सभा में एक चिता बनाओ और मुझे सती करा दीजिए। श्रोताओं फूल

21:18

सिंह पंजाबी ने आननफानन में लकड़ियों का प्रबंध किया। और गजमोतनी को वही चिता बना के सती करा

21:27

दिया। और जब गजमोतनी सती हो गई तो उसके एक

21:32

घंटे बाद स्वयं नल उस धागे से उतर कर के नीचे आ रहा

21:37

है। और नल धागे से उतर कर के नीचे आ गया। और जब नीचे आया तो फूल सिंह उसकी से उसकी

21:46

सेना उसका दरबार अचंभित हो गया कि हमने तो इस नट के हाथ पैर शीश मुंह सब जला दिए। ये

21:55

कैसे जीवित हो गया? नल ने मनसुख से पूछा कि भाई हमारी नटनी कहां है? तो मनसुख कहने

22:03

लगा कि इस फूल सिंह ने अपने महल में छिपा दिया है बलपूर्वक। नल कहने लगा कि महाराज आप तो राजा हैं और

22:11

हम नट हैं। हमारी नटनी को आपने महल में क्यों छिपा लिया? तो फूल सिंह कहने लगा कि

22:17

देखिए नट झूठ क्यों बोल रहे हो? तुमने तुम्हारे हाथों से उस नटनी को शक्ति करा

22:25

दिया था। जबकि श्रोताओं शक्ति कराते समय भी गजमोतनी के पास वीर थे आठ। और जैसे ही

22:33

उसने अग्नि लगाई थी तो गजमोतनी को उठाकर ले गए और फूल सिंह के महल में आराम से

22:39

छोड़ दिया। तो नल कहने लगा कि महाराज फूल सिंह मेरी

22:46

नटनी आपके महल में है। फूल सिंह कहने लगा कि भाई ऐसा नहीं है। मैंने सती करा दिया।

22:52

मनसुख कहने लगा कि नहीं भाई इन्होंने बलपूर्वक नटनी को महल में दबका लिया है।

22:57

नल कहने लगा मैं आवाज लगाता हूं। तो फूल सिंह कहने लगा आवाज लगाइए। तो राजा नल्ले

23:04

जैसे ही नटनी को आवाज लगाई जब आवाज लगी तो नटनी उस महल से निकल कर के

23:11

आ रही थी और जब ये फूल सिंह ने देखा तो फूल सिंह हड़बहड़ा गया। फूल सिंह कहने लगा

23:18

कि ये कैसे नट हैं? इन्होंने ये क्या खेल किया? और तीनों के तीनों वहां इकट्ठे हो

23:24

जाते हैं। अब तो फूल सिंह घबरा जाता है। फूल सिंह

23:29

कहने लगा कि नटो ये क्या विद्या थी कि महाराज बस यही तो हमारा खेल था। फूल सिंह

23:36

पंजाबी उन नटों पर प्रसन्न हो जाता है और उनसे कहने लगा कि जो तुम मांगना चाहो यदि

23:42

आज मेरा राज्य भी मांगोगे तो मैं राज्य भी दे दूंगा। तो नल कहने लगा कि महाराज आप तीन वचन दे

23:51

दीजिए। तो फूल सिंह पंजाबी नल और मनसुख को नहीं पहचान पाता है और तीन

23:58

वचन दे देता है। तो नल कहने लगा कि महाराज जो जादू का पिटारा आपकी पुत्री सरवती के

24:06

पास है उसे दे दिया जाए। महाराज हम नट हैं और खेल करते डोलते हैं। बस उससे और कुछ

24:13

बड़ा खेल करेंगे ताकि हमें कुछ मिल जाए। तो राजा फूल सिंह कहने लगा चलो तुमने बहुत

24:20

बड़ी चीज मांगी है। परंतु मैं वचनबद्ध हूं। मैं आपको वचन दे चुका हूं। मैं आपको

24:25

एक जादू का पिटारा प्रदान करता हूं। श्रोता उस सरबति से वह जादू का पिटारा

24:31

लेकर के फूल सिंह ने राजा नलकोर गजमोतनी को सौंप दिया। और वो तीनों मनसुख, नल और

24:41

गजमोतनी नट भेष में उसकी सीमा से कंपिलगढ़ की सीमा

24:46

से बाहर निकल जाते हैं। चले जाते हैं महाराज फूल सिंह को प्रणाम करके और आ जाते

24:52

कंपिलगढ़ की सीमा पर और जब कंपिलगढ़ की सीमा पर आ गए तो राजा नल ने अपना एक पत्र

25:00

वाहक बुलाया एक दूत बुलाया और दूत को बुला के एक चिट्ठी लिखी और चिट्ठी लिख के उसमें

25:08

लिख दिया कि मूर्ख फूल सिंह सावधान हो जा तुझे मारने के लिए मंझ रानी और राजा प्रथम

25:17

शेर तेरी सीमाओं पर सेना के साथ खड़ा हुआ है और कल प्रातः काल और कल प्रातः काल

25:26

युद्ध आरंभ कर दिया जाएगा। श्रोताओं जब वो पत्रवाहक उस पत्र को लेकर के फूल

25:35

सिंह के दरबार में पहुंचा और पत्र को फूल सिंह के सामने प्रस्तुत किया तो फूल सिंह

25:42

ने उस पत्र को पढ़कर के कहा कि मेरा दुश्मन आ चुका है। मुझसे युद्ध करने के

25:49

लिए उसकी मृत्यु नजदीक आ गई है। परंतु देखिए श्रोताओं फूल सिंह यह भूल गया था कि

25:56

उसके पास जो जादू का पिटारा था उसे तो पहले ही गजमतनी और राजा नल ले गए थे उनसे

26:04

यह बात वो नहीं जानता था। फूल सिंह ने अपने पुत्र विजय सिंह को बुलाया और विजय

26:10

सिंह से कहा बेटे कल युद्ध के लिए सेना को सुसज्जित करवाओ। कल प्रातः काल ही हमें

26:18

हमारी सीमाओं पर पड़े हुए शत्रुओं पर आक्रमण करना है। एक नरवर से चलकर के कोई

26:25

नल नामक राजा है। राजा प्रथम का पुत्र है। उसके माता-पिता तो हमारी जेल में बंद हैं

26:31

लेकिन वो युद्ध करने के लिए आया है। उनकी कैद छुड़ाने के लिए आया है। और कल के

26:37

युद्ध में ही उनको हम बड़ा भारी नुकसान पहुंचाएंगे। उनको बंदी बना लेंगे।

26:44

श्रोताओं जब फूल सिंह की बात उसके पुत्र विजय सिंह ने सुनी तो क्रोधित हो उठा।

26:51

नेत्रों को लाल कर लिया और अपने सेनापति और सैनिकों को सुसज्जित होने का आदेश दे

26:56

दिया। सेना ने युद्ध की तैयारी कर ली और जब प्रातः काल हुआ तो कंपिलगढ़ का जो

27:05

दुर्ग था उसका परकोटा बना हुआ था। उस परकोटे के बाहर संपूर्ण सेनाओं के साथ फूल

27:14

सिंह, उसका पुत्र विजय सिंह, उसके सेनापति और अन्य जो योद्धा थे वो समस्त वीर योद्धा

27:22

युद्ध के मैदान में आ गए। उधर नरवर वाले भी युद्ध के मैदान में पहले से ही

27:27

सुसज्जित खड़े हुए थे और इंतजार कर रहे थे कि फूल सिंह के किले पर आक्रमण करें या फूल सिंह

27:35

किले के बाहर युद्ध करने आता है। श्रोताओं दोनों सेना सेनाएं आमने-सामने अड़ गई।

27:41

दोनों सेनाओं में युद्ध आरंभ हो गया। तो देखिए श्रोताओं उन्हीं की भाषा में आला की

27:48

भाषा में मैं आपको उस युद्ध का वर्णन सुना रहा हूं। और विजन बोल दिया फूल सिंह ने

27:54

हुए नरवर के जब होशियार सुमर शारदा निज खेरी की ले सब रे हथियार दोनों अन बराबर

28:05

मिल गई मची परस पे मारामार गुर परग और गदा

28:11

चल रही है कोता खानी चले कटार खटखट खटखट

28:16

तेगा चल रहो चल रही छपक छपक तलवार और कट कट सुर गिरे धरनी पे बड़बड़ करे छतरी

28:26

बार डेढ़ पहर तक बजोए दुधारो भवे लगी है रक्त की धार ये गत देखी फूल सिंह ने

28:34

नरवरिया माने हार सुमिरन करके जगदंबा को हाथी दीनो बढ़ाया गार जहां परमंस को और नल

28:44

राजा और सेनापति वीर बलवान बाई मोर्चे पे

28:50

फके ठाड़ो कीन महा कठिन केपान ना कोई लो

28:55

उम्र को पट्टो ना जीवे कोई बरस हजार 12 बरस को पूरा जीवे और तेरे जिए सियार बरस

29:04

18 क्षत्रिय जीवे ज्यादा जीवन को धिक्कार

29:10

कबहु भागे नरवर गढ़बारे भागे कबहु पंजापी जान भजवल थक गए दो दलन के सबके बिग गए

29:20

ओसान परी पापड़ी है होटन पे और चेहरे पे छाए गयो

29:26

रेत साझ भ ना समर भूमि को जीत गयो है किसी पे खेत बढ़त भान फिरे दोनों दल सबने मान कर

29:37

तलवार फूल सिंह पहुंचो कम्पिलगढ़ और यो मन में करत विचार देखिए श्रोताओं युद्ध इस

29:45

तरीके से हुआ कि दोनों पक्ष बराबर के टक्कर में आ गई। कोई किसी को नहीं हरा

29:52

सका। फूल सिंह के साथ मां काली स्वयं युद्ध करती थी। राजा नल फूल सिंह को

29:58

पृथ्वी पर तो डाल लेते थे, पटक लेते थे लेकिन जैसे ही तलवार का वार करते मां

30:04

भवानी अपना खड़क अड़ा देती थी और फूल सिंह उनके वार से बच जाता था। श्रोताओं दोनों

30:10

पक्षों का युद्ध करते-करते बुरा हाल हो गया और सूर्यास्त हो गया। जब सूर्यास्त

30:16

हुआ तो दोनों दल अपने अपने शिविरों में चले गए। उधर फूल सिंह अपने किले में जाकर

30:23

के विचार करने लगा कि शत्रु बड़ा प्रबल है और इसे ऐसे हरा पाना संभव नहीं है। मुझे

30:31

मां भवानी की आराधना करनी होगी और आराधना करके कल के युद्ध में मैं राजा नल को बंदी

30:38

बना के लाऊंगा। श्रोताओं इधर फूल सिंह मां भवानी के मंदिर में चला जाता है और मां

30:44

भवानी की आराधना कर रहा है। मां काली की आराधना कर रहा है। काली पर उन्होंने पुष्प

30:51

धूप दीप नैवेद्य चढ़ा के माता काली को मंत्रो उच्चारण से प्रसन्न कर लिया। काली

30:58

प्रकट हो गई। कहने लगी बोल बेटे कैसे बुलाई कि माता तुम जानती हो मेरी सीमाओं

31:04

पर प्रबल शत्रु खड़ा हुआ है। शत्रु बड़ा बलशाली दिखाई देता है। दो लाख की फौज के

31:10

साथ उसने आक्रमण किया है। तो माता कल के युद्ध में मैं शत्रु को बंदी बना लाऊं। तो

31:17

मां काली प्रसन्न होकर कहने लगी बेटे तथास्तु जाओ कल के युद्ध का जो सेनापति

31:23

होगा वो तुम्हारा बंधक होगा। अब देखिए श्रोताओं फूल सिंह पंजाबी तो

31:28

अपनी माता काली से वरदान लेकर के लौट जाता है अपने महल को। इधर राजा नल गजमतनी लाखा

31:38

दादा और मनसुख गुर्जर चारों के चारों मन में विचार कर रहे हैं कि कल का युद्ध इस

31:44

तरीके से नहीं लड़ेंगे। क्योंकि हमारी सेना एक साथ जब युद्ध में झोंकी जाती है,

31:51

युद्ध में लड़ाई जाती है तो सैनिक परेशान हो जाते हैं। सेना को चार टुकड़ियों में विभाजित किया जाए। 50-50 हजार की चार

31:59

टुकड़ियां निर्धारित कर ली गई और दो टुकड़ी आराम करेंगी और दो टुकड़ी युद्ध

32:04

करेंगी और कल का सेनापति वह होगा जो फूल सिंह को बंदी बना के लाएगा। देखिए

32:11

श्रोताओं बीड़ा डलवा दिया महाराज नल ने और गजमोतनी ने। अब बीड़ा को खाने के लिए नल के

32:20

दरबार में जवानों की कमी नहीं थी। परंतु फूल सिंह से सब डरते थे। फूल सिंह के साथ

32:27

मां भवानी लड़ती थी। तो मनसुख ने विचार किया। मनसुख कहने लगा मित्र मैं निभाऊंगा

32:34

मित्रता। और मैं कल फूल सिंह को बंदी बना के लाऊंगा। कल्कि सेना का प्रधान सेनापति

32:40

मैं होना चाहिए। मनसुक ने बीड़ा चबा लिया। पान को उठा के खा गई। गजमतनी कहने लगी

32:49

देवर जी आपके साथ युद्ध भूमि में मुझे भी चलना होगा। तो मनसुख कहने लगा नहीं भाभी

32:56

मैं तुम्हें युद्ध भूमि में नहीं ले जाऊंगा कि नहीं तुम नहीं जानते। फूल सिंह

33:02

के साथ मां काली लड़ती है। उसके साथ हमने उसका जादू का पिटारा ही तो लिया है। उसके

33:08

पास चार वीर हैं। उनको रोकना आसान नहीं है। इसलिए कल मैं आपके साथ मर्दाने भेष

33:14

में चलूंगी। श्रोताओं दूसरा दिन हुआ तो इधर तो सेना का प्रधान सेनापति

33:22

मनसुख गुर्जर को बना दिया गया। और उधर स्वयं फूल सिंह पंजाबी अपने हाथी के ओदे

33:31

पर सवार होकर के युद्ध भूमि के लिए निकल पड़ा। श्रोताओं मनसुख गुर्जर और रानी

33:38

गजमोतनी भी दोनों एक साथ युद्ध भूमि में चले जाते हैं। युद्ध आरंभ हो गया। दोनों

33:45

सेनाएं आमने सामने आ गई। फूल सिंह का पुत्र विजय सिंह युद्ध भूमि

33:50

में आगे बढ़ा और आगे जैसे ही वह पुत्र आगे बढ़ा तो देखिए श्रोताओं मनसुख कोई

33:56

छोटा-मोटा योद्धा नहीं था। मनसुख महापराक्रमी था। मनसुख ने आगे बढ़कर के

34:03

विजय सिंह पर वार किया। और विजय सिंह भी बड़ा रणब था। वार को बचा लिया और तेगा

34:11

धरणी पर गिरा। दोनों में मल युद्ध आरंभ हो गया। अब देखिए श्रोताओं जब गजमतनी ने देखा

34:18

कि यह बहुत उचित अवसर है तो उन्होंने अपने चार वीरों का आक्रमण विजय सिंह पर करा

34:25

दिया और जैसे ही चार वीरों ने आक्रमण किया विजय सिंह पर तो विजय सिंह धरनी पर गिर

34:30

गया और मौका मिलते ही मनसुख ने उसका सर धड़ से अलग कर दिया फूल सिंह पंजाबी का

34:36

पुत्र दूसरे दिन के युद्ध में मारा गया अब देखो श्रोताओं से में भगदड़ मच गई कम पिल

34:44

गढ़ की सेना युद्ध भूमि छोड़कर भागने लगी। तभी फूल सिंह को पता चला कि मेरा पुत्र

34:50

वीरगति को प्राप्त हो गया है। तो फूल सिंह क्रोधित हो उठा। क्रोधित होकर के आगे बढ़ा

34:56

युद्ध भूमि में। सामने लाकर के अपना हाथी मनसुख के सामने खड़ा कर दिया और कहने लगा

35:03

अरे नरवर के बच्चे तू युद्ध भूमि में मरने आ गया। आज मैं

35:09

तुझे जीता नहीं छोडूंगा। कसम है मुझे मेरी मां भवानी की। मैं आज तुझे बंदी बना के

35:14

कंपिलगढ़ को घसीटता हुआ ले जाऊंगा। श्रोताओं जब इतनी बात मनसुख ने सुनी तो

35:21

मनसुख ने अपना तेगा खींच लिया। तेगा खींच के प्रहार किया और जैसे ही हाथी के ओदे पर

35:29

प्रहार किया तो हाथी के हौदे के जो रस्सा थे वो काट दिए और वो राजा पृथ्वी पर पटक

35:35

लिया। राजा को जब पृथ्वी पर पटका तो राजा मन में विचार करने लगा कि यह बड़ा लड़वैया

35:42

है, बड़ा योद्धा है। उसने अपने चार वीरों को याद किया। चारों वीर एकदम से युद्ध के

35:48

मैदान में आ गए। और जब मनसुख ने देखा कि चार वीर युद्ध करने आ रहे हैं। तो मनसुख

35:55

घबरा गया। क्योंकि मनसुख जादू नहीं जानता था। मनसुख तो तेगाधारी था। श्रोताओं

36:01

गजमोतनी वही युद्ध के मैदान में मंसुख का साथ दे रही थी तो गजमोतनी ने आठ वीरों को

36:07

याद किया और आठों वीरों ने उन चारों वीरों को कुछ समय में ही कैद कर लिया और कैद

36:14

करके गजमतनी के सामने प्रस्तुत कर दिया और इधर मनसुख ने उस महिपथ को जो भूपाल था

36:22

उसको पटक लिया पथरी पर फूल सिंह को धरनी पर डाल दिया और फूल सिंह बेहोश हो जाता है

36:29

इधर सेना भाग जाती है कंपिलगढ़ की तो मनसुख

36:34

कहने लगा गजमोतनी से भाभी अब आप जाइए हम जीत चुके हैं मैंने इसको बंदी बना लिया है

36:41

आप शिविर में चलिए श्रोताओं गजमोतनी शिविर में आ जाती है और उधर जब फूल सिंह की

36:49

मूर्छा जागी तो फूल सिंह ने पुनः अपने और चार वीरों को याद किया और मां भवानी को

36:55

याद किया मां भवानी से कहने लगा माता आपने मुझे वचन दिया था कि कल के युद्ध में कल

37:01

का सेनापति आपका बंदी होगा। श्रोताओं मां भवानी टेगा लेकर के मनसुख गुर्जर पर

37:09

आक्रमण कर देती है। मनसुख गुर्जर पर अदृश्य वार होने लगी। मनसुख गुर्जर हड़बड़ा गया और फूल सिंह उसके चंगुल से

37:16

छूट गया। मां भवानी और फूल सिंह के बारों से मनसुख बेहोश हो जाता है। मूर्छित हो

37:24

जाता है और युद्ध भूमि में गिर पड़ा। फूल सिंह ने रास्ता निकाला और मनसुख

37:30

गुर्जर की मसक चढ़ा ली। मसक चढ़ा के हाथी के ओदे पर रखा। बांध लिया हाथी के ओदा में

37:36

और सेना सहित विजय का धोसा बजवाते हुए कंपेलगढ़ को चला गया। और दूसरा दिन हुआ तो

37:45

फूल सिंह ने मनसुख को दरबार में खड़ा किया और दरबार में खड़ा करके आदेश दिया कि इसको

37:51

भासी में डाल दिया जाए। अब श्रोताओं इधर की कहानी सुनिए। जब नल को

37:58

यह पता चला कि उसका मित्र उसका पगड़ी पलटा यार फूल सिंह पंजाबी ने कैद करा लिया है।

38:05

तो मंझा के पास आ जाता है। तो रानी गजमोतनी के पास आ जाता है नल। लाखा दादा

38:13

गजमोतनी और राजा नंद आपस में विचार कर रहे हैं कि

38:19

इस आता ताई की कैद से मेरे मित्र मंसुख को छुड़ाना संभव नहीं है। यह महापराक्रमी है।

38:26

मां भवानी इसके साथ लड़ती है। इससे कैसे विजय प्राप्त की जाए? तो गजमतनी कहने लगी

38:34

कि महाराज आप घबरा क्यों रहे हैं? आपके पास भी तो मां भवानी लड़ती है। याद

38:41

करो माता भवानी को। आसन लगा के बैठ जाइए। श्रोताओं राजान रात्रि के समय माता भवानी

38:49

की पूजा करते हैं। मां देवी की आराधना करने लगी और आसन मार के बैठ गया और कहने

38:56

लगा कि मातेश्वरी आप युद्ध के मैदान में आइए। मेरी रक्षा

39:02

करो। हे माता इस कंपिलगढ़ में मेरी बेइज्जती हो रही है। मेरी पराजय हो रही

39:09

है। श्रोताओं जब राजा नल ने मां भवानी की आराधना की तो मां भवानी प्रकट हुई। मां

39:16

भवानी कहने लगी कि नल तू बड़ा धोखेबाज है।

39:22

तुझे जहां मेरी आवश्यकता पड़ी वहां मैं तेरे सामने आई। मैंने मुझे कहा कि माता घूमासुर दाने का

39:31

वध करा दीजिए और मैं तुझे प्रसाद चढ़ाऊंगा तुझ पर सोने का छत्र

39:37

चढ़ाऊंगा और तुझे दो बकराओं की बलि चढ़ाऊंगा कहा था नल बोला हां माता उसके बाद तू

39:46

पाताल लोक पहुंच गया वहां तेने मुझे स्मरण किया था कि माता आज मेरे प्राणों की रक्षा

39:52

कर मैं तुझे दो बकराओं की बलि चढ़ाऊंगा परंतु नल तू बड़ा बेकौली है। तेरे आज तक

40:00

मुझे मूसरी भी नहीं चढ़ाई, चूहे की बलि भी नहीं चढ़ाई और तू मुझसे ये चाहता है कि

40:07

मैं फूल सिंह को पराजित करा दूं। नहीं नल ये संभव नहीं है। तो नल कहने लगा माता

40:13

बोलिए तुझे क्या चाहिए? मैं वही चढ़ाऊंगा। माता देवी को मनाने लग गया। तो देवी कहने

40:20

लगी नल देखिए मैं तो देवी हूं। मैं तेरा

40:25

साथ दे रही हूं। परंतु इस नगर की कंपिलगढ़ की जो चंडी है

40:32

उसका जो मंदिर है वह पूरब दिशा में है और वहां पर फूल सिंह पंजाबी पाठ पूजा करके

40:38

गया था। आप उस देवी को मनाइए। उस देवी के मंदिर में जाओ और जो देवी आपसे मांगे वो

40:45

देवी को चढ़ाइए। मां चंडी को चढ़ाइए। मैं उसे नहीं रोक सकती।

40:50

हे श्रोताओं माता देवी के अनुसार राजा नल चल देते हैं फूल सिंह जो पंजापी का मंदिर

40:57

था माता चंडी के मंदिर में माता चंडी के मंदिर में आया नल ने ध्यान लगाया माता

41:04

चंडी प्रकट हुई और माता चंडी से नल कहने लगा कि माता आप मेरी पराजय क्यों कर रही

41:11

है इस दुष्ट के हाथों मेरी पराजय हो रही है तो चंडी कहने लगी वीर नल क्यों घबरा

41:18

रहा है फूल सिंह ने मुझ पर 1000 मंत्रों का जाप किया है। तू मेरे ऊपर

41:26

2000 मंत्रों का जाप कर और मुझे मध्यपान करा और मुझ पर एक भैंसा की बलि चढ़ा और कल

41:35

के युद्ध में तू फूल सिंह को किले सहित धराशाई कर देगा। मैं डेढ़ पहर के लिए तुझे

41:41

वचन देती हूं। सो जाऊंगी। और डेढ़ पहर में फूल सिंह को तुझे बंदी बनाना होगा। नल

41:48

कहने लगा ठीक है माता श्रोताओं तीसरे दिन का युद्ध श्रोताओं मां भवानी मां चंडी से

41:57

वरदान लेकर के नल लौट आता है अपने शिविर को और दूसरे दिन युद्ध की संपूर्ण

42:03

तैयारियां की नल ने अपनी संपूर्ण सेना को सुसज्जित होने का आदेश दे दिया कि कल के

42:09

दिन कंपिलगढ़ के किले को ध्वस्त कर देना है। तोड़ दो कि कंपिलगढ़ के किले के

42:15

किवाड़ घुस जाओ अंदर मारकाट मचा दो बंदी बना लो फूल सिंह को श्रोताओं जब तीसरे दिन

42:24

का युद्ध आरंभ हुआ तो फूल सिंह पंजाबी भी युद्ध के मैदान में हाथी के ओदे पर चढ़कर

42:30

आया और मनसुख वही बंदी गृह में बंदी बना पड़ा है। मनसुख विचार कर रहा है कि अब

42:38

मुझे कोई नहीं छुड़ाएगा। मेरा भाई नलवी बंदी बन गया तो भगवन क्या होगा? परंतु

42:44

देखिए श्रोताओं जब दूसरे दिन का युद्ध आरंभ हुआ तो राजा नल ने मां भवानी को याद

42:51

किया कि माता आपने मुझे वचन दिया था कि डेढ़ पहर तक मैं सो जाऊंगी तो तुम डेढ़

42:57

पहर तक उस मंदिर में जाकर के सो जाओ। गजमोतनी राजा नल

43:04

दोनों की दोनों युद्ध के मैदान में डटे हुए हैं। गजमोतनी ने फूल सिंह पर जादू

43:10

चलाया और फूल सिंह पर जादू चलाया तो फूल सिंह मूर्छित होकर के जमीन पर गिर पड़ा और

43:16

जैसे ही मूर्छित होकर के जमीन पर गिरा तो नल के पास जल दरियाई घोड़ा था। वीरवरण

43:22

घोड़ा था। सात धार की तलवार थी। नल ने कुछ ही समय में फूल सिंह को बंदी बना लिया।

43:28

मस्के कस ली और घोड़ा पर रख के चल दिया अपने शिविर को। कंपिलगढ़ की सेना भाग गई

43:37

और नरवरगढ़ की सेना ने किले में प्रवेश कर लिया। किले को जीत लिया, विजित कर लिया और

43:44

फूल सिंह की सेना ने हथियार डाल दिए। अब देखिए श्रोताओं इधर फूल सिंह बंदी बना हुआ शिविर में पड़ा

43:53

हुआ है और राजा नल स्वयं फूल सिंह के किले में

43:59

प्रवेश कर जाते हैं। बंदी जितने बने हुए थे उन सबको छुड़ा दिया। अपनी माता को महल

44:06

से उतार लिया। अपने पिता की जेल को छुड़ा लिया। जितने भी जेल में बंदी राजा थे सबको

44:13

मुक्त करा दिया। नरवर नरेश राजा नल्ले श्रोताओं

44:19

इधर क्या होता है मनसुख नहीं मिला क्योंकि मनसुख तो 60 हाथ नीचे एक भक्खी में पड़ा

44:26

हुआ था अब देखो राजा नल अपने माता-पिता को साथ

44:33

लेकर के अपने शिविर में आ जाता है और बंदी फूल सिंह को अपने सामने खड़ा कर लिया फूल

44:38

सिंह से कहने लगा तेगा निकाल के कि फूल सिंह अब तू मरने के लिए तैयार तैयार हो

44:44

जाओ। तो फूल सिंह गिड़गिड़ा जाता है। राजा नल के चरणों को पकड़ लेता है और कहने लगा

44:51

कि हे वीर श्रेष्ठ हे नरवर नरेश मेरी पुत्री सरवती का विवाह मैं आपके साथ किए

44:58

देता हूं। श्रोताओं फूल सिंह ने मनसुख को बंदी ग्रह से मुक्त

45:05

कर दिया और अपनी पुत्री सरवती का विवाह राजा नल के साथ कर दिया। देखिए राजा नल के

45:14

दो से तीन रानियों का उल्लेख मिलता है क्योंकि पहली रानी तो गजमूतनी थी। फिर

45:22

दमयंती और ये बीच में एक सरवती भी आ गई। नगमंती से उसका विवाह नहीं हुआ था। तो

45:28

सरवती का विवाह भी राजा नल के साथ कर दिया था। श्रोताओं मंजा के कथना अनुसार सरती

45:37

राजा नल की बहू बन गई। रानी मंजा की पुत्रवधू बन गई। और बड़े धूमधाम से राजा

45:46

नल ने विवाह किया। विवाह करने के बाद राजा नल अपने माता-पिता की जेल को छुड़ाने के

45:53

पश्चात चल देता है नरवरगढ़ के लिए। परंतु देखिए श्रोताओं मैं आपको एक रहस्य की बात

46:00

बताना चाहता हूं कि सरती नल के साथ रहना नहीं चाहती थी। उसे पता था

46:07

कि मंजा मुझे रोजाना तहाने मारेगी। इसलिए जब मार्ग में सेना जा रही थी तो उसने हाथी

46:14

के हौदे से कूद करके आत्महत्या कर ली थी और उसका प्राणांत वहीं हो गया था। मनसुख

46:21

गुर्जर राजा नल और राजा प्रथम सम्मान सहित

46:26

अपने गढ़ नरवर में आ जाते हैं। अपने माता-पिता की जेल को छुड़ाने के पश्चात।

46:32

तो देखिए श्रोताओं राजा नल ने अपने माता-पिता की कैद को छुड़ा लिया है और

46:37

नरवर में आ गए

 

16.

महाराज अब हमारी पुत्री सयानी हो चुकी है। समय अपनी गति से आगे बढ़ रहा है और कन्या

0:05

अब विवाह योग्य आयु में प्रवेश कर चुकी है। मेरी पुत्री अब विवाह योग्य हो गई है।

0:11

मेरी पुत्री के विवाह के लिए मैं कुछ शर्त रखता हूं। मेरी कुछ शर्तें हैं। पहली शर्त लड़के की

0:18

आयु 20 वर्ष होनी चाहिए। दूसरी शर्त कासिमगढ़ महल के पीछे एक जंगल है। उस जंगल में से भूतों को भागना

0:24

पड़ेगा। तीसरी शर्त मेरे तीन पुत्र हैं। तीनों ही बहुत बलवान है। तीनों पुत्रों को मुझे सहित हराना पड़ेगा। चौथी शर्त ऊपर

0:32

तोरण लटकाया जाएगा। और पांचवी शर्त

0:39

मेरे राज्य के मंदिर में भगवान शंकर की वरदानी एक शेरनी विचरण करती है। उस शेरनी

0:45

को भगाना पड़ेगा। इन पांचों शर्तों का दान जो राजा पूरी

0:50

करेगा वही मेरी पुत्री से विवाह करेगा। समस्त श्रोताओं का, भक्तों का और

0:58

सब्सक्राइबर बंधुओं का एक बार फिर से स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है। श्रोताओं

1:05

जैसा कि आप जानते हैं हमारी कहानी चल रही थी नल पुराण इतिहास से।

1:12

एक राजा हुए थे कासिम सिंह। एक कासिम गढ़

1:18

नामक शहर था। कासिमपुर कह सकते हैं, कासिम गढ़ कह सकते हैं। दोनों लिखित में हैं। कासिमपुर नामक

1:26

एक राज्य था और उस राज्य में एक कासिम सिंह नामक राजा राज्य किया करता था। राजा

1:34

बड़ा प्रतापी था। उस राजा के तीन पुत्र थे। जो एक से एक बढ़कर के बलवान था। उन

1:42

पुत्रों को रणभूमि में हराना इतना आसान नहीं था।

1:48

जो बड़ा पुत्र था उसका नाम था भयंकर सिंह। जो छोटा पुत्र था उसका नाम था बूंदा। और

1:57

एक तीसरे नंबर वाला पुत्र था उसका नाम था विश्वजीत। श्रोताओं तीनों पुत्र एक से एक

2:05

बढ़कर के योद्धा थे। उस राजा के एक पुत्री पैदा हुई और उस पुत्री का नाम था कश्मीरा।

2:14

कश्मीरा बड़ी सुंदर थी। मानो चंद्रमा में से चीर करके निकाली हो। चंद्रमा की कलाएं

2:21

उसके रूप के सामने लज्जित हो जाती थी। श्रोताओं धीरे-धीरे कासिम सिंह का समय

2:28

निकलता गया। और जब कश्मीरा 16 वर्ष की हो गई। देखो श्रोताओं मैं बताना चाहूंगा कि

2:35

हमारे प्राचीन भारत की मर्यादा थी कि लड़की जब 16 वर्ष की हो जाती है तो उसका

2:42

विवाह कर देना चाहिए। और यह माता-पिता के लिए भी हितकर रहता था। जो वर्तमान समय में

2:50

यह विसंगतियां चल रही हैं। आप देख रहे हैं लड़कियों की आयु को खींचना और उसके

2:56

दुष्परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं। जो कि लव मैरिज के रूप में आते हैं। वो उस जमाने

3:02

में नहीं होती थी। तो जब कश्मीरा 16 वर्ष की युवती हो गई तो उसकी माता

3:11

कश्मीरा की माता ने मन में विचार किया कि मेरी पुत्री विवाह योग्य हो गई है और एक

3:18

दिन उसने महाराज कासिम सिंह को अपने महल में बुलाया। उस रानी का नाम था तारावती।

3:25

रानी तारावती ने अपने पति महाराज कासिम सिंह को महल में आमंत्रित किया।

3:33

बांदी को भेजा और बांदी से कहा बांदी महाराज को बुला करके लाइए। श्रोताओं बांदी

3:39

दरबार में पहुंच जाती है और महाराज कासिम सिंह को जो रानी ने कुछ कहा था बुलवाने के

3:47

लिए भेजा था। महाराज कासिम सिंह से कहा कि महाराज आपको रानी साहब याद कर रही हैं।

3:54

श्रोताओं राजा बीच में ही अपनी राज्यसभा को स्थगित करके चल देता है अपने रजवासों

4:01

के लिए। राजा कासिम सिंह अपने महल में चला जा रहा है। जब रानी कश्मीर रानी तारावती ने देखा

4:10

कि महाराज आ रहे हैं तो एक सोने का पलंग बिछा दिया गया और महाराज की अगवानी में

4:19

खड़ी हो गई। श्रोताओं राजा कासिम सिंह आकर के उस स्वर्ण पलिंग पर विराजमान हो जाता

4:26

है। सोने के पलंग पर बैठ जाता है। तब रानी तारावती अपने पति से क्या कहने लगी? हाथ

4:34

जोड़ के कहे भूपते नार तारावत रानी और जल्दी ते ब्याह करो भूपती रह गई सुता

4:41

सयानी कि हे महाराज तुम्हारी पुत्री विवाह योग्य हो गई है। और तारावती क्या कहने लगी

4:48

कि राजा ध्यान लगा सुन वाणी मैं समझाऊं तोए और सानी सुता फिरे घर में वो पत्थर ते

4:56

भारी होए हे महाराज जब घर में सानी सुता

5:01

हो जाती है सानी सानी का मतलब है यहां बड़ी से जबान से विवाह योग्य हो जाती है

5:07

पुत्री तो माता-पिता को नींद नहीं आती। माता-पिता उसकी चिंता में मग्न हो जाते

5:13

हैं कि उसको सुंदर सा एक वर देखना है। उसका विवाह करना है। बड़े-बड़े स्वप्न,

5:18

बड़े-बड़े ख्वाब उनके मन में आते रहते हैं। तो हे राजन हमारी पुत्री कश्मीरावी

5:25

विवाह के योग्य हो गई है। तो क्यों ना कोई अच्छा सा राजकुमार खोजा है और कन्या एक

5:32

सुंदर सा लड़का ढूंढ करके इसका विवाह कर दिया जाए। हमारी पुत्री सयानी होती तो यह बात जब अपनी गति से राजा कासिम सिंह

5:38

ने सुनी और कासिम सिंह कहने लगा प्रवेश कर देखिए रानी तारावती हम राजा हैं और हमारे

5:45

विवाह कुछ शर्तों के अधीन होते हैं तो आपने हमसे कहा है हम अभी नाई और ब्राह्मण

5:51

को बुलाते हैं अपने दरबार का आयोजन करते हैं और जो हमारी कुछ शर्तें हैं उन शर्तों

5:58

को हम एक पत्रिका में लिख देंगे और ना ही ब्राह्मण को टीका देकर के लड़की की सगाई

6:06

करने के लिए भेज देते हैं। देखिए श्रोताओं देखिए श्रोताओं तारावती रानी ने जब महाराज

6:14

कासिम सिंह को समझाया तो कासिम सिंह रानी से कहने लगा रानी बहुत जल्दी ही हमारी

6:20

पुत्री का विवाह करेंगे। तुम निश्चिंत हो जाइए कि नहीं महाराज निश्चिंत मैं तब हो

6:26

सकती हूं जब मेरी पुत्री का विवाह हो जाएगा। मुझे तब तक चैन से नींद नहीं आएगी

6:32

क्योंकि अब मेरी पुत्री विवाह के योग्य हो गई है। श्रोताओं वर्तमान समय तो ऐसा चल

6:37

रहा है कि 16 तो क्या 30 वर्ष की पुत्रियां हो जाती है तो भी माता-पिता को

6:44

नींद आना तो क्या उनके कान पर जू तक नहीं रेंगती है। उन्हें कोई होश नहीं रहता है।

6:49

और उसी के मैं पहले बता चुका हूं दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। तो देखिए श्रोताओं महाराज कासिम सिंह आ जाते हैं

6:57

अपने राज दरबार में। राज दरबार को आमंत्रित कर लिया। बड़े-बड़े सामंत धवलों

7:04

को बुलाया। अपने तीनों पुत्रों को बुलाया। और महाराज कासिम सिंह ने अपना जो ब्राह्मण

7:12

था राजपुरोहित था पंडित बंसीधर उसको

7:18

बुलाया और पंडित जी से कहने लगा कि पंडित जी हमारी पुत्री विवाह योग्य हो गई है और

7:25

हमें आप उन राजाओं का परिचय दीजिए जो हमारे समान बलधारी हो। हमारे विवाह के

7:33

नियमों का पालन करें। हमारी शर्तों को पूरा करें। हम उसके साथ हमारी पुत्री का

7:38

विवाह कर देंगे। तो दरबार कहने लगा कि महाराज आप अपनी शर्तों को बताइए और इस

7:46

पत्रिका में लिखिए। तो महाराज ने पहली शर्त बताई कि मेरी लड़की 16 वर्ष की है।

7:53

लड़के की आयु 20 वर्ष होनी चाहिए। दूसरी शर्त महाराज कासिम सिंह लिखाते हैं

8:01

कि मेरा जो यह क्षेत्र है कासिमपुर इसके चारों तरफ वन है और वन में बड़े-बड़े

8:08

विकराल दानव रहते हैं। उन दानवों को युद्ध करके वन क्षेत्र से भगाना होगा। मेरी

8:15

दूसरी शर्त है। मेरी तीसरी शर्त है तीन मेरे पुत्र हैं और एक से एक बढ़कर के

8:23

योद्धा है। तीनों पुत्रों का सामना उन तीनों पुत्रों को हराना किसी के बस का काम

8:30

नहीं है। उन तीनों पुत्रों को मुझ सहित युद्ध भूमि में पराजित करना पड़ेगा। और

8:37

मेरी चौथी शर्त है और मेरी चौथी शर्त है कि 80 हाथ ऊपर तोरण लटकाया जाएगा। तोरण

8:46

कहते हैं जो विवाह पर दूल्हा उस पर तोरण मारता है। वो तोरण लटकाते हैं बर्फ कन्या

8:52

पक्ष वाले और दूल्हा उस तोरण को एक छड़ी से प्रहार करता है। उसको तोरण मारना कहते

8:58

हैं। तो तोरण मारेगा। वह तोरण 80 गज ऊपर

9:04

होगा। यह मेरी चौथी शर्त है और मेरी पांचवी शर्त है कि मेरे राज्य में एक

9:12

सिंनी विचरती है जो मां भवानी के मंदिर में निवास करती है। भगवान शंकर की वरदानी

9:19

है वो सिंनी से मैंने समझौता कर रखा है कि उस सिंघिनी को मुझे प्रतिदिन एक जानवर

9:27

भेजना पड़ता है उसे भोजन के लिए जो मेरे राज्य से जाता है। उस सिंघिनी को इस

9:34

क्षेत्र से भगा दे। यदि मेरी इन पांचों शर्तों का कोई पालन करे तो वह नरेश

9:42

सहज ही मेरी पुत्री के साथ विवाह कर सकता है। मैं उसके साथ मेरी पुत्री का विवाह कर

9:47

दूंगा। श्रोताओं यह बात जब उसके ब्राह्मण बंसीधर ने सुनी

9:53

तो बंसीधर कहने लगे कि महाराज आप बड़े-बड़े राजाओं के यहां सिक्का को भिजवाइए। शर्तों की एक पत्रिका बना दीजिए

10:01

और मेरे साथ आपका नाई भेज दीजिए। प्राचीन समय में नाई और ब्राह्मण ही विवाह

10:10

तय करते थे। जबकि वर्तमान समय में तो खुद बेटी वाले ही करते हैं। तो देखिए श्रोताओं

10:16

महाराज कासिम सिंह ने और पत्रिका में लिख रहे हैं राम राम आदाब वंचना सब राजाओं को

10:25

लिखा जोहार। कासिमपुर है देश हमारा यहां पर विकट चले

10:30

तलवार। और अपनी शर्तें लिखी। पहली शर्त लिख दी।

10:37

दूसरी शर्त लिख दी। तीसरी, चौथी और पांचों शर्तों को उस पत्रिका में लिख दिया। और

10:43

नीचे कासिमपुर शहर की मोहर लगा दी गई। और अपने हस्ताक्षर कर दिए महाराज ने और

10:51

पत्रिका को सिक्का देकर के नाई और ब्राह्मण को उस पत्रिका को दे दिया और कह

10:57

दिया कि जो नरेश इस पत्रिका को लेगा उसे हमसे युद्ध करना पड़ेगा। हमारी शर्तों को

11:04

निभाना पड़ेगा और उसी के साथ हमारी पुत्री का विवाह होगा। अब देखिए श्रोताओं नाई और

11:12

ब्राह्मण को कासिमपुर नरेश ने महाराज कासिम सिंह ने पत्रिका थमा दी और नाई और

11:20

ब्राह्मण घोड़ों पर असवार होकर के पत्रिका को लेकर के चल देते हैं। तो सबसे पहले नाई

11:28

और ब्राह्मण शहर आगरे पहुंचते हैं। वहां देखा तो वहां उन्हें

11:36

जो वहां का नरेश था उसने पत्रिका को पढ़ करके मना कर दिया।

11:42

श्रोताओं श्रावस्ती उज्जैन

11:47

अवंतिका जितने भी उस समय जनपद थे जांगल प्रदेश

11:54

इत्यादि सभी नरेशों के पास राजा कासिम सिंह के नाई और ब्राह्मण उस

12:01

सिक्का को लेकर के जाते हैं। परंतु जो राजा उस सिक्का की शर्तों को पढ़ता है तो

12:07

वही राजा विवाह करने से मना कर देता है।

12:12

अब देखिए श्रोताओं उस सिक्का को नाई और ब्राह्मण ने समस्त राजाओं के पास वामन गढ़

12:21

थे उस समय वामन गढ़ों पर उस सिक्के को घुमा दिया। सिक्के को लेकर वामन नरेशों के

12:28

पास पहुंच गए जो महत्वपूर्ण राजा थे। परंतु कोई नरेश ने उस सिक्के को नहीं

12:34

लिया। अब तो नाई और ब्राह्मण बड़े परेशान हो गए। घूमते-घूमते

12:40

दो माह का समय निकल गया। परंतु कोई नरेश उस सिक्के को नहीं लेता है। कह देता है कि

12:46

हमारे यहां मरने के लिए कोई फालतू नहीं है। हम ऐसा विवाह नहीं करना चाहते। जिसकी

12:53

मृत्यु आ गई होगी वह इस सिक्के को धारण करवाएगा। सिक्के को अपने बेटे पर चढ़ाएगा।

13:01

श्रोताओं घूमतेघूमते नाई और ब्राह्मण पहुंच जाते हैं श्याम नगर में। जहां

13:07

महाराज मैनपाल गुर्जर राज्य किया करते थे और उसका पुत्र था मनसुख। मनसुख की आयु 20

13:15

वर्ष की थी। मनसुख कुछ समय पहले ही

13:20

नरवरगढ़ नरेश नल के माता-पिताओं की कैद को छुड़वा के लाए थे। बड़े विकट योद्धा थे

13:28

महाराज मनसुख। महाराज मैनपाल के पुत्र। तो जब महाराज मैनपाल का दरबार लग रहा था

13:36

उसी दरबार में नाई और ब्राह्मण प्रवेश करते हैं। नाई और ब्राह्मण को देखकर के

13:42

महाराज मैनपाल ने उन्हें बैठने के लिए उचित आसन का प्रबंध किया। सम्मान सहित आसन

13:50

पर बैठाया। जब नाई और ब्राह्मण बैठ गए तो महाराज मैनपाल पूछने लगे कि कहो ब्राह्मण

13:57

देव किस वजह से आपका आना हुआ कि महाराज हम

14:02

कासिमपुर के महाराज कासिम सिंह के नाई और ब्राह्मण हैं।

14:07

महाराज उनकी पुत्री कश्मीरा बड़ी सुंदर है। बड़ी रूपवती है। चंद्रमा भी उसके

14:15

सामने लज्जित हो जाता है। उस पुत्री का विवाह उसका सिक्का हम किसी राजा के पुत्र

14:22

पर चढ़ाने आए थे। परंतु हे महाराज हम समस्त राजाओं के पास गए। किसी राजा ने

14:29

सिक्के को नहीं लिया। मैनपाल कहने लगा कि क्यों? क्या कारण था कि महाराज

14:37

उस सिक्के की कुछ शर्तें हैं। देखिए श्रोताओं मैनपाल उस सिक्के को पढ़ रहा है।

14:44

सिक्के को जब मैनपाल ने पढ़ा तो मैनपाल मन में विचार करने लगा कि मैं इस सिक्के को

14:51

कभी नहीं ले सकता। क्योंकि यह सिक्का तो मेरे इस सेना सहित राज्य का नाश कर सकता

14:57

है। इसलिए नाई ब्राह्मण से कहने लगा कि देखो ब्राह्मण देव तुम्हारे महाराज की

15:03

शर्तें बहुत बड़ी हैं और इन शर्तों का पालन होना संभव नहीं है। देखिए श्रोताओं

15:09

जहां होनी बलवान होती है। भाग्य का लिखा कभी नहीं मिट सकता। तो नरवर नरेश महाराज

15:17

नल अपने मित्र मनसुख से मिलने के लिए उसी समय श्याम नगर को आ रही थी। जब मनसुख ने

15:26

नल को आता हुआ देखा तो मनसुख मन में विचार करने लगा कि मेरा पगड़ी पलटा यार आ गया।

15:32

मेरा परम मित्र आ गया और अब इस सिक्के की देखी जाएगी। महाराज नल महाराज मैनपाल के

15:39

दरबार में पहुंच जाते हैं। महाराज मैनपाल ने नरवर नरेश का बड़ा स्वागत किया और

15:46

उन्हें उचित आसन पर बैठाया। श्रोताओं राजा नल महाराज मैनपाल के दरबार

15:53

में बैठ जाते हैं और जब महाराज मैनपाल के चेहरे की तरफ देखा तो महाराज का चेहरा

16:01

उदास था। नल पूछने लगा कि हे महाराज हे श्यामनगर नरेश मुझे यह बताएं कि आपकी

16:08

चिंता का कारण क्या है? आपका चेहरा मुझे उदास दिखाई दे रहा है। क्या बात है

16:15

महाराज? तो महाराज मैनपाल कहने लगे बेटे नल क्या बताऊं तुझे? राजा कासिम सिंह का

16:23

एक खत मेरे पास आया है। उसने सिक्का भिजवाया है मेरे पुत्र मनसुख का विवाह

16:30

करने के लिए। परंतु बेटे उसकी शर्तें ऐसी हैं कि मैं उन शर्तों का पालन नहीं कर

16:36

सकता। उन शर्तों को पूरा नहीं कर सकता। नल कहने लगा महाराज आप सिक्का को मुझे

16:44

पढ़वाइए तो सही। उस सिक्के की शर्त क्या है? वो पत्रिका दीजिए। श्रोताओं नल ने जब

16:51

उन पत्रिकाओं को पढ़ा। जो सिक सिक्का के साथ पत्रिका आई थी। उस पत्रिका को महाराज

16:58

नल ने पढ़ा। तो पहली शर्त थी लड़का 20 वर्ष का होना चाहिए। तो नल कहने लगा

17:04

मैनपाल सिंह महाराज हमारा मित्र 20 वर्ष का हो चुका है। पहली शर्त को हम बखूबी

17:11

निभाते हैं। दूसरी शर्त थी कि

17:17

दानवों को मारना होगा। कासिमपुर क्षेत्र है उसके चारों तरफ वन है और उस वन में

17:23

दाने रहते हैं। उन दानों को मारना होगा। नल कहने लगा कि महाराज मैंने अब तक कितने

17:30

ही दानों को मार दिया। मुझे किसी दाने से डर नहीं लगता। इस शर्त का पालन भी हो

17:36

जाएगा। यह भी पूरी हो जाएगी। महाराज तीसरी शर्त पढ़िए कि तीसरी शर्त यह है जो तोरण

17:44

है वो 80 गज ऊपर लटकाया जाएगा। नल कहने लगा कि महाराज 200 गज ऊपर लटकवा दो। तोरण

17:51

मार दिया जाएगा। मेरे पास वीरवरन नामक घोड़ा है। जल थल गगन तीनों में समान गति

17:58

से चलता है। तो मैं तीसरी शर्त का पालन भी कर सकता हूं। ये भी हो जाएगी पूरी महाराज

18:05

चौथी शर्त पढ़िए। तो चौथी शर्त लिखी थी कि मेरे तीन पुत्र भयंकर सिंह विश्व विश्व

18:15

विश्वजीत और बूंदा इन तीनों से युद्ध करना पड़ेगा।

18:20

साथ में मैं भी हराना पडूंगा। जब मुझे और मेरे पुत्रों को हरा दोगे। यह मेरी अगली

18:26

शर्त होगी। राजा नल कहने लगे महाराज ये भी कोई बड़ी शर्त नहीं है। ये भी हो जाएगा

18:33

काम। परंतु अगली शर्त क्या है? उसे पढ़िए कि मेरे देवी के मंदिर में एक शेरनी रहती है।

18:42

उस शेरनी से मेरा समझौता है। मुझे प्रतिदिन उसको एक जीव भेजना पड़ता है। एक

18:49

कोई उसको भोजन के लिए कोई जानवर भेजना पड़ता है और वह उसे खाती है। मेरे राज्य

18:55

में पशुओं की कमी आ चुकी है। उसको मंदिर से भगाना होगा। राजा नल कहने लगा कोई बात

19:02

नहीं है। यह भी माता भवानी के प्रताप से हो जाएगा। महाराज आप सिक्का को मेरे मित्र

19:09

पर चढ़वाइए। श्रोताओं नल ने मैनपाल तो मना कर रहा था परंतु नल ने जबरदस्ती से नाई और

19:17

ब्राह्मण से सिक्का को मनसुख पर चढ़वा दिया। और मनसुख से कह दिया मित्रों विवाह

19:25

की तैयारी की जाए और नाई और ब्राह्मण को सहर्ष सम्मान सहित

19:32

विदा कर दिया। नाई ब्राह्मण कहने लगे यह बहुत अच्छा हुआ। हमारा क्लेश मिट गया।

19:39

फांस कट गई। हम तो बड़े परेशान थे क्योंकि कोई सिक्का को ले नहीं रहा था। परंतु यह

19:46

बहुत अच्छा हुआ। सिक्का को चढ़ाकर के नाई ब्राह्मण पहुंच जाते महाराज कासिम सिंह के

19:53

दरबार में। महाराज कासिम सिंह से कहने लगे कि महाराज सिक्का को श्याम नगर के महाराज

20:01

मैनपाल के पुत्र मनसुख पर चढ़ा दिया है और वह आपके समस्त शर्तों का पालन करने के लिए

20:07

तैयार है तो इधर कासिम सेन भी अपनी तैयारी

20:12

आरंभ कर देता है। प्रसन्न हो जाता है। कासिम सेन कहने लगा कि चलो कोई महाराज तो

20:19

ऐसा हुआ। कोई नरेश तो ऐसा हुआ जिसने मेरी पुत्री का सिक्का अपने पुत्र पर चढ़ा

20:24

लिया। अब हमें हमारी तैयारियां करनी चाहिए। देखिए श्रोताओं उधर कासिम सिंह

20:31

अपनी तैयारियां आरंभ कर देता है। सेना को सुसज्जित कर रहा है। और इधर राजा नल ने भी

20:38

मनसुख से कह दिया मित्र 1 लाख की फौज तुम्हारी है और 1 लाख फौज मेरे पास है। हम

20:45

दोनों मित्र चलेंगे और बलपूक उस राजा की समस्त शर्तों का पालन करते हुए तुम्हारा

20:52

विवाह करके लाऊंगा। आदेश दे दिया अपनीप सेनाओं को कि सुसज्जित

21:00

हो जाओ और आदेश दे दिया अपनीपनी फौजों को कि

21:05

समस्त सेनाएं कासिमगढ़ की तरफ कच करें। तो देखिए श्रोताओं 2 लाख की फौज 1 लाख की

21:13

सेना नल के पास थी और 1 लाख की सेना मनसुख गुर्जर के पास थी। दो लाख की फौज तैयार हो

21:20

गई सज के। हाथी, घोड़ा, पैदल समस्त प्रकार की सेनाएं, चतुरंगिणी सेनाएं तैयार हो गई।

21:30

रण के बाजे बजने लगे और मनसुख को बरना बना दिया गया। दूल्हा बनाया जा रहा है। उसके

21:37

माथे पर मोहर बांध दी गई। शरीर पर हदी लगा दी गई। हाथ में कंगन बांध दिया गया। जिसको

21:44

कखना कहा जाता है। और राजा

21:49

नल ने अपने मित्र मनसुख को तैयार करके एक रथ 10 पहिया का एक रथ सजवा करके तैयार कर

21:57

दिया और उस रथ में बैठाने के लिए अपने मित्र को ले जा रहा है। और जैसे ही

22:03

श्रोताओं रथ के जो पेंद बोलते हैं उसको जैसे फुट रेस्ट होता है ऐसा होता है। उस

22:10

पर पैर रखा और वैसे ही सामने से छींक हुई और जब सामने से छींक हुई तो मनसुख गुर्जर

22:19

के ब्राह्मण बंसीधर कहने लगे कि बेटे मनसुख सामने से छींक हो गई है। अभी थोड़े

22:26

समय के लिए आप नीचे आ जाए तो देखिए श्रोताओं कुछ काशुन और अपशकुन भी होते

22:32

हैं। यानी सामने की छींक होती है वो बहुत बेकार होती है।

22:38

कुछ अशुभ समय होता है उसे टालने के लिए सामने से छींक होती है कि आप इस समय थोड़ा

22:44

रुक जाएं। कहीं-कहीं जैसे कहते हैं कि मार्ग को बिल्ली काट गई तो वो भी एक अपशकुन माना

22:51

जाता है। ये अपशकुन होते हैं और अच्छे समय तक रुकने के लिए ये इंतजार करने की कहते

22:59

हैं। यदि हम इन समयों पर रुक जाते हैं तो हमारे साथ कोई अनहोनी होने से हमारा बचाव

23:06

हो जाता है। ऐसा वेद शास्त्रों का मानना है। जब सामने से छींक हुई तो बंसीधर

23:12

ब्राह्मण ने रोकना चाहा कि आप रथ से नीचे

23:19

उतर जाएं। तो नल कहने लगे कि पंडित जी हम भारतीय हैं।

23:26

हे ब्राह्मण देव चाहे पश्चिम दिशा में सूर्य क्यों ना हो लेकिन भारत के शूरवीर

23:33

कभी भी अपनी आन से नहीं हटते। कहते हैं कि जो सुर शूरवीर होते हैं जो

23:41

रणवं होते हैं वो कभी भी पीछे कदम नहीं रखते। मित्र बैठ जाइए अपने रथ पर विराजमान

23:48

हो जाइए। श्रोताओं पंडित बंसीधर की बात को इंकार करते हुए नकारते हुए राजा नल और

23:57

मनसुख गुर्जर दोनों मित्र अपने रथ पर विराजमान हो जाते हैं। सेना को आदेश दे

24:02

दिया कि कच किया जाए। दो लाख की फौज पलटन के साथ

24:09

मनसुख गुर्जर श्रोताओं 2 लाख की फौज मनसुख गुर्जर और राजा नल की

24:16

कासिमपुर के लिए प्रस्थान कर देती है। कोच कर देती है और रण के बाजे बजवा दिए जाते

24:23

हैं। दोनों मित्र पगड़ी पलटाया नल और मनसुख एक ही रथ में विराजमान है और साथ

24:30

में महाराज मैनपाल सेना का संचालन करते हुए चल रहे हैं। अब देखिए श्रोताओं,

24:38

पहले दिन का पड़ाव क्योंकि नरवरगढ़ के कुछ

24:43

आगे ही श्यामनगर था। और श्यामनगर और नरवरगढ़ से

24:50

जब कासिमपुर के लिए जाना था, तो वहां बंगाला देश पड़ता था। ये बंगाला प्राचीन

24:57

समय में बहुत बड़ा क्षेत्र था और जहां जादू का गढ़ था। मां कामा देवी के क्षेत्र से

25:04

लेकर के वर्तमान बंगाल विहार का कुछ हिस्सा उस बंगाले में आता था। प्राचीन काल के बंगाले में। तो

25:13

पहले दिन का सफर करने के बाद सेनाओं ने एक बंकिमगढ़ नामक स्थान है।

25:21

वहां पर अपना पड़ाव डाला। और उससे अगले

25:26

दिन का जो उनका कूच था। प्रस्थान किया। सेनाएं चली तो और किसी शहर में ठहर गई और

25:35

उससे अगले दिन तीसरे दिन सेनाओं ने बंगाल के बॉर्डर पर अपना पड़ाव डाल दिया। बंगाल

25:42

की सेम पर सेनाएं आ गई। दो लाख की फौज पलटन और महाराज

25:48

मैनपाल उसके दोनों पुत्र नल और मनसुख नल को भी वो

25:55

पुत्र के समान मानते थे। दोनों पगड़ी पलटा यार अपनी सेना के साथ

26:00

हैं। श्रोता वो पड़ाव डल गया है और शिविर लगा दिए गए हैं। शिविरों के बीच में एक

26:07

बहुत बड़ा सुसज्जित तंबू तैयार किया गया और उस तंबू में जो दूल्हा होता था मनसुख

26:15

गुर्जर। उस मनसुख को उस तंबू में बहुत बड़ी सुरक्षा के बीच में सुलाया जाता था।

26:23

वहां सोता था मनसुख और उसके साथ में उसका पगड़ी पलटा यार। चार कला से अवतार स्वयं

26:31

राजा नल उनके साथ रहते थे। अब देखिए श्रोताओं यहां से आगे बड़ा रोचक प्रसंग

26:37

आरंभ होता है। बंगाल के बॉर्डर पर सेना रुक जाती है और रात्रि का समय होने को है।

26:45

दोनों मित्र भोजन करने के पश्चात अपने शिविर में चले जाते हैं। सेनाओं के

26:51

सेनापति जो कुछ हैं वो गस्त कर रहे हैं। दो लाख की फौज पड़ी हुई है शिविर लगा के।

26:58

हाथी, घोड़ा और पैदल समस्त प्रकार की सेनाएं पड़ी हुई है और आराम कर रही है।

27:06

सेनाओं का पड़ाव बहुत दूर तक दिखाई दे रहा है। जैसे मानो

27:12

कोई सेना का समंदर उमड़ रहा हो। इसी बीच

27:17

बंगाले से एक लड़की धोबी की लड़की और उस लड़की का नाम था चंद्रवती।

27:25

चंद्रवती नाम की एक परम सुंदरी कन्या। जादू में निधान थी। 14 विद्याएं जानती थी।

27:33

आपको एक बात और बताना चाहूंगा कि प्राचीन बंगाल में जितना जादू होता था वो औरतों के

27:39

पास होता था। तो चंद्रकला 20 वर्ष की उम्र और चंद्रमा के समान सुंदर

27:47

लड़की विहार करने के लिए चल देती है। रात्रि का समय था। जब उस चंद्रकला ने उस

27:54

बंगाले के बॉर्डर पर आई तो वहां देखा कि सेना का एक समुद्र पड़ा हुआ है। विशाल

28:01

सेना पड़ी हुई है। तो चंद्रकला मन में सोचने लगी कि इतने लोग कहां से आए? इतने

28:07

हाथी, इतने घोड़ा, इतनी फौज पलटन है। यह

28:13

कोई राजा है और या तो किसी राजा पर चढ़ाई करने जा रहा है या फिर कहीं निकल कर के जा

28:20

रहा है। क्या कारण है मुझे इसकी जांच करनी चाहिए। तो चंद्रकला ने अपना जादू का

28:27

पिटारा निकाला। और उस सेना पर जादू चला दिया। जितने भी पहरेदार थे, सब सो गए।

28:34

जितने शूर सिपाही थे सब सो गए और सबको सोने के बाद चंद्रकला उस शिविर में घूम

28:41

रही है। सेनाओं के उस विशाल समुद्र में घूम रही है। चंद्रकला ने देखा कि चारों

28:47

तरफ सैनिकी सैनिक पड़े हुए हैं। परंतु ये बहुत बड़ा सुसज्जित तंबू लगा हुआ है। इस

28:53

तंबू में क्या है? मुझे इसको चलकर देखना चाहिए। चंद्रकला ने उस तंबू में प्रवेश

28:59

किया तो देखा दो सुंदर राजकुमार सो रहे हैं। दोनों की छवि देखते ही बनती थी। चंद्रमा

29:08

के समान सुंदर उन्हें देखकर के चंद्रकला

29:14

मन में प्रसन्न हो जाती है और कहने लगी कि हे मां भवानी

29:19

आज मेरी सुन ली। मुझे तो ऐसे ही पतियों की आवश्यकता थी। मैं इसीलिए तो अब तक कुमारी

29:27

थी। मैंने विवाह नहीं करवाया। और आज मैं इन दोनों का अपहरण करके ले जाऊंगी। देखिए

29:33

श्रोताओं तंबू में बैठी बैठी विचार कर रही है कि किसको ले चलना चाहिए नल को या मनसुख

29:42

को क्योंकि मनसुख तो दूले बन रहा था और नल की जो शोभा थी सुंदरपन था वो मनसुख से

29:50

कहीं 10 गुना अधिक था दोनों की उम्र लगभग बराबर थी दोनों समान आयु के

29:58

मित्र थे अब श्रोताओं चंद्रकला ने विचार विमर्श किया और विचार करके मन में आया कि

30:05

मेरी छोटी बहन वीरवती और है। हम दोनों बहनों को ये दोनों राजकुमार बड़ी उपयुक्त

30:12

रहेंगे। क्यों ना इन दोनों राजकुमारों का अपहरण कर लेती हूं। देखिए श्रोताओं जादू

30:19

में प्रवीण उस धोरी की पुत्री चंद्रकला ने अपना जादू चलाया।

30:25

जादू चलाने के पश्चात पलंग सहित तंबू में से दोनों राजकुमारों को उठा लिया और दोनों

30:32

को आकाश मार्ग से लेकर के चल देती है। चली जा रही है और कुछ ही समय में अपने शहर

30:40

बंगाल में आ जाती है। बंगाले में आ गई। अपने घर ले आई और घर ला के मंत्र फूंका और

30:49

नल को तोता बना दिया और मनसुख को बैल बना दिया। नल को तोता बनाकर के पिंजरे में बंद

30:57

कर दिया और मनसुख को बैल बना के खूंटे से बांध दिया। अब देखिए श्रोताओं बड़ा

31:04

विचित्र काम हो गया। इधर मनसुख विचार कर रहा है कि मैं विवाह करने जा रहा था और

31:10

यहां ये कैसा विवाह हुआ। जब प्रातः काल हुआ तो महाराज मैनपाल जगे।

31:18

समस्त शूर सिपाही सेना सेनापति धवल सामंत सब जाग गए। चलने की तैयारी करने

31:26

लगे। परंतु महाराज मैनपाल को तभी एक सैनिक ने सूचना दी कि महाराज जिस शिविर में

31:32

दोनों राजकुमार थे उनमें से एक भी राजकुमार शिविर में नहीं है। यह बात महाराज मैनपाल ने सुनी तो महाराज

31:39

मैनपाल कहने लगे कि दोनों मित्र हैं कहीं घूमने निकल गए होंगे। थोड़ी बहुत देर में

31:44

आते होंगे। परंतु श्रोताओं घंटे दो घंटे इंतजार किया। कोई सूचना नहीं मिली। ना

31:51

मनसुख आया और ना नल आया। अब तो बड़े सोच में पड़ गए कि जब तक दूल्हे नहीं होगा तो

32:00

बारात कैसे जाएगी? बिना दूल्हे के बारात कैसी होती है? यह विचार कर रहे हैं और

32:06

बंगाल के बॉर्डर पर उन्हें विचार करते करते 12:00 बज जाते हैं। परंतु ना तो राजा

32:13

नल आया कहीं से और ना मनसुक आया। होश उड़ गए महाराज के। महाराज मैनपाल घबरा

32:20

गए कि हे भगवन ये क्या हुआ? मेरे दोनों पुत्र कहां गए? उनका कोई अता पता नहीं। आज

32:27

से यह बेल तेरा पति है। दिन में इसे कोलू के बैल की तरह जोतना और रात में इंसान बना

32:33

देना। उस चंद्रकला नामक लड़की ने अपनी बहन वीरमती को बुलाया और उससे कह दिया कि जो

32:39

बैल बना हुआ है ये तेरा पति है और जो तोता बना हुआ है ये मेरा पति है। इसके साथ

32:45

विवाह मैं करूंगी और इसके साथ विवाह तू कर लेना। दिन को इसको बैल बना के कोलू में

32:51

जोतना है और रात्रि को आदमी बनाने बना लेना है। तो श्रोताओं वीरमती ने उस बैल की

32:58

सेवा करना आरंभ कर दिया। दिन को तो मनसुख को कोलू में जोता जाता था और रात्रि को

33:04

मनुष्य बना लिया जाता था। बड़ी विचित्र घटना हो रही है मनसुख के और नल के साथ। नल

33:10

को रात्रि में मनुष्य और दिन में तोता। नल कहने लगा उस लड़की से कि देखिए लड़की तू

33:16

ध्यान से सुन मैं मेरे मित्र का विवाह करने जा रहा था परंतु तेने हमारे साथ बड़ा

33:23

धोखा किया है। हम विवाह के लिए कासिमपुर जा रहे थे। परंतु तेने मार्ग में ही हमारा

33:28

अपहरण कर लिया। इसका परिणाम बहुत बुरा होगा और तुझे भुगतना पड़ेगा। वो लड़की

33:35

कहने लगी चंद्रकला कि चुपचाप तोता बने बैठे रहो। आप कुछ नहीं कर सकते। यहां ये

33:43

जादू का क्षेत्र है और हमारा गढ़ है। यहां हमें कोई जादू में पराजित नहीं कर सकता।

33:49

श्रोताओं नल राजा और मनसुख चिंता मग्न है। इधर देखिए महाराज मैनपाल ने चारों तरफ दूत

33:58

भेजे। परंतु नल का और मनसुख का कोई अता-पता नहीं लगा। अब देखिए मैनपाल ने

34:06

सोचा कि दोनों राजकुमार कहीं हो सकता है नरवरगढ़ या श्यामनगर चले गए हो किसी कारण

34:12

से तो उन्होंने दो विशेष प्रकार के दूत बुलाए जो चलने में बड़े सफल थे। हर काम को

34:20

बड़ी कुशलता से कर लेते थे। दोनों सैनिकों को आदेश दिया कि तुम श्यामनगर जाओ और तुम

34:27

नरवरगढ़ जाओ और देख के आओ कहीं राजा नल और मनसुख श्यामनगर या नरवरगढ़ तो नहीं चले

34:33

गए। श्रोताओं सेना पड़ी हुई है। तीन दिन सेनाओं को पड़े पड़े हो गए। तीन दिन का

34:39

सफर करने के बाद दोनों सैनिक एक श्याम नगर पहुंचता है और एक

34:47

नरवरगढ़ पहुंचता है। श्याम नगर में नलका और मनसुख का कोई पता नहीं है। नरवरगढ़ में

34:54

भी नलका और मनसुख का कोई पता नहीं है। तभी महारानी गजमोतनी

34:59

राजा नल की पत्नी उसने देखा। रानी मंझा ने देखा और महाराज प्रथम ने देखा तो सैनिक से

35:07

कहने लगे कि सैनिक तुम यहां कैसे आए कि महाराज बंगाल की सेम पर सेनाएं पड़ी हुई

35:14

है और ना जाने नल और मनसुख का अपहरण किसी

35:19

ने कर लिया है। उनका कोई पता नहीं है। तो गजमोतनी सोचने लगी कि यह काम अवश्य किसी

35:26

जादूगरनी का है। और बंगाला मैं जानती हूं वहां जादू का कोई ठिकाना नहीं है। संपूर्ण

35:33

देश जादू से भरा हुआ है। अब उनको छुड़ाने के लिए मुझे कुछ करना होगा। श्रोताओं उस

35:41

सैनिक से रानी गजमतनी कहने लगी कि देख सैनिक

35:47

मैं तेरे साथ चलती हूं और इसकी अनुमति मैं महारानी मंझा से लेकर के आती हूं। महाराज

35:54

प्रथम से लेकर के आती हूं। श्रोताओं गजमोतनी महाराज प्रथम और मंजा के कक्ष में

36:00

पहुंच जाती है और महाराज प्रथम से और मंझा से कहने लगी कि हे महाराज हे मातेश्वरी

36:09

मुझे आप बंगाल के बॉर्डर तक जाने की अनुमति दीजिए कि क्यों पुत्री कि मैं

36:15

जानती हूं बंगाला जादू का देश है। मैंने आपको जहां से कैद छुड़ाई थी उस समय बंगाले

36:22

को देख लिया था। बंगाल में चारों तरफ जादू है। वहां की हर स्त्री जादूगरनी है। और

36:30

निश्चित ही मेरे पति और मनसुख देवर का किसी ने अपहरण किया है। किसी नारी ने हो

36:36

सकता है उन्हें तोता या बकरा बना रखा हो या बैल बना रखा हो। मुझे जाने की अनुमति

36:42

दीजिए। श्रोताओं मंझ रानी कहने लगी कि पुत्री तुम यदि इस वेश में जाओगी तो मार्ग

36:49

में कोई खतरा हो सकता है कि नहीं मैं आज ही सैनिक वेशभूषा तैयार करती हूं और मैं

36:55

सैनिक भष में जाऊंगी। अब देखिए श्रोताओं इधर गजमोतनी ने सैनिक का भष बनाया। जनाना

37:03

भष उतार के फेंक दिया। और मर्दाना भष धारण कर लिया और एक घोड़े

37:09

पर सवार होकर के उस सैनिक के साथ चल देती है बंगाले के बॉर्डर की तरफ। तीन दिन का

37:16

सफर करने के बाद गजमोतनी और वह सैनिक दोनों पहुंच जाते हैं बंगाल के बॉर्डर पर

37:23

जहां महाराज मैनपाल अपनी सेना के साथ पड़े हुए हैं। महाराज मैनपाल बड़े व्याकुल हैं।

37:29

कुछ कर नहीं सकते विवश हैं। इधर पहले श्यामनगर से जो सैनिक भेजा था उसने आकर के

37:36

सूचना दी कि महाराज मनसुख और राजा नल श्यामनगर तो नहीं

37:41

पहुंचे। कुछ देर के बाद गजमोतनी और वह सैनिक दोनों आ जाते हैं। उस सैनिक को देख

37:49

के गजमोतनी को देख के मैनपाल कहने लगा कि इस सैनिक को कहां से लाए आप? तो वह सैनिक

37:55

कहने लगा महाराज ये एक विशेष प्रकार का सैनिक है। विशेष सुसज्जित सैनिक है और ये

38:02

गुप्तचर जानता है। इसलिए इस सैनिक को मैं आपकी सेवा में लेकर के आया हूं। मैनपाल

38:09

कहने लगा तब तो चलिए हमें इस समय इसकी आवश्यकता भी है। अब श्रोताओं गजमोतनी ने

38:17

उस सैनिक से कह दिया था कि तुम्हें मेरा भेद नहीं बताना है। नहीं महाराज मैनपाल क्रोधित हो जाएंगे। श्रोताओं गजमोतनी ने

38:26

दूसरा दिन हुआ। महाराज मैनपाल रो रहे हैं। विलाप कर रहे हैं। विलाप चल रहा है। उनका

38:32

रुदन चल रहा है कि मेरे पुत्रों को कौन ले गया। खोज चल रही है लेकिन कोई भी बंगाल के

38:39

भीतर घुसने का दुस्सा नहीं कर सकता था। अब गजमोतनी ने मन में विचार किया कि मुझे

38:46

कुछ करना होगा। मेरे पति और मनसुख देवर को सात दिन हो गए।

38:53

वहां वो बैल और तोता बने पड़े हैं। और वो भी आंसुओं से अश्रुधारा से रो रहे हैं।

39:00

उनकी आंखों से भी अश्रुधारा और वे दोनों

39:06

भी बड़े दुखी हैं। वो भी रो रहे हैं। यह सोच कर के गजमोतनी ने एक नटनी का भष धारण

39:14

किया। एक नटनी का बाना धारण किया और नटनी का बाना धारण करके चल देती है उस शहर के लिए।

39:25

जहां नल और मनसुख तोता और बैल बने हुए दो

39:31

लड़कियों की कैद में है। अब देखो श्रोताओं गजमोतनी चली जा रही है और उधर से वो

39:41

चंद्रवती और वीरवती दोनों बहन अपने अपने पतियों को लेकर के राजा नल और मनसुख को

39:48

लेकर के चल देती है कि आज इनके साथ हमें जंगल में विहार करना है।

39:54

श्रोताओं दोनों उन्हें ले आती है और ला के दोनों खड़े कर दिए। तो वीरमती कहने लगी

40:03

चंद्रकला से कि बहन पहले तुम्हारे जो पति है तोता है इसको आदमी बनाओ।

40:10

तो चंद्रकला ने मंत्र फूंका और नल को आदमी बना दिया। और जैसे ही नल अपने भष में आया

40:18

तो नल ने अपना तेरा खींच लिया कि तुझे काट देता हूं। तो वीरवती कहने लगी जल्दी से

40:25

मंत्र पढ़ इसे तोता बना और फिर मंत्र पढ़ के वापस नल को तोता बना दिया। हाथ में

40:31

पिंजरा लग रहा है और एक जो छोटी थी वीरवती उसने बैल को पकड़ रखा है। दोनों भ्रमण कर

40:38

रही है और तभी वहां गजमोतनी आ जाती है। नटनी का भेष था। गजमोतनी ने देखा तो

40:46

पहचानने में देर नहीं लगी। गजमोतनी समझ गई कि इन दोनों बहनों ने ही इनको परेशान कर

40:54

रखा है। इनका अपहरण किया है। मुझे अभी इनको मुक्त कराना होगा। श्रोताओं गजमोतनी

41:00

के बारे में मैं आपको पहले ही बता चुका हूं कि उस समय यानी मैं आपको बताऊंगा

41:06

गजमोतनी और नल का कार्यकाल है। उनका जो उत्पन्न होने का समय है, उनका राज्य काल

41:13

है। यानी त्रेता युग के बाद में। त्रेता युग और द्वापर युग के पहले अर्थात दोनों

41:20

का संधि काल कह सकते हैं हम क्योंकि भगवान राम के वंश में ही पैदा हुआ था नल एक दिन

41:26

इस पर मैं अलग से वीडियो बना दूंगा कि किस काल में पैदा हुए थे नल राजा और मंसुक

41:31

गुर्जर। अब देखो श्रोताओं उस जमाने में गजमतनी के समान दूसरा जादूगर

41:38

कोई नहीं था। तो गजमोतनी ने देखा कि दोनों लड़कियों के साथ हमारे पति और देवर हैं।

41:45

तो क्यों ना इस मौके का फायदा उठाया जाए। गजमतनी ने अपने वीरों का स्मरण किया। अपने

41:51

शरीर को कीलित किया। सुरक्षा चक्र बनाया और सुरक्षा चक्र बनाकर के उस लड़की

41:56

चंद्रकला से कहने लगी कि हे लड़की तुम्हारा यह तोता बड़ा सुंदर है। इस तोते

42:03

को मुझे दे दीजिए। तो वह चंद्रकला कहने लगी कि जा तू कौन होती है नटनी इस तोता को

42:10

इससे तो मैं विवाह करूंगी। यह तो मेरा पति है। गजमतनी ने उसे समझाया कि तुम्हारी

42:16

मृत्यु को निमंत्रण दे रही हो। तो चंद्रकला कहने लगी कि आप नहीं जानती शायद

42:22

ये बंगाला है। यहां पर विद्याओं की कमी नहीं है। एक से एक बढ़कर के विद्या है।

42:28

तुझे भी यदि कोई कुतिया बनना है या कोई

42:34

चिड़िया बनना है। तुझे भी यदि चिड़िया बन करके मेरे इस पिंजड़े में बंद रहना है। तो

42:40

आइए श्रोताओं जब ऐसे चंद्रकला ने कहा तो गजमतनी ने मंत्र को आमंत्रित किया। और

42:48

चंद्रकला पर छोड़ दिया। और चंद्रकला पर जैसे ही मंत्र छोड़ा तो चंद्रकला की उसने

42:56

एक चिड़िया बना दी। और चिड़िया बना करके पकड़ लिया अपने हाथ में। जब वीरमती ने

43:01

देखा कि मेरी बहन को इसने चिड़िया बना लिया है। तो वीरमती सामने आई और तभी

43:07

गजमतनी ने फिर मंत्र का प्रहार किया। और उसने अपने मंत्र से उस वीरमती को भी

43:13

चिड़िया बना दिया। दोनों बहनों को चिड़िया बना के पिंजरे में कैद कर लिया और नल और

43:19

मनसुख को लेकर के गजमोतनी चली आती है अपने शिविरों की तरफ।

43:25

जब शिविर से कुछ दूर रह गई तो गजमतनी ने नल को और मनसुख को खड़ा किया और खड़ा करने

43:34

के बाद एक पात्र में जल लिया। जल को अभिमंत्रित किया और नल पर और मनसुख पर

43:40

छींटे मारे और जैसे ही छींटे मारे तो नल और मनसुख पूर्ववत हो गए। और जब दोनों

43:47

पूर्ववत हुए तो गजमोतनी एक वृक्ष की ओठ ले जाती है। नल कहने लगा मनसुख से कि मनसुख

43:54

सिवाय गजमोतनी के कोई दूसरा ऐसा नहीं हो सकता जो हमारी कैद छुड़ा ले। अवश्य ही

44:00

गजबतनी आई है। मनसुख कहने लगा कि हां भाई नल भाभी ही एकमात्र ऐसी है जो हमें छुड़ा

44:07

सकती है। बंगाले की विद्या का तोड़ उसके पास है। देखा जाए कहां है उसको? तो

44:14

उन्होंने खोज की तो गजमोतनी एक वृक्ष की ओठ में खड़ी हुई है। नल उसे पहचान जाता

44:19

है। नल कहने लगा कि गजमोतनी अब तू हमसे छिपे मत। और हम जानते हैं कि तेरे बिना हम

44:26

कासिमपुर को विजय नहीं कर सकते। तुझे हमारे साथ चलना होगा। बंगाले का यह बॉर्डर

44:33

यह सीम हमें पार करानी होगी। श्रोताओं नल

44:38

मनसुक और गजमोतनी तीनों अपने शिविर में अपनी सेना के पास आ जाते हैं। और जब

44:44

महाराज मैनपाल ने देखा कि उसका पुत्र राजा नल और उसकी नल की पत्नी गजमोतनी तीनों एक

44:52

साथ आ रहे हैं तो मैनपाल की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैनपाल कहने लगा कि नल

44:59

तू क्या ससुराल चला गया था? तो मनसुख कहने लगा नहीं महाराज हमें इस बंगाले की ये दो

45:07

लड़कियां जो देखिए इस तोते में चिड़िया बनकर बंद हैं। इन्होंने हमारा अपहरण कर

45:13

लिया था। मेनपाल कहने लगा इन चिड़ियाओं को मुझे दिया जाए। इन्हें कैद कर लिया जाए और

45:20

समय आने पर छोड़ा जाएगा। श्रोताओं उन दोनों चिड़ियाओं को

45:25

गजमोतनी ने अपने पास कैद कर लिया है चिड़िया के रूप में क्योंकि वह चंद्रकला

45:31

और वीरमती दोनों बहन थी। एक धोबी की पुत्री थी। अब देखिए श्रोताओं पहले दिन

45:37

राजा नल और मनसुख अपने तंबू में आ जाते हैं और सेना को कच का आदेश दे दिया जाता

45:44

है। सेना पहले दिन का सफर करती है और बीच बंगाल में जाकर के अपना अगले दिन का पड़ाव

45:51

लगा देती है। देखिए श्रोताओं से को आदेश दे देते हैं कि यहां से प्रस्थान किया जाए

45:57

कासिमपुर की तरफ। श्रोताओं संपूर्ण सेना बंगाली शहर को पार करती हुई निकल जाती है

46:05

और जैसे ही बंगाल को पार किया तो वो कासिमपुर की सीमा में पहुंच गए। परंतु

46:13

मैंने आपको बताया था पहले ही कि उनके विवाह की एक शर्त थी कि कासिमपुर में

46:18

प्रवेश करने से पहले आपको एक वन से गुजरना होगा। एक जंगल से निकलना होगा और उस जंगल

46:26

में कुछ दैत्यों ने, कुछ दानवों ने अवैध कब्जा कर लिया है। वो उस क्षेत्र को हमारे

46:33

राज्य से हथियाना चाहते हैं तो आपको पहले उस वन क्षेत्र को मुक्त कराना होगा। अब

46:39

देखिए श्रोताओं जैसे ही कासिमपुर की सीम में प्रवेश किया तो वन क्षेत्र जब दिखाई

46:46

दिया तो राजा नल ने आदेश दे दिया अपने सेवकों को कि यहीं सेना का पड़ाव डलवा

46:52

दिया जाए। सेनापतियों को आदेश दिया कि सेना को यहीं रोक दिया जाए और पहले इस वन

46:59

को विजित करना होगा। अब देखो श्रोताओं शाम का वक्त था। सेना वहीं रोक दी गई। संपूर्ण

47:06

सेना पड़ी हुई है। दो लाख की फौज के साथ राजा नल, मनसुख गुर्जर और महाराज मैनपाल

47:14

वहां रुके हुए हैं। दूसरे दिन प्रातः काल का वक्त हुआ तो राजा नल महाराज मैनपाल से

47:21

कहने लगे कि महाराज इस वन में दाने हैं और उन दानों को हराना है। तो मैनपाल कहने लगा

47:29

बेटे नल तुम ही एक महापराक्रमी योद्धा हो जो इन दानों को हरा सकते हैं। तो नल कहने

47:36

लगा महाराज आप चिंता ना करें। मेरे साथ आप केवल एक सैनिक टुकड़ी भेजें। मैं 20,000

47:43

की सेना लेकर के दानों से युद्ध करने के लिए जा रहा हूं। श्रोताओं राजा नल

47:50

सुसज्जित हो जाते हैं युद्ध के लिए। और 20,000 की सेना लेकर के उस वन क्षेत्र में

47:57

प्रवेश कर जाते हैं। जब वन में प्रवेश किया तो दानवों ने देखा कि कोई मानव हमारे

48:03

क्षेत्र में प्रवेश कर रहा है। तो दानव सेना ने उन पर आक्रमण कर दिया। अब देखो

48:11

राजा नल तो अवतार थे। चार कला से पैदा थे। मां भवानी के भक्त थे। परंतु जो सेना थी

48:19

दानवों ने कुछ समय में ही नष्ट कर डाली। 20,000 जवानों को ध्वस्त कर दिया दैत्यों

48:25

ने। खा गए उन सैनिकों को। हाथी, घोड़ा, पैदल जो भी थे उन सबको खा गए। राजा नल

48:33

देखते रह गए और 20,000 की सेना समाप्त हो गई। पहले दिन राजा नल ने बहुत से दानों का

48:39

संघार किया। बहुत से दानों को मार गिराया। परंतु श्रोताओं दाने अतुलित बलशाली थे।

48:47

राजा नल उनका कुछ ना बिगाड़ सके। और तब तक शाम का वक्त हो गया। राजा नल वापस अपने

48:54

शिविर को सेना की संपूर्ण सेना को बलिदान करने के पश्चात

49:00

लौट आते हैं। महाराज मैनपाल ने जब यह देखा तो राजा नल से कहने लगे बेटे नल मैंने

49:07

तुम्हारे साथ 20,000 सैनिक भेजे थे। क्या हुआ उनका? तो राजा नल के पास कोई जवाब

49:12

नहीं था कि महाराज 20,000 सैनिक रणभूमि में मारे जा चुके हैं। दानवों ने खा लिया

49:20

20,000 की सेना को तो मैनपाल घबरा जाते हैं कि जब 20,000 सैनिक मात्र 4 घंटे के

49:27

युद्ध में समाप्त हो गए। दाने खा गए तो हमारी 2 लाख की सेना 4 दिन में समाप्त हो

49:34

जाएगी। राजा नल, मनसुख गुर्जर, गजमोतनी

49:39

चारों की चारों एक शिविर में एकत्र हो जाते हैं और विचार विमर्श चल रहा है कि

49:46

किस तरीके से इस दुर्ज क्षेत्र को विजित किया जाए। दानों को हराया जाए। तो गजमतनी

49:53

कहने लगी महाराज आप क्यों चिंता करते हैं? आप कोई भी सेना ना ले जाकर के अकेले युद्ध

50:00

भूमि में जाएं। आप में ना जाने कितने दानों को मारने की क्षमता है। आप ही युद्ध

50:07

करेंगे। श्रोताओं मैनपाल कहने लगे कि नहीं पुत्री यदि नल समाप्त हो गए वीरगति को

50:15

प्राप्त हो गए तो फिर हमारी सेना कभी भी कासिमपुर नहीं पहुंच सकती। परंतु नल कहने

50:21

लगे कि महाराज आप चिंता ना करें। मुझ पर भरोसा रखें। आज के युद्ध में मैं दानों का

50:28

सफाया कर दूंगा। और जो दानों का प्रधान है जो महाराज है उसको मैं बंदी बना लाऊंगा।

50:36

श्रोताओं दूसरे दिन महाराज नल वीरवरन घोड़ा पर सवार हो गया। जल दरियाई घोड़ा था

50:43

राजा नल के पास जो जल थल गगन तीनों में समान गति से चलता था। राजा नल अपने घोड़े

50:50

पर सवार हो गया। सात धार का जो खाड़ा था उसके पास घुमा सुर दाने का वो खाड़ा निकाल

50:58

लिया और उस खाने को लेकर के राजा नल चल देता है उस वन को विजित करने के लिए

51:05

श्रोताओं सुबह से शाम तक राजा नल ने युद्ध किया परंतु दानवों की कोई कमी नहीं आई।

51:14

दानवों की सेना बहुत विशाल थी। दूसरे दिन के युद्ध में भी राजा नल वापस आ

51:21

गए। इसी तरीके से युद्ध करते करते 15 दिन

51:26

का समय व्यतीत हो जाता है। परंतु श्रोताओं राजा नल उन दानों को पराजित नहीं कर सके।

51:34

जब दाने प्रतिदिन मरने लगे तो इधर दानों के सरदारों ने चार दाने उनके सरदार थे। उस

51:43

क्षेत्र पर आधिपत्य किए हुए थे। तो वो चारों मन में विचार करने लगे कि हमारे

51:48

दाने प्रतिदिन घट रहे हैं और वो कैसा मानव है जो अकेला ही रणभूमि में आता है। सेना

51:55

नहीं लाता। आज हम चारों को चलना होगा और आज ही हम उसको समाप्त कर देंगे। श्रोताओं

52:02

अगले दिन के युद्ध में वो चारों के चारों दाने जो मुखिया थे। उस वन के कहना चाहूंगा

52:10

एक तरीके से राजा थे। चारों दाने अपनी चार सैनिक टुकड़ियों के साथ चल देते हैं राजा

52:17

नल को पराजित करने के लिए। जब राजा नल अपने वीरवरण घोड़ा पर सात धार

52:25

की तलवार को लेकर के आए तो उन दानों ने राजा नल को पहचान लिया। श्रोताओं आपको याद

52:32

दिलाना चाहूंगा कि राजा नल ने जब गजमोतनी से विवाह किया था तो चार दाने घुमासुर

52:40

दाने की जेल में थे कैद में थे। राजा नल ने उन चारों दानों को मुक्त करा दिया था

52:47

और वो चारों दाने राजा नल से वचन देकर के गए थे कि जब आपको हमारी आवश्यकता हो हम

52:54

आपको सहारा देंगे। आपकी मदद करेंगे। श्रोताओं उन चारों दानों ने वहां से निकल

53:01

कर के कासिम के वन क्षेत्र पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। तो वो चारों

53:08

दाने राजा नल को देखकर के हतप्रब रह गए।

53:14

चारों आपस में बात करने लगे। सेना को रोक दिया गया कि रुक जाओ। चारों कहने लगे ये

53:20

वही राजकुमार है। इस राजकुमार ने ही तो हमें घुमासु दैत्य की कैद से मुक्त कराया

53:27

था। और ना जाने हमने इसकी कितनी सेना को क्षतिग्रस्त कर दिया है। कितने सैनिक मारे

53:33

जा चुके हैं। चारों दैत्य जो चारों दाने थे अपने हथियार डाल देते हैं। सेना भी

53:40

हथियार डाल देती है। राजा नल ने उन दानों को देखा तो राजा नल को भी पहचानने में देर

53:46

ना लगी। चारों दाने और राजा नल एक दूसरे की तरफ

53:51

देख रहे हैं। दाने कहने लगे कि राजकुमार आप इस क्षेत्र में आए और हमने आपका अनादर

53:59

किया। इसके लिए हम शर्मिंदा हैं। आप बताइए हमसे क्या चाहते हैं? राजा नल कहने लगे

54:06

वीर श्रेष्ठ दानवों तुमने कोई गलत काम नहीं किया। रणभूमि में युद्ध करना एक वीर

54:13

का काम होता है। तुमने वही काम किया जो एक वीर को करना चाहिए। तो दाने कहने लगे कि

54:20

राजा नल अब मुझे यह बताओ कि हमें क्या आज्ञा है? राजा नल कहने लगे देखिए दानवों

54:26

तुम जानते हैं कि मैं मेरे मित्र मनसुख को लेकर के राजा कासिम सिंह के यहां विवाह

54:34

करने जा रहा हूं। मेरी बारात इस वंश से निकलेगी। तो दाने कहने लगे कि राजा नल

54:42

आपका स्वागत है। आपकी बारात को भोजन व्यवस्था हमारी तरफ से होगी। तो राजा नल

54:47

बोले कि नहीं तुमको एक काम करना होगा। तुम्हें यह क्षेत्र छोड़ना होगा। और आज के

54:54

बाद तुम बबरी वन में चले जाइए। अपना साम्राज्य वहां स्थापित कीजिए और जब मुझे

55:00

तुम्हारी आवश्यकता होगी तो मैं तुम्हें याद कर लिया करूंगा। श्रोताओं चारों दाने

55:07

नल से गले मिले और गले मिलने के बाद नल से अनुमति लेकर के चारों के चारों अपनी सेना

55:15

सहित उस वन प्रदेश को खाली कर देते हैं और चारों दाने चले जाते हैं बबरी वन में। अब

55:24

देखिए श्रोताओं राजा नल ने जब उस क्षेत्र को विजित कर लिया तो महाराज मैनपाल से कहा

55:30

कि राजन ध्यान से सुनिए मैंने इस संपूर्ण क्षेत्र के दानों को भगा दिया है। यहां

55:37

कोई भी दाना आपको नजर नहीं आएगा। हमारी सेना को सम्मान सहित आगे बढ़ने का आदेश

55:44

दिया जाएगा। श्रोताओं महाराज मैनपाल ने अपने सेनापतियों को कूच का आदेश दे दिया

55:51

और कुछ ही समय में महाराज मैनपाल की सेना उस वन क्षेत्र को

55:58

पार कर गई और पार करने के बाद आ जाती है सेना कासिमपुर में। कासिमपुर के मैनों पर

56:06

सेना ने अपना पड़ाव डाल दिया और महाराज मैनपाल ने अपना दरबार सजाया। दरबार सजाने

56:14

के बाद एक खतवाहक को बुलाया। एक पत्रवाहक को बुलाया और पत्रवाहक को एक पत्र देकर के

56:22

महाराज कासिम सिंह के दरबार में भेजा और लिख दिया कि हम

56:30

महाराज मैनपाल श्याम नगर नरेश अपने पुत्र

56:35

मनसुख का विवाह करने आपके राज्य में आ चुके हैं। श्रोताओं वह खत पत्रवाहक को

56:42

दिया और पत्रवाहक उस खत को लेकर महाराज कासिम सिंह के दरबार में पहुंच जाता है।

56:49

महाराज कासिम सिंह को वो खत दिया तो महाराज कासिम सिंह सोचने लगे कि मैनपाल

56:57

वास्तविकता में एक पराक्रमी राजा दिखाई देता है। क्योंकि उस वन क्षेत्र को विजित

57:03

करना आसान नहीं था। मेरे पास इस संसार के सर्वश्रेष्ठ योद्धा हैं। मेरा पुत्र भयंकर

57:10

सिंह, बूंदा और विश्वजीत तीनों इतने सक्षम है कि संसार के समस्त

57:17

राजाओं को जीत सकते हैं। परंतु इस वन क्षेत्र को नहीं जीत पाए। तो महाराज

57:24

मैनपाल ने इस क्षेत्र को कैसे विजित कर लिया? तो उधर से वो पत्रवाहक वापस आ जाता

57:32

है और महाराज कासिम सिंह एक खत लिखते हैं और उस खत में उन्होंने लिख दिया कि आपका

57:40

कासिमगढ़ की सीमा में स्वागत है। परंतु महाराज मैनपाल आपको हमारे नगर के प्रवेश

57:48

द्वार पर एक भगवान शंकर का मंदिर है। जो हमारे इस नगर का पूर्व दिशा का दरवाजा है।

57:57

उस दरवाजे पर भगवान शंकर का मंदिर है। उसका दरवाजा हमेशा लगा रहता है और उस

58:05

मंदिर में एक शेरनी रहती है। हमारा उस शेरनी से समझौता है। हम प्रतिदिन उसके

58:13

भोजन की व्यवस्था करते हैं। हे राजन सबसे पहले आप उस शेरनी को इस क्षेत्र से दूर

58:20

भगाइए। अब देखिए श्रोताओं वो खत लेकर के पत्रवाहक महाराज मैनपाल के दरबार में आ

58:28

जाता है। महाराज मेनपाल ने उस पत्र को पढ़ा तो पत्र पढ़ने के बाद जो दूत था,

58:35

पत्रवाहक था, उसे तो सम्मान सहित भेज दिया और अपने दरबार में सातपान का बीड़ा लगा

58:42

करके डलवाया कि कोई भी योद्धा इस शहर कासिमपुर के पूरब दरवाजे पर बने भगवान शिव

58:51

के मंदिर में से उस शेरनी को यहां से भगा देगा। उसे मुंह मांगा इनाम दिया जाएगा। अब

58:58

देखिए श्रोताओं महाराज मैनपाल के दरबार में एक से एक बड़ा

59:03

योद्धा था। बड़े-बड़े गुर्जर योद्धा, बड़े-बड़े महाराज, नलके, सेनापति,

59:10

बड़े-बड़े योद्धा परंतु किसी की हिम्मत नहीं हुई। हर कोई जानता था कि वो भगवान

59:16

शंकर की वरदानी शेरनी है। तो किसी ने भी उस पान के बीड़े को नहीं खाया। तो मैनपाल

59:23

कहने लगे कि बेटे नल इस कासिमगढ़ में इस कासिमपुर शहर में मेरी बेइज्जती हो रही

59:31

है। मेरी इज्जत धूमिल हो रही है। मेरे यहां कोई भी योद्धा इस वीणा को खाने वाला

59:38

नहीं है। जब तक शेरनी नहीं मरेगी तो महाराज मैनपाल

59:44

से हम विवाह का प्रस्ताव नहीं रख सकते। उनकी शर्त है कि शेरनी को भगाना होगा या

59:50

मारना होगा। अब देखो श्रोताओं जब राजा नल ने यह सुना

59:56

तो राजा नल ने माता भवानी का स्मरण किया। भवानी का स्मरण करने के बाद वो बीड़ा

1:00:03

उठाया और बीड़ा खा लिया कि महाराज मैं जाऊंगा उस शेरनी से युद्ध करने के लिए।

1:00:10

महाराज मैनपाल को मैनपाल ने एक खत लिख के सूचना भिजवा दी महाराज

1:00:18

कासिम सिंह को कि मेरा शेर तुम्हारी शेरनी को भगाने जा रहा है। श्रोताओं राजा नल

1:00:25

अपने जल दरियाई घोड़ा पर सवार हो गए। अपने वीरवरण घोड़ा पर सवार हो गए। सात धार का

1:00:32

खाड़ा हाथ में ले लिया और चल देते हैं उस जो किला था उसके पूर्वी दरवाजे की तरफ

1:00:40

जहां भगवान शंकर का मंदिर बना हुआ था। भगवान शंकर के मंदिर पर जब राजा नल चलने

1:00:48

लगे तो उस शहर के लोग उस शहर के नर नारी

1:00:53

अपनी छतों से देख रहे थे कि किस तरीके से महाराज मैनपाल उस शेरनी को भगाते हैं।

1:01:00

अब देखो श्रोताओं ध्यान से सुनने की बातें। राजा नल जब उस मंदिर पर पहुंचे तो

1:01:08

देखा कि मंदिर में एक शेरनी बैठी हुई है। राजा नल उस शेरनी की तरफ देखने लगे और

1:01:15

शेरनी राजा नल की तरफ देखने लगी। राजा नल ने शेरनी को पहचान लिया और शेरनी ने राजा

1:01:22

नल को पहचान लिया। राजा नल ने अपने हाथ से खाड़ा पृथ्वी में डाल दिया। जो सात धार की

1:01:28

तलवार नल के हाथ में थी वो महाराज नल ने पृथ्वी पर रख दी। महाराज नल अपने घोड़े से

1:01:35

उतर जाते हैं और उधर से शेरनी भी चलती चली आ रही है। श्रोताओं दोनों एक दूसरे के गले

1:01:43

मिलने लगे। आपको याद दिलाना चाहूंगा श्रोताओं कि जब राजा नल का जन्म हुआ था तो

1:01:49

राजा नल को एक शेरनी ने दूध पिलाया था। वही भगवान शंकर की वरदानी शेरनी थी। उसी

1:01:57

को भगवान शंकर ने राजा नल को दूध पिलाने के लिए भेजा था। तो वही शेरनी उस मंदिर

1:02:03

में रहा करती थी। वहां से उस वन को छोड़कर के और कासिमपुर के मंदिर में आराधना के

1:02:10

लिए आ गई थी। तो नल ने उस शेरनी को पहचाना। शेरनी ने नल को पहचाना और दोनों

1:02:16

एक दूसरे से लिपट करके मिलने लगे। शेरनी बड़ी प्रसन्न हुई। कहने लगी बेटे नल मैं

1:02:24

तुझे देखकर के बहुत प्रसन्न हूं। तुझ जैसा पुत्र मुझे प्राप्त हुआ। बेटे तुम यहां

1:02:29

कैसे आई? तो शेरनी से नल कहने लगा माता मैं मेरे मित्र का विवाह करने के लिए इस

1:02:37

कासिमपुर में आया हूं। और यहां के महाराज की शर्त है कि जो मंदिर पर शेरनी रहती है

1:02:45

उस शेरनी को इस मंदिर से भगाना होगा। हे मातेश्वरी मैं तुमसे निवेदन करता हूं कि

1:02:53

आप नरवरगढ़ चली जाए। शेरनी कहने लगी बेटे नल मैं हमेशा तेरे साथ रहना चाहती हूं।

1:03:00

मैं तेरी आज्ञा से तू मेरा पुत्र है। मैंने मेरे पुत्र को दूध पिलाया और तुझे

1:03:05

दूध पिलाया। मैं तुझसे ये अपेक्षा करती हूं कि तू मेरे

1:03:11

दूध को नहीं लजाएगा। नल जा इस किले को विजित कर और मैं अभी तेरी आज्ञा से

1:03:18

नरवरगढ़ जा रही हूं। श्रोताओं व शेरनी राजा नल से इस तरीके से बात कर रही थी और

1:03:26

वहां पर वो कासिम सिंह और उसके कुछ गुप्तचर्य देख रही थी कि इसका ये योद्धा

1:03:32

तो शेरनी से बात कर रहा है। शेरनी से गले मिल रहा है। ये कितना पराक्रमी राजा है।

1:03:39

शेरनी वहां से छोड़ कर के चल देती है नरवरगढ़ की तरफ और वो मंदिर खाली हो जाता

1:03:44

है। महाराज नल शेरनी को भेज करके वापस

1:03:50

अपने शिविर में आ जाते हैं। और महाराज मैनपाल से कह दिया कि महाराज वो शेरनी

1:03:55

यहां से चली गई है। आप एक खत भिजवाइए महाराज कासिम सिंह के लिए। देखिए श्रोताओं

1:04:03

राजा नल के कहने से महाराज मैनपाल ने एक पत्र लिखा और पत्र को

1:04:10

लिख के भिजवा दिया महाराज कासिम सिंह के यहां। कासिम सिंह ने वह खत पढ़ा। पूर्वी

1:04:18

द्वार खोला गया किले का। पूर्वी द्वार के मंदिर पर महाराज कासिम सिंह पूजा करने आए

1:04:26

हैं। और जब यह पता चल गया कि शेरनी इस क्षेत्र को छोड़कर जा चुकी है तो महाराज

1:04:32

कासिम सिंह वापस अपने किले में आ जाते हैं। अपने दरबार को आमंत्रित किया और

1:04:38

दरबार को आमंत्रित करने के पश्चात एक पान का बीड़ा डलवाया और अपने बड़े

1:04:45

पुत्र भयंकर सिंह को बुलाया और कहने लगा कि बेटे भयंकर सिंह विश्वजीत और बूंदा

1:04:53

तीनों पुत्रों में से आज कोई योद्धा इस दो लाख की सेना को हमारी सीम से दूर भगा

1:05:00

देगा। कोई यदि ऐसा योद्धा मेरे यहां है तो वो आए। और इस बीड़ा को खाए।

1:05:08

जब वो बीड़ा पड़ा हुआ देखा तो महाराज कासिम सिंह का बड़ा पुत्र भयंकर सिंह चलता है।

1:05:15

भयंकर सिंह ने उस पान के बीड़े को खा लिया और राजा कासिम सिंह से कहने लगा पिताजी आप

1:05:22

मेरी चिंता ना करें। मैं आज के युद्ध में ही जो श्यामनगर की और नरवरगढ़ की सेना है

1:05:29

उसे नरवरगढ़ तक और श्यामनगर तक नहीं छोडूंगा।

1:05:35

श्रोताओं 60 हजार की फौज लेकर के भयंकर सिंह युद्ध के मैदान में चल देता

1:05:42

है। सूचना भिजवा दी महाराज कासिम सिंह ने महाराज मैनपाल को कि मेरा बड़ा पुत्र

1:05:49

युद्ध के लिए आ रहा है। आप इसे बंदी बनाए या पराजित करें।

1:05:54

अब देखो श्रोताओं राजा नल ने जब यह सुना महाराज मैनपाल से

1:06:01

कि 60 हजार की फौज लेकर के उसका पुत्र भयंकर सिंह युद्ध भूमि में आ रहा है तो

1:06:07

महाराज नल ने भी महाराज मैनपाल से अनुमति ली और 60 हजार की फौज लेकर के राजा नल भी

1:06:14

उसका सामना करने के लिए कासिमपुर के युद्ध के मैदान में आ गए।

1:06:20

देखो श्रोताओं राजा नल चार कला से अवतार सात धार का खाड़ा मां भवानी का वरदानी और

1:06:29

वीर वरण जैसा घोड़ा जो मनुष्य खाता था। अब

1:06:34

देखिए दोनों योद्धा आमने-सामने आ गए। भयंकर सिंह ने नल से कहा कि योद्धा तुम ये

1:06:43

मैदान छोड़कर भाग जाओ। क्यों मेरे हाथों से मरना चाहते हैं? नल कहने लगा वीरभ

1:06:48

युद्ध तो करो। वीरों को यह शोभा नहीं देता कि बिना युद्ध किए पराजय स्वीकार कर ले। यदि आप मुझे

1:06:56

विजित कर लेते हैं तो बंदी बना ले जाना। अब श्रोताओं दोनों पक्षों में युद्ध आरंभ

1:07:04

हो जाता है। भयंकर सिंह भी महायोद्धा थे। उनके साथ भैरव युद्ध किया करता था।

1:07:12

देखिए श्रोताओं प्राचीन समय के जो राजा थे उनके साथ देवियां काली चंडी और भैरव जैसे

1:07:21

देवता गण युद्ध किया करते थे। अब भैरव

1:07:26

भयंकर सिंह का साथ दे रहा था। राजा नल और भयंकर सिंह में बहुत बड़ा युद्ध चल रहा

1:07:33

था। दोनों में बार पर बार हो रही थी। परंतु कोई भी योद्धा हार नहीं मान रहा था।

1:07:40

युद्ध करते करते तीन पहर का समय व्यतीत हो गया। परंतु ना

1:07:45

राजा नल की जीत हुई और ना भयंकर सिंह की जीत हुई। गजमोतनी ने मन में विचार किया कि

1:07:52

मेरे स्वामी रणभूमि में अकेले ही गए हैं। और भयंकर सिंह के पास हो सकता है कुछ जादू

1:07:59

हो तो मुझे भी रणभूमि में चलना चाहिए। रानी गजमोतनी ने जनाना भेष उतारा फेंक

1:08:06

दिया उतार कर के। और मर्दाना भष धारण किया। एक सैनिक की भेशभूषा धारण की और

1:08:13

अपने अस्प पर सवार होकर के पहुंच जाती है रणभूमि में। महाराज नल ने देखा कि गजमोतनी

1:08:20

उसके पास आ गई है। तो राजा नल गजमोतनी से कहने लगे कि देखिए रानी मुझे युद्ध

1:08:27

करते-करते तीन पहर का समय बीत गया है। परंतु मैं इसे बंदी नहीं बना सका। यह

1:08:32

भयंकर सिंह महाभट योद्धा है और इसके साथ दैय शक्ति युद्ध कर रही है। स्वयं भैरव

1:08:40

इसके साथ युद्ध भूमि में इसकी सुरक्षा कर रहा है। यह बात जब गजमोत्नी ने सुनी तो

1:08:46

गजमोतनी कहने लगी मत घबराओ मैं अभी इसको बंदी बनवा देती हूं। राजा नल कहने लगे कि

1:08:54

तुम क्या करोगी कि मेरे पास वीर हैं और अभी मैं मेरे वीरों का स्मरण करती हूं और

1:09:00

इसे बंदी बनवाती हूं। श्रोताओं इधर गजमोतनी ने अपने चार वीरों को याद

1:09:06

किया और चारों वीरों ने इकट्ठा होकर के भयंकर सिंह पर आक्रमण किया। इधर राजा नल

1:09:13

ने तलवार से जो हाथी के ओदा पर विराजमान था। उस भयंकर सिंह के रस्सा काट दिए और

1:09:21

रस्सा कटते ही भयंकर सिंह जमीन पर गिर पड़ा। बड़ा अघोर युद्ध हुआ। मल युद्ध चलने

1:09:28

लगा राजा नल में और भयंकर सिंह में। दोनों का युद्ध एक घड़ी तक चला और एक घड़ी के

1:09:35

युद्ध के बाद राजा नल ने भयंकर सिंह को भूमि पर डाल लिया और उसी का जो सेरा था

1:09:42

जिसको फेंटा कहते हैं उसी का फेंटा उतार लिया और उसकी मस्कें चढ़ा ली उसको बांध

1:09:49

लिया बांध करके महाराज नल ने भयंकर सिंह को खींचना आरंभ कर दिया और खींचते हुए

1:09:57

भयंकर सिंह को अपने शिविर की तरफ ले जाने लगे जब

1:10:02

कासिम सिंह की सेना ने यह देखा कि हमारा प्रधान सेनापति बंदी बन चुका है तो देखिए

1:10:09

श्रोता उस सैनिकों में दम नहीं होती। सेना हमेशा कमांडर के पीछे युद्ध करती है।

1:10:15

सेनापति के पीछे युद्ध करती है। जब सेनापति बंदी बन गया तो सेना का धैर्य छूट

1:10:21

गया। और जब सेना का धैर्य छूट गया तो सेना कासिमगढ़ की तरफ भाग गई।

1:10:28

और नल उस भयंकर सिंह को बंदी बना करके अपने शिविर में ले आए। डरवा दिया उसको

1:10:35

कैदखाने में कि इसको कैदखाने में बंद कर दिया जाए। जेल में बंद कर दिया जाए।

1:10:41

श्रोताओं भयंकर सिंह सलाखों के पीछे पड़ा हुआ है और महाराज नल भी अपनी सेना को लेकर

1:10:49

के वापस अपने शिविरों में आ जाते हैं। इधर राजा नल और महाराज मैनपाल मनसुख गुर्जर और

1:10:56

गजमोतनी विचार कर रहे हैं और उधर कासिम सिंह राजा विचार विमर्श में है कि

1:11:05

क्या ये सभी शर्तों को जीत पाएंगे? अब देखिए श्रोताओं पहले दिन का युद्ध बूंदा

1:11:12

से समाप्त हो गया है। यह वीडियो अब काफी लंबा हो चुका है। अब मैं यह वीडियो समाप्त

1:11:18

करने की आप सभी श्रोताओं से अनुमति लेता हूं और कल के वीडियो में आपको बताऊंगा कि

1:11:24

राजा नल किस तरीके से बूंदा को हराते हैं और अपने मित्र का विवाह करते हैं। तो

1:11:31

देखिए श्रोताओं आप सभी से अनुमति लेने के पश्चात अब यह वीडियो मैं समाप्त कर रहा

1:11:37

हूं।

 

17.

0:00

मेरे समस्त सब्सक्राइबर बंधुओं, श्रोताओं

0:04

और भक्तों आप सभी का हमारे YouTube चैनल

0:07

पर एक बार स्वागत और अभिनंदन है। श्रोताओं

0:11

जैसा कि आप जानते हैं हमारी कहानी चल रही

0:14

थी नल पुराण इतिहास में से और उसके 21

0:18

एपिसोड आपकी सेवा में प्रसारित कर चुका था

0:21

और 22वां एपिसोड आपकी सेवा में लेकर के

0:24

उपस्थित हूं। परंतु श्रोताओं मैं आपसे एक

0:28

निवेदन करना चाहूंगा कि हमारे वीडियोस पर

0:32

लाइक बहुत कम आते हैं। अब यह मैं नहीं

0:35

जानता कि आपको वीडियो पसंद आता है या नहीं

0:38

आता। तो श्रोताओं वीडियो को लाइक करना ना

0:41

भूलें जिससे हमें उत्साह मिले। आइए

0:44

श्रोताओं आपकी सेवा में मैं 22वां एपिसोड

0:47

लेकर के उपस्थित हूं और आपका ध्यान 21वें

0:50

एपिसोड से जोड़ता हूं। 21वें एपिसोड में

0:53

मैंने आपको बताया था कि महाराज मैनपाल

0:57

अपनी बारात को लेकर के दानवों के क्षेत्र

1:01

को विजित करते हुए पहुंच जाते हैं

1:05

कासिमपुर और कासिमपुर के राजा को सूचना

1:09

भिजवा देते हैं। वहां राजा नल जिस शेरनी

1:13

ने दूध पिलाया था उस शेरनी को देवी के

1:16

मंदिर से नरवरगढ़ भेज देते हैं। और जब

1:20

राजा कासिम सिंह को इसकी सूचना मिलती है,

1:23

तो अपने बड़े पुत्र भयंकर सिंह को युद्ध

1:26

के लिए भेजता है जिसे राजा नरबंदी बना

1:30

लेते हैं। अब देखिए श्रोताओं यहां से

1:33

हमारा आज का एपिसोड आरंभ होता है। जब

1:37

कासिमपुर की सेना भाग करके महाराज कासिम

1:41

सिंह के पास पहुंची। तो कासिम सिंह कहने

1:44

लगा क्या हुआ सैनिकों कि महाराज हमारे

1:47

प्रधान सेनापति

1:49

भयंकर सिंह बंदी बन चुके हैं तो महाराज

1:54

कासिम सिंह आग बबूला हो गई और अपने

1:57

महापराक्रमी पुत्र बूंदा को बुलाया। बूंदा

2:01

की एक विशेषता थी श्रोताओं यदि बूंदा के

2:04

शरीर से रक्त की एक बूंद भी पृथ्वी पर

2:08

गिरी तो 100 बूंदा बनकर तैयार हो जाती थी।

2:12

उसे हराना संभव नहीं था और फिर भगवान शंकर

2:16

का वरदानी था। अब देखो श्रोताओं

2:21

बूंदा को बुलाया महाराज कासिम सिंह ने और

2:24

बूंदा से कहा बेटे फौज तैयार करो और जो

2:28

हमारे सीमा पर हमारे मेड़ों पर जो फौज

2:32

पड़ी हुई है उस फौज को नरवरगढ़ तक मार मार

2:35

करके भगा दीजिए। उसमें कोई राजा नर बताया।

2:39

बड़ा भारी विकराल योद्धा है। उसने हमारे

2:42

पुत्र भयंकर को कैद कर लिया है। श्रोताओं

2:46

जब बूंदा ने यह बात सुनी तो क्रोधित हो

2:49

गया। लाल नेत्र हो गए। अपनी फौज को आदेश

2:53

दे दिया और सेना को तैयार करके आननफानन

2:58

में ही चढ़ाई कर दी। धावा बोल दिया महाराज

3:04

मैनपाल की सेना पर और वो जब तक संभलने

3:07

नहीं पाए सेना तैयार नहीं हो पाई। उससे

3:11

पहले बूंदा ने आक्रमण कर दिया। अब देखो

3:15

उधर से पता चला हड़बड़ी मची सेना में तो

3:18

महाराज नल स्वयं युद्ध करने के लिए आए।

3:21

उधर से मनसुख भी युद्ध भूमि में उतर गए और

3:23

महाराज मैनपाल भी युद्ध भूमि में उतर गए।

3:26

क्यों? क्योंकि बूंदा ने किसी को अवसर

3:28

नहीं दिया युद्ध के मैदान में आने का।

3:31

उनके शिविरों पर आक्रमण कर दिया गया।

3:34

बूंदा महापराक्रमी योद्धा था।

3:37

युद्ध करता जा रहा है और उसके सामने कोई

3:40

भी योद्धा नहीं टिक पा रहा है। अब देखिए

3:43

श्रोताओं राजा नल को जब इस बात का पता चला

3:46

कि बूंदा महापराक्रमी है तो स्वयं महाराज

3:50

नल और मनसुख दोनों मिलकर के उसका सामना

3:53

करने के लिए चले। श्रोताओं दो योद्धाओं ने

3:57

घेर लिया। महापराक्रमी थे दोनों योद्धा और

4:00

उन्होंने घेर लिया है बूंदा को। बूंदा

4:03

युद्ध भूमि में आग उबल रहा है। उसकी तेग

4:07

के सामने जो कोई आ जाता है वो जीता नहीं

4:10

जाता। उसे यमलोक की सैर करनी पड़ती है। तो

4:14

महाराज नल और मनसुख दोनों दोस्त आपस में

4:18

बतलाए कि मित्र इसको हम रोकेंगे।

4:21

राजा नल और मनसुख दोनों आक्रमण कर देते

4:24

हैं। और जब दोनों ने उस पर तेक के वार

4:27

किए। राजा नल ने अपनी सात धार की तलवार

4:31

चढ़ाई और उसका सर धड़ से अलग कर दिया काट

4:35

करके और जैसे ही सर को धड़ से अलग किया तो

4:39

100 बूंदा तैयार हो गई। जब एक बूंदा था अब

4:43

100 बूंदा हो गई और 100 बूंदाओं ने

4:47

सुसज्जित होकर के आक्रमण किया। एक-एक नल

4:51

पर नल अकेले थे। मनसुक अकेला था। उन उन पर

4:56

50-50 योद्धा हो गए। 50-50 बूंदाओं ने घेर

4:59

लिया चारों ओर से। महाराज नल और मनसुख

5:04

आश्चर्य में पड़ गए कि अब क्या होने वाला

5:06

है। श्रोताओं महाराज नल देवी के प्रताप से

5:12

उनको पराजित करने में लगे हुए हैं। पछाड़

5:15

रहे हैं उन बूंदाओं को। परंतु

5:19

देखिए मनसुख कमजोर पड़ जाते हैं और युद्ध

5:23

भूमि से पीछे हटने लगे और जिस जेल में

5:26

भयंकर सिंह कैद था उस जेल पर बूंदाओं ने

5:30

आक्रमण कर दिया क्योंकि बूंदा 100 हो गए

5:34

थे और अब डर की वजह से नल उसका सर धड़ से

5:38

अलग नहीं कर रहे हैं। जितने बूंदाओं को

5:40

काटा उससे कहीं 100 गुने बूंदा तैयार हो

5:44

जाती।

6:00

युद्ध भूमि की स्थिति बड़ी विकराल हो गई।

6:04

महाराज मैनपाल के शिविर पर आक्रमण कर दिया

6:07

है वृंदाओं ने। और जो जेल थी जिसमें भयंकर

6:11

सिंह कैद था उस भयंकर सिंह को छुड़ा लिया

6:14

है मुक्त करा लिया बूंदा ने और युद्ध करते

6:17

करते शाम का वक्त हो गया परंतु किसी भी

6:20

तरफ की ना हार हुई और ना जीत हुई बूंदा

6:25

युद्ध में से भयंकर सिंह को छुड़ा करके

6:27

वापस लौट जाता है कासिमपुर और इधर जब राजा

6:32

नल अपनी सेना को संभालने लगा तो सेना वापस

6:36

शिविरों में बुलाई तो तो देखा कि सेना को

6:39

बड़ी भारी क्षति पहुंचाई है। सेना के 60

6:42

हजार जवान एक ही दिन में तहस-नहस हो गए।

6:45

मारे गए रणभूमि में। श्रोताओं महाराज

6:48

मैनपाल

6:50

राजा नल और मनसुख बैठकर के विचार करने

6:53

लगे। यदि इसने कल इसी तरीके से युद्ध किया

6:56

तो हमारी सेना को दो दिन में साफ कर देगा।

7:00

क्योंकि इसने 60 हजार फौज एक दिन में

7:03

समाप्त कर दी। राजा नल कहने लगे कि इसका

7:07

कोई ना कोई हमें तोड़ ढूंढना होगा और अब

7:10

तो भयंकर सिंह भी मुक्त हो गए हैं। कल

7:13

दोनों भाई एक साथ आक्रमण करेंगे और उनका

7:16

सामना करना पड़ेगा। महाराज मैनपाल कहने

7:19

लगे कि बेटे नल इसका यदि हमने कोई उपाय

7:23

नहीं खोजा तो हमें कल ही यहां से भागना

7:27

पड़ेगा। यह सीमा छोड़नी पड़ेगी। तुम तो कह

7:30

रहे थे कि मैं विवाह करके लाऊंगा। परंतु

7:34

हम तो यहां हो सकता है प्राणों से हाथ धो

7:36

बैठे। राजा नल कहने लगे कभी क्षत्रिय पीछे

7:40

नहीं हटते। रणभूमि में बलिदान हो जाते

7:43

हैं। वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। पर

7:46

सच्चा क्षत्रिय रणभूमि से पीछे नहीं हटता

7:49

महाराज। हमें उसकी चुनौती स्वीकार है।

7:53

बैठे हुए विचार कर रहे हैं। तभी गजमोतनी

7:56

का प्रवेश गजमोतनी आकर के बैठ जाती है।

8:00

महाराज नल से कहने लगी कि महाराज आप चिंता

8:04

मत कीजिए। मैंने बूंदा का तोड़ खोज लिया

8:08

है। कि बताओ क्या तोड़ है? कहने लगी कि

8:12

सात धातु की जो धातु बहुत मजबूत हो। सात

8:18

धातुओं से मिक्सर

8:21

चार मोगरी बनवाइए। मोंगरी कहते हैं सोटे।

8:25

चार मोगरी बनवाओ और जब बूंदा रणभूमि में

8:29

आए तो ध्यान रखना बूंदा के शरीर से रक्त

8:33

की एक भी बूंद नहीं निकल जाए। और मेरे

8:37

आठों वीरों को मैं बूंदा पर आक्रमण

8:39

करवाऊंगी। और जब बूंदा पृथ्वी पर गिर जाए

8:43

तो महाराज नल को और महाराज मनसुख को दोनों

8:47

को एक साथ बूंदा पर आक्रमण करना है और

8:50

मोग्रियों से उसकी कुटाई करनी है। ध्यान

8:53

रहे उसका शरीर कहीं से फटना नहीं चाहिए।

8:57

यदि शरीर फट गया और रक्त निकल गया तो 100

9:00

बूंदा तैयार हो जाएंगे और हम उन्हें

9:03

पराजित नहीं कर पाएंगे। श्रोताओं

9:06

गजमोत्नी ने ऐसा ही करवाया।

9:10

चार शानदार असल धात की मोरी बनवाई और

9:14

दूसरे दिन युद्ध भूमि में पहले से ही

9:17

सुसज्जित हो गई कि बूंदा हमें अवसर नहीं

9:19

देगा वो आक्रमण करेगा श्रोताओं 500 की फौज

9:25

लेकर के राजा नल स्वयं मनसुख महारानी

9:30

गजमोतनी

9:32

तीनों की तीनों रणभूमि के लिए चल देते

9:35

हैं। उधर बूंदा अपने पिता से कहने लगा

9:39

पिताजी आज मैंने 60 हजार नरवर की फौज को

9:43

काट डाला है। कल के युद्ध में जो राजकुमार

9:47

है विवाह करने आया है। उस राजकुमार को और

9:50

उसका साथी राजकुमार नल है उसको बंदी बना

9:53

लाऊंगा। अब देखिए श्रोताओं बूंदा और भयंकर

9:58

सेन और तीसरा विश्वजीत तीनों भाइयों ने एक

10:02

साथ मिलकर के आक्रमण किया।

10:05

और आक्रमण की रफ्तार इतनी तेज थी कि उसका

10:10

मुकाबला करना संभव नहीं था। विश्वजीत बामन

10:14

गढ़ों को जीत चुका था। केवल नरवरगढ़ शेष

10:18

रहा था उससे। उसका सामना कोई नहीं कर सकता

10:21

था। इसलिए विश्वजीत नाम था उसका। बड़ा

10:24

सुभट हाथियों को फेंकने वाला।

10:28

देखिए श्रोताओं इसमें संदेह ना करें कि

10:31

राजा नल का जो समय है वह भगवान श्री राम

10:34

से पांच पीढ़ी बाद है। उसी वंश में मैं

10:37

आपको किसी दिन इस पर अलग से वीडियो बना

10:40

दूंगा। द्वापर युग का प्रारंभिक समय मान

10:44

लीजिए और त्रेता युग का अंतिम समय मान

10:48

लीजिए। दोनों का जो मिलन काल है, संधि काल

10:51

है। उस समय पर राजा नल पैदा हुए थे। तो उस

10:56

समय ऐसे ही विकराल भट्ट योद्धा होती थी तो

11:01

आक्रमण की रफ्तार बहुत तेज थी। उसका

11:04

प्रभाव रोकना संभव नहीं था। श्रोताऊ

11:07

गजमोत्नी ने देखा कि ये तीनों भाई बड़े

11:11

वेग से चले आ रहे हैं और तीनों के साथ मां

11:15

भवानी, किसी के साथ भैरव और किसी के साथ

11:18

चंडी युद्ध भूमि में खड़कग लेकर के खड़ी

11:22

है। तो राजा नल

11:26

गजमोतनी से कहने लगे रानी इन पर वीरों से

11:29

आक्रमण कराया जाए। गजमोतनी ने अपने वीरों

11:33

का स्मरण किया और जैसे ही बूंदा पर वीर

11:37

टूटे तो बूंदा मूर्छित होकर के जमीन पर

11:41

गिर पड़ा। और जैसे ही जमीन पर गिरा तो

11:44

महाराज नल और मनसुख पहले से ही तैयार थे।

11:49

दोनों उसे दबोच लेते हैं और दबोच करके जो

11:52

मोंगरी होती है उनसे कुटाई आरंभ कर दी।

11:57

कुटाई आरंभ की तो बूंदा फड़फड़ाने लगा।

12:00

बूंदा को बैठा होने का अवसर ही नहीं दिया।

12:03

खड़ा ही नहीं होने दिया। देखिए श्रोताओं

12:06

महाराज नल और मनसुख बूंदा की कुटाई कर रहे

12:10

हैं और इधर नरवरगढ़ का प्रधान सेनापति

12:15

सामने चलता है। जो सेनाओं की कमान संभाले

12:18

हुए थे सेनापति कमांडर वो आगे बढ़ते हैं

12:21

और विश्वजीत और भयंकर सिंह को रोक लेते

12:25

हैं। दोनों में दोनों सेनाओं में भयंकर

12:29

युद्ध चल रहा है। जिसका वर्णन करना संभव

12:32

नहीं है। श्रोताओं नल ने और मनसुख ने कुछ

12:36

समय में ही बूंदा को बेहोश कर दिया। और

12:39

बूंदा बेहोश हुए और बूंदा को रस्सियों से

12:42

कस लिया गया। जंजीरों से कस करके महाराज

12:46

नल ने उसे तुरंत भिजवा दिया अपने शिविर

12:49

में। और जो जेल बनी हुई थी, उस जेल में

12:53

डलवा दिया कैदखाने में। और जो विश्वूप

12:56

विश्वजीत और भयंकर सिंह थे। उन पर दोबारा

12:59

से आक्रमण किया।

13:01

आक्रमण किया तो अब तो वह प्रबल हो गई

13:04

क्योंकि बूंदाबंदी बन चुका था। परंतु

13:08

विश्वजीत को रोकना आसान काम नहीं था और

13:12

पहले दिन तीसरे दिन का युद्ध समाप्त हो

13:16

गया। युद्ध समाप्त होने के बाद दोनों दल

13:19

अपनेप डेरों में आ गए। अपनेप शिविरों में

13:23

आ गए और अपनेपने योद्धाओं की गिनती करने

13:26

लगे। तो जब विश्वजीत और भयंकर सिंह को पता

13:30

चला कि बूंदा नहीं है। कुछ सैनिकों ने कहा

13:33

कि महाराज उनको बंदी बना लिया गया है। तब

13:37

तो महाराज कासिम सिंह के पैरों तले से

13:41

जमीन निकल गई। कहने लगा पुत्रों ये राजा

13:45

बड़ा पराक्रमी है। महा बलवान है। और हमें

13:49

हमारी पुत्री का विवाह इसके साथ करना ही

13:52

होगा। क्योंकि क्योंकि हम स्वयं सिक्का

13:55

चढ़ा करके आए हैं। परंतु हम इनके पराक्रम

13:58

को देख रहे थे। परंतु कल के युद्ध में मैं

14:01

स्वयं चलूंगा रणभूमि में और देखूंगा उसका

14:04

पराक्रम। वो बताऊंगा कल के वीडियो में। आज

14:07

का वीडियो मैं अब यहीं समाप्त करता हूं।

14:10

श्रोताओं आप सभी से क्षमा चाहूंगा कि मेरे

14:13

पास समय बहुत कम है और इसलिए मैं आपको

14:16

बड़े एपिसोड आपकी सेवा में प्रसारित नहीं

14:19

कर पा रहा हूं। इसके लिए मुझे खेद है और

14:22

आपसे क्षमा प्रार्थी हूं। श्रोताओं कल

14:25

आपके सामने फिर नया वीडियो लेकर के

14:28

उपस्थित हो जाऊंगा। तब तक के लिए आप सभी

14:31

से अनुमति चाहता हूं। श्रोताओं जय

0:03

इतिहास के पन्नों में यह कहानी साफ-साफ

0:06

लिखी हुई है। समस्त श्रोताओं का, भक्तों

0:10

का और सब्सक्राइबर बंधुओं का एक बार फिर

0:13

से स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है।

0:16

श्रोताओं जैसा कि आप जानते हैं हमारी

0:19

कहानी चल रही थी नरपुराण इतिहास में से।

0:23

श्रोताओं समय के अभाव में मैं आपको बहुत

0:26

छोटे एपिसोड आपकी सेवा में प्रसारित कर पा

0:29

रहा हूं। इसके लिए मैं आपसे क्षमा

0:31

प्रार्थी हूं। देखिए श्रोताओं मैं आपका

0:34

ध्यान 22वें एपिसोड से जोड़ता हूं। 22वें

0:38

एपिसोड में मैंने आपको बताया था कि जब

0:42

युद्ध हुआ तो उस युद्ध में बूंदा ने अपने

0:46

बड़े भाई भयंकर सिंह को तो छुड़ा लिया

0:49

लेकिन दूसरे दिन के युद्ध में बूंदा स्वयं

0:51

बंदी बन जाता है। और जो सेना थी कासिम गढ़

0:57

की भाग करके महाराज कासिम सिंह के पास

1:00

पहुंचती है। श्रोताओं इधर देखिए क्या होता

1:03

है। महाराज नल

1:06

मनसुख और जो उनके प्रधान सेनापति थे स्वयं

1:11

राजा मैनपाल मनसुख के पिताजी और रानी

1:14

गजमोतनी एक टेंट में एक शिविर में एक कक्ष

1:19

में बैठकर के आपस में बातचीत कर रहे थे।

1:22

रण पर रणनीति बना रहे थे कि कल के युद्ध

1:26

में हम इस तरीके से युद्ध नहीं करेंगे।

1:29

हमें यह युद्ध यथाशीघ्र समाप्त करना है।

1:32

जितना जल्दी हो सके युद्ध समाप्त करना है।

1:35

हमारी सेना की बहुत बड़ी बहुत बड़ी क्षति

1:38

हो चुकी है। इसलिए कल हमें तीनों योद्धाओं

1:42

को युद्ध भूमि में उतरना होगा। अब देखो

1:45

श्रोताओं उधर जब सेना भाग करके महाराज

1:50

कासिम सिंह के पास पहुंची तो कासिम सिंह

1:54

तिलमिला उठे कि उनका पुत्र महापराक्रमी

1:58

योद्धा बूंदाबंदी बन चुका है। तो यह बात

2:02

सुनकर के कासिम सिंह अपने पुत्र विश्वजीत

2:06

को बुलाते हैं और विश्वजीत से कहने लगे

2:10

अरे राजा

2:12

ऐसे बोल

2:15

ऐसे परे ना लाला पार

2:20

कल देखो रणभूमि में

2:25

धारण करंगो खुद हथियार

2:29

राजा

2:31

कासिम सिंह कहने लगे अपने पुत्र से कि

2:34

बेटे ऐसे पार नहीं पड़ेगी। मैं कल की

2:37

रणभूमि में स्वयं अस्त्र धारण करूंगा।

2:41

मुझे हथियार उठाना पड़ेगा। मैं देखूंगा कि

2:44

कितने पराक्रमी नरेश हैं। उनको मैं कल की

2:47

रणभूमि में पराजित कर दूंगा। श्रोताओं

2:51

अपने दोनों पुत्रों को आदेश दे दिया कि

2:55

सेना को सुसज्जित करो और कल एक साथ हम

2:59

तीनों के तीनों पिता पुत्र आक्रमण करके

3:02

अपने पुत्र बूंदा की कैद छुड़ाएंगे और हो

3:06

सके तो उनमें से राजा नल और महाराज मैनपाल

3:10

को बंदी बनाना होगा। तो देखिए श्रोताओं

3:14

महाराज कासिम सिंह ने अपने दोनों पुत्रों

3:18

को आदेश दे दिया कि सेना को सुसज्जित करो

3:21

और कल हम स्वयं रणभूमि में उतरेंगे।

3:24

श्रोताओं तीनों पिता पुत्र रणभूमि के लिए

3:28

साजो सामान तैयार कर लेते हैं। झिलम टोप

3:31

बख्तर पहन करके पांचों हथियार धारण कर

3:34

लेते हैं और अपनेपने हाथियों के हौदाओं पर

3:38

सवार हो जाते हैं और सेना को आदेश दे दिया

3:41

आक्रमण का कि चलिए मैदान की तरफ। अब उधर

3:46

देखिए राजा नल स्वयं जो दूल्हे बने हुए थे

3:51

मनसुख और उनके पिता श्री महाराज मैनपाल

3:55

उन्होंने देखा कि स्वयं महाराज कासिम सिंह

3:57

रणभूमि में आए हैं। तो महाराज मैनपाल ने

4:00

भी अपने अस्त्र सजा लिए कि मेरी तलवार की

4:04

धार भी अभी पहनी है। मेरी तलवार की धार

4:08

कुंद नहीं हुई है। मैं देखता हूं कैसा

4:10

योद्धा है कासिम सिंह।

4:13

तीनों योद्धा एक-एक बट जाते हैं। विश्वजीत

4:16

को महाराज नल कासिम सिंह के जो सामना कर

4:22

रहे हैं स्वयं नरेश मैनपाल और जो भयंकर

4:26

सिंह है उसके सामने उनका जो दूल्हा बना

4:30

हुआ मनसुख गुर्जर है। स्वयं महाराज मनसुख

4:33

गुर्जर बड़ा भारी घोर संग्राम हुआ। परंतु

4:38

श्रोताओं आपको बताना चाहूंगा कि जो राजा

4:43

कासिम सिंह था उसके साथ भी मां काली स्वयं

4:46

लड़ती थी। जो नगर की चंडी थी वो स्वयं

4:50

युद्ध करती थी और उसके पास चार वीर थे। तो

4:54

कासिम सिंह ने अपने चारों वीरों का स्मरण

4:57

किया और चारों वीरों का स्मरण किया तो

5:01

महाराज मैनपाल समझ गए कि अब मेरी पराजय

5:04

होना निश्चित है। चारों वीर महाराज मैनपाल

5:08

पर झपटे और महाराज मैनपाल को घोड़े से

5:11

नीचे गिरा दिया और जैसे ही महाराज मैनपाल

5:14

घोड़े से नीचे गिरे कासिम सिंह हाथी के

5:17

हौदे से उतरता है और मैनपाल को रस्साओं से

5:22

जकड़ लेता है बंदी बना लिया महाराज मैनपाल

5:24

को हाथी के हौदे में रख लिया और चला जाता

5:28

है अपनी सेना को साथ लेकर के

5:31

कासिमगढ़ के लिए श्रोताओं शाम तक युद्ध

5:35

चला सूर्य स्त तो अपने अपने सैनिकों को

5:39

संभालने लगे और जब भगती हुई सेना ने

5:43

महाराज नल और मनसुख से कहा कि आज के युद्ध

5:46

में हमारे महाराज मैनपाल बंदी बन चुके

5:50

हैं। श्रोताओं अब तो नल और मनसुख घबरा

5:55

जाते हैं कि अब महाराज को छुड़ाना संभव

5:58

नहीं है। क्योंकि विश्वजीत बहुत भारी

6:01

योद्धा है और कासिम सिंह भी बहुत भारी

6:04

योद्धा है। परंतु देखा जाएगा कल युद्ध

6:08

करना होगा। दोनों रह जाते हैं मनसुख और

6:12

उसका पगड़ी पलटा मित्र नल। दोनों मित्र

6:16

अपने कक्ष में जो मंत्रणा कक्ष है उसमें

6:19

बैठकर के विचार कर रहे हैं। क्या किया

6:22

जाए? तो गजमतनी ने देखा कि महाराज नल और

6:26

मनसुख दोनों व्याकुल हैं और महाराज कासिम

6:29

सिंह के डर से हथियार डालना चाहते हैं

6:33

क्योंकि कासिम सिंह कोई छोटे-मोटे राजा

6:35

नहीं थे। कासिम सिंह भवानी के वरदानी बड़े

6:40

महापराक्रमी उनकी तलवार से संसार दहलता

6:44

था। श्रोताओं गजमोत्नी कहने लगी कि महाराज

6:48

कल के युद्ध में मैं आपके साथ चलूंगी। और

6:52

कल मैं पूरा युद्ध समाप्त कर दूंगी। राजा

6:55

नल कहने लगे गजबतनी

6:57

तुम युद्ध कैसे समाप्त करोगी कि महाराज

7:01

मैं कासिम सिंह को भैंसा बना दूंगी।

7:04

और जब कासिम सिंह भैंसा बन जाए तो आपको

7:08

उसे बंदी बना लेना है। और जो विश्वजीत है

7:12

मैं उस पर भी जादू चलाऊंगी और उसे भी

7:15

भैंसा बना दूंगी। मैं कल के युद्ध में

7:18

जितनी भी कासिमगढ़ की सेना होगी समस्त

7:21

सेना को अपने सम्मोहक मंत्र के द्वारा

7:24

मूर्छित कर दूंगी। देखिए श्रोताओं एक

7:28

विद्या होती है सम्मोहक और वो विद्या ऐसी

7:30

होती है यदि उस अस्त्र का संधान कोई भी

7:33

योद्धा जानता है तो सामने वाले योद्धा की

7:37

समस्त सेना सहित उसे बेहोश किया जा सकता

7:40

है। तो श्रोताओं गजमोतनी की बात सुनकर के

7:44

राजा नल और मनसुख दोनों बातें करने लगे कि

7:49

मित्र हम तेगा में आसानी से नहीं हार

7:52

सकते। हमें कल के युद्ध में ये युद्ध

7:54

समाप्त करना होगा और महाराज मैनपाल को हर

7:58

हालत में छुड़ाना होगा। श्रोताओं जब

8:02

प्रातः काल हुआ तो नल और मनसुख ने अपनी

8:06

सेना को आदेश दे दिया कि आज का युद्ध

8:09

अंतिम युद्ध होना चाहिए। युद्ध निर्णायक

8:12

स्थिति का होना चाहिए। या तो वीरगति को

8:16

प्राप्त होंगे और या आज हम उस राजा को

8:19

वीरगति दिला देंगे। उसे पराजित करेंगे। हे

8:22

श्रोताओं

8:25

समस्त सेना को सजा करके रण के बाजे बजवा

8:28

दिए। सेनाएं मैदान में आ गई और उधर से भी

8:32

महाराज कासिम सिंह क्योंकि महाराज मैनपाल

8:36

को बंदी बना लिया था। उसके दोनों पुत्र

8:39

उधर से भी बूंदाबंदी बना हुआ पड़ा है।

8:42

दोनों पुत्र भी रणभूमि के लिए तैयार हो

8:45

जाते हैं और वह भी यह सोच रहे हैं कि आज

8:48

बूंदा की कैद छुड़ानी है और नल और मनसुख

8:52

दोनों को बंदी बनाना है। श्रोताओं

8:55

आमनेसामने की टक्कर हो जाती है दोनों

8:57

सेनाओं में। बड़ा भयंकर घनघोर युद्ध हो

9:01

रहा है।

9:03

हाथी के ओदा वाले से हाथी का ओहदा।

9:06

घुड़सवार से घुड़सवार पैदल से पैदल

9:09

तलवारबाज से तलवारबाज युद्ध कर रहा है।

9:13

अपने अपने महाराजाओं की जय जयकार करके

9:15

युद्ध कर रहे हैं। तभी रानी गजमोतनी जिधर

9:20

अपना घोड़ा चला देती है उधर

9:24

काट काट करके योद्धाओं को ढेर का ढेर

9:27

मचाती चली जाती है। सेना को काट रही है

9:31

महारानी गजमोतनी और युद्ध करते-करते जहां

9:35

राजा नल भयंकर सिंह और महाराज कासिम सिंह

9:39

से युद्ध कर रही थी। उस मोर्चा पर पहुंच

9:42

जाती है और देखा कि कासिम सिंह इस तरीके

9:47

से हारने वाला नहीं है। महारानी गजमोतनी

9:50

ने देखा कि कासिम सिंह

9:53

आग उबल रहा है। उसकी तलवार थमने का नाम

9:57

नहीं ले रही है और भयंकर सिंह भी महावट

10:01

योद्धा है। और महाराज नल दोनों से लोहा ले

10:04

रहे हैं। तो गजमोतनी ने सम्मोहक मंत्र का

10:08

संधान किया और दोनों योद्धाओं पर वो

10:11

सम्मोहक मंत्र चला दिया। दोनों योद्धा उसी

10:15

समय मूर्छित हो जाते हैं। जैसे ही दोनों

10:18

योद्धा मूर्छित हुए तो महाराज नल्ले

10:21

उन्हें तुरंत रस्सियों से बंधवा लिया।

10:24

बंदी बना लिया और बंदी बना करके दोनों को

10:27

भिजवा दिया अपने कारागृह में। डलवा दिया

10:30

कारागार में। श्रोताओं विश्वजीत रह जाता

10:34

है। विश्वजीत बड़ा बलवान था। विश्वजीत को

10:38

पता चल गया कि महाराज कासिम सिंह और उनके

10:42

बड़े भाई भयंकर सिंह बंदी बन चुके हैं। अब

10:45

मैं अकेला रह गया हूं रणभूमि में। परंतु

10:48

विश्वजीत को हराना आसान काम नहीं था। जैसा

10:53

उसका नाम था वैसा ही उसका काम था। वो

10:56

दोनों हाथों से तलवार चलाना जानता था।

11:00

उसकी तलवार थमने का नाम नहीं लेती थी। 60

11:04

हजार हाथियों की ताकत थी विश्वजीत में।

11:08

उसका नाम विश्वजीत ऐसे ही नहीं था। कोई भी

11:12

राजा उसका मुकाबला करने में सक्षम नहीं

11:14

थे। जब महाराज मनसुख आगे बढ़े तो विश्वजीत

11:20

ने मनसुख को पटक लिया। मनसुख को जमीन पर

11:24

डाल लिया है और जैसे ही काटने के लिए

11:27

तलवार चलाई तो नल अपना तेगा सामने अड़ा

11:30

देते हैं। रोक लिया विश्वजीत को और महाराज

11:34

नल में और विश्वजीत में युद्ध होने लगा।

11:38

महाराज नल ने कुछ समय में ही क्योंकि नल

11:41

देवी के वरदानी थे। नल भी कोई मामूली

11:43

शक्ति नहीं थे। चार कला से अवतार था नल।

11:47

विश्वजीत को जमीन पर डाल दिया। मसके बांध

11:51

ली। बंदी बना लिया। बंदी बना करके अपने

11:56

शिविर को भिजवा दिया। और सेना जब सेनापति

11:59

नहीं रहा। राजा राजा के तीनों पुत्र बंदी

12:03

बन गए तो सेना भाग जाती है कासिमगढ़ के

12:06

लिए। और महाराज नल और मनसुख भी अपनी विजय

12:11

का डंका बजाते हुए आ जाते हैं अपने

12:14

शिविरों में।

12:16

श्रोताओं महाराज मैनपाल तो बंदी बने हुए

12:19

हैं। पड़े हुए हैं कासिमगढ़ के कारागार

12:23

में। परंतु इधर राजा नल अपना दरबार लगाते

12:26

हैं। राजा नल दरबार में बैठते हैं और

12:30

महाराज कासिम सिंह को दरबार में पेश कराया

12:33

जाता है कि उस मुलजिम को पेश किया जाए।

12:37

और कासिम सिंह से पूछा जाता है कि महाराज

12:41

कासिम सिंह आपके सिक्का की जो शर्तें थी

12:45

हमने समस्त शर्तों का पालन कर दिया है।

12:48

क्या आप विवाह करने के लिए राजी हैं?

12:52

कासिम सिंह कहने लगे बेटे नल मैं मान गया

12:56

तू वाकई में योद्धा है। और मुझे ऐसे ही

13:00

योद्धाओं को अपनी पुत्री का विवाह करना

13:02

था।

13:03

तो राजा नल कहने लगे को भेजिए। पहले अपने

13:07

एक सेवक को भेजिए और महाराज मैनपाल को

13:11

बंदी गृह से छुड़वाइए। फिर हम आपको सम्मान

13:14

सहित यहां से रिहा कर देंगे। महाराज

13:17

मैनपाल कहने लगे कि राजा नल हम क्षत्रिय

13:21

हैं। वचन से मुकरना नहीं जानते। मर जाते

13:24

हैं लेकिन वचन से नहीं चलते।

13:28

हम तुम्हारे पिताजी को इसी समय आदेश पारित

13:32

करते हैं। तुम्हारा एक सैनिक बुलाइए। तो

13:35

महाराज

13:37

कासिम सिंह ने वहीं से एक खत लिखा और एक

13:40

सैनिक को खत देकर के भेज दिया कासिमगढ़।

13:44

श्रोताओं कासिमगढ़ में सेनापति को क्योंकि

13:48

राजा राजा के पुत्र तो बंदी थे। वो खत दे

13:51

दिया और जब सेनापति ने खत पढ़ा महाराज के

13:55

दस्तखत हस्ताक्षर पढ़े तो महाराज मैनपाल

13:59

को सम्मान सहित हाथी के ओदा पर बैठा करके

14:03

विदा कर दिया। महाराज मैनपाल आ जाते हैं

14:07

बंदी गृह से छूट करके अपने शिविर में और

14:11

वहां देखा तो महाराज कासिम सिंह बंदी बने

14:14

खड़े हुए हैं। महाराज मैनपाल ने आते ही

14:19

पहले कासिम सिंह को कैद से मुक्त कराया कि

14:21

कासिम सिंह को छोड़ दिया जाए। उसके तीनों

14:24

पुत्रों को बुलाया जाए। श्रोताओं कासिम

14:27

सिंह के तीनों पुत्र विश्वजीत, भयंकर सिंह

14:30

और बूंदा तीनों को कारागार से मुक्त कर

14:33

दिया गया।

14:34

और महाराज कासिम सिंह महाराज मैनपाल से

14:38

कहने लगे राजन हम तुमसे प्रसन्न हैं और

14:41

हमारी पुत्री का विवाह करने के लिए तैयार

14:43

हैं। तुम चढ़ाई बारात की तैयारी कीजिए।

14:48

बारटी बारटी होती है। बारटी के लिए बारात

14:51

को ले आओ। परंतु ध्यान रहे महाराज हमारा

14:55

जो तोरण है 80 गज ऊपर है। 80 गज ऊपर तोरण

15:00

मारना पड़ेगा आपके पुत्र को। तो राजा नल

15:03

कहने लगे महाराज कासिम सिंह हमने आपकी सभी

15:06

शर्तों को पूरा कर दिया है। एक शर्त बाकी

15:10

रह रही है कि आपका तोरण 80 गज ऊपर है और

15:14

हमारा जो लड़का है वो वहां तक नहीं

15:16

पहुंचेगा। परंतु परंतु मां भवानी के

15:19

प्रताप सिंह जाइए हम यह शर्त भी आपकी पूरी

15:23

करेंगे। राजा कासिम सिंह कहने लगे महाराज

15:25

हम आपसे पराजित हो गए हैं। इसका मतलब यह

15:28

नहीं है कि आप तोरण को नहीं मारें। हम

15:32

विवाह नहीं करेंगे। तो राजा नल कहने लगे

15:35

ठीक है महाराज आप सम्मान सहित अपने नगर को

15:38

लौट जाए। श्रोताओं कासिम सिंह और उसके

15:42

तीनों पुत्र सम्मान सहित आ जाते हैं कासिम

15:45

गढ़ और हंसी-खुशी विवाह की तैयारी करने

15:49

लगे। क्योंकि उसकी समस्त शर्तों का पालन

15:53

महाराज मैनपाल कर चुके थे। विवाह की

15:56

तैयारी की गई। 80 गज ऊंचा दरवाजा बनाया

16:00

गया और उस दरवाजे पर तोरण लगा दिया गया।

16:04

तोरण जानते हैं विवाह के टाइम पर जो

16:06

दूल्हा होता है उसको छड़ी से उसमें छड़ी

16:09

मारता है। वो तोरण मारना कहलाता है।

16:13

श्रोताओं इधर महाराज नल ने

16:17

अपनी माता भवानी का स्मरण किया और बारात

16:20

को चढ़ाई के लिए भेज दिया। बड़े धूमधाम से

16:24

ढोल नगाड़े बजते हुए बारात बारटी के लिए

16:27

चली जा रही है। श्रोताओं जब बारात दरवाजे

16:32

पर आई तो देखा राजा नल सोचने लगे कि 80 गज

16:38

ऊपर तोरण है। मेरे पास उड़ना घोड़ा तो है

16:42

लेकिन नियमानुसार घोड़े पर बैठकर तोरण

16:45

नहीं मारा जाता। यह तो स्वयं मेरे मित्र

16:48

को ही तोरण मारना होगा।

16:50

रानी गजमोतनी कहने लगी जब रानी गजमोतनी ने

16:54

नल का चेहरा पढ़ा तो चेहरा उदास हो गया तो

16:58

गजमोतनी कहने लगी महाराज आप घबराइए मत

17:02

मेरे पास आठ वीर हैं। मैं तुम्हारे मित्र

17:05

को 80 गज तो क्या 8000 गज ऊपर पहुंचा

17:10

दूंगी। चिंता मत कीजिए। श्रोताओं गजमोतनी

17:15

ने जब दूल्हा उस पारोठी पर दरवाजे पर आया

17:20

तो अपने वीरों का स्मरण किया और वीरों से

17:22

कहा कि जो दूल्हा है इसे 80 गज ऊपर जो

17:27

तोरण है वहां तक पहुंचाइए।

17:30

आठों वीर अदृश्य हो गए। अदृश्य होकर के

17:33

मनसुख को उठा लिया। समस्त नगर देख रहा है

17:38

कि ये कैसा योद्धा है जो गगन रामनी विद्या

17:41

जानता है। ये तो अंतरिक्ष में उड़ रहा है।

17:44

और मनसुख ने तोरण भी मार दिया।

17:48

देखिए श्रोताओं जय जयकार के स्वरों से

17:53

संपूर्ण नगर गूंज उठा। महाराज नल और

17:57

महाराज मैनपाल और महाराज मनसुख की जय

17:59

जयकार हो रही है। श्रोताओं राजा हंसीखुशी

18:04

बारात को अंदर लेवा ले जाता है। अपने किले

18:08

में ले गया और बारात के लिए पकवान बनवाना

18:11

आरंभ कर दिया। बारात की भोजन व्यवस्था

18:13

आरंभ कर दी गई और एक विद्वान ब्राह्मण

18:17

बुलाया गया। शुभ समय, शुभ घड़ी और शुभ

18:22

मुहूर्त देखकर के ब्राह्मण ने जो फेरा

18:26

होते हैं, भामर डलती है उनका समय

18:28

निर्धारित किया।

18:30

कश्मीरा को दुल्हन बनाया गया। कश्मीरा को

18:34

सजाया गया। कश्मीरा चंद्रमा के समान सुंदर

18:37

थी। चंद्रमा के समान कांत थी कश्मीरा की।

18:42

दुल्हन बनी ऐसी शोभा दे रही है मानो स्वयं

18:46

चंद्रमा की चांदनी ने रूप धारण कर लिया

18:49

हो। श्रोताओं विवाह का मंडप तैयार हो गया

18:54

और राजा मैनपाल ने मनसुख के साथ महाराज नल

18:58

को भेज दिया कि आप फेरा डलवाइए। श्रोताओं

19:03

विधि विधान के अनुसार नियमानुसार मनसुख के

19:06

और कश्मीरा के फेरा डल गई। भामरे डल गई और

19:10

अब वो दोनों पति पत्नी बन गई। महाराज

19:13

मैनपाल कासिम सिंह के समधी बन गए और राजा

19:18

मनसुख उनके दामाद बन गए। राजा नल उनके

19:21

मित्र थे मनसुख के इसलिए वो भी दामाद बन

19:24

गए। महाराज कासिम सिंह ने 60 हजार हाथी 60

19:30

हजार घोड़ा

19:32

और 60 हजार की सेना दहेज में राजा मेनपाल

19:37

को दी। राजा मैनपाल

19:40

हंसीखुशी अपने पुत्र का विवाह कर लेते

19:43

हैं। श्रोताओं और सम्मान सहित

19:48

अपने पुत्रवधू को लेकर के हंसीखुशी अपने

19:51

नगर को प्रस्थान कर देते हैं और अपने नगर

19:55

के लिए आ जाते हैं। श्रोताओं

19:59

श्रोताओं आज का यह जो मैदान था हमारा

20:02

राजा मनसुख गुर्जर का विवाह वो संपूर्ण हो

20:06

गया है। कश्मीरा

20:09

आ जाती है श्यामनगर में। अब आगे का मैदान

20:13

मैं आपको 24वें एपिसोड में सुनाऊंगा

20:16

श्रोताओं वो कल से आरंभ करूंगा। इसी के

20:20

साथ अब यह वीडियो समाप्त होता है। जय हिंद

20:23

जय भारत।

18.

0:03

इतिहास के पन्नों में यह कहानी साफसाफ

0:06

लिखी हुई है। नव पुराण इतिहास का नया

0:11

एपिसोड आपकी सेवा में प्रसारित है।

0:14

श्रोताओं परंतु मैं आपका ध्यान

0:18

23वें एपिसोड से जोड़ता हूं। 23वें एपिसोड

0:21

में मैंने आपको बताया था कि मनसुख गुर्जर

0:25

का विवाह हो जाता है। विवाह संपन्न कराने

0:28

के बाद महाराज मैनपाल, मंसू गुर्जर और

0:32

रानी कश्मीरा

0:34

तथा राजा नल सभी प्रसन्नता पूर्वक अपने

0:39

अपने नगरों को आ जाते हैं। महाराज नल चले

0:43

जाते हैं अपने

0:45

नगर को नरवरगढ़ को। अब देखिए श्रोताओं

0:51

ये सभी काम जब संपूर्ण हो गए तो एक दिन

0:55

फिर महारानी मंजा

0:59

बैठी हुई थी सोच अवस्था में। जब राजा नल

1:04

ने अपनी माता को सोच अवस्था में बैठे हुए

1:07

देखा तो कारण पूछा

1:11

तो बंजा रानी कहने लगी बेटे नल

1:14

क्या बताऊं तुझे? मैं प्रसन्नता पूर्वक

1:18

गंगा स्नान करना चाहती थी। परंतु दुष्ट

1:22

कंपिलगढ़ नरेश फूल सिंह ने मुझे स्नान

1:25

नहीं करने दिया।

1:27

और गंगा के घाट से मुझे बंदी बना लिया

1:32

गया।

1:34

मैं काग उड़ाते उड़ाते परेशान हो गई और

1:38

तेरे पिता महाराज प्रथम चक्की पीसते पीसते

1:42

उनके हाथों में छाले पड़ गए। इतनी चाकी

1:45

चलाई उन्होंने।

1:47

तो हे पुत्र नल अब मुझे आशा है इस बात की

1:52

कि तुम दोनों पति पत्नी

1:55

हम दोनों तुम्हारे पिता और मुझे गंगा

1:58

स्नान करा के लाएंगे।

2:01

श्रोताओं

2:03

देखिए राजा लोग थे

2:06

तो राजा नल ने मन में विचार किया कि जब

2:09

इनकी इच्छा गंगा स्नान की है तो मैं अवश्य

2:12

ही इनको गंगा स्नान कराऊंगा। श्रोताओं

2:17

गजमोतनी भी वही आ जाती है और गजमोतनी

2:21

महाराज नल से कहने लगी कि हे राजन जब आप

2:25

जैसा बलधारी इनका पुत्र हो और आप स्वयं

2:31

एक राज्य का संचालन करने वाले हो

2:35

जादू में मेरे समान जादूगर इस दुनिया में

2:38

नहीं है तो क्यों ना माता-पिता को गंगा

2:42

स्नान कराएं और हम भी गंगा स्नान करें।

2:46

श्रोताओं

2:47

राजा नल ने जब गजमोतनी की और मंजा की बात

2:52

सुनी तो आदेश दे दिया अपनी फौज को

2:57

कि तैयार किया जाए सेना को 500 योद्धा

3:01

तैयार किए जाए। देखिए राजा लोग थे तो वो

3:04

इसी तरीके से स्नान करते थे। सैनिक साजो

3:07

सामान के साथ धोसा के साथ स्नान करते थे।

3:13

यह नहीं कि चुपचाप स्नान करें।

3:16

देखो श्रोताओं

3:18

चारों प्राणी राजा नल, गजमतनी, महाराज

3:22

प्रथम और रानी बंजा गंगा स्नान करने के

3:26

लिए तैयार हो रहे हैं। और इधर लाखा दादा

3:29

को बुला लिया गया है। लाखा दादा ब्राह्मण

3:33

थे। तो लाखा दादा से कहा कि लाखा दादा अब

3:38

हम गंगा स्नान करने की तैयारी कर रहे हैं।

3:41

तो लाखा ब्राह्मण कहने लगे ठीक है बेटे नल

3:44

गण गंगा पर ही स्नान करेंगे क्योंकि हमने

3:47

कंपिलगढ़ नरेश को तो पराजित कर दिया

3:51

और अब वो हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता और

3:54

फिर कोई दूसरा राजा ऐसा है नहीं जो हमसे

3:58

कुछ युद्ध करे या कोई और हमारे साथ उत्पात

4:01

करने की कोशिश करे

4:04

श्रोताओं

4:06

राजा नलदे 5000 योद्धाओं को सजा लिया।

4:11

हाथी, घोड़ा फौज पलटन सज जाती है। समस्त

4:15

योद्धा तैयार हो गए और दो सुंदर पालकियां

4:19

जिसमें एक में मंझा बैठ जाती है। एक में

4:23

गजमतनी रानी बैठ जाती है। दो दिव्य रथ

4:27

सजाए गए। जिसमें महाराज प्रथम और उनके

4:31

पुत्र राजा नल विराजमान हो गए। श्रोताओं

4:36

सेना के साथ हंसीखुशी धोसा बजाते हुए गढ़

4:41

गंगा पर स्नान करने के लिए जा रहे हैं।

4:45

गजमोतनी रानी

4:47

बड़ी प्रसन्न है कि चलो हम अपना गंगा

4:51

स्नान पूर्ण करते हैं। पहले जो गंगा स्नान

4:54

अधूरा रह गया था। हमारे सास ससुर को

4:57

कंपिलगढ़ नरेश फूल सिंह ने बंदी बना लिया

5:00

था। अब हम उन्हें गंगा स्नान करा के

5:04

लाएंगे।

5:05

श्रोताओं तीन दिन का सफर करने के बाद

5:09

श्रोताओं तीन दिन का सफर करने के बाद राजा

5:14

नल महाराज प्रथम मंज रानी और गजमोतनी गढ़

5:18

गंगा पर पहुंच जाते हैं। गढ़ गंगा पर

5:23

राजाओं की भीड़ रहती थी। वह स्थान था गढ़

5:28

गंगा जहां पर राजा लोग स्नान किया करते

5:32

थे। श्रोताओं राजा नल ने अपनी सेना को

5:36

आदेश दे दिया कि यही तंबू डेरा लगा दिए

5:39

जाए, शिविर लगा दिए जाए और सुरक्षा

5:43

व्यवस्था चौकस रहे। अब देखिए श्रोताओं उधर

5:47

क्या होता है जब कंपिलगढ़ नरेश फूल सिंह

5:52

को यह सूचना मिलती है कि राजा नल ने मेरी

5:56

पुत्री से विवाह किया और रास्ते में मार्ग

6:00

में मेरी पुत्री को मार दिया। सरबती का

6:03

अंत कर दिया तो फूल सिंहंग

6:07

आग बबूला हो जाता है।

6:10

अंदर ही अंदर जलने लगा उसका जहर

6:15

बाहर आने लगा। श्रोताओं आप समझ रहे होंगे

6:19

कि जो पराजित शत्रु होता है। मैं आपको एक

6:22

बात बताना चाहूंगा। जीवन का सत्य है ये।

6:25

विजेता शत्रु कभी भी खतरा नहीं पहुंचाएगा

6:29

आपको। क्योंकि विजेता शत्रु तो अपने अहम

6:32

में हो जाता है। अहंकार में आ जाता है कि

6:35

मैं जीत गया और दोबारा इसे पराजित करूंगा।

6:38

परंतु भारतीय नरेशों की ये सबसे बड़ी भूल

6:41

होती थी कि वो विजय के बाद अहंकार में

6:46

उत्साह में खो जाते थे और पराजित शत्रु

6:50

हमेशा उस मौके का फायदा उठाता था।

6:53

तो हमेशा जिस दुश्मन को आपने हरा दिया है

6:57

उस दुश्मन से सावधान रहो। उसका को कभी भी

7:00

विश्वास मत करो। श्रोताओं

7:04

वही राजा फूल सिंह

7:07

आग की तरह जलने लगा और मन में विचार करने

7:10

लगा कि मेरे गुरुदेव हैं जलंधर जोगी। उनका

7:14

गुरु था जलंधर जोगी जो बहुत बड़ा जादूगर

7:19

था।

7:21

14 विद्या निधान था। कि अब मुझे मेरी

7:24

इज्जत बचानी है। और दो साल का समय जब तक

7:28

निकल गया था क्योंकि युद्ध को दो साल हो

7:32

गए कंपिलगढ़ से महाराज प्रथम की कैद

7:35

छुड़ाई तो सेना भी सुदृढ़ करने लगा

7:39

और श्रोताओं मन में विचार करके कि मुझे

7:42

अपनी इज्जत बचानी है।

7:45

चल देता है अपने गुरु जोगी जालंधर के पास।

7:50

जालंधर जोगी के पास चला जा रहा है। खोजता

7:54

खोजता पहुंच जाता है अपने गुरु के पास।

7:59

श्रोताओं

8:01

गुरु का आश्रम खोजा।

8:04

आश्रम खोजने के बाद गुरु के पास पहुंचा और

8:08

गुरु को प्रणाम किया। तो गुरु ने जब राजा

8:12

फूल सिंह को देखा

8:14

तो आशीर्वाद दिया और उसका चेहरा देखकर के

8:20

जोगी जालिंदर कहने लगा कि हे राजन हे मेरे

8:25

प्रिय शिष्य मुझे यह बताओ कि तुम्हारा

8:27

चेहरा उदास क्यों है? तुम्हारी उदासी का

8:30

कारण क्या है?

8:32

किसी ने कुछ कहा हो तो मुझे बताइए। मैं

8:37

समस्त भारतवर्ष के नरेशों को पत्थर की

8:40

शिला बना सकता हूं। यह बात सुनकर के

8:44

कंपिलगढ़ के राजा फूल सिंह पंजाबी कहने

8:48

लगे कि बाबा गुरु जी मैं आपको कुछ बता

8:52

नहीं सकता। मेरे कंपिलगढ़ में आग लगा दी

8:56

गई। मेरा कंपिलगढ़ जला दिया गया। मुझे

9:00

बंदी बना लिया। मेरे दोनों हाथ बांध दिए

9:03

गए। मेरी मसके चढ़ा ली गई। मेरी समस्त

9:07

सेना पराजित हो गई।

9:09

यह बात जब जालिंदर जोगी ने सुनी तो

9:13

जालिंदर जोगी कहने लगा बेटे ऐसा कौन पैदा

9:16

हो गया बामनगढ़ के बीच में? जिसने

9:20

तो जो जैसे देवी के वरदानी

9:24

राजा को हरा दिया। कौन है वो नरेश कि

9:28

महाराज

9:30

मैं गढ़ गंगा पर स्नान करने गया था।

9:33

वह एक नरवरगढ़ का राजा था प्रथम

9:37

और उससे उसकी पत्नी मंजा ने मेरी पुत्री

9:40

सरती का अपमान किया था।

9:43

इस वजह से हम दोनों में वहां गढ़ गंगा पर

9:46

युद्ध हुआ और मैं

9:49

राजा प्रथम को मंजा सहित बंदी बना के

9:52

कंपिलगढ़ ले गया। मैंने प्रथम को कैद में

9:55

डाल दिया। पीसने को एक चाखी दे दी और मंजा

9:58

को महल पर खड़ा कर दिया। एक लंबा बांस

10:01

देकर के काग उड़ाने के लिए। तो जालिंदर

10:05

नाथ जोगी कहने लगे फिर बेटे क्या हुआ कि

10:08

बाबा

10:10

कुछ समय बाद उसका एक पुत्र था नल।

10:15

उस नल्ले अपने मित्र श्याम नगर के राजा

10:20

मनसु गुर्जर को साथ लेकर के आक्रमण किया

10:25

और उस आक्रमण में उसने हमारे कंपिलिगढ़ को

10:29

जला के रख दिया। कंपिलगढ़ के हर घर में आग

10:32

लगा दी गई। कंपिलगढ़ की लूट की गई।

10:35

कंपिलगढ़ में हत्याएं की गई।

10:38

हे गुरुदेव

10:40

यहीं तक सीमित नहीं रहा। तुम्हारे इस

10:42

शिष्य फूल सिंह को बंदी बना लिया गया।

10:46

इसकी भुजाएं बांधी गई

10:49

और गुरु जी मेरी पुत्री सरती का विवाह

10:53

बलपूक कर लिया और यहीं तक नहीं छोड़ा।

10:57

विवाह करने के बाद मेरी पुत्री का अंत कर

11:00

दिया। मैं जल रहा हूं आग में। हे गुरुदेव

11:05

आप यदि मुझे जीवित देखना चाहते हैं तो

11:08

मेरी इच्छा की पूर्ति की जाए। जब अपने

11:11

शिष्य को इस तरीके से रोते हुए

11:15

जालिंदर जोगी ने देखा तो जालिंदर जोगी

11:17

खड़ा हो गया। आंखें तरेरा खा गई। कहने लगी

11:22

बेटे

11:23

खड़े हो जाओ और मुझे ये बताओ कि अब तुम

11:27

क्या चाहते हो? कि बाबा

11:30

ध्यान से सुना जाए। वही नल अपने माता-पिता

11:35

को गढ़ गंगा पर स्नान कराने आया है

11:38

और साथ में उसकी पत्नी गजमोतनी भी है और

11:43

मेरी हार राजा नल के बस का काम नहीं था कि

11:47

राजा नल से मेरी हार हुई है। मैं

11:50

तलवारबाजी में नहीं हार सकता था बाबा।

11:53

मेरी हार गजमोतनी ने कराई है कि कैसे कि

11:57

वह बहुत बड़ी जादूगर है।

12:00

उसने अपने वीरों की मदद से

12:04

और अनेकों जादू चला के मेरी सेना को

12:08

पराजित किया। मुझे बंदी बनवाया और मेरी

12:11

पुत्री का अंत भी उसी ने कराया। क्योंकि

12:14

मेरी पुत्री यदि नल के साथ महलों में जाती

12:17

तो रानी बनती। उससे अधिकार मांगती। इसलिए

12:21

उस गजमतनी ने मेरी पुत्री का भी अंत करा

12:24

दिया। बाबा मैं तुम्हारा शिष्य हूं और यदि

12:30

तुम मुझे चाहते हैं तो मुझे गजमतनी का हरण

12:34

करके आना चाहिए। गजमतनी को चोरी करके लाओ।

12:38

तुम कैसे लाओगे यह मैं नहीं मैं नहीं

12:40

जानता।

12:42

जालिंदर जोगी कहने लगा बस बेटे थोड़ी सी

12:44

बात है मैं आज ही जा रहा हूं गणगंगा पर और

12:49

मैं गजमतनी का हरण करके लाऊंगा गजमोतनी को

12:53

तेरी सेवा में उपस्थित कर दूंगा तू चिंता

12:57

मत करे हे श्रोताओं

13:00

राजा फूल सिंह वही चंदागढ़ के किले में

13:05

रुक जाते हैं

13:08

और इंतजार कर रहे हैं अपने गुरु गुरु जोगी

13:12

जालंदर नाथ के आने का। इधर जालिंदर नाथ

13:15

अपने शिष्य को साथ लेते हैं और दोनों गुरु

13:18

शिष्य

13:20

कंधाओं पर झोली लटका करके चल देते हैं

13:23

गणगंगा के लिए। श्रोता वो अपने जादू के बल

13:28

से जो कि जलंधर नाथ ने एक चादर निकाली। उस

13:32

चादर को बिछाया और दोनों गुरु शिष्य उस

13:36

चादर पर बैठ गए। चादर पर बैठने के बाद

13:39

चादर से कहा कि चलिए गढ़ गंगा पर लेकर

13:42

चलिए। तो देखो श्रोताओं चादर जादुई थी।

13:47

दोनों गुरु शिष्य चादर पर बैठकर के

13:50

अंतरिक्ष मार्ग से कुछ ही क्षणों में गढ़

13:53

गंगा पर पहुंच गए।

13:56

उधर ध्यान से सुनने की बात है। जलंधर जोगी

13:59

तो आ जाते हैं गढ़ गंगा पर। उधर राजा नल

14:03

और गजमोतनी सबसे पहले अपने माता-पिता को

14:07

स्नान कराते हैं और स्नान कराने के बाद

14:11

अपने माता-पिता को नरवरगढ़ भेज दिया जाता

14:14

है। 10,000 सैनिक उनके साथ भेज दिए और नल

14:19

ने और गजमत ने कह दिया कि हम दो से चार

14:23

दिन में वापस लौटेंगे। हम यहां कई दिन

14:26

गंगा में स्नान करेंगे। यहां पर्व लेंगे

14:30

और यहां पर कुछ समय रहना चाहेंगे।

14:33

श्रोताओं

14:35

राजा प्रथम कहने लगे ठीक है पुत्र परंतु

14:38

सावधानी रखना क्योंकि ये राजा हैं ये कभी

14:42

भी बैर नहीं छोड़ते अपना मौका निकाल सकते

14:44

हैं। तो नल कहने लगा पिताजी आप चिंता मत

14:48

करो। रणभूमि में मैं किसी को नहीं जीतने

14:51

दूंगा। मेरे पास अक्षय ते है घुमासुर दाने

14:55

की। और जो दाने की पुत्री गजमोतनी है वो

14:59

जादू में बड़ी प्रवीण है। बड़ी पारंगत है।

15:03

उसके समान कोई जादूगर इस संसार में है

15:05

नहीं। तो इसलिए हमें डरने की आवश्यकता

15:08

नहीं है।

15:10

श्रोताओं महाराज और रानी मंझा तो आ जाते

15:14

हैं नरवरगढ़ और राज्य का संचालन संभालने

15:18

लग गए। उधर देखिए राजा नल से मोतनी कहने

15:23

लगी कि महाराज

15:25

मैं आज अकेली गंगा स्नान के लिए जाना

15:28

चाहती हूं। मैं गंगा में विहार करूंगी और

15:31

गंगा स्नान करूंगी। नल कहने लगा ठीक है

15:34

गजबतनी तुम यहीं तुम्हारे तंबू लगे हुए

15:38

हैं। घाट पर चली जाओ। आराम से स्नान करके

15:42

आओ। राजा लोग भी स्नान करके जा चुके हैं।

15:45

श्रोताओं जब पर्व होता था उसी समय राजा

15:49

रहते थे और जब पर्व समाप्त हुआ तो राजा भी

15:52

अपने तंबू डेराओं को उखाड़ करके चले जाते

15:55

थे अपने राज्यों के लिए। वहां कोई राजा

15:58

नहीं रहा। केवल राजा नल का टेंट शिविर लगा

16:02

हुआ है। और गजमतनी

16:07

गंगा में स्नान करने के लिए महाराज नल से

16:10

कह के चली जाती है।

16:12

गजमतनी गंगा में घुस जाती है। प्रवेश कर

16:15

गई गंगा में। छातीछाती पानी में गजमतनी

16:18

घुस जाती है। इधर श्रोताओं

16:22

जालिंदर जोगी वही बाट लगाए बैठा हुआ है।

16:27

घात लगा के बैठा है कि कब मैं गजमतनी का

16:31

अपहरण करूं। कब गजमोतनी की चोरी करके ले

16:34

जाऊं। तो जब झिलमिला

16:37

जब जालिंदर जोगी ने देखा कि ये जो लड़की

16:42

है। गंगा की धार में स्नान कर रही है। कोई

16:45

राजकुमारी दिखाई पड़ती है। यही मुझे राजा

16:49

नल की पत्नी गजमोतनी जान पड़ती है। तो

16:54

जालिंदर जोगी ने दिमाग से काम लिया और

16:58

आवाज लगाई हे पुत्री गजमोतनी हमें दक्षिणा

17:02

दीजिए। जब गजमोतनी ने पीछे मुड़ के देखा

17:06

तो कहने लगी बाबा मैं अभी स्नान कर रही

17:10

हूं। मैं गंगा के अंदर हूं। मेरा आधा बदन

17:15

उघारा है। नंगा है मेरा आधा बदन। मैंने

17:18

कुछ वस्त्र उतार करके बाहर रखे रख रखे

17:21

हैं। इसलिए हे बाबा मुझे स्नान करने

17:24

दीजिए। और स्नान करने के बाद आप मेरे पति

17:28

महाराज नल के पास जाइए। आपको मुंह मांगा

17:31

दान मिलेगा।

17:33

तो जालिंदर जोगी कहने लगा कि पुत्री मुझे

17:37

तो किसी राजा की पुत्री दिखाई नहीं पड़ती।

17:41

मैं जानता हूं तू दाने की लड़की है। मैं

17:44

यह भी जानता हूं तू जादू में निधान है।

17:47

इसीलिए तू मेरा अनादर कर रही है।

17:50

तो यह बात सुनकर के गजमूतनी कहने लगी कि

17:53

नहीं संत महाराज मैं संतों का अपमान करना

17:56

नहीं चाहती। तो जालिंदर जोगी कहने लगे कि

18:00

यदि तू संतों का अपमान नहीं करती तो तू

18:02

मेरे बारे में नहीं जानती। पुत्री मैं कभी

18:05

किसी नर के हाथ से दान नहीं लेता। मैं

18:09

केवल नारियों से ही दक्षिणा लेता हूं और

18:12

यदि तू दक्षिणा देना चाहती है तो इस गंगा

18:15

से बाहर निकल।

18:17

श्रोताओं गंगा की धारा में गजमोतनी पर

18:20

जादू नहीं चल रहा था उसका। जादू चलाने का

18:23

प्रयास कर रहा था जोगी परंतु जैसे ही जादू

18:27

चलाता वो जादू कट जाता था। इसलिए वो

18:30

गजमतनी को अर्धनग्न अवस्था में क्योंकि

18:34

कुछ वस्त्र उतार रखे थे बाहर निकालना

18:36

चाहता था। गजमोतनी कहने लगी कि बाबा मैं

18:41

अभी बाहर नहीं निकलूूंगी। मेरे नहाने का

18:43

समय निकला जा रहा है। तो जालंधर जोगी कहने

18:47

लगा पुत्री यदि तुम्हें दान नहीं देना है

18:50

तो मैं जा रहा हूं। ठीक है।

18:53

गजमूतनी मन में विचार करने लगी कि यदि ये

18:56

संत

18:58

बिना दान लिए हुए यहां से चला गया तो मुझे

19:02

इसका बहुत बड़ा पाप लगेगा। इसलिए मुझे इसे

19:06

गंगा से निकल कर के स्नान को मध्य में

19:09

छोड़ के गंगा से बाहर निकलना चाहिए और

19:12

इसको दान देना चाहिए। हे श्रोताओं गजमोतनी

19:17

कहने लगी बाबा ठीक है मेरे पास यहां कुछ

19:20

है नहीं लेकिन मेरे गले में नौखा हार पड़ा

19:24

हुआ है। आप ठहरिए मैं निकलती हूं। यदि

19:28

श्रोताओं गजमोतनी गंगा से बाहर नहीं

19:31

निकलती तो जादू नहीं चलता। गजमोतनी को पता

19:35

होता तो जादू नहीं चलता।

19:38

गजमोतनी

19:41

जालिंदर जोगी से कहने लगी बाबा तुम उधर

19:44

छिप जाइए मैं बाहर निकलती हूं क्योंकि

19:48

मेरा कुछ शरीर अर्ध नग्न है। इसलिए मैं

19:52

वस्त्र धारण कर लेती हूं और तुम्हें जो

19:55

दान होगा श्रद्धा अनुसार प्रदान करूंगी।

19:59

तो देखिए श्रोताओं

20:01

अब यह वीडियो यहां से आगे कैसे गजमोतनी की

20:04

चोरी करता है जालिंदर जोगी यह मैं आपको कल

20:08

के वीडियो में सुनाऊंगा। आज का वीडियो ये

20:11

काफी लंबा हो गया है और किस तरीके से

20:14

महाराज नल गजमोतनी को छुड़ा के लाएंगे

20:18

चंदागढ़ से। तो यह आपकी सेवा में मैं कल

20:22

लेकर के उपस्थित हो जाऊंगा श्रोताओं। तब

20:25

तक के लिए यह वीडियो मैं यहीं समाप्त करता

20:27

हूं। इसी के साथ आप सभी श्रोताओं से

20:30

अनुमति लेता हूं। जय हिंद जय भारत।

19.

0:03

इतिहास के पन्नों में यह कहानी साफ-साफ

0:06

लिखी हुई है। आप सभी श्रोताओं का इस चैनल

0:10

पर स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है।

0:13

श्रोताओं जैसा कि आप जानते हैं हमारी

0:16

कहानी चल रही थी नल पुराण इतिहास में से

0:19

और उसके 24 एपिसोड मैं आपकी सेवा में

0:24

प्रसारित कर चुका था और 25वां एपिसोड आपकी

0:28

सेवा में लेकर के उपस्थित हूं। आपका ध्यान

0:31

मैं 24वें एपिसोड से जोड़ता हूं। मैंने

0:34

24वें एपिसोड में बताया था कि जब राजा नल

0:40

महाराज प्रथम समस्त मनसुख गुर्जर का विवाह

0:44

करके नरवरगढ़ में आ जाते हैं तो उसके बाद

0:48

गंगा स्नान करने के लिए जाते हैं क्योंकि

0:51

गंगा स्नान अधूरा रह गया था और उस समय फूल

0:54

सिंह ने महाराज प्रथम को और रानी मंजा को

0:57

कैद कर लिया था। उस स्नान को पूरा करने के

1:01

लिए राजा नल

1:03

स्वयं अपने साथी मनसु गुर्जर को साथ लेकर

1:06

के गंगा स्नान के लिए जाते हैं और गंगा

1:09

स्नान के बाद महाराज प्रथम को रानी मंजा

1:13

को स्नान करा के भेज दिया जाता है नरवरगढ़

1:16

वहां राजा नल मनसुख गुर्जर और गजमोतनी रुक

1:20

जाते हैं। इधर फूल सिंह पंजाबी अपने गुरु

1:25

जोगी जालिंदर के पास जाता है और जालिंदर

1:29

जोगी वहां से चलता है और गजमोतनी जहां

1:33

स्नान कर रही थी गंगा के जिस घाट पर उस

1:38

घाट पर आ जाता है और गजमतनी

1:42

को गंगा से बाहर निकाल लिया है श्रोताओं

1:45

अब यहां से आज का एपिसोड आरंभ हो रहा है।

1:48

रानी गजमोतनी

1:50

जब अर्धनग्न अवस्था में क्योंकि जल में

1:53

स्नान कर रही थी। कुछ वस्त्र उतार के बाहर

1:56

रखे हुए थे। बाहर आई तो जालिंदर जोगी से

2:01

कहने लगी बाबा मैं मेरे वस्त्र धारण कर

2:04

लेती हूं। मेरा स्नान पूर्ण नहीं हुआ।

2:07

परंतु फिर भी मैं आपको दान देना चाहती

2:10

हूं। क्योंकि मैं एक रानी हूं और आपको

2:13

मेरे दरवाजे से आपने मुझसे कुछ मांगा

2:17

इसलिए मैं आपको निराश होकर के नहीं लौटने

2:21

देना चाहती हूं। श्रोताओं

2:24

जब झिलमिला जोगी ने श्रोताओं जब जालिंदर

2:29

जोगी ने यह बात सुनी तो जालिंदर जोगी और

2:33

उसका शिष्य

2:35

मंत्र को अभिमंत्रित करने लगे। श्रोताओं

2:39

जालिंदर जोगी ने मंत्र पढ़ा। सबसे प्रचंड

2:43

मंत्र का उपयोग किया क्योंकि जालिंदर जोगी

2:46

यह जानता था कि गजमोतनी महा जादूगरनी है

2:50

और उसे बस में करना कोई आसान बात नहीं है।

2:53

इसलिए मुझे अपने सबसे प्रचंड और शक्तिशाली

2:57

मंत्र का उपयोग करना होगा। हे श्रोताओं उस

3:01

जालंधर जोगी ने माता कालिका का दिया हुआ

3:05

महामंत्र जो कभी इसका बार खाली नहीं जाता

3:09

अमोग शक्ति थी उस शक्ति का प्रहार गजमोतनी

3:14

पर कर दिया और जैसे ही उस शक्ति का प्रहार

3:17

हुआ तो गजमतनी

3:19

मूर्छित हो जाती है कुछ समय के लिए आपको

3:22

यह भी बताना चाहूंगा कि जालिंदर जोगी

3:25

गजमोतनी का शरीर परिवर्तित नहीं कर सकता

3:28

था

3:29

उसे किसी दूसरे शरीर में जैसे कोई जानवर

3:33

में या कोई पक्षी में तब्दील नहीं कर सकता

3:36

था क्योंकि उसके शरीर के रक्षक जो वीर थे

3:40

उसके साथ रहते थे और जैसे ही गजमोतनी

3:43

मूर्छित अवस्था में आई तो झिलमिला तो

3:47

जालिंदर जोगी ने अपने वीरों का स्मरण किया

3:50

और वीरों से गजमोतनी के शरीर को ऊपर उठा

3:54

लिया और अंतरिक्ष मार्ग से गजमोतनी को

3:58

लेकर के चल चल दिए श्रोताओं

4:01

गजमोतनी चली जा रही है और अपनी चादर को

4:04

बिछा के झिलमिला जोगी या जालिंदर जोगी भी

4:07

बैठ जाता है। उस चादर पर जालिंदर जोगी बैठ

4:11

गया और वो भी पीछे से चला जा रहा है।

4:14

वीरों ने

4:16

कुछ ही पल में समय नहीं लगाया ज्यादा और

4:19

कुछ ही पल में गजमोतनी को चंदागढ़ के किले

4:24

में ले जाकर के कैद कर दिया। श्रोताओं

4:27

गजमोतनी उस किले में कैद हो जाती है। बंदी

4:31

बन जाती है। गजमोतनी को जब होश आया उसकी

4:35

मूर्छा हटी मंत्र का प्रभाव कम हुआ तो

4:38

गजमोतनी ने अपनी आंखें खोली और आंखें

4:41

खोलने के बाद देखने लगी

4:44

और सोचने लगी हे भगवान क्या मैं कोई

4:47

स्वप्न देख रही हूं। मैं तो गंगा में

4:50

स्नान कर रही थी। माता गंगा की जलधारा में

4:56

स्नान कर रही थी। मैं कहां आ गई? याद करने

4:59

लगी गजमोतनी कि मेरे साथ यह क्या हुआ? मैं

5:02

तो किसी के किले में कैद हूं। यह तो किसी

5:05

राजा का कारागार है। मुझे यहां कौन लाया

5:08

और कैसे आया? गजमोतनी ने अपना ध्यान

5:11

लगाया। स्मरण शक्ति वापस प्राप्त करने की

5:15

कोशिश की। तो गजमोत्नी सोचने लगी कि मेरे

5:18

पास एक जोगी आया था। एक ऋषि आया था और

5:22

उसने मुझसे दान मांगा था। और मैं उसे अपना

5:26

नौ लखाहार दान में दे रही थी। लेकिन उसके

5:29

बाद मुझे पता नहीं है कि मेरे साथ क्या

5:31

हुआ। मैं यहां कैसे आई और यह निश्चित ही

5:35

उस जोगी का काम है। हे श्रोताओं

5:39

गजमोतनी उस कमरे में कैद है और उधर सुनिए

5:43

अब जब गजमोतनी को काफी समय हो गया। वापस

5:49

अपने शिविर में नहीं लौटी तो राजा नल

5:52

मनसुख से कहने लगा मनसुख तेरी भाभी को

5:55

बहुत समय हो गया है और वह गंगा स्नान करके

5:58

नहीं लौटी है। मित्र वैसे यहां कोई राजा

6:01

लोग तो है नहीं पर फिर भी कोई ना कोई खतरा

6:04

हो सकता है। गंगा की धारा में बह सकती है।

6:07

गंगा का बहाव कम नहीं है। इसलिए जाकर के

6:11

देखिए।

6:13

जब मनसुख गुर्जर गंगा के घाट पर आया तो

6:17

देखने लगा कि वहां कोई भी स्नान नहीं कर

6:21

रहा था। सोना पड़ा हुआ था घाट।

6:24

यह देखकर के मनसुख वापस चला जाता है तंबू

6:28

में और महाराज नल से कहने लगा मित्र प्रलय

6:32

हो गई। राजा नल कहने लगा क्या हुआ कि कुछ

6:36

कहा नहीं जा सकता कि क्यों कि जिस घाट पर

6:40

भाभी गजमोतनी स्नान कर रही थी। हमारी फौज

6:44

हमारी सेना स्नान करती थी। हम स्नान करते

6:47

थे। उस घाट के कोसों दूर तक कोई भी

6:50

व्यक्ति दिखाई नहीं देता। यह बात जब राजा

6:53

नल ने सुनी तो अपने कुछ सैनिकों को कुछ

6:56

योद्धाओं को साथ लेकर के गंगा के घाट पर

6:58

आया और वहां देखा तो कहीं गजमतनी दिखाई

7:02

नहीं दी। राजा नल बड़े परेशान हुए। बड़े

7:07

विचलित हो गए। मन में सोचने लगे कि हे

7:10

भगवन ये क्या हुआ? चारों तरफ सैनिक दौड़ाए

7:15

लेकिन कई कोसों तक गजमोतनी का पता नहीं

7:18

था। कोई बताने वाला नहीं था कि गजमोतनी

7:21

कहां गई। राजा नल गंगा में खड़े हैं। गंगा

7:26

के जल में खड़े होकर के माता गंगा को याद

7:30

कर रहे हैं कि क्या मेरी पत्नी गजमतनी

7:34

माता गंगा तुझ में समाहित हो गई?

7:37

यदि ऐसा हुआ तो आपने अच्छा नहीं किया।

7:41

क्योंकि गजमोत ने भी नल के ही पूर्वज लेकर

7:45

के आए थे। महाराज भागीरथ

7:48

उसी कुल में इवाकु वंश में ही नल उत्पन्न

7:52

हुए थे। क्या आपने मेरे परिवार को समाप्त

7:57

कर दिया? परंतु माता गंगा का कोई जवाब

8:00

नहीं आया। श्रोताओं राजा नल मन में विचार

8:04

करने लगी कि इस गंगा में ही मेरी पत्नी

8:08

चली गई है और माता गंगा मुझे कुछ बता नहीं

8:11

रही है इसलिए मुझे भी गंगा में डूब कर के

8:16

आत्महत्या करनी चाहिए ये विचार राजा नल के

8:19

मन में आ रहा है श्रोताओं राजा नल गंगा के

8:23

जल में छाती छाती जल में घुस जाते हैं और

8:27

गंगा का ध्यान लगाया तलवार हाथ में लगी

8:30

हुई

8:31

और माता गंगा का स्मरण करके अपने पूर्वज

8:35

भागीरथ का स्मरण करके कहने लगे कि हे

8:37

मातेश्वरी

8:39

यदि मैंने मेरी पत्नी को इस जल में

8:42

प्रभावित किया है तो मुझे भी इस जल में

8:44

प्रवाहित कीजिए

8:47

नहीं तो मैं नरवरगढ़ कैसे जाऊंगा? नरवरगढ़

8:51

जाने में मुझे बहुत बड़ी शर्म आएगी।

8:54

नरवरगढ़ के लोग यह कहेंगे कि गंगा के घाट

8:57

से गजमोतनी को कोई हरण करके ले गया। कोई

9:01

बलपूक गजमतनी को ले गया। राजा नल की तलवार

9:05

जंग खा गई। राजा नल में वो शक्ति नहीं

9:08

रही। इसलिए मैं तेरे इस जल में ही प्राण

9:12

त्याग कर रहा हूं। हे श्रोताओं माता गंगा

9:15

ने जब यह देखा कि भागीरथ का एक वंशज मेरे

9:20

जल में प्राण त्यागने के लिए तैयार है तो

9:23

माता गंगा ने श्वेत वस्त्र धारण किए।

9:26

श्वेत वस्त्र धारण करके जल की धारा पर

9:29

प्रकट हो गई और कहने लगी राजा नल ध्यान से

9:33

सुन

9:35

तेरी पत्नी को मेरी जलधारा में प्रवाहित

9:38

नहीं किया है तो राजा नल ने माता गंगा को

9:42

प्रणाम किया और गंगा से निवेदन करके कहने

9:46

लगा तो मातेश्वरी जब आपने जल में प्रवाहित

9:49

नहीं किया तो फिर कहां गई आपके जल में

9:53

स्नान करने भेजा था मैंने उसे और जब आपके

9:57

सरहदी क्षेत्र में से

9:59

कोई चला जाए, कोई गायब हो जाए या खो जाए

10:02

तो उसकी जिम्मेदारी कौन की होगी? गंगा

10:05

कहने लगी पुत्र मैं सब कुछ देख रही थी।

10:09

तुम्हारे महा दुश्मन फूल सिंह पंजाबी

10:12

जिसको तुमने जीवित छोड़ दिया था। और उसी

10:16

ने अपने गुरु जालिंदरनाथ जोगी को भेजा था।

10:21

वो एक साधु के भष में यहां आया और उसने

10:25

तुम्हारी पत्नी का अपहरण कर लिया है।

10:29

तुम्हारी पत्नी का हरण करके ले गया। जादू

10:32

चला दिया उस पर और जादू से वह मूर्छित हो

10:34

गई और जालिंदर जोगी अपने वीरों की सहायता

10:38

से आकाश मार्ग से ले गया है। तो राजा नल

10:42

कहने लगे मातेश्वरी मुझे यह बताइए जब तुम

10:45

इतना ही बता रही हो कि कहां ले गया है कि

10:48

राजा नल ये मेरी गारंटी नहीं है। यह मैं

10:51

नहीं बता सकती। यह काम तुम्हारा है। हे

10:55

श्रोताओं, अब तो राजा नल गंगा की धार से

10:58

बाहर आ जाते हैं। बाहर आ गए। मनसुख के साथ

11:02

खड़े हुए हैं। और मनसुख और नल अपनी फौज के

11:06

कमांडर से कहने लगे कि हम जब तक तुम्हें

11:11

कोई आदेश ना दे दे तब तक तुम तैयार रहना।

11:14

यदि रणभूमि में स्वयं यमराज भी तुम्हारे

11:17

सामने युद्ध करने आ जाए तो तुम्हें तैयार

11:20

रहना है, सजग रहना है। और मैं और मनसुख और

11:24

लाखा दादा क्योंकि उनके कुल पुरोहित थे,

11:27

ब्राह्मण थे। हम तीनों गजमतनी की खोज में

11:31

जा रहे हैं। हे श्रोताओं राजा नल मंसो

11:36

पूजर और लाखा ब्राह्मण तीनों अपनी-अपनी

11:39

तेगा हाथ में लेकर के गजमोतनी को खोजने के

11:43

लिए चल देते हैं। सेना गंगा के घाट पर

11:46

पड़ी हुई है। पड़ाव डला हुआ है। खोजते

11:50

खोजते नल को मनसुख को और लाखा दादा को सात

11:55

दिवस का समय व्यतीत हो गया। लेकिन गजमोतनी

11:58

का कोई अता पता नहीं लग रहा है। खोज रहे

12:02

हैं और उधर सुनिए श्रोताओं जब चंदागढ़ के

12:06

किले में गजमोतनी कैद हो गई तो जोगी

12:11

जालिंदर नाथ ने अपने शिष्य महाराज फूल

12:15

सिंह को बुलाया और फूल सिंह से कहा कि फूल

12:18

सिंह जिस रानी ने तेरी बेइज्जती की थी

12:21

मंत्र चला करके तेरी सेना को पराजित किया

12:24

था वही रानी मेरी कैद में आज बंदी है। तू

12:27

जो चाहे वो इसके साथ कर सकता है। हे

12:30

श्रोताओं अब तो फूल सिंह मन में प्रसन्न

12:34

हो गया। कहने लगा कि महाराज आपने मेरे साथ

12:39

बहुत अच्छा किया। वाह गुरुदेव आपने मेरी

12:44

मेरा जो कष्ट था उस कष्ट को कम कर दिया।

12:47

मेरा प्रतिशोध पूरा हो गया। गजमोतनी को अब

12:50

मैं किसी भी कीमत पर राजा नल को नहीं दे

12:52

सकता। चाहे मुझे दोबारा युद्ध क्यों ना

12:55

करना पड़े। हे श्रोताओं

12:58

अब तो फूल सिंह पंजाबी अपने गुरु जालिंदर

13:03

नाथ को लेकर के उस कक्ष में जिसमें गजमतनी

13:06

कैद थी उस कक्ष में पहुंच जाता है। चार

13:10

सैनिक साथ में लिए और सैनिकों को आदेश

13:14

दिया कि इसे बंदी बना लिया जाए। जंजीरों

13:16

से जकड़ लिया जाए और बाहर निकाला जाए।

13:20

श्रोताओं

13:21

गजमोतनी को जंजीरों से जकड़ करके बाहर

13:25

निकाल दिया गया। किले में जहां फूल सिंह

13:29

पंजाबी चंदागढ़ के किले में बैठा हुआ था।

13:32

उस सभा में पेश कर दिया गया। गजमोतनी को

13:35

जंजीरों से बंधी हुई है। और रानी गजमोतनी

13:40

से फूल सिंह पंजाबी कहने लगा कि रानी बहुत

13:44

जादूगरनी बनती थी। बड़ा युद्ध किया था।

13:48

बड़ी भीड़ थी। तलवार चलाने में भी निपुण

13:51

थी। अब चला तेरा बल। अब चला तेरा जादू। अब

13:55

चला तेरी तलवार। कहां है वो तेरा पति? अब

13:58

बुला उसे। अब मैं तुझे अपनी पत्नी बना के

14:02

रखूंगा। तो गजमतनी बंधे हुए जंजीरों से एक

14:06

शेरनी की तरह दहाड़ करके

14:09

राजा फूल सिंह से कहने लगी अरे कायर अरे

14:13

नीच अरे दुष्ट राजा तेरा अंत बिल्कुल

14:16

नजदीक है। तुझे बचाने वाला कोई नहीं है।

14:21

मैं जानती हूं कि इस तेरे जो गुरु ने मुझ

14:25

पर जादू चलाया है। उस जादू को मैं नहीं

14:29

तोड़ पाई। तब मेरा यह हाल हुआ। परंतु

14:32

ध्यान रखना कि बहुत जल्दी ही तुम दोनों

14:36

मेरी कैद में होंगे। तुम्हें तुम्हारे

14:39

प्राण बचाने के लिए मुझसे भीख मांगनी

14:42

पड़ेगी। श्रोताओं

14:45

यह बात जब राजा फूल सिंह ने सुनी तो

14:48

क्रोधित हो उठा और कहने लगा गुरुदेव अभी

14:52

इसको उसी कारागृह में बंद कर दो और आदेश

14:56

दे दिया चार सैनिकों को कि इसमें कोड़ों

14:58

की मार लगाई जाए। इसमें 10 कोड़े रोज लगाए

15:01

जाएं और बंदी गृह में बंद रखा जाए। इसको

15:05

जेलियों की तरह इससे बर्ताव किया जाए।

15:08

खाने के लिए इसे सूखी रोटी दी जाए।

15:11

श्रोताओं गजमोतनी उधर यातना भोग रही है।

15:15

जकड़ी पड़ी हुई है अपनी जंजीरों में। और

15:19

इधर खोजते खोजते राजा नल मनसुख और लाखा

15:24

ब्राह्मण चले जा रहे हैं। जब नल की कोई

15:28

पेस नहीं पड़ी तो मार्ग में माता भवानी का

15:32

एक मंदिर मिल गया। और उस मंदिर में राजा

15:37

नल प्रवेश कर जाते हैं। आसन मार के बैठ

15:40

गया और अपनी माता देवी का ध्यान धरने लगा।

15:45

आपको मैं बताना चाहूंगा कि नल जैसा देवी

15:47

का भक्त कोई नहीं हुआ था। चाहे किसी के

15:51

साथ में देवी लड़ी हो लेकिन अंतिम समय में

15:54

उसने नल का साथ दिया था। राजा नल ने जब

15:57

देवी के मंदिर में अपनी देवी मैया का

16:00

स्मरण किया और

16:03

ध्यान धरते धरते तीन दिवस का समय व्यतीत

16:07

हो गया परंतु देवी माता प्रकट नहीं हुई तो

16:10

राजा नल ने अपना तेगा निकाला और तेगा

16:13

निकाल कर के अपनी गर्दन पर चलाने का

16:17

प्रयास किया तो माता देवी प्रकट हो गई

16:20

राजा नल का खड़क पकड़ लिया कहने लगी पुत्र

16:23

बस छोटी सी बात पर ही हिम्मत हार गए वीर

16:28

योद्धा कभी मरते नहीं है कष्टों से घबराते

16:31

नहीं है वो और क्या बात है कैसे बुलवाई

16:35

क्यों याद किया क्या कारण है नल कहने लगा

16:40

सब जानते हुए मातेश्वरी और मुझे ये पूछ

16:42

रही हो कि क्या कारण है तो देवी कहने लगी

16:47

अरे नल तू भूल गया तू मुझसे वायदा कर देता

16:51

है कि मैं तुझ पर भेंट चढ़ाऊंगा तेरी पूजा

16:54

करूंगा तुझ पर पुष्प अर्पित अर्पित करूंगा

16:57

परंतु आज तक तू मुझे कुछ नहीं चढ़ाता है

17:01

तू केवल केवल जब तुझ पर कष्ट आता है तो

17:05

मेरे मंदिर में आकर के मेरा ध्यान धर के

17:08

मरने के लिए बैठ जाता है। परंतु जा मैं

17:13

तुझे बताती हूं कि जो तेरी पत्नी गजमोतनी

17:16

है चंदागढ़ के किले में कैद है। फूल सिंह

17:20

पंजाबी का सख्त पहरा लग रहा है। वो दुर्ग

17:24

कंपिलगढ़ के अधीन है। कंपिलगढ़ के राजा का

17:28

अधिकार क्षेत्र है। उसी के द्वारा निर्मित

17:31

दुर्ग है। और उस दुर्ग में

17:35

फूल सिंह की कैद में तेरी पत्नी बंद है।

17:39

राजा नल कहने लगा कि मातेश्वरी उसे अपहरण

17:42

करने वाला कौन था कि पुत्र यह मत पूछे

17:46

जोगी जालिंदरनाथ

17:48

जो कि 14 विद्या निधान है। तेरी पत्नी

17:51

गजमोतनी के समान ही विद्या में निपुण है।

17:54

उसे जादू से जीत पाना संभव नहीं है। उसी

17:58

ने अपनी जादू की चादर के द्वारा

18:01

तेरी पत्नी का हरण किया। अपने वीरों को ले

18:05

आया। वीरों से गजमूतनी को किले में कैद

18:08

करवा दिया। इसलिए हे नल तुझे मैं एक उपाय

18:13

बताती हूं। तुम तीनों जोगी का रूप धारण

18:16

करो। और चंदागढ़ के किले के बाहर

18:20

दक्षिण दिशा में जोगी जालिंदर नाथ का

18:24

मंदिर है।

18:25

साधु का रूप धारण करो और जोगी जालंधर नाथ

18:29

के शिष्य बन जाओ और उसकी जो विद्या है

18:33

उसका जादू है उस जादू को चुरा लीजिए। उससे

18:37

विद्या सीख लीजिए

18:40

और जब तुम अपनी पत्नी को छुड़ा सकते हो।

18:43

अन्यथा रणभूमि में सीधे युद्ध करके नहीं

18:47

तो तुम भी बकरे या कुत्ते बनके फूल सिंह

18:50

की कैद में होंगे और फूल सिंह आपको जीवित

18:53

नहीं छोड़ेगा। आपके सर को धड़ से अलग कर

18:56

सकता है। हे श्रोताओं माता देवी ने यह कहा

19:00

तो मनसुख लाखा दादा

19:04

तीनों की तीनों कहने लगे कि सेना को आदेश

19:07

दे दिया जाए

19:09

कि आप गंगा के घाट पर ही तीन महीने तक की

19:13

व्यवस्था खानेपीने और रहने की रखें।

19:18

यदि आवश्यकता होगी तो हमें सैनिक कार्रवाई

19:20

करनी पड़ेगी।

19:22

हे श्रोताओं राजा नल

19:25

अपनी सेना को एक आदेश भिजवा देता है लाखा

19:28

ब्राह्मण पे और लाखा ब्राह्मण उस आदेश को

19:31

सेना को सुना करके यथाशीघ्र वापस लौट आते

19:35

हैं और तीनों चल देते हैं। चलते-चलते

19:39

पहुंच जाते हैं चंदागढ़ की सीम में।

19:42

चंदागढ़ में पहुंचने के बाद

19:45

उन्होंने पूछते पूछते

19:49

जो जोगी जालिंदर नाथ था उस जोगी जालिंदर

19:53

नाथ का आश्रम खोजा। आश्रम की भव्यता देखते

19:57

ही बनती थी। जादू का बना हुआ आश्रम था।

20:01

आश्रम में अद्भुत चमत्कारिक शक्तियां थी।

20:06

स्वयं माता काली वहां विराजमान थी। जो

20:09

जोगी जाल जालिंदरनाथ कह देता था माता काली

20:13

से वही करती थी। हे श्रोताओं भैरव 56 कलुआ

20:19

वामन भैरव और 64 जोगिनी उस मंदिर में उसकी

20:23

सुरक्षा व्यवस्था में थी। जोगी जालिंदर

20:26

नाथ बहुत बड़ा सिद्ध था। राजा नल अपने

20:31

ब्राह्मण लाखा ब्राह्मण से कहने लगा कि

20:34

पंडित जी तुम ऐसा कीजिए सबसे पहले मैं

20:38

जाता हूं और मैं देखूंगा इसको और यदि मेरा

20:41

मौका लगा तो मैं इसे समाप्त ही कर दूंगा।

20:45

हे श्रोताओं राजा नल ने जटाजूट धारण किए

20:50

और एक साधु का रूप बना लिया। देखो

20:53

परिस्थिति क्या करवा देती है। जो राजा था

20:56

तेग चलाता था जिसके आदेश में दम थी। अपनी

21:00

पत्नी को छुड़ाने के लिए एक बाबा जी का

21:03

रूप धारण करता है। हाथ में कमंडल ले लिया।

21:07

वक्कल वस्त्र धारण कर लिए जटाजूट और भस्म

21:10

रमाली और अलख निरंजन कहता हुआ पहुंच जाता

21:14

है जालिंदर जोगी के आश्रम में। जालिंदर

21:18

जोगी ने जब जब देखा तो कहने लगा कोई बहुत

21:22

अच्छा साधु है। बड़ा सुंदर साधु है। इसको

21:26

सम्मान सहित अंदर ले आइए। श्रोताओं उसके

21:30

शिष्य राजा नल को सम्मान सहित किले के

21:33

अंदर ले गए। हे श्रोताओं राजा नल को पहचान

21:38

नहीं पाया जोगी जालंधर नाथ क्योंकि देखा

21:42

ही नहीं था नल को। और अब नल उस मंदिर में

21:47

पहुंच गए हैं। उसमें बड़े आराम से रहने लग

21:49

जाते हैं। कुछ समय बाद मंसु गुर्जर भी

21:53

साधु का रूप धारण करता है। और इसी तरीके

21:56

से वो भी उस मंदिर में प्रवेश कर जाता है।

21:59

और कुछ समय बाद लाखा ब्राह्मण भी साधु का

22:02

रूप धारण करके उस मंदिर में प्रवेश कर

22:05

जाते हैं। तीनों अलग-अलग समय पर उस मंदिर

22:08

में प्रवेश कर गए और लाखा

22:12

दादा

22:13

राजा नल और मंसु गुर्जर तीनों अलग-अलग

22:16

कक्षों में अलग-अलग भाषाओं में बातें करने

22:20

लगे। अलग-अलग कक्षों में रहते अलग-अलग देश

22:23

के रहने वाले साधु बन गए। ताकि इस जोगी

22:26

जालिंदर नाथ को कोई भ्रम ना हो जाए। एक

22:30

दिन जोगी जालिंदर नाथ की सेवा कर रहे थे।

22:33

राजा नल और मंसुख गुर्जर। तो मनसुख गुर्जर

22:37

कहने लगा कि बाबा इसको सेवा करने का

22:40

अधिकार नहीं है क्योंकि मैं आपकी अधिक

22:43

सेवा करता हूं। नल कहने लगा बाबा पहले

22:46

आपकी शरण में मैं आया था इसलिए शिष्य बनने

22:48

का अधिकार मुझे है क्योंकि वो जोगी

22:51

जालिंदर नाथ को भ्रम में डालना चाहते थे।

22:54

जोगी जालिंदरनाथ

22:56

उनके माया जाल में फंस जाता है और कहने

23:00

लगा तुम दोनों मेरे शिष्य हैं। कोई बात

23:04

नहीं है। दोनों को शिष्य बना लिया जोगी

23:06

जालिंदर नाथ ने और तीसरे लाखा ब्राह्मण वो

23:10

भी आ जाते हैं। लाखा दादा कहने लगे कि

23:14

बाबा जब इनको शिष्य बना लिया तो मुझे

23:17

क्यों नहीं बनाया? मुझे भी शिष्य बनाइए।

23:20

लाखा ब्राह्मण को भी शिष्य बना लिया। और

23:23

अब तीनों उसके मंदिर में जो जादू का

23:26

पिटारा था उसे खोजते हैं कि कैसे इसका

23:30

जादू का पिटारा मिलेगा। कैसे वो शक्ति

23:33

मिलेगी। श्रोताओं नल और मनसुक तो तेगा

23:36

चलाना जानते थे। परंतु लाखा ब्राह्मण बड़ी

23:40

चालाक थे।

23:42

उनको देवी की जहां प्रतिमा थी, माता काली

23:46

की प्रतिमा थी, वहां उसका जादू का पिटारा

23:49

मिल जाता है। संपूर्ण जादू का पिटारा

23:54

देखा लाखा ब्राह्मण ने तो लाखा ब्राह्मण

23:58

प्रसन्न हो गए और राजा नल से कहने लगे कि

24:02

महाराज हमारा काम बन चुका है। हमें इसका

24:05

जादू मिल चुका है और हम इसका जादू यहां से

24:09

निकाल करके ले जाएंगे। और इससे कुछ जादू

24:13

मैंने सीख लिया है कि यह क्या जानता है और

24:16

तब हमें गजमोतनी के पास प्रवेश करना है।

24:20

हे श्रोताओं

24:22

इस तरीके से वो उस किले में रह रहे हैं।

24:26

कुछ समय और निकल गया धीरे-धीरे।

24:29

एक दिन नल कहने लगे बाबा मुझे इस चंदागढ़

24:34

के दुर्ग में लेकर के चलिए। और मैं इस

24:39

दुर्ग को घूम के देख के आना चाहता हूं। यह

24:42

बात जब

24:44

जोगी ने सुनी तो जोगी कहने लगा बेटे कोई

24:46

बात नहीं है। चलिए मैं आज तुम्हें चंदागढ़

24:49

का दुर्ग दिखाता हूं।

24:51

राजा नल जोगी के भष में बड़ी-बड़ी जटाएं

24:54

भस्मी रमी हुई है। चेहरा

24:58

भस्मी से अलग ही दिखाई दे रहा है। और राजा

25:02

नल को लेकर के

25:04

जोगी जालिंदर नाथ पहुंच जाता है चंदागढ़

25:07

के किले में। जब चंदागढ़ के किले में

25:10

पहुंचा तो फूल सिंह ने जोगी जालिंदर नाथ

25:13

का बड़ा स्वागत किया। बड़ा सम्मान किया।

25:17

इधर

25:20

फूल सिंह कहने लगा बाबा महीने का समय

25:23

व्यतीत हो गया है परंतु गजमोतनी मेरी एक

25:26

बात भी मानना पसंद नहीं करती वो मेरी तरफ

25:29

देखती भी नहीं है कारागृह में बंद है।

25:33

मैंने उसे जंजीरों से जकड़े रखा है।

25:37

जोगी जालिंदर नाथ तुम जाओ और उसे कुछ समझा

25:40

के आओ। हे श्रोताओं देखिए

25:44

राजा नल को साथ में लेकर के जोगी जालंधर

25:47

नाथ उस जेल तक पहुंच जाते हैं जहां

25:50

गजमोतनी कैद है। गजमोतनी को राजा नल ने

25:54

देखा और राजा नल को गजमोतनी ने देखा तो

25:58

गजमोतनी के नेत्रों से आंसुओं की धार बहने

26:01

लगी। राजा नल गजमोतनी से कहने लगा कि केवल

26:06

आज की रात्रि ही तुझे इस जेल में रहने

26:08

दूंगा। कल तो मैं इस झिलमिला जोगी को और

26:12

दुष्ट फूल सिंह को

26:14

इनका सर तुम्हारे चरणों में होगा। दोनों

26:18

के मस्तक धड़ से अलग कर दूंगा।

26:20

देखकर के झिलमिला जोगी या जोगी जालंदर नाथ

26:24

गजमोतनी को समझाता है। परंतु गजमोतनी उसकी

26:28

एक बात भी नहीं मानती है। हे श्रोताओं

26:31

राजा नल को साथ में लेकर के जोगी

26:34

जालिंदरनाथ

26:36

महाराज फूल सिंह से कहने लगे कि राजन एक

26:39

महीने का वक्त और दीजिए। गजमोतनी को

26:42

तुम्हारी पटरानी बनवा दूंगा मैं। मैं आज

26:45

भी उस पर अपना जादू चला के आया हूं। नल

26:48

कहने लगा बेटे आज रात्रि का समय है। कल तो

26:52

मैं तुम्हारे सरों को धड़ से अलग कर दूंगा।

26:55

हे श्रोताओं नल को लेकर के नल उसके साथ

27:00

क्योंकि नल की भी कुछ मजबूरी थी। आ जाता

27:03

है जोगी जालिंदर नाथ के मंदिर में और वहां

27:07

आकर के नल अपने दोनों साथी मनसुख गुर्जर

27:11

और लाखा दादा से मंत्रणा कर रहा है। विचार

27:14

कर रहा है। देखिए श्रोताओं कल के वीडियो

27:18

में मैं आपको बताऊंगा कि राजा नल किस

27:21

तरीके से गजमोतनी को उस दुष्ट की कैद से

27:24

मुक्त कराते हैं और किस तरीके से फूल सिंह

27:27

का अंत करते हैं। अब ये वीडियो मैं यहीं

27:30

समाप्त करता हूं। इसी के साथ जय हिंद जय

20.

इतिहास के पन्नों में यह कहानी साफसाफ

0:06

लिखी हुई है। समस्त श्रोताओं का, भक्तों

0:09

का और सब्सक्राइबर बंधुओं का एक बार फिर

0:13

से स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है।

0:16

श्रोताओं जैसा कि आप जानते हैं हमारी

0:18

कहानी चल रही थी नल पुराण इतिहास में से

0:22

और उसके 25 एपिसोड मैं आपकी सेवा में

0:26

प्रसारित कर चुका था और आज 26वां एपिसोड

0:30

आपकी सेवा में लेकर के उपस्थित हूं। परंतु

0:32

मेरे श्रोताओं की कुछ शिकायतें हैं और मैं

0:36

उनसे उन शिकायतों के लिए क्षमा प्रार्थी

0:39

हूं। क्योंकि श्रोताओं मेरी कुछ समस्याएं

0:43

हैं। मैं आपको बता चुका हूं और उनका

0:45

समाधान अभी होने वाला नहीं है। इसलिए मैं

0:51

आपको प्रतिदिन वीडियो डालने में असमर्थ

0:54

हूं। फिर भी कोशिश करता हूं आपको प्रतिदिन

0:58

वीडियो प्रसारित किया जाए। आपकी सेवा में

1:00

वीडियो डाला जाए। तो आइए श्रोताओं मैं

1:04

आपका ध्यान वापस 25वें एपिसोड से जोड़ता

1:07

हूं। 25वें एपिसोड में मैंने आपको बताया

1:10

था कि राजा नल मनसुख और लाखा ब्राह्मण

1:17

तीनों की तीनों जालिंदर जोगी के यहां उसके

1:19

शिष्य बन जाते हैं और धीरे-धीरे उसके जादू

1:23

को सीखने लगते हैं और उसके जादू के पिटारे

1:26

को ले लेते हैं। श्रोताओं, एक दिन राजा नर

1:31

जालिंदर जोगी के साथ महाराज फूल सिंह के

1:35

चंदागढ़ में प्रवेश कर जाता है। क्योंकि

1:37

वह फूलसिंह के ही आधिपत्य में आता था वो

1:39

दुर्ग। और

1:42

उसमें प्रवेश करके गजमोतनी से जहां जिस

1:46

जेल में कैद थी, उसमें मिल करके आए थे।

1:49

श्रोताओं मिलने के बाद

1:52

राजा नल वापस आ जाते हैं और जहां जालिंदर

1:56

जोगी का आश्रम था उस आश्रम में तीनों

2:00

मंत्रणा करने लगे। नल कहने लगा मित्रों आज

2:03

रात्रि के समय ही मुझे गजमोतनी को उसकी

2:07

कैद से छुड़ाना है। मनसुख कहने लगा

2:10

मित्रों युद्ध विद्या में तो हम पारंगत

2:14

हैं। परंतु जादू में हम कुछ नहीं जानते।

2:17

और यह चंदागढ़ जादू का गढ़ है। फूल सिंह

2:21

पंजाबी हमसे युद्ध में नहीं जीत सकता। हम

2:25

उसका वध कर सकते हैं। परंतु यह जालिंदर

2:28

जोगी है। ये बहुत बड़ा जादूगर है। इसने

2:32

गजमोतनी जैसी जादूगर रानी को अपने कब्जे

2:36

में ले लिया। उसका अपहरण कर लिया। तो नल

2:39

कहने लगा वीर कभी डरते नहीं है। वीरों को

2:43

डरना शोभा भी नहीं देता। मैं आज रात्रि

2:46

में ही मेरी रानी को कैद से मुक्त करा

2:48

लूंगा। हे श्रोताओं राजा नल

2:53

इंतजार कर रहे हैं रात्रि होने का। रात्रि

2:56

के ठीक 12:00 बजे।

2:59

12:00 बजते ही राजा नल ने अपना तेगा

3:02

निकाला। मां भवानी का स्मरण किया।

3:05

और नल

3:07

अपने साथी मनसुख और लाखा ब्राह्मण को सजग

3:11

करने के बाद उनको प्लानिंग के अनुसार पहले

3:13

बता दिया था कि मैं जा रहा हूं। नल चल

3:16

देता है चंदागढ़ के दुर्ग की तरफ। मध्य

3:21

रात्रि का समय है। महा बलवान महा पराक्रमी

3:24

योद्धा अपनी रानी की कैद को छुड़ाने के

3:27

लिए चंदागढ़ के दुर्ग में प्रवेश करने के

3:31

लिए प्रवेश द्वार पर पहुंच जाता है।

3:34

प्रवेश द्वार पर देखा दो पहरेदार लगे हुए

3:37

हैं। राजा नल ने

3:40

भष बदला। भष बदल के जालिंदर जोगी का रूप

3:45

बनाया और जालिंदर जोगी का रूप बना के

3:49

दोनों पहरेदारों से कहने लगा कि मुझे अभी

3:51

इसी समय महाराज फूल सिंह से मिलना है।

3:55

मुझे कुछ अनिष्ट की आशंका हुई और इसलिए

3:57

मैं राजा के पास चला आया हूं। जब ये बात

4:01

पहरेदारों ने सुनी तो सोचा महात्मा है।

4:05

जालिंदर जो भी है हमारे महाराज का गुरु

4:07

है। इसे अंदर जाने दिया जाए।

4:10

श्रोताओं जालिंदर जोगी के वेश में राजा नल

4:13

अंदर चले गए। किले में प्रवेश कर गए और

4:18

कुछ द्वारों तक आगे निकल गए। देखा सामने

4:22

से फूल सिंह पंजाबी आ रहे हैं क्योंकि फूल

4:27

सिंह भी रात्रि में सोता नहीं था। पराजय

4:31

शत्रु को हमेशा नींद नहीं आती।

4:34

पराजय शत्रु तो इस तरीके से तड़फड़ाता

4:38

रहता है कि कब मेरे शत्रु से बदला लिया

4:40

जाए। बदले की आग में जल रहा था। इसलिए वो

4:44

चाहता था कि गजमतनी बहुत जल्दी ही मेरी

4:47

पत्नी बने। हे श्रोताओं जब

4:52

जालिंदर जोगी के भष में महाराज नल ने यह

4:55

देखा तो फूल सिंह पंजाबी के सामने पहुंच

4:59

जाता है। कहने लगा राजन आज रात्रि को मुझे

5:02

एक धार्मिक अनुष्ठान करना है और मुझे

5:05

गजबतनी के कक्ष में अभी प्रवेश करना है।

5:08

फूल सिंह कहने लगे कि गुरुदेव आपकी जैसी

5:11

इच्छा आप जाइए और आवश्यकता पड़े तो मुझे

5:15

भी बुलवा लेना। हे श्रोताओं

5:18

राजा नल संपूर्ण सेना को और राजा फूल सिंह

5:22

को चकमा देकर के प्रवेश कर जाते हैं उस

5:27

जेल के अंदर। जेल में पहुंचने के बाद

5:30

गजमतनी को देखा तो गजमोतनी की जो जंजीरें

5:34

जकड़ी हुई थी उन्हें खोल दिया। खोल के

5:37

गजमोतनी से कहने लगा गजमोतनी अब हमें इस

5:41

दुर्ग से बाहर निकलना होगा। गजमोतनी कहने

5:44

लगी कि देखो तुम साधु के भष में है और इस

5:50

तरीके से मैं तुम्हारे साथ बाहर निकलूूंगी

5:54

तो फूल सिंह हो सकता है हमें अपने दरबार

5:58

में बुला ले तो नल कहने लगा गजमतनी फिर

6:00

दूसरा कोई उपाय नहीं है कि नहीं महाराज

6:03

आपने मेरी कैद को मुक्त कर दिया है और

6:06

मेरे पास 14 विद्या जादू है मैं जादू में

6:11

कम नहीं हूं

6:13

परंतु इस क्षेत्र में यहां की जो नगर की

6:16

देवी है उसका आधिपत्य स्थापित है। वो मेरे

6:21

जादू को चलने नहीं देती। जालिंदर जोगी ने

6:25

अखंड सिद्धियां प्राप्त की हैं। इसलिए वो

6:28

मेरे जादू को काट देता है। परंतु महाराज

6:32

आप जालिंदर जोगी के भष में बाहर आइए और

6:35

मैं यहां से मेरे वीरों की सहायता से

6:37

निकलती हूं। हे श्रोताओं नल और गजमोतनी

6:42

दोनों विचार करके एक दूसरे से आगे पीछे उस

6:46

जेल से उस कैद से कैदखाने से निकल कर के

6:51

भागते हैं। नल और गजमतनी चंदागढ़ के मेड़े

6:56

पर आकर के मिल जाते हैं। और जैसे ही मेड़े

6:59

पर नल और गजमोतनी मिले नल ने अपना राजसी

7:02

बाना धारण किया जोगी का भष उतार के फेंक

7:04

दिया। श्रोताओं जालिंदर जोगी को पता चल

7:08

जाता है। जालिंदर जोगी को पता चला कि मेरे

7:12

साथ धोखा हुआ है। और ये तीनों जो जोगी के

7:15

भष में मेरे यहां विद्या ग्रहण कर रहे थे।

7:19

मेरे शिष्य बने हुए थे। ये कोई और नहीं।

7:22

ये तो स्वयं राजा नल और उसके साथी हैं। हे

7:25

श्रोताओं अब तो जालिंदर जोगी ने क्रोध

7:28

करके मनसुख पर मंत्र का प्रहार किया। और

7:32

मनसुख को वही के वही पत्थर का बना दिया।

7:36

लाखा ब्राह्मण को भी वही पत्थर का बना

7:38

दिया। उसी अपने आश्रम में और दोनों को

7:41

पत्थर का बना करके अपनी मंत्र शक्ति से

7:45

सुसज्जित उस जादुई चादर को निकाला। और

7:48

जादुई चादर पर अपने शिष्य के साथ बैठ जाता

7:53

है। और उस चादर को अंतरिक्ष मार्ग से

7:58

उड़ाया और कुछ ही समय में जहां नल और

8:01

गजमतनी दोनों जा रही थी। भागने की कोशिश

8:05

में थे वहां पहुंच जाता है। यदि श्रोताओं

8:09

नल और गजमोतनी चंदागढ़ की सीएम को पार कर

8:12

जाती तो उसका जादू नहीं चलता। परंतु

8:16

दुर्भाग्यवश गजमोतनी तो चंदागढ़ की सेम को

8:20

पार कर गई परंतु महाराज नल चंदागढ़ की सीम

8:23

को पार नहीं कर पाए और उसके अभिमंत्रित

8:28

मंत्र

8:30

मंत्रों से प्रेरित जो उड़द होते हैं वो

8:32

फेंके और वो राजा नल को जाकर के लगे और

8:35

राजा नल हाथ में तलवार थामे हुए वहीं

8:39

पत्थर के बन जाते हैं। जब नल पत्थर के हो

8:43

गए तो जालिंदर जोगी अब कहने लगा गजमोतनी

8:48

अब मैं तुझे जीवित नहीं छोडूंगा तुझे मेरे

8:50

महाराज की पटरानी बलपूक बनवा दूंगा

8:53

क्योंकि ये मैंने तेरे तीनों साथी

8:55

तुम्हारा पति मनसुख और तुम्हारे कुल

8:58

पुरोहित लाखा ब्राह्मण को मैंने पत्थर का

9:01

बना दिया है। जब गजमोत्नी को यह पता चला

9:04

कि जालिंदर जोगी पीछा कर रहा है। तो

9:07

गजमतनी ने अपने वीरों का स्मरण किया और

9:10

अंतरिक्ष मार्ग से चलने लगी। श्रोताओं

9:15

जालिंदर जोगी ने अपनी जादुई चादर को

9:19

अंतरिक्ष में उड़ाया और दोनों गुरु शिष्य

9:23

पीछा कर रहे हैं गजमोतनी का। आगे-आगे

9:25

गजमतनी चली जा रही है और पीछे-पीछे जोगी

9:28

जालिंदरनाथ चला जा रहा है। हे श्रोताओं

9:33

रानी गजमोतनी ने देखा कि एक रतनगढ़ नामक

9:37

राज्य है और वहां का राजा रतनसेन है। उसकी

9:41

पुत्री रत्नावली बड़ी

9:44

जादूगरनी है। वो भी जादू जानती थी और अपनी

9:48

महल की छत पर केस सुखा रही थी। गजमोतनी ने

9:53

उस रत्नावली को देखा तो एक तोते का रूप

9:57

धारण किया और रत्नावली की गोदी में जाकर

9:59

के बैठ जाती है। कांपते हुए बदन से

10:03

गजमोतनी रत्नावली की गोदी में गिरी।

10:06

रत्नावली ने देखा कि ये तोता

10:10

मादा तोता यानी तोती नहीं कह सकते हैं।

10:12

मैना कहते हैं मादा तोता को कि ये मैना

10:16

मेरी गोदी में कैसे आ गई? यह कहां से आई?

10:20

कौन है तू? रत्नावली कहने लगी जब रत्नावली

10:25

ने इतना पूछा तो गजमतनी अपने वास्तविक रूप

10:28

में आ गई और रत्नावली के हाथ जोड़कर के

10:32

चरणों को पकड़ लिया। रत्नावली बोली बहन तू

10:35

कौन है और किसने तुझे सताया है? ऐसा

10:38

दुशा्वास किसका है जो तुझे परेशान किया

10:41

है? गजमोतनी कहने लगी देखिए बहन मैं

10:47

राजा नल की महारानी गजमोतनी हूं घूमासुर

10:51

दाने की पुत्री हूं बहन मुझे जालिंदर नाथ

10:56

जोगी ने चोर लिया था चुरा लिया था मैं

11:00

उसके चंगुल से मुक्त होकर के छूट के भागी

11:03

हूं परंतु जोगी जालिंदरनाथ आकाश मार्ग से

11:06

जादुई चादर से मेरा पीछा कर रहा है यदि तू

11:10

मेरी सुरक्षा रक्षा कर सके तो मुझे बता

11:13

नहीं तो मैं यहां से यह तेरा दुर्ग छोड़

11:16

के कहीं दूसरी जगह शरण लेती हूं। श्रोताओं

11:21

क्षत्रियों का धर्म होता है कि जो शरण में

11:24

आ जाता है उसे नहीं त्यागते।

11:27

भगवान श्री राम ने भी विभीषण जब शरण में

11:30

आया था तो हनुमान जी से यही कहा था कि जो

11:33

मेरी शरण में आया है चाहे उसने करोड़ों

11:36

अपराध क्यों ना किए हो मैं उसको कभी नहीं

11:39

भगा सकता। तो देखिए श्रोताओं गजमोतनी

11:42

रत्नावली की शरण में आई थी। रत्नावली कहने

11:45

लगी महारानी मैं तुझे वचन देती हूं कि मैं

11:50

तेरी मेरे प्राणों की बाजी लगाकर भी रक्षा

11:53

करूंगी। गजमोतनी कहने लगी देखिए बहन मैं

11:58

तुझे बता रही हूं कि वो जोगी किसी ना किसी

12:01

भेष में आएगा और वो मुझे तुझसे मांगेगा।

12:04

पर तू ध्यान रखना कि मुझे दे मत देना। तो

12:09

रत्नावली कहने लगी कि मैं वायदा करती हूं

12:11

तुझे यह तीन वचन देती हूं कि मैं तुझे

12:14

नहीं दूंगी और यदि तू मुझे दे व्यवस्था बस

12:17

तुझे देना पड़ जाए तो मुझे तू जोर से फेंक

12:21

देना मैं अंतरिक्ष में उड़ जाऊंगी

12:24

तो रत्नावली कहती है ठीक है बहन मैं तेरी

12:27

बात स्वीकार करती हूं और यदि मुझे तुझे

12:31

देना भी पड़ गया तो मैं किसी के हाथ में

12:34

नहीं दूंगी तुझे आकाश में मुक्त कर दूंगी

12:37

हे श्रोताओं

12:39

जोगी जालिंदर नाथ को पता चला कि महाराज

12:42

रतन सिंह की पुत्री ने मेरी जो शत्रु की

12:46

पत्नी है उसे अपने महल में शरण दे दी है

12:50

तो जोगी जालिंदरनाथ

12:52

अलख निरंजन कहता हुआ अपने शिष्य के साथ

12:55

पहुंच जाता है राजा रतन सेन के दरबार में

12:58

और कहने लगा महाराज रतन सेन तुम मुझे

13:01

जानते हैं रतन सेन कहने लगा आइए गुरुदेव

13:05

आपको एक बात और बताना चाहूंगा कि रतन सेन

13:08

भी जालिंदर नाथ जोगी का ही शिष्य था

13:12

और फूल सिंह भी जालिंदर नाथ जोगी का ही

13:15

शिष्य था। इसलिए जोगी जालिंदर नाथ का

13:19

महाराजा रतन सेन ने बड़ा सम्मान किया।

13:22

अपने आसन पर बैठाया और कहने लगा कि

13:25

गुरुदेव आपका आना कैसे हुआ कि राजन

13:29

तुम्हारे महल में मेरा चोर है। और उसे

13:33

मुझे दिलवाइए। राजा कहने लगा बाबा आपका

13:36

चोर और मेरे महल में ऐसा संभव नहीं है कि

13:39

हां बेटे तुम्हारी पुत्री रत्नावली के पास

13:44

मेरे शत्रु की पत्नी गजमोतनी है जो

13:48

घूमासुर दाने की पुत्री है और उसने और

13:51

उसके पति राजा नल ने तुम्हारे गुरु भाई

13:54

महाराज फूल सिंह के कंपिलगढ़ को ध्वस्त कर

13:57

दिया है। फूल सिंह को हरा दिया है। उसकी

14:01

पुत्री

14:03

का विवाह अपने साथ नहीं किया। सरवती को

14:05

अपमानित करके मौत के घाट उतार दिया है।

14:08

उसे बदला ले लेने के लिए मैंने उसका अपहरण

14:11

किया था। और वह भाग करके मुझसे छूट गई

14:15

मेरे चंगुल से और तुम्हारे किले में

14:18

तुम्हारी पुत्री रत्नावली के महल में है।

14:21

राजा कहने लगे ठीक है महाराज। गुरुदेव आप

14:25

चिंता ना करें। मैं अभी मेरी पुत्री को

14:27

बुलाता हूं। भरे हुए दरबार में से महाराज

14:31

रतन सेन ने एक सेवक को रत्नावली के पास

14:35

भेजा कि रत्नावली

14:37

तुझे महाराज ने बुलाया है हे श्रोताओं जब

14:41

सेवक ने रत्नावली से ऐसे कहा तो रानी

14:43

गजमूतनी बोली कि देखिए बहन तेने मुझे वचन

14:48

दिया है क्या तुम अपना वचन निभा पाओगी तो

14:52

वो छतरानी कहने लगी रानी राजकुमारी

14:56

रत्नावली कहने लगी कि हम क्षत्रिय हैं।

14:59

वचन के पक्के हैं। यदि मेरे पिता ने भी

15:02

तुम्हें मांगा तो मैं मेरे गुरु की सौगंध

15:05

खा के कहती हूं तो मैं प्रदान नहीं

15:07

करूंगी। दूंगी नहीं मेरे प्राण दे दूंगी।

15:10

और यदि देना पड़ गया तो तुम्हें मैं

15:12

अंतरिक्ष में छोड़ दूंगी। देखिए श्रोताओं

15:16

रत्नावली अपने पिता के यहां पहुंच जाती

15:18

है। और पिता

15:21

से कहने लगी कहो पिताजी मुझे कैसे

15:24

बुलवाया? कि बेटी तुमने एक स्त्री को

15:29

कबूतरी के वेश में

15:32

मैना के वेश में तुम्हारे महल में रखा हुआ

15:34

है। वो तुम्हारे पास रह रही है। उस मैना

15:38

को ये मेरे गुरु हैं। जब मुझे आवश्यकता

15:41

पड़ती है तो मेरे साथ रणभूमि में जहां मैं

15:44

चाहता हूं वहां मुझे ये सुरक्षा प्रदान

15:47

करते हैं। आज मेरे गुरु का एक काम पड़ा

15:50

है। मुझे उस काम को करना होगा। बेटी

15:54

रत्नावली मैं तुझे आदेश देता हूं कि मुझे

15:58

वो मैना ला के सौंपी जाए।

16:02

तो रत्नावली कहने लगी कि ठीक है पिताजी

16:05

मैं जा रही हूं। हे श्रोताओं रत्नावली

16:09

अपने पिता के आदेश को सुनकर के महल पर आई

16:12

और रानी गजमोतनी से कहने लगी कि देखिए बहन

16:16

मेरे पिता का आदेश है कि मुझे तुमको

16:20

जालिंदरनाथ जोगी को सौंपना है। परंतु मैं

16:23

छत्राणी हूं। मैं तुमसे यह वायदा कर चुकी

16:27

हूं कि मैं तुम्हें कभी भी ना अपने पिता

16:29

को सौपूंगी, ना जोगी जालिंदर नाथ को। मैं

16:32

तुम्हें मुक्त कर देती हूं। तुम जाइए। और

16:37

मैं आमंत्रित करके मेरे पास मां भवानी का

16:40

एक जादुई चक्र है। इस जादुई चक्र को तुम

16:43

पर छोड़ देती हूं तुम्हारी सुरक्षा के

16:46

लिए। जाओ बहन हे श्रोताओं रत्नावली ने

16:50

अपना जादुई चक्र गजमोत्नी के चारों ओर

16:53

अभिमंत्रित करके छोड़ दिया और अंतरिक्ष

16:56

में उड़ा दिया गजबतनी को। इधर जब जोगी

17:00

जालिंदर नाथ को पता चला तो कहने लगा कि

17:03

देखिए राजन तुम्हारी पुत्री ने मेरे साथ

17:05

विश्वासघात किया है। मेरे शत्रु की पत्नी

17:08

को अंतरिक्ष में छोड़ दिया है। परंतु मैं

17:10

इसे ऐसे नहीं छोडूंगा। ये कबूतर का भेष

17:13

धारण करके चल रही है। मैं देखता हूं उसे।

17:15

हे श्रोताओं

17:17

अब तो जालिंदर जोगी बाज का रूप धारण कर

17:21

लेता है। बाज का रूप धारण किया और गजमतनी

17:24

का पीछा किया। गजमतनी चली जा रही है और

17:28

पीछे पीछे जोगी जालिलंदरनाथ चला जा रहा

17:31

है। देखिए श्रोताओं जिसको ईश्वर बचाता है

17:35

उसे कोई मार नहीं सकता। उसे कोई पराजित

17:38

नहीं कर सकता।

17:40

तो गजमोतनी मन में विचार करने लगी कि

17:43

ईश्वर अब मैं इससे कैसे बचूं? तो गजमोतनी

17:48

ने देखा कि मार्ग में कुछ सरसों का ढेर

17:52

लगा हुआ है। सरसों के दाने पड़े हुए हैं।

17:57

गजमोतनी मन में विचार करने लगी कि मुझे

18:00

इसकी नजर चुका करके इस सरसों के ढेर में

18:03

मिल जाना चाहिए।

18:05

श्रोताओं गजमोतनी उस सरसों के ढेर में

18:10

किसी का घर था किसी गांव में उस सरसों के

18:13

ढेर में प्रवेश कर जाती है और जब जोगी

18:17

जालिंदर नाथ ने यह देखा कि गजमोतनी इस

18:20

सरसों के ढेर में प्रवेश कर गई और मुझे

18:23

इसे मारना है तो उसने तुरंत चूहे का रूप

18:26

धारण किया और चूहे का रूप धारण किया और

18:30

अपनी माया से

18:33

लाखों चूहे उत्पन्न कर दिए।

18:35

और उस सरसों को खाने लगे। श्रोताओं मायावी

18:38

चूहे थे। कुछ ही समय में सरसों का ढेर

18:41

समाप्त कर दिया। परंतु गजमोतनी ने देखा

18:44

मौके का फायदा उठाया और बिल्ली का रूप

18:47

धारण किया। बिल्ली का रूप धारण करके बैठ

18:51

जाती है छुप करके और देख रही है कि

18:55

जालिंदर जोगी किस चूहे में है। उसके प्राण

18:59

कौन से चूहे में बसे हुए हैं। यदि मैं एक

19:02

चूहे को मारूंगी तो हो सकता है जोगी

19:05

जालिंदर मुझ पर आक्रमण करें। देख रही है

19:09

जब समस्त ढेर समाप्त हो गया तो जोगी

19:11

जालिंदर नाथ ने जो अपने मायावी चूहे थे

19:14

उनको समाप्त कर लिया और मन में सोचने लगा

19:18

कि गजमोतनी कहां गई? मैंने इसी ढेर में

19:20

उसे प्रवेश करते हुए देखा था। इधरउधर उस

19:24

दाने को देखने लगा जिसमें गजमोतनी के

19:26

प्राण थे। श्रोता वो गजमोतनी तो यह चाह

19:30

रही थी। मौका मिला। मौका मिलते ही जालिंदर

19:34

जोगी पर झपट्टा मारा और उसकी गर्दन धड़ से

19:37

अलग चूहे को मरोड़ दिया और जैसे ही उसको

19:42

मारा तो उसकी डेड बॉडी मृत शरीर जालिंदर

19:46

जोगी में परिवर्तित हो गया। श्रोताओं उसे

19:49

मारने के बाद गजमोतनी अपने वास्तविक रूप

19:52

में आ गई। वास्तविक रूप में आकर के जिस

19:57

स्थान पर मारा था वहां उन गांव वालों को

20:00

एकत्र किया और कहा कि यह महा जादूगर महा

20:03

दुष्ट और नीच आदमी है। इसका दाह संस्कार

20:06

ना करने के बजाय इसकी लाश को कुत्तों को

20:09

फेंक दिया जाए। हे श्रोताओं

20:12

रानी गजमोतनी ने उस नीच जोगी जालिंदर नाथ

20:17

का शरीर कुत्तों के हवाले करवा दिया और

20:22

स्वयं राजा नल को खोजने के लिए चल देती

20:25

है। श्रोताओं चल श्रोताओं गजमोतनी ने जोगी

20:30

जालिंदर नाथ का अंत कर दिया है। और

20:34

गजमोतनी अब महाराज नल को खोजेगी और यह कल

20:39

के वीडियो में मैं आपकी सेवा में लेकर के

20:42

यह वीडियो उपस्थित हो जाऊंगा। श्रोताओं अब

20:45

आप सभी श्रोता बंधुओं से सज्जनों से

20:48

अनुमति चाहता हूं इस वीडियो को समाप्त

20:51

करने की। इसी के साथ यह वीडियो समाप्त

20:54

होता है। जय हिंद जय भारत।

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