Raja Nal ki Sampoorm katha Part 01

 हे महाराज हमारी कोई संतान नहीं है। हमारा वंश अब कैसे आगे चलेगा? महाराज हमें कोई ना कोई उपाय तो ढूंढना ही होगा वरना हमारे सिंहासन की गद्दी खाली रहजाएगी।

देखिए ना महाराज मैं गर्भवती हो गई हूं। अब मैं मेरी संतान के सभी सुख भोगूंगी। 

बहनों यदि मंजा रानी के पुत्र पैदा हो गया तो महाराज हमें रानी का अधिकार कभी नहीं देंगे। हमें षड्यंत्र रचना होगा। 

दोस्तों राजा नल जो इस कथा का नायक है। इस कहानी का मूल नायक है। उस राजा नल का जन्म कहां से हुआ? कैसे हुआ। राजा नल का जन्म। 

दोस्तों, राजा नल से संबंधित लेख महाभारत में भी मिलता है। महाभारत में पांडव वनवास में होते हैं। तो युधिष्ठिर उस समय पांडवों को धैर्य बनाते हुए कहते हैं कि इस धरती पर एक ऐसा राजा भी पैदा हुआ था जिसने 12 वर्ष तक तेली के घर पूजन किया था। खेल कहते हैं जिसे जो पशुओं के लिए चढ़ाई जाती है, खिलाई जाती है। हल्का भोजन किया था। परंतु हम तुम तो अन्न का भोजन कर रहे हैं। केवल 12 वर्ष का वनवास है तो है तो आप धैर्य धारण करें। 

उसी राजा नल की कुछ महत्वपूर्ण कथाएं हैं आपकी सेवा में प्रस्तुत करूंगा। 

 नरवरगढ़ नामक एक राज्य था और उस राज्य पर उस किले पर उस शहर पर एक राजा वीरसेन राज किया करते थे जिन्हें नल पुराण में राजा प्रथम भी कहा गया है। राजा प्रथम वहां राज किया करती थी। राजा प्रथम एक बड़े धर्मात्मा ईश्वर भक्त और बड़े नियम वाले थे। परंतु श्रोताओं समय और ईश्वर यह दोनों बड़े प्रभावी होते हैं। उस महापराक्रमी नरेश के घर 101 रानियां थी और उन रानियों में सबसे बड़ी रानी का नाम था । रानी मंझा और उन समस्त 101 रानियों के भी कोई भी संतान नहीं हुई। राजा के घर में जब कोई पुत्री या पुत्र का जन्म नहीं हुआ तो राजा बड़ी दुखी रहने लगे। राजा दिन प्रतिदिन संतान के बारे में ही सोचते।

राजा की व्यवस्था वृद्धि होने लगी। राजा की अवस्था बढ़ गई और 101 रानी महलों में निवास करती थी। राजा की 101 पत्नियां थी। परंतु छोटाओं दुर्भाग्यवश किसी के गर्भ से भी एक भी संतान की उपत्ति नहीं हुई। अब तो राजा प्रथम जिन्हें युधिष्ठिर भी कह सकते हैं। लेकिन राजा प्रथम भी और नाम है उनका।

राजा प्रथम बड़े चिंतित रहने लगे। समस्तरानियों के ऊपर जो 100 रानियां होती हैं उन्हें पटरानी कहते हैं। तो मंझा पटरानी थी और राजा प्रथम की सबसे प्रिय रानी भी थी कि राजा अजयपाल की पुत्री थी रानी मंझा।

उसके बारे में भी मैं आपको अलग से बता दूंगा जो वीडियो बढ़ने के अर्थ्ता तो रानी मंझा महाराज वीरसेन से कहने लगी कि देखिए प्राणनाथ हमारी और तुम्हारी आयु समाप्त हो चलेगी। परंतु हमारे तुम्हारे कोई संतान की उत्पत्ति नहीं हुई। इस गद्दीको कोई वारिस नहीं मिला। क्या होगा इस गद्दी का? यह गद्दी सुनी जा रही है।

श्रोताओं राजा भी व्यवस्था आखिर क्या कर सकता था? उसी समय ईश्वर की कृपा थी। गुरु गोरखनाथ महंत व श्री संगत गुरु गोरखनाथ नरवरगढ़ पधारी और उन्होंने नरवरगढ़ केजंगलों में आसन की समाधि लगा ली। प्राचीन समय के जो संत होते थे, वह अखंड तपस्या किया करते थे और ध्यान लगाकर के बैठ जाते थे और अखंड समय तक वह ईश्वर का चिंतन करते रहते थे। तो गुरु गोरखनाथ ने नरवरगढ़ के पास ही आकर के नरवरगढ़ के एक बाग में शाही बगीचा था। उसमें जाकर के समाधि लगाकर के ध्यान मग्न अवस्था में बैठ जाते हैं। तपस्या में लीन हो गई। 

जब मंझ रानी को इस बात का पता चला कि नरवरगढ़ में गुरु गोरखनाथ जी आए हुए हैं तो मंझ रानी महाराज वीरसेन से कहने लगी कि हे नाथ कि इस संसार के महान तपस्वी गुरु गोरखनाथ हम पर दया करने के लिए हमारी शाही बाग में ठहरे हुए हैं। शाही बाग में तपस्यारत हैं। मंत हम दोनों चलते हैं और गुरु गोरखनाथ को सेवा करके प्रसन्न करेंगे। तो देखिए श्रोताओ रानी मंझा और राजा प्रथम दोनों चल देते हैं अपने शाही बगीचे में और देखा कि गुरु गोरखनाथ एक वृक्ष के नीचे ध्यान मग्न अवस्था में बैठे हुए हैं। तो मंझ रानी और महाराज प्रथम ने गुरु गोरखनाथ की सेवा करना आरंभ कर दिया। कई वर्ष व्यतीत हो गए।

परंतु गोरखनाथ की समाधि भंग नहीं हुई। सेवा करते-करते ऐसे कहा जाता है तब गुरु गोरखनाथ की समाधि भंग हुई हो। हो सकता है 12 वर्ष ना हो लेकिन जो गाने वाले हैंउनके हिसाब से 12 वर्ष है। अर्थात बहुत समय व्यतीत हो गया। जब बहुत समय व्यतीत हो गया तब गोरखनाथ की समाधि भंग हुई और समाधि भंग हुई तो सामने एक जानू परम सुंदरी और राजा प्रथम को देखा कि रानी मंझा गुरु गोरखनाथ के चरणों में गिर पड़ी और रानी मंझा गोरखनाथ से कहने लगी कि बाबा मेरी उम्र व्यथित हो गई। महाराज की उम्र गई।

महाराज के घर में 101 पत्नियां हैं। 101 रानियां हैं। परंतु कोई भी संतान पैदा नहीं हुई है। अब कृपा करके आप हमें एक संस्थान रूपी रत्न प्रदान करें। तो गुरु गोरखनाथ उनकी सेवा से प्रभावित हो गए और राजा प्रथम से कहने लगे कि राजन मैं तुम पर और तुम्हारी इस रानी पर बड़ा प्रसन्न हूं और मैं तुम्हें पुत्र रत्न प्रदान करता हूं। तभी मंझा रानी कहने लगी नहीं गुरु शेष मेरी 100 बहनें और हैं। 

यदि उनके भी संतान पैदा हो जाए तो भला आशीर्वाद होगा। तो गुरु गोरखनाथ रानी मंझा और राजा प्रथम की बात मान लेते हैं और पढ़ करके अभिमंत्रित करके तेज युक्त 100 101 चावल राजा प्रथम को देते हैं कि राजा प्रथम यह 101 चावल हैं। इनको नियम और व्रत से

प्रातः काल स्नान करके और ईश्वर का ध्यान करके रानियों को खिला देना। आपके घर 101 पुत्रों का जन्म हो जाएगा। परंतु पूरा ध्यान रखना कि यह चावल यदि नहीं खाए तो फिर कोई संतान पैदा नहीं होगी। अब तो राजा प्रथम बड़े प्रसन्न हो गए। राजा प्रथम 101 चावलों को लेकर के आशीर्वाद स्वरूप गुरु गोरखनाथ से लेकर के चल देते हैं औरखुशी-खुशी अपनी रानी मंझा के साथ आ जाते हैं नरवरगढ़। नरवरगढ़ में आ गए। 

राजा की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। राजा मन में विचार कर रहे हैं कि ईश्वर आपने मेरी बहुत अच्छी सुनी। अब तो मेरे महलों में बालिकाओं की किलकारियां सुनने को मिलेंगी।

अब तो मेरा चौथापन सुधर जाएगा। मेरा बुढ़ापा सुधर जाएगा। राजा प्रथम और मंझझ रानी दूसरे दिन समस्त रानियों जो 100 रानियां थी उनको बुलाते हैं और उन्हें स्नान कराकर पाठ पूजा कराने के बाद राजा प्रथम 101 रानियों को भी खिलाकर लेते हैं और सबको एक-एक चावल वितरित कर देती हैं।

अब देखिए श्रोताओं वो 100 रानियां चावलों को हाथ में लेकर के मन में विचार करने लगेंगी कि देखिए ईश्वर की माया होती है।

जो ईश्वर चाहता है वही होता है। मानव के चाहने से कुछ नहीं होता है। बताओ। अब तो वह 100 रानियां मन में विचार करने लगेंगी कि यदि चावल को खाने से कहीं गर्भ रह जाए, कहीं बालक पैदा हो जाए तो फिर यह दुनिया व्यवहार करना बंद कर देगी। इसलिए उन्होंने ऊंची वृद्धि को सोच लिया। देखिए मैं आपको बताना चाहूंगा कि संतान उत्पत्ति के कई तरीके होते हैं। 

आप कुछ लोग यह कहेंगे कि नहीं होते हैं। परंतु दृष्टि द्वारा संताने पैदा होती हैं। जैसे भगवान वेदव्यास ने की थी पांडवों को। के पांडवों के बीच में जो धृष्ट राष्ट्र पांडुभित परती थे और प्राचीन समय में मानस संपत्तिभी पैदा होती थी। शरीर के किसी तेज अवयव वाले भाग से भी संतान की उत्पत्ति हुई देखी गई है। जैसे मकरध्वज के पसीने से हनुमान जी के पसीने से मकरध्वज का जन्म हुआ। पार्वती के शरीर के मैल से भगवान गणेश का जन्म हुआ। ऐसे अनेकों संत पुत्र पैदा इस संसार में हुए हैं। उन्हें बड़े-बड़े नामधारी हैं। वह सभी इसी तरीके से मानस संपत्ति से पैदा हुए हैं। तो ईश्वर की माया थी। 

100 रानियों का दिमाग घूम गया और दिमाग घूम गया तो उन्होंने मनमें विचार किया कि महाराज वृद्ध हुए हैऔर इनकी मति मारी गई है। साथ-साथ इस मंझारानी की मति भी खराब हो गई है। इस 100 का दाब महाराज ने कहा कि इन्हें आप खा जाएं। तो श्रोताओं उन रानियों के हाथ ईश्वर की कृपा से पीछे की तरफ चले गए और छड़ के ऊपर से उन चावलों को फेंक दिया। परंतु पतिव्रता रानी मंझा और जिसने गुरु गोरखनाथ की सेवा की थी। गुरु में बड़ी आस्था थी।

ईश्वर की भक्त थी। उसने उस चावल को खा लिया था। श्रोताओं जो ईश्वर करता है वही होता है। मैं पहले भी कह चुका हूं। देखिए वह तो चावलों को फेंक करके अपने-अपने महलों में चली जाती हैं और मंझ रानी भी उस चावल को खाने के बाद अपने महल में चली जाता है। धीरे-धीरे कुछ समय व्यतीत हुआ और मंझा रानी गर्भवती हो गई। जब मंझा रानी के गर्भ का पता और रानियों को चला उन 100 रानियों को मंझा सहित 101 थी। मंझा पट रानी थी तो अब 100 रानियों के पैरों तले की जमीन खिसक गई। रानियां मन में विचार करने लगी कि हमने उन चावलों को फेंक दिया और इसने खा लिया जो मंझा है। इसने वह चावल खा लिया। अब तो महाराज पहले ही यह पटरानी थी और अब तो हमारी सुनने वाले नहीं हैं।

महाराज हो सकता है हमें मरवा दें। अब तो हमें कोई ना कोई उपाय सोचना पड़ेगा इस मंझा रानी को मरवाने का। 100 रानियां एक साथ बैठ जाती है। आपको यह बताना चाहूंगा कि वह 100 रानियां बहने थी इसलिए तो एक स्थान पर एक साथ रहती थी और मंझा अकेली थी जो राजा अजयपाल से उसकी पुत्री थी रानी मंझा। तो सौ रानी मन में विचार करती हैं कि किस तरीके से इस मंझा को मरवाया जाए। यह विचारकर रही हैं और आपस में विचार विमर्श चल रहा है और उधर मंझ रानी का गर्भ धीरे-धीरे आ रहा है। वृद्धि कर रहा है और उधर उस रानी को मारने का षड्यंत्र रानियों द्वारा किया जा रहा।

 

2.

हे महाराज हमारी कोई संतान नहीं है।

0:05

हमारा वंश अब कैसे आगे चलेगा?

0:08

महाराज हमें कोई ना कोई उपाय तो ढूंढना ही

0:11

होगा वरना हमारे सिंहासन की गद्दी खाली रह

0:14

जाएगी।

0:16

देखिए ना महाराज मैं गर्भवती हो गई हूं।

0:19

अब मैं मेरी संतान के सभी सुख भोगूंगी।

0:24

बहनों यदि मंजा रानी के पुत्र पैदा हो गया

0:27

तो महाराज हमें रानी का अधिकार कभी नहीं

0:29

देंगे। हमें षड्यंत्र रचना होगा।

0:32

नमस्कार दोस्तों आपका इस चैनल पर एक बार

0:35

फिर से स्वागत और अभिनंदन करता हूं।

0:39

श्रोताओं जैसा कि आप जानते हैं हमारी कथा

0:43

चल रही थी नल पुराण इतिहास से। और उसमें

0:47

आपको बताया था कि राजा प्रथम राजा वीरसेन

0:50

और उसके 101 रानियां थी जिनके कोई संतान

0:54

नहीं थी और रानी मंझा गुरु गोरखनाथ की रोज

0:58

सेवा करती थी। गुरु गोरखनाथ की सेवा करती

1:02

तो गोरखनाथ ने 101 चावल रानी मंझा को देते

1:06

हैं और उन चावलों को राजा वीरसेन अपनी

1:09

रानियों में वितरित कर देते हैं जिन्हें

1:11

अन्य रानियां तो नहीं लेती हैं और मंझा

1:14

रानी खा जाता है और मंझा रानी गर्भवती हो

1:18

जाती है। श्रोताओं जब अन्य रानियों को 100

1:21

रानियों को यह पता चला कि मंझा रानी

1:24

गर्भवती है और हमारे कुछ नहीं है तो वह

1:27

100 रानियां मंझा को देखकर जलने लगती है

1:30

और मन में विचार करने लगी कि यदि मंझ रानी

1:33

के पुत्र पैदा हो गया तो महाराज पहले ही

1:36

हमारी इतनी इज्जत नहीं करते और यदि मंझ

1:39

रानी के पुत्र हो जाएगा तो हमारा कुछ लेना

1:42

देना ही नहीं रहेगा हमारी इज्जत नहीं

1:45

रहेगी राजा हमें मरवा सकता है अब तो

1:48

श्रोता ताओं 100 रानियां मन में विचार

1:50

करने लगी कि किसी भी तरीके से इस मंझा

1:53

रानी को मरवाया जाए। इसको यहां से

1:56

निकलवाया जाए ताकि राजा हमें भी उतना ही

1:59

प्रेम करता रहे जितना पहले करता था।

2:02

श्रोताओं यह विचार करके 100 रानियां

2:05

इकट्ठी हो जाती है। एक स्थान पर बैठी हुई

2:08

हैं और मंझ रानी को इसका कोई पता भी नहीं।

2:11

अब देखिए 100 रानियां षड्यंत्र रच रही

2:14

हैं। और तो उन्होंने अपने राजपुरोहित

2:17

जिसका नाम गंगाधर पंडित था पंडित गंगाधर

2:20

को बुलवाया और गंगाधर पंडित के पास

2:23

उन्होंने अपनी एक बांधी को भेजा। तब बांधी

2:26

गंगाधर पंडित के पास पहुंची तो गंगाधर

2:29

कहने लगे कि चलो ठीक है मैं आ रहा हूं।

2:32

महारानियों ने बुलवाया है। तो श्रोताओं

2:35

गंगाधर पंडित अपने पात्रा घड़ा लेकर के चल

2:38

देते हैं राजमहल की तरफ और राजमहल में

2:41

वहां पहुंच गए जहां 100 रानियां एकत्र

2:44

बैठी थी और इंतजार कर रही थी रानी मंझा के

2:47

विरुद्ध। अब तो गंगाधर पंडित को उन्होंने

2:50

आसन दे दिया। आसन पर बैठा दिया। पर गंगाधर

2:53

पंडित से हाथ जोड़कर के दो रानियां कहने

2:56

लगी कि पंडित जी अब आप ही हमारी रक्षा कर

2:59

सकते हैं। तो गंगाधर पंडित बोले कि कहो तो

3:02

क्या बात है तुम कैसे उदास दिखाई दे रही

3:05

हो? तो देखिए श्रोताओं रिस्बत हर जमाने

3:08

में चलती थी। 100 रानियों ने पांच मोहरों

3:10

की थैली जो पांचों मोहरों से भरी हुई थी।

3:13

उस जमाने की मुद्रा थी मुहूर्त। स्वर्ण

3:16

मुद्राएं। पांच थैली स्वर्ण मुद्राओं से

3:18

भरी गंगाधर पंडित के पास रखी और गंगानगर

3:22

पंडित से कहने लगी पंडित जी हम तुम्हें धन

3:25

की कमी नहीं आने देंगे तुम कितना ही धन ले

3:28

जा सकते हो परंतु हे पंडित जी हमारी सबसे

3:31

बड़ी बाधा है मंझ रानी मंझ रानी ने हमारे

3:34

साथ विश्वासघात किया जब महाराज ने चावल

3:37

वितरित किए तो मंझ रानी उस चावल को खा गई

3:41

और हमने उन चावलों को नहीं खाया और मंझ

3:44

रानी अब गर्भवती है यदि मंझ रानी ानी गर्भ

3:47

से कोई पुत्र पैदा हुआ तो पंडित जी महाराज

3:50

प्रथम हमें मरवा देंगे और मंझा पहले ही

3:52

पटरानी है। वह मंझा से अधिक प्रेम करेंगे

3:56

और हमें देश निकाला दे सकते हैं। तो पंडित

3:59

मन में विचार करने लगा कि बस यह तो छोटा

4:01

सा काम है। यह तो मेरे बाएं हाथ का खेल

4:04

है। मैं कल ही मंझा रानी को निकलवा दूंगा।

4:07

यहां से मरवा दूंगा। मंझझा रानी से सभी

4:10

रानियां नापसंद हो जाती है गंगाधर पंडित

4:12

की बात सुन के और गंगाधर पंडित पांच

4:15

थैलियों को लेकर जो स्वर्ण मुद्राएं थी

4:18

उनको लेकर के अपने घर चले जाते हैं। जब घर

4:21

आया तो गंगाधर पंडित ने वह स्वर्ण

4:23

मुद्राएं अपनी जो पंडिता थी उसके हाथ में

4:26

दे दिया। यह बात सुनकर के ब्राह्मणी कहने

4:29

लगी कि पंडित जी मुझे यह बताइए कि तुम

4:32

इतना स्वर्ण कहां से लाए? तो पंडित जी

4:34

कहने लगे कि देखिए पंडिता मुझे मंझ रानी

4:37

को मरवाना है और उसके एवज में 100 रानियों

4:40

ने मुझे यह स्वर्ण मुद्राएं दी हैं। तो

4:43

पंडिता उसे समझाती है कि हे ब्राह्मण तुम

4:46

यह घिनौना कृत करने जा रहे हैं। मंझ रानी

4:49

इस राज्य की महारानी है। इस राज्य की

4:52

पटरानी है और पतिव्रता स्त्री है। तो यह

4:55

गलत काम मत कीजिए। तो ब्राह्मण गंगाधर

4:58

पंडित कहने लगे कि नहीं हुई पंडिता हमें

5:01

यह 500 बॉक्स स्वर्ण मुद्राएं मिली हैं।

5:04

पांच थैलियां स्वर्ण मुद्राएं मिली हैं और

5:06

इन्हें अपने पास बचाने के लिए मुझे यह काम

5:09

तो करना ही होगा। पंडितानी पंडित को

5:12

बार-बार धिक्कारती है श्रोताओं परंतु

5:14

पंडित जी नहीं मानते हैं और कहते हैं

5:17

बिल्कुल मैं मंझ रानी को मरवा दूंगा। अब

5:20

देखिए श्रोताओं होता क्या है कि कल गंगाधर

5:23

पंडित दूसरे दिन महाराज प्रथम के दरबार

5:25

में उपस्थित हो जाता है और चेहरा बना हुआ

5:28

है। पंडित जी के चेहरे से मुस्कान गायब है

5:31

और उतरा हुआ चेहरा और जब महाराज प्रथम ने

5:34

गंगाधर पंडित को आता हुआ देखा तो गंगाधर

5:37

पंडित के चरणों में प्रणाम किया और जब

5:40

चेहरे की तरफ देखा तो महाराज प्रथम के होश

5:43

उड़ गए। महाराज प्रथम के राजपुरोहित थे तो

5:46

गंगाधर पंडित से महाराज प्रथम कहने लगे कि

5:49

यह पंडित जी आज क्या कारण है कि आपके

5:52

चेहरे का तेज समाप्त हो गया। आपका चेहरा

5:55

उतरा हुआ है। आप बड़े दुखी दिखाई देते

5:58

हैं। तो देखिए श्रोताओं गंगाधर पंडित

6:00

महाराज प्रथम से कहने लगे कि महाराज क्या

6:03

बताऊं बड़े दुख की बात है। तो राजा प्रथम

6:06

कहने लगे कि फिक्र होकर कहिए क्या बात है

6:09

पंडित जी कि महाराज मैंने जब यह अपने पत्र

6:12

देखे तो मुझे ज्ञात हुआ कि तुम्हारी इस

6:15

महारानी मंझा गर्भवती है। तो राजा प्रथम

6:18

कहने लगे कि यह तो बड़े सौभाग्य की बात

6:20

है। हमारे अब तक कोई संतान पैदा नहीं हुई

6:23

कि नहीं महाराज इतना ही नहीं है। आप 101

6:27

चावल लाए थे और आपने अपनी 101 रानियों को

6:30

वितरित किए परंतु कोई भी रानी गर्भवती

6:33

नहीं हुई। तुम्हारी मंझा रानी ही गर्भवती

6:36

कैसे हुई? महाराज जानते हैं इसका कारण

6:39

क्या हुआ? तुम्हारी रानी ब्रह्मचारिणी है।

6:42

हे महाराज वह पुष्प के गर्भ से जो संतान

6:45

पैदा होगी वह इस राज्य का विनाश कर देगी।

6:48

ना राजा बचेगा, ना प्रजा बचेगी, ना कोई

6:51

किला बचेगा। इसलिए ही राजन मैं देखकर के

6:54

बड़ा दुखी हूं कि अब मेरे महाराज का अंतिम

6:57

समय नजदीक है। इस राज्य का विनाश होने

7:00

वाला है। हे श्रोताओं अब तो राजा भी बड़े

7:03

परेशान हुए। तो राजा पंडित जी से कहने लगे

7:06

कि हे पंडित जी जैसे भी संभव हो आप मेरे

7:09

प्राण बचाइए। तो गंगाधर पंडित कहने लगा कि

7:12

राजा बस यह छोटी सी बात है। इसका तो एक

7:15

आसान तरीका है। यदि तू बचना चाहता है तो

7:18

इसका एकमात्र एक ही उपाय है। तो राजा बोला

7:22

कहो ब्राह्मण देव वह उपाय मुझे बताइए

7:24

जिससे मेरे राज्य का विनाश मेरे राज्य का

7:27

नाश ना हो। तो गंगाधर महाराज प्रथम से

7:30

कहने लगे कि महाराज आप राजा हैं। यदि आप

7:34

और आपका राज्य सही सलामत रहा। आप जिंद

7:37

रहे, आपकी प्रजा जीवित रही तो आप अनेक

7:40

रानियां ला सकते हैं। इसलिए हे राजन आपको

7:43

मंझा रानी को मरवाना होगा। अब तो श्रोताओं

7:46

राजा भी अपने पुरोहित की बात समझ गए।

7:49

ब्राह्मण देव ने पंडित गंगाधर ने कपट भरी

7:52

चाल चली और उस कपट भरी चाल से राजा प्रथम

7:55

बैठ गए। राजा प्रथम जाल में फंस गए और

7:58

महाराज प्रथम चार जल्लादों को बुलाया।

8:01

चारों जल्लादों को बुलाकर के राजा प्रथम

8:03

कहने लगे कि जल्लादों जाओ मंझझा रानी के

8:06

महल में जाओ और मंझ रानी को खींच लाओ महल

8:10

से बाहर और ले जाओ उसे जंगल में और उसको

8:13

मार दो उसकी आंखें निकाल करके मुझे ले आना

8:16

उसके वस्त्र मुझे ले आया हे श्रोताओं अब

8:19

तो राजा प्रथम का आदेश सुनकर के जल्लाद चल

8:22

देते हैं जल्लादों का जो प्रमुख था

8:25

चिंतामणि नामक जल्लाद कहने लगा कि महाराज

8:28

तुम क्या कर रहे हो एक बार और सोच सोच

8:31

लीजिए मंझ रानी इस राज्य की महारानी इस

8:34

राज्य की पटरानी है। आप कितना गलत काम

8:36

करने जा रहे हो और कोई भी बात नहीं है

8:39

महाराज पतिव्रता रानी है। परंतु राजा का

8:42

आदेश राजा ने जल्लाद से कहा कि जल्लादों

8:46

जाओ और जो मैं कह रहा हूं उस आदेश का पालन

8:49

करो। अब तो राजा का आदेश सुनकर के चारों

8:52

जल्लाद मंझा के महल की तरफ चल देते हैं और

8:55

मंझा को नीचे से आवाज लगाई। मंझ रानी अपने

8:58

महल में सो रही थी। मंझ रानी ने जाना कि

9:01

महाराज ने मुझे बुलवाया है। जब मंझ रानी

9:04

महल से बाहर निकल कर आई तो देखा कि

9:07

इधर-उधर को 100 रानियां भी देख रही हैं और

9:10

जल्लादों ने मंझ रानी को जंजीरों में जकड़

9:13

लिया। मंझ रानी जंजीरों में बांध ली गई।

9:16

मंझा पूछ रही है कि मेरा दोष क्या है?

9:19

परंतु कोई दोष बताने वाला नहीं है।

9:21

क्योंकि महाराज को तो गंगाधर पंडित ने 100

9:24

रानियों से धन लेकर के बहका दिया था। अपने

9:27

जाल में फंसा लिया था। हे श्रोताओं अब तो

9:30

मंझ रानी को बांधकर के जल्लाद लेकर के

9:33

चलते हैं। जब महाराज प्रथम की राज्यसभा के

9:36

आगे से मंझ रानी निकली तो महाराज प्रथम ने

9:39

मंझ रानी को प्रणाम किया। परंतु महाराज

9:42

प्रथम ने अपना मुंह बगल को फेर लिया कि

9:44

मैं ऐसी दुष्ट रानी का दर्शन करना नहीं

9:47

चाहता कि मैं नहीं देखना चाहता ऐसी रानी

9:50

का मुंह। ले जाइए इसे और जंगल में जाकर के

9:53

मार दीजिए। फिर श्रोताओं अब तो मंझ रानी

9:56

को जल्लाद लेकर के चल देते हैं। मंझ रानी

9:59

को नरवरगढ़ की सीमा से बाहर निकाल दिया

10:01

गया तो अपने जल्लादों से कहने लगी कि

10:04

जल्लादों ठहरो मैं स्त्री हूं और तुमसे

10:07

भाग नहीं सकती। परंतु मुझे मेरे इस केक

10:10

मेरे इस बस्ती को प्रणाम तो करने दीजिए।

10:12

फिर श्रोताओं मंझ रानी ने अपनी बस्ती को

10:15

प्रणाम किया और जल्लाद मंझ रानी को ले गए

10:18

विकट वन में बियाबान जंगल में ले गए मंझ

10:21

रानी को श्रोताओं मंझ रानी उन जल्लादों से

10:24

कहने लगी कि जल्लादों ठहरो मुझे छोड़ोगे

10:28

नहीं मैं जानती हूं परंतु आप ऐसा कीजिए

10:31

मुझे अब यहीं रोक दीजिए या ज्यादा मत आगे

10:33

चलाइए क्योंकि मेरे पैरों में छाले पड़ गए

10:36

हैं। मैं आगे नहीं चल सकती। मुझे यहीं

10:39

समाप्त कर दीजिए कि अब जल्लाद चिंतामणि मन

10:42

में विचार करने लगा कि हमने इस रानी का

10:45

अन्न खाया है। यह महारानी है। इस राज्य की

10:48

जनता इस राज्य की प्रजा इस रानी को बहुत

10:51

चाहती है। इस रानी का अंत कैसे किया जाए?

10:54

हे भगवान मुझे कोई ऐसी शक्ति प्रदान करो

10:57

जिससे इस रानी का बचाव हो जाए। चिंतामण

11:00

जल्लाद रानी से कहने लगा कि महारानी तुम

11:03

इस हस के वृक्ष की ओठ में जाकर अपने

11:06

वस्त्र उतार लीजिए और अपने वस्त्रों को

11:08

उतार करके हमें दे दीजिए और हम आपको मारना

11:11

नहीं चाहते। आपको हस के वृक्ष में नग्न

11:14

अवस्था में रह सकती हो। रानी कहने लगी कि

11:17

नहीं जल्लादो महाराज ने तुम्हें आदेश दिया

11:20

है तो तुम मुझे मारो। परंतु चिंतामणि

11:22

जल्लाद का हाथ रानी के ऊपर नहीं उठ सकता

11:24

था कि चिंतामणि जल्लाद अपना तेगा उठाता है

11:27

और तेगा नीचे ही गिर जाता है और वह तेगा

11:30

नीचे ही गिर जाता है। श्रोताओं ईश्वर की

11:33

माया बलवान थी। रानी उस वृक्ष की आड़ में

11:36

गई और वहां उन्होंने अपने वस्त्र उतारकर

11:38

जल्लादों को फेंके और वह वृक्ष बहुत विशाल

11:41

क्षेत्र में होकर के बढ़ गया। यह मानकर

11:43

चलिए एक भीघा जमीन में होकर के वृक्ष ने

11:46

अपना फैलाव कर लिया। बहुत बड़ा वृक्ष हो

11:48

गया। चारों तरफ फैल गया। जल्लाद कहने लगे

11:51

कि माता तुम राजमाता हो और हम इन वस्त्रों

11:54

को लेकर जा रहे हैं और किसी मृग को मार

11:57

करके उसके लिए आंख ले जाएंगे। हे श्रोताओं

12:00

रानी मंजा तो नग्न अवस्था में उस हस के

12:02

वृक्ष में रह जाती है और उधर वह जल्लाद

12:05

रानी के वस्त्र लेकर के और एक मृग मारते

12:08

हैं। उस मृग के खून से वस्त्रों को रंग

12:10

लेते हैं और उस मृग के नेत्रों को निकाल

12:12

कर के महाराज प्रथम के दरबार में पहुंच

12:15

जाते हैं और महाराज प्रथम से कहा कि लो

12:17

महाराज यह मंजा रानी के लिए नेत्र हैं और

12:20

यह मंजा रानी के पास पत्र हैं। तो महाराज

12:23

ने नेत्रों को छोड़ दिया और वस्त्रों को

12:25

फिकवा दिया है। श्रोताओं अब तो 100

12:27

रानियां बड़ी प्रसन्न रुत कि चलो हमारा

12:29

कांटा निकल गया निकल गया हमारा कांटा अब

12:32

हमें कोई भी चिंता नहीं है अब वह 100

12:35

रानियां बड़े आराम से बड़ी प्रसन्न हो रही

12:37

हैं गंगाधर पंडित भी बड़े प्रसन्न है और

12:40

चिंतामणि भी मन में विचार कर रहा है और

12:42

चिंतामणि जल्लाद भी मन में विचार कर रहा

12:45

है कि हे भगवन आपने बहुत अच्छा सुनिए

12:48

हमारी बात सुन ली कि मंज रानी जीवित बच गई

12:51

परंतु वह कैसे प्राण बचाएगी वह इस हस के

12:53

वृक्ष में है कि वह उसे कुंज गलीजी जी

12:56

छोड़ेगा नहीं उसे अवश्य मार देगा और वह

12:58

गर्भवती भी है। हे श्रोताओं इधर मंज रानी

13:02

उस वृक्ष में विचार कर रही है। ईश्वर का

13:04

ध्यान कर रही है कि हे भगवान अब मेरा क्या

13:07

होगा? सुनसान जंगल है। बियाबान जंगल है और

13:11

उस ही के वृक्ष में मंज रानी बैठी हुई है।

13:14

नग्नवस्था में उस वृक्ष से बाहर भी नहीं आ

13:16

सकती। और मंज रानी का जो गर्भ का समय था

13:19

आठ माह का समय पूरा हो गया मंज रानी का और

13:22

गर्भ नौवें मास में लग जाता है। मंज रानी

13:25

उस वृक्ष में पत्ता खाती है। हीस की जंगल

13:28

से पत्तियां आ जाती हैं और अपना भोजन बना

13:30

लेती हैं। उनका श्रोताओं उस ही के वृक्ष

13:33

में मंज रानी अपना निवास कर रही है।

13:35

हीरोताओं जिसको कोई मारना चाहता है और यदि

13:38

उसे ईश्वर पालतू तो उसे कोई नहीं मार

13:41

सकता। इस संसार में कोई ऐसी शक्ति नहीं है

13:44

जिसको राखे साइयां मार ना सके कोई। बाल ना

13:47

बांका कर सके चाहे जग वैरी क्यों ना हो

13:50

अर्थात जिसे ईश्वर जीवित रखना चाहता है

13:53

उसे संसार में और कोई नहीं मार सकता चाहे

13:55

संपूर्ण संसार उसका दुश्मन क्यों ना हो

13:58

मंज रानी ही इसके वृक्ष में अपना समय

14:00

गुजार रही है श्रोताओं अब देखिए श्रोताओं

14:02

मंज रानी उस पिच के वृक्ष में रह रही है

14:05

दोस्तों अब आगे का वीडियो हम कल बताएंगे

14:08

यदि वीडियो पसंद आई हो तो वीडियो को लाइक

14:10

करो और चैनल को सब्सक्राइब करें इसी के

14:13

साथ जय हिंद जय आ रहा था।

 

3.

हमारी कथा नल पुराण के इतिहास से निरंतर

0:02

चल रही है। अब तक इसके दो एपिसोड आपकी

0:05

सेवा में प्रसारित किए जा चुके हैं। पिछले

0:07

एपिसोड में आपने सुना कि नरवरगढ़ के नरेश

0:09

महाराज प्रथम राजा वीर सिंह ने रानी मंझा

0:12

को वनवास दे दिया और उन्हें मृत्युदंड

0:14

देने के लिए जल्लादों के मुखिया चिंतामण

0:17

जल्लाद को सौंप दिया। परंतु विधि का विधान

0:20

कुछ और ही था। चिंतामणि जल्लाद ने रानी

0:22

मंझा को मारने के बजाय उन्हें एक निर्जन

0:25

वन में हीस नामक वृक्ष पर जीवित छोड़

0:27

दिया। राजा को विश्वास दिलाने के लिए उसने

0:30

एक मृग का वध किया। उसकी आंखें निकाल ली

0:32

और रानी के वस्त्रों को रक्त से रंग कर

0:35

महाराज प्रथम के समक्ष प्रस्तुत कर दिया।

0:37

यह देखकर महाराज ने समझ लिया कि रानी मंझा

0:40

का अंत हो चुका है। उन्होंने उन नेत्रों

0:42

को पैरों से कुचल दिया और वस्त्रों को

0:44

फिकवा दिया। इधर वन में रानी मंझा अत्यंत

0:48

दयनीय स्थिति में अपना जीवन व्यतीत कर रही

0:50

थी। वे नग्न अवस्था में उसी हस के वृक्ष

0:53

पर रहती थी। भोजन के नाम पर केवल पत्तियां

0:56

खाती। पत्तियों पर सोती, पत्तियों को

0:58

ओढ़ती और बिछाती। जो रानी कभी महलों में

1:01

लहती थी, जिनके लिए 36 प्रकार के व्यंजन

1:04

बनते थे। आज वही रानी पत्तों पर जीवन

1:06

बिताने को विवश थी। यह समय का कठोर प्रहार

1:09

था। धीरे-धीरे समय बीतता गया। रानी मंझा

1:12

का शरीर दुर्बल हो गया। परंतु धैर्य बना

1:15

रहा। तभी वह शुभ घड़ी आ गई। जब एक महान

1:18

वीर का जन्म होना था। 14 कलाओं से युक्त

1:21

चार कलाओं के अवतारी पुरुष राजा नल के

1:23

जन्म का समय आ पहुंचा। प्रसव की घड़ी निकट

1:26

आने पर रानी मंझा अत्यंत चिंतित हो गई। वन

1:29

में ना कोई दवा थी ना कोई सहायक। वे मन ही

1:32

मन माता देवी का स्मरण करने लगी। हे

1:34

मातेश्वरी इस घोर संकट में मेरी रक्षा

1:37

कीजिए। जिसे ईश्वर बचाते हैं उसका कोई कुछ

1:40

नहीं बिगाड़ सकता। माता देवी ने अपनी भक्त

1:43

की पुकार सुन ली। उन्होंने एक वृद्धा का

1:45

रूप धारण किया और रानी मंझा के पास

1:47

पहुंची। वृद्धा ने उनके सिर पर हाथ रखकर

1:50

कहा, डरो मत बेटी। मैं यहीं वन में रहती

1:52

हूं। तुम्हारे प्रसव में मैं सहायता

1:54

करूंगी। स्वयं देवी माता ने रानी मंझा का

1:57

सुरक्षित प्रसव कराया। यह एक अद्भुत घटना

2:00

थी कि शिशु की नाल गर्भ में ही कटी हुई

2:02

थी। इसी कारण उस बालक का नाम नल रखा गया।

2:06

प्रसव के पश्चात देवी माता ने रानी को

2:08

स्नान कराया और कहा जब भी आवश्यकता हो मैं

2:11

यहीं वन में उपस्थित रहूंगी। यह कहकर वे

2:14

अंतर्ध्य हो गई। उधर नरवरगढ़ के किले पर

2:17

एक तोप रखी थी जो केवल राजवंश में बालक के

2:20

जन्म पर चलाई जाती थी। जैसे ही राजा नल का

2:23

जन्म हुआ वह तोप अपने आप चल पड़ी। नगरवासी

2:26

आश्चर्य में पड़ गए क्योंकि राजमहल में तो

2:28

किसी संतान का जन्म नहीं हुआ था।

2:30

विद्वानों ने आकाश की ओर देखा पर कोई कारण

2:33

ना समझ सका। इधर रानी मंझा एक नई चिंता

2:36

में पड़ गई। उनके स्तनों में दूध नहीं उतर

2:39

रहा था और नवजात राजा नल भूख से रो रहा

2:41

था। उसी ही के वृक्ष के पास एक शेरनी रहती

2:45

थी जिसने ठीक उसी समय एक शावक को जन्म

2:47

दिया था। उसका शावक दूध पीकर खेल रहा था।

2:50

शेरनी ने रानी मंझा की पीड़ा को देखा और

2:53

कहा डरो मत बहन मैं तुम्हारी सहायता

2:56

करूंगी। उसने राजा नल को अपनी गोद में

2:58

लेकर दूध पिलाना प्रारंभ किया। कई दिनों

3:01

तक शेरनी ने राजा नल को अपना दूध पिलाया।

3:04

दूध पिलाने के पश्चात शेरनी ने राजा नल के

3:06

सिर पर पंजा रखकर आशीर्वाद दिया कि जिस

3:09

बालक ने मेरा दूध पिया है, वह अत्यंत

3:11

पराक्रमी होगा। देवता और दानव भी युद्ध

3:14

भूमि में उसका सामना नहीं कर सकेंगे। कुछ

3:17

समय पश्चात वन से बाहर नरवरगढ़ से 20 कोस

3:20

दूर दक्षिणपुर नामक नगर में लक्ष्मी सेठ

3:23

नामक एक धनी व्यापारी रहते थे। उनके दो

3:26

पुत्र पूर्णचंद्र और पन्नालाल विदेश

3:28

व्यापार से लौटे थे। एक दिन लक्ष्मी सेठ

3:31

का रथ अनायास ही उसी वन की ओर मुड़ गया और

3:34

हीस के वृक्ष के पास आकर रुक गया। राजा नल

3:36

के रोने की आवाज सुनकर लक्ष्मी सेठ ने

3:39

रानी मंझा से संपूर्ण कथा जान ली।

3:41

उन्होंने कहा बेटी मैं तुम्हें धर्म की

3:44

पुत्री बनाकर अपने घर ले चलूंगा। रानी

3:46

मंझा ने अपनी नग्न अवस्था की बात कही। तब

3:49

लक्ष्मी सेठ ने अपनी धोती देकर उन्हें

3:51

वस्त्र पहनाए। शेरनी ने भी रानी को समझाया

3:54

कि मानव समाज में जाकर अपने पुत्र का पालन

3:56

पोषण करना उचित होगा। राजा नल के साथ वह

3:59

सिंह शावक भी जाने को तैयार हुआ जो उसके

4:02

साथ जन्मा था। लक्ष्मी सेठ रानी मंझा को

4:05

अपने नगर ले आए। उनकी पत्नी ने जब सच्चाई

4:07

जानी कि यह उनकी धर्मपुत्री है तो वह

4:10

प्रसन्न हुई। रानी मंझा और राजा नल सुख

4:13

पूर्वक रहने लगे। कुछ समय बाद राजा नल का

4:16

जन्मोत्सव और जनेऊ संस्कार रखा गया। इस

4:18

अवसर पर महाराज प्रथम राजा वीर सिंह को भी

4:21

आमंत्रित किया गया। महाराज ने बालक को

4:24

देखा तो उनका मन विचलित हो उठा। उन्हें

4:26

बालक का मुख रानी मंझा से मिलताजुलता

4:28

प्रतीत हुआ। परंतु वे बिना कुछ कहे लौट

4:31

आए। इधर राजा नल धीरे-धीरे बड़ा होने लगा।

4:34

सिंह शावक के साथ खेलता कूदता रहा।

4:37

श्रोताओं यहीं इस एपिसोड का समापन होता

4:39

है। अगला भाग आगामी वीडियो में प्रस्तुत

4:41

किया जाएगा। तब तक के लिए जय हिंद जय

5.

हे महाराज प्रथम देखिए ना हम आपके लिए

0:03

इतना अच्छा आभूषण प्रस्तुत करेंगे जिसे

0:05

देखने से आप हमें इनाम देंगे।

0:08

हे महाराज प्रथम देखिए ना हम आपके लिए

0:11

कितनी अच्छी वस्तुए

0:12

हे बनियों यदि छ महीने के अंदर तुम एक

0:15

मोचरी और एक गोट नहीं ला सके तो तुम्हें

0:18

फांसी की सजा होगी।

0:20

हे मामा आप इतने चिंतित दिखाई क्यों दे

0:23

रहे हैं? मुझे बताइए। मैं आपकी समस्या का

0:26

हल अवश्य ढूंढ लूंगा। हे मेरी माता मुझे

0:30

हमारे परिवार को फांसी से बचाने के लिए

0:31

मेरे मामाओं के साथ जंगल

0:33

भयानक जंगल जाना होगा।

0:34

नमस्कार दोस्तों इस वीडियो में आपका एक

0:36

बार फिर से स्वागत और अभिनंदन है। यदि आप

0:38

चैनल पर नए हैं तो वीडियो को लाइक एवं

0:41

सब्सक्राइब जरूर कीजिए। तो आइए दोस्तों

0:43

वीडियो शुरू करते हैं। मैंने तीसरे एपिसोड

0:46

में बताया था कि राजा नल और उसकी माता मंज

0:49

रानी को दशरथपुर का एक लक्ष्य सेठ अपने

0:52

यहां ले जाता है। और जब राजा नल का

0:54

उद्घाटन किया जन्मोत्सव मनाया तो उस उत्सव

0:57

में नरवरगढ़ नरेश महाराज प्रथम को भी

1:00

आमंत्रित किया गया और महाराज प्रथम उसने

1:02

मनुष्यों समारोह में भाग लेने के बाद

1:05

पछताते हुए सोचते हुए अपनी राजधानी

1:07

नरवरगढ़ लौट जाते हैं। इधर राजा नल अपने

1:10

साथ के बच्चों में खेल रहा है। दक्षिण

1:12

पूर्व में और धीरे-धीरे बड़ा हो रहा है।

1:15

अब देखिए श्रोताओं राजा नल तो एक क्षत्रिय

1:17

का बेटा था और वह बनिए के लड़कों के साथ

1:19

खेल रहा था। सेठों के लड़कों के साथ खेल

1:22

रहा था। तो बनिए के लड़के तो बनाते थे

1:24

तराजू बाट। 100 ग्राम 200 ग्राम की जो बाट

1:27

होते हैं 1 किलो बाट। यह ऐसा खेल खेलते

1:30

थे। जबकि राजा नल धनुष बाण बनाता था। धनुर

1:33

विद्या सीखता था। तलवारबाजी सीखता था। और

1:36

जो क्षत्रियों के धर्म होते हैं घुड़सवारी

1:38

सीखता था। ऐसे खेल खेल रहा था। कभी किले

1:41

बनाता। इस तरीके से राजा नल सबसे अलग खेल

1:44

खेलता था। अब देखिए श्रोताओं धीरे-धीरे कई

1:48

वर्ष व्यतीत हो गई और राजा नल 13 साल का

1:50

योद्धा हो जाता है। अब उसके दो मामा जो

1:53

लक्ष्मी सेठ था उसके दो पुत्र थे। सेठ

1:55

फूलचंद और पन्नालाल दोनों विदेशों में

1:58

व्यापार किया करते थे। एक दिन की बात है

2:01

कि फूलचंद और पन्नालाल दोनों व्यापार के

2:03

लिए चले जाते हैं। जब वह दूसरे देश में

2:05

पहुंचे तो उससे पहले उन्हें एक वन मिल

2:07

गया। एक जंगल मिल गया। समुद्री क्षेत्र थे

2:10

तो वहां दलदली महावन बहुतायत में मिलते

2:12

थे। उस वन में एक दानव रहता था जिसका नाम

2:15

था घुमासुर और उस घुमासुर दानव का किला उस

2:18

वन में बना हुआ था। उस घुमासुर दानव की एक

2:21

परम सुंदरी जो देव अप्सराओं को भी लजाती

2:23

थी। ऐसी एक सुंदर कन्या जिसका नाम था

2:26

गजमोतिनी। बड़ी सुंदर थी। रूप बाल और

2:29

विवाह के योग्य 15-16 साल की युवती। अब

2:32

वही घुमासुर दानव की पुत्री उसी समुद्र पर

2:34

स्नान करने के लिए आ जाती है। अब देखिए

2:37

श्रोताओं उधर बनियों का जहाज चला जा रहा

2:39

है। पन्नालाल और फूलचंद अपना जहाज जिसमें

2:42

सामान भरा हुआ है और उधर ही वह चले जा रहे

2:45

हैं और उस समुद्र के तटीय क्षेत्र पर

2:47

घुमासुर दानव की लड़की सूर्य स्नान करने

2:50

के लिए आती है और उस क्षेत्र में कोई नहीं

2:52

रहता था। उस लड़की ने अपने वस्त्रों को

2:54

उतार करके पार पर रख दिए। वह लड़की चौसर

2:57

का खेल भी खेलती थी जिसकी 16 गोटियां होती

2:59

हैं। उन गोटियों को साथ लेकर चलती थी।

3:02

जहां जाती थी वह साथ ले जाती थी। तो वह

3:04

गोटियां भी साथ लाई थी और उसी तट पर नग्न

3:07

होकर के स्नान कर रही थी। और उधर जब

3:09

बनियों का जहाज आया उस तट की तरफ जहां वह

3:11

गजमती स्नान कर रही थी तो लड़की ने देखा

3:14

कि इधर कोई आ रहा है। कोई व्यक्ति चला आ

3:16

रहा है। कोई मनुष्य चला आ रहा है। तो

3:18

लड़की जल्दी से उस पानी से निकली और निकल

3:20

कर के अपने वस्त्र उठाए। कुछ पहने

3:22

आधे-अधूरे और जल्दबाजी में उसकी एक गोट और

3:25

एक मोचरी मोचरी होती है कि पैर में पहनी

3:27

जाती है। एक मोचरी वहां रह जाती है और एक

3:30

गोट रह जाती है और वह जंगल से भाग जाती

3:33

है। चली जाती है लड़की अपने महल को और

3:35

अपने महल में जाकर के लड़की तो आराम से सो

3:37

जाती है। उसे ध्यान भी नहीं रहता है कि

3:39

उसकी गोट कहीं खो गई है। इधर बनिए आए तो

3:42

आपस में दोनों भाई बात करने लगे कि भाई

3:44

अभी परम सुंदरी लड़की स्नान कर रही थी।

3:47

लड़की बड़ी सुंदर थी। न जाने कहां चली गई

3:49

है। उन्होंने जहाज का लंगर डाल दिया। जहाज

3:52

को खड़ा कर दिया और वह तट पर उतरे तो देखा

3:55

तो वहां एक बड़ी सुंदर मोचरी पड़ी हुई है

3:57

जिसको पहना जाता है। पैर में पहनते हैं और

3:59

एक गोटी पड़ी हुई है जो स्वर्ण से जड़ित

4:01

है। सोने से जड़ी हुई है। बनिए ने उस

4:04

मोचरी को और उस गोट को उठा लिया और मन में

4:06

विचार करने लगे कि कितनी सुंदर गोट है।

4:08

कितनी सुंदर यह मोचरी है और दोनों भाई मन

4:11

में विचार करने लगे कि भाई यह तो महाराज

4:13

प्रथम के लिए भेंट में देने लायक वस्तु है

4:16

कि हम दोनों चलते हैं अपने देश को और

4:18

महाराज प्रथम को इस मोचरी और इस गोट को

4:20

भेंट में देंगे। श्रोताओं किसी पर कोई

4:22

विपत्ति आती है तो कहकर नहीं आता।

4:24

पन्नालाल और फूलचंद बड़े खुशी होते हैं और

4:27

उसमें वह अच्छी तरह गोट को उठा लेते हैं।

4:29

अपने पास बड़े इंतजाम से रख के दोनों जहाज

4:32

वापस लौटा देते हैं अपने देश के लिए और

4:34

कुछ समय में महीने 2 महीने का सफर करके

4:36

यात्रा करके आ जाते हैं। दक्षिण और पश्चिम

4:39

में जहाज को समुद्र के तट पर छोड़ दिया

4:41

जाता है और दोनों अपना सामान गाड़ियों में

4:43

लाद करके चले जाते हैं दक्षिण पूर्व में

4:46

और दक्षिण पूर्व में आने के बाद दोनों

4:48

भाइयों ने अपना सामान उतारा और सामान उतार

4:50

करके विचार विमर्श करने लगे। अपने पिता

4:52

लक्ष्मी सेठ को बताया कि देखो कि हम कितनी

4:55

सुंदर वस्तु लेकर के आए हैं। यह कितनी

4:57

सुंदर मोचरी है और कितनी सुंदर यह गोट

4:59

होती है। यदि हम इस गोट को और इस मोचरी को

5:02

महाराज के पास भेंट में करें। महाराज के

5:04

पास मोचरी को और इस गोट को भेंट में

5:06

पहुंचाएं तो न जाने राजा हमें कितना इनाम

5:08

दे। हमें फिर व्यापार करने की आवश्यकता

5:11

नहीं रहेगी। लोभ में आ जाते हैं बनिए

5:13

पन्नालाल और फूलचंद। श्रोताओं दोनों सेठ

5:16

मन में विचार कर अपने पिता से विचार

5:18

विमर्श करके चल देते हैं नरवरगढ़ को

5:20

महाराज प्रथम के पास और महाराज प्रथम के

5:23

दरबार में पहुंचकर देखा तो महाराजा प्रथम

5:25

का दरबार लगा हुआ है। साथ ही सिंहासन पर

5:28

महाराजा प्रथम विराजमान हुए हैं और उनके

5:30

दामाद सुरमा और जो दरबारी थे वह भी वहां

5:32

विराजमान है। भरी हुई सभा में दोनों सेठ

5:35

पन्नालाल और फूलचंद पहुंच जाते हैं और

5:37

महाराज प्रथम से हाथ जोड़कर के निवेदन

5:39

करके पन्नालाल और फूलचंद सेठ ने एक थाल

5:42

में सुसज्जित करके उस गोटी को रखा और उस

5:45

मोचरी को रखा और महाराज के दरबार में

5:47

प्रस्तुत पहुंच जाते हैं राजा वीर सिंह के

5:50

दरबार में और राजा वीर सिंह से कहने लगे

5:52

कि महाराजा हे राजन हम आपकी सेवा में कुछ

5:55

भेंट देने आए हैं। हम एक अद्भुत वस्तुओं

5:57

को लेकर के आए हैं। ऐसी वस्तु आज तक हमने

5:59

नहीं देखी है। राजन आप इसे स्वीकार करें।

6:02

तो राजा प्रथम ने देखा कि वास्तविकता में

6:05

भेंट बहुत सुंदर थी। परंतु श्रोताओं एक

6:07

कहावत है राजा जोगी अगयन जब इनकी उल्टी

6:11

रीत बचते हुए परशुराम से थोड़ी राखे

6:14

विपरीत अर्थात राजा जोगी जोगी कहते हैं

6:17

सन्यासी को अग्नि और जल इनकी हमेशा उल्टी

6:21

रीति होती है। यह छोटी सी बात पर प्रसन्न

6:23

भी जल्दी होते हैं और क्रोधित भी छोटी सी

6:25

बात पर हो जाते हैं। न जाने कितना बड़ा

6:27

दंड देने में सक्षम होते हैं। इसलिए इनसे

6:30

बचकर रहना चाहिए। सावधानी से रहना चाहिए

6:32

क्योंकि यह किसी से प्रीति नहीं करते,

6:34

प्रेम नहीं करते। तो जब राजा ने यह देखा

6:37

कि कितनी सुंदर गोट है। कितनी सुंदर यह

6:39

मोचरी है तो दोनों बनियों को बुलाया

6:41

पन्नालाल और फूलचंद को और दोनों से कहा कि

6:44

सेठों यह बताओ यह गोट कहां से आई? यह

6:46

मोचरी कहां से आई? कहां से लाए तुम इसे?

6:49

तो दोनों के पास कोई जवाब नहीं था। राजा

6:51

कहने लगा कि ध्यान से सुनो। या तो इसके

6:54

साथ की मोचरी और 15 गोट लेकर आओ और या फिर

6:57

इनको पहनने वाली भी लेकर आओ और जाइए मैं

6:59

तुम्हें 6 महीने का समय देता हूं। यदि 6

7:02

महीने के समय में तुम इन गोटों को पूरा

7:04

नहीं कर सके 16 गोट होती हैं। 15 गोट लानी

7:07

है और यह मोचरी का जोड़ा पूरा नहीं कर सके

7:09

दूसरे इसके साथ की मोचरी नहीं ला सके तो

7:12

आपके परिवार से फांसी की सजा दे दी जाएगी।

7:14

श्रोताओं बनियों के पैरों के तले से जमीन

7:16

निकल गई। मुंह लटक गए। बनियों के होश उड़

7:19

गए और मन में विचार करने लगे कि महाराज के

7:21

सामने गिड़गिड़ाने लगे कि महाराज हम

7:23

इन्हें न जाने कहां से ला सकते हैं। तो

7:25

राजा तो मानने वाले नहीं थे। आदेश जारी कर

7:28

दिया कि नहीं कुछ नहीं 6 महीने का समय है।

7:31

यदि तुम्हारे परिवार को बचाना है तो 6

7:33

महीने के भीतर भी तुम्हें यह मोचरी लानी

7:35

होगी। इसके साथ ही और 15 गोट लानी होगी।

7:38

अन्यथा आप जीवित नहीं बचोगे। जाइए मेरे

7:40

दरबार से भाग जाइए। श्रोताओं दोनों सेठ

7:43

मुलाकात करके बड़े दुखी होकर के दक्षिणपुर

7:45

आ जाते हैं। आ गए दक्षिणपुर में विचार

7:48

विमर्श करने लग रहे हैं। सेठों के पैरों

7:50

तले से जमीन निकल गई और उनके घर में भोजन

7:52

बनना बंद हो गया। सेठ मन में विचार करने

7:54

लगे कि यदि हम उन गोटियों और मोचरी को

7:57

महाराज के पास नहीं ले जाते तो हमारा

7:59

परिवार तो जीवित रहता। इनाम लेने गए थे

8:01

लेकिन काम के बदले मृत्युदंड ले आए और वह

8:04

भी संपूर्ण परिवार के लिए। श्रोताओं अब तो

8:06

लक्ष्य सेठ भी बड़ा दुखी हुआ। उन्हें बड़ा

8:09

कष्ट का सामना करना पड़ रहा था। बनियों की

8:11

हवा निकल जाती है और वह बेचारे बोलना तो

8:13

दूर खटिया पकड़ने से हैं और मन में विचार

8:16

कर रहे हैं कि हे भगवान अब हमारी इस राजा

8:18

प्रथम से जान कैसे बचे भगवान का ध्यान धर

8:21

रहे हैं। जब बनियों को कई दिन दुखी व्यतीत

8:24

हो गए तो देखिए श्रोताओं वही राजा नल भी

8:26

रहा करता था। राजा नल की उम्र भी 16 साल

8:29

की थी। युवा हो गया था। भुजाओं में बल तथा

8:31

अतुलित शक्ति थी राजा नल में। और राजा नल

8:34

ने जब यह सुना कि उसके मामा बड़े परेशान

8:36

हैं, बड़े दुखी हैं। कई दिनों से भोजन

8:38

नहीं खा रहे हैं और यहां तक कि भोजन बन भी

8:41

नहीं रहा है तो राजा नल अपने मामाओं के

8:43

पास पहुंच जाता है। पन्नालाल और फूलचंद के

8:45

पास पहुंच जाता है और दोनों से कहने लगा

8:48

कि मामा बात क्या है? मुझे यह बताओ आप

8:50

इतने दुखी क्यों हैं? तो पन्नालाल और

8:52

फूलचंद कहने लगे कि बेटे क्या बताएं तुझे?

8:55

हम महाराज प्रथम के दरबार में कुछ भेंट

8:58

लेकर के गए थे। परंतु महाराज ने हमें बजाय

9:01

इनाम के मौत का फरमान जारी कर दिया है।

9:04

मृत्युदंड जारी कर दिया है। तो राजा नल

9:07

कहने लगे कि यह तो महाराज ने बहुत गलत काम

9:10

किया है। महाराज ने ऐसा क्यों किया? ऐसा

9:12

क्या कारण है? तो सेठ कहने लगे कि जब हम

9:16

जहाज पर गए थे तो वहां हमें समुद्र के तट

9:19

पर यह गोट और एक मोचरी मिली थी। हम इसको

9:21

महाराज की सेवा में ले गए। तो महाराज ने

9:24

यह कहा कि इस मोचरी के साथ की मोचरी लाओ।

9:27

इनको पूरी करो। यह अधूरी हैं। 16 गोटी

9:31

होती हैं। 15 गोटी और लाओ और इसके साथ ही

9:34

एक दूसरी मोचरी भी लाओ। अब तो जब हम इसे

9:37

करने में सक्षम नहीं हुए तो महाराज ने

9:39

आदेश जारी कर दिया कि छ महीने में यदि तुम

9:42

इन्हें नहीं ला सके तो तुम्हारे परिवार को

9:44

मृत्युदंड मिलेगा। अब तो श्रोताओं राजा नल

9:48

जो कि चार कला से अमिताभ तथा क्षत्रिय

9:51

योद्धा था। राजा प्रथम का पुत्र था। वह

9:54

विचार करके सेठों से कहने लगा। देखिए

9:56

श्रोताओं यहां कुछ गायक कलाकार भी बहुत

9:59

अच्छा गाते हैं। एक लाइन मैं सुनाता हूं

10:01

आपको। हाथ जोड़ के राजा नल मामानते बोलियो

10:06

वाणीवाल घाट पहुंचा दियो नौटंकी मैंने

10:09

जानी नौटंकी मैंने जानी। अर्थात तुम जहां

10:12

से इन गोटों को लेकर के आए हैं मुझे उसी

10:15

घाट पर उसी समुद्र के तट पर ले चलो मामा।

10:18

मैं आपकी मदद करूंगा और गोटों को मैं लेकर

10:21

के आऊंगा। आप चिंता मत कीजिए। श्रोताओं

10:23

राजा नल की बात सुनकर के सेठों ने कुछ

10:26

कंबल लिए। कुछ हिम्मत बंधाती है और वह

10:29

जहाज को तैयार करते हैं। मन में विचार

10:32

करने लगे कि यदि यह लड़का ही हमारा काम कर

10:34

दे तो हो सकता है हमारे प्राण बच जाए। अब

10:37

देखिए श्रोताओं राजा नल तैयार हो जाता है।

10:40

वह 16 वर्षीय युवक है और दोनों सेठ

10:43

पन्नालाल और फूलचंद भी अपना जहाजी बेड़ा

10:46

तैयार कर लेते हैं और अपने परिवार को छोड़

10:49

के अपनी माता मंज रानी से विदा लेकर के

10:52

अनुमति लेकर के राजा नल कहता है कि माता

10:55

मैं छ महीने में वापस आ जाऊंगा। आप चिंता

10:58

मत करना। मैं बहुत जल्दी ही मामाओं की

11:00

समस्या को हल कर दूंगा। मैं मोचरी और गोट

11:03

दोनों को लाकर के इन्हें दे दूंगा। देखिए

11:05

श्रोताओं मंज रानी तो सब कुछ जानती थी

11:08

क्योंकि मंज रानी स्वच्छता उनकी मंजिल

11:10

आपको विश्वास था कि उसका पुत्र इस असंभव

11:13

कार्य को भी जरूर कर देगा। तो मंजा रानी

11:16

से अनुमति लेकर के राजा नल पन्नालाल और

11:18

फूलचंद के साथ चल देता है। जहाज में बैठकर

11:21

चले जा रहे हैं। चलते-चलते कई दिन का सफर

11:24

करने के बाद उसी तट पर पहुंच जाते हैं।

11:27

देखिए श्रोताओं अब यह वीडियो काफी लंबा हो

11:30

जाएगा तो उसे सुनने में भी बोरियत होती

11:32

है। इसलिए यह वीडियो मैं यहीं समाप्त करता

11:34

हूं और इसका अगला भाग बड़ा आनंददायक है।

11:37

तब तक के लिए सभी को मेरी ओर से प्रणाम।

11:40

जय हिंद, जय

5.

हे राजा नल मुझे तू डर मत। मैं सभी का

0:04

भाग्य लिखती हूं। मैं सभी लोगों की

0:06

जोड़ियां बनती हूं।

0:08

हे राजा नल तेरा पहला विवाह आज से तीसरे

0:11

दिन हो जाएगा। आज का तेरा तेल है। कल का

0:13

मांग रहे और परसों के तेरे फेरा हैं।

0:16

राजा नल की कहानी के मैं चार भाग आपकी

0:18

सेवा में प्रसारित कर चुका था। और पांचवा

0:21

भाग आज आपकी सेवा में लेकर के उपस्थित

0:23

हूं। और मैंने चौथे भाग में आपको बताया था

0:26

कि राजा नल जिस लक्ष्मी सेठ के यहां रहते

0:29

थे राजा नल और उसकी माता मंज रानी उसी

0:32

लक्ष्मी सेठ के दो लड़के फूलचंद और

0:35

पन्नालाल जब व्यापार को जाते हैं तो

0:37

समुद्र के तट से एक मोचरी और गोट चौसर की

0:40

गोट उनको ले आते हैं। और उन्हें जब राजा

0:43

प्रथम के दरबार में भेंट के रूप में राजा

0:45

को देते हैं तो राजा उन्हें यह कहते हुए

0:48

आदेश देते हैं कि 6 महीने में यदि गोट और

0:50

मोचरी का जोड़ा नहीं ला पाए तो आपको

0:53

परिवार सहित मृत्यु के घाट उतार दिया

0:55

जाएगा। और जब यह आदेश उन सेठों ने सुना तो

0:58

वह बड़े परेशान हो जाते हैं और उनकी

1:01

परेशानी देखकर के राजा नल अपने मामाओं के

1:04

पास आ जाता है और उनसे कहता है कि मैं उन

1:06

गोटों को लेकर आऊंगा। आप मुझे उस स्थान पर

1:09

ले चलिए। तो राजा नल को पन्नालाल और

1:11

फूलचंद जहाज में बैठा के समुद्र के दूसरी

1:14

पार उस क्षेत्र में ले जाते हैं जहां

1:16

घूमासुर दाना रहता था। समुद्र के तट पर आ

1:20

जाते हैं और जहाज में से वहां उतर जाते

1:22

हैं। श्रोताओं हम आज का अपना यह वीडियो

1:25

आरंभ करते हैं। जब पन्नालाल और फूलचंद उस

1:28

समुद्र के तट पर पहुंच गए तो राजा नल से

1:30

कहने लगे कि यह वही स्थान है जहां हमें एक

1:33

गोट मिली थी और एक मोचरी मिली थी। तो राजा

1:36

नल उनसे कहने लगा कि देखो मामा यह बहुत

1:39

बियाबान वन है और मैं इस बियाबान वन में

1:41

गोटों को खोजने के लिए जा रहा हूं। तुम

1:44

यहीं रहना। यदि मैं तुम्हें साथ ले जाता

1:46

हूं तो आप सोचिए मैं तुम्हें बताऊंगा या

1:48

गोटों को खोजूंगा। इसलिए आप जब तक मैं लौट

1:51

कर नहीं आ जाऊं यहीं बैठे रहना। इसी

1:54

समुद्र के तट पर भगवान राम का जाप करते

1:56

रहना और मैं गोटों को लेने के लिए जा रहा

1:59

हूं। यदि मैं तीन दिवस में वापस नहीं

2:01

लौटूं तो समझ लेना कि मैं मर चुका हूं और

2:04

आप फिर वापस लौट जाना दक्षिणपुर को। तो

2:07

देखिए श्रोताओं राजा नल अपने मामा से इस

2:09

तरीके से कह करके उस वन में प्रवेश कर

2:12

जाता है जिस वन में घुमासुर नामक महादेव

2:14

का वरदानी दैत्य रहा करता था। राजा नल चला

2:18

जा रहा है। कुछ आगे देखा तो एक धूना लगा

2:20

हुआ था और उस धुने पर एक बुढ़िया बैठी हुई

2:23

थी। एक बूढ़ी माता बैठी हुई थी और उस

2:25

बूढ़ी माता के पास पुस्तकों का ढेर लगा

2:27

हुआ था। जब राजा नल ने उस बूढ़ी माता को

2:30

देखा, उस बुढ़िया को देखा, तो राजा नल उसे

2:33

देखकर के डर गया। राजा नल सोचने लगा कि यह

2:36

शायद दाना मुझे पहले ही मिल चुका है।

2:38

परंतु राजा नल हिम्मत करके आगे बढ़ता चला

2:41

जाता है। तो बुढ़िया ने राजा नल को इशारा

2:43

किया कि तुम इधर आओ। परंतु राजा नल समझ गए

2:46

कि यह मुझे खाने के लिए बुला रही है। और

2:48

राजा नल वापस भागने लगते हैं। तो वह बूढ़ी

2:51

माता राजा नल को आगे से घेर लेती है और

2:54

राजा नल का हाथ पकड़ करके अपने धुने पर ले

2:57

आती है और कह रही है बेटे नल तू मुझे देख

2:59

के डर रहा है। तू नहीं जानता मैं कौन हूं।

3:02

तो राजा नल कहने लगा कि मैं तो आपके बारे

3:04

में नहीं जानता माता पर तुम मेरे बारे में

3:06

कैसे जानती हो? कि बेटे ध्यान से सुन मैं

3:09

तेरी पूरी जीवनी जानती हूं। तू राजा नल है

3:12

और कुछ गायक कलाकार यहां इस तरीके से यह

3:15

गाना प्रस्तुत करते हैं। तो मैं आपके

3:17

सामने चार लाइन उसकी प्रस्तुत कर रहा हूं।

3:19

ना सोचीवा राजा ने मन में और संग भेज

3:22

जल्लाद दई तेरी मैया वन में पर अब ऐसे

3:25

फाटे में और वही सांवरे के बीच जन्म जलियो

3:28

काटे में हृदय तेरो काको फाट और दाई बन के

3:31

आई नार तेरो मैंने काटियो और दाई बनके आई

3:34

नार तेरो मैंने काटियो दूध तेरी मैया के

3:38

ना आयो तो दिना बीत गए चार मने तो सिंघनी

3:41

बनके दूध मैंने पियो कुंवर क्यों घबरा रहे

3:44

हो मन में और भेज संग जल्लाद दई तेरी मैया

3:47

वन में जब राजा नल को उस भय माता ने उस

3:50

विधि ब्रह्मा ने यह बताया कि मैंने ही

3:52

तेरा जन्म किया था। हीस के वृक्ष में

3:54

मैंने ही तुझे सिंघनी बनकर के दूध पिलाया

3:56

था और तेरा नाम नल है और तू गोटों के लिए

3:59

आया है। तो राजा नल उससे कहने लगा कि माता

4:02

तुम मेरी जीवनी बताती रहोगी या कुछ

4:05

तुम्हारे बारे में बताओगी। तुम कौन हो? तो

4:07

विधि ब्रह्मा भय माता राजा नल से कहने लगी

4:10

कि बेटे मैं भय माता हूं। मेरा काम है

4:13

किसी की जोड़ी मिलाना किसी की जोड़ी

4:15

तोड़ना। मैं ही जोड़ी लिखती हूं। मुझे

4:17

विधि ब्रह्मा कहते हैं, भय माता कहते हैं।

4:19

तो राजा नल कहने लगे कि एक बात बता माता

4:22

मेरी जोड़ी क्या मिलाई है आपने? मेरी उम्र

4:25

16 वर्ष हो चुकी है और अभी तक मेरा विवाह

4:27

नहीं हुआ है। तो मेरा विवाह किसके साथ लिख

4:30

दिया है? तो भय माता राजान से कहने लगी कि

4:33

बेटे मैंने तेरा ढाई विवाह लिख दिया है कि

4:36

ढाई कैसे माता कि देखिए तेरा पहला विवाह

4:38

आज से तीसरे दिन हो जाएगा। आज का तेरा तेल

4:41

है। कल का मांगर है और परसों के तेरे फेरा

4:44

है। ध्यान रखना। राजा नल कहने लगा कि इस

4:47

तरीके से कैसे हो सकता है कि बेटे इस जंगल

4:50

में तेरा विवाह होगा ध्यान रखना और तेरा

4:52

जो दूसरा विवाह है वह नागराज की पुत्री के

4:55

साथ होना था उसका नाम नगमंती है और वह

4:58

तुझे अवश्य मिलेगी लेकिन बीच में ही तेरी

5:00

नागराज बासुकी से मित्रता हो जाएगी और उस

5:03

मित्रता के कारण तू उससे विवाह नहीं करेगा

5:06

वह कन्या तुझे अवश्य मिलेगी इसलिए वह आधा

5:09

विवाह हुआ तेरा और तेरा तीसरा विवाह राजा

5:12

भीम की पुत्री दमयंती के साथ लिख दिया है

5:14

मैंने तेरे मेरे तीन विवाह लिख दिए हैं।

5:16

तो राजा नल भय माता से कहने लगा कि माता

5:19

तूने मेरा सब कुछ बता दिया। पर मुझे यह

5:21

नहीं बताया कि मेरे पिताजी कौन है। तो भय

5:24

माता कहने लगी कि बेटे जिस राजा के लिए तू

5:27

इन गोटों को खोजने आया है। जिस नरगढ़ नरेश

5:30

के लिए तू इन गोटों को खोजने आया है। वही

5:32

राजा नरवरगढ़ नरेश राजा वीरसेन तुम्हारे

5:35

पिता हैं। उन्होंने तुम्हारी माता को

5:37

वनवास दिया था। जल्लादों के हाथ सौंप दिया

5:40

था और वन में भेज दिया था। अब तू ऐसा कर

5:42

यह जो यह रास्ता जा रहा है, इस रास्ते को

5:45

चला जा। यह रास्ता सीधा एक किले पर

5:47

खुलेगा। एक किला होगा और उस किले पर पहुंच

5:50

जाना। वहां एक परम सुंदरी लड़की है जिसका

5:53

नाम गज मोतनी है। चंद्रमा के समान जिसकी

5:55

कांत और बड़ी सुंदर और बड़ी गुणवान इस

5:58

दाने की लड़की है और यहां तेरा विवाह

6:00

अवश्य हो जाएगा। सीधा चला जा। जब राजा नल

6:04

ने उस भय माता की बात सुनी तो राजा नल

6:06

कहने लगा कि माता यदि मैं मार्ग में फंस

6:08

गया तो तू जा मुझे याद कर लेना। मैं वहीं

6:11

तेरे पास आ जाऊंगी। तू देवी का ध्यान धरना

6:14

और मैं तेरे पास आ जाऊंगी। हे श्रोताओं,

6:16

अब तो राजा नल उस भय माता की बात सुनकर के

6:19

चल देते हैं। राजा नल चला जा रहा है।

6:22

बियाबान सुनसान वन है और उसमें 16 वर्ष का

6:25

एक युवक राजकुमार राजा नल आगे चला जा रहा

6:28

है। जैसे-जैसे राजा नल आगे बढ़ता है। वन

6:31

की विशालता बढ़ती जाती है। जब बहुत आगे

6:33

राजा नल चला गया तो राजान ने देखा एक बड़ा

6:36

सुंदर भव्य महल बना हुआ है। तो राजान बड़ा

6:39

खुशी हुआ कि इसी स्थान पर मेरा विवाह

6:41

होगा। तो राजा नल उस महल के चारों तरफ

6:44

दरवाजा खोजने के लिए चले आते हैं। परंतु

6:46

श्रोताओं राजा नल को उस महल का दरवाजा

6:49

नहीं मिला। राजा नल मन में विचार करने लगा

6:51

कि इस महल में जब दरवाजा ही नहीं है तो

6:54

मेरा विवाह कैसे होगा? वह कोई भय माता

6:56

नहीं थी। राजा नल डरने लग गया। वह तो इस

6:59

दाने की दलाल थी। इसी तरीके से मनुष्यों

7:02

को फंसाती है और यहां इस दाने के महल में

7:04

भेज देती है। अब तो राजा नल घबरा गया। उस

7:07

किले पर सोच रहा है जब इस महल में दरवाजा

7:10

ही नहीं है तो मैं अंदर कैसे जाऊंगा। इस

7:12

किले की विशालता इतनी है कि मैं ऊपर नहीं

7:15

चढ़ सकता। अब तो राजा नल बाहर खड़ा हुआ है

7:18

और मन में विचार कर रहा है। परंतु बात याद

7:20

आ गई कि उस भय माता ने मुझसे कहा था कि

7:23

तुम देवी का ध्यान धारण करना और मैं

7:25

तुम्हारे पास आ जाऊंगी। तो राजा नल आसन

7:28

मार करके बैठ गया और उस देवी का ध्यान

7:30

स्मरण किया और जब स्मरण किया तो भय माता

7:33

कुछ ही क्षणों में राजा नल के पास आ जाती

7:35

है और कहने लगी बेटे तुम क्यों घबरा रहे

7:38

हो कि माता तुमने मुझे यहां भेजा है यहां

7:41

इस मकान में महल में दरवाजा ही नहीं है

7:43

ब्याह तो तब होगा जब मैं इसके अंदर प्रवेश

7:46

करूंगा कि बेटे यह एक दाने का मकान है।

7:49

दाना भगवान शंकर का वरदानी है और 100 मन

7:52

की एक शिला पत्थर की दरवाजे पर लगा रखी

7:54

है। अरे तू यह शिला हटा के फेंक दे और

7:56

किले के अंदर प्रवेश कर जा और तेरा विवाह

7:59

इस किले के अंदर हो जाएगा। श्रोताओं राजा

8:02

नल कहने लगा कि मैया 100 मन की शिला कि

8:04

हां बेटे कि यह तो मैं नहीं हटा सकती।

8:07

राजा नल उस शिला को हटाने का प्रयास करता

8:09

है परंतु शिला नहीं हटी। तो देवी माता ने

8:12

अपने लांगुरिया का स्मरण किया और

8:14

लांगुरिया को याद किया तो लांगुरिया तुरंत

8:17

देवी माता के पास आ जाता है और कहने लगा

8:19

कि मातेश्वरी मुझे क्यों याद किया कि बेटे

8:22

यह भगवान शिव का वरदानी राजा नल मेरा परम

8:25

भक्त राजा नल है और यह इस किले में प्रवेश

8:28

करना चाहता है तो इसकी शिला हटाकर फेंक

8:30

दे। श्रोताओं लांगुरिया ने उस महल के

8:33

दरवाजे से जो 100 मन की शिला लगी हुई थी

8:35

उस शिला को हटा करके फेंक दिया और राजा नल

8:38

से कह दिया जा महल में प्रवेश कर जा और वह

8:41

देवी माता वहां से अंतर्ध्य हो गई और राजा

8:44

नल उस महल में प्रवेश कर जाता है। परंतु

8:46

कुछ आगे चला तो देखता है मेन दरवाजे में

8:49

तो प्रवेश कर गया परंतु एक दूसरे दरवाजे

8:51

पर 100 फली का एक चक्र चल रहा है और हर

8:54

फली में 100-100 तलवार लगी हुई है और वह

8:57

चक्र घूम रहा है। राजा नल को उस किले के

9:00

अंदर उसी दरवाजे से जाना है। अब तो राजा

9:03

नल मन में विचार कर रहा है कि अब क्या

9:05

करूं? अब इस किले के अंदर कैसे जाऊं? यह

9:08

राजा नल सोचता हुआ वहां खड़ा हुआ है उस

9:10

किले पर। अब देखिए श्रोताओं राजा नल ने

9:13

फिर देवी माता का ध्यान किया। तो देवी

9:15

माता कहने लगी कि बेटे यह ध्यान से देखकर

9:19

के वेग से इस किले के अंदर प्रवेश कर जाओ

9:22

और फिर तुम्हें कोई समस्या नहीं आएगी। तो

9:25

देखिए श्रोताओं माता देवी का स्मरण किया

9:28

और राजा नल उस किले के अंदर प्रवेश कर

9:30

गया। किले में चौक में पहुंच जाता है और

9:33

वहां देख रहा है कि उस किले में कोई नहीं

9:36

है। राजा नल मन में विचार करने लगा। राजा

9:39

नल उस किले के अंदर विचार कर रहा है कि अब

9:41

क्या किया जाए? उस बुढ़िया ने तो मुझे इस

9:44

किले में फंसा दिया। अब मैं बाहर भी नहीं

9:46

निकल सकता। और वहीं उस किले में खोजता हुआ

9:49

डोल रहा है। जब कुछ आगे पहुंचा तो देखा एक

9:53

पलंग पर कोई सो रहा है। उसने एक दो साला

9:56

उड़ रखी है और आराम से सो रहा है। अब राजा

10:00

नल मन में विचार करने लगा कि यह दाने की

10:02

लड़की सो रही है। आगे बढ़ जाता है। फिर मन

10:05

में विचार आया यदि दाना हुआ तो मुझे खा

10:08

जाएगा। फिर पीछे हटता है। परंतु उसी क्षण

10:11

मन में विचार आया कि मुझसे विधि ब्रह्मा

10:13

ने कहा था कि दाना तो 10:00 बजे से और शाम

10:17

को 5:00 बजे तक के लिए में नहीं रहता है।

10:19

वह तो शाम के 5:00 बजे किले में आता है और

10:22

सुबह 10:00 बजे निकल जाता है फिर भोजन की

10:24

तलाश में। तो यह दाने की लड़की है। यही

10:27

सोचता-सचता और उस पलंग के पास पहुंच जाता

10:30

है। जब देखा कि उसमें एक सुंदर रूपवान

10:33

चंद्रमा के समान परम सुंदरी एक लड़की सोई

10:36

हुई है। तो राजा नल ने उसकी गौशाला को

10:39

झटका और झटका मारकर के खंब की ओठ में खड़ा

10:42

हो गया। उस लड़की ने देखा कि यह कौन है

10:44

जिसने मुझे जगाया है। तो वह लड़की खड़ी

10:46

हुई चारों तरफ महल में देखा तो उसे कोई

10:49

दिखाई नहीं दिया। तो वो लड़की सोचने लगी

10:52

हो सकता है मैं स्वप्न देख रही होंगी। और

10:54

इसलिए फिर सो जाती है। जब वह फिर सोई तो

10:58

राजा नल ने फिर दोशाला ढकी और इसी तरीके

11:01

से राजा नल ने तीसरी बार दोशाला ढकी तो

11:03

लड़की खड़ी हो गई और कहने लगी कि कौन है

11:06

इस किले में? इस किले में अंदर आने की

11:08

हिम्मत कैसे हुई? तुम कौन हो? बाहर निकलो।

11:11

तो राजा नल बाहर खड़ा हो जाता है। और वह

11:14

लड़की राजा नल से कहने लगी कि तू कौन है?

11:16

यहां से अभी और इसी समय वापस लौट जा। तेरी

11:20

हिम्मत हो गई कि तू भगवान शंकर के वरदानी

11:22

दानव के गढ़ में आ गया। दानव के किले में

11:25

आ गया। अब तू जीवित नहीं जा सकता। यदि

11:28

तुझे तेरे प्राण प्यारे हैं, जीवन चाहता

11:30

है तो यहां से लौट जा। अब तो श्रोताओं

11:33

राजान उस गजमोतनी के रूप को देख रहा है।

11:36

उसके चेहरे की तरफ एक टक दृष्टि से निहार

11:39

रहा है। राजानल उससे कहने लगा कि मैं

11:41

राजकुमार हूं और मैं तुझसे विवाह करने आया

11:44

हूं। मैं ऐसे नहीं जाऊंगा। तो लड़की कहने

11:47

लगी अरे तू विवाह करने वाला कौन है? क्यों

11:50

मौत के मुंह में आया है? क्या नाम है

11:52

तेरा? मुझे यह बता। तो राजा नल कहने लगा

11:54

कि मेरा नाम नल है। मैं राजकुमार हूं और

11:57

मैं तुझसे विवाह करना चाहता हूं। मुझे भव

11:59

माता ने यह बताया था कि मेरा विवाह तेरे

12:02

साथ होगा। जब राजा नल का नाम सुना तो

12:05

गजमोतनी रुक जाती है। सहम जाती है।

12:08

क्योंकि गजमोतनी नल राजा के ही लोटा ढारती

12:11

थी। पति रूप में नल राजा को प्राप्त करना

12:13

चाहती थी। इसलिए वह कहने लगी कि तुम नल

12:16

नहीं हो सकते। तो राजा नल कहने लगा नल

12:18

हूं। तो वह गजमतन कहने लगी कि मैं

12:20

तुम्हारी परीक्षा लूंगी। तो राजा नल कहने

12:23

लगा परीक्षा कर ले। और गजमतनी कहती है यदि

12:26

तुम असली नल नहीं हुए तो तुम जानते हो आज

12:29

शाम को मेरे दादा के पेट में पाओगे। दादा

12:32

की चटनी बनकर के पेट में चले जाओगे। उनका

12:34

भोजन बनोगे शाम का। तो नल कहने लगा तू

12:37

परीक्षा कर ले। कैसे परीक्षा करेगी? मैं

12:39

असली नल हूं। तो गजम मोती कहने लगी कि मैं

12:42

परीक्षा चौपरसार में करूंगी। मेरे साथ तू

12:44

चौसर खेल और यदि चौसर में तूने मैं हरा दी

12:48

तो तू राजा नल है। और यदि तू हार गया तो

12:51

देख ले शाम को बाबा के पेट में मिलेगा। तो

12:54

राजा नल कहने लगा कि मैं असली नल हूं। तू

12:56

मुझसे चौसर खेलिए। श्रोताओं दोनों की

12:59

चौसरसार बिछ जाती है। और चौसरसार की

13:01

गोटियां गज मोती निकाल करके उसमें रखती

13:04

है। तो उसके पास तो 15 गोटी थी। एक गोट तो

13:07

समुद्र के तट पर खो गई थी। उन्हीं की खोज

13:10

में तो राजा नल वहां तक आकर के पहुंचा था।

13:12

तो उसने अपनी अंगूठी निकाली और 16वीं गोट

13:15

के स्थान पर रखी। तो राजा नल कहने लगा कि

13:18

गजमूतनी यह 16वीं गोट कहां है कि मेरी एक

13:21

गोट खो गई थी। किसी ने चुरा ली। तो राजा

13:24

नल कहने लगा कि मैं मेरे वीरों से तेरी

13:26

गोट को मंगवा दूं। तो राजा नल से गजमूती

13:29

कहने लगी कि ऐसे वीरों वाला है तो

13:31

मंगवाइए। तो राजा नल के पास रखी हुई थी।

13:34

राजा नल तो मन में विचार कर रहा था कि

13:37

मुझे तो इसको इसी समय मेरे कब्जे में लेना

13:40

है। इसे मेरे ऊपर आसक्त करना है। तो

13:42

श्रोताओं राजा नल ने वह गोट निकाल करके दे

13:45

दी उसको। अब देखिए राजा नल ने गोट निकाली

13:48

तो गजमोतनी कहने लगी कि तू ही मेरी गोटों

13:50

का चोर है। तू ही गोटों को चुरा कर ले

13:52

जाता था। तो राजा नल गजमोतिन से कहने लगा

13:55

कि नहीं अब तू मुझे चोर बना रही है। जब

13:58

मैंने तेरी गोटी मंगवा दी तो चोर हो गया

14:00

मैं। मैं नहीं जानता। तुझे एक गोट मेरे

14:03

मामाओं को मिली थी समुद्र के तट पर और वह

14:06

इसे ले गए और इन्हीं गोटों को लेने के लिए

14:09

तो मुझे यहां तक आना पड़ा। बहुत जल्दी मन

14:11

सुया उसके लिए बता दिया सब कुछ। श्रोताओं

14:15

गजमोतनी कहती है कि ठीक है चौसर का खेल

14:18

होने दीजिए। श्रोताओं दोनों में चौसर का

14:20

खेल हुआ और राजा नल जब अपने पासों को

14:23

डालता है तो राजा नल के गिनती में 18 और

14:26

जब गजमोतनी पासे डालती है तो काने तीन आते

14:28

हैं। गजमोतनी खेल में हार जाती है और राजा

14:32

नल चौसर का खेल जीत जाता है। अब तो

14:34

गजमोतनी को भरोसा हो गया कि यह और कोई

14:37

नहीं राजा नल है। मुझे सिवाय राजा नल के

14:40

इस दुनिया में कोई नहीं हरा सकता है।

14:42

देखिए श्रोताओं, आपको एक बात बताना

14:44

चाहूंगा कि गजमोतनी के पास ऐसी तीन चीजें

14:47

ऐसी थी जो दुनिया में किसी के पास नहीं

14:50

थी। नंबर एक, चौसर का खेल। सिवाय राजा नल

14:54

के उसे कोई नहीं हरा सकता था। दूसरे उसके

14:56

पास जादू था। वह चौधे विद्या निधान थी।

15:00

महा जादूगरनी थी इस इस समय की संसार की।

15:03

तो उसके समान जादू में कोई दूसरा नहीं था।

15:05

तो जब गजमोतनी को यह भरोसा हो गया कि यह

15:08

राजा नल है तो जब तक शाम का वक्त हो गया

15:11

5:00 बजने को हो गए और 5:00 बजे तो दाने

15:14

ने अपने घर की तरफ चलने की कोशिश की और

15:17

भोजन को खाकर के डकार ली और जब डकार दाने

15:20

को आई तो जैसे मानो एक तोप चल गई हो और

15:23

उसकी आवाज राजा नल के कानों में पड़ी तो

15:26

राजा नल कहने लगा कि यह बंदूक कहां चली?

15:29

यह तोप कहां चली है? तो दाने की लड़की

15:31

कहने लगी कि यह तोप नहीं है। यह मेरे

15:34

पिताजी हैं जिन्होंने भोजन को ग्रहण करके

15:36

डकार ली है। तो राजा नल के पैरों से जमीन

15:39

निकल गई। राजा नल के होठ सूख गए। राजान का

15:42

चेहरा महसूस हो गया। अब तो राजा नल घबरा

15:45

गए। राजा नल उससे पूछने लगा कि यह कहां

15:48

आएगा कि गजमोती कहने लगी यहीं महल में

15:50

आएगा और कहां जाएगा कि सोएगा कहां? के इस

15:53

चौक में तो राजा नल घबरा गया कि कितनी देर

15:56

में आने वाला है कि बस थोड़ी देर में ही

15:58

अभी किले में प्रवेश करने वाले हैं। अब तो

16:01

श्रोताओं राजान गजमतनी के हाथ जोड़ने लगा

16:04

कि अब मुझे तू ही बचा सकती है। दूसरा बचने

16:07

का कोई उपाय नहीं है। तो देखिए श्रोताओं

16:10

मैं पहले ही बता चुका हूं कि गजमतनी के

16:13

पास ऐसी जादू की विद्या थी जो उस जमाने

16:16

में किसी के पास नहीं थी। महान जादूगरनी

16:18

थी गजमोतनी। कहा कि ठीक है। सामने खड़े हो

16:21

जाओ। राजा नल को सामने खड़ा कर लिया।

16:24

मंत्र अभिमंत्रित किया और राजा नल पर छोड़

16:27

दिया। जब राजा नल पर मंत्र छोड़ा तो एक

16:30

मक्खी बना लिया। छोटी सी मक्खी और मक्खी

16:33

बना करके राजा नल को अपनी चोटी जो चोटी

16:36

होती है बाल होते हैं उन बालों में गूंथ

16:39

लिया एक डिब्बी में रखकर और राजा नल से कह

16:42

दिया कि यहीं बैठा रहे। हिलना मत पूरी रात

16:45

चुपचाप रहे। नहीं तो बाबा के पेट में चला

16:48

जाएगा। तेरा भोजन बन जाएगा। तो राजा नल

16:50

आराम से गजमोतनी के बालों में मक्खी बनकर

16:53

बैठे हुए हैं। और उधर जब दानव आता है जब

16:56

सांझ हुआ और वह दाना आया अपने किले पर तो

16:59

दाने ने देखा कि मेरे महल की 100 मन की जो

17:01

शिला है वह दूर हटी हुई पड़ी हुई है। दाने

17:04

ने किले के अंदर प्रवेश किया तो देखा कि

17:07

उसे मनुष्य की बदबू आ रही थी। तो अपनी

17:09

लड़की से कहने लगा कि बेटी आज इस किले में

17:12

से मुझे मनुष्य की बदबू आ रही है। मेरे

17:15

किले के दरवाजे की पटियां दूर हटी पड़ी

17:17

हुई थी। क्या कारण है पुत्री? तो लड़की

17:20

कहने लगी कि पिताजी आप सब दिन मनुष्यों को

17:22

खाते हैं। पूरे दिन आप पर यही काम रहता

17:25

है। इसलिए आपको बदबू आ रही है और दरवाजे

17:28

की पटिया तो आज आप लगा करके ही नहीं गए

17:31

थे। आप ध्यान भूल गए। श्रोताओं गजमोतनी

17:34

दाने को बहका देती है और राजा नल को वहीं

17:36

बालों में बैठा लेती है। अब यहां से इसका

17:39

अगला भाग मैं आपकी सेवा में लेकर के कल के

17:42

वीडियो में उपस्थित हो जाऊंगा। अब यह

17:44

वीडियो मैं यहीं समाप्त करता हूं। तब तक

17:46

के लिए जय हिंद जय

6.

 

नमस्कार दोस्तों इस चैनल पर एक बार समस्त

0:02

श्रोताओं का भक्तों का और सब्सक्राइबर

0:05

बंधुओं का एक बार फिर से स्वागत और

0:07

हार्दिक अभिनंदन है। श्रोताओं जैसा कि आप

0:10

जानते हैं हमारी कथा चल रही थी नल पुराण

0:12

इतिहास से और उसके पांच एपिसोड में आपकी

0:15

सेवा में प्रसारित कर चुका था और छठवां

0:18

एपिसोड आपकी सेवा में लेकर के उपस्थित

0:20

हूं। इससे पहले मैंने पांचवें भाग में

0:23

बताया था कि राजा नल किस तरीके से भय माता

0:26

के समझने से और दानव के किले पर चला आता

0:29

है। दाना रहता था घुमासुर और उस घुमासुर

0:32

किले पर राजा नल चला जाता है। माता देवी

0:35

ने लांगुरिया को भेज के दूर फेंक दी किले

0:37

की जो शिला लगी हुई थी और राजा नल उस किले

0:41

में जो 100 फली का चक्र चल रहा था उस चक्र

0:44

को भेद करके प्रवेश कर जाता है। मंजानी का

0:47

पुत्र जब गजमोतिन के सामने आता है तो

0:49

दोनों में प्रेम हो जाता है और जब शाम का

0:51

वक्त होता है दाना अपने घर के लिए आता है

0:54

तो नल घबरा जाता है और जो गजमोतिन थी दाने

0:58

की पुत्री राजा नल को जादू से एक मक्खी

1:01

बनाकर के डिब्बी में बंद कर लेती है और

1:03

अपनी चोटी में बैठा लेती है। जब दाना घर

1:06

आया तो दाना भगवान शंकर का वरदानी था। आते

1:09

ही उसे खुशबू आने लगी। 100 गज एरिया में

1:12

दाने को खुशबू आ जाती थी मनुष्य की। तो

1:15

दाना अपनी पुत्री से कहने लगा कि पुत्री

1:17

आज मुझे ऐसा लगता है पहले यह बता कि यह

1:20

मेरे किले की जो पटिया है मेरे दरवाजे की

1:23

शिला है इसको किसने हटाया? तो लड़की कहने

1:26

लगी कि पिताजी मुझे तो कुछ पता नहीं है।

1:28

मैं तो अंदर ही सोती रहती हूं। मैं तो

1:30

कहीं घर से बाहर जाती ही नहीं हूं। हो

1:33

सकता है आप ही पटिया को लगाकर ना गए हो।

1:36

दाना कहता है नहीं पुत्री मुझे यह बताइए

1:39

कि यह मनुष्य की बदबू कहां से आ रही है?

1:41

तो लड़की बोली कि आप प्रतिदिन मनुष्य का

1:44

भोजन करते हैं इसलिए आपको यह बदबू आ रही

1:46

होगी। तो दाने को विश्वास नहीं होता है।

1:49

दाना कहने लगा लड़की तू झूठ बोल रही है तो

1:52

मुझे मरवाना चाहती है तू सत्य-सत्य बता कि

1:55

तेरे पास कौन आया है। तो लड़की कहती है कि

1:57

मेरे पास कोई नहीं आया। दाने ने लड़की को

2:00

उठाया और उठा के अपनी मुट्ठी में बंद कर

2:02

दिया और जब इधर-उधर से श्वास खींचा तो

2:05

गजमोतिन की तरफ से फिर मनुष्य की बदबू आने

2:08

लगी। परंतु दाने को कुछ दिखाई नहीं दे रहा

2:10

है कि जो मनुष्य है वह कहां छुपा हुआ है।

2:13

बेटी तेरे पास कोई ना कोई अवश्य है। मुझे

2:16

सही-सही बता कि तेरे पास कौन है। लड़की

2:18

नहीं मानती है नहीं बताती है। गजमतिन बड़ी

2:22

चालाक थी तो दाना उसे ले जाता है। उसके

2:24

पास एक भक्खी थी। भक्सी कहते हैं एक सूखा

2:27

का कुआं था जो 100 गज गहरा था और वह दाने

2:30

ने इसलिए बनवा रखा था कि जो कोई शिकार

2:33

उससे बचता था तो दाना उसे खाने के लिए

2:35

उसमें डाल देता और जब भूख लगती तब उसमें

2:38

से खा लेता तो दाना उस लड़की को उस भक्सी

2:41

पर ले आता है उस बात को उगलवाने के लिए कि

2:44

एक बात को उगल नहीं रही है और लड़की को

2:46

उठाया और उबर से भक्सी में डाल दिया।

2:49

परंतु मैं आपको पहले ही बता चुका हूं कि

2:51

गजमतिन के पास जादू था। संसार में उसके

2:54

समान कोई जादूगरनी नहीं थी। तो गजमोतिनी

2:57

ने अपने आठ वीरों का स्मरण किया और वह वीर

2:59

उपस्थित हो गए। गजमोतिन को पकड़ा और आराम

3:02

से नीचे कुएं में उतार दिया। उसे बाहर

3:05

निकाला और जादू पढ़ा और राजा नल बना दिया

3:08

और राजा नल से गजमोतिन कहने लगी कि देखिए

3:11

तुमसे ही मेरा विवाह होगा और इस मेरे पिता

3:14

के पास इतनी अच्छी-अच्छी वस्तुएं हैं।

3:16

कौन-कौन सी वस्तु? कुछ बता तो सही कि मेरे

3:19

पिता के पास एक वीर वरण नामक घोड़ा जो जल,

3:22

थल, गगन तीनों में समान गति से चलता है।

3:25

मेरे पिता के पास एक साथ मणियों की माला

3:27

है। मेरे पिता के पास सात धार की तलवार

3:30

है। मां भवानी की दी हुई अक्षय तेज है जो

3:33

अपने आप चलती है। शत्रु का विनाश करती है

3:35

और मेरे पिताजी के पास नारद मुनि विद्या

3:38

की कोठी है। यह समस्त चीजें तुझे मिलेंगी

3:41

और मैं संसार की अद्वितीय सुंदरी हूं।

3:44

श्रोताओं जब दाने ने देखा कि लड़की किसी

3:46

से बात कर रही है तो दाने ने उसे खींचा।

3:49

दाने की विशेषता थी कि 100 गज दूर से वह

3:52

आदमी को खींच सकता था। जब लड़की हवा में

3:54

उठने लगी तो अपना जादू चलाया। राजा नल को

3:57

डिब्बी में बंद किया और उसी बैना में जो

4:00

बालों की चोटी थी उसमें दुबका लिया और

4:02

दाने ने लड़की को ऊपर निकाल लिया और दाना

4:05

पूछ रहा है कि पुत्री सत्य-सत्य बता तेरे

4:08

पास कौन है? तू अभी किससे बात कर रही थी?

4:11

कि नहीं पिताजी मेरे पास कोई नहीं है। इस

4:14

कुआं में मैं किससे बात करूंगी? मैं तो

4:16

केवल उसमें बैठी हुई थी। आपको भ्रम हो गया

4:18

है। परंतु श्रोताओं दाने को विश्वास नहीं

4:21

होता है और लड़की से कहता है कि बेटी यदि

4:24

तू सत्य है सच्ची है तो मुझे तब विश्वास

4:27

होगा तू गंगाजल ले आ। तू एक गंगी सागर में

4:30

जल भर के ला और गंगाजल उठा कि तेरे पास

4:33

कोई नहीं है। तो देखिए श्रोताओं राजा नल

4:36

बैना के ऊपर बैठा हुआ है और रानी गजमोतिन

4:39

से कह रहा है कि झूठी गंगाजल उठा जा नहीं

4:42

तो यह दाना मुझे छोड़ेगा नहीं मुझे खा

4:45

जाएगा। तू ही बचा सकती है मुझे तो। तो

4:47

देखिए जो गजमोतिन थी बड़ी समझदार लड़की थी

4:50

और वह अपने पिता को गंगाजल उठा रही है कि

4:53

मैं समझा रही तो और मैं और तू और मेरे सर

4:56

पर पति परमेश्वर हुए। जब इस तरीके से

4:58

गंगाजल उठाई तो दाना कहने लगा कि बेटी

5:01

केवल यहां मैं और तू है। यह तीसरा कौन आ

5:04

गया? इसे बता यह कहां है? इसी को तो खोज

5:07

रहा हूं। तो लड़की कहने लगी पिताजी एक तो

5:10

मैं हूं यहां और एक तुम हो। और देखिए जो

5:13

कुंवारी लड़कियां होती हैं जिनके विवाह

5:15

नहीं होते उनके तो पति परमेश्वर ही होते

5:18

हैं। तो दाने की समझ में आ गया कि मेरी

5:20

लड़की वास्तव में बड़ी समझदार है और अपनी

5:23

जगह पर सही है। तो दाना कहने लगा कि बेटी

5:26

जा तू मेरे यहां से बड़ी हुई मुझे क्षमा

5:29

कर दे। मैंने तुझे गलत समझा था। अब तू

5:32

आराम से जाकर के सो जा। अब श्रोताओं लड़की

5:34

अपने महल में बिस्तर पर आ जाती है। अपने

5:37

कक्ष में आ जाती है और चौक में दाना सो

5:39

जाता है। राजा नल मक्खी बना हुआ उसे

5:42

डिब्बी में बैठा है। प्रातः काल हुआ और

5:45

दाना बहुत जल्दी जंगल में चला गया। उसको

5:47

तो आखेट के लिए जाना होता था। अब लड़की ने

5:50

देखा कि दिना चला गया और नल बैठा था। राजा

5:53

नल को निकाला और दीवार पर रखा और पढ़कर

5:56

मंत्र गजमोतिन अपने राजा नल को ठीक कर

5:59

दिया। राजा नल के कहा कि गजमोतिन तेरे इस

6:02

पिता की मृत्यु कैसे होगी? कल पूछ ले तेरे

6:05

बाबा की गजमोतिन जो तेरा पिता है उससे तो

6:07

उसकी मृत्यु पूछ के वह कैसे मरेगा? नहीं

6:10

तो हम इस तरीके से कब तक रहेंगे और उधर

6:12

उसे मामाओं की चिंता सता रही थी। पन्नालाल

6:15

और फूलचंद समुद्र के तट पर बैठे हुए हैं।

6:18

दो दिन का समय निकल चुका है। अब तो मंत्र

6:20

पढ़कर के राजा नल ने गजमोतिन तैयार कर दी।

6:23

देखिए जहां तक कि संसार की कोई भी शक्ति

6:26

उसे हरा नहीं सकती है और तू मेरी जान

6:28

बचाओ। तेरे पिता को पूछ उसकी मृत्यु कैसे

6:31

होगी? तो यह बात सुनकर के गजमोतिन राजा नल

6:33

से कहने लगी ठीक है आज शाम को पिता को आने

6:36

दीजिए। तो जब शाम को दाना आया जब दाना आता

6:40

हुआ दिखाई दिया तो गजमोतिन ने मंत्र फूंका

6:42

और राजा नल को मक्खी बनाया और उसी डिब्बी

6:45

में बंद करके बैना में छिपा दिया। जब शाम

6:47

को दाने का वापस आया। दाना कहने लगा बेटी

6:50

मुझे बता तो सही क्या बात है? लड़की बहुत

6:53

रोई आंसू बहाने लगी। झूठ मांस के आंसू,

6:57

झूठ मूठ के आंसू क्योंकि उसे तो त्रियाजाल

7:00

फैलाना था। त्रियाजाल फैला के दाने से

7:02

कहने लगी जब तेने बरी करी मेरे बाबा जाके

7:06

अपने महल सोई और ऐसा स्वप्न आयो जाकर अपने

7:09

महल सोई और ऐसा स्वप्न देख बहुत रोई कि

7:12

मुझे जो स्वप्न आया मैं स्वप्न को देखकर

7:14

के बड़ी रोती हूं। तो दाना कहने लगा कि

7:16

बेटी क्या बात है? तो गजमोतिन कहने लगी

7:19

आयो एक बिन मूछन कौन पट्ठा जाके कंधा पर

7:22

हरो दुपट्टा कि हे बाबा एक ऐसा लड़का आया

7:25

16 17 वर्ष का युवक था और बड़ा सुंदर और

7:28

बड़ा सजीला था बाने केक देती तेरी पटिया

7:31

वाय देख फटी मेरी छातिया कि हे बाबा उसको

7:35

देख के मैं घबरा गई उसने तेरे दरवाजे की

7:37

पटिया को फेंक दिया बाबा लूं वनगो मेरी

7:40

सास को लाला और मैंने वा के बार दही

7:42

वरमाला कि हे बाबा अपने पिता से कह रही है

7:46

कि पिताजी उसके मैंने वरमाला डाल दी। मेरा

7:48

उसके साथ विवाह हो गया। और एक दूसरी बात

7:51

बाबा बाने बहुत बुरो करो। दाना कहने लगा

7:54

लड़की क्या किया कि पिताजी अब क्या बताऊं

7:57

मैं ना बोली वह नर ते और वा ने तेरे शीश

8:00

काट दिया धड़ ते कि बाबा मैंने तो उससे

8:03

बात भी नहीं की लेकिन उस लड़के ने तेरे सर

8:05

को धड़ से अलग कर दिया। तो दाना कहने लगा

8:08

कि बेटी चिंता मत कर। मुझे मिररने वाला

8:10

कोई नहीं है। लड़की कह रही है बाबा मैंने

8:12

एसो देखो सपनों और मोए किल बता दे अपनो कि

8:16

हे पिताजी मुझे तुम्हारा काल बताइए कि तुम

8:19

कैसे मरोगे क्योंकि मुझे बड़ी चिंता है।

8:21

जब से मैंने स्वप्न देखा है मुझे नींद

8:24

नहीं आती कल नहीं पड़ रही है। मेरी नींद

8:26

को चैन नहीं है। तो दाना उसकी त्रिया जाल

8:29

में फंस जाता है। अपनी पुत्री को पहचान

8:31

नहीं पाया। अब क्या असर होता अब देखिए।

8:34

दाना कहने लगा कि बेटी चिंता मत कर। मैं

8:37

किसी से आसानी से नहीं मर सकता। पिताजी

8:40

क्यों कि बेटी इस चौक में जिस किले में हम

8:43

रहते हैं पहले तो इसमें कोई प्रवेश नहीं

8:45

कर सकता। 100 मन की शिला इसके दरवाजे पर

8:48

लगी रहती है। और यदि कोई प्रवेश भी कर गया

8:50

तो इस चौक में सात कमरे बने हुए हैं। पहले

8:53

कमरे में मैंने चार दानों को बंद कर रखा

8:56

है। चार दाने हैं वह खा जाएंगे। और दूसरे

8:58

कमरे में तेरी माता हिडिंबा को बंद कर रखा

9:01

है। कैद कर रखा है। वह खा जाएगी। और तीसरे

9:03

कमरे में मैंने एक वीर वरण नामक घोड़ा है।

9:06

सूर्य का पुत्र है जो मनुष्य को खाता है

9:08

वह खा जाएगा। और चौथे कमरे में सात

9:11

मोतियों की माला है। उसके प्रकाश को कोई

9:14

सहन नहीं कर सकता। यदि चौथे कमरे को भी

9:17

पार कर गया तो नागराज बसुकी खा जाएगा और

9:20

यदि उससे आगे चला तो सातवें कमरे में बहुत

9:23

गहरी खाई है और उस खाई में पानी भरा हुआ

9:26

है। उसमें नाग बिच्छू कचरा न जाने कितने

9:30

प्रकार के जहरीले कीड़े-मकोड़े उसमें पड़े

9:32

हुए हैं और उसके बीच में एक अखा वृक्ष का

9:36

पेड़ है और उस वृक्ष पर एक पिंजरा है और

9:38

उस पिंजरा में एक बुगली है और उस बुगली

9:40

में मेरे प्राण हैं। जो कोई अपने हाथ में

9:43

पकड़ लेगा उस बुगली को मरेगा जो कम बुगली

9:45

के साथ करेगा वो मेरे साथ होगा। मेरा काल

9:48

वहां है बेटी और उस तक कोई आसानी से नहीं

9:51

पहुंच सकता। बहुत बड़ा संघर्ष करना पड़ेगा

9:53

और फिर मैं हूं। मेरे होते हुए कोई मेरे

9:56

क्षेत्र में भी प्रवेश नहीं कर सकता।

9:58

इसलिए पुत्री तू आराम से सो जाओ। बड़े

10:00

आराम से तसल्ली में रह। अब तो श्रोताओं

10:03

राजा नल कान से कुछ ऊपर बैठा हुआ सुन रहा

10:05

है और राजा नल सोच रहा है कि अब तो दाना

10:08

कहां जाएगा? श्रोताओं दाना कहने लगा कि

10:11

बेटी ध्यान से सुन कोई नहीं मार सकता

10:13

मुझे। केवल एक नरवर गढ़ नरेश राजा प्रथम

10:16

हुआ। राजा प्रथम की एक रानी होगी मांझा और

10:19

उसको वनवास दिया जाएगा और वन में एक नल

10:21

नामक पुत्र हुआ और वह मुझे मारेगा। तब

10:24

जाकर के बेटी मेरा अंत होगा और इसमें अभी

10:27

बहुत समय मुझे लगता है बाकी है। वह अभी

10:29

शायद पैदा नहीं हुआ होगा। श्रोताओं अपनी

10:32

पुत्री को समझा देता है और पुत्री को समझा

10:35

के आराम से चौक में सो जाता है। राजा नल

10:38

मन में सोच रहा है कि मैं ही मारूंगा।

10:40

गजमतनी कहने लगी चुप बैठा रह हल्ला मत

10:43

करे। नहीं तो यदि बाबा को पता चल ग तो

10:46

तीरो कलयुगो तू जिंदा नहीं बचेगा। तुझे खा

10:49

जाएगा। श्रोताओं अब सुनिए ध्यान से क्या

10:52

होता है। दाना आराम से सो जाता है चौक में

10:55

और जब दूसरा तीसरा दिन हुआ दाना जंगल को

10:57

चला जाता है। बनी को चला गया और राजा नल

11:00

चौक में आ जाता है और दाने की रखी हुई

11:02

तलवार को राजा नल खींच लेता है। अब

11:05

देखूंगा तेरे पिता को तो लड़की कहने लगी

11:07

वाह पहलवान तीन दिनाते डिब्बी में बंद है

11:10

और अब पहलवान बन रहा है नल। बोलो ठीक है

11:13

कोई बात नहीं। लेकिन मारूंगा तो मैं ही तो

11:15

लड़की कहती है ठीक है। लेकिन ऐसे नहीं मार

11:18

सकते। जाओ पहले कक्ष को खोलिए। श्रोताओं

11:21

जब राजा नल ने पहले कक्ष को खोला, पहले

11:23

कमरे को खोला तो पहले कमरे में चार दाने

11:26

मिले। चारों को प्रणाम करके चले गए। जब

11:29

राजा नल ने तीसरा कक्ष खोला तो तीसरे कक्ष

11:31

में सात धार की तेज मिली तलवार रखी हुई

11:34

थी। सात धार की तलवार को राजा नल ने उठा

11:37

लिया। क्योंकि उस तलवार को वरदान था कि

11:39

केवल राजा नल ही चला सकते हैं। चौथा कक्ष

11:43

खोला तो उसमें सात मणियों की माला राजा नल

11:45

को मिली। राजा नल ने माला को उठा लिया और

11:48

गले में धारण कर लिया। पांचवें कक्ष में

11:50

सूर्य का पुत्र वीरवरण नामक घोड़ा बंद था।

11:53

वीरवरण घोड़े ने राजा नल को देखते ही

11:55

पहचान लिया। उसे देवताओं का वरदान था कि

11:58

तेरे ऊपर केवल राजा नर ही सवारी कर सकते

12:00

हैं। कोई दूसरा सवारी नहीं कर सकता।

12:03

श्रोताओं राजा नल आगे और बढ़ जाते हैं। और

12:05

जब छठवां कक्ष खोला तो नागराज वसुकी कैद

12:08

थे। वसुकी को जैसे ही खोला गया तो राजा नल

12:11

पर बड़ी प्रसन्न हुए और अपना जो पगड़ी थी

12:14

अपनी उतार करके राजा नल के शीश पर रख दी

12:16

कि मैं तुझे पगड़ी पलटा यार बना लेता हूं।

12:19

पहले मेरी कैद छुड़ाई है और जहां तुझे

12:21

मेरा काम पड़ेगा मैं वचन निभाऊंगा। तुम

12:24

जहां मुझे स्मरण करोगे वहीं आ जाऊंगा।

12:26

श्रोताओं और जब सातवां द्वार कक्ष खोला तो

12:29

सातवें कक्ष में बहुत गहरी खाई बनी हुई

12:32

थी। तेज अंदर चल रहा था और उसमें एक वृक्ष

12:34

खड़ा हुआ था। परंतु राजा नल के साथ नागराज

12:38

थे। तो नागराज के प्रभाव से जितने भी

12:40

जहरीले जीव थे, वह सब उसको छोड़कर के चले

12:42

गए। राजा नल उस वृक्ष पर चढ़ गया। बुगली

12:45

का पिंजरा हाथ में ले लिया। पिंजरे को खोल

12:47

करके आ जाता है चौक में। गजमोतनी कहने लगी

12:50

कि देख मेरे पिताजी को पता चल गया होगा

12:52

क्योंकि इस बुगली में उसके प्राण बसते हैं

12:55

और मेरे पिताजी आने वाले होंगे तो जल्दी

12:57

से इसका अंत कर दें। तो यह बात सुनकर की

12:59

गजमतनी कहने लगी कि यदि उसके ह्थे चढ़ गया

13:02

तो कलयुग भी नहीं होगा। यह मानिए जैसे

13:04

नाश्ता किया पेट में चले जाएगा बचेगा

13:07

नहीं। जल्दी से इसकी गर्दन भी दे। राजा नल

13:10

ने गर्दन को भी तो दाने को भी महसूस हुआ

13:12

और दाना गिर पड़ता है। दाना खड़ा होता है

13:15

और गिर जाता है और राजा नल उस बुगली को भी

13:18

जा रहा है। श्रोताओं आगे का भाग कल आपकी

13:21

सेवा में प्रस्तुत करेंगे। यदि वीडियो

13:23

अच्छा लगा हो तो वीडियो को लाइक करें और

13:25

चैनल को सब्सक्राइब करें। धन्यवाद।

 

7.

 

नमस्कार दोस्तों। इस चैनल पर उपस्थित

0:03

समस्त श्रोताओं का, भक्तों का और

0:05

सब्सक्राइब बंधुओं का एक बार फिर से

0:08

स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है। श्रोताओं

0:10

हमारी कहानी चल रही थी नल पुराण इतिहास से

0:13

और उसके छह भाग मैं आपकी सेवा में

0:15

प्रसारित कर चुका था। खैर सातवां भाग आपकी

0:17

सेवा में लेकर के उपस्थित हूं। आइए

0:19

श्रोताओं आपका ध्यान मैं फिर सातवें

0:21

एपिसोड से जोड़ता हूं। मैंने छठवें एपिसोड

0:24

में आपको बताया था कि राजा नल ने जो दानव

0:26

के प्राण उस बुगली में थे उस बुगली का

0:28

पिंजरा ले लिया और उसे लेकर के दाने के

0:31

अतिरिक्त चौक में आ गए। बुगली लेकर मैदान

0:33

में आ गए और किले के चौक में खड़े हो जाते

0:36

हैं। गजमतिन दानव की पुत्री राजा नल के

0:38

साथ है और राजा नल से कह रही है कि तुम

0:41

जल्दी से इस बुगली को समाप्त कर दो। यदि

0:43

मेरे पिताजी को यह पता चला तो वह तुम्हें

0:46

जीवित नहीं छोड़ेंगे। तुम उनके पेट में

0:48

चले जाओगे। बच नहीं पाओगे। लेकिन राजा नल

0:50

कहता है कि ऐसे नहीं पहले उसे दरवाजे पर आ

0:53

जाने दो तब मारूंगा। मैं इस तेरे पिता का

0:56

वध अवश्य करूंगा लेकिन वह जंगल में पड़ा

0:58

रह जाएगा। मैं उसे वहां मारना नहीं चाहता।

1:01

यहां उसका अंतिम संस्कार करेंगे। उसे तब

1:04

यहां आ जाएगा तब मारेंगे। लेकिन गजमोतिन

1:07

उसे बार-बार समझाती है कि नहीं जल्दी से

1:09

इसका अंत कर दीजिए। श्रोताओं और राजा नल

1:12

ने उस बुगली के दोनों पैर तोड़ दिए तो

1:14

जंगल में ही दाने के दोनों पैर टूट जाते

1:16

हैं। क्योंकि जो बुगली के साथ होता था वही

1:19

उस दाने के साथ होता था। उस व्यक्ति के

1:21

साथ होता था। तो श्रोताओं जब राजा नल ने

1:23

बुगली के पैर तोड़े तो दाना लुढ़कना आरंभ

1:26

कर देता है और लुढ़कते- लुढ़कते अपने किले

1:29

के दरवाजे में आकर जाता है और दरवाजे पर

1:31

आया जोर से चिंघाड़ लगाई और कहने लगा कि

1:34

बेटी तुम कहां हो? लेकिन गजमोतिन ने जब

1:36

देखा कि उसका पिता घुमा व्यक्ति आ गया है

1:39

महल के दरवाजे पर तो गजमोतिन एक खंभ की ओठ

1:42

में छिप जाती है। राजा नल कहने लगा कि

1:44

गजमोतिन अब तुम्हें छिपने की आवश्यकता

1:47

नहीं है। अब तो इसकी मृत्यु मेरी मुट्ठी

1:49

में है। तो दाना राजा नल से कहने लगा बेटे

1:52

मैंने जानता था कि तुम जरूर आओगे और मेरा

1:55

वध करोगे। मेरी पुत्री का विवाह करोगे।

1:58

मेरी पुत्री का विवाह करोगे। मुझे भगवान

2:00

शंकर ने पहले ही बता दिया था और मैं इस

2:03

भ्रम में था कि अभी आपके जन्म और आपके

2:05

बड़े होने में अभी समय है। लेकिन मैं इस

2:07

जाल में फंस गया और मेरी पुत्री को मैंने

2:10

अपना काल बता दिया। पुत्री गजमोतिन तू

2:12

कहां है? मेरे सामने उपस्थित हो। राजा नल

2:15

उसे बुला रहा है। गजमोतिन कि तेरा पता है

2:18

अंतिम समय उसे देख लीजिए दर्शन कर लीजिए।

2:22

लेकिन गजमोतिन कहने लगी कि नहीं महाराज

2:24

नहीं राजन मैं बाहर नहीं आ सकती क्योंकि

2:26

मेरे पिता भगवान शंकर के वरदानी हैं और यह

2:29

कोई भी श्राप मुझे दे सकते हैं। तो देखिए

2:31

श्रोताओं राजा नल चौक में खड़ा है और दाना

2:34

किले का पक्ष लेकर बाहर दरवाजे पर पड़ा है

2:37

और गजमोतिन से कहता है कि आज गजमोतिन ने

2:40

मुझसे झूठी गंगा उठाई थी। तूने मुझे

2:42

बहकाया, मेरे साथ धोखा किया, मेरे साथ छल

2:46

किया। इसलिए मैं तुझे श्राप देता हूं कि

2:48

राजा नल भी तेरा नहीं होगा। जैसे पहले

2:51

तूने मुझसे दगा किया है, ऐसे ही यह राजा

2:53

नल भी धोखा करेंगे। तू मेरी नहीं हुई।

2:56

मैंने तुझे पालपस कर बड़ा किया है कि यह

2:58

राजा नल भी तेरा नहीं होगा। यह मेरा वरदान

3:01

है। और घुमासुर दानव कहने लगा बेटी ध्यान

3:04

से सुन से मेरी किस्मत पड़ गई हेटी और यह

3:08

मेरा है और यह मेरा है। शाप सुता तेरे हुए

3:11

ना बेटा बेटी कि तेरा वंश नहीं चलेगा।

3:14

तेरे उदर से कोई संतान की उत्पत्ति नहीं

3:16

होगी। पहले धोखे यह धोखे में फंसा करके

3:20

जाल में फंसा करके मेरा अंत करवाया है।

3:22

नहीं तो मैं इस नल पर आसानी से नहीं मर

3:25

सकता था। यदि तू मेरा कहा मानती तो मैं

3:28

तुम्हें तेरा विवाह आवश्यकता क्या देता

3:30

परंतु तूने तो मुझे मरवा दिया और भी धोखे

3:33

से। इसलिए तेरे कोई संतान पैदा नहीं होगी।

3:36

गजमोतिन कहने लगी कि मेरे पिताजी भगवान

3:38

शंकर के वरदानी हैं। महाराज तुम इस बुगली

3:41

की गर्दन क्यों नहीं मरोड़ देते? जिससे

3:43

जल्दी से इसका अंत हो जाएगा। श्रोताओं

3:45

गजमोतिन के कहने से राजा नल ने उस बुगली

3:48

की गर्दन मरोड़ दी और जैसे ही बुगली की

3:50

गर्दन मरोड़ी दानव घुमासुर धरती पर गिर

3:53

पड़ा लेकिन मृत्यु को प्राप्त नहीं हुआ मर

3:56

नहीं रहा है उस चल रहा है इसमें तो राजा

3:59

नल गजमोतिन से कहने लगा कि गजमोतिन मैंने

4:02

इस बुगली को मरोड़ दिया इसकी गर्दन को

4:04

मरोड़ दिया परंतु यह तुम्हारे पिता का अंत

4:06

क्यों नहीं हुआ तो गजमोतिन कहने लगी कि

4:09

नहीं महाराज यह ऐसे नहीं मर सकता यह भगवान

4:12

शंकर का वरदानी है और इसे मारने के लिए

4:15

तुम्हें नागोक जाना होगा। राजा नल कहता है

4:17

नागलोक नागलोक में कैसे जाऊंगा कि मेरे

4:20

पिता के जो सातवां कक्ष था जिसमें मेरे

4:23

पिताजी के प्राणों की बलि थी उस कक्ष से

4:25

नागलोक तक रास्ता जाता है। वहां से नागलोक

4:28

सीधे पहुंच सकते हैं। तुम्हारे पास मणियों

4:31

की माला है तो उस मणियों की माला को अपने

4:33

गले में धारण करो और उसके कक्ष में चले

4:36

जाइए और आप नागोक चले जाएंगे। वहां भगवान

4:39

शंकर की तपस्या करके नागराज की पुत्री

4:42

नागराज वासुकी की पुत्री के पास एक बाण था

4:45

जिससे मेरे पिता का अंत होना था। वज्रवाहन

4:48

नामक बाण था। उस वज्र बाण को वह नागराज की

4:51

सुता ले गई और वह तुम ला सकते हो। जब तक

4:54

वह बाण वहां से नहीं आएगा तब तक इसका अंत

4:56

हो नहीं सकता। तो देखिए श्रोताओं राजा नल

4:59

गजमोतिन के कहने से उस मणियों की माला को

5:02

धारण करते हैं और सातवें कक्ष के रास्ते

5:04

चले जाते हैं। उधर नागोक में नागराज

5:07

वासुकी की एक पुत्री थी जो जिसके नाम पर

5:10

नगमंती भगवान शंकर की आराधना कर रही थी और

5:14

उसे तीन जन्म व्यतीत हो गए आराधना

5:16

करते-करते कि मुझे पति के रूप में राजा नल

5:19

मिलना चाहिए। श्रोताओं अब आप सोच सकते हैं

5:22

कि उसने इसी बात पर तीन जन्म निकाल दिए कि

5:25

मुझे पति के रूप में राजा नल मिले। मैंने

5:27

तो वह भी उसमें बैठी हुई थी। भगवान शंकर

5:30

से बाण लेकर आई थी और भगवान शंकर ने कहा

5:33

था कि एक दिन इस बाण को लेने तेरे पास

5:35

राजा नल अवश्य आएगा। वह हुआ था तो उसे

5:38

वहां के लिए प्रस्ताव रख सकती है। अब

5:41

देखिए तो बताओ वह लड़की सो रही थी। वह बाण

5:43

उसके नीचे लगा हुआ था। और जैसे ही नागलोक

5:46

में पहुंच के नगमंती के नीचे से वह बाण

5:48

खींचा तुल नगमंती जाग जाती है। नगमंती जगी

5:52

राजा नल की तरफ देखने लगी और कहने लगी

5:55

सच-सच बताओ तुम कौन हो? क्योंकि इस बाण को

5:58

केवल राजा नल ही स्पर्श कर सकते हैं। यदि

6:00

कोई दूसरा व्यक्ति इसे स्पर्श करता तो

6:02

जलकर भस्म हो जाता। सत्य बताओ तुम कौन हो?

6:06

राजा नल कहने लगा कि मैं राजा नल हूं।

6:08

तुमने मुझे सही पहचाना। तो नगमंती कहने

6:11

लगी आप मुझसे विवाह कीजिए। तो राजा नल

6:13

कहने लगा विवाह मैं तुमसे विवाह कैसे कर

6:16

सकता हूं? मेरा विवाह तो दानव अभुमासुर की

6:19

पुत्री गजमोतिन के साथ हो रहा है और मैंने

6:22

दानव को मार दिया है और मैं तुम्हारे पास

6:24

यह अजवाइन नामक बाण लेने आया हूं। मुझे यह

6:27

बाण चाहिए। तो वह लड़की कहने लगी कि नहीं

6:30

बाण तो आप ले जाइएगी लेकिन मेरे साथ विवाह

6:33

करना होगा। राजा नल उसे मना कर देते हैं।

6:35

लड़की विवाह के लिए जिद करती है। लेकिन

6:38

राजा नल विवाह के लिए मना कर देते हैं। तो

6:40

देखिए श्रोताओं वह नगमंती बता रही थी।

6:43

उसने मंत्र अभिमंत्रित करके जल के छींटे

6:45

मारे और जल के छींटे जैसे ही दिए तो उसके

6:48

पूरे शरीर में अग्नि प्रज्वलित हो गई।

6:50

अग्नि जल से पूरे शरीर में से और जब अग्नि

6:53

जलने लगी तो राजा नल को श्राप देने लगी।

6:56

राजा नल को अपने श्राप दिया अरे भूलो ना

6:59

रहगो तेरो 12 बरस तक तेली के घर पर खावेगो

7:02

कर वचन सच्च चारों ओर तेरो मेरे संग होंगो

7:06

विवाह और गजमोतिन को छत से मारूंगी नाम

7:09

मेरो अभय है नगमंती और भीम नाम के घर जब

7:11

होंगो दमयंती अब तो नगमंती ने राजा नल को

7:15

श्राप दे दिया कि नल ध्यान से सुन मुझे

7:17

पता है तू मुझसे विवाह नहीं करेगा लेकिन

7:20

जिसके प्यार में तू पागल हो रहा है मैं

7:22

उसको महल से गिरा करके मार दूंगी छत से

7:25

गिरा करके मार कर दूंगी और तेरा मेरे साथ

7:27

विवाह होगा। मेरा नाम नागलोक में नगमंती

7:30

है। लेकिन मैं राजा भीम के यहां समद शिखर

7:33

के राजा भीम के यहां अवतार धारण करूंगी और

7:36

तब मेरा नाम दमयंती होगा और तू मेरे साथ

7:39

रहेगा। श्रोताओं जब राजा नल को श्राप दिया

7:42

तो नगमंती उससे कहने लगी कि नगमंती तेरा

7:44

पिता मेरा पगड़ी पलटाया बन गया और इसलिए

7:47

तू मेरी धर्म की पुत्री हुई क्योंकि तू

7:49

मेरे मित्र की पुत्री है मेरे यार की

7:52

पुत्री है और पता मैं तेरे साथ विवाह कैसे

7:54

कर लेता तो राजा नल की बात सुनकर के नगर

7:57

नगमंती शांत हो जाती है और अग्नि में

8:00

प्रज्वलित होकर के शरीर का त्याग कर देती

8:02

है। राजा नल वहां से उस अब वज्र बाण नामक

8:05

बाण को लेकर के चलते हैं और वापस आ जाते

8:08

हैं। दानव किले में आ जाते हैं और दाने के

8:10

किले में आकर के राजा नल ने बाण लिए अपना

8:13

अनुसंधान किया और धनुष पर वह निर्णय भगवान

8:16

शंकर का दिया हुआ बाण चढ़ाया उस बाण का

8:19

संधान किया और घुमासुर की छाती पर उस बाण

8:21

का प्रहार किया और जब वह बाण घुमासुर दाने

8:24

लगा तो घुमासुर की मृत्यु हो गई समाप्त हो

8:27

गया अब तो गजमोतिन रोने लगी राजा नल कहने

8:30

लगे कि गजमोतिन तुमसे हमने ही इसको मरवाया

8:33

है मेरी मदद की है अब रो क्यों रही हो तो

8:36

गजमोतिन कहने लगी कि महाराज आप जानते हैं

8:39

यह मेरे पिता हैं इसलिए मुझे रोना है तो

8:41

मुझे इसका दाह संस्कार करना होगा। दाने का

8:44

अंतिम संस्कार क्रियाकलाप करने के बाद

8:47

गजमोतिन राजा नल से कहने लगी कि देखिए

8:49

मेरा तेरा विवाह होगा। नल कहने लगा कि

8:52

विवाह कौन करेगा? अब मेरे साथ चलिए। अब

8:55

वहां अपने गांव में चलकर के विवाह कर

8:57

लेंगे। परंतु नहीं। गजमोतिन कहने लगी कि

9:00

ऐसे नहीं महाराज मैं बुलाती हूं ऋषि नारद

9:02

को और तुम बुलाइए तुम्हारी दिल माता को।

9:05

राजा नल ने ध्यान किया माता देवी चली जाती

9:08

हैं और गजमोतिन ने नारद मुनि का ध्यान

9:10

किया तो नारद मुनि चले जाते हैं और वह

9:13

माता का ध्यान किया तो वह माता चली नारद

9:15

मुनि आ गए और लड़का और लड़की गजमोतिन सती

9:18

और राजा नल दोनों को बैठा दिया गया अग्नि

9:21

के समक्ष। अब नारद मुनि भ्राहमण का कार्य

9:23

कर रहे हैं। फिर आप आ रहे हैं उन दोनों की

9:26

नल के और गजमोतिन की। तो नारद मुनि बड़े

9:29

विद्वान थे। नारद मुनि नल और गजमोतिन से

9:32

कहने लगे कि गजमोतिन मेरी बात ध्यान से

9:34

सुनो। मैं आज तुझे नल पुराण की कथा सुनाता

9:37

हूं और इस कथा को तेरे तेरे अलावा राजा नल

9:40

के अलावा कोई तीसरा व्यक्ति नहीं जानता और

9:42

या मैं जानता हूं मैं तो एक दिव्य लोक का

9:44

रहने वाला हूं। पृथ्वी लोक का कोई भी

9:46

व्यक्ति इस कथा को नहीं जानता है। केवल

9:48

राजा नल और तुम ही दो ऐसे हैं जो इस कथा

9:51

को सुन रहे हैं। तो श्रोताओं नारद जी

9:53

गजमोतिन को संपूर्ण नल पुराण की कथा सुना

9:56

दी। कैसे राजा नल का जन्म हुआ? कैसे

9:58

बनियों के यहां रहा वो? संपूर्ण कथा राजा

10:01

नल की जो थी नारद मुनि गजमोतिन को सुना

10:03

दी। अब गजमोतिन एवं कथा सुनी नारद जी कहने

10:07

लगे गजमोतिन अपनी इस कथा को भूल मत जाना

10:09

और मैं यह कह रहा हूं कि इसको नल के अलावा

10:11

कोई नहीं जानता है। यह तेरे काम की है।

10:14

इसे याद रखना। श्रोताओं इधर क्या होता है?

10:16

देव ऋषि नारद ने उनकी भावनाएं डाल दी। सात

10:19

फेरे डाल दिए और उनका विवाह हो गया था।

10:22

विवाह होने के बाद जो सात धार का खड़ा सात

10:25

मणियों की माला भीड़, वर घोड़ा और जो दाने

10:28

के किले में जो स्वर्ण मुद्राएं और स्वर्ण

10:30

से बने हुए आभूषण थे वह समस्त आभूषण राजा

10:33

नल को दान में दे दिए। अब देखिए जो विवाह

10:35

होने के बाद देव ऋषि नारद है। माता और

10:38

देवी माता तो चली जाती है। अंतर्धान हो

10:40

जाते हैं। उन समस्त देवताओं के जाने के

10:42

बाद राजा नल वीरवर घोड़े को बुलाया। वीरवर

10:45

घोड़ा आ जाता है जो कि वीरवर घोड़ा भगवान

10:48

सूर्य का पुत्र था। जल, थल, गगन तीनों में

10:51

समान गति से चल सकता था और राजा नल चलने

10:54

को तैयार हो जाता है। सात धार की तलवार ले

10:56

ली। मां भवानी की अक्षय धी है और जब बैठने

11:00

को तैयार हुआ तो बीरबल घोड़ा कहने लगा कि

11:02

देख राजा नल मैं क्षत्रिय हूं। मेरा यह

11:05

धर्म रहा है कि मैंने आज तक स्त्री जाति

11:07

को अपनी पीठ पर नहीं बैठाया है। हालांकि

11:09

गजमोतिन मेरी पुत्री के समान है क्योंकि

11:11

मैं दानव की कैद में था और यह तभी से इसका

11:14

जन्म हुआ था। इसकी माता भी खैर न थी जो

11:17

स्वर्ग को चले गई। इसलिए यह मेरी पुत्री

11:19

है। परंतु फिर भी स्त्री है। मैं इसे अपनी

11:22

पीठ पर नहीं बैठूंगा। तो गजमोतिन कहने लगे

11:24

बस महाराज यह छोटी सी बात है। तो अपना

11:26

धर्म निभा चलिए। मैं तुमसे पहले पहुंच रही

11:29

हूं। तो आप जानते हैं मैंने बताया था आपको

11:31

कि गजमोतिन के समान जादू में इस संसार में

11:33

और कोई नहीं था। परम जादूगरनी थी गजमोतिन।

11:36

राजा नल तो घोड़े पर सवार होकर चलता है और

11:39

गजमोतिन एक चील का रूप धारण करती है और

11:41

राजा नल से पहले समुद्र तट पर पहुंच जाता

11:44

है। राजा नल बीच समुद्र के तट पर पहुंच

11:46

जाता है और अपने मामाओं से मिलता है। अब

11:48

देखिए श्रोताओं राजा नल अपने मामा के पास

11:51

आया तो वह मामा बड़े खुशी हुए। कहने लगे

11:54

कि यह घोड़ा और यह औरत इतनी सुंदर नारी तू

11:56

कहां से ले आया है? तो राजा नल उनको सब

11:58

कुछ बता देता है। श्रोताओं अब यहां से आगे

12:01

की कथा कल के वीडियो में आपकी सेवा में

12:03

लेकर के उपस्थित हो जाऊंगा। तब तक के लिए

12:05

जय हिंद, जय

 

 

8.

नमस्कार दोस्तों इस चैनल पर उपस्थित समस्त

0:03

श्रोताओं का भक्तों का और सब्सक्राइब

0:06

बंधुओं का एक बार फिर से स्वागत और

0:08

हार्दिक अभिनंदन है। श्रोताओं जैसा कि आप

0:11

जानते हैं हमारी कहानी चल रही थी नल पुराण

0:14

इतिहास में से और उस नल पुराण इतिहास के

0:18

सात भाग मैं आपकी सेवा में प्रसारित कर

0:20

चुका था और आठवां भाग आपकी सेवा में लेकर

0:24

के उपस्थित हूं। तो देखिए आपका ध्यान मैं

0:27

वापस उसी सातवें भाग पर ले आता हूं जिस

0:30

सातवें भाग में मैंने बताया कि राजा नल का

0:33

विवाह हो जाता है गजमोतिन के साथ और राजा

0:37

नल को वीरवरण नामक घोड़ा मिल जाता है सात

0:40

धार की कलवारे से मिल जाती हैं और नारद

0:44

मुनि विद्या की पोथी मिल जाती है और नारद

0:47

जी ने नल पुराण सुना दिया नल के लिए और

0:49

गजमतिन के लिए अब देखिए श्रोताओं कि जब

0:53

विवाह हो गया तो दोनों घोड़े पर बैठने के

0:56

लिए तैयार हो जाते हैं। लेकिन घोड़ा

0:59

गजमोतिन को बैठाने से मना कर देता है।

1:01

इंकार कर देता है। तो राजा नल घोड़े पर

1:05

बैठकर चल देता है। और गजमोतिन के समान उस

1:08

समय संसार में कोई भी जादूगर नहीं था। वह

1:11

महान जादूगरनी की समस्त विद्याओं की

1:14

ज्ञाता थी। तो एक चील का रूप धारण किया और

1:18

आकाश मार्ग से राजा नल से पहले पहुंच जाती

1:21

है समुद्र के तट पर। और जब राजा नल समुद्र

1:24

के तट पर पहुंचते हैं तो गजमती नीचे उतर

1:28

जाती है और अपना मूल रूप धारण कर लेती है।

1:32

परम सुंदरी थी गोद में श्रोताओं अप्सराओं

1:35

के समान सुंदर थी क्योंकि दाने की पुत्री

1:38

थी। अब देखिए जब वह वहां पन्नालाल और

1:42

फूलचंद सेठ मिले तो राजा नल से पूछने लगे

1:46

अरे मोचरी क्या गोट ले आया? तो राजा नल

1:49

कहने लगा कि मामा मोचरी नहीं मैं उनके

1:52

पहनने वाली लाया हूं। राजा नल की बात

1:55

सुनके दोनों कहने लगे कि यह कौन है? तू इस

1:59

लड़की को कहां से लाया है? यह लड़की इतनी

2:02

सुंदर है। इसको यह बता तू इसको कैसे ले

2:06

आया? और यह कौन की लड़की है? इसका क्या

2:08

पता बताएं? तो राजा नल अपने मामाओं को बता

2:11

रहा है उस लड़की के बारे में। अरे बेटी तो

2:14

घुमासुर की लाो भवरिया मामा डार। दानो

2:17

मैंने मार दियो है डट डट के बजाई तलवार

2:20

वाई को लायो घोड़ा वाई की लायो तलवार नाम

2:23

याको है गज मोतिन माला डारिए यानी मेरी

2:26

नार यह घुमासुर नामक दाने की पुत्री है यह

2:30

एक सुंदर भव्य महल में रहा करती थी वहीं

2:33

भगवान शिव का वरदानी दाना रहा करता था

2:36

दैत्य रहा करता था उस दैत्य को मैंने मार

2:39

दिया है और उसी दैत्य की यह पुत्री है

2:43

इसने मेरे साथ विवाह कर लिया मेरे गले में

2:45

इसने माला डाल दी है मामाओ और उसी दाने का

2:48

यह वीरवरण नामक घोड़ा है। यह जल, थल, गगन

2:52

तीनों में समान गति से चल सकता है। और उसी

2:55

दाने की यह अक्षय भारतीय तलवार है। सात

2:58

धार की है। इसमें इसको इधर से आप चला दोगे

3:01

उधर ही यह शत्रु का विनाश करने में सक्षम

3:04

है। यह दाने को मार करके यह वस्तुएं मैंने

3:07

प्राप्त की हैं। अब देखिए श्रोताओं जब

3:11

राजा नल उन मामाओं की खातिर अपने प्राण

3:14

दांवकर लगा करके उनके साथ आ जाए उस विकट

3:17

वन में गया और उस विकट वन में से 16 गोटों

3:20

को इकट्ठा किया। गजमतीन से विवाह किया और

3:24

दाने को मारा। वो मामाओं की रक्षा के लिए

3:26

ही तो आया था। और वह मामा उसके बारे में

3:29

क्या सोच रहे हैं? पन्नालाल कहने लगा

3:32

फूलचंद से कि इसको जब हम लेकर के चलेंगे

3:35

तो इससे इस पर बैठकर के मार देंगे और जहां

3:39

से धक्का मारेंगे जहाज बीच समुद्र में

3:42

होगा तब ताकि इसका कोई पता ही नहीं चलेगा

3:45

और यह समुद्र में मर जाएगा और यह जो लड़की

3:48

है इसे हम लेंगे और इसे महाराज की सेवा

3:52

में भेंट कर देंगे। अब दोस्तों दोनों

3:54

बनिया के मन में बेईमानी आ जाती है।

3:57

पन्नालाल और फूलचंद अनिष्ट कर्म करने के

4:00

लिए तैयार हो जाते हैं। उद्यत हो जाते हैं

4:04

अपने भांजे धर्म के भांजे बाजा नल को

4:06

मारने के लिए। अब देखिए श्रोताओं बनियों

4:10

ने बुद्धि से काम लिया। राजा नल को बहकाया

4:13

और कहा बेटे बहुत अच्छा किया। इस लड़की को

4:16

ले चलिए और इन गोटों को हमें दे दीजिए।

4:19

श्रोताओं राजा नल ने जो घोड़ा था वह जहाज

4:23

में बैठा दिया। गजमुतिन जहाज में बैठ गई

4:26

और राजा नल से कहने लगे दोनों सेठ

4:29

पन्नालाल और फूलचंद कि बेटे तू हमारे पास

4:32

आजा। तू वहां मत सो पीछे जहाज में। हमारे

4:35

पास में सो क्योंकि जब हम तुझे नहीं देखते

4:38

हैं तो हमें तेरे देखे बिना तसल्ली नहीं

4:41

आती। हमें कल नहीं पड़ती है क्योंकि हम

4:44

तुझे निहारते रहना चाहते हैं। बनियों के

4:47

मन की जो बेईमानी है जो घात लगाकर बैठे उस

4:51

घात को करने के लिए पन्नालाल और फूलचंद

4:54

दोनों राजा नल को बहला लेते हैं। राजा नल

4:57

विश्वास कर लेता है मामाओं का क्योंकि

4:59

राजा नल उन्हीं के यहां बड़ा हो रहा था।

5:02

उन्हीं ने उसका पालन पोषण हुआ था। अब

5:05

देखिए श्रोताओं जहाज चला जा रहा है।

5:08

रात्रि का वक्त है। पन्नालाल फूलचंद के

5:12

पास राजा नल सोता हुआ है और गजमोतिन भी सो

5:15

जाती है और घोड़ा को भी नींद आ जाती है।

5:18

अब देखिए क्या होता है श्रोताओं। पन्नालाल

5:21

फूलचंद से कहने लगा जब समुद्र का बीज आ

5:24

गया कि फूलचंद इसको जगा तो दोनों ने राजा

5:28

नल को जगा लिया। राजा नल से कहने लगे बेटे

5:30

आप सो रहे हैं और हमें तो आपसे कुछ पूछना

5:33

चाहते हैं कि आपने भगवान शंकर के वरदानी

5:37

उस दैत्य को कैसे मार दिया। हम तो आपसे

5:39

बात करने के प्रयास में थे लेकिन आप तो सो

5:42

गए पुत्र बैठा हो जाए। राजा नल श्रोताओं

5:46

बैठे हो जाते हैं। परंतु नींद आ रही थी।

5:49

तो नींद में आप जानते हैं कि आधा अधूरा

5:51

होश रहता है। राजा नल से पन्नालाल और

5:54

फूलचंद कहने लगे बेटे समुद्र से पानी लेकर

5:57

के मुंह धो लीजिए। और तब हमारे पास बैठिए।

6:01

अब देखिए श्रोताओं राजा नल जब जहाज के उस

6:04

आगे तख्ते पर आया समुद्र में से पानी लेने

6:08

के लिए लपका नीचे की तरफ झुका तो बनिया ने

6:12

समुद्र में धक्का मार दिया और राजा नल

6:15

जहाज से गिरा और समुद्र में गया। देखिए

6:18

जहाज को बनिया तो आगे ले जाते हैं बढ़ा

6:21

करके और इधर क्या होता है? कुछ देर बाद

6:24

गजमतिन जगी तो वह अपने घोड़ा से पूछने लगी

6:28

कि घोड़ा कि हां बता बहन क्या बात है

6:31

क्योंकि घोड़ा गजमोतिन को अपनी बहन मानता

6:33

था कि आज मेरा कुछ श्रृंगार और खराब हो

6:37

रहा है। मेरे कुछ अपशकुन हो रहे हैं। क्या

6:40

कारण है? कहीं महाराज नल मुझे दिखाई नहीं

6:43

दे रहे। तो इस बात को सुनकर के घोड़ा कहने

6:46

लगा कि देखिए बहन मैं तो सो गया था। मैं

6:49

परेशान था और मैं सो रहा हूं इसलिए मुझे

6:52

कोई पता नहीं है। तो एक बात मैं आपको और

6:55

बताना चाहूंगा जो पतिव्रता स्त्रियां होती

6:58

हैं। जब उनका पति किसी संकट में होता है

7:01

तो उनके अपशकुन होने लग जाते हैं। अब तो

7:04

गजमतिन के दाहिने अंग फड़कने लगे। अब

7:07

देखिए गजमोतिन मन में विचार कर रही है कि

7:10

आज क्या हुआ? तो गजमोतिन के माथे की बिंदी

7:13

गिर गई और जो स्त्रियों के शकुन होते हैं

7:16

वह सभी शकुन बिगड़ने लगे क्योंकि राजा नल

7:19

उस समुद्र में गिर गया। अब देखिए श्रोताओं

7:22

गजमोतिन खड़ी हो जाती है और पन्नालाल और

7:25

फूलचंद के पास आ जाती है और उससे पूछने

7:28

लगी कि मामा मेरे पति कहां हैं? मुझे

7:31

बताइए मैं उनके दर्शन करना चाहती हूं।

7:34

मुझे उनके देखे बिना कल नहीं पड़ रही है।

7:36

तो बनिया बड़े चालाक थे। कहने लगे मेरी

7:39

पीठ पीछे दूसरा जहाज आ रहा है। हमारे पास

7:42

ज्यादा माल था इसलिए हम दोनों इस जहाज में

7:45

आ गए और हमने बेटे नल को पीछे की जहाज में

7:48

भेज दिया है। वह जहाज को लेकर के आ रहा

7:51

है। उसके पास में काफी इंतजाम है। कई

7:54

व्यक्ति उसके साथ है। बहुत माल भरा हुआ है

7:57

उसमें और उस जहाज को लेकर के आ रहा है।

8:00

जहाज थोड़ी दूरी पर है। बस हमारे साथ ही आ

8:03

जाएगा। और देखिए श्रोताओं बनिया तो उसको

8:07

ले जाते हैं अपने घर बनिया जहाज को ले आए

8:10

और जो गजमोतिन घोड़ा और सात मणियों की

8:13

माला थी उन्हें लेकर के पहुंच जाते हैं

8:16

दक्षिणपुर। श्रोताओं गजमोतिन ने यह पूछने

8:20

की भरसक कोशिश की। परंतु बनिया थे चालाक

8:23

थे। बहका दिया गजमोतिन को कि पीछे की जहाज

8:26

को लेकर आ रहा है तेरा पति। हमारा भांजा

8:29

भी आता ही होगा। चलो बेटी चलो चलो। और

8:32

बनिया बहकाकर गजमोतिन को दक्षिणपुर ले आते

8:35

हैं। श्रोताओं दक्षिणपुर में गजमोतिन आई

8:38

आती है। गजमोतिन ने जब वहां देखा तो अपनी

8:42

सास के पास चली जाती है। एक बनिया तो उसे

8:45

जाने नहीं देना चाहता था। गजमतिन ने मंज

8:48

रानी के चरण पकड़ लिए और मंज रानी से कहने

8:51

लगी कि मुझे तो कुछ ऐसा लगता है कि इन

8:54

बनियों ने मेरे पति के साथ और तुम्हारे

8:56

पुत्र के साथ कुछ धोखा कर दिया है।

8:59

श्रोताओं गजमतिन के कहने पर मंज रानी ने

9:01

पन्नालाल और फूलचंद को पूछा लेकिन दोनों

9:04

ने गजमोतिन को और मंज रानी को बहका दिया।

9:07

मंज रानी से कहने लगे मेरी बहन पीछे दौड़ा

9:10

आ रहा है और उसमें तेरा पुत्र आता ही

9:13

होगा। श्रोताओं मंजा तो समझ गई कि मेरा

9:17

पुत्र इस दुनिया में जीवित नहीं है।

9:19

इन्होंने धोखा किया है और गजमोतिन भी यह

9:22

बता रही थी कि मुझसे विवाह करके मेरे पिता

9:25

का वध करने के बाद हम जहाज में बैठ गए और

9:28

उसके बाद मैंने मेरे पति को नहीं देखा।

9:31

देखिए श्रोताओं वीडियो काफी लंबा हो गया

9:34

है कि राजा नल कैसे फिर गजमतिन से मिलेगा

9:37

और समुद्र में किस तरीके से जीवित बचेगा।

9:40

अब मैं यह वीडियो यहीं समाप्त करता हूं।

9:42

जब तक के लिए जय हिंद जय

9.

नमस्कार दोस्तों इस चैनल पर उपस्थित समस्त

0:02

श्रोताओं का भक्तों का और सब्सक्राइब

0:04

बंधुओं का एक बार फिर से स्वागत और

0:06

हार्दिक अभिनंदन है। श्रोताओं जैसा कि आप

0:09

सब जानते हैं हमारी कथा चल रही थी नल

0:12

पुराण इतिहास में से और उसके मैं आठ

0:14

एपिसोड आपकी सेवा में प्रसारित कर चुका था

0:17

और नवां एपिसोड आज आपकी सेवा में लेकर के

0:20

आज फिर उपस्थित हूं। तो मैं आपका ध्यान एक

0:22

बार आठवें भाग से जोड़ता हूं और आठवें भाग

0:25

में मैंने आपको बताया था कि जब राजा नल गज

0:28

मोतिन को लेकर के अपने मामा के पास आता है

0:31

पन्नालाल और फूलचंद के पास आता है तो वह

0:34

दोनों डर जाते हैं और राजा नल को वह जहाज

0:37

में बैठा लेते हैं और जहाज में से जगाकर

0:39

समुद्र में धक्का मार देते हैं। राजा नल

0:42

तो समुद्र में गिर जाता है और गजमोतिन को

0:45

बहका करके ले जाते हैं। जब दक्षिण पूर्व

0:47

में गजमोतिन रानी मंजा के पास चली जाती है

0:50

और मंजा रानी और गजमोतिन दोनों आपस में

0:53

विचार विमर्श कर रही हैं तो देखिए

0:55

श्रोताओं आगे क्या होता है। आज के वीडियो

0:58

में मैं आपको इसे बहुत आगे बढ़ाने की

1:00

कोशिश करूंगा। मंजा रानी और गजमोतिन दोनों

1:03

विचार विमर्श कर रही हैं और पन्नालाल और

1:06

फूलचंद ने कह दिया कि पीछे एक जहाज आ रहा

1:09

है और उस जहाज में स्वयं हमारा भांजा नल

1:12

लेकर के आ रहा है। उस जहाज में ज्यादा

1:14

सामान है और अधिक सामान के कारण उसे

1:17

ज्यादा समय लग सकता है। अब देखिए मंजा

1:19

रानी को यह विश्वास नहीं होता है और

1:22

गजमतिन को भी विश्वास नहीं होता है। गज

1:24

मोतिन का जो श्रृंगार था वह श्रृंगार करती

1:27

है लेकिन श्रृंगार रुकता नहीं है। खराब हो

1:29

जाता है। बिंदी गिर जाती है, जुड़ा खुल

1:32

जाता है और जो भी नारियों के श्रृंगार

1:34

होते हैं, वह श्रृंगार दूर हो जाते हैं।

1:37

तो गजमोतिन समझ जाती है कि मेरे पति अब इस

1:39

दुनिया में जीवित नहीं है। अब श्रोताओं

1:42

पन्नालाल और फूलचंद ने एक षड्यंत्र रचा और

1:46

षड्यंत्र रच करके मंजा रानी से कहने लगे

1:48

कि देखिए बहन नरवरगढ़ में एक बहुत विशाल

1:51

मेले का आयोजन किया जा रहा है। और हमारी

1:54

यह भांजी वधू गज मोतिन इसका मन नहीं लग

1:56

रहा है यहां। और अभी से नल को आने में समय

1:59

लग सकता है। दो-चार पांच दिन लग सकते हैं।

2:02

और आज हम इसे मेला दिखाने के लिए नरवरगढ़

2:05

ले जाते हैं। मंज रानी नरवरगढ़ का नाम

2:08

सुनते ही डर जाती है कि यदि राजा को मेरा

2:10

पता चल गया कि मैं जीवित हूं तो महाराज

2:13

मुझे जीवित नहीं छोड़ेंगे। इसलिए गजमतिन

2:15

को मंज रानी चुपचाप भेज देती है। मंजा उसे

2:18

कुछ नहीं कहती है। सेठों ने एक रथ तैयार

2:21

किया। उसमें गजमतिन को बैठाया। अपनी

2:24

पत्नियों को तैयार किया और उन सबके साथ

2:26

गजमतिन को लेकर के ले जाते हैं नरवरगढ़।

2:29

नरवरगढ़ में राजा प्रथम का दरबार लगा हुआ

2:32

था। श्रोताओं गजमोतिन यह नहीं जानती थी।

2:35

गजमोतिन सेठों के बहकावे में आ गई और सोच

2:38

रही थी कि मैं मेला देख करके वापस लौट

2:40

दूंगी। अब राजा प्रथम के राजमहलों के

2:42

सामने रथ को रुकवा दिया था। राजा प्रथम के

2:45

राजमहलों के सामने रथ को रुकवा दिया और गज

2:48

मोतिन को और 16 गोटों को लेकर पन्नालाल और

2:51

फूलचंद गज मोतिन के साथ पहुंच जाते हैं

2:53

महाराज प्रथम के दरबार में जहां महाराज

2:56

वीरसेन साथ के सिंहासन पर विराजमान है और

2:59

उनका दरबार भरा हुआ है और तभी उनके दरबार

3:02

में सेठों ने जाकर के प्रणाम किया और जब

3:04

सेठों ने प्रणाम किया तो राजा प्रथम अधिक

3:07

मुस्कुरा करके राजा प्रथम कहने लगे कि

3:09

सेठों मैंने तुमसे 16 गोट मंगाई थी। क्या

3:12

ले आए? पन्नालाल और फूलचंद कहने लगे

3:15

महाराज आपने तो हमसे गोट और मोचरी मंगाई

3:18

थी परंतु हम तो उसके पहनने वाली भी अपने

3:21

साथ में लाए हैं। श्रोताओं राजा प्रथम ने

3:23

जब गजमोतिन का चंद्रमा के समान चेहरा देखा

3:26

तो राजा प्रथम बड़े प्रसन्न होते हैं और

3:28

मन में विचार करने लगे कि ऐसी सुंदर रानी

3:31

तो मैंने आज तक नहीं देखी। मेरे महलों में

3:34

कोई भी पटरानी ऐसी नहीं है। मेरी मंजा

3:36

रानी भी इतनी सुंदर नहीं है। राजा प्रथम

3:39

मन में विचार कर रहा है और सेठों ने

3:41

गजमोतिन को महाराज के दरबार में खड़ा कर

3:44

दिया है। राजा प्रथम गजमोतिन से पूछने लगे

3:46

कि लड़की तू कौन है और कहां से आई है?

3:49

क्या तुझे हमारे महलों में रहना है? तो

3:51

गजमोतिन कहने लगी कि देखिए महाराज मैं

3:54

नहीं जानती कि आप कौन हैं। परंतु राजन

3:57

मेरा आपसे अनुरोध है। मेरा आपसे निवेदन है

4:00

कि महाराज मैं एक शर्त पर ही आपके महलों

4:02

में रहूंगी जब आप मुझे नल पुराण इतिहास

4:05

कथा को सुना देंगे। नल पुराण की कथा खुलवा

4:08

देंगे। क्योंकि मैंने आपको पहले ही बताया

4:10

था नारद जी ने जब फेरे डाले थे विवाह हुआ

4:13

था उस समय गजमोतिन और राजा नल को नल पुराण

4:16

कथा सुनाई थी। केवल वही व्यक्ति ऐसे थे

4:19

संसार में जो नल पुराण की कथा को जानते

4:22

थे। इसलिए गजमोतिन कहने लगी कि महाराज मैं

4:25

आपके महलों में अवश्य रहूंगी। परंतु तब जब

4:28

आप मुझे नल पुराण कथा सुनी देंगे अन्यथा

4:31

मैं तुम्हारी पुत्री और तुम मेरे धर्म के

4:33

पिता। यह बात सुनकर के वीरसेन गजमोतिन के

4:36

प्रस्ताव को मान लेते हैं। जब यदि मैं नल

4:38

पुराण खुलवा दूंगा तो कि महाराज फिर मैं

4:41

आपके महलों में आप कहेंगे इस तरीके से

4:44

रहूंगी। अब तो श्रोताओं सेठों ने गजमोतिन

4:46

को राजा प्रथम के हवाले कर दिया। राजा

4:49

प्रथम को दे दिया। 16 गोटों को दे दिया और

4:51

मोचरी को दे दिया। और सेठ राजा प्रथम से

4:54

इनाम लेकर के शहर दक्षिण पूर्व आ जाते

4:56

हैं। मंजा रानी को बहका दिया कि देखिए बहन

4:59

तुम्हारी लड़की जो तुम्हारी पुत्रवधू थी

5:01

वह तो वहीं महाराज प्रथम के दरबार में है।

5:04

अब तो मंजा रानी और भी घबरा जाती है कि

5:06

महाराज को यह पता नहीं है कि वह मेरी

5:09

पुत्रवधू है और ना जाने राजा का मूड उल्टा

5:12

होता है। महाराज कुछ गलत ना कर बैठे। अब

5:14

देखिए श्रोताओं राजा प्रथम ने जब उस

5:17

चंद्रमा के समान बड़ी सुंदर लड़की को देखा

5:19

गज मोतिन को देखा जिसकी हंस के समान गर्दन

5:22

है चंद्रमा के समान गोरा मुखड़ा उसको

5:25

देखकर के राजा प्रथम उस पर आसक्त होने लगे

5:28

और उन्होंने अपने राज्य में डोरा पिटवा

5:30

दिया कि कोई भी विद्वान ब्राह्मण मेरे

5:33

यहां उपस्थित होकर के नल पुराण इतिहास की

5:36

कथा सुनाएगा हम उसे मुंह मांगा इनाम

5:38

देंगे। जो वह मांगेगा उसे वही इनाम देंगे।

5:41

क्योंकि राजा प्रथम के कोई पुत्र या संतान

5:43

नहीं थी। राजा प्रथम तो इस भरोसे में है

5:46

कि उनके कोई संतान नहीं है और हो सकता है

5:49

इस रानी के गर्भ से कोई संतान हो जाए।

5:51

इसलिए राजा प्रथम उससे विवाह करने के लिए

5:54

आतुर है और उन्होंने ब्राह्मणों को

5:56

आमंत्रित करवा दिया। अब देखिए श्रोताओं एक

5:59

से एक विद्वान ब्राह्मण राजा प्रथम के

6:01

दरबार में आने लगे और राजा प्रथम विद्वान

6:04

ब्राह्मण का सम्मान करते हैं और उन्हें एक

6:06

मंच बैठवा मंच बनवा दिया। उस मंच के सामने

6:09

रानी गजमोतिन बैठ जाती है और कुछ दरबारी

6:12

बैठ जाते हैं और साथ में कुछ रानियां बैठ

6:15

जाती हैं और नल पुराण की कथा कोई ब्राह्मण

6:18

जो आता वह कुछ अलग ही सुनाते क्योंकि नल

6:21

पुराण की कथा तो केवल राजा नल ही सुना

6:23

सकते थे या स्वयं गज मोतिन सुना सकती थी

6:26

और कोई तीसरा आदमी ऐसा था नहीं कि जो नल

6:29

पुराण की कथा जानता हो या स्वयं देव ऋषि

6:31

नारद सुनाए और नारद तो पृथ्वी लोक में

6:34

आएंगे भी क्यों इसलिए राजा प्रथम ने

6:36

अलग-अलग ब्राह्मणों को बुलाया कोई कोई कथा

6:39

कह जाता, कोई किसी की कथा कह जाता, कोई

6:42

किसी राजा की कथा कह जाता, कोई भगवान की

6:44

कथा कह जाता। लेकिन नल पुराण की कथा किसी

6:47

भी विद्वान से नहीं सुनाई गई। इस तरीके से

6:50

राजा को रोजाना एक ब्राह्मण बुलाना होता

6:52

था और वह ब्राह्मण कोई ना कोई कथा सुनाता

6:55

और गजमोतिन उसे मना कर देती कि यह नल

6:58

पुराण की कथा नहीं है। नल पुराण की कथा जो

7:00

सुना देगा तभी मैं विवाह करूंगी। चाहे

7:03

हमें कितना ही समय व्यतीत हो जाए। मैं

7:05

आपसे विवाह नहीं कर सकती। राजा वीरसेन

7:08

बड़े लालायत थे गजमोतिन के साथ विवाह करने

7:10

के लिए परंतु बहुत बड़ी शर्त के अधीन बन

7:13

गई। अब वह विवाह नहीं कर सकते जब तक कोई

7:15

नल पुराण की कथा नहीं सुनाएगा तब तक

7:18

गजमोतिन महाराज प्रथम से विवाह नहीं करती।

7:20

तो राजा ने देश विदेश में सूचना भिजवा दी

7:23

कि कोई भी विद्वान ब्राह्मण नल पुराण की

7:26

कथा सुनाए उसे मुंह मांगा इनाम दूंगा और

7:28

आधा राज्य भी दूंगा। बहुत बड़ी-बड़ी

7:31

घोषणाएं राजा प्रथम ने की। परंतु कोई

7:33

ब्राह्मण जानता ही नहीं था। इसलिए कोई भी

7:36

ब्राह्मण नल पुराण की कथा नहीं सुना पाया।

7:39

अब देखिए श्रोताओं इधर तो राजा प्रथम ने

7:41

रोजाना सिलसिला जारी कर दिया। ब्राह्मण

7:43

महाराज के दरबार में आता और नल पुराण के

7:46

बहाने कोई दूसरी कथा सुनाता और गजमोतिन

7:49

उसे मना कर देती थी। यह कथा नल पुराण की

7:51

नहीं है और वह ब्राह्मण लौट जाता। यही

7:54

सिलसिला महाराज के दरबार में चल रहा था।

7:56

महाराज गजमोतिन से विवाह करने के लिए

7:59

लालायित थे। परंतु अब देखिए श्रोताओं आपका

8:02

ध्यान मैं वापस उधर ले चलता हूं जहां राजा

8:04

नल है। राजा नल को जब उन्होंने पन्नालाल

8:07

और फूलचंद ने जहाज में से धक्का दिया तो

8:10

राजा नल जहाज से गिर समुद्र में गया और

8:13

नीचे चलता हुआ चला जा रहा है। राजा नल को

8:15

कुछ होश नहीं है। परंतु आपको मैं बताना

8:18

चाहूंगा कि राजा नल के गले में सात मणियों

8:21

की माला डली हुई थी। तो इसलिए समुद्र का

8:23

पानी मार्ग देता हुआ चला गया। जहां मणि

8:26

होती है तो मणि से पानी हट जाता है।

8:28

मणियों के प्रकाश से पानी दूर हो गया।

8:30

मार्ग बन गया राजा नल के लिए और राजा नल

8:33

चलते चला जा रहा है। राजा नव कई दिनों की

8:36

यात्रा करने के बाद पहुंच जाता है नागलोक

8:39

में। और नागोक में जब राजा नल नीचे उतरा

8:41

तो वहां के विचित्र रहन-सहन, भव्य इमारत

8:44

और भव्य शानदार बागानों को देख के राजा नल

8:48

सोचने लगते हैं कि हे भगवान मैं किस लोक

8:50

में आ गया। मुझे यही पता नहीं है। और मेरे

8:53

साथ मेरे दुष्ट और पापी मामा जो मुझे धर्म

8:56

का भांजा मानते थे, यह कितना अनिष्ट कर्म

8:58

किया है। मुझे समुद्र में डाल दिया और वह

9:01

भी धोखे से। यदि मुझे कह करके समुद्र में

9:04

डालते हैं, तो मैं उन पर समुंदर को चढ़ा

9:06

देता। राजा नल के मन में रहकर के विचार

9:09

उठा। यह सोच कर के राजा नल चला जा रहा है।

9:12

राजा नल कुछ आगे चले तो कुछ नागों को देखा

9:15

जो वहां पहरा दे रहे थे। नागलोक में

9:18

महाराज बासुकी के राज्यों में पहुंच दिए।

9:21

उन्होंने देखा कि कोई ऐसा मानव आया है,

9:23

कोई ऐसा व्यक्ति आया है, बड़ा योद्धा

9:25

दिखाई देता है जिसके गले में सात-सात

9:28

मणियों की माला पड़ी हुई है। यह ना जाने

9:30

महाराज बासुकी से राज्य नहीं छीन ले। यह

9:33

सोचकर के पहरेदारों ने वहां से दौड़ लगाई

9:35

और पहुंच जाते हैं अपने सेनापति नागराज

9:38

बासुकी के बड़े पुत्र तक्षक के पास और

9:41

तक्षक से जाकर के कहते महाराज राजकुमार जी

9:44

कोई ऐसा व्यक्ति आया है जिसके गले में

9:46

सात-सात मणियों की माला पड़ी हुई है। उसने

9:48

ना जाने कितने लाख लोगों को मार दिया है।

9:51

लोगों को मार करके मणियों की माला बना रखी

9:53

है। फिर राजकुमार तक्षक आप चलकर के

9:56

शीघ्रता से उसे रोकिए। नहीं तो महाराज

9:58

अनर्थ हो जाएगा। वह हमारे महाराज बासुकी

10:01

को अपदस्त कर सकता है। वह देखने में बड़ा

10:03

बलवान, हष्टपुष्ट और वीरता दिखाई पड़ता

10:05

है। जब सैनिकों की बात तक्षक ने सुनी तो

10:08

तक्षक कहने लगा चलो ठीक है हम देखते हैं

10:10

कौन है। जब तक्षक ने राजा नल को देखा तो

10:14

राजा नल की शरीर से कांत फूट रही थी। राजा

10:17

नल का शरीर चमक रहा था। मणियों की तरह

10:20

राजा नल का जोशीला बदन चम जोशीला चेहरा

10:23

चमक मार रहा था। और श्रोताओं राजा नल को

10:27

देखकर के तक्षक मन में विचार करने लगा कि

10:29

यह किसी राजा का पुत्र है और यह अवश्य ही

10:32

नागोक पर आक्रमण करने के लिए आया है। इससे

10:35

ऐसा कोई मामला भी हो और यह हमें यहां

10:38

राज्य से निष्कासित कर देगा। यह सब विचार

10:41

तक्षक अपने मन में विचार किया कि मुझे इसे

10:43

सपोर्ट करना चाहिए। तो वह बड़ी सुंदर सी

10:45

लकड़ी बन जाता है और लकड़ी बनकर के राजा

10:48

नल के सामने गिर जाता है। राजा नल ने उस

10:50

एक सुंदर लकड़ी को देखा तो अपने हाथ में

10:52

उठा लिया और पूंछ वाला हिस्सा पकड़ करके

10:55

पीछे की तरफ लटका लिया। अब देखिए श्रोताओं

10:58

जैसे ही तक्षक का मौका लगा तो तक्षक ने

11:01

जहां गर्दन का निचला हिस्सा होता है पीठ

11:03

में काट लिया ताकि नजर नहीं पहुंचे राजा

11:06

नल की क्योंकि उसके गले में मणियों की

11:07

माला पड़ी हुई थी। इसलिए तक्षक तो भय था

11:10

कि जहां इसकी दृष्टि पहुंच जाएगी हो सकता

11:12

है मेरा जहर इस पर असर ना करे और जैसे ही

11:15

तक्षक ने खाया तक्षक ने पूरी ताकत से पूरा

11:18

जहर राजा नल के शरीर में उड़ेल दिया। अब

11:21

तो श्रोताओं तक्षक राजा नल के हाथ से छूट

11:23

करके चल भागता है। राजा नल कुछ चलता है और

11:26

चलने के बाद बासुकी महाराज का जो शाही

11:29

बगीचा था उस बगीचे में गिर जाता है। यह

11:32

बैस बनीची खांस नहीं रहा। मुंह से झाग आने

11:34

लग रहे हैं। और अब इस तरह करके कभी तो

11:37

अपनी माता की याद आ रही है। कभी गजमौतिन

11:39

की याद आ रही है। परंतु कुछ कर नहीं सकता

11:42

है। समुद्र में समुद्र के निचले तल में

11:44

जहां नागों का राजयोग नागों का राज चलता

11:47

है। नागोक में है। वहां राजा नल मरणासन

11:49

स्थिति में पड़ा हुआ है और विचार कर रहा

11:52

है और श्रोताओं इधर गजमतिन के अपशकुन होना

11:55

आरंभ हुआ। गजमौतिन के अपशकुन तो पहले आरंभ

11:58

हुए थे। गजमौतिन श्रृंगार करती है।

11:59

श्रृंगार बह जाता है। माथे का सिंदूर है।

12:02

आंखों में काजल बह जाता है। गजमतिन की

12:04

आंखों से अकस्मात ही आंसू आने लग गए। और

12:07

इधर जो इसकी माता थी मंज रानी मंज रानी के

12:10

आंसुओं की झड़ी लग गई। लेकिन मंज रानी समझ

12:12

गई है कि मेरा पुत्र इस संसार में जीवित

12:14

नहीं है। इन बनियों ने मेरे साथ बड़ा धोखा

12:17

किया है। विश्वासघात किया है। यह सोच रही

12:20

है और राजा नल मरणासन स्थिति में कभी मां

12:23

की याद करते हैं तो कभी अपनी पत्नी गजमतिन

12:25

की याद करते हैं। सोच रहे हैं कि हे भगवन

12:28

ऐसे दुष्ट मामाओं को तो इस संसार में जीने

12:30

का अधिकार नहीं दिए। इन्होंने मुझे धोखे

12:32

से समुद्र में डाल दिया और यह कोई दुष्ट

12:34

नाग ने मुझे डस लिया है। यह सोचते-सचते

12:37

राजा नल के मुंह से झाग निकल जाते हैं।

12:39

राजा नल पृथ्वी पर गिर जाता है और कुछ ही

12:41

समय में राजा नल का पूरा शरीर नीला पड़

12:44

जाता है और कुछ ही समय में राजा नल की

12:46

मृत्यु हो जाती है। और जैसे ही राजा नल की

12:48

मृत्यु हुई श्रोताओं अब वहां का वृतांत

12:51

सुनिए। नरवरगढ़ में एक तोप रखी हुई थी कि

12:54

अवधि हो जाती है। किले के ऊपर एक बम रखी

12:56

हुई की वह बम गिर जाती है। श्रोताओं यहां

12:59

एक विद्वान कवि ने कहा है कि अवधि है गई

13:02

बम और सिंहासन को तखत फट गए योग और फट्टो

13:05

सभा को कम अर्थात जो राज्य सभा थी उसमें

13:08

सिंहासन बना हुआ था उसका तखत टूट गया।

13:11

किले पर रखी हुई बम अवधी हो गई और राज्य

13:13

का झंडा था वह नीचे गिर गया। समस्त

13:15

विद्वान ब्राह्मणवर विचार करने लगे।

13:17

महाराज प्रथम मन में विचार करने लगे कि

13:20

हमारे राज्य में कुछ अनहोनी नहीं हुई है।

13:22

फिर भी यह ऐसा कैसे हो गया? श्रोताओं कई

13:25

विद्वानों ने उसका निष्कर्ष निकाला और

13:27

निष्कर्ष निकाल कर के यही कहा कि महाराज

13:29

आपके राज्य का कोई बहुत बड़ा पुरुष जो

13:31

आपके राज्य में बड़ी भूमिका निभाता है

13:33

उसकी मृत्यु हो चुकी है। परंतु राजा प्रथम

13:36

तो यह जानते नहीं थे कि उनके कोई पुत्र है

13:38

मंज रानी जीवित है। इसलिए उस बात को टाल

13:40

दिया गया। अब देखिए राजा नल की लाश को

13:43

पड़े पड़े 4 दिन हो जाते हैं। पड़ी हुई है

13:45

राजा नल की लाश समुद्र में है। तो फिर अब

13:48

देखिए जब कई दिन लाश को पड़े हो गए तो एक

13:50

दिन स्वयं नागराज बासुकी अपने रिसीवर में

13:52

भ्रमण करने के लिए जो साहिब बाग था उसमें

13:55

भ्रमण करने के लिए चले जाते हैं। वह कहते

13:57

हैं मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता

13:59

है। तो राजा नल की लाश पड़ी हुई थी। उसी

14:02

बाग में राजा बासुकी टहल रहे थे। भ्रमण कर

14:05

रहे थे। कुछ आगे बढ़े तो उन्होंने देखा एक

14:07

पुरुष की डेड बॉडी पड़ी हुई है। लाश पड़ी

14:10

हुई है। उन्होंने देखा कि देखा कि किसकी

14:12

मृत्यु हो गई है। नजदीक जाकर देखा तो

14:14

बासुकी पहचान गए। अरे यह तो मेरा मित्र

14:17

मेरा पगड़ी पलटा यार राजा नल है। यह

14:19

निष्कर्म किसने किया? यह तो मेरे पास

14:21

मिलने के लिए आ रहा था और ऐसा कौन दुष्ट

14:24

है जिसने मेरे मित्र को खा लिया। श्रोताओं

14:26

राजा बासुकी क्रोधित हो जाते हैं। वहां

14:29

उपस्थित सैनिकों को बुलाया। सैनिक तो यह

14:31

किसने कर दिया है? सैनिक कहने लगे कि

14:33

महाराज हमें नहीं पता। अरे यह मेरा मित्र

14:36

था। यह मेरा पगड़ी पलटा यार था। इसने ही

14:38

मुझे घुमासुर दाने की जेल से मुक्त कराया

14:40

और तुमने मेरे यार को जो मिलने मुझसे

14:42

नागोक आ रहा था उसे डस लिया। उसको मौत के

14:45

घाट सुला दिया। यह किसका अनिष्ट कर्म है?

14:47

मैं उसे जीवित नहीं छोडूंगा। जब सैनिकों

14:50

ने महाराज बासुकी की बात सुनी। महाराज

14:52

बासुकी राजा नल की लाश पर विलाप कर रहे

14:54

हैं, रो रहे हैं। तभी श्रोताओं सैनिकों ने

14:56

कहा कि महाराज आपके प्रधान सेनापति तक्षक

14:59

ने किया है। हमने महाराज आपकी सुरक्षा की

15:02

वजह से तक्षक को सूचना दी और तक्षक के

15:04

बारे में यह बात सुनी तो राजा बासुकी कहने

15:06

लगे तक्षक को बुलाया जाए। श्रोताओं तक्षक

15:09

को बुला लिया गया। महाराज बासुकी ने तक्षक

15:11

को बुला लिया और तक्षक से कहने लगा अरे

15:13

दुष्ट यह मेरा मित्र था। इसने मुझे चार

15:16

दिन पहले ही घोमासुर दाने की जेल से

15:18

छुड़ाया था। यह तो मेरा परम मित्र है मेरा

15:20

और मेरा यार मुझसे मिलने आया तो इसे डस

15:22

लिया। तक्षक कहने लगा पिताजी मुझे यह पता

15:25

नहीं था कि आपका मित्र है और आपसे मिलने आ

15:28

रहा है। हमने तो इसके गले में सात मणियों

15:30

की माला देखी तो मैंने सोच लिया था कि कोई

15:32

राक्षस है। यह हमारे महाराज बासुकी पर

15:34

आक्रमण करने वाला है और कहीं हमारे महाराज

15:36

को फिर बंदी ना बना ले। इसलिए महाराज

15:38

मैंने इसको डस लिया। यह बात सुनकर के

15:41

बासुकी कहने लगा अरे दुष्ट देख तूने कितना

15:43

बड़ा अनिष्ट कर्म किया है। जाओ सभी नियमों

15:46

को तोड़ करके अमृत लाइए और मेरे मित्र को

15:48

जीवित करना होगा। जब यह बात तक्षक ने सुनी

15:50

तो तक्षक कहने लगे पिताजी अमृत का उपयोग

15:53

हम भी नहीं कर सकते हैं क्योंकि अमृत

15:55

उपयोग करने के लिए हम पावन रहे तो बासुकी

15:58

कहने लगे नहीं किसी भी कीमत पर मेरा यार

16:00

जीवित होना चाहिए। तो तक्षक कहने लगा कि

16:03

देखो महाराज मुझे भगवान शंकर का वरदान है

16:06

कि मेरे खाए हुए व्यक्ति को मैं चाहूं तो

16:08

सात दिवस तक जीवित कर सकता हूं। जब यह बात

16:11

बासुकी ने सुनी तो बासुकी कहने लगे कि

16:13

मेरे मित्र को कितने दिन हो गए कि महाराज

16:15

अभी इसको पांचवा दिन है। अच्छा पांचवा दिन

16:17

है तो इसे जीवित किया जाए। नहीं तो चाहे

16:20

मुझे कुछ भी करना पड़े सृष्टि के नियम

16:21

बदलने पड़े लेकिन मैं इसे जीवित करके

16:24

रखूंगा। श्रोताओं बासुकी के आदेशानुसार

16:27

तक्षक ने जिस स्थान से राजा नल को काटा था

16:29

उसी स्थान पर अपना मुंह लगाया और जहर को

16:32

धीरे-धीरे खींचना आरंभ किया। कुछ समय में

16:34

ही तक्षक ने संपूर्ण जहर वापस खींच लिया

16:37

है और जैसे ही राजा नल का जहर खत्म हुआ तो

16:40

आपको यहां एक बात बताना चाहूंगा कि सांप

16:42

के काटने से जो मृत्यु होती है वह अकाल

16:44

मृत्यु की श्रेणी में आती है। उसका जो

16:46

जीवन होता है वह ब्रह्मांड में रहता है।

16:48

ब्रह्मांड में यमराज का पहरा नहीं रहता।

16:50

यमराज अटैक नहीं करता। जब चारों ओर से जहर

16:53

घेर लेता है तो ब्रह्मांड में कई दिनों तक

16:55

जीवित रहता है। ऐसा प्रमाण वेद शास्त्रों

16:58

में है। इसलिए सांप के इछुए व्यक्ति को

17:00

यदि कोई अच्छा सा बाघ ही हो या कोई अच्छा

17:02

सा इलाज मिल जाए तो वह जीवित हो सकता है।

17:05

तो तक्षक ने उसका जहर खींचा और राजा नल ने

17:08

आंखें खोली। वो इस शह शंकर भगवान की जय

17:10

श्रुचता। और जब राजा नल ने खड़े हुए तो

17:13

बासुकी को सामने खड़ा देखा कि बासुकी एकदम

17:16

से राजा नल के गले से लिपट जाते हैं और

17:18

कहने लगे अरे यार बहुत दिनों में आए कहां

17:21

चले आए आप? आपको तो मेरे नागों ने परेशान

17:24

भी बहुत किया है। यह बात सुनकर के नल कहने

17:26

लगे नहीं मित्र मैं तो केवल आपसे दर्शन

17:28

करने के लिए ही आ रहा था। आपके पास आया था

17:31

मित्र और तो श्रोताओं बासुकी ने राजा नल

17:33

का बड़ा सम्मान किया। राजा नल को अपने साथ

17:36

भव्य रथ मंगाया और रथ में अपने महल तक

17:38

बैठाकर ले गया। सम्मान सहित अपने घर ले

17:41

गया और राजा नल वहां कई दिनों तक रुकने

17:43

लगा। श्रोताओं राजा नल वहां ठहरा हुआ है

17:46

और इधर राजा प्रथम था। नरवरगढ़ में राजा

17:48

नल का पिता जिसके वहां गज मोतिन है वह भी

17:51

बड़े-बड़े विद्वान ब्राह्मणों को बुलाता

17:53

है और प्रतिदिन नल की कथा गुरुद्वारा

17:55

सुनवाते और वह कथा गजमोतिन समझ नहीं पाती।

17:58

यह वह ज्योति ने मना कर देती है और यही

18:00

क्रम महाराज का भी जारी है। इधर राजा नल

18:02

नाग लोक में आराम से रहे हैं। दोस्तों, यह

18:05

वीडियो काफी लंबा हो गया है। अब कल के

18:07

वीडियो में हम देखेंगे कि किस तरीके से

18:09

राजा नल अपनी रानी गजमोतिन के पास पहुंचते

18:11

हैं और क्या होता है वहां। कैसे अपना

18:13

परिचय देते हैं या क्या करते हैं, वह

18:16

देखेंगे कल के वीडियो में। अब यह वीडियो

18:17

मैं यहीं समाप्त करता। जब तक के लिए, जय

18:20

हिंद, जय

10.

नमस्कार दोस्तों, इस चैनल पर उपस्थित

0:02

समस्त श्रोताओं का, भक्तों का और

0:04

सब्सक्राइबर बंधुओं का एक बार फिर से

0:05

स्वागत और हार्दिक अभिनंदन है। श्रोताओं,

0:08

जैसा कि आप जानते हैं हमारी कहानी चल रही

0:09

थी नल पुराण इतिहास से और उसके नौ एपिसोड

0:12

आपकी सेवा में प्रसारित कर चुका और 10वां

0:14

एपिसोड आज आपकी सेवा में लेकर के उपस्थित

0:16

हूं। तो आइए श्रोताओं अब आपका ध्यान मैं

0:18

वापस नौवें एपिसोड पर जोड़ता हूं। मैंने

0:21

नौवें एपिसोड में बताया था कि राजा नल जब

0:23

समुद्र में गिर गया तो वहां नागलोक में

0:25

पहुंच जाता है। नागोक में तक्षक के काटने

0:27

से नल की मृत्यु हो जाती है और नल की

0:29

मृत्यु के कुछ दिन बाद उसके मित्र बासुकी

0:32

आते हैं और वह राजा नल को जीवित कर लेते

0:34

हैं। जिंदा करके वापस अपने साथ महलों में

0:36

ले जाते हैं। और जो रानी थी गज मोतिन वो

0:40

सेठों ने राजा प्रथम के महलों में पहुंचा

0:42

दी। नरवरगढ़ पहुंचा दिया उसे। और राजा

0:44

प्रथम से रानी गज मोती ने एक शर्त रखी कि

0:47

जो भी कोई ब्राह्मण मुझे नल पुराण सुना

0:49

देगा तो मैं महाराज आपसे विवाह कर लूंगी।

0:52

अन्यथा जब तक आप नल पुराण नहीं सुनाओगे आप

0:54

मेरे धर्म के पिता है और मैं आपकी धर्म की

0:56

पुत्री हूं। तो नरवरगढ़ के नरेश महाराजा

0:59

वीरसेन गज मोतनी की शर्त को मान लेते हैं

1:01

और प्रत्येक दिन एक ब्राह्मण को बुलाते

1:03

हैं और नल की कथा सुनवाने का प्रयास करते

1:06

हैं। परंतु नल की कथा तो केवल दो ही

1:08

व्यक्ति जानते थे। एक तो स्वयं राजा नल और

1:10

दूसरे गजमोतनी जो सुनने वाली थी। अब कोई

1:13

मृत्यु लोक में नल पुराण कथा जानता ही

1:15

नहीं था। केवल देव ऋषि नारद जी जानते थे।

1:17

तो देखिए श्रोताओं कोई भी ब्राह्मण गजमतनी

1:20

के लिए नल की कथा नहीं सुना पा रहा है। और

1:22

राजा विवाह के चक्कर में गजमतनी बड़ी

1:24

सुंदर थी। उसे विवाह के चक्कर में दूर-दूर

1:26

से ब्राह्मणों को बुलाते हैं और कथा

1:28

सुनवाते हैं। लेकिन गज मोतनी इंकार कर

1:30

देती है कि महाराज यह राजा नल की कथा नहीं

1:32

है। जब राजा नल की कथा कोई सुना देगा तो

1:35

मैं आपसे विवाह कर लूंगी। राजा इस तरीके

1:37

से कथा सुनते-सुनते लगभग महीनों का समय

1:39

व्यतीत हो गया। अब इधर सुनिए पाताल लोक

1:42

में नाग लोक में राजा नल अपने मित्र

1:44

बासुकी के राजमहलों में रह रहा है।

1:47

रहते-रहते काफी समय व्यतीत हो गया तो राजा

1:49

नल अपने मित्र बासुकी से कहने लगा कि

1:51

मित्र अब मैं अपने देश को जाना चाहता हूं

1:53

क्योंकि मेरी अभी नई शादी हुई है और मेरी

1:56

पत्नी गजमोतनी मुझे याद करती होगी। मेरी

1:58

माता भी मुझे याद करती होगी और रो-रो करके

2:01

मेरे चक्कर में वह अंधी हो गई होगी

2:02

क्योंकि मेरे मामा ने तो मुझे समुद्र में

2:04

धक्का दे दिया था। इसलिए हे महाराज बासुकी

2:07

आप मुझे समुद्र के किनारे पर छोड़कर आइए।

2:10

मुझे आप नागोक से ऊपर छोड़कर आए। तो जब

2:13

जाने की बात नल ने की तो नागराज बासुकी

2:15

दुखी हुए। हे और मित्र तुम मेरे परम मित्र

2:18

हो। तुम जब कभी मुझे याद करोगे तो मैं

2:20

वहीं आपके सामने उपस्थित हो जाऊंगा। आपके

2:22

जो भी कष्ट होंगे उन कष्टों को हरण करने

2:24

की कोशिश करूंगा। आप मुझे याद कर लेना

2:27

मुझे भूल मत जाना। और हे मित्र मैं

2:29

तुम्हें एक बड़ी सौगात देता हूं। मेरी

2:30

निशानी देता हूं कि आप नागोक में आए थे और

2:33

नागोक से बिना निशानी के वापस लौट जाए।

2:36

मेरे पास भगवान शंकर की एक दिव्य अंगूठी

2:38

है और यह दिव्य अंगूठी इतनी करामाती है।

2:40

राजा नल से कह रहा है बासुकी बासुकी की

2:43

काया पलट अंगूठी ले जा पहरे को बाएं हाथ

2:46

80 बरस को बने डोकरा यह इसकी करामात।

2:49

अर्थात यह अंगूठी है। यह शरीर को बदल देती

2:52

है। यह काया पलट अंगूठी है। इसको धारण

2:54

करने से जब आप इसको बाएं हाथ में धारण कर

2:56

लेंगे महाराज नल तो आप 80 वर्ष के वृद्ध

2:59

हो जाओगे। यह इस अंगूठी की करामात है। यह

3:01

शरीर को बदल देती है। इसलिए हे राजन तुम

3:04

यह अंगूठी ले जाइए। यह अंगूठी आपके बहुत

3:06

काम आने वाली है। श्रोताओं महाराज बासुकी

3:09

ने राजा नल को वो काया पलट अंगूठी दे दी।

3:11

राजा नल ने उसे धारण करके देखा। जब बाएं

3:13

हाथ में धारण किया तो 80 वर्ष के बन गए और

3:16

जब उतारा तो वही 18 वर्ष के युवा हो गए।

3:18

अब तो राजा नल उस अंगूठी को ले लेते हैं

3:20

और अपने मित्र से कहने लगे मित्र अब आप

3:23

मुझे समुद्र के किनारे पर छोड़ के आइए। तो

3:25

बासुकी ने अपने सबसे बड़े जो उस समय का

3:28

मालवाहक था कहते हैं जो समुद्र से नाग

3:30

नागों के लिए सामान ले जाने लाने का कार्य

3:32

करता था। एक कच्छप को बुलाया एक कछुआ को

3:35

बुलाया और कछुआ को आदेश दिया कि आप मेरे

3:37

मित्र को और मुझे अपनी पीठ पर बैठा करके

3:40

और समुद्र के किनारे पर छोड़िए। श्रोताओं

3:42

राजा नल और नागराज बासुकी उस कच्छप की पीठ

3:45

पर बैठकर के समुद्र के बाहर ऊपर तट पर आ

3:47

जाते हैं। आप कहेंगे कि राजा नल डूबे

3:49

क्यों नहीं? तो वह मैं पहले ही बता चुका

3:51

हूं कि राजा नल के गले में सात-सात मणियों

3:53

की माला थी जिससे पानी दूर हटता था। पानी

3:55

में मार्ग बन जाता था। राजा नल समुद्र के

3:57

किनारे आ गए। बासुकी ने राजा नल को समुद्र

4:00

के किनारे पर उतार दिया। तो श्रोताओं मैं

4:02

आपको एक बात और बता देता हूं। तो राजा नल

4:04

कछुआ ठाकुर थे। और कछुआ क्यों कहलाए?

4:07

क्योंकि कछुआ पर बैठने के कारण राजा नल का

4:10

संपूर्ण वंश कछुआ में तब्दील हो गया। उसी

4:12

समय से कछुआ वंश का उदय हुआ माना जाता है।

4:15

तो देखिए श्रोताओं राजा नल को उसका मित्र

4:17

बासुकी समुद्र के तीर पर छोड़ देता है और

4:19

बासुकी वापस अपने नागोक चला जाता है और

4:22

राजा नल मन में विचार करते हैं कि पहले

4:24

मुझे अपनी माता के पास दक्षिणपुर चलना

4:26

चाहिए और वहां हो सकता है गजमतनी को भी

4:29

दक्षिणपुर लेकर के गए होंगे तो राजा नल उस

4:31

अंगूठी को जो बासुकी ने दी थी बाएं हाथ

4:33

में धारण करता है और जैसे ही अंगूठी धारण

4:35

की तो राजा नल की आयु 80 वर्ष की हो गई।

4:38

80 वर्ष का एक वृद्ध बनकर के राजा नल

4:40

पहुंच जाता है दक्षिणपुर। दक्षिणपुर में

4:42

नल ने देखा तो उसके मामा बड़े आराम में रह

4:44

रहे थे। सेठों की तो चिंता मिट गई थी

4:46

क्योंकि उन सेठों को महाराज प्रथम को तो

4:49

उन्होंने गोट मोचरी और उनके पहनने वाली

4:51

सबको महाराज के दरबार में छोड़ दिया था और

4:53

महाराज से इनाम भी उन्होंने प्राप्त की

4:55

थी। तो राजा नल समझ गई थी इन सेठों ने

4:57

अवश्य गज मोतनी को महाराज वीरसेन के दरबार

4:59

में भेज दिया होगा। नरवरगढ़ के नरेश के

5:02

दरबार में भेज दिया होगा। राजा नल कहने

5:04

लगे माता मैं सब कुछ जानता हूं। नरवरगढ़

5:06

के नरेश हमारे पिता हैं। महाराज वीरसेन

5:08

मंज रानी कहने लगी बेटे तुम्हें किसने

5:10

बताया? यदि महाराज को यह पता चला तो हमें

5:12

जीवित नहीं छोड़ेंगे कि नहीं माता आप

5:14

चिंता मत करो। मैं महाराज के दरबार में जा

5:17

रहा हूं और मैं आपको महाराज के दरबार में

5:19

सम्मान सहित महाराज स्वयं रथ में बैठा

5:22

करके दरबार में ले जाएंगे। आप चिंता मत

5:24

कीजिए। मैं जा रहा हूं महाराज के दरबार

5:26

में और मैं अपना भष बदल करके जाऊंगा।

5:28

श्रोताओं राजा नल अपनी माता से अनुमति

5:30

लेकर के चल देते हैं नरवरगढ़ के लिए। राजा

5:33

नल ने महाराज बासुकी नागराज बासुकी की दी

5:35

हुई अंगूठी अपने बाएं हाथ में धारण की और

5:37

जैसे ही अंगूठी पहनी तो वही 80 वर्ष के

5:39

वृद्ध बन गए और राजा नल ने पंडितों का भष

5:42

धारण किया अपना भष बदला क्षत्रिय रूप

5:44

छिपाया और पंडितों का भष धारण कर लिया और

5:46

चल देते हैं वो बत्रा हाथ में लिया कुछ

5:49

ग्रंथ हाथ में लिए और नारायण नारायण राम

5:51

राम का जाप करते हुए राजा नल चले जा रहे

5:53

हैं। जब राजा नल नरवरगढ़ में प्रवेश किया

5:56

उन्होंने तो उन्हें देखकर के कुछ सैनिक और

5:58

कुछ ग्रामीण कहने लगे कि यह ब्राह्मण बड़ा

6:00

वृद्ध है और विद्वान दिखाई पड़ता है। तो

6:02

क्यों ना इससे पूछा जाए कि यह नल पुराण

6:04

सुना सकते हैं तो उन्होंने राजा नल से

6:06

पूछा कि हे ब्राह्मण देव हमारे महाराज की

6:09

एक शर्त है कि बोलो क्या शर्त है कि वह एक

6:11

नई रानी लेकर के आए हैं। उनके यहां एक नई

6:14

रानी आई है और उस रानी की शर्त है कि कोई

6:16

भी विद्वान ब्राह्मण उन्हें नल पुराण सुना

6:18

दे तो वह उसी रानी राजा के साथ विवाह कर

6:20

लेंगी। महाराज वीरसेन के साथ विवाह हो

6:22

जाएगा। राजा नल कहने लगे तो फिर क्या हुआ?

6:25

अभी तक कोई सुना नहीं पाया कि नहीं

6:26

ब्राह्मण देव कोई ऐसा विद्वान ब्राह्मण

6:28

नहीं आया। महाराज ने अनेकों ब्राह्मण

6:30

बुलाए। देश विदेश के अनेकों विद्वान पंडित

6:32

बुलाए लेकिन किसी ने भी नल पुराण इतिहास

6:34

नहीं सुनाया और रानी ने उससे विवाह नहीं

6:36

किया। रानी की शर्त है कि जब तक आप मुझे

6:38

नल पुराण नहीं सुनाओगे तब तक आप मेरे धर्म

6:41

के पिता और मैं आपकी धर्म की पुत्री हूं।

6:43

इसलिए हे ब्राह्मण देव यदि आप जानते हैं

6:45

तो आप हमारे महाराज को नल पुराण सुना करके

6:47

अनुग्रहित करें। तो राजा नल कहने लगे कि

6:49

बस छोटी सी बात है। नल पुराण की तो कोई

6:52

बड़ी बात नहीं है। चलो मुझे ले चलिए

6:54

महाराज के दरबार में। राजा नल कुछ सैनिकों

6:56

के साथ चल देते हैं महाराज वीरसेन के

6:58

दरबार में। श्रोताओं राजा नल चले जा रहे

7:01

हैं और वीरसेन का दरबार लगा हुआ है। वहां

7:03

कुछ विद्वान ब्राह्मण बैठे हुए हैं और वह

7:05

नल पुराण सुनाने की कोशिश कर रहे हैं। जब

7:07

कुछ सैनिकों ने राजा प्रथम को सूचना दी।

7:09

राजा वीरसेन को सूचना दी कि महाराज एक

7:11

काशी पड़ा हुआ विद्वान ब्राह्मण है और वह

7:13

कह रहा है कि मैं नल पुराण सुना दूंगा। वह

7:15

काशी से पढ़ करके आया है। तो वीरसेन कहने

7:18

लगे बुलाओ उनका मेरे दरबार में स्वागत है।

7:20

महाराज वीरसेन ने राजा नल का बड़ा स्वागत

7:22

किया। महाराज वीरसेन जब चरणों की तरफ

7:24

बढ़ने लगे तो राजा नल सोचने लगे कि यह

7:27

मेरे पिता हैं और यदि मेरे चरण छुए तो

7:29

मुझे इसका पाप लगेगा। राजा नल पीछे हट

7:31

जाते हैं कि नहीं मैं काशी पड़ा हुआ

7:32

ब्राह्मण हूं। मैं किसी से चरण स्पर्श

7:34

नहीं कराता। महाराज आप दूर रहें। राजा नल

7:37

की जब बात सुनी तो वीरसेन रुक जाते हैं और

7:40

राजा नल महाराज वीरसेन से कहने लगे कि

7:42

राजन कहो क्या फरमाइश है कि आप क्या चाहते

7:45

हैं? तो वीरसेन कह रहे हैं राजा नल से कि

7:48

देखिए ब्राह्मण देव मैं एक नई रानी लेकर

7:50

के आया हूं और उस रानी की एक शर्त है कि

7:52

कोई भी ब्राह्मण मुझे नल पुराण सुनवा दे

7:54

तो मैं राजा वीरसेन के साथ विवाह कर

7:56

लूंगी। क्या अभी तक कोई ब्राह्मण ने नहीं

7:58

सुनाई आपको नल पुराण की कथा? नहीं

8:00

ब्राह्मण देव अनेकों विद्वान ब्राह्मण

8:01

बुलाए। एक से एक बड़ा विद्वान आया लेकिन

8:04

कोई नल पुराण नहीं सुना सका। जब राजा नल

8:06

ने यह बात सुनी तो राजा नल कहने लगे कि

8:08

महाराज मैं नल पुराण सुना दूंगा पर मेरी

8:10

एक शर्त होगी कि बोलो क्या शर्त होगी कि

8:12

एक ऊंचा सा मंच लगवाइए उस मंच पर मैं

8:14

बैठूंगा मेरे पास में ही आप अपने राज

8:17

सिंहासन पर विराजमान होंगे मेरे पास में

8:19

ही बैठेंगे और महाराज संपूर्ण नगर बैठा

8:22

होगा नरवरगढ़ और महाराज दूसरी बात आप और

8:24

सुनिए मत काते करियो तंगी बुलवा लेते 100

8:27

रानी ने बुलवा लो चिंतामण जल्लाद महाराज

8:30

किसी को आपको परेशान नहीं करना है कहीं आप

8:32

किसी को फांसी की सजा दें या किसी को

8:34

मृत्यु दंड दें। आप अपने गंगाधर ब्राह्मण

8:37

को बुलाइए। चिंतामण जो जल्लाद था उसको

8:39

बुलाइए और अपनी 100 रानियों को बुलाइए। तब

8:42

महाराज संपूर्ण नगर के सामने आपका यह

8:44

संपूर्ण नरवरगढ़ बैठा हुआ होगा। ऐसे स्थान

8:47

पर मंच लगवाइए कि संपूर्ण नरवरगढ़ की जनता

8:50

नर नारी उस सभा में बैठ जाए। ऐसे स्थान पर

8:53

उस कथा का मंच होगा। और महाराज वहां से

8:55

मैं आप सभी को राजा नल की कथा सुनाऊंगा।

8:58

तो देखिए राजा वीरसेन का मन तो रानी

9:00

गजमोतिन में फंसा हुआ था। वह तो कितना ही

9:03

खर्च हो जाए, कुछ भी हो जाए लेकिन कोई ऐसा

9:05

ब्राह्मण हो जो उसे नल पुराण की कथा सुनाए

9:08

ताकि उसका विवाह रानी गजमोतिन से हो जाए।

9:10

देखिए श्रोताओं राजा वीरसेन ने जब राजा नल

9:13

की बात सुनी। उस काशी के ब्राह्मण बन रहे

9:15

थे राजा नल। उसकी बात सुनी तो राजा प्रथम

9:17

ने अपने सैनिकों को आदेश दिया। अपने

9:19

सेवकों को आदेश दिया कि एक विशाल मैदान

9:22

में एक शानदार सा मंच बनाया जाए। श्रोताओं

9:24

राजा के सेवकों ने नौकरों ने कुछ ही समय

9:27

में एक बड़ा शानदार मंच बना दिया। चारों

9:29

ओर से कनातें लगा दी गई और इतना स्थान बना

9:32

दिया गया कि संपूर्ण नरवरगढ़ उसमें बैठ

9:34

सके और भव्य मंच बनने के बाद राजा को

9:37

बैठने के लिए अलग कुर्सी रानी गजमोतनी के

9:39

बैठने के लिए अलग कुर्सी और 100 रानियों

9:42

को बैठने के लिए अलग-अलग कुर्सियां डलवा

9:43

दी गई और जब मंच बन गया तो महाराज प्रथम

9:46

ने राजा नल से कहा कि हे ब्राह्मण देव अब

9:49

हमारा मंच तैयार है। आप हमें कथा सुनाइए।

9:51

श्रोताओं राजा नल कहने लगा कि महाराज आप

9:54

अपने संपूर्ण नरवरगढ़ में निमंत्रण लगवा

9:56

दीजिए कि मैं नल पुराण की कथा सुना रहा

9:59

हूं। जब तक आपका यह शहर नहीं होगा मेरे

10:01

पास तब तक मैं आपको कथा नहीं सुनाऊंगा। हे

10:04

राजन तुम्हारी जो 100 रानियां हैं उनको

10:06

बुलवाऊं। चिंतामणि जल्लाद को बुलाइए और उस

10:09

गंगाधर ब्राह्मण को बुलाइए। राजा प्रथम

10:11

कहने लगा कि यह ब्राह्मण तो मेरी संपूर्ण

10:13

जन्म कुंडली जानता है। मेरे सभी भेद को

10:16

जानता है। यह कैसे जानता है? पर राजा

10:18

सोचने लगे कि काशी पढ़ा हुआ ब्राह्मण है,

10:20

विद्वान है। इसलिए इसको सब कुछ ज्ञात है।

10:22

श्रोताओं महाराज प्रथम ने संपूर्ण नगर में

10:25

संपूर्ण नरवर नर में घोषणा करा दी कि काशी

10:28

पढ़े बड़े विद्वान ब्राह्मण आए हैं और वह

10:30

नल पुराण की कथा सुना रहे हैं। संपूर्ण

10:32

नगरवासी कल महाराज के दरबार में उपस्थित

10:35

हो जाए। श्रोताओं राजा के आदेश से नगर के

10:38

अधिकांश व्यक्ति अधिकांश जनता महाराज के

10:40

दरबार में आ गई। जहां मंच लगा हुआ था वहां

10:42

बैठने की व्यवस्था थी अलग से जनता के लिए।

10:45

उस पर संपूर्ण नगर आकर के बैठ जाता है।

10:47

संपूर्ण नरवरगढ़ के नर नारी उस सभा में

10:50

बैठ जाते हैं। राजा प्रथम की 100 रानियां

10:52

बैठ जाती हैं। अलग कुर्सियों पर राजा

10:54

प्रथम जो नई रानी लाए थे गजमोतनी उस रानी

10:57

को भी अलग से कुर्सी डलवा देते हैं और

10:59

स्वयं महाराज प्रथम एक ऊंचे से सिंहासन पर

11:01

विराजमान हो जाते हैं। चिंतामणि जल्लाद भी

11:04

महाराज की सभा में उपस्थित है और जो

11:06

संपूर्ण इस घटना का यंत्रकारी था। मंजा

11:08

रानी को मारने में जिसका बड़ा योगदान था,

11:11

वह ब्राह्मण गंगाधर पंडित भी बैठा हुआ था

11:13

और राजा नल उस ऊंचे मंच पर जहां व्यास

11:16

गद्दी लगाई गई थी जहां से नल पुराण की कथा

11:18

कहनी थी उस व्यास गद्दी पर विराजमान है।

11:21

राजा नल कहने लगे महाराज प्रथम से कि

11:23

महाराज आप ध्यान से सुने आपका संपूर्ण नगर

11:26

यहां आ चुका है और अब आप ध्यान से सुनिए

11:29

मैं आपको राजा नल की कथा सुना रहा हूं। नल

11:31

पुराण की कथा आपको सुना रहा हूं। तो राजा

11:33

प्रथम सोचने लगे कि आप सुनाओ मुझे नहीं

11:36

सुननी केवल इस रानी को सुननी है। यदि यह

11:38

रानी संतुष्ट हो जाए तो मेरे लिए का तो

11:40

तुम कुछ भी सुना दो। मैं वही सुनने को

11:42

तैयार हूं। मुझे तो इस रानी से विवाह करना

11:44

है। रानी गजमोदितनी बैठी हुई है और राजा

11:47

नल 80 वर्ष का एक वृद्ध का रूप वृद्ध

11:49

ब्राह्मण बने हुए हैं। 80 वर्ष जिनकी उम्र

11:51

हो गई है क्योंकि उस अंगूठी के प्रभाव के

11:53

कारण और मंच पर बैठे हुए हैं और कथा सुना

11:56

रहे हैं। और राजा प्रथम से कह रहे हैं कि

11:58

राजन ध्यान से सुनो। सुन राजा चितला वचन

12:01

सत मानो मेरो बस बामणगढ़ के बीच बसे एक

12:05

नरवर खेरो के हे राजन मेरी बात को ध्यान

12:07

से सुनो मैं जो कह रहा हूं वह सत्य है

12:09

बामनगढ़ों के बीच में एक नरवरगढ़ नामक शहर

12:12

था एक राज्य था जहां वीरसेन बलवान 101

12:15

रानी महलन में जिनके ना कोई संतान के हे

12:18

राजन नरवरगढ़ पर एक वीरसेन नामक राजा

12:21

राज्य किया करते थे जिनको राजा प्रथम भी

12:23

कहा जाता है। राजा प्रथम राज्य किया करते

12:26

थे और राजा प्रथम के 101 रानियां थी।

12:28

परंतु ईश्वर की ऐसी कुदृष्टि थी कि महाराज

12:31

के यहां कोई भी पुत्र पुत्री का जन्म नहीं

12:33

हुआ। कोई किस्मत पर गई और 101 रानी महलन

12:36

में कोई के होयो ना बेटा बेटी। राजा प्रथम

12:38

के 101 रानियां होने के बाद भी कोई संतान

12:41

नहीं हुई। जब राजा प्रथम ने और जनता ने और

12:44

100 रानियों ने यह सुना तो सब मन में

12:46

विचार करने लगे। राजा सोचने लगा कि यह

12:48

कैसा? यह तो मेरी कथा सुना रहा है। यह तो

12:51

मेरी जीवनी बता रहा है। राजा प्रथम तो मैं

12:53

ही हूं। नरवरगढ़ यही है। पर चलिए कोई बात

12:55

नहीं है। यह तो गजमोतनी को संतुष्ट कर दे

12:58

और यह कुछ भी सुना दे। पर राजा का उधर

13:00

ध्यान चला जाता है। वीरसेन का ध्यान भी

13:02

चला जाता है। श्रोताओं तो राजा सोच रहे

13:04

हैं कि कुछ भी सुना सुना तो सही। उधर

13:06

गजमोतनी भी सोच रही है कि यह ब्राह्मण है।

13:08

कोई यह नल पुराण की सही कथा सुना रहा है।

13:10

क्योंकि देव ऋषि नारद ने मुझे यही सुनाया

13:12

था और आगे कहने लगे कि जब काफी समय बीत

13:15

गया राजा की आयु ढल गई तो एक बार भगवान

13:17

गोरखनाथ गुरु गोरखनाथ आते हैं नरवरगढ़ की

13:20

सीमा में। जब नरवरगढ़ की सीमा में गोरखनाथ

13:23

आए, तो उनकी पटरानी थी मंजा रानी राजा

13:26

वीरसेन की, और मंजा अपने पति राजा वीरसेन

13:28

को लेकर के गोरखनाथ की सेवा में चली जाती

13:31

है। दोनों पति-पत्नियों ने राजा सहित राजा

13:34

और रानी सहित गुरु गोरखनाथ की बड़ी सेवा

13:36

की। जब गोरखनाथ की समाधि खुली, ध्यान भंग

13:38

हुआ, तो गोरखनाथ दोनों को देखकर के बड़ा

13:41

प्रसन्न हुआ और कहने लगा, कि वत्स तुमने

13:43

मेरी बहुत सेवा की है। तुम वरदान मांगिए

13:45

क्या मांगना चाहते हो? मैं तुम पर प्रसन्न

13:47

हूं। मैं तुम्हें वही दूंगा। तो हे राजन

13:50

ब्राह्मण कह रहे हैं ब्राह्मण भेषधारी

13:52

राजा नल कह रहे हैं कि हे राजन ध्यान से

13:54

सुनो गुरु गोरखनाथ ने 101 चावल दिए। राजा

13:57

ने मांगा था कि गुरु जी मेरे कोई संतान

14:00

नहीं है। मुझे एक पित्र दे दीजिए। मेरे

14:02

101 रानियां हैं महलों में। तो गुरु

14:04

गोरखनाथ ने कहा कि राजन तुम्हारे 101

14:07

पुत्र होंगे। यह चावल ले जाओ और तुम्हारी

14:09

रानियों को खिला देना। हे राजा महाराज

14:11

प्रथम से कह रहे हैं ब्राह्मण भेषधारी

14:13

राजा नल कि हे राजन ध्यान से सुनो। जब

14:16

राजा और रानी दोनों घर आए महारानी मंजा और

14:19

राजा वीरसेन तो उन्होंने अपनी समस्त

14:21

रानियों को एक लाइन में खड़ा कर लिया और

14:23

सबको गुरु गोरखनाथ के द्वारा अभिमंत्रित

14:25

किया हुआ एक-एक चावल उनके हाथ पर रख दिया।

14:28

परंतु वह 100 रानियां तो विश्वास नहीं कर

14:30

रही थी कि कहीं चावलों से संतान पैदा होती

14:33

है। इसलिए उन्होंने तो उस चावल को फेंक

14:34

दिया। 100 रानियों ने चावल फेंक दिया और

14:37

मंजा रानी उस चावल को खा गई। हे महाराज,

14:39

मंजा रानी गर्भवती हो जाती है। मंजा रानी

14:42

के गर्भ रह जाता है और जब मंज रानी के

14:44

गर्भ का पता उन 100 रानियों को चला तो 100

14:47

रानी चिढ़ने लगती है। कहने लगी कि यह तो

14:49

पहले ही पटरानी है और इस जब यह इसके पुत्र

14:52

और हो जाए तो महाराज हमें फांसी की सजा

14:54

देंगे। हम 100 रानियों को मरवा देंगे।

14:56

इसलिए सभी रानी डर जाती हैं और मंजा रानी

14:59

को मरवाने का उपाय सोचती हैं। अब तो

15:01

श्रोताओं सभी रानी भी मन में विचार करने

15:03

लगी। सभी कहने लगे यह ब्राह्मण कुछ गलत

15:06

सुना रहा है। महाराज यह तो हमारी कथा सुना

15:09

रहे हैं। गंगाधर पंडित जी सोचने लगे कि यह

15:12

मेरी पोल भी खोलने वाला है कि महाराज इसको

15:14

भगा दीजिए। यह कोई कथा नहीं सुना रहा है।

15:17

यह तो आपकी जीवनी सुना रहा है। तो गजमोतनी

15:20

नहीं कहने लगी कि देखिए महाराज राजा प्रथम

15:23

से यह ब्राह्मण यहां तक सही सुना रहा है।

15:25

इसको आगे सुनाने दीजिए। अब तो राजा से जब

15:29

गजमोतनी ने कह दिया तो राजा प्रथम चुप लगा

15:32

जाते हैं। राजा प्रथम कहने लगे कि सुनाओ

15:34

ब्राह्मण देव मुझे तो केवल गजमोतनी को कथा

15:37

सुनवानी थी और किसी से कोई लेना देना नहीं

15:39

है। तो फिर राजा नल कहने लगे कि उन 100

15:42

रानियों ने मन में विचार किया और गंगाधर

15:44

नामकद ब्राह्मण को बुलाया। जब गंगाधर का

15:47

नाम आया तो गंगाधर कांप गए पंडित जी हिल

15:50

गए भीतर से कि अब मेरी पोल खुलेगी और

15:52

महाराज प्रथम मुझे फांसी देंगे। तब फिर

15:55

कहने लगे राजा नल कि हे राजन उस ब्राह्मण

15:58

ने रानियों के पास आकर के पूछा तो रानियों

16:00

ने कहा कि मंझा रानी को किसी भी तरीके से

16:02

मरवा दो और उसके लिए 100 रानियों ने उस

16:05

गंगाधर ब्राह्मण को पांच स्वर्ण से भरी

16:08

हुई स्वर्ण मुद्राओं से भरी हुई थैलियां

16:10

दी थी और उन थैलियों को ले जाकर के गंगाधर

16:13

ब्राह्मण ने अपने घर रख दिया और मंझ रानी

16:16

को मरवाने का एक षड्यंत्र किया। अब तो

16:18

राजा प्रथम का ध्यान भंग हो गया और राजा

16:20

प्रथम एकदम से उस ब्राह्मण की बातों पर

16:23

ध्यान लगाने लगे और गंगाधर ब्राह्मण से

16:25

कहने लगे अरे दुष्ट ब्राह्मण तेने तो मेरे

16:28

नाश कर दिया तो नल एकदम से कहने लगे कि

16:30

नहीं महाराज मैंने आपसे पहले ही कहा था कि

16:33

आप किसी को दंडित नहीं करेंगे किसी से आप

16:36

कुछ नहीं कहेंगे आप तो केवल कथा सुनिए

16:38

नहीं तो यहां से आगे की कथा मैं नहीं

16:40

जानता हूं तो राजा प्रथम कहने लगे कि नहीं

16:43

ब्राह्मण देव आप कथा सुनाइए आपकी कथा

16:46

सुनना चाहता हूं मैं सुनना चाहता हूं।

16:48

इसमें तो बड़ी-बड़ी गुप्त रहस्य की बातें

16:50

खुल रही हैं। तो राजा नल कहने लगे कि हे

16:53

महाराज उस गंगाधर ब्राह्मण ने कुछ स्वर्ण

16:55

मुद्राओं के लोभ के लिए गंगा जैसी पवित्र

16:58

रानी मंझा पर लांछन लगाया। उसका जो गर्भ

17:01

था उसे किसी दूसरे व्यक्ति का बताया। जबकि

17:03

गुरु गोरखनाथ के चावल का गर्भ था और उसे

17:06

विभचारणी रानी कहकर पुकारा और महाराज

17:09

प्रथम से गंगाधर ब्राह्मण कहने लगे कि

17:11

महाराज यदि आप अपने पुत्र का मुंह देख

17:14

लेंगे तो आप मारे जाओगे। आपके राज्य का

17:17

नाश हो जाएगा। एक थोड़े से धन के लिए

17:19

गंगाधर पंडित ने वह अनिष्ट कर्म किया। हे

17:22

राजन और वह राजा भी इतना सोच नहीं पाया।

17:25

राजा की मति भी मारी गई और उस गंगाधर

17:27

ब्राह्मण के कहने से राजा प्रथम ने चार

17:30

जल्लाद बुलाए और चार जल्लादों का मुखिया

17:32

चिंतामणि जल्लाद था। चिंतामणि भी वहां

17:35

बैठा हुआ था। राजा प्रथम सोचने लगा कि यह

17:38

तो मेरी कथा है और इस गंगाधर ब्राह्मण ने

17:40

मेरे साथ बड़ा धोखा किया है। हे महाराज

17:43

आपने उस चिंतामणि जल्लाद को आदेश दिया कि

17:45

जो रानी है मंझा उसको महलों से लाया जाए

17:49

और उसको वन में ले जाकर के मार दिया जाए।

17:51

हे महाराज उस राजा वीरसेन के आदेश अनुसार

17:55

चारों जल्लाद महल में चले जाते हैं और

17:57

मंझा रानी को महल से बंदी बनाकर के ले आते

17:59

हैं। चारों जल्लाद राजा के आदेश पर

18:02

महारानी मंझा को बेहड़ वन में ले गए। हे

18:05

महाराज अब यहां से आगे की कथा समाप्त होती

18:08

है क्योंकि मैं जानता ही नहीं हूं क्योंकि

18:10

मंझा रानी वहां वन में ले जाकर के

18:12

उन्होंने छोड़ दी और वहां रानी जाने मार

18:15

दी या जीवित छोड़ दी जल्लादों ने यह

18:17

महाराज मैं नहीं जानता यहां से आगे की कथा

18:20

अब मुझसे नहीं आती महाराज अब शाम का वक्त

18:23

हो गया है और आगे की कथा मैं आपसे कल

18:25

कहूंगा। आज तो कथा समापन का समय हो गया

18:28

है। तो देखिए श्रोताओं मंझ रानी की यहां

18:30

तक की कथा सुना के राजा नल कथा का समापन

18:33

कर देते हैं। अगली कथा दूसरे दिन

18:36

सुनाऊंगा। संपूर्ण दरबार इसी तरह से लगा

18:38

होगा। अब यह कहानी यहीं खत्म होती है। यदि

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कीजिए। जब तक के लिए, जय हिंद, जय

 

 

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