कथासरित्सागर में नल और दमयन्ती की कथा

कथासरित्सागर में नल और दमयन्ती की कथा

मैं इस सम्बन्ध में तुझे एक कथा सुनाता हूँ, सुनो। प्राचीन काल में नल नाम का एक राजा था ॥२३७।।

वह राजा इतना सुन्दर था कि उसके रूप से अपमानित होकर कामदेव, मानों (उसी दुःस्ल से) क्रूज़ शिवजी के नेत्र की आग में जलकर भस्म हो गया ।॥२३८॥

पत्नी-रहित उस राजा ने, अपने ही समान सुन्दरी पत्नी की खोज करते हुए विदर्भ देश के राजा भीम की कन्या दमयन्ती का नाम सुना ॥२३९॥

सारी पृथ्वी पर ढूंढ़ते हुए राजा भीम को भी राजा नल के सिवा अपनी कन्या के योग्य दूसरा पति नहीं मिला ॥ २४०॥

इसी बीच एक बार राजा भीम की कन्या दमयन्ती जलक्रीडा के लिए एक तालाब में उतरी ॥२४१॥

उस सरोवर में उसने, कमल की नाल को खाते हुए एक राजहंस को युक्ति से अपनी चादर फेंककर पकड़ लिया ॥२४२॥

उससे इस प्रकार पकड़ा गया वह दिव्य राजहंस, मनुष्यों की वाणी में उससे कहने लगा-'हे राजकुमारी, मैं तेरा उपकार करूंगा। मुझे छोड़ दे। निषच देश का राजा नल है। अच्छे गुणों से गूंचे हुए हार के समान जिसे दिव्य रमणियाँ भी हृदय में धारण करती हैं ॥२४३-२४४॥

तू उसके समान पत्नी है और वह तेरे समान पति है। अतः, यह समान पति-पत्नी-संयोग कराने में मैं तेरा प्रणय-दूत बनूंगा' ।॥२४५॥

यह सुनकर और उन दिव्य हंस को सत्य बोलनेवाला समझकर, दमयन्ती ने 'ठीक है, तुम दूत बनों' यह कहते हुए उसे छोड़ दिया ॥२४६।॥

और बोली कि 'मैं नल के सिवा दूसरे को नहीं करूंगी; क्योंकि उसने, कान के मार्ग से प्रविष्ट होकर, मेरा मन हर लिया है' ।॥२४७॥

उस हंस ने वहाँ से चलकर शीघ्र ही जलक्रीडा में लगे हुए नलवाले सरोवर का बघय लिया ॥२४८॥

राजा नल ने भी, उस मनोहर राजहंस को देखकर खिलवाड़ के साथ फेंके हुए अपने दुपट्टे से उसे बाँध लिया ।। २४९॥

तदनन्तर, वह हंस उससे बोला-'राजन्, मुझे छोड़ दो। मैं तो तुम्हारे उपकार के लिए ही यहाँ आया हूँ। सुनौ, तुम्हें कहता हूँ- ॥२५०।।

विदर्भ देश में राजा भीम की पृथ्वी की तिलोत्तमा और देवताओं से भी चाही जानेवाली दमयन्ती नाम की कन्या है।। २५१।।

मेरे द्वारा तेरे गुणों का बखान करने पर तुझमें सुदृढ प्रेम रखनेवाली उस दमयन्ती ने तुझे हो अपने पति के रूप में वरण किया है। यही कहने के लिए मैं आया हूँ' ।॥ २५२॥

इस प्रकार, शुभ फल को प्रकट करनेवाले हंस के वचनों से और कामदेव के पुष्प-वाणों से वह राजा नल एक साथ ही विष गया ।। २५३।।

जौर उस हंस से बोला-हे पक्षिश्रेष्ठ, मैं धन्य हूँ, मूत्तिमती मनोरथ सम्पत्ति के समान जिसने मुझे बरग कर लिया है ॥२५४॥

ऐसा कहकर राजा से छोड़े गये उस हंस ने, उसी समय विदर्भ देश में जाकर दमयन्ती से सच्ची बात बता दी और वह इच्छानुसार चला गया ।।२५५।।

नल के लिए उत्कंठित दमयन्ती ने, माता द्वारा नल की प्राप्ति के लिए पिता से अपना स्वयंवर कराने की प्रार्थना की ॥२५६।।

राजा ने भी, इस बात की स्वीकृति देकर, दमयन्ती के स्वयंवर के लिए, पृथ्वी के सभी राजाओं के पास दूत भेज दिये ॥२५७।।

दूतों के द्वारा स्वयंवर-समाचार प्राप्त होने पर सभी राजा, विदर्भ के प्रति जाने लगे और उत्कंठित नल भी, रथ पर सवार होकर विदर्भ के लिए बला ॥२५८॥

तदनन्तर, नल-दमयन्ती के प्रेम-स्वयंवर का मनाचार इन्द्र आदि सभी लोकपालो ने नारद मुनि से मुना। यह सुनकर इन्द्र, वायु, यम, अग्नि, वरुण पाँचों लोकपाल, आपन में सम्मति करके नल के पास गये ॥२५०-२६०॥

और. विदर्भ को जाने हुए विनम्र नल में मार्ग में ही मिलकर वे बोले- तुम हमारी ओर से हमारे मन्देश दमयन्ती को जाकर मुना दो ॥२६१॥

किनू हम पांचों में में किमी एक लोकपाल की वर ले। मानव नल से तुझे क्या मुख मिलेगा ? क्योंकि, मनुष्य मरणवर्मा होते हैं और देवता अमर हैं।॥२६२॥

और तू हमारे वरदान में अदृश्य होकर उनके पास जा सकेगा। दूसरे व्यक्ति तुझे न देख सकेंगे।' नल ने देवताओं की इस आज्ञा को ठीक हैं' कहकर मान लिया ॥२६३॥

और, दमयन्ती के भवन में अदश्य रूप से जाकर उगे देवताओं का सन्देश उसी प्रकार उसने सुना दिया ॥२६४।।

यह मुनकर वह पतिव्रता बोकी 'बह देवता भले ही अमर हों, मेरा पति तो नल हो होगा। मुझे देवताओं से क्या प्रयोजन ? ॥ २६५॥

दमयन्ती का यह उत्तर सुनकर नल ने उसके सामने अपने को प्रकट कर दिया, फिर जाकर इन्द्र आदि लोकपालों से उसका उत्तर उसी प्रकार कह दिया ।। २६६७।

तब प्रसन्न देवताओं ने नल से कहा है सत्यवादी हमलोग तेरे वश में है। तू जब भी हमें स्मरण करेगा, तभी हम तेरे समीप आयेंगे। इस प्रकार का वर उसे देकर वे देवता चले गये ॥२६७।।

तब नल के प्रमग्र होकर विदर्भ की ओर चले जाने पर दमयन्ती को ठगने की इच्छा से देवताओं ने नल का रूप धारण कर लिया ॥२६८॥

और, राजा भीम की सभा में जाकर मनुष्यों का-सा व्यवहार करनेवाले वे देवता, स्वयंवर प्रारम्भ होने पर, नल के पास ही बैठ गये ॥ २६९॥

तदनन्तर, अपने भाई के द्वारा एक-एक करके परिचित कराये जाते हुए अनेक राजाबों को छोड़ती हुई दमयन्ती, क्रमशः नल के पास पहुंची ॥२७०॥

वहाँ जाकर छाया (परछाई), पलक गिरना आदि मानव गुणों से युक्त छह नलों को देखकर माई के व्याकुल हो जाने पर दमयन्ती सोचने लगी-॥२७१॥

अवश्य ही उन पाँचों लोकपालों ने, यह मावा फैलाई है। इसलिए, इनमें छठे को ही मैं वास्तविक नल समहूँ और कोई दूसरा उपाय नहीं है।॥ २७२॥

ऐसा सोचकर एकमात्र नल में लगे हुए मनवाली दमयन्ती सूर्य की ओर मुँह करके इस प्रकार बोली-॥२७३।।

हे लोकपालो, यदि स्वप्न में भी मेरा मन नल को छोड़कर किसी दूसरे पुरुष में न गया हो, तो इसी सत्य के प्रभाव से मुझे अपना स्वरूप दिलाओ ॥२७४।।

विवाह से पहले ही वर लिये गये पुरुष के अतिरिक्त कन्या के लिए और सभी पर-पुरुष हैं और दूसरों के लिए, वह कन्या परस्त्री के समान है। तब तुम लोगों का यह कैसा अज्ञान है' ।।२७५॥

यह सुनकर इन्द्र आदि पाँचों लोकपाल, अपने वास्तविक रूप में आ गये और छठा राजा नल, अपने यवार्य रूप में स्पष्ट हुआ ॥ २७६॥

तब प्रसन्न दमयन्ती ने, खिले हुए नीलकमलों के समान अपनी दृष्टि और वरमाला, दोनों ही राजा नल को डाल दिये ॥ २७७॥

इतने में आकाश से पुष्यों की वर्षा हुई। तब राजा भीम ने दमयन्ती का नल के साथ विधिपूर्वक विवाह कर दिया ॥२७८॥

इसके बाद भीम के द्वारा उचित शिष्टाचार और सत्कार किये गये अन्यान्य राजा और इन्द्र आदि देवता भी अपने-अपने स्थानों को गये ॥ २७९॥

इन्द्र आदि देवताओं ने जाते हुए मार्ग में द्वापर और कलियुग को देखा। उन दोनों को दमयन्ती के स्वयंवर के निमित्त आये हुए जानकर उनसे वे देवता बोले-॥२८०॥

'अब तुमलोग विदर्भ की ओर न जाओ। हम लोग यहीं से आ रहे हैं। स्वयंवर हो गया और दमयन्ती ने राजा नल को कर लिया ॥ २८१॥

यह सुनते ही वे दोनों पापी क्रोष से बोले-'आप लोगों के समान देवताओं को छोड़कर उसने मनुष्य का वरण किया, इसलिए हम उन दोनों का वियोग अवश्य करायेंगे', इस प्रकार प्रतिज्ञा करके वे दोनों वहीं से लौट गये ॥ २८२-२८३॥

उपर राजा नल, सात दिनों तक ससुराल में रहकर, नई वधू दमयन्ती के साथ निषध देश को आ गया ।॥२८४।।

यहाँ उन दोनों का प्रेम गौरी और शंकर के प्रेम से भी अधिक था; क्योंकि गौरी, शंकर का आधा (बायाँ) भाग थी, किन्तु दमयन्ती तो नल का सर्वस्व ही, अर्थात् पूरी आत्मा थी ॥२८५।।

कुछ समय के अनन्तर दमयन्ती ने, नल से, पहले चन्द्रसेन नामक पुत्र और उसके उपरान्त इन्द्रसेन नाम की कन्या को जन्म दिया ॥२८६॥

इतने दिनों तक कलियुग अपनी पूर्व प्रतिज्ञा पर दृढ रहकर शास्त्र-मर्यादा का पालन करने-वाले नल का छिद्र (दोष) खोजने में लगा रहा ॥ २८७।।

कुछ दिनों के अनन्तर एक बार मद्य के नशे की मस्ती में स्मृतिहीन राजा नल, बिना सन्ध्या किये और बिना पैर घोये ही जाकर सो गया ॥२८८॥

रात-दिन मौका ढूंढ़ते हुए कलि ने यह अच्छा अवसर देखकर नल के शरीर में प्रवेश किया ॥२८९।।

इस प्रकार, कलियुग के अपने शरीर में प्रविष्ट हो जाने से वह नल धार्मिक आचार-विचारों को छोड़कर मनमाना आचरण करने लगा ॥२९०।।

जैसे, जुआ खेलने लगा, दामियों के साथ रमण करने लगा, झूठ बोलने लगा, दिन में सोने और रात्रि में जागने लगा ॥ २९१॥

बिना कारण कोष करने लगा, अन्याय से धन कमाने लगा, सज्जनों का अपमान और दुष्टों का मम्मान करने लगा ॥ २९२॥

ऐगे ही उसके भाई पुष्कर के भी सन्मार्ग का परित्याग करने पर, अवसर पाकर, द्वापर ने उसके भी शरीर में प्रवेश किया ॥२९३।।

एक बार, नल ने अपने छोटे भाई पुष्कर के घर पर दान्त नाम के सुन्दर श्वेत बैल को देखा ॥२९४॥

लोभ के कारण उस बैल को माँगते हुए बड़े भाई नल को, द्वापर से ग्रसे हुए पुष्कर ने बह बैल नहीं दिया ॥२९५।।

और बोला- 'यदि इस बैल पर तुम्हारी इच्छा है, तो तुम जूए में जीतकर मुझसे इसे ले लो। देर न करो। यह सुनकर कलि से बसे हुए नल ने, यह प्रस्ताव स्वीकार किया और उन दोनों भाइयों का परस्पर जूआ आरम्भ हुआ ।॥ २९६-२९७।।

पुष्कर की ओर से बैल दाँव पर था और नल की ओर से हाथी-घोड़े आदि दाँव पर लगाये गये थे। अन्त में, पुष्कर जीत गया और नल हार गया ॥ २९८॥

इस प्रकार दो-तीन दिनों तक निरन्तर चलते हुए जूए में सारी सेना, खजाना आदि हार जाने पर भी, नल ने, कलिग्रस्त होने के कारण मना किये जाने पर भी, किसी की एक न मानी ॥२९९।।

तब, दमयन्ती ने राज्य को चौपट हुआ समझकर दोनों बच्चों को उत्तम रथ में बैठाकर अपने पिता के घर मेज दिया ॥३००।।

धीरे-धीरे, नल सारा राज्य हार गया। तब उससे जितेन्द्रिय पुष्कर ने कहा-'तुम सब कुछ तो हार चुके हो, अब उस बैल के दाँव पर दमयन्ती को लगाओ ।॥३०१-३०२॥

उसकी इन बातों की आँषी से आग की तरह जलता हुआ नल, उस बुरे समय में भी उससे कुछ नहीं बोला और न दमयन्ती को ही दाँव पर लगाया ।।३०३॥

तब उसके भाई पुष्कर ने कहा- 'यदि दाँव पर दमयन्ती को नहीं लगाते हो, तो तुम उसके साथ ही मेरे देश से निकल जाओ' ॥३०४।।

तब राजा नल दमयन्ती के साथ उस देश से निकल गया और राज्य के सिपाही उसे राज्य की सीमा तक छोड़ आये ॥३०५॥

'हाय ! जहाँ कलि ने नल की भी ऐसी दुर्दशा कर डाली, वहाँ अन्यान्य कीड़ों के समान साधारण प्राणियों को कथा ही क्या है ॥ ३०६।।

ऐसे धर्महोन और स्नेह-रहित जूए को बार-बार धिक्कार है, जो नल-जैसे राजषियों को भी विपत्ति में डाल देता है और जो कलि तथा द्वापर का जीवन है ।। ३०७७॥

तदनन्तर, भाई द्वारा विजित विदेश को जाता हुआ. भूख से व्याकुल वह नल, एक बन के मध्य में एक तलाब पर पहुँचा ॥ ३०८॥

वहाँ पर कुद्मों से कटे हुए कोमल पैरोंवाली दमयन्ती के साथ, उस जंगली सरोवर के तट पर उस नल ने दो हंसो को देखा ॥३०९।।

उनको पकड़ने के लिए उसने उन पर अपना दुप‌ट्टा डाला, परन्तु वे हंस उसे भी अपने साथ लेकर उड़ गए ॥३१०।।

तब नल ने आकाश से यह वाणी सुनी कि ये दोनों हंस जूए के दो पासे थे, जो तेरा वस्त्र भी ले गये ॥३११॥

अब केवल एक वस्त्र (घोती) ही पहना हुआ नल दुःखित मन से बैठा हुआ, दमयन्ती को उसके पिता के घर का मार्ग बताने लगा-॥३१२॥

'हे प्रिये, यह मार्ग विदर्भ की ओर तेरे पिता के पर को जाता है और यह कोशल देश की बोर' ॥३१३॥

यह सुनकर दमयन्ती को यह शंका हुई कि क्या आर्यपुत्र ! मुझे मार्ग बताकर छोड़ना चाहते हैं ।॥३१४।।

तब वे दोनों पति-पत्नी, सायंकाल में फल, मूल, जल आदि खा-पीकर कुशा के मास्तरण पर बान्त होकर सो गये ॥३१५॥

मार्ग-श्रम से श्रान्त दमयन्ती, धीरे-धीरे गहरी नींद में सो गई, किन्तु कलियुग से मोहित नल, उसे छोड़कर भागने की चिन्ता में जागता ही रहा ॥३१६॥

तदनन्तर, उसे सोई हुई जानकर, एक वस्त्र पहने हुए दमयन्ती को छोड़कर, उसकी चादर के फटे हुए आधे टुकड़े को ओड़कर वह नाल वहाँ से चला गया ।॥३१७।।

रात बीतने पर जगी हुई दमयन्ती ने, बन में पति को न देखकर और उसे त्याग कर गया हुबा जानकर विलाप करना आरम्भ किया-॥३१८॥

'हाय, आर्यपुत्र ! हाय महासत्त्वशालिन् ! हाय शत्रुओं पर भी कृपा करनेवाले! हाय मेरे प्यारे ! किसने तुझे मेरे प्रति इतना निर्देय बना दिया ? ॥३१९॥

तू अकेला इन घोर जंगलों में कैसे जायगा, तेरी यकावट दूर करने के लिए कौन सेवा करेगा। राजाओं के गिर पर धारण की हुई मालाओं के पराग से जो तेरे चरण रंग जाते थे, उन तेरे चरणों को अब मागं की धूल कलुषित करेगी! ॥३२०-३२१॥

जो तेरा शरीर, चन्दन के लेप का भी सहन नहीं कर सकता था, वह अब दोपहर के सूर्य की प्रचंड गरमी को कैसे सहन करेगा ॥३२२॥

मुझे शिशु बालक से क्या करना है, लड़की से क्या और अपनी आत्मा से भी क्या लाभ है? यदि मैं सती हूँ, तो उसके प्रभाव से देवता तेरा कल्याण करें ॥३२३॥

इस प्रकार, एक-एक बात के लिए नत की चिन्ता करती हुई वह सती दमयन्ती, नल द्वारा पहले दिन दिखाये हुए मार्ग से आगे चल पड़ी ॥ ३२४॥

मार्ग में जाते हुए उसने, नदियों, पहाड़ों और जंगलों को किसी प्रकार पार किया; किन्तु पति-भक्ति को वह किसी प्रकार पार न कर सकी ॥३२५।।

मागं में उसके सतीत्व के तेज ने उसकी रक्षा की; जिससे वह सर्प से बच गई और उस पर आसक्त व्याष (बहेलिया) भस्म होगया ॥ ३२६॥

तब दैवयोग से मार्ग में मिले हुए व्यापारियों के एक दल के साथ वह सुबाहु नाम के राजा के नगर में जा पहुँची ।॥३२७॥

वहाँ पर राजकुमारी ने, अपने महल से बैठे-बैठे दमयन्ती को दूर से ही देख लिया बौर उसकी सुन्दरता से प्रसन्न होकर उसे बुलवाकर और भेंट-रूप में उसे अपनी माता को सौंप दिया ॥ ३२८॥

तब वह दमयन्ती उस, महारानी से समावृत होकर उसी के पास रहने लगी। समाचार पूछने पर उसने इतना ही कहा कि मेरा पति मुझे छोड़कर चला गया ॥ ३२९॥

उभर दमयन्ती के पिता भीम ने नल का समाचार जानकर, नल और दमयन्ती के कुशल जानने के लिए चारों बोर दूत भेजे ॥३३०॥

उन दूतों में सुषेण नाम का एक मन्त्री, घूमता हुआ ब्राह्मण के वेश में सुबाहु की राजधानी में आ पहुंचा ॥३३१॥

वहाँ मन्त्री ने, आगन्तुकों में अपने परिचितों को ढूंढ़ती हुई दमयन्ती को देखा और उस दुखिया दमयन्ती ने भी पिता के मन्त्री को देखा ॥३३२॥

वे दोनों, परस्पर पहचानकर इस प्रकार रोने लगे कि सुबाडू राजा की रानी ने उन्हें जान लिया ॥३३३।।

जब उसने उन दोनों को अपने पास बुलाकर विस्तृत समाचार पूछा, तब उसे पता चला कि वह उसकी बहन की कन्या दमयन्ती है ॥ ३३४॥

तब महारानी ने, अपने पति में कहकर और दमयन्ती का सम्मान करके उसे रथ पर बैंडाकर मैनिक, सिपाहियों और मुषेण मन्त्री के साथ पिता के घर भेज दिया ।॥३३५।।

पिता के घर पहुँचकर और अपने दोनों बच्चों को पाकर पिता के संरक्षण में पति की प्रतीक्षा करती हुई दमयन्ती वहाँ रहने लगी ।।३३६॥

नल को पाक-विद्या और रथ चलाने की कला में विशेषज्ञ बताते हुए उसका परिचय देकर उसे ढूंढने के लिए दमयन्ती के पिता भीम ने, चारों ओर अपने गुप्तचर भेजे ॥३३७।।

और, गुप्तचरों से राजा भीम ने कहा- "जहाँ तुम्हें नल के होने का सन्देह हो, वहाँ तुम इस आर्या को पढ़ना वन में सोई हुई कुमुदिनी के समान सुन्दरी नवयुवती पत्नी को क्रूरता से छोड़कर बम्बर (वस्त्र और आकाश) का टुकड़ा पाकर हे चन्द्र, तू अदृश्य होकर कहाँ चला गया?"।॥३३८-३३९॥

उघर, राजा नल, उस वन में, रात्रि के समय, दमयन्ती को छोड़कर आघा दुपट्टा बोढ़े हुए दूर चला गया और आगे जाकर उसने वन में लगी हुई आग देखी ॥३४०॥

'हे महापुरुष, विवश मुझे जबतक यह दावाग्नि जला नहीं देती, उसके पहले ही मुझे इससे निकाल लो' ।।।३४१॥

ऐसा बचन सुनकर राजा ने ध्यान से देखा कि दावानल के पास कुंडली मारे हुए एक नाग बैठा है।॥ ३४२॥

वनाग्नि की लपटों से उस नाग के फथ की मणि की किरणें जटिल हो रही हैं, मानों वनाग्नि ने हाथ में प्रबंड शस्त्र लेकर उसकी खोपड़ी पकड़ ली हो ।॥ ३४३॥

राजा नल ने दया करके उसके समीप जाकर और उसे कंधे पर रखकर दूर ले जाकर जैसे ही छोड़ना चाहा, वैसे ही वह नाग बोला-॥३४४।।

'यहाँ से और दस पग आगे ले जाकर मुझे छोड़ो।' तब नल एक, दो, चीन, चार, पाँच, छह सात, इस प्रकार गिनकर दस पग आगे गया। जब राजा ने दस (दश)¹ कहा, तब छल से कंधे पर बैठे हुए उस नाग ने ललाट के पास उसे हैंरु लिया। इस कारण, वह राजा, छोटे हाथोंवाला काला और विरूप हो गया- ॥३४५-३४७।।

तब राजा ने क्रोष से नाग को उतारकर कहा-'तू कौन है और तूने मेरे साथ यह क्या प्रत्युपकार किया है ?'।॥३४८॥

नल के यह वचन सुनकर वह नाग उत्तर देता हुआ बोला- 'राजन्, मुझे नागों का राजा कर्कोटक नाम से जानो। गुप्त निवास करने में रूप का बदल जाना महान् पुरुषों की कार्यसिद्धि के लिए ही होता है। इसलिए, मैंने तुम्हारे ललाट पर हंसा है, जो तेरे लाभ के लिए ही होगा ॥३४९-३५०॥

और, यह अग्निशौच नाम के वस्त्र का जोड़ा लो। इसे ओड़ते ही तुम अपने पूर्वरूप में आ जाओगे ॥३५१॥०

ऐसा कहकर और उसे शौचवस्त्र का जोड़ा देकर, कर्कोटक चला गया। उसके चले जाने पर, तल क्रमशः कोशल देश में जा पहुंचा ।।३५२॥

वहाँ जाकर वह नल, कोगलराज ऋतुपर्ण के घर में ह्रस्वबाहु के नाम से पाचक (रसोइया) बन गया ।॥३५३॥

वह जो दिव्य रसवाले भोजन बनाता था और रथ चलाने की विशेषता रखता था, इससे उसने उस राज्य में पर्याप्त यश प्राप्त कर लिया।। ३५४।।

जब कि नल हुस्वबाहु के नाम से वहाँ नौकरी कर रहा था, इसी बीच विदर्भ-राज्य के गुप्तबरों में से एक वहाँ आवा ॥३५५॥

निदिष्ट चिह्नों से वह नल को जानकर और उसे राजसमा में बैठे हुए देखकर, वह गुप्तचर युक्ति से वहाँ जा पहुंचा। वहाँ जाकर उसने अपने स्वामी भीम द्वारा कही हुई आर्या -पढी।।३५६-३५७।।

'वन में सोई कुमुदिनी के समान सुन्दरी नवयुवती पत्नी को क्रूरता से छोड़कर अम्बर (वस्त्र और आकाश) का टुकड़ा पाकर हे चन्द्र, तू अदृश्य होकर कहाँ चला गला गया ?' ॥३५८॥

उसे सुनकर सभासदों ने उसे पागल का प्रलाप समझा, किन्तु रसोइए के वेश में प्रच्छन्न नल ने उसे उत्तर दिया ॥३५९॥

'क्षीण चन्द्रमा, अम्बर (वस्त्र और आकाश) के एक देश से दूसरे (सूर्य-मंडल) मंडल में जाकर यदि कुमुदिनी के लिए अदृश्य हो जाता है। तो उसमें उसकी क्या क्रूरता है ?' ॥३६०॥

यह उत्तर सुनकर और उसे विपत्ति के कारण विकृत रूपवाला नल समझकर वह गुप्तचर वर्षों से चला गया ॥३६१॥

और, विदर्भ की राजधानी में पहुँचकर उसने महारानी के सहित राजा भीम तथा दमयन्ती से, जो कुछ उसने देखा-सुना था, सब कह मुनाया ।।३६२।।

यह सुनकर दमयन्ती, एकान्त में अपने पिता से बोली-'पाचक के रूप में छिपा हुआ बह अवश्य ही मेरा पति है ॥ ३६३॥

अब उसके यहाँ बुलाने में मेरी युक्ति कीजिए। उस राजा ऋतुपर्ण के पास दूत भेजिए, वह दूत राजा ऋतुपर्ण के पास पहुंचते ही राजा से यह कहे कि राजा नल कही चला गया है। उसका पता अब नहीं लग रहा है।॥ ३६४-३६५॥

अब दमयन्ती प्रातःकाल ही फिर स्वयंवर करेंगी। इसलिए, आप स्वयंवर के लिए आज ही विदर्भ देश में पधारे ॥ ३६६॥

यह सुनकर वह राजा, रथ चलाने में कुशल आर्यपुत्र (नल) के साथ एक दिन में अवश्य ही यहाँ आ जायगा' ।॥३६॥

पिता के साथ उसने इस प्रकार विचार कर और तदनुसार उसने कोसलराज के पास उपयुक्त दूत को भिजवाया ।।। ३६८॥

उस दूत ने, राजा ऋतुपर्ण को उसी प्रकार जाकर सन्देश दे दिया। उत्सुक राजा ऋतुपर्ण ने भी, सूत के रूप में अपने पास में स्थित नल से कहा ॥ ३६९।।

है ह्रस्वबाडू, तुमने मुझसे कहा था कि मुझे रथ चलाने का ज्ञान भी है, तो यदि तुम्हें उत्साह है, तो मुझे बाज ही विदर्भ देश की राजधानी में पहुंचा दो ॥ ३७०।।

यह सुनकर नल ने कहा, 'ठीक है. पहुंचाता हूँ।' इस प्रकार कहकर और अच्छे-अच्छे घोड़ों को जोड़कर उसने एक उत्तम रथ तैयार किया ॥३७१।।

यह स्वयंवर का प्रचार, मेरी प्राप्ति के लिए एक बहाना मात्र है, ऐसा मैं समझता हूँ; क्योंकि दमयन्ती तो स्वप्न में भी ऐसी नहीं है (कि वह पुनः स्वयंबर करे) ॥३७२॥

तो अब वहाँ जाकर देखता हूँ ऐसा सोचकर उसने, राजा ऋतुपर्ण के लिए, सजा-सजाया तैयार रथ ला दिया ॥ ३७३।।

राजा के रथ पर आरूढ़ हो जाने पर नल ने, गरुड को जीतनेवाले वेग से रथ को हाँका ॥३७४।।

रथ के वेग से राजा ऋतुपर्ण का वस्त्र गिर गया। तब रथ को रोकने के लिए कहते हुए राजा ऋतुपर्ण से नल ने कहा कि 'राजन्, तुम्हारा वह वस्त्र कहाँ गिरा, यह पता नहीं लगेगा; क्योंकि यह रथ, अनेक योजन आगे आ चुका है' ।।३७५-३७६।।

यह सुनकर राजा ऋतुपर्ण नल से बोला- 'तू मुझे रथ चलाने की क्रिया बता। मैं तुझे पासा फेंकने का तरीका बताता हूँ और उसका ज्ञान भी अभी कराता हूँ, जिससे पासे अपने वश में हो जाते है और संख्या भी मालूम हो जाती है ।।३७७-३७८॥

यह सामने जो वृक्ष दीख रहा है, उसके पत्तों और फलों को गिनकर मैं तुम्हें बताता हूँ और फिर तुम भी उसे गिनकर देखो' ।॥ ३७९॥

ऐसा कहकर ऋतुपर्ण ने, उम पेड़ के जितने पत्ते और फल बताये थे, नल के गिनने पर उतने ही निकले ॥३८०॥

तब गजा नन्न ने ऋनुपर्ण को रथ-मंचालन-विद्या बता दी और राजा ऋतुपर्ण ने उसे अक्ष-विद्या (युत-कला) ॥३८१॥

तब नल ने, उम विद्या को परीक्षा, एक दूसरे पेड़ पर की और उसने उमे भली भाँति मही पाया ॥३८२॥

यह जानकर राजा नल, जब प्रसन्न हुआ, तब उसके शरीर से एक काला पुरुष निकला। राजा ने उससे फिर पूछा- 'तू कौन है ।। ३८३॥

वह बोला-'मैं कलियुग हूँ। दमयन्ती के द्वारा तेरा वरण करने पर मैं ईर्ष्या से तेरे शरीर में घुमा। इसी कारण जुआ खेलने में तेरी मम्पत्ति नष्ट हो गई ॥ ३८४

तदनन्तर, वन में तुझे इंसते हुए काकर्कोटक ने तुझे नहीं हंसा, बल्कि मुझे इंसा। देख, यह जला हुआ मैं तेरे सामने बड़ा हूँ ।॥३८५॥

व्यर्थ ही दूसरे का अपमान करना किसके लिए कल्याणकारी होता है। इसलिए, बेटा, अब मैं जाता हूँ। अब दूसरों में मेरे रहने का स्थान नहीं है' ॥३८६॥

ऐसा कहकर वह कलि अदृश्य होगया और नल भी, उसी समय पहले के समान धर्मात्मा और तेजस्वी हो गया ॥ ३८७॥

तब नल ने आकर और रथ पर बैठकर वेग से उसी दिन, उस राजा ऋतुपर्ण को विदर्भ देश में पहुंचा दिया ॥ ३८८॥

वह राजा ऋतुपर्ण वहाँ के लोगों द्वारा हँसी का पात्र बनाया जाता हुजा वहीं राजभवन के पास ठहरा ॥ ३८९॥

आश्चर्यजनक रम की ध्वनि को सुनकर नल के आने की सम्भावना करती हुई दमयन्ती, हृदय से प्रसन्न हुई ।॥३९०।।

तदनन्तर उसने वास्तविक बात जानने के लिए उसके पास एक दासी को भेजा। वह दासी सब जानकर नल के लिए उत्सुक दमयन्ती से बोली-॥३९१॥

'हे देवि, मैंने जाकर पता लगाया कि यह राजा ऋतुपर्ण, तेरे झूठे स्वयंवर का निमन्त्रण पाकर बाया है। उसे ह्रस्वबाहु नाम का सारची एक दिन में ही यहाँ से आया है। क्योंकि, वह रय-संचालन-विज्ञान का विशेपज है ॥ ३९२-३९३।।

तो, मैंने रसोईचर में जाकर उम रसोइए को देखा। वह काले रंग और विकृत रूप का कोई व्यक्ति है।॥३९४॥

उसका च८त्कार मैंने देखा कि उसने चावलों में पानी नहीं डाला था, किन्तु उनमें स्वयं पानी आ गया लकडियों में आग न लगाने पर भी लकड़ियाँ अपने-आप जल उठीं और पलक मारते ही उसने अनेक प्रकार के दिव्य भोजन तैयार कर दिये। यह सब देखकर मुझे बहुत आश्चर्य हुआ और मैं यहाँ आई ॥३९५-३९६॥

दामी के मुंह में यह गब सुनकर दमयन्ती सोचने लगी 'अग्नि और जल जिसके वश में हों और जो ग्य-विया के रहस्य को जानता है, आर्यपुत्र (नक) इतना विरूप कैसे हो गया। मैं नमझती हूँ, मेरे विधोग से पीड़ित होने के कारण ऐसा हुआ होगा। तो मैं अब उसी से पूछती हूँ ॥३९७-३९८॥

ऐमा मोचकर दमवन्नी ने, उम दामी के साथ अपने दोनों बच्वों को नल के पास भेजा ॥३९९।।

उन्हें देखकर और दोनों बच्चों को गोद में लेकर बहुत समय तक धारा-प्रवाह आँसू बहाते हुए नल मौन रोता रहा ॥४००॥

कुछ समय बाद वह बेटी (दासी) से बोला ऐमे ही मेरे दो बच्चे, अपने नाना के घर में हैं। उन्हें स्मरण करके मुझे दुःख हुआ ।॥४०१॥

तब उस दासी ने, उन बच्चों के साथ लौटकर दमयन्ती को सारा समाचार सुनाया। तब दमयन्ती को भी पूर्ण विश्वास होगया ।॥४०२॥

दूसरे दिन, प्रातःकाल उसने दासी को आज्ञा दी कि तू जाकर राजा ऋतुपर्ण के रसोइए से कह दे-॥४०३।१

कि मैंने सुना है, 'तेरे समान दूसरा कोई रसोईदार नहीं है, अतः आज तू मेरे यहाँ आकर व्यंजन बना' ॥४०४

'ठीक है' ऐसा कहकर दासी द्वारा प्रार्थित किया गया पाचक, ऋतुपर्ण से आज्ञा लेकर दमयन्ती के पास आया ॥४०५।।

तब उसे देखकर दमयन्ती बोली-'रसोइए का रूप धारण किये हुए तुम यदि राजा नल हो, तो चिन्ता-समुद्र में डूबी हुई मुझे बाज पार लगाओ' ॥४०६।॥

यह सुनकर स्नेह, दुःख और लज्जा से जाकुल राजा नल नीचे मुँह किये हुए आँसुओं से रुधे गले से अवसर की बात बोला- ॥४०७॥

'हाँ, मैं वही बज-सा कठोर पापी नल हूँ। तुम्हें सन्तप्त करते हुए मैंने नल होकर भी अन्नल (अग्नि) का काम किया है' ।॥४०८॥

इस प्रकार कहते हुए नल से दमयन्ती ने पूछा कि यदि ऐसा है, तो तुम इतने कुरूप कैसे हो गये ? ॥४०९।।

इस प्रकार पूछती हुई दमनन्ती को नल ने अपना पिछला सारा समाचार-काकर्कोटक को आग से निकालने से लेकर कलियुग के शरीर से निकलने तक का मुना डाला ॥४१०॥

और, उसी समय काकर्कोटक के दिये हुए अग्नि से शुद्ध वस्त्रों को पहनकर वह नल, फिर से अपने पुराने और वास्तविक रूप में आ गया ॥ ४११॥

पुनः अपने सच्चे रूर में आये हुये सुन्दर नल को देखकर खिले हुए कमल के समान मुल-वाली दमयन्ती ने आंखों के आंसुओं में दु.ब-दावानल के शान्त हो जाने पर अवर्णनीय आनन्द का अनुभव किया ॥४१२॥

नल के मिल जाने में अत्यन्त प्रसन्न सेवक-सेविकाओं द्वारा नल का सहसा प्रकट हो जाना जानकर, उम विदर्भ राज भीम ने, वहाँ आकर नल का समुचित अभिनन्दन और समुचित आदर-मत्कार करके अपने नगर को महोत्सवमय बना दिया ॥४१३।।

तदनन्तर, मन-ही-मन हँसते हुए राजा भीम के द्वारा समुचित रूप से सत्कृत राजा ऋतुपर्ण भी नल को बधाई देकर कोसल देश को चला गया ।॥४१४।।

इसके पश्चात् नियच देश के राजा नल ने, कलियुग की दुष्टता के कारण होनेवाले उपद्रव को, राजा भीम को मुनाकर, अपनी प्राणप्यारी दमयन्ती के साथ वहीं सुखपूर्वक निवास किया ॥४१५॥

कुछ ही दिनों के अनन्तर धर्मात्मा राजा नल ने अपने श्वशुर की सेनाओं के साथ निषब देश में जाकर और अपने भाई पुष्कर को पासों के विज्ञान से जीतकर उसे बाज्ञाकारी बना लिया। देह से द्वापर के निकल जाने पर, शान्त हुए छोटे भाई पुष्कर को, उसका अपना भाग देकर नल अपनी प्राणप्रिया दमयन्ती के साथ अपने राज्य का पुनः विधिपूर्वक शासन करने लगा ॥४१६।।

तारापुर नगर में, इस प्रकार कथा सुना करब्राह्मण सुमन ने प्रोषितपतिका राजकुमारी बन्बुमती से फिर कहा-॥४१७॥

'हे राजपुत्री, बड़े-बड़े लोग भी, इस प्रकार का बसह्य कष्ट भोगकर पुनः कल्याण प्राप्त करते हैं। सूर्य के समान प्रचंड तेजस्वी भी, अस्त का अनुभव करके फिर उदय लेते हैं।॥४१८॥

इसलिए हे सदाचारिणी, तू भी यात्रा से लौटने पर अपने पति को अवश्य प्राप्त करेगी। धैर्य रख, उद्विग्नता छोड़। और, पति-प्राप्ति की कामना पूर्ण होने से आनन्द प्राप्त कर' ।।४१९॥

इस प्रकार, कहते हुए उस ब्राह्मण को बहुत धन, वस्त्र आदि से सत्कृत कर वह सद्‌गुणोंवाली बन्धुमती चैर्य-धारण करके अपने पति के अध्गमन की प्रतीक्षा में पिता के घर में निवास करती थी ॥४२०॥

कुछ ही दिनों के पश्चात् उसका पति महीपाल, दूसरे देश में रहनेवाली अपनी माता को साथ लेकर पिता-सहित पुनः अपनी राजधानी (तारापुर) में लौट आया ॥४२१॥

प्रजा के नेत्रों को आनन्द देनेवाले महोपाल ने, अपनी पत्नी बन्धुमती को इस प्रकार आनन्दित किया, जैसे पूर्णिमा का बन्द्र, समुद्र की लक्ष्मी को आनन्दित करता है।॥४२२॥

तदनन्तर महीपाल, बन्धुमती के साथ, उसके पिता द्वारा दिये गये राज्य के भार को वहन करता हुआ और अभीष्ट भोगों को प्राप्त करता हुआ अपनी पृथ्वी का शामन करने लगा ॥४२३॥

वत्सेश्वर उदयन का पुत्र नरवाहनदत्त, अपनी पत्नियों के साथ, मन्त्री मरुभूति के मुँह मे इस विवित्र और राग-मनोहर कथा को सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ। ॥४२४।।

महान कवि श्रीनोमदेव भट्ट द्वारा रचित कथासरित्सागर के अलंकारवती-लम्बक का षष्ठ तरंग समाप्त

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